Tuesday, September 30, 2025

गयाजी के तीर्थ (6) प्रेत शिला मंदिर ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

प्रेतशिला, बिहार के गया जिले में स्थित एक अत्यंत पवित्र स्थल है, जो पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है । यह न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यहाँ के लोकगीत, पुरानी परंपराएं और धार्मिक विधियाँ इसे विशेष बनाती हैं। यह गया शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक पर्वत है जिसके ऊपर प्रेतशिला वेदी है। यह स्थान गया शहर से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर- पश्चिम दिशा में स्थित है। रामशिला से यहां की दूरी 4 मील पश्चिम की तरफ है। नारद पुराण में है इसका वर्णन गया की प्रमुख वेदी प्रेतशिला शहर के पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित प्रेतगिरि पहाड़ी पर है।
अशांत आत्माओं को मुक्ति 
हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। मान्यताओं के अनुसार जबतक पुनर्जन्म या मोक्ष नहीं मिलता, आत्माएं भटकती रहती हैं। अकाल मृत्यु के कारण आत्माओं को शांति नहीं मिलती और वो भटकती रहती हैं। ऐसे में गया के प्रेतशिला पिंडवेदी में पिंडदान करने से अशांत आत्माओं को मुक्ति मिलने की मान्यता है।
पवित्र पहाड़ी
प्रेतशिला में स्थित एक पवित्र पहाड़ी माना जाता है कि पूर्वजों के उद्धार के लिए हिंदू अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है। तीर्थयात्री अपने दिवंगत प्रियजनों को मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने में मदद करने के लिए पिंड दान करने के लिए इस साइट पर जाते हैं। पहाड़ी आसपास के परिदृश्य का एक सुंदर दृश्य भी प्रदान करती है, जिससे यह एक आध्यात्मिक और सुरम्य स्थान दोनों बन जाता है।
पिंडदान करने से मोक्ष
मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां के पिंडदान के साथ ब्रह्म कुंड का भी पिंडदान किया जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख “प्रेतशिला तीर्थ” के रूप में मिलता है। 
यमराज का मंदिर
इस पर्वत पर भगवान यमराज का मंदिर है, जहाँ श्रद्धालु विशेषकर पितृ पक्ष मेला के समय आते हैं। इस स्थान पर की गई पूजा-अर्चना को स्वर्गलोक तक पहुँचने वाला कर्म माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां की पड़ाही पर मृत्यु के देवता भगवान यम को समर्पित एक मंदिर है। मंदिर का निर्माण शुरू में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था लेकिन इसका कई बार जीर्णोद्धार किया गया। 
भगवान श्री राम भी आए थे प्रेतशिला पिंडवेदी: 
प्रेतशिला भगवान श्री राम से भी जुड़ा है. प्रेतशिला स्थित ब्रह्मकुंड सरोवर में भगवान श्री राम ने स्नान किया था. ब्रह्म कुंड में भी पूर्वजों का पिंडदान किया जाता है. पितृ पक्ष मेले के आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को चावल और आटे से पिंडदान करने का विधान है. चावल आटे के पिंंड के पिंडदान से पितरों को जहां प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है. वहीं, ब्रह्मलोक की प्राप्ति भी हो जाती है. जिस प्रकार भगवान विष्णु की पूजा करने पर सभी प्रकार के यज्ञ पूर्ण हो जाते हैं. उसी प्रकार प्रेतशिला में श्राद्ध, तर्पण, स्नान एवं पिंडदान करने से पितरों को प्रेत योनी से मुक्ति और ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है. वहीं, पिंडदान करने वाले को अक्षय फल की प्राप्ति भी होती है.
रामकुंड तालाब
मंदिर के पास रामकुंड नामक एक तालाब देखा जा सकता है। माना जाता है कि भगवान राम ने एक बार इसमें स्नान किया था। यहां पहुंचने के लिए लगभग 380 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन जो लोग चढ़ नहीं पाते हैं, वे डोली का सहारा लेते हैं। यहां पिण्ड दान करने से और प्राणी प्रेत योनि से मुक्त होते हैं, खासकर अकाल मृत्यु वाले लोगों की आत्माओं को मुक्ति मिलती है।आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को प्रेतशिला पिण्ड दान करने का विधान है। 
भूतों का पहाड़
प्रेतशिला को भूतों का पहाड़ कहा जाता है। अकाल मृत्यु से परलोक सिधारने वाले गया जी में स्थित मुख्य वेदियों में से एक प्रेतशिला पिंडवेदी में निवास करते हैं।यहां अकाल मृत्यु से मरने वालों के निमित पिंडदान से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। वह अपने वंंश परिवार को आशीर्वाद देते हैं। लोगों का मानना है कि इस स्थान पर पिंडदान करने के बाद आत्मा को मोक्ष मिलता है। यहां तिल मिश्रित सत्तु के पिंडदान की विशेष महत्ता है। इस पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए 380 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। 
पितरों की आत्मा को मिलती है मुक्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रेतशिला पिंड वेदी पर श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को तुरंत मुक्ति मिल जाती है और उन्हें भटकना नहीं पड़ता है. यहां पर एक बहुत बड़ी चट्टान है. जिसका संबंध परलोक से माना जाता है। गरुड़ पुराण की कथा के अनुसार इस शिला की दरारों से पितरों का आगमन होता है। वह पिंड ग्रहण करके अपने लोक वापस लौट जाते हैं. इस पर्वत की चोटी पर स्थित प्रेतशिला वेदी पर श्राद्ध करने से भूत-प्रेत योनी में भटकती आत्माओं को भी मुक्ति मिल जाती है।
ब्रह्मा जी ने अपने अंगुठे से खीचीं थी लकीरें:- 
देर संध्या होते ही इस पहाड़ पर कोई नहीं जाता।अकाल मृत्यु वाले पितर जो यहां वास करते हैं, उनकी तरह-तरह की आवाजें यहां सुनाई पड़ती है। यह वह पिंडवेदी है, जहां ब्रह्मा जी ने अपने अंगूठे से तीन लकीरें खींची थी। यहां ब्रह्मा जी के चरण चिह्न हैं और यह धर्मशिला के रूप में जाना जाता है।
सत्तू उड़ाने का विधान:- 
प्रेतशिला में सत्तू उड़ाने का विधान है. यहां पिंडदान और सत्तू उड़ा कर अकाल मृत्यु से मरे पितरों को मोक्ष दिलाने की मान्यता है. मान्यता है, कि यहां सबसे उंची चोटी पर प्रेत वेदी यानि कि जो चट्टान है और उसमें जो दरार है, वह पिंडदान और सतू उड़ाने से पितरों के लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त कर देता है. इस पहाड़ पर यम देवता का भी निवास है और मंदिर है.
पितृपक्ष मेले के तीसरे दिन प्रेतशिला में पिंडदान का विधान है. यहां सतू उड़ाकर पिंडदानी अपने पितर के लिए मोक्ष की कामना करते हैं. यहां पिंडदान से पितर को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है. यहां सत्तू उड़ाकर पिंडदान का अति महत्व है. बताया जाता है कि अकाल मृत्यु जिनके यहां होती है, उनके यहां सूतक काल लगा रहता है. सूतक काल में सत्तू का सेवन वर्जित माना गया है.
पितरों का फोटो लगाकर पिंडदान करने की प्रथा:- 
प्रेतशिला में अपने पितरों का फोटो लगाकर तीर्थ यात्री पिंडदान करते हैं. पिंडदान का कर्मकांड पूरा होने के बाद फोटो को विसर्जित कर दिया जाता है. पितरों के फोटो को पीपल के वृक्ष या बरगद के वृक्ष के पास समर्पित कर दिया जाता है. प्रेतशिला में पितरों के फोटो के साथ पिंडदान के उपरांत तस्वीर को प्रेतशिला स्थित बरगद के वृक्ष या फिर प्रेत शिला में स्थित ब्रह्मकुंड तालाब के पास छोड़ देते हैं. पूर्वजों का पिंडदान के बाद उनकी फोटो को पिंडदानी वापस नहीं ले जाते हैं. उनके द्वारा छोड़े गए फोटो को विभिन्न पुजारी कई स्थान पर बरगद या पीपल के वृक्ष के समीप रख देते हैं या फिर उसे टांग देते हैं.
प्रेत वेदी की परिक्रमा करना आवश्यक:  
पिंडदानी जब सत्तू उड़ाते हैं, तो इस प्रेत वेदी की तीन से पांच बार परिक्रमा करते हैं और सत्तू को चट्टान की दरार में उड़ाते हैं. चट्टान की दरार में जब सत्तू डालकर अपने पितरों के प्रेत योनि से मुक्ति की कामना करते हैं और पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है. सत्तू पितरों को प्रिय होता है, क्योंकि इससे उन्हें मोक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है. इसलिए पहाड़ी की चोटी पर चट्टान के पास हवा में पिंडदानी सत्तू उड़ाते हैं, जिससे अकाल मृत्यु में मरे पूर्वज प्रेतयोनी से मुक्त हो जाते हैं. अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों का श्राद्ध पिंडदान प्रेत शिला में करने का विशेष महत्व है.
ताली बजाकर लगाया जाता है ठहाका 
कहा जाता है कि अकाल मृत्‍यु से मरने वाले पूर्वजों का प्रेतशिला की वेदी पर श्राद्ध और पिंडदान करने का विशेष महत्‍व है। पिंडदान के बाद परिजन ताली बजाकर ठहाका लगाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि अकाल मृत्यु के कारण किसी की मौत होती है, तो उनके घर में लोग रोते हैं। लेकिन प्रेतशिला में पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष मिलती है और आज के दिन पितरों का द्वार खुला होता है। यही कारण है कि उनके परिजन तीन बार ताली बजाकर ठहाका लगाकर खुशी का इजहार करते हैं।
शाम के बाद कोई नहीं रहता यहां:- कहा जाता है कि यहां प्रेतशिला के चट्टानों के छिद्रों में अकाल मृत्यु के शिकार पितरों का वास होता है. चूंकि मृत्यु दो तरीके से होती है. एक प्राकृतिक और एक अप्राकृतिक यानि कि अकाल मृत्यु का शिकार होने वाले पितरों का इस प्रेत पर्वत पर वास होता है. यही वजह है, कि इस प्रेत पर्वत को भूतों का पहाड़ भी कहा जाता है. यहां संध्या के बाद कोई व्यक्ति पहाड़ पर नहीं जाता. सिर्फ पुजारी साधु संतों को ही या अपवाद स्वरूप किसी व्यक्ति को ही संध्या पहर के बाद यहां देखा जा सकता है। प्रेत शिला की कहानी इस लिंक द्वारा और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है - 

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लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवंसूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिकविषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, धर्म, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक स्वयं चारों धाम की यात्रा कर गया जी के तथ्यों से अवगत हुआ है।
वॉट्सप नं.+919412300183

Saturday, September 27, 2025

मातृ गया कहा जाता है गुजरात का सिद्धपुर ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

भारत में एक मात्र माताओं का पिंडदान स्थल 
पितृ पक्ष में जहां गया को पितरों की मुक्ति का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, वहीं गुजरात का सिद्धपुर माताओं की आत्मा की शांति के लिए अनोखा स्थल है. यहां सिर्फ मातृ श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा है, जिसे हर्ष बिंदु सरोवर से जोड़ा जाता है. परशुराम और कपिल मुनि तक ने यहां अपनी माताओं का श्राद्ध किया था. यहां सिर्फ मां के लिए पिंडदान और श्राद्ध किए जाते हैं. यही वजह है कि इसे लोग ‘मातृगया’ भी कहते हैं.

 सिद्धपुर की खासियत 
सिद्धपुर का सबसे अहम तीर्थ है हर्ष बिंदु सरोवर, जिसके बारे में कहा जाता है कि ये भगवान विष्णु के आंसुओं से बना. पौराणिक मान्यता के अनुसार, ऋषि कर्दम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु के आँसुओं की बूंदें एक कुंड में एकत्रित हुईं, जिससे बिंदु सरोवर बना। मान्यता है कि यहीं पर परशुराम ने अपनी माता का श्राद्ध किया था. यही नहीं, कपिल मुनि ने भी अपनी माता देवहूति का पिंडदान यहीं किया था. धार्मिक मान्यता के अनुसार देवहूति दुनिया की पहली मां थीं, जिनका श्राद्ध यहां हुआ.सिद्धपुर को पवित्र बनाने वाले सिर्फ मिथक नहीं हैं, बल्कि यहां की परंपराएं भी हैं. मोक्ष पीपल नाम से प्रसिद्ध एक वटवृक्ष के नीचे पुत्र अपनी मां के मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं और यही वह जगह है, जहां सदियों से उत्तर भारत से आए ब्राह्मण परिवार मातृ श्राद्ध कराते आ रहे हैं.

सिर्फ मां के श्राद्ध की अनोखी परंपरा
सिद्धपुर का ये बिंदु सरोवर अहमदाबाद से लगभग 115 किलोमीटर दूर है.सिद्धपुर का बिंदु सरोवर गुजरात में स्थित एक पवित्र कुंड है, जिसे 'मातृ तर्पण स्थल' या 'मातृ गया' के नाम से भी जाना जाता है। यह पांच पवित्र सरोवरों में से एक है और इसके बारे में मान्यता है कि यह भगवान विष्णु के आँसुओं की बूंदों से बना है। ऋग्वेद, रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। यहां दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक से लोग आते हैं. यहां 30 परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ियों से मातृ श्राद्ध की परंपरा निभा रहे हैं. इन ब्राह्मणों को ‘औदिच्य’ कहा जाता है, जिसका मतलब है उत्तर से आए लोग. आज भी यहां वंशावली लिखने की परंपरा वैसी ही जीवित है जैसी गया में है. पुरोहित अपनी बहियों से बता देते हैं कि आपके परिवार से पहले कौन-कौन यहां मातृ श्राद्ध कर चुका है. गुरु गोलवलकर से लेकर अमिताभ बच्चन तक यहां अपनी मां का पिंडदान कर चुके हैं.यहां आने वाले लोगों की भावनाएं बहुत अलग होती हैं. पिता के लिए श्राद्ध की परंपरा हर जगह है, लेकिन मां के लिए एक अलग स्थल होना लोगों के दिल को छूता है. यहां सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी अपनी मां, नानी, दादी या परदादी के श्राद्ध के लिए आती हैं.
   यहां उत्तर और दक्षिण भारत से हजारों लोग हर साल आते हैं. पर एक दिक्कत है कि ट्रेनें यहां से होकर गुजरती हैं लेकिन रुकती नहीं. अगर सरकार यहां एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों का स्टॉपेज दे दे, तो सिद्धपुर का महत्व और बढ़ सकता है. गया में जैसी सुविधा है, वैसी ही यहां भी होनी चाहिए क्योंकि ये मातृगया है.

