Wednesday, March 23, 2022

स्वंभुव मनु और शतरूपा पुत्र प्रियव्रत - उत्तानपाद की कहानी( राम के पूर्वज - 2 ) डा. राधे श्याम द्विवेदी

स्वायम्भु मनु के दो पुत्र थे: 1. प्रियव्रत और 2. उत्तानपाद।
प्रियव्रत की कहानी  
प्रियव्रत मनु के सबसे बड़े पुत्र थे। मनु पुत्र प्रियव्रत को सारा राजपाट सौंप देना चाहते थे, लेकिन प्रियव्रत अपने ईष्ट देव की आराधना में ही लगे रहते थे। बाद के दिनों में उन्होंने पिता की बात को मान लिया और विवाह के लिए सहमत हो गये। मनु अपने बड़े पुत्र को पृथ्वी का राज्य सौंपकर निश्चित होना चाहते थे। लेकिन प्रियव्रत अखण्ड समाधि-योग द्वारा विष्णु आराधना में मग्न थे। मनु और ब्रह्मा ने प्रियव्रत को समझाया। अनिच्छा होते हुए भी उन्हें मनु और ब्रह्मा की बात माननी पड़ी। स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि दस पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुए।
प्रियव्रत का विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री से विवाह किया
इनकी दो पुत्रियां- सम्राट और कुक्षि और दस पुत्र हुए।
आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मन, द्युतिमान, मेधा, मेधातिथि, भव्य, सवन, पुत्र और ज्योतिष्मान । इनमें मेधा, अग्निबाहु और पुत्र – योग पारायण और पूर्वजन्म वृत्तान्त जानने वाले थे। बाकी सात को पृथ्वी के सात द्वीप बांट दिये:
पुत्र                    द्वीप
आग्नीध्र              जम्बुद्वीप
मेधातिथि             प्लक्षद्वीप
ज्योतिष्मान           कुशद्वीप
द्युतिमान                क्रौंचद्वीप
भव्य                      शाकद्वीप
सवन                    पुष्करद्वीप
 प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम तामस और रैवत- ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने नामवाले मनवंतरों के अधिपति हुए। महाराज प्रियव्रत के दस पुत्रों मे से कवि, महावीर तथा सवन ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था। प्रियव्रत ने अपनी पुत्री उर्जस्वती का विवाह दैत्य गुरु शुक्राचार्य के साथ किया था, जिसके फलस्वरूप देवयानी का जन्म हुआ।
उत्तानपाद की कहानी   
ये मनु के द्वितीय पुत्र थे। मनु के दूसरे पुत्र उत्तानपाद तथा तीन कन्याएँ आकूति, देवहुति और प्रसूति थीं।राजा मनु सन्यास को चले गए और प्रियव्रत तपस्या के लिए चले गए अब राजा मनु के छोटे पुत्र उत्तानपाद सारे राज्य की बागडोर सम्भाल कर राज्य करने लगे। राजा उत्तानपाद के एक पत्नि थी सुनिति। सुनिति एकदम नाम के अनुसार थी यानि निति निपुन पर राजा उत्तानपाद को सुनिति से कोई संतान नही हुई । जब बहुत साल बीत गए तो उनके राज्य की जनता को बहुत चिन्ता हुई कि जब राजा के संतान नही होगी तो राजा के बाद राज्य की देखभाल कौन करेगा?
राज्य की जनता ( प्रजा ) और मंत्रीमंडल इस निष्कर्ष पर पहुंचे की राजा को दुसरा विवाह कर लेना चाहिए पर राजा उत्तानपाद इस बात से सहमत नही हुए तो वे सभी रानी सुनिति को समझाने लगे की राज्य के लिए राजा के पुत्र की जरुरत होती है। रानी उनकी बात से सहमत हो गई की राजा को संतान प्राप्त करने के लिए दुसरी शादी कर लेनी चाहिए।
        रानी सुनिति का राजा उत्तानपाद को दुसरी शादी के लिए रजामंद करने का प्रयास शुरु हुआ। रानी सुनिति राजा को समझाती की राजा का सच्चा धर्म अपनी प्रजा के हीत के बारे मे सोचना और राज्य की भलाई के कार्य करना इस समय हमारे कोई संतान नही और हमारे बाद कौन प्रजा की देखभाल करेगा । राज्य राजा के बिहीन सुना हो जाएंगे ऐसे मे कोई दुसरा राजा अपने राज्य पर आक्रमण कर देगा तो हमारा यह राज्य क्षत विछिपत हो जाएंगा।
       बहुत बहस के बाद राजा को रानी की बाते के आगे झुकना पडा और दुसरी शादी के लिए सहमत होना पडा।