श्राद्ध की परंपरा
यहां मातृ श्राद्ध की विधि भी खास है. ब्राह्मण यजमान के लिए चावल से पिंड बनता है जबकि अन्य जातियों के लिए जौ का पिंड तैयार किया जाता है. पुरोहित मंडल के अनुसार यहां 200 से ज्यादा ब्राह्मण परिवार जुड़े हैं, जो सालभर श्राद्ध-तर्पण कराते हैं. सिद्धपुर का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी बहुत गहरा है. अक्सर बेटे अपनी मां से सबसे गहरा रिश्ता मानते हैं. जब मां इस दुनिया से चली जाती है तो यहां आकर मातृ पिंडदान करना उनके लिए श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक बन जाता है.

अन्य प्रमुख आकर्षण 

कपिल मुनि का आश्रम:
कहा जाता है कि कपिल मुनि ने अपनी माता देवहूति को ज्ञान प्रदान करने के लिए इसी सरोवर के किनारे तपस्या की थी। 

ऋषि परशुराम से भी जुड़ा ये स्थान :
परशुराम ने भी अपनी माता का श्राद्ध इसी सरोवर के किनारे किया था, जो इसे धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।

पर्यटक यहां बिंदु सरोवर के अलावा प्राचीन वालकेश्वर महादेव मंदिर, बोहरा हवेलियाँ और अन्य ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन भी कर सकते हैं। 
        ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 










Friday, September 26, 2025

पितृतर्पण, पिण्डदान में सत्कर्म में अपकर्म भी हो जाते हैं- ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


पितरों को श्रद्धा और श्राद्ध देने का महापर्व
पितृ पक्ष' अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का
महापर्व होता है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में देखे जाते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के आधार पर सूर्य देव जब कन्या राशि में गोचर करते हैं, तब हमारे पितर अपने पुत्र-पौत्रों के यहाँ विचरण करते हैं। विशेष रूप से वे तर्पण की कामना करते हैं। श्राद्ध से पितृगण प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वालों को सुख-समृद्धि, सफलता, आरोग्य और संतान रूपी फल देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। वे उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
बारह पिंड निकालने की क्रिया
हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल और पितृकुल दोनों की पहले पीढ़ियों के गुणसूत्र उपस्थित होते हैं। चावल के पिंड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, उन्हें आपस में मिलाकर फिर अलग बांटते हैं। जिन-जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की देह में हैं, उन सबकी तृप्ति के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है। पिंडदान दाहिने हाथ में लेकर करना चाहिए और मंत्र के साथ पितृ तीर्थ मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिंड किसी थाली या पत्तल में स्थापित करें। पितृतीर्थ मुद्रा में दक्षिण दिशा में मुख करके बायां घुटना मोड़कर बैठा जाता है। इस तरह सबसे पहला पिंड देवताओं के निमित निकालें। दूसरा पिंड ऋषियों के निमित तीसरा दिव्य मानवों के निमित, चौथा दिव्य पितरों के, पांचवां पिंड यम के, छठा मनुष्य-पितरों के नाम, सातवां मृतात्मा के नाम, आठवां पिंड पुत्रदारा रहितों के नाम, नौवां उच्छिन्न कुलवंश वालों के नाम, दसवां पिंड गर्भपात से मर जाने वालों के नाम, ग्यारहवां और बारहवां पिंड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित।
इस तरह से बारह पिंड निकाले जाते हैं और उन पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्रार्थना की जाती है और मंत्र का जप किया जाता है। मंत्र है- 
ऊं पयः पृथ्वियां पय ओषधीय, 
पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। 
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम। 
गरुण पुराण के हवाले से श्री कृष्ण का वचन उद्घृत है - 
कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति। 
आयुः पुत्रान्यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।। 
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्। 
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।। 
देवताभ्यः पितृणां हिपूर्वमाप्यायनं शुभम्।।
पितृ कर्म से तीनो ऋणों से मुक्ति 
भारतीय वैदिक वांगमय के अनुसार प्रत्येक मनुष्य पर इस धरती पर शरीर धारण करने के पश्चात् तीन प्रकार के ऋण बन जाते हैं-
देव ऋण
ऋषि ऋण
पितृ ऋण
पितृ पक्ष के श्राद्ध :- इस अवधि के 16 श्राद्ध साल के ऐसे सुनहरे दिन हैं, जिनमें व्यक्ति श्राद्ध प्रक्रिया में शामिल होकर उपरोक्त तीनों ऋणों से मुक्त हो सकता है। महाभारत के प्रसंग के अनुसार, मृत्यु के उपरांत कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इनकार कर दिया था। कर्ण ने कहा, "मैंने तो अपनी सारी सम्पदा सदैव दान-पुण्य में ही समर्पित की है, फिर मेरे ऊपर यह कैसा ऋण बचा हुआ है?” चित्रगुप्त ने जवाब दिया कि "राजन, आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन आपके उपर अभी पितृऋण बाकी है। जब तक आप इस ऋण से मुक्त नहीं होंगे, तब तक आपको मोक्ष मिलना कठिन होगा।" इसके उपरांत धर्मराज ने कर्ण को यह व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पुनः पृथ्वी पर जाइए और अपने ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध-तर्पण तथा पिंडदान विधिवत करके आइए। तभी आपको मोक्ष यानी स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी।” इस घटना से पितृ कर्म की प्रमाणिकता और भी बलवती हो जाती है।
पितरों को श्रद्धा - श्राद्ध ना देने का फल
जो लोग दान श्राद्ध, तर्पण आदि नहीं करते, माता-पिता और बडे बुजुर्गो का आदर सत्कार नहीं करते, पितृ गण उनसे हमेशा नाराज रहते हैं। इसके कारण वे या उनके परिवार के अन्य सदस्य रोगी, दु:खी, मानसिक और आर्थिक कष्ट से पीड़ित रहते है। वे निःसंतान भी हो सकते हैं। पितृदोष के कारण उनको संन्तान का सुख भी दुर्लभ रहता है। 
     भारत की पावन भूमि में ऐसे कई स्थान हैं, जहाँ ऐसे भूले- भटके लोग पितृदोष की निवृत्ति के लिए अनुष्ठान कर सकते हैं। देश के गया आदि जैसे अनेक पौराणिक स्थल पितृ दोष के निवारण के लिए श्राद्धकर्म को आरंभ करने हेतु उपयुक्त स्थल हैं। इन स्थलों में जाकर वे श्रद्धालु पितृ पक्ष के श्राद्ध आरंभ कर सकते हैं, जिन्होंने पहले कभी भी श्राद्घ न किया हो। वैसे तो पितृ पक्ष के श्राद्ध की महिमा अपार है, लेकिन जो भी श्रद्धालु अपने दिवंगत पिता, माता दादा, परदादा, नाना, नानी आदि का इन 16 श्राद्धों में व्रत उपवास रखकर ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा आदि देते हैं, उनके घर लक्ष्मी और विष्णु भगवान सदैव ही बने रहते हैं। अर्थात् वे सदैव ही धन धान्य से परिपूर्ण रहते हैं।श्राद्ध कर्म के पीछे के विज्ञान का एक पक्ष भावना से जुड़ा है और दूसरा पक्ष आध्यात्मिक विज्ञान से। यथा - 
।।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।...
ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।
(भावार्थ : पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।)
अर्यमा हिंदू धर्म में एक देवता हैं जो पितरों के अधिपति और पितृलोक के राजा हैं। वे ऋषि कश्यप और देवमाता अदिति के पुत्रों में से एक हैं और आदित्य देवताओं में शामिल हैं। श्राद्ध और तर्पण के दौरान अर्यमा का नाम लेना पितरों की आत्मा की शांति के लिए आवश्यक माना जाता है, क्योंकि उनकी प्रसन्नता से ही पितर तृप्त होते हैं। 
।।श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छादम्।।
(भावार्थ : श्राद्ध से श्रेष्ठ संतान, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।)
सात कुल प्रभावित
सात कुलों के लिए पिण्ड दान,तर्पण और दक्षिणा का कर्म संचालित होता है - 
1.पिता का परिवार - पिताजी कुल
2.माता का परिवार - नाना कुल
3.पत्नी का परिवार - भार्या कुल
4.बहन का परिवार - भगिनी कुल
5.बेटी का परिवार - दोहिता कुल
6.पिता की बहन का परिवार - पितृ भगिनी - बुआ
7.माता की बहन का परिवार - मातृ भगिनी - मौसी
     मोटे तौर पर हम इन्हें अपने पिता, दादा, परदादा, माता, दादी, परदादी, नाना, परनाना, विधात्नानी, नानी,परनानी, विधात्नानी, चाचा, ताऊ, चाची, ताई,
पत्नी के पिता और माता, बुआ, फूफा, मामा, मामी, मौसा, मौसी, आदि को 
अभिमंत्रित करते हैं। इसके अलावा किसी का नाम हम भूल गए हों, जिस किसी की आकस्मिक दुर्घटना जनित मृत्यु हुई हो, जो आग से जल कर मरा हो, पानी में डूबने से मरा हो, सर्पदंश से मौत हुई हो, आत्म हत्या की हो, गर्भस्थ मृत्यु पाया हो, सांप ने काटा हो यहां तक पशु-पक्षी योनि में से भी कोई हो, वे सब इस पूजा से प्रभावित होते हैं। इन सब के लिए पिण्ड दान,तर्पण और दक्षिणा कर्म सम्पन्न कराया जाता है ।
कुछ खास तैयारी 
अपने सात कुलों/परिवारों के रिश्तेदारों की सूची उनके गोत्र की जानकारी रखना चाहिए।
1.कपड़ों का एक सेट जो आपके पिता पहनते थे , क्रय करना चाहिए।
2. साड़ी और ब्लाउज का सेट जो माँ पहनना पसंद करती थीं, क्रय करना चाहिए।
3. पितरों के मोक्ष लिए 84 दान प्रयागराज और अन्य तीर्थ स्थानों में किए 
जाते हैं, जो 84 लाख योनियों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्राप्ति का फल प्रदान करती है। सम्राट हर्षवर्धन ने अपने समय में प्रयाग कुंभ में 84 दान किए थे, जिसमें वस्त्र, बिस्तर और घरेलू सामान जैसी कई वस्तुएं शामिल थीं। इस दान की परंपरा में सेजिया दान (बिस्तर दान) प्रमुख है, और यह व्यक्ति को इस लोक में कल्याण व परलोक दिलाता है। इनमें सज्जा दान, वस्त्र बिछाने ओढ़ने वाले का दान, बरतन दान, छाता, चप्पल ,मच्छरदानी, सोना दान,गौ दान , भू दान, अश्व दान आदि भी किया जाता है।
4. अपने स्थानीय पंडे और पुरोहित से एक लम्बी चौड़ी सामनों की लिस्ट बनवा लेनी चाहिए उसे यात्रा के दौरान क्रय कर लेनी चाहिए।
5.स्थानीय पुरोहित और पिण्ड स्थल का पंडा और पुरोहित इस संस्कार को श्रद्धा से करवाते है और दक्षिणा चढ़वाते हैं।
5.यह क्रिया घर पर ,अयोध्या सरयू घाट पर, अयोध्या के भरत कुंड पर , वाराणसी गंगा घाट पर ,वाराणसी का पिचास मोचन घाट पर पिण्ड दान करवाया जाता है। इसके बाद पुन - पुन गया आदि 54 पवित्र वेदियों पर सम्पन्न कराया जाता है।
गया में पिंडदान 
अगली कड़ी में मुख्य रूप से गया में श्राद्ध, पितृ यज्ञ, शुद्ध कार्य के लिए पिंडदान किया जाता है। इसे पितरों के लिए श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।
गया जी में पिंडदान करने के लिए 3 मुख्य और पचासों गौड़ पिण्ड वेदियां भी हैं। इनमें कुछ ही पर पिण्ड दान करवाया जाता है। मुख्य वेदियां निम्न है - 
1- फाल्गुनी नदी - पिंड दान
2- श्री विष्णुपद मंदिर - पिंड दान
3- श्री अक्षय वट जी - पिंड दान 
4- वैतरणी - अंतिम मुक्ति का तर्पण
मुख्यतःपुत्र ही श्राद्ध कर्म का अधिकारी 
पिंडदान का सबसे पहला अधिकार ज्येष्ठ पुत्र को होता है। पिंड दान और तर्पण के लिए मुख्यतःपुत्र आदरणीय अज्ञेय होने के साथ-साथ श्राद्ध कर्म करता है, वह ब्राह्मणों को भोजन कराता है। यदि पुत्र न हो तो उसका अधिकार पोता, पुत्र का पुत्र और परपोता (प्रपौत्र), पुत्री के पुत्र (नाती), पत्नी, भाई, भतीजा, भांजा, पुत्री की बहू या बेटी भी यह दायित्व संभाल सकते हैं, यदि वे अनुपस्थित या असमर्थ हों और परिवार में कोई पुरुष सदस्य न हो, तो दामाद भी पिंडदान कर सकता है। गोद लिया हुआ पुत्र भी अधिकारी होता है यदि कोई भी उत्तराधिकारी न हो, तो राजा या पुरोहित (पंडित) या ब्राह्मण भी इसे कर सकते हैं। ब्राह्मण को दतक मानकर पिंडदान करने का विधान है। ये सभी गया जी में पिंडदान करते हैं । पिंडदान के बाद ब्राह्मण भोजन कराया जाता है । इसके बाद दक्षिणा दी जाती है। कुछ लोग शैय्या दान, श्रृंगार सामग्री का दान, वस्त्र दान, शैय्या दान, स्वर्ण दान, गौदान ,वर्तन दान, आदि करते हैं। अष्ट महादान में पितरों को संतुष्ट करने वाले आठ प्रकार के दान में तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्तधान्य (सात तरह के अनाज), भूमि और गाय शामिल हैं। भगवद गीता के अनुसार सात्विक, राजसिक और तामसिक दान के तीन प्रकार हैं। कुछ स्रोत 16 अलग-अलग प्रकारों में भौतिक वस्तुएं और अनुष्ठानिक दान दोनों को शामिल करते हैं, जैसे हिरण्यगर्भ दान, ब्रह्मांड दान, कल्पवृक्ष दान, और रत्नधेनु दान महा दान के उदाहरण हैं। गाय, स्वर्ण, चांदी, रत्न, विद्या, तिल, कन्या, हाथी, घोड़ा, शय्या, वस्त्र, भूमि, अन्न, दूध, छत्र तथा आवश्यक सामग्री सहित घर इन 16 वस्तुओं के दान को महादान कहते हैं।
गया का डांड अपकर्म है शास्त्रीय नहीं 
गया के पण्डो द्वारा धर्मिक अनुष्ठान और आवश्यक खर्च के नाम पर कुछ वाजिब और कुछ गैरवाजिब शुल्क जबरन या स्वेच्छया संकल्प कराए जाते हैं जिसमें पूजन सामग्री, ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा, दान-दक्षिणा, तथा कभी-कभी यात्रा और ठहरने का खर्च शामिल होता है, जो पिंडदान की अवधि और विधि पर निर्भर करता है. इसके अलावा, पण्डित अक्सर विधि की एक निश्चित फीस दक्षिणा भी लेते हैं और दान-पुण्य जैसे अन्य खर्चे भी इसमें शामिल करते हैं. पितृकर्म के संदर्भ में डांड नहीं होता है । यह सामान्यतः शारीरिक या सामाजिक सजा के संदर्भ में प्रयुक्त होता है, पर गया में खुले मंच पर डांड कह कर पंडा और पुरोहित अपने को गौरवान्वित होकर अपकर्म कर जाते हैं। उनके द्वारा उत्तम मध्यम और अधम श्रेणी का दान और दक्षिणा कह कर यजमान से भारी रकम देने के लिए बाध्य किया जाना डांड भी अपकर्म हो जाता है। इसे बढ़ावा न देकर शास्त्रोचित कर्म को प्रेरित करना चाहिए।
       इस अपकर्म को प्रोत्साहित करने के लिए गया का पंडा सामंतवाद जैसा एक पंचायत सभा आहुत कर लोगों को सनातन कर्म कांड के बारे में एक विशेष व्याख्यान भी देता है। अपना चरण पूजा करवाता है और दक्षिणा एवं भोजन का खर्चा भी लेता है। उनके द्वारा उत्तम मध्यम और अधम श्रेणी का दान और दक्षिणा कह कर यजमान को डांड (अपकर्म) के लिए बाध्य किया जाता है । खुले मंच से यजमान से संकल्प करा कर धन वसूला जाता है। उनके साथ उनके कुछ हृष्ट पुष्ट सहायक भी उनके काम में मदद करते हैं।
जगन्नाथपुरी का अटका भी अपकर्म 
जगन्नाथ पुरी में पिंडदान के लिए पंडा कोई न कोई निर्धारित शुल्क लेता है, वह अपनी सेवा और भगवान जगन्नाथ को भोग चढ़ाने के बदले में दक्षिणा स्वरूप अटका मांगते हैं, जो भक्त की इच्छा पर निर्भर करता है और हजार रुपये से कम नहीं होता है। इस शुल्क से जगन्नाथ मंदिर में तरह-तरह के भोग लगाने की बात कही जाती है। कुछ शुल्क मंदिर में जमा करने की बात कही जाती है। पितृकर्म से वैदिक रूप में अटका कोई शास्त्र सम्मत संबंध नहीं होता है। पर व्यवहारिक रूप में तीर्थ पुरोहित खुले मंच से 'अटका' को अपना अधिकार कहते हैं। वैसे अटका का अर्थ किसी कार्य में बाधा या रुकावट आना होता है। इसे पंडा और पुरोहित द्वारा यजमान से कहना और मांगना उचित नहीं है। फिर भी व्यवहारिक रूप में यह प्रचलित है। सरकार के किसी सक्षम संगठन द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर इस समस्या का निदान करना चाहिए।  
       तीर्थ में शुल्क इस बात पर निर्भर कर सकता है कि आप पंडा को किस काम के लिए भुगतान कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप मंदिर के भीतर किसी विशेष पूजा या अनुष्ठान के लिए पंडा को संलग्न करते हैं, तो शुल्क वाजिब है। पंडा द्वारा यह अपेक्षा की जाती है कि यजमान अपनी इच्छा से कुछ दक्षिणा दे। आप अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जो चाहें नहीं दे पाते हैं, अपितु पंडा या पुरोहित के आदेश पर डांड देने के लिए बाध्य कर दिए जाते हैं। यह भी एक प्रकार से अपकर्म ही है।
धार्मिक स्थानों पर दान ईश्वर प्रेरित सद कार्य :- 
हमारे देश में अन्य जगहों की अपेक्षा धार्मिक स्थानों में ही ज्यादा पैसा दान किया जाता है या चढ़ाया जाता है । हिन्दू मंदिर इसका हिसाब रखते है और सरकार के खाते में भी की कुछ अंश डालते हैं पर कई अन्य धर्मों में यह नियंत्रण और हिसाब देखने या मांगने की हिम्मत किसी को नहीं होती है। सरकार को जमा इस पैसे का सदुपयोग अच्छी तरह से नहीं हो पाता। उस जगह के रखरखाव तथा अन्य खर्चों के अलावा जो पैसे बचते हैं। अगर उन पैसों को जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद के लिए उपयोग किया जाए तो यह उस पैसे का सर्वोत्तम उपयोग होगा। जैसे गरीब बच्चों की पढ़ाई में ,गरीब लोगों के इलाज के लिए अस्पतालों की सुविधा, तथा उनके लिए घर बनाना, कपड़ों की व्यवस्था करना, भूखे व्यक्तियों के लिए भोजन आदि की व्यवस्था की जा सकती है। इसके अलावा लाइब्रेरी खोली जा सकती है जो बच्चे किताब नहीं खरीद सकते हैं उनके लिए तो यह सबसे उपयुक्त होगा। शहर के विकास कार्यों में पैसा खर्च किया जा सकता है ताकि लोगों को और सुविधाएं उपलब्ध हो सके।अगर कोई पैसे का सच में सदुपयोग करना चाहे तो रास्ते हजार हैं । और इन कामों को करने से भगवान भी खुश और इंसान‌ भी खुश हो सकते हैं। इससे बढ़िया सदुपयोग और क्या हो सकता है उस दान के पैसे का जिसका पाई-पाई लोगों की भलाई के लिए काम आ जाए।
     वैदिक शास्त्रों में लिखा है कि हर गृहस्थ का ये कर्तव्य होता है अपनी कमाई का दसवां भाग दान करे। दान ज़रूरी नहीं किसी मंदिर में ही किया जाए, वह ब्राह्मणों को अलग से भोज कराकर भी दिया जा सकता है। हर कोई किसी गरीब को स्वतः ही दान दे सकता है।
     सन्यासी और ब्रह्मचारी जो मंदिर में भगवान की सेवा करते हैं। उनका कार्य होता है कि वो समाज को भगवद-ज्ञान दें। अतः उनकी सेवा करना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है। इसलिए मंदिरों में दान देने की प्रथा शुरू हुई, जो मुझे लगता है एक सही चीज़ है अगर सही जगह की जाए तो और उत्तम है।
      धार्मिक स्थलों पर लोगों द्वारा पैसे या चढ़ावा चढ़ाने को मैं गलत नहीं मानता हूं यदि यह स्वेच्छया ईश्वर के प्रति यह जाता है और यह किसी के काम आ रहा है तो ठीक है। हम और आप सिर्फ माध्यम है , यह ईश्वर का दिया हुआ है इस भावना से दिया हुआ दान ईश्वर को मंजूर है। दान देने के बाद उस दान से मोह या ममता नही रहना चाहिये जैसे कि कन्या दान के बाद पुत्री से। अगर उससे संबंध रहा तो सिवाय दुख के कुछ नहीं होने वाला है वैसे भी दान सात्विक पात्र को हो पाए तो वह आध्यात्मिक सुख शांति और मोक्ष का कारक होता है। 
जोर जबरदस्ती से लिया दान है झटका(अपकर्म)
झटका शब्द किसी अचानक हुए आघात, शारीरिक या मानसिक सदमे के लिए प्रयोग होता है। पितृ पक्ष के दान या शुल्क के लिए इस शब्द का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है। ये तो एक भक्त की भावना आहत होने की अनुभूति है,जिसे कोई भुक्त भोगी ही अनुभव कर सकता है। यदि यजमान अपने तीर्थ के अनुभव इसे इस रूप में पाए तो दोष उसका नहीं अपितु उसे उस परिस्थिति में लाने वाले पंडे या तीर्थ पुरोहित का है। स्वेच्छया दान ना होने,जोर जबरदस्ती से डांड को झटका या अपकर्म कहा जा सकता है। इस परम्परा को पारदर्शी बनाकर अंकुश लगाया जाना चाहिए। अक्षम व्यक्ति से या अत्यंत गलत पात्र को किया दान मुफ्त कमाई का साधन और पुजारियों, ट्रस्टियों, मालिकों द्वारा मनमानी मौज का साधन तो हो सकता है शुद्ध वैदिक दान की श्रेणी में नहीं आ सकता है। यह उनके आध्यात्मिक उन्नति में बाधक और नरक गामी बनाता है। यदि प्राप्त दान अच्छे उद्देश्य में लगा तभी फली भूत होगा। अन्यथा जोर जबरदस्ती से लिया दान शुभ फल दायक कभी नहीं हो सकता है और पाने वाला नरक गामी होता है। “माङव्य ऋषि” को गलत दण्ड देने वाले “धर्मराज” को “विदुर” बनकर दण्ड भोगना पड़ा था। “एकलव्य” से जबरन गुरु दक्षिणा लेने वाले “गुरु द्रोणाचार्य” को अपने प्राणों की आहुति महाभारत में देनी पड़ी। राम द्वारा बालि को छुपकर मारने के लिए कृष्णावतार में एक साधारण बहेलिए के हाथ प्राणोत्सर्ग करना पड़ा। राजा दशरथ के हाथ से श्रवण कुमार को बाण लगने की कीमत उन्हें जान देकर देनी पड़ी। 
       राष्ट्र कवि राम धारी सिंह दिनकर ने रश्मिरथी का अंतिम सातवां खण्ड में अपकर्म के बारे में इंगित करते हुए कहते हैं - 
पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,
सहेली सर्पिणी की हो चुकी है,
न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,
निगल ही जायगी सद्धर्म को वह ।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
(वॉट्सप नं.+919412300183)


Sunday, September 21, 2025

भारत के प्रमुख पिण्ड तर्पण स्थल✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


पितरों का महत्व और श्राद्ध की परंपरा

धर्मग्रंथों में साफ लिखा है कि मनुष्य का शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, पर आत्मा अमर रहती है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने बताया है कि पितृ दोष से मुक्ति और पितरों की शांति के लिए श्राद्ध व पिंडदान करना जरूरी है। यही वजह है कि आज भी यह माना जाता है कि अगर पितरों की आत्मा तृप्त है, तो परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

मोक्ष भूमि गया

वैसे तो देश में 55 से ज्यादा ऐसी जगहें हैं जहां पिंडदान किया जाता है, लेकिन बिहार के गया में इसका खास महत्व है। यही वह जगह है जहां परंपरा, कथा और आस्था तीनों एक साथ मिलते हैं। यही वजह है कि आज भी कोई बेटा या बेटी जब अपने पितरों की आत्मा की शांति चाहता है, तो पहला ख्याल गया का ही आता है।

गया की धरती पर कदम रखना एक हिन्दू के लिए बड़े पुण्य का काम है । कहा जाता है कि खुद भगवान विष्णु यहां पितृ देव के रूप में विराजमान हैं। यही कारण है कि गया का नाम आते ही लोगों की श्रद्धा और भी बढ़ जाती है।इतना ही नहीं पितृपक्ष में भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विनअमावस्या तक देशभर से लाखों लोग यहां आते हैं।मान्यता है कि इन दिनों गया में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और परिवार पर से पितृ दोष दूर होता है।

गया धाम की कहानी:- 

प्राचीन काल में गयासुर नाम के एक राक्षस ने कठिन तप किया और ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके उनसे एक वरदान मांगा कि उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाये । उसको देखने मात्र से ही लोगों के पाप कट जाएं और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो । गयासुर को मिले उस वरदान ने सृष्टि का संतुलन बिगाड़ दिया । लोग बिना किसी डर के पाप कार्यों में लिप्त होने लगे, क्योंकि उसके बाद गयासुर के दर्शन मात्र से ही उनके सारे पाप दूर हो जाते थे और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती थी । स्वर्ग और नर्क का सन्तुलन बिगड़ने पर देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद माँगी । तब भगवान विष्णु की सलाह से देवताओं ने गयासुर से यज्ञ करने हेतु पवित्र जमीन की मांग की । गयासुर की नजर में उसके शरीर से पवित्र कुछ नही था, इसलिए वह भूमि पर लेट गया और बोला कि आप लोग मेरे शरीर पर ही यज्ञ कर लीजिये । गयासुर का शरीर पाँच कोस जमीन पर फ़ैल गया । गयासुर के समर्पण से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने वरदान दिया कि अब से यह स्‍थान जहां तुम्हारे शरीर पर यज्ञ हुआ है वह गया के नाम से जाना जाएगा । यहां श्राद्ध करने वाले को पुण्य और पिंडदान प्राप्त करने वाले को मुक्ति मिल जाएगी ।

ब्रह्माजी ने व्यासजी को बताया कि गया नामक असुर ने कठोर तपस्या से देवताओं और मनुष्यों को कष्ट दिया था। परेशान देवगण विष्णु जी के पास गए, जिन्होंने वध का आश्वासन दिया। शिवजी की पूजा के लिए क्षीरसागर से कमल लाते समय, विष्णुमाया से मोहित गया । असुर कीकट देश में शयन करने लगा। उसी समय श्री विष्णु ने अपनी गदा से उसका वध कर देवों और मनुष्यों का कल्याण किया। भगवान विष्णु ने इसके बाद घोषणा की कि उसकी देह अब पुण्यक्षेत्र के रूप में पूजनीय होगी। यहां किए गए यज्ञ, श्राद्ध और पिंडदान से भक्त स्वर्ग-ब्रह्मलोक की प्राप्ति करेंगे।