बहुत खौज-खबर के बाद एक छोटा सा राज्य था उसकी राजकुमारी जीसका नाम सुरुचि था सुरुचि नाम के अनुरुप उतनी ही सुन्मादर थी सुरुचि यानि सुन्नदरता से भरा यौवन जो दुसरो को अपनी तरफ खिंच लेती है सुन्दरता से मुग्ध हो कोई भी उसकी और आकर्षित हो जाए सुरुचि मान गई पर उसने शर्त रखी कि मै शादी के लिए तैयार तब होऊंगी जब राजा की पहली पत्नि राजा का त्याग करदे नही तो सौतन का सामना करना मुझे मंजुर नही।रानी उसकी इस बात से सहमत हो गई ।रानी सुनिति अपने राज्य और प्रजा की भलाई के लिए राजा से दुर होने के लिेए सहमत हो गई। अब राजा उत्तानपाद की शादी सुरुचि से हो गई।राजा उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो गए अब तो जो वो सुरुचि चाहती राजा वही करते। हमेशा राजा शुरुचि को प्रसन्न रखने के लिए यत्न करते रहते ।रानी सुनिति राजा से दुर अपने रंगमहल मे ही रहती कभी भी राजा के सामने नही जाती थी।
         रानी सुनिति अपनी पत्नि धर्म सुरुचि को सम्भला कर खुद प्रभु भक्ति मे लग गई अपने महल मे ही रह कर भक्ति करती।इस पर भी रानी सुरुचि को रानी सुनिति से जलन होती उसको लगता कही रानी सुनिति से मिलने राजा उसके पास ना चले जाए वो राजा को इस बात की चेतावनी सदैव देती रहती की वो सुनिति से दुर ही रहे अब सुरुचि एक पल के लिए भी राजा को अपने से दुर नही जाने देती हर पल वो राजा के साथ रहती सभा भवन मे भी वो राजा के साथ जाती थी।
इस पर भी उसके मन को संतोष नही मिला उसने हार कर एक दिन राजा से कह ही दिया की सुनिति को महल और राज्य सब को छोड कर दुर चले जाने का प्रबंध करो।राजा उत्तानपाद सुरुचि का दिवाना बन गया था जैसे वो कहती करता इस लिए राजा ने सुनिति को देश निकाला देने की सोची पर रानी सुनिति इस बात से घबरा गई की अब राज्य से दुर कहाॅ जाऊंगी पर राजा तो अब सुरुचि के हाथ की कटपुती बन गए थे उन्होने सुनिति की कोई परबाह नही की और सुनिति को राज्य छोड कर चले जाने का आदेश दिया बेचारी सुनिति राजा की आज्ञा मान कर राज्य से दुर चली गई।
         उसने राज्य की सिमा के पास कुछ दुरी पर एक कुटिया बना कर रहने लगी उसकी साथ उसकी प्रिय दासी जो उसके पिता ने उसको शादी के वक्त भेट की थी वो साथ रहती थी इससे रानी सुनिति को बडा सहारा था। वो दासी राज्य मे जाकर सामान ले आती थी जंगल से फल फूल आदि भी रानी के लिए ले आती थी। राज्य का सारा हाल वो दासी देख सुन कर उसका वर्णन रानी सुनिति को कर देती थी और रानी सुनिति अपनी प्रजा की खुशहाली की जानकारी पा कर खुश होती थी।
        एक दिन राजा उत्तानपाद शिकार खेलने निकले तो मौसम बहुत खराब होने के बजह से उन्हे रात हो गई और इधर-उधर किसी आश्रय की तलाश मे निकल पडे उन्हे एक कुटिया दिखी और भोजन पानी की आश से वो कुटिया के निकट गए और कुटिया के बाहर खडे हो कर कुटिया के मालिक से अंदर रुकने की आज्ञा मांगने लगे ।अतिथि की आवाज सुन कर दासी बाहर आई और राजा को अंदर ले गई। वह कुटिया रानी सुनिति की थी पर राजा को इस बात का पता नही था। जब रानी सुनिति ने दीपक की मदद से राजा को भोजन परोसा तो रानी सुनिति की नजर राजा उत्तानपाद पर पडी और वो राजा को पहचान गई। रानी ने आतिथ्य धर्म निभा कर राजा को भोजन करवाया।और राजा के पाव छुए तब राजा उत्तानपाद को पता चला की यह रानी सुनिति है।
         अब राजा सुनिति से नजरे भी नही मिला पाए बहुत शर्मिना हुए की ये मेने क्या कर दिया त्रिया-चरित्र के वश होकर मेने इतना बडा पाप कर दिया अपनी ही रानी को को जंगल मे कुटिया मे रहने के लिए मजबुर कर दिया महलो की रानी अब जंगल मे रहती है। राजा का पछतावा हुआ वेचारी जंगली जानवरो से कैसे खुद की रक्षा करती होगी जंगली भोजन खा कर रहती है। रानी की दुर्दशा के जीमेदार खुद को मान कर पछतावा करने लगे इस लिए उस रात को वह रानी के संग बिता कर अगले दिन राज्य चले गए।