भारत के पिण्ड तर्पण के प्रमुख केन्द्र 

प्राचीन में गया के पंचकोश में 365 वेदियां थीं, परंतु कालांतर में इनकी संख्या कम होती गई और आज यहां 45 वेदियां हैं जहां पिंडदान किया जाता है। पूरे विश्व में गया ही एक ऐसा स्थान है, जहां सात गोत्रों में 121 पीढि़यों का पिंडदान और तर्पण होता है। यहां पिंडदान में माता, पिता, पितामह, प्रपितामह, प्रमाता, वृद्ध प्रमाता, प्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्ध प्रमातामही, पिताकुल, माताकुल, श्वसुर कुल, गुरुकुल, सेवक के नाम से किया जाता है। गया श्राद्ध का जिक्र कर्म पुराण, नारदीय पुराण, गरुड़ पुराण, वाल्मीकि रामायण, भागवत पुराण, महाभारत सहित कई धर्मग्रंथों में मिलता है।

1.विष्णुपद मंदिर:

गयासुर का पूरा शरीर ही आज का गया तीर्थ है। उसकी पीठ पर बने विष्णु भगवान के पैरों के निशान के ऊपर बनवाया गया भव्य मंदिर विष्णुपद मन्दिर के नाम से जाना जाता है।दंतकथाओं में कहा गया है कि गयासुर नामक दैत्य का बध करते समय भगवान विष्णु के पद चिह्न यहां पड़े थे। यह मंदिर 30 मीटर ऊंचा है जिसमें आठ खंभे हैं। इन खंभों पर चांदी की परतें चढ़ाई हुई है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के 40 सेंटीमीटर लंबे पांव के निशान  आज भी देखे जा सकते हैं। यह मन्दिर हिन्दू मान्यताओं में भगवान विष्णु के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है । गया के पास ही स्थित पाथेरकट्टी पहाड़ी से लायी गई ग्रेनाइट की चट्टानों से इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 18वी शताब्दी में इस मन्दिर का निर्माण राजस्थान से ख़ास तौर से बुलाये गये लगभग 1200 शिल्पकारों से करवाया । मंदिर के निर्माण में लगभग 12 वर्ष लगे ।मन्दिर के अंदर गर्भगृह में एक बेसाल्ट की चट्टान के उपर भगवान विष्णु के पैर के निशान आज भी मौजूद हैं, जिसको धर्मशिला के नाम से जाना जाता है ।प्रांगण के अंदर अन्य मंदिर भी स्थित हैं। एक भगवान नरसिम्हा को समर्पित है और दूसरा फाल्ग्विस्वर के रूप में भगवान शिव को समर्पित है।

2.फल्गु निरंजना नदी :- 

फल्गु नदी के तट पर स्थित यह स्थान पितरों के मोक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. जिस फल्गु नदी को मोक्षदायिनी गंगा से भी पवित्र माना गया, वह गया धाम में अपने अस्तित्व के लिए ही जूझती मिली । सीता के श्राप ने फल्गु को अंतः सलीला (सतह के नीचे से बहने वाली) बना दिया, लेकिन फिर उसी फल्गु को गंगा से भी पवित्र माना गया। यही फल्गु नदी बोधगया में निरंजना के नाम से जानी गयी । 

3.प्रेत शिला मंदिर :- 

प्रेतशिला गया शहर से लगभग 8 किमी उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है। यह हिंदूओं का एक पवित्र स्थान हैं, जहां वे पिंड दान (दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए एक धार्मिक अनुष्ठान) करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और लोगों का मानना है कि इस स्थान पर पिंडदान करने के बाद आत्मा को मोक्ष मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां की पड़ाही पर मृत्यु के देवता भगवान यम को समर्पित एक मंदिर है। मंदिर का निर्माण शुरू में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था लेकिन इसका कई बार जीर्णोद्धार किया गया। आप मंदिर के पास रामकुंड नामक एक तालाब देख सकते हैं, ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने एक बार इसमें स्नान किया था। यह गया शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक पर्वत है जिसके ऊपर प्रेतशिला वेदी है। यह स्थान गया शहर से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है। पहुंचने के लिए 676 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन जो लोग चढ़ नहीं पाते हैं, वे डोली का सहारा लेते हैं। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और वे प्रेत योनि से मुक्त होते हैं, खासकर अकाल मृत्यु वाले लोगों की आत्माओं को मुक्ति मिलती है। 

4.अक्षय वट गया :- 

पितृपक्ष के अंतिम दिन या यूं कहा जाए कि गया के माड़नपुर स्थित अक्षयवट स्थित पिंडवेदी पर श्राद्धकर्म कर पंडित द्वारा दिए गए सुफल के बाद ही श्राद्धकर्म को पूर्ण या सफल माना जाता है।यह परंपरा त्रेता युग से ही चली आ रही है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की नगरी गया से थोड़ी दूर स्थित माढ़नपुर स्थित अक्षयवट के बारे में कहा जाता है कि इसे खुद भगवान ब्रह्मा ने स्वर्ग से लाकर रोपा था। इसके बाद मां सीता के आशीर्वाद से अक्षयवट की महिमा विख्यात हो गई। सीता जी द्वारा पिण्ड दान करने पर पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्य- वादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली।अक्षयवट के निकट भोजन करने का भी अपना अलग महत्व है। अक्षयवट के पास पूर्वजों को दिए गए भोजन का फल कभी समाप्त नहीं होता। 

5.सीता कुण्ड गया :- 

सीताकुंड विष्णुपद मंदिर के ठीक विपरीत दिशा में स्थित है। सांस्कृतिक दृष्टि से इस कुंड का विशेष महत्व है। इस कुंड को लेकर ऐसा कहा जाता है कि 14 वर्ष के लिए वनवास जाते समय सीता माता ने इसी कुंड में स्नान किया था। इसी वजह से इस कुंड का नाम सीता कुंड पड़ा।सीता कुंड, गया में स्थित एक पवित्र जलस्रोत है, जो माता सीता की तपस्या और पवित्रता से जुड़ा हुआ है।  यह स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र है और यहाँ मकर संक्रांति व रामनवमी जैसे पर्वों पर विशेष स्नान का महत्व माना जाता है। कुंड के पास एक छोटा मंदिर भी स्थित है, जहाँ श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं।सीता कुंड का जल आज भी साफ़ और निर्मल बना हुआ है, जिसे आस्था के साथ पिया और संग्रहित किया जाता है। आसपास का प्राकृतिक वातावरण इसे और अधिक आध्यात्मिक बनाता है। 

6.धर्मारण्य वेदी, गया:- 

निरंजना के तट पर स्थित पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी ।धर्मारण्य पिंडवेदी है, यहां श्राद्ध करने से विभिन्न बाधाओं से मुक्ति मिलती है, पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है. चाहे किसी की आत्मा भटक रही हो, या किसी का परिवार विभिन्न रोगों से ग्रसित हो या फिर संतान ना हो, शादी ना हो रही हो, या फिर अन्य कोई भी बाधा हो, अगर लोग यहां पिंडदान करते हैं तो उन्हें उक्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है, साथ ही पितरों का उद्धार होता है. इस वेदी पर श्राद्ध कर्मकांड करने से पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है. महाभारत काल में स्वयं युधिष्ठिर ने भी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान किया था. इसलिए इस पिंडवेदी का बहुत ही महत्व है. यह स्थान पर पिंडदान व तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए इस पवित्र स्थान को मोक्ष स्थली भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अलावा सभी देवी-देवता विराजमान हैं। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म और पिंडदानकिया गया था। वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का वर्णन किया गया है।

कालांतर से चली आ रही तर्पण व पिंडदान की प्रक्रिया पावन भूमि गया के आसपास स्थित पिंडवेदियों पर आज भी जारी है। स्कंद पुराण के अनुसार, महाभारत के युद्ध के दौरान मारे गए लोगों की आत्मा की शांति और पश्चाताप के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ने धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान किया था। हिंदू संस्कारों में पंचतीर्थ वेदी में धर्मारण्य वेदी की गणना की जाती है। माना जाता है कि धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध का विशेष महत्व है। यहां किए गए पिंडदान व त्रिपिंडी श्राद्ध से प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है और सभी पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

7.बोधगया :- 

मुख्य शहर से थोड़ी दूर पर स्थित बोधगया में पीपल के पेड़ (जिसे बाद में बोधि वृक्ष का नाम मिला) के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई । पुराने शहर के पास बहती फल्गु नदी के किनारे हर साल पितृपक्ष के 15 दिनों में लाखों लोग गया तीर्थ की धरती पर अपने पितरों का पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करके उनके मोक्ष की कामना करते हैं । पितृपक्ष के परे भी यह सिलसिला साल भर चलता ही रहता है । ज्ञान और मोक्ष के इसी संगम ने गया को मुक्तिधाम बना दिया । यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ज्ञान का सागर है और हिन्दू धर्म को मानने वालों के लिए मोक्ष का द्वार है ।गया तीर्थ में पिंडदान के लिए सिर्फ फल्गु नदी का किनारा ही नहीं है, बल्कि ऐसी कई सारी वेदियाँ हैं, जहाँ पिंडदान और श्राद्ध के कार्यक्रम विधिपूर्वक संपन्न होते हैं । 

8.मंगला गौरी मंदिर गया:- 

मंगला गौरी मंदिर 15वीं सदी में बना है। यह देवी सती को समर्पित 52 महाशक्तिपीठों में गिना जाता है, जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे थे। यह मंदिर पहाड़ी पर विराजमान है। मंगला गौरी मंदिर बिहार के गया जिले में, भस्मकूट पर्वत पर स्थित एक प्रमुख शक्ति पीठ है, जहाँ सती माता का वक्षस्थल गिरा था और यह 18 महाशक्ति पीठों में से एक माना जाता है. यह मंदिर दया की देवी माता मंगला गौरी को समर्पित है।

9. रामशिला पहाड़ी गया बिहार 

रामशिला पहाड़ी बिहार के गया जिले में स्थित एक प्राचीन और पवित्र स्थल है, जहां भगवान राम से जुड़ी मान्यताएं हैं और यह धार्मिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है. यह पहाड़ी अपने मनमोहक नजारों और हरियाली के लिए भी जानी जाती है, जो इसे एक लोकप्रिय स्थल बनाती है।

10.पुष्कर में श्राद्ध और तर्पण का महत्व

पुष्करिणी तीर्थ के पवित्र जल में अपनी छवि देखने वाला हर व्यक्ति सुंदर प्रतीत होता था, जिसके कारण इसे 'मुख दर्शन तीर्थ' कहा गया. यज्ञ में स्नान और अग्नि कार्य करने वाले तपस्वियों ने इसे 'श्रेष्ठ पुष्कर' घोषित किया. ऋषि पुलस्त्य के अनुसार, पुष्कर तीर्थ तीन भागों में विभक्त है—ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यमा पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर. यह तीर्थ दो और आधे योजन लंबा और आधा योजन चौड़ा है. यहां एक बार प्रवेश करने से ही राजसूय और अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है. चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को ब्रह्मा, देवता, महर्षि, सिद्ध और पितर इस तीर्थ पर अवतरित होते हैं. इस दिन तर्पण और पूजा, विशेष रूप से ज्येष्ठ पुष्कर में, अत्यंत फलदायी होती है. कहते हैं कि पितृ गंगा नदी के अलावा इस तीर्थ में भी स्नान करने उतरते हैं.

प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल में दस हजार करोड़ देवता, जैसे आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, गंधर्व और अप्सराएं, यहां निवास करते हैं. यहां भोजन दान करने से अनंत फल प्राप्त होता है. ब्रह्मा पुष्कर सरोवर में स्नान और आदि वराह मंदिर तथा ब्रह्मा मंदिर में पूजा, विशेष रूप से कार्तिक पूर्णिमा पर, अपार लाभ देती है.

पुष्कर तीर्थ में सरस्वती नदी के तट पर मृत्यु होने पर पुनर्जनम नहीं होता. यहां तिल और जल के साथ सुवर्ण (स्वर्ण) दान मेरु पर्वत दान के समान है. पितरों के लिए पिंडदान से उन्हें पूर्ण तृप्ति मिलती है. शाम को या रात्रि में स्नान और दान से स्थायी सुख प्राप्त होता है. यज्ञ के बाद सरस्वती नदी समुद्र की ओर चली गई, लेकिन नंदा नदी के रूप में पुनः प्रकट हुई.

आनंद रामायण में पुष्कर का जिक्र

आनंद रामायण में पुष्कर का जिक्र होता है, जिसमें बताया गया है कि श्रीराम और सीता, अपनी तीर्थयात्रा के दौरान पुष्कर आए थे. इस पावन क्षेत्र की महिमा देखकर श्रीराम ने अपने सभी पितरों का तर्पण और श्राद्ध यहां किया था. 

श्रीकृष्ण ने भी बताई थी महिमा

इस विषय का जिक्र महाभारत के एक अंश और गरुण पुराण में दूसरी तरह से मिलता है, जहां श्रीकृष्ण खुद पुष्कर की महिमा बताते हुए कहते हैं कि इस स्थान पर तर्पण और श्राद्ध और श्राद्ध के लिए ही ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों को शांति और तृप्ति मिलती है, साथ ही मनुष्य को कई यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है.


श्राद्ध के भोजन से कैसे तृप्त होते हैं पितृ

एक बार जब श्रीराम और सीता श्राद्ध के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करा रहे थे, तब देवी सीता भी खुद अपने हाथों से उन्हें भोजन परोस रहे थीं. अचानक देवी सीता कुछ ब्राह्मणों को देखा और फिर दौड़कर लताओं की ओट में जा छिपीं. श्रीराम ने उनसे इसका कारण और रहस्य पूछा. देवी सीता ने कहा कि मुझे ब्राह्मणों के बीच राजसी वस्त्र पहने, क्षत्रियों के तेज से युक्त और शीलवान प्रतापी राजा दिखे. सभी को मैं ठीक-ठीक नहीं पहचान पाई, लेकिन इस बीच इंद्र की तरह शोभित आपके पिता महाराज दशरथ को मैंने पहचान लिया और देखकर लज्जा के कारण ही यहां छिप गई. लज्जा इसलिए क्योंकि वह मुझेराजपरिवार की बेटी बनाकर लाए थे और अब जब वो मुझे वल्कल (गेरुआ, तपस्वी) वेश में देखेंगे तो उन्हें दुख होगा. उन्हें दुख हुआ तब तो आपका श्राद्ध कर्म भी अधूरा रह जाएगा. इसलिए मैं यहां लता ओट में छिपी हूं. श्रीराम ने सीता को निर्भय किया फिर दोनों ने पिता के चरण छुए और राजा दशरथ ने उन्हें बहुत से आशीर्वाद दिए. इस तरह पुष्कर तीर्थ का एक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां देवी सीता और श्रीराम ने श्राद्ध विधान किया था.