      अब वो घडी आई जब सुरुचि माँ बनने वाली हुई। यह जानकर राजा उत्तानपाद खुशी से झुम उठे। बधाईयाँ बांटी गई पुरे राज्य की प्रजा को उपहार भेट किए गए।यह जब रानी सुनिति की दासी ने देखा सुना की रानी सुरुचि माँ बनने वाली है इसलकी खबर उसने रानी सुनिति को सुनाई अब रानी सुनिति भी इस खुशी मे बहुत खुश हुई कि राज्य की राजकुमार मिल जाएंगा। कुछ दिनो बाद ही सुनिति भी माँ बनने वाली थी। अब राज्य मे वो घडी आई की सुरुचि ने एक बालक को जन्म दिया उधर- सुनिति ने भी एक बालक को जन्म दिया। देखो भगवान की कैसी लीला कहाॅ तो कितने सालो तक रानी सुनिति को बालक नही हुआ उधर सौत के संतान हुई तभी सुनिति को भी संतान पैदा हो गई।
          एक तरफ राजा उत्तानपाद और रानी सुरुचि की संतान राजकुमार बहुत लाड प्यार ऐशो आराम से पल रहाॅ था उधर राजा उत्तानपाद का दुसरा पुत्र जो जंगल मे कुटिया मे बचपन बीता रहाॅ था। सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम रखा गया और सुनिति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया। राजा अपनी सुनिति रानी से पैदा संतान ध्रुव के जन्म से अनजान था उसे पता नही चला था कि उसकी दुसरी संतान भी पैदा हुई है । वो तो उत्तम मे ही अपना मन रमाए बैठे थे। अपनी कम आयु में ही कठोर तपस्या द्वारा श्रीहरि को प्रसन्न करने वाले बालक ध्रुव राजा उत्तानपाद के ही पुत्र थे। 
          कहते हैं जो बड़ी रानी है उनको बाद में एक पुत्र हुआ जिसका नाम था ध्रुव और दूसरी रानी सुरुचि को उत्तम नाम का पुत्र हुआ। अब जरा ध्यान से सुनना, दूसरी रानी जो है वह राजा उत्तानपाद को आसक्ति में बांध लिया था। दरअसल हम सभी उत्तानपाद हैं। उत्तान पाद का मतलब?  जिसके दोनों पैर ऊपर हों। जीव जब मां के गर्भ में रहता है तब उसके पैर ऊपर की ओर होते हैं। इसलिए हम सब उत्तानपाद हैं और हम जीवों की मुख्य दो पत्नियां हैं। कौन सी?.. “सुनीति और सुरुचि” सुनीति माने सुंदर नीति बुद्धिमानी और सुरुचि माने सुंदर रुचि अर्थात मनमानी, अब बुद्धि भी दो प्रकार की होती हैं।
एक सद्बुद्धि दूसरी दुर्बुद्धि बुद्धिमानी और मनमानी यह दो पत्नियां हम सब की प्रत्येक जीव की है। सुंदर नीति सुंदर ज्ञान शास्त्रों का जिसके आधार पर अपने जीवन को चलाना है, शास्त्र के सिद्धांत पर अपने जीवन को अग्रसर करना है तभी तो ध्रुव की प्राप्ति होगी। ध्रुव माने अटल स्थिर तत्व की प्राप्ति कब होगी?.. जब सुनीति का आश्रय लोगे, जब बुद्धिमानी का आश्रय लोगे और यदि बुद्धिमानी छोड़ मनमानी के चक्कर में पड़ गए तो मनमानी का दूसरा नाम है सुरुचि, मतलब सुनीति की सौत इच्छाओं और मनोकामना का नाम है सुरुचि। अब कामनाएं अच्छी हों, तो ठीक है पर कामनाएं तो कई प्रकार की होती हैं। अच्छी भी बुरी भी तो व्यक्ति जब कामनाओं के पीछे पड़ जाता है। कि नहीं यह होना ही चाहिए तो कभी पूरी नहीं होती है एक आवश्यकता पूरी हुई दूसरी द्वार पर खड़ी है।
          दूसरी बात; अब सुरुचि का पुत्र कौन है? उत्तम! हमने यदि अपनी बुद्धि वस्तुओं की इच्छाओं में फसाया तो कामनाएं और बड़ी होंगी। फिर वह उत्तम ही करता है कभी चोरी, तो कभी डकैती, अरे वस्तु को पाने की इच्छा हुई धन है, हमने उसे खरीद लिया। परंतु इच्छा है धन नहीं है, तो परिणाम क्या हुआ?.. हम चोर कहलाएंगे मतलब कि उस चीज, उस वस्तु को हमें पाना है उसके लिए हम चाहे जिस हद तक जाएं किसी को मारना पड़ेगा चाहे जेल भी क्यों न जाना पड़े। यही है उत्तम सुरुचि का पुत्र।
          अब उत्तानपाद जब सुरुचि के प्रेम पास में फंस गया तो सुनीति को घर से निकाल बाहर किया उसका मतलब क्या?.. मतलब कि हर प्राणी कामनाओं की पूर्ति में ही प्रसन्न होता है। महाराज! पर यह याद रखो कि सुरुचि से क्या मिलता है और सुनीति से क्या मिलता है यही शिक्षा हमें इस ध्रुव चरित्र से लेनी चाहिए।