     इसी तरह द्वापर में श्रीकृष्ण ने कई बार पुष्कर यात्रा की थी और यहां विशेष साधना की थी. उन्होंने भी अपने पूर्वजों को यहां जल दिया था. जब यादव वंश पूरी तरह समाप्त हो गया था तब एक मात्र बचे यदुवंशी बज्रनाभ ने सभी के लिए तीर्थ फल प्राप्ति और तर्पण का विधान यहां किया था. पांडवों ने भी अपने परिवार के लिए यहां प्रार्थना की थी और तर्पण कर पितरों को तृप्त किया था.

11.प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज को भी पितृ तर्पण का पवित्र स्थान माना जाता है. यहां संगम पर पिंडदान और तर्पण करने से पितरों की आत्मा प्रसन्न होती है।पितरों को सारे पापों से मुक्ति मिलती है और उन्‍हें स्‍वर्ग में स्‍थान मिलता है। परिवार पर से कष्ट दूर होते हैं. 

12. उज्‍जैन, मध्‍यप्रदेश: - 

महाकाल की नगरी उज्‍जैन में लोग काल सर्प दोष और पितृ दोष निवारण की पूजा करने के लिए देश-दुनिया से आते हैं. क्षिप्रा नदी के तट पर पूर्वजों के लिए पिंडदान करने से उनकी आत्‍मा को शांति मिलती है. मान्‍यता है कि उज्‍जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे पिंडदान कराने का फल गयाजी में पिंडदान कराने जितना ही मिलता है।

13. द्वारका, गुजरात:- भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में भी गोमती नदी के तट पर पिंडदान किया जाता है।कृष्‍ण भक्‍त यहां विशेष रूप से आते हैं।

14. पुरी, ओडिशा:-महानदी और भार्गवी नदी के संगम तट पर स्थित यह पवित्र स्थान पितरों को पुण्य और शांति प्रदान करता है। जगन्नाथ मंदिर के लिए प्रसिद्ध पुरी में भी समुद्र तट पर पिंडदान कराया जाता है। मान्‍यता है कि 'स्वर्गद्वार' नामक स्थान पर पिंडदान करने से पितरों को सीधे स्वर्ग में प्रवेश मिलता है।

15.पिशाच मोचन कुंड, काशी:- 

काशी में स्थित पवित्र पिशाच मोचन कुंड में पितरों को सभी बंधनों से मुक्त करने की विशेष शक्ति मानी जाती है। प्राचीन कथाओं के अनुसार, इस स्थान का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि एक परेशान आत्मा यहाँ स्नान करने के बाद शांत हो गई थी। गरुड़ पुराण में वर्णन है कि इस कुंड को स्वयं भगवान विष्णु ने आशीर्वाद दिया था। जब परिवार इस पवित्र स्थान पर पिंडदान और तर्पण करते हैं, तो माना जाता है कि पितरों को तत्काल संतुष्टि और मुक्ति प्राप्त होती है। कुंड के चारों ओर प्राचीन पीपल के पेड़ हैं, जहाँ ऐसा कहा जाता है कि पितरों की आत्माएँ अपने वंशजों द्वारा याद किए जाने की प्रतीक्षा करती हैं। विश्वास है कि यहाँ अनुष्ठान करने के बाद भक्तों को पारिवारिक समस्याओं और आर्थिक कठिनाइयों से राहत मिलती है। गंगा जल से मिश्रित इस कुंड का पानी पितृ दोष को दूर करने और पारिवारिक जीवन में शांति लाने के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।

16.ब्रह्मकपाल, बद्रीनाथ (उत्तराखंड)

उत्तराखंड के चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम के पास अलकनंदा नदी के तट पर स्थित। ब्रह्मकपाल घाट पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि पितरों के लिए किया गया तर्पण स्थायी होता है और इससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है.यहां  ब्रह्मकपाल क्षेत्र में पिंडदान करने से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है. 

17.हर की पौड़ी,हरिद्वार (उत्तराखंड):

हरिद्वार, उत्तराखंड: हरिद्वार में हर की पौड़ी पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है.पिंडदान के लिए उत्तराखंड के हरिद्वार को शुभ माना गया है। कहते हैं कि हरिद्वार में पिंडदान करने से ज्‍यदा फल मिलता है। खासतौर से जिनके पितृ प्रेत योनि में भटक रहे हैं, उनके लिए हरिद्वार में श्राद्ध करना फलदायी है। मान्‍यता है कि हरिद्वार में गंगा नदी में पितरों का तर्पण करने से पितरों की आत्‍मा को शांति मिलती है। 

18.नारायणी शिला, हरिद्वार:- 

भगवान विष्णु के श्रीविग्रह के तीन महत्वपूर्ण अंग तीन अलग-अलग तीर्थों में स्थित हैं। चरण बिहार के गया में विष्णुपाद मंदिर में, शीर्ष भाग उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम के ब्रह्मकपाल पर और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला में है। इसी कारण इस स्थान को हृदय स्थल कहा जाता है।गंगा तट पर स्थित इस शिला के दर्शन मात्र से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और यहां किया गया पिंडदान व श्राद्ध पितृों को मोक्ष प्रदान करता है।शास्‍त्र कहते हैं कि हरिद्वार में भगवान विष्‍णु का स्‍थान है। यहां जो भी भक्ति भाव से अपने पितरों के लिए मनोकामना करता है, वह सीधे भगवान विष्णु तक पहुंच जाती है। इसलिए इस जगह का वर्णन पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया  है।शास्‍त्र कहते हैं कि हरिद्वार में भगवान विष्‍णु का स्‍थान है। यहां जो भी भक्ति भाव से अपने पितरों के लिए मनोकामना करता है, वह सीधे भगवान विष्णु तक पहुंच जाती है। इसलिए इस जगह का वर्णन पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है।

19.कुशावर्त घाट -

हरिद्वार में पिंडदान करना है, तो कुशावर्त घाट अच्‍छी जगह है। ज्‍यादातर लोग यहीं पिंडदान करते हैं।

20.नासिक (महाराष्ट्र):

गोदावरी नदी के तट पर त्रयंबकेश्वर के पास श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिलती है. 

21.कुरुक्षेत्र (हरियाणा):

पितरों के मोक्ष के लिए कुरुक्षेत्र में भी पिंडदान का विधान है. 

22.द्वारिका (गुजरात):

पिण्डारक नामक तीर्थ क्षेत्र में श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिलती है. 

23.लक्ष्मण बाण कुंड (कर्नाटक):

यह रामायण काल से जुड़ा स्थान है, जहां भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था. 

24.त्र्यंबकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग पितृ कर्मों के लिए विशेष प्रसिद्ध है. यहां गोदावरी नदी के तट पर तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है. मान्यताओं के अनुसार, यहां खासकर त्रिपिंडी श्राद्ध नामक एक विशेष पूजा की जाती है. यह उन पूर्वजों के लिए की जाती है जो अपनी मृत्यु से असंतुष्ट रह जाते हैं.

25.रामेश्वरम (तमिलनाडु)

रामेश्वरम, दक्षिण भारत का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है. यहां पर समुद्र तट पर स्थित धनुषकोडी और अग्नितीर्थम दो प्रमुख स्थल हैं, जहां पितरों का श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है. मान्यता है कि रामेश्वरम में किए गए पितृ कर्म का फल कई गुना बढ़कर मिलता है. कहा जाता है कि यहां पितरों के श्राद्ध से आत्मा को सीधा मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पर से पितृ दोष समाप्त होता है.

26.प्रिंसेप घाट और हुगली नदी के घाट ( पश्चिम बंगाल) 
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित प्रिंसेप घाट और हुगली नदी के किनारे बने अन्य घाट भी पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध हैं. श्राद्ध पक्ष में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों का तर्पण करने पहुंचते हैं. मान्यता है कि हुगली नदी, जो गंगा की ही धारा है, उसमें पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. खासकर प्रिंसेप घाट पर किया गया तर्पण अत्यंत फलदायी माना जाता है. 

27.भरत कुंड

भरत कुंड, जिसे नंदीग्राम भी कहा जाता है, अयोध्या के पास स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए हजारों लोग हर दिन पिंडदान के लिए यहां पहुंचते हैं। इसे गया बेदी भी कहा जाता है।

28.सरयू नदी अयोध्या 

अयोध्या पवित्र सरयू नदी के तट पर स्थित है, और नदी के किनारे भी पिंडदान के अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां लोग नदी में डुबकी लगाते हैं और फिर ब्राह्मणों की देखरेख में अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान व हवन का अनुष्ठान करते हैं।

29.सिद्धवट, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

उज्जैन में पितृ तर्पण के लिए तीन मुख्य स्थान हैं, सिद्धवट, गयाकोठा मंदिर और रामघाट. इनमें से गयाकोठा मंदिर का महत्व सबसे विशेष माना जाता है. हर साल यहां हजारों श्रद्धालु दूध और जल अर्पित कर अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं. मान्यता है कि इसी स्थान पर फल्गु नदी गुप्त रूप से प्रकट हुई थी. यही कारण है कि सप्तऋषियों को साक्षी मानकर यहां किया गया श्राद्ध वही पुण्यफल देता है, जो बिहार के गया जी में श्राद्ध करने से प्राप्त होता है. इसके अलावा, क्षिप्रा नदी के पवित्र तट पर स्थित रामघाट भी पितृ कर्म और तर्पण के लिए अत्यंत पूजनीय स्थल है.

सिद्धवट उज्जैन: एक चमत्कारी वटवृक्ष

उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित सिद्धवट तीर्थ को प्रेतशिला तीर्थ भी कहते हैं. यहां एक विशाल वटवृक्ष मौजूद है, जिसे सिद्धवट कहा जाता है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र पेड़ को स्वयं माता पार्वती ने लगाया था. वहीं धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का मुंडन संस्कार हुआ था, इसलिए यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है.

इस वटवृक्ष से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है. कहा जाता है कि मुगल शासकों ने इसे कई बार कटवाने की कोशिश की थी. इतना ही नहीं, इसके ऊपर लोहे के तवे तक रखवा दिए गए, ताकि यह दोबारा अंकुरित न हो सके. लेकिन हर बार यह वटवृक्ष उन लोहे के तवों को चीरकर फिर से लहलहा उठा. आज भी यह वटवृक्ष उसी स्थान पर मजबूती से खड़ा है और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है.

150 साल पुराना वंशावली रिकॉर्ड

उज्जैन की एक और विशेषता यह है कि यहां के पुरोहितों के पास पीढ़ियों का हिसाब-किताब आज भी मौजूद है. बताया जाता है कि उनके पास लगभग 150 से 200 साल पुराना वंशावली रिकॉर्ड मौजूद है. डिजिटल युग में भी वे बिना किसी कंप्यूटर की मदद के, केवल गोत्र, समाज या गांव का नाम पूछकर किसी भी व्यक्ति की कई पीढ़ियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं. 

उज्जैन में स्थित सिद्धवट तीर्थ भी पिंडदान और श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध है. इसे पितृ कर्मों का प्रमुख स्थान माना गया है. यहां एक विशाल वटवृक्ष है, जिसके नीचे पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा तृप्ति मिलती है. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ श्रद्धालु सिद्धवट पर पिंडदान करना पुण्यकारी मानते हैं. यह स्थल पितृदोष से मुक्ति के लिए बेहद शुभ माना जाता है.


      आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

पूर्व पुस्तकालय और सूचना अधिकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा 

Friday, September 19, 2025

कालीघाट का काली मंदिर पूर्वी भारत का श्रेष्ठ मन्दिर ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

कोलकाता में मां काली के दर्शन का सौभाग्य मिला। यहां के काली माता के दर्शन का विशेष महत्त्व है। जहाँ भक्त गंगा स्नान के बाद माँ काली के दर्शन करते हैं। यह पश्चिम बंगाल एक हिंदू प्रसिद्ध मंदिर है, जो हिंदू देवी काली को समर्पित है। यह हिंदू तांत्रिक परंपरा में 10 महाविद्याओं में से एक है जो कालीकुल पूजा परंपरा में सर्वोच्च देवता हैं । यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर में स्थापित काली की प्रतिमा अद्वितीय है। यह बंगाल की अन्य काली प्रतिमाओं की तरह नहीं है। यह मंदिर शक्ति पीठों में गिना जाता है। यहाँ माँ काली की शक्ति और कृपा को महसूस करने बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। काली माँ का आशीर्वाद श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था का प्रतीक है।

     देवी भागवत पुराण , कालिका पुराण और शक्ति पीठ स्तोत्रम के अनुसार , देवी सती के दाहिने पैर की उंगलियां यहां गिरी थीं, जब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उनके शरीर को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया था ताकि उनके ब्रह्मांडीय नृत्य के दौरान महादेव के क्रोध को शांत किया जा सके। यह पूर्वी भारत के सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण पूजा स्थलों में से एक है , चार आदि शक्तिपीठों में से एक है।  मंदिर पूरे वर्ष लाखों भक्तों को काली पूजा , नव वर्ष , पोइला बैसाख , स्नान यात्रा , दुर्गा पूजा और कई अमावस्या जैसे अवसरों पर आकर्षित करता है। पितृ पक्ष के श्रद्धालु पितृ तर्पण के बाद इस शक्ति पीठ पर पूजा अर्चन करते हैं।

कालीघाट  -

कालीघाट शब्द की उत्पत्ति मंदिर में निवास करने वाली देवी काली और घाट (नदी तट) से हुई है, जहाँ मंदिर स्थित है। इस क्षेत्र में माँ काली के महत्व के कारण, इस स्थान को काली क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है । कोलकाता शहर में गंगा नदी के पुराने मार्ग पर स्थित देवी माँ काली को समर्पित  एक  पवित्र  घाट था। यह मंदिर अब आदि गंगा नामक एक छोटी नहर के तट पर स्थित है, जो बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाने वाली मुख्य गंगा नदी से जुड़ती है। समय के साथ नदी मंदिर से दूर चली गई है। पुराने समय में व्यापारी देवी मां काली के दर्शन के लिए  अपनी यात्रा कालीघाट पर रुकते थे । 

वर्तमान कसौटी की मूर्ति :- 

वर्तमान कसौटी की मूर्ति दो संतों - आत्माराम ब्रह्मचारी और ब्रह्मानंद गिरि द्वारा बनाई गई थी। ब्रह्मानंद गिरि के बाद, कई तपस्वी संतों ने मंदिर की बागडोर संभाली। इस तपस्वी-संत परंपरा के अंतिम महंत भुवनेश्वर गिरि थे।भुवनेश्वर गिरि के बाद,कालीघाट मंदिर का कार्यभार गृहस्थ भक्तों या सेबैतों - उनके अपने दामादों और बेटियों - ने संभाल लिया। इसके बाद संतों, तांत्रिकों और कापालिकों का प्रभुत्व काफी कम हो गया। वर्तमान में, तीन विशाल आंखें, सोने से बनी लंबी उभरी हुई जीभ और चार हाथ, सभी सोने से बने हैं। इनमें से दो हाथों में तलवार और असुर  राजा 'शुम्भ' का कटा हुआ सिर है। तलवार ईश्वरीय ज्ञान का प्रतीक है और असुर (दानव) का सिर मानवअहंकार का प्रतीक है, जिसे मोक्ष प्राप्त करने के लिए ईश्वरीय ज्ञानद्वारा मारा जाना चाहिए। अन्य दो हाथ अभय और  वरद   मुद्रा  या आशीर्वाद में हैं, जिसका अर्थ है कि उनके दीक्षित भक्त या कोई भी व्यक्ति जो सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, वह सभी विपत्तियों और दुर्भाग्य से बच जाएगा क्योंकि दिव्य माँ देवी अपने भक्तों का इस लोक और परलोक में मार्गदर्शन करेंगी।

      कालीघाट मंदिर में प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री आते हैं, देवी काली को  मानव मां की तरह मानते हैं, उनके पास अपनी कष्टदायक घरेलू समस्याएं लेकर आते हैं, तथा समृद्धि और कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं। जब उनकी प्रार्थना पूरी हो जाती है तो वे पुनः माता के पास लौटकर अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। 

     पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती के आत्मदाह की खबर सुनकर , शिव क्रोध से अंधे हो गए और तांडव नृत्य (विनाश नृत्य) शुरू कर दिया। संसार को आसन्न विनाश से बचाने के लिए, भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव को 51 टुकड़ों में काट दिया,जो भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिरे। कालीघाट वह स्थान है जहाँ दक्षिणायनी या सती के दाहिने पैर के अंगूठे गिरे थे। 

इतिहास

कालीघाट काली मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप में लगभग 200 वर्ष पुराना है, हालाँकि इसका उल्लेख 15वीं शताब्दी में रचित मानसर भाषन और 17वीं शताब्दी में रचित कवि कंकन चंडी में भी मिलता है। इसके बाद, इसे बंगाल के कुछ प्रमुख ज़मींदार परिवारों का संरक्षण प्राप्त हुआ , जिनमें बावली राज और सबर्ण रॉय चौधरी परिवार सबसे प्रमुख थे।

    मंदिर की वर्तमान संरचना 1809 में सबर्ण रॉय चौधरी परिवार के संरक्षण में पूरी हुई थी। संतोष रॉय चौधरी, जो स्वयं एक काली भक्त थे, ने 1798 में वर्तमान मंदिर का निर्माण शुरू किया था। निर्माण पूरा होने में 11 साल लगे।  रॉय चौधरी का देवता के प्रति पारंपरिक संरक्षण विवादित है। इस स्थल पर आने वाले तीर्थयात्री मंदिर के कुंडुपुकुर तालाब में स्नान यात्रा नामक एक पवित्र डुबकी लगाते हैं । 

        मन्दिर के प्रमुख अंग

कुंडुपुकुर तालाब 

यह पवित्र कुंड मंदिर की चारदीवारी के बाहर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। पहले यह बड़ा था और इसे 'काकू-कुंड' कहा जाता था।इस कुंड में 'सती अंग' (सती के दाहिने पैर का अंगूठा) गिरा था। ऐसा माना जाता है कि इस छोटे से कुंड/तालाब में स्नान करने से संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है। इस कुंड के जल को पवित्र गंगा नदी के जल के समान माना जाता है। यात्री पवित्र स्नान यात्रा का अभ्यास करते हैं।

शोष्टी तल :- 

यह तीन फुट ऊँची एक आयताकार वेदी है जिस पर एक छोटा सा कैक्टस का पौधा रखा है।इस पवित्र स्थान को षोष्टी तल या  मोनोशा तल के नाम से जाना जाता है। इस वेदी का निर्माण गोबिंद दास मंडल ने 1880 में करवाया था। कैक्टस पेड़ के नीचे, एक वेदी पर तीन पत्थर एक साथ रखे हैं - बाएँ से दाएँ, जो  षष्ठी  (शोष्ठी),  शीतला और  मंगल चंडी देवियों का प्रतिनिधित्व करते हैं ।वेदी स्थल ब्रह्मानंद गिरि की समाधि है। यहाँ सभी पुजारी महिलाएँ हैं। यहाँ कोई दैनिक पूजा या भोग नहीं लगाया जाता। यहाँ की देवियों को देवी माँ काली का अंश माना जाता है।

नटमंदिर

मुख्य मंदिर के समीप नटमंदिर नामक एक बड़ा आयताकार मंच बनाया गया है, जहां से प्रतिमा का मुख देखा जा सकता है। इसका निर्माण मूलतः जमींदार काशीनाथ रॉय ने 1835 में करवाया था। 1835 में काशीनाथ राय ने मंदिर चौक में एक नट मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद इसका कई बार जीर्णोद्धार किया गया।

जोर बांग्ला

मुख्य मंदिर का विशाल बरामदा, जो मूर्ति के सामने है, जोर बांग्ला के नाम से जाना जाता है। गर्भगृह के अंदर होने वाले अनुष्ठान जोर बांग्ला के माध्यम से नटमंदिर से दिखाई देते हैं।

हरकठ तल

यह नटमंदिर से सटा हुआ दक्षिण दिशा में बलि (पशु बलि) के लिए बना स्थान है। यहाँ पशु बलि के लिए अगल-बगल दो बलि वेदियाँ हैं। इन्हें हरि-कठ कहते हैं।

राधा-कृष्ण मंदिर:- 

यह मुख्य मंदिर के पश्चिम दिशा में मंदिर के अंदर स्थित है।1723 में मुर्शिदाबाद जिले के एक बंदोबस्त अधिकारी ने पहली बार राधा-कृष्ण के लिए एक अलग मंदिर बनवाया।1843 में बावली राज परिवार के एक सदस्य , वैष्णव उदय नारायण मंडल ने कालीघाट मंदिर चौक में वर्तमान श्याम राय मंदिर की स्थापना की। 1843 में उदय नारायण नामक एक ज़मींदार ने उसी स्थान पर वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया।1858 में मदन गोपाल कोले ने श्याम राय मंदिर के लिए एक दल मंच स्थापित किया। इस मंदिर को श्यामा-राय मंदिर के नाम से जाना जाता है। राधा-कृष्ण के लिए शाकाहारी भोग तैयार करने के लिए एक अलग रसोईघर है।

वास्तुगत संरचना:- 

मंदिर का निर्माण बंगाली मंदिर वास्तुकला की अठ-चला शैली के अनुसार किया गया है । मंदिर की छतें नुकीली हैं,जिन्हें बंगाली में चाला कहा जाता है , जो ग्रामीण बंगाल में मिट्टी और टहनियों से बनी फूस की छत वाली झोपड़ियों की नकल हैं।

     मुख्य मंदिर एक चतुर्भुजाकार इमारत है जिसमें एक छोटा गुंबद है। दोनों छतों पर कुल आठ मुख हैं। दोनों ही धात्विक रजत रंग में रंगे हैं, जबकि कंगनी के किनारों को पीले, लाल, हरे और नीले रंग से रंगा गया है। शीर्ष पर तीन शिखर हैं, जिनमें से सबसे ऊँचे शिखर पर एक त्रिकोणीय पताका है। मंदिर की बाहरी दीवारें हरे और सफेद रंग के हीरे के आकार के शतरंज के पैटर्न में डिज़ाइन की गई हैं। अठ-चला के नीचे की सीमाओं को विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं और प्राकृतिक तत्वों के टेराकोटा रूपांकनों के साथ जटिल रूप से डिज़ाइन किया गया है, जो बंगाल वास्तुकला के अधिकांश ऐतिहासिक मंदिरों का एक महत्वपूर्ण तत्व है । 

क्विंटसेंस लैंडस्केप आर्किटेक्ट द्वारा संरक्षण

2024 में, 200 साल पुराने मंदिर को 1809 में अपनी स्थापना के बाद से पहला बड़ा आधुनिक युग का जीर्णोद्धार प्राप्त हुआ। 200 करोड़ रुपये के बजट में किए गए इस निर्माण में 165 करोड़ रुपये कोलकाता नगर निगम द्वारा प्रदान किए गए , जबकि मुकेश अंबानी ने माँ काली के प्रति समर्पण के संकेत के रूप में रिलायंस फाउंडेशन से 35 करोड़ रुपये का योगदान दिया। मूल सिद्धांतों और मौजूदा जटिल टेराकोटा मिश्रित अठ-चला शैली की वास्तुकला को बदलने के बजाय, मौजूदा लोकाचार को बरकरार रखा गया और उसका जीर्णोद्धार किया गया । पुनर्विकास कार्य क्विंटसेंस (लैंडस्केप आर्किटेक्ट) द्वारा संरक्षण वास्तुकार कल्याण चक्रवर्ती और कलाकार तमाल भट्टाचार्य की देखरेख में किए गए, उन्होंने अठ-चला शैली की छतों के नीचे छिपी टेराकोटा की नाजुक कृतियों की खोज की।

       भट्टाचार्य ने फूलों, पक्षियों और पत्तियों की कई प्रकृति-प्रेरित टेराकोटा आकृतियाँ भी खोजीं, जो पिछली दो शताब्दियों में जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं। उन्होंने मंदिर की मौलिकता और उसके गौरवशाली अतीत के प्रतिबिंब के एक अभिन्न अंग के रूप में, जीर्णोद्धार के बाद उन्हें प्रदर्शित करने का निर्णय लिया। टेराकोटा के काम में मदद के लिए बिष्णुपुर के वास्तुकला के छात्रों को नियुक्त किया गया था। चूँकि आज के समय में उन टेराकोटा कृतियों की हूबहू प्रतिकृतियाँ मिलना मुश्किल था, इसलिए उन्होंने अपूरणीय रूप से क्षतिग्रस्त आकृतियों के स्थान पर कुछ नई आकृतियाँ बनाईं। 

25 प्रकार की टाइलें :- 

मंदिर में 25 विभिन्न प्रकार की टाइलें थीं, जिन्हें उपलब्धता के अनुसार लाया गया था, लेकिन उनका उचित रखरखाव नहीं किया गया। स्टिकर स्थानांतरण और ग्लेज़िंग द्वारा एक समान रूप देने के लिए उन्हें समान टाइलों से बदल दिया गया था। 

50 किलो सोने का शिखर:- 

स्तंभों को फिर से रंगा गया और मंदिर के शिखर पर तीन शिखरों को 50 किलो सोने से मढ़ा गया। तीनों शिखरों में से सबसे ऊँचे शिखर को एक सुनहरे ध्वज से सजाया गया था, जो आध्यात्मिक प्रभुता का प्रतीक था। बेहतर भीड़ प्रबंधन के लिए बाजार क्षेत्र को मुख्य मंदिर परिसर से अलग करने के लिए एक नई दीवार का निर्माण किया गया था। वेंटिलेशन में सुधार किया गया था और बेलपत्रों से पानी निकालने का भी विस्तार से काम किया गया था। 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक इस समय पितृ तर्पण चारों धाम की यात्रा पर है।

(वॉट्सप नं.+919412300183)


गंगा सागर है आस्था त्याग और विश्वास की कहानी ,सगर पुत्रों की कुर्बानी और भगीरथ प्रयास की जुबानी ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी



कर्दम ऋषि ब्रह्मा जी के पुत्र थे, वे भगवान के प्रेमी, पिता के आज्ञाकारी और जन्मजात विरक्त थे। ब्रह्मा जी ने उनको आदेश दिया कि सृष्टि का कार्य आगे बढाओ। कर्दम ऋषि का गृहस्थाश्रम में जाने का मन नहीं था पर पिता की आज्ञा को मानना भी आवश्यक था अत: उन्होंने बीच का रास्ता निकाला।

घोर तपस्या से कपिल पुत्र की प्राप्ति:- 

ऋषि कपिल एक महत्वपूर्ण ऋषि हैं और उन्हें इसलिए भी अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि उन्हें भगवान विष्णु (हिंदू त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एक अंश) का पाँचवाँ अवतार माना जाता है ।कर्दम ऋषि ने विवाह पूर्व सतयुग में सरस्वती नदी के किनारे भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप भगवान विष्णु कपिल मुनि के रूप में कर्दम ऋषि के यहां अवतरित हुए थे। इनकी माता स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहूति थी। कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती तथा शान्ति आदि कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल मुनि की बहनें थीं।

कपिलवस्तु रहा कपिल का जन्म स्थान 

कपिलवस्तु, नेपाल भारत सीमा पर बसे नगर में बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था और सगर के पुत्र ने सागर के किनारे कपिल को क्रुद्ध रूप में  शाप पाया तथा बाद में सगर के पौत्र भागीरथ ने वहीं गंगा नदी का सागर के साथ संगम कराया। इससे मालूम होता है कि कपिल का जन्मस्थान कपिलवस्तु और तपस्या क्षेत्र गंगासागर था। इससे कम-से- कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था। यदि हम कपिल के शिष्य आसुरि का शतपथ ब्राह्मण के आसुरि से अभिन्न मानें तो कह सकते हैं कि कम-से-कम ब्राह्मण काल में कपिल की स्थिति रही होगी। इस प्रकार 700 वर्ष ई.पू. कपिल का काल माना जा सकता है। कहा गया है - 