Tuesday, March 22, 2022

स्वयंभुव मनु और शतरूपा की कहानी ( राम के पूर्वज -1 ) डा. राधे श्याम द्विवेदी


                भगवान राम सूर्यवंश में त्रेता युग के तृतीय चरण में आए परंतु रावण का जन्म सतयुग ( सत्ययुग ) के मध्य काल तृतीय चरण की शुरुवात में हुआ और वह सूर्यवंशी राजाओं से पीढ़ी दर पीढ़ी लडता रहा और हमेशा हारा अंत में रामजी द्वारा मारा गया। राम विष्णु के अवतार भी रहे और ब्रह्मा द्वारा सृजित कुल में अवतार लिए थे। इसी कुल परंपरा के कुछ धुंधले पृष्ठों पर जमे धूल को साफ कर प्रभु जी के कुल की कीर्ति गाथा प्रभु जी के श्रीचरणों में समर्पित किया जा रहा है।
          त्रिमूर्ति की अवधारणा में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, और भगवान शिव हिंदू धर्म में सर्वोच्च शक्तियां माने गए हैं। हिंदू त्रिमूर्ति में भगवान ब्रह्मा इक्कीस ब्रह्मांडो के स्वामी ब्रह्म-काल (ज्योति निरंजन) और देवी दुर्गा (माया / अष्टांगी / प्रकृति देवी) के सबसे बड़े पुत्र हैं। उनके अन्य दो छोटे भाई भगवान विष्णु और भगवान शिव हैं। ब्रह्मा को विश्व के आद्य सृष्टा, प्रजापति, पितामह तथा हिरण्यगर्भ भी कहते हैं। पुराणों में जो ब्रह्मा का रूप वर्णित मिलता है वह वैदिक प्रजापति के रूप का विकास है। प्रजापति उसे कहते हैं जिससे प्रजाओं की उत्पत्ति हो अर्थात जिससे परिवार, कुल और वंश की वृद्धि हो। ब्रह्मा के पुत्रों को भी प्रजापित कहा जाता है। कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया। राम के पूर्वजों की पीढ़ी की शुरूआत सबसे पहले ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई।
         दूसरी पीढ़ी में ब्रह्मा जी के पुत्र थे मरीचि हुए थे। तीसरी पीढ़ी में मरीचि के पुत्र कश्यप हुए थे।इसके बाद कश्यप के पुत्र विवस्वान हुए। जब विवस्वान हुए तभी से सूर्यवंश का आरंभ माना जाता है। विवस्वान से पुत्र वैवस्वत मनु हुए।वैवस्वत मनु के दस पुत्र हुए , इनमें से एक का नाम था इक्ष्वाकु इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना हुई। भगवान राम का जन्म वैवस्वत मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था. 
स्वयंभुव मनु और शतरूपा :- 
सरस्वती से विवाह करने के पश्चात ब्रह्मा ने सर्वप्रथम स्वयंभु मनु को जन्म दिया। शतरूपा संसार की प्रथम स्त्री थी ऐसी हिंदू मान्यता है। इनका जन्म ब्रह्मा के वामांग से हुआ था (ब्रह्मांड. 2-1-57) तथा स्वायंभुव मनु की पत्नी थीं। सुखसागर के अनुसार सृष्टि की वृद्धि के लिये ब्रह्मा जी ने अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम 'का' और 'या' (काया) हुये। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम स्वयंभुव मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई।
स्वायंभुव 'मनु' को आदि भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। सभी भाषाओं के मनुष्य-वाची शब्द मैन, मनुज, मानव, आदम, आदमी आदि सभी मनु शब्द से प्रभावित है। यह समस्त मानव जाति के प्रथम संदेशवाहक हैं। इन्हें प्रथम मानने के कई कारण हैं। संसार के प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु और प्रथम स्त्री थी शतरूपा। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान मनु को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है। उन्होंने अपनी संकल्प शक्ति से शतरूपा देवी का सृजन किया। शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा और शतरूपा के संयोग से ही स्वयंभू मनु का जन्म हुआ । इन्हीं मनु से मानव प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वायंभु मनु और स्त्री रूप में शतरूपा को प्रकट किया। 