शंकर तेरी जटा से बहती है गंग धारा।

सागर में मिलके पुत्रों को जिसने तारा।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता गंगा भगवान शिव की जटा से निकलकर पृथ्वी पर पहुंची थीं तब वह भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गई थीं। मां गंगा के पावन जल से राजा सागर के साठ हजार शाप ग्रस्त पुत्रों का उद्धार हुआ था। इस घटना की याद में तीर्थ गंगा सागर का नाम प्रसिद्ध हुआ। कहा भी गया है - 

सब तीर्थ बार बार, गंगासागर एक बार"

ये वह भजन हैं जो हर साल देश भर से गंगासागर के पवित्र तट पर पहुँचने के लिए यात्रा करने वाले हर तीर्थयात्री के दिल में अमर हो गया है। गंगासागर मेले की गंभीरता भक्तों की भावना से खूबसूरती से भरी हुई है, जो मानते हैं कि गंगासागर के पवित्र जल में डुबकी लगाने से उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिलेगी। 

आस्था और विश्वास का अद्भुत समन्वय:- 

पश्चिम बंगाल के सुदूर दक्षिण मेखलाकार सागर द्वीप अवस्थित है। इस डेल्टा द्वीप के दक्षिण तरफ फ़ेनिल समुद्र है जो अपनी उत्तल लहरों से दूरदूर तक शुभ्र बालुकामय सुविस्तृत स्थल खण्ड का विस्तार है। चारों ओर फैले  बन इसकी शोभा में चार चांद लगाते हैं। गंगासागर, वह भूमि है,जहाँ आस्था और विश्वास का संगम होता है, कोलकाता से लगभग 118 किलोमीटर दूर गंगा डेल्टा के दक्षिणी सिरे पर, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के क्षेत्र में स्थित है। गंगासागर या सागर द्वीप, मुख्य भूमि से कटा हुआ एक भूभाग है, जो चांदी की रेत, साफ आसमान, गहरे नीले समुद्र और प्रतिष्ठित कपिल भगवान के आश्रम के साथ एक अद्वितीय धार्मिक माहौल बनाता है। ये वह तट हैं जहाँ पवित्र गंगा हज़ारों किमी. की यात्रा के बाद समुद्र से मिलकर विलीन हो जाती है।

एक जीवन्त कविता :- 

गंगासागर जीवन्त कविता है। गंगासागर की तीर्थयात्रा संसार (जीवन, मृत्यु और अस्तित्व की चक्रियता ) से निर्वाण (मोक्ष/ मुक्ति) तक की आकर्षक यात्रा काप्रतिबिंब है। यह एक ऐसी यात्रा जिसने विद्वानों, लेखकों, तर्कवादियों और अध्यात्म वादियों को सदियों से आकर्षित किया है। गंगा सागर दर्शन की भीड़ सांसारिक से आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से मनुष्य की अथक खोज की एक अंतर्दृष्टि है। समय बीतने के साथ मिथक किंवदंतियों में बदल गए, किंवदंतियों कहानियों में और कहानियाँ विश्वासों में बदल गईं। राजा भगीरथ के नाम पर गंगा को भी "भागीरथी" नाम दिया गया और सगर राजा के नाम पर समुद्र का नाम "सागर" रखा गया और द्वीप का नाम "सागर द्वीप" रखा गया। 

पौराणिक महत्व:- 

गंगासागर की पौराणिक कथा जीवन और मृत्यु के चक्र और मोक्ष के आकर्षण के बीच के मिलन के बारे में है। और इस भक्तिमय नियति का केंद्र प्रतिष्ठित कपिल भगवान का मंदिर है। भागवत पुराण के अनुसार, महर्षि कपिल मुनि (या ऋषि कपिल) का जन्म ऋषि कर्दम और पृथ्वी के शासक स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहुति के घर हुआ था। महाभारत में ये सांख्य के वक्ता कहे गए हैं। इनको अग्नि काअवतार और ब्रह्मा का मानसपुत्र भी पुराण मेंकहा गया है। श्रीमद्भगवत के अनुसार कपिल विष्णु के पंचम अवतार माने गए हैं।

        कर्दम मुनि ने अपने पिता भगवान ब्रह्मा के वचनों का पालन करते हुए समर्पित रूप से कठोर तपस्या की। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर, सर्वोच्च आत्मा भगवान विष्णु अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए। परमानंद में, कर्दम मुनि ने भगवान की महिमा की प्रशंसा की। प्रसन्न होकर, भगवान ने उन्हें देवहुति से विवाह करने के लिए कहा और भविष्यवाणी की किउनकी नौ बेटियाँ होंगी और समय के साथ, पूरी सृष्टि जीवों से भर जाएगी। और वह एक अवतार के रूप में जन्म लेंगे और दुनिया को सांख्य दर्शन सिखाएँगे। कपिल मुनि ने अपने प्रारंभिक वर्षों में ही वेदों का अथाह ज्ञान प्राप्त कर लिया और सांख्य दर्शन को अमर कर दिया। सभ्भवत: कपिल ने  ही सर्वप्रथम ध्यान और तपस्या का मार्ग बतलाया था। उनके पहले कर्म ही एक मार्ग था और ज्ञान केवल चर्चा तक सीमित था। ज्ञान को साधना का रूप देकर कपिल ने त्याग, तपस्या एवं समाधि को भारतीय संस्कृति में पहली बार प्रतिष्ठित किया।

गंगासागर की कथा:- 

भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के शासक "राजा सगर" या "सगर राजा" ने ऋषि और्व के निर्देशानुसार अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया था। ऐसा माना जाता है कि 100 अश्वमेध यज्ञ करने से पूरी पृथ्वी पर आधिपत्य प्राप्त करने में मदद मिलती है। देवताओं के राजा भगवान इंद्र 100 अश्वमेध यज्ञ को पूरा करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। उन्हें डर था कि वे किसी नश्वर के हाथों अपना प्रभुत्व खो देंगे, और उन्होंने राजा सगर के घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम के पास छिपा दिया था।

60,000 सगर पुत्रों का वीभत्स अन्त:- 

क्रोध से भरकर, सगर राजा ने अपने 60,000 पुत्रों (सगर पुत्रों) को खोए हुए घोड़े का पता लगाने के लिए भेजा। सगर पुत्रों ने अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को नष्ट कर दिया और ऋषि के आश्रम पहुँच गए। घोड़े को खोजने पर, सगर पुत्रों ने ऋषि को चोर समझ लिया और ध्यान कर रहे ऋषि को गालियाँ देनी शुरू कर दीं। इसके बाद होने वाले हंगामे ने ऋषि की तपस्या में बाधा डाली। क्रोधित होकर, कपि मुनि ने अपनी आँखें खोलीं और 60,000 सगर पुत्रों को जलाकर राख कर दिया, जिससे उनकी आत्माएँ नरक में चली गईं।

सगर पौत्र अंशुमान ने खोज निकाला:- 

कई वर्षों बाद, सगर राजा के वंशज अंशुमान ने कपिल मुनि के आश्रम में घोड़े को अभी भी खड़ा पाया। उन्होंने ऋषि को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। अंशुमान के प्रयास से संतुष्ट होकर ऋषि ने घोड़े को वापस लाने की अनुमति दी और उन्हें पता चला कि उनके पूर्वजों की आत्माएँ केवल गंगा के पवित्र जल से श्राद्ध करने के बाद ही मुक्त हो सकती हैं। हालाँकि राजा अंगशुमान और उनके बेटे दिलीप श्राद्ध पूरा नहीं कर पाए क्योंकि भयंकर सूखे के कारण अगस्त्य मुनि ने समुद्र का सारा पानी पी लिया था।

भागीरथ की घोर तपस्या:- 

एक पीढ़ी बाद, राजा भगीरथ ने निंदित आत्माओं को मुक्त करने का कार्य अपने हाथ में लिया और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुक्त करने के लिए प्रार्थना की। उन्होंने उनसे भगवान विष्णु से प्रार्थना करने के लिए कहा कि वे पवित्र गंगा को धरती पर आने दें। सहमत होने पर, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर गंगा को अनियंत्रित किया गया तो इसका विशाल बल पूरी सृष्टि को मिटा देगा और उन्हें भगवान शिव से प्रार्थना करने के लिए कहा। शिव अपनी जटाओं पर गंगा का पूरा बल धारण करने के लिए सहमत हो गए। शिव की जटाओं की घुमावदार भूलभुलैया में, गंगा ने अपना क्रूर बल खो दिया और धीरे-धीरे पूरे अस्तित्व को सहलाते हुए धरती पर उतरीं। भगीरथ अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने में सक्षम हुए, जिससे आत्माओं को पाताल लोक की आग से मुक्ति मिली।

सामाजिक महत्व:- 

गंगासागर सिर्फ़ एक तीर्थस्थल नहीं है; यह भावना, संस्कृति, आस्था और विश्वास का संगम है - जीवन का उत्सव है । धर्म हमेशा से ही इस भूमि की संस्कृति में समाया हुआ है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला गंगासागर कोई अपवाद नहीं है। मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। यह एक ऐसा उत्सव है जो विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों के लिए एक साझा केंद्र बिंदु बन जाता है, जो एक साथ मिलकर एकता का परिचय देते हैं। गंगासागर की महत्ता बताते हुए नारद मुनि युधिष्ठिर से कहते हैं कि दस अश्व मेघ यज्ञ जैसा पुण्य एक बार गंगा सागर स्नान से मिलता है। वैसे तो गंगा हर जगह पवित्र हैं किन्तु हरिद्वार प्रयाग और गंगा सागर में स्नान से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। स्कन्द पुराण में ऐसा वर्णन आया है कि तीर्थ दर्शन सब प्रकार का दान सर्व देवता का पूजा सर्व विधि तपस्या सर्व प्रकार के दान करने से जो पुण्य मिलता है वह एक बार गंगा सागर स्नान से ही प्राप्त हो जाता है। गंगा सागर आज नित्य तीर्थ बन गया है फिरभी मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा सागर तीर्थ स्नान परम पुण्य दायक है।

बैतरणी पार:- 

गरुड़ पुराण के अध्याय 47 में एक रहस्यमय नदी का नाम "बैतरणी" बताया गया है। यह नदी नश्वर दुनिया की भौतिक संपत्ति का प्रतीक है, जिसे छोड़ना मुश्किल है। ऐसा माना जाता है कि मृतकों की आत्माओं को नदी पार करनी चाहिए, और जो लोग दयालु नहीं रहे हैं या दूसरों की मदद के लिए आगे नहीं आए हैं, वे नदी में गिर जाएंगे और अनंत काल के रसातल में नष्ट हो जाएंगे। असहाय आत्मा गाय की पूंछ से चिपके हुए नदी पार करने में सक्षम होती है ।

पुण्य स्नान:- 

मोक्ष पुनर्जन्म से मुक्ति का एक अंतर्निहित अर्थ है जिसे धरती पर रहते हुए प्राप्त किया जा सकता है। कुछ भारतीय परंपराओं ने दुनिया के भीतर नैतिक कार्यों पर मुक्ति पर जोर दिया है, एक रहस्यमय परिवर्तन जो व्यक्ति को अहंकार और दुख के धुंधले बादल से परे परिस्थितियों की वास्तविकता का सामना करने कीअनुमति देता है। मोक्ष की यह मुक्ति मकर संक्रांति की शुभ महातिथि पर गंगासागर में दिव्य स्नान के माध्यम से भक्तों की आत्माओं में जागृत होती है। एक ऐसा नजारा जिसे देखना मुश्किल है। दुनिया भर में लाखों भक्त पवित्र संगम के अमृत में डुबकी लगाने के लिए सांस रोककर इंतजार करते हैं।

मोक्ष का सोपान :- 

इस पौराणिक कथा में आस्था रखते हुए, दुनिया भर से लाखों तीर्थयात्री मोक्ष की तलाश में पितृ पक्ष और मकर संक्रांति के दौरान गंगासागर मेले में आते हैं। माना जाता है कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से सभी दुख और पाप धुल जाते हैं। इस विश्वास के साथ, लाखों लोग कपिल मुनि आश्रम में "सब तीर्थ बार बार गंगा सागर एकबार" भजन गाते हुए आते हैं।

             लेखक सपत्नीक


कपिल भगवान का मन्दिर 

1)प्राचीन मंदिर:- 

गंगासागर की तट पर स्थित कपिल मुनि मंदिर काफी पुराना है. इस जगह के साथ पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं. इसका विशेष महत्व है. गंगासागर की तट पर स्थित कपिल मुनि आश्रम गंगा और सागर के मिलन के पहले से ही प्रतिष्ठित है। सन 434 अब्द में इस तीर्थ क्षेत्र में एक मन्दिर अवस्थित था। यह मंदिर बार बार समुद्र द्वारा ग्रास किए जाने के कारण अपना स्थान बदलता रहा है। पता चलता है कि मन्दिर का निर्माण रानी सत्य भामा ने 430 अब्द में कराया था। इस जगह के साथ पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं. इसका विशेष महत्व है. 

2)एक और मंदिर :- 

कपिल मुनि का मंदिर 1437 में स्वामी रामानंद ने स्थापित किया था. पहला मंदिर वर्तमान जगह से लगभग 20 किमी की दूरी पर था. लेकिन जलस्तर बढ़ने से यह समुद्र में समा गया. इसे फिर दूसरी जगह स्थापित किया गया. पर कुछ सालों बाद यह मंदिर भी समुद्र में समा गया. बताया जाता है कि इसी तरह कपिल मुनि के तीन मंदिर समुद्र में समा चुके हैं. अब वर्तमान मंदिर पर भी खतरा मंडरा रहा है. बताया जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण 1970 के दशक में किया गया था. लेकिन जब यह बना था, उस समय सागर से करीब चार किमी की दूरी पर था. वर्तमान समय में सागर से कपिल मुनि मंदिर की दूरी कम होकर मात्र 500 मीटर रह गयी है.

 3)गुप्त काल का एक मंदिर:- 

इस स्थान पर गुप्त काल का एक मंदिर था।  तटीय कटाव के कारण यह मंदिर नष्ट हो गया था । 19वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में, जब वॉरेन हेस्टिंग्स ने द्वीप से वनस्पति साफ़ करवा दी और यह स्थल पूर्व मेदिनीपुर के एक स्थानीय बंगाली हिंदू ज़मींदार यदुराम की ज़मींदारी के अंतर्गत आ गया, जिन्होंने कपिलमुनि के मंदिर को पुनः प्राप्त किया। फिर यह स्थल अयोध्या के रामानंदी साधुओं के नियंत्रण में आ गया । पुराना मंदिर बांस से बना था जो 50 के दशक के अंत या 60 के दशक की शुरुआत में चक्रवातों के कारण नष्ट हो गया था। पहला ईंट से बना मंदिर 1961 में 20,000 रुपये में बनाया गया था, और मंदिर की छत एस्बेस्टस से बनी थी । पूर्व मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय ने मंदिर के निर्माण में 11,000 रुपये का योगदान दिया था।

4.)नया मंदिर: 1974 में वर्तमान:- 

वर्तमान मंदिर 1974 ई में बनाया जाना कहा जाता है। इसे सात बार परिवर्तन के दौर से गुजरना पड़ा है। वर्तमान में यह मंदिर अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी द्वारा नियंत्रित होता है। चूँकि मंदिर और मंदिर परिसर गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी के तट पर हैं, इसलिए कभी-कभी उच्च ज्वार या चक्रवाती तूफानों के दौरान समुद्र और नदी का पानी मंदिर और मंदिर परिसर में प्रवेश कर जाता है । मई 2021 के अंत में बंगाल की खाड़ी में यास नाम का एक शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात बना । इस तूफान के प्रभाव से ज्वार का पानी कपिल मुनि के आश्रम और मंदिर में प्रवेश कर गया। 

ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाई मुश्किलें:- 

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बंगाल सहित पूरे देश के तटवर्ती इलाकों में समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है. इन क्षेत्रों में मौसम में भी तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है. बंगाल समेत देश के तटवर्ती इलाकों में आये दिन चक्रवाती तूफान आ रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में चक्रवाती तूफानों की संख्या, गति व तीव्रता में काफी वृद्धि देखी गयी है. इसका असर सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल गंगा सागर पर भी पड़ रहा है.

110 मीटर भू-भाग हो गया था जलमग्न:- 

कोलकाता से करीब 100 किमी दूर दक्षिण 24 परगना जिले के सागर द्वीप पर स्थित यह तीर्थस्थल हर साल छोटा होता जा रहा है. सागर द्वीप वर्तमान में करीब 224.3 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है. यहां 43 गांव हैं. इनमें सबसे बड़ा गांव है, गंगा सागर. समुद्र के बढ़ते जलस्तर ने इस पूरे द्वीप को खतरे में डाल दिया है. जानकार बताते हैं, 1969 से 2022 तक लगभग 52 वर्षों में सागरद्वीप का 31 वर्ग किमी ( लगभग छह किमी का इलाका) क्षेत्र पानी में समा गया है. 1969 के आसपास सागरद्वीप का कुल क्षेत्रफल 255 वर्ग किमी के आस-पास था, जो अब कम होकर 224.3 वर्ग किमी हो गया है. यानी हर साल औसतन 110 मीटर (0.6 वर्ग किमी  का भू-भाग जलमग्न हो रहा है.

वर्तमान कपिल मंदिर भी खतरे में :- 

गंगा सागर में स्थित वर्तमान कपिल मुनि मंदिर भी खतरे में है. अगर अब भी केंद्र व राज्य सरकार सचेत नहीं हुई, तो अगले एक दशक में कपिल मुनि मंदिर भी पानी में समा जायेगा. वर्तमान मंदिर का निर्माण 1970 के दशक में किया गया था. लेकिन जब यह बना था, उस समय सागर से करीब चार किमी की दूरी पर था, लेकिन वर्तमान समय में सागर से कपिल मुनि मंदिर की दूरी कम होकर मात्र 500 मीटर रह गयी है. अगर इसी तरह समुद्र का जलस्तर बढ़ता रहा और कटाव जारी रहा, तो बहुत जल्द कपिल मुनि मंदिर भी पानी में समा जायेगा.विशेषज्ञों के अनुसार, तटीय पर्यावरण के मुद्दे अत्यधिक जटिल हैं, इसलिए तटीय क्षेत्र के विकास पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए. भूमि, समुद्र और वायुमंडल के बीच निरंतर भौतिक संपर्क तट को एक गतिशील क्षेत्र बनाता है. सागर द्वीप तट ज्वार-भाटा बहुल वाला क्षेत्र है. अत्यधिक उच्च ज्वार के दौरान यहां उच्च ज्वार छह मीटर तक पहुंच जाता है और कभी-कभी ये प्रभाव चक्रवातों के दौरान बहुत अधिक होते हैं, जो अक्सर तट के इस हिस्से में होते हैं. उस समय तो छह मीटर से उच्च ज्वार आते हैं, जिससे तटवर्ती क्षेत्रों में कटाव बहुत अधिक होता है.

मुख्य मन्दिर में स्थापित विग्रह;- 

यहां मूल रूप में कपिल मुनि मध्य में पद्मासन में योग निद्रा में लीन हैं । इनके बाएं हाथ में कमंडल और दाएं हाथ में जप माला धारण किए हुए हैं। उनके ऊपर पंच नाग का छत्र छाया है।सूर्य और चंदमा भी दिखाया गया है।भगवान कपिल के दक्षिण मां गंगा देवी की गोद में बालक भगीरथ को दिखाया गया है। गंगा जी मकर पर आरूढ़ चार भुजा वाली है। उनके हाथ में शंख चक्र, रत्नकुम्भ और वराभय धारण किए हुए हैं। बाएं तरफ राजा सगर की मूर्ति है।कपिल मुनि के मंदिर में पूजा करने और देवता का आशीर्वाद लेने जाते हैं।  एक और कारण है जिसकी वजह से हर साल लाखों तीर्थयात्री गंगासागर आते हैं। वे आस्था के साथ स्नान करते हैं और कपिल मुनि के मंदिर की ओर पूजा करने और देवता का आशीर्वाद लेने जाते हैं। 

      इन केंद्रीय विग्रह के बाई ओर अष्ट भुजा सिंह वाहिनी श्री जी विशालाक्षी की अलग से मूर्ति विराजमान है।इससे बाई ओर देवराज इंद्र अपने श्याम कर्ण घोड़े के साथ दृष्टव्य हैं।एक अलग भाग में हनुमान जी, देवाधिदेव महादेव कपालेश्वर सपरिवार विराजमान हैं। दीवाल पर श्री कृष्ण और राधा रानी का विग्रह अंकित है।

           अन्य आकर्षण

सागर बीच:- 

सागर बीच सागरद्वीप के सिरे पर स्थित है, जो विश्व के अधिकांश तीर्थयात्रियों में गंगासागर के नाम से लोकप्रिय है। सागर तट में हर साल लाखों पर्यटकों का मेला लगता है क्योंकि श्रद्धालुगण गंगा नदी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए सागरद्वीप आते हैं।सुनहरी रेत और कैसुरीना के पेड़ों के साथ यह शहर का सबसे लोकप्रिय बीच है, जो सूर्योदय और सूर्यास्त के सुंदर दृश्य प्रदान करता है. एक प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थ यात्रा का हिस्सा होने के अलावा, यह प्राचीन सागर तट सूर्यास्त का आनंद लेने के लिए एक शांत-निर्मल, सुखद वातावरण प्रदान करता है।

भारत सेवा आश्रम:- 

सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक लोकहितैषी संघटन है जिसमें संन्यासी और नि:स्वार्थीकार्यकर्ता भ्रातृभाव से कार्य करते हैं। यह संयासियों और नि:स्वार्थ कर्मयोगियों की संस्था है जो मानवता की सेवा के लिये समर्पित है। इसका मुख्यालय कोलकाता में है तथा पूरे भारत तथा विश्व में कोई ४६ अन्य केन्द्र हैं।एक गैर-लाभकारी संस्था का आश्रम, जो तीर्थयात्रियों को ठहरने और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, खासकर गंगासागर मेले के दौरान. सर्वांगीण राष्ट्रीय उद्धार इसका मुख्य उद्देश्य और संपूर्ण मानवता की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति इसका सामान्य लक्ष्य है। भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना प्रखर देशप्रेमी सन्त आचार्य श्रीमद् स्वामी प्रणवानन्द जी महाराज ने सन् 1917 में की थी।

ओंकारनाथ मंदिर:- 

ओंकारनाथ मंदिर गंगासागर में एक और बहुत ही पावन मंदिर है। यह मंदिर भगवान ओंकार और उनके उपदेशों को समर्पित है। मनोहारी हरियाली के बीच यह मंदिर अत्यंत शांतमय वातावरण में स्थित है। यहाँ भीड़ बहुत कम होती है और कोई भी व्यक्ति बड़ी शांति से, अपनी भक्ति को पूरा समय देते हुए आराम से पूजा कर सक प्रदान करता है. 

मानानंद कपिलाश्रम:- 

मानानंद कपिलाश्रम वास्तव में पश्चिम बंगाल के गंगासागर द्वीप पर स्थित कपिल मुनि का आश्रम है, जो गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी के संगम पर है. यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है जहाँ लोग पवित्र स्नान करने आते हैं और भगवान कपिल की पूजा करते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे भगवान विष्णु के अवतार थे. राजा सगर के 60,000 पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति के लिए गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने में कपिल मुनि की भूमिका से यह स्थान पौराणिक रूप से जुड़ा हुआ है. 

इस्कॉन मंदिर: - 

इस्कॉन गंगासागर मंदिर एक भव्य सांस्कृतिक और वैदिक शिक्षा केंद्र है।जो मुख्य मन्दिर के पास है. यह मंदिर तीन चरणों में बन रहा है और इसमें एक भव्य मंदिर, संग्रहालय, पुस्तकालय, अतिथि गृह और पूर्ण-गुंबद थिएटर जैसी सुविधाएं होंगी. यह बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाने और आध्यात्मिक उत्थान के लिए एक केंद्र के रूप में कार्य करता है. 

अन्य प्रमुख संस्थान :- 

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर 

योगेंद्र मठ 

ओमकार नाथ यात्री निवास

शंकराचार्य मठ 

चिंता हरेश्वर मन्दिर 

कपिलानंद सांख्य कुटीर आश्रम

वासुदेव मठ

संख्याचार्य योगाश्रम

राम कृष्ण मिशन गंगा सागर 

बल्लभाचार्य आश्रम

श्री लोकनाथ आश्रम

इसके अलावा यहां अन्यानेक चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाएं भी जन सेवा के लिए समर्पित हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक स्वयं यात्रा करके ये रिपोर्ट बनाई है।

(वॉट्सप नं.+919412300183)




Friday, September 12, 2025

काशी के पिशाचमोचन के पिण्डदान- तर्पण से प्रेतात्मा भी मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

मोक्ष की नगरी काशी:- 

यहां भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है। काशी को मोक्ष की नगरी कही जाती है। यहीं से भगवान शिव ने सृष्टि रचना का प्रारम्भ किया था । यहां जो इंसान अंतिम सांस लेता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है इसीलिए कई लोग अपने अंतिम समय में काशी में ही आकर बस जाते हैं। मोक्ष नगरी काशी में चेतगंज थाने के पास पिशाच मोचन कुंड स्थित है।

गंगावतरण से पहले का तीर्थ :- 

इस कुंड की महत्ता गरुड़ पुराण में भी बताया गया है। काशी खंड की मान्यता के अनुसार पिशाच मोचन मोक्ष तीर्थ स्थल की उत्पत्ति गंगा के धरती पर आने से भी पहले से है। मान्यता है कि हजार साल पुराने इस कुंड किनारे बैठ कर अपने पितरों जिनकी आत्माए असंतुष्ट हैं उनके लिए यहा पितृ पक्ष में आकर कर्म कांडी ब्राम्हण से पूजा करवाने से मृतक को प्रेत योनियों से मुक्ति मिल जाती है।इसके लिए पेड़ पर सिक्का रखवाया जाता है ताकि पितरों का सभी उधार चुकता हो जाए और पितर सभी बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकें और यजमान भी पितृ ऋण से मुक्ति पा सके। प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। 

त्रिपिंडी श्राद्ध का विधान:- 

ऐसी मान्यता है कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसलिये पितृ पक्ष के दिनों पिशाच मोचन कुंड पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्राद्ध की इस विधि और पिशाच मोचन तीर्थस्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।

बहुत व्यवस्थित व्यवस्था :- 

वाराणसी प्रशासन ने कुंड के चारों तरफ पक्का पूजन तर्पण स्थल बना रखा है जो विशाल जन समूह को शास्त्रीय विधि से तर्पण को सुगम बनाता है। अयोध्या के भरत कुंड की गया वेदी और कुण्ड में भी इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए। भारत में सिर्फ पिशाच मोचन कुंड पर ही त्रिपिंडी श्राद्ध होता है, जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। मान्यता के अनुसार यहां कुंड़ के पास एक पीपल का पेड़ है जिसको लेकर मान्यता है कि इस पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है। 

शिवगण कपर्दि द्वारा निर्मित तीर्थ:- 

काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ / विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया था और इस स्थान पर शिव की पूजा की थी, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सकें - भगवान विश्वनाथ का सिद्धि क्षेत्र।

कपर्दीश्वर की पूजा से प्रेत योनि से मुक्ति:- 

एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया था। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति का उपाय मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार उस पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। 

पितृ लोक से जुड़ा यह क्षेत्र :- 

हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (अश्विनका कृष्ण पक्ष) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। 

पितृ दोष निवारण का सिद्ध क्षेत्र :- 

यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। 

पितृपक्ष के महीने में विशेष आयोजन:- 

पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद / गेरुवा कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। 

प्रमुख आकर्षण :- 

मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, विशाल वृक्षों हरियाली युक्त शांत वातावरण इसकी दिव्यता को दर्शाती है।कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंच कोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन किया जा सकता है। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।


लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक इस समय पितृ तर्पण चारों धाम की यात्रा पर है।)

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