          भगवान श्रीराम जी के आद्य पुरुष स्वयंभुव मनु थे। मनु एक धर्मशास्त्रकार थे, धर्मग्रन्थों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है। ये ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से थे जिनका विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न अयोनिज कन्या शतरूपा से हुआ ।आपव (जो कि बाद में स्वायंभुव मनु कहलाये) ने प्रजा की रचना करने के उपरांत शतरूपा को अपनी पत्नी बना लिया। स्वयंभू मनु और सतरूपा से बहुत सी संताने हुई और उन्हीं की संतानों से यह नर मनुष्य की सृष्टि की रचना हुई। उनके पुत्र का नाम वीर हुआ। वीर ने प्रजापति कर्दम की कन्या काम्या से विवाह किया तथा दो पुत्र (1) प्रियव्रत तथा (2) उत्तानपाद और तीन पुत्री (1) प्रसूति और (2) आकूति ( 3) देवहूति नाम की संतानों को जन्म दिया। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ।
          दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया। इसके नाम श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धुति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि, और कीर्ति हैं। तेरह का विवाह धर्म से किया और फिर भृगु से ख्याति का, शिव से सती का, मरीचि से सम्भूति का, अंगिरा से स्मृति का, पुलस्त्य से प्रीति का पुलह से क्षमा का, कृति से सन्नति का, अत्रि से अनसूया का, वशिष्ट से ऊर्जा का, वह्व से स्वाह का तथा पितरों से स्वधा का विवाह किया। आगे आने वाली सृष्टि इन्हीं से विकसित हुई।
            देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। रुचि के आकूति से एक पुत्र उत्प‍न्न हुआ जिसका नाम यज्ञ रखा गया। इनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था। कपिल ऋषि देवहूति की संतान थे। हिंदू पुराणों अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई।
           महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। इन्हीं ने 'मनु स्मृति' की रचना की थी जो आज मूल रूप में नहीं मिलती। उसके अर्थ का अनर्थ ही होता रहा है। उस काल में वर्ण का अर्थ रंग होता था और आज जाति। प्रजा का पालन करते हुए जब महाराज मनु को मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राजपाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर एकान्त में अपनी पत्नी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए।               इन्हें परम ब्रह्म का दर्शन हुआ और अगले जन्म में ये दशरथ कौशल्या के रूप में जन्म लेकर राम नामक परम ब्रह्म के माता पिता का सम्मान मिला था। मनु ने सुनंदा नदी के किनारे सौ वर्ष तक तपस्या की। दोनों पति-पत्नी ने नैमिषारण्य नामक पवित्र तीर्थ में गौमती के किनारे भी बहुत समय तक तपस्या की। उस स्थान पर दोनों की समाधियां बनी हुई हैं।

Sunday, March 20, 2022

राम चरित मानस में आदर्श रामराज्य की परिकल्पना डा. राधे श्याम द्विवेदी

            हिन्दू संस्कृति में राम द्वारा किया गया आदर्शासन रामराज्य के नाम से प्रसिद्ध है। वर्तमान समय में रामराज्य का प्रयोग सर्वोत्कृष्ट शासन या आदर्श शासन के रूपक (प्रतीक) को रामराज्य, लोकतन्त्र का परिमार्जित रूप माना जा सकता है।रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने रामराज्य पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सिंहासन पर आसीन होते ही सर्वत्र हर्ष व्याप्त हो गया, सारे भय–शोक दूर हो गए एवं दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गई। कोई भी अल्प मृत्यु, रोग–पीड़ा से ग्रस्त नहीं था, सभी स्वस्थ, बुद्धिमान, साक्षर, गुणज्ञ, ज्ञानी तथा कृतज्ञ थे।
राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।।
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।
       वाल्मीकि रामायण में भरत जी रामराज्य के विलक्षण प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं, "राघव! आपके राज्य पर अभिषिक्त हुए एक मास से अधिक समय हो गया। तब से सभी लोग निरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियां बिना कष्ट के प्रसव करती हैं। सभी मनुष्यों के शरीर हृष्ट–पुष्ट दिखाई देते हैं। राजन! पुरवासियों में बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृत के समान जल गिराते हुए समय पर वर्षा करते हैं। हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन नगर तथा जनपद के लोग इस पुरी में कहते हैं कि हमारे लिए चिरकाल तक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें।"
धर्म भारत की आत्मा:-
भारतवर्ष   अत्यन्त   प्राचीन   समय   से   ही   धर्म - प्रधान   देश   रहा   है।   यहाँ   धर्म   की   अत्यन्त   व्यापक   एवं   विशद   व्याख्या   की   गई   है ।धर्म   लगभग   जीवन   के   हर   एक   कार्यों   में   समाविष्ट   है।   “ धर्म   भारतीय   जीवन   के   प्रत्येक   स्फुरण   में   इतना   घुल मिल   गया  है   कि   दोनों   के   बीच   कोई   विभाजन   सम्भव   ही   नही है।   भारतीय   दृष्टि   में   धर्म   जीवन   का   आदर्श   है और   जीवन   धर्म   का   व्यवहार। ”  धर्म   के   माध्यम   से   सत् - असत्   के   भेद ,  न्यायिक   क्रियाओं ,  नैतिक   सिद्धान्तों   को   समझकर   उसे   अपने   जीवन   में   लागू   किया   जा   सकता   है।   महाभारत   में   ‘ धर्म ’  के   विषय   में   बताते   हुए   यह   कहा   गया   है   कि   धर्म   वही   है   जिससे   किसी   दूसरे   को   कष्ट   न   पहुँचे बल्कि   लाभ   हो।   जो   धर्म   का   मात्र   अपने   लिए   ही   अंधानुकरण   करता   है ,  वह   अंधे   के   समान   सूर्य   की   प्रभा   से   अछूता   रहता   है।  राम चरित मानस में पुरूषार्थ का विशेष विधान  के   अर्थ   में   प्रयोग   नहीं   मिलता   है।   एक   पुत्र   के   राम चरित मानस में पुरूषार्थ का विशेष विधान उसके   माता - पिता   की   आज्ञा   का   पालन   करना   ही   ‘ धर्म ’  है।   अयोध्याकाण्ड   में  कौशल्या   श्रीराम   के   लिए   कहती   हैं -

‘ सरल   सुभाउ   राम   महतारी।

बोली   बचन   धीर   धरि   आरी।

तात   जाऊँ   बलि   कीन्हेहु   नीका।

पितु   आयसु   सब   धरम   के   टीका।। ’

              अर्थात्   हे   माता  !  मैं   बलिहारी   जाती   हूँ ,  तुमने   अच्छा   किया।   पिता   की   आज्ञा   का   पालन   करना   ही   सब   धर्मों   में   शिरोमणि   धर्म   है   और   जिसको   माता - पिता   प्राणों   के   समान   प्रिय   हैं ,  चारों   पदार्थ ( धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष ) उसके मुट्ठी  में रहते हैं -

‘ चारि   पदारथ   करतल   ताकें।

प्रिय   पितु   मातु   प्रान   सम   जाकें।। ’

दान की महिमा:-भारत   तथा   हिन्दू   धर्म   में   ‘ दान ’  की   बड़ी   महत्ता   है।   ‘ दान ’  का   अर्थ   है   कि   जब   आप   अन्य   प्राणियों   को   अपनी   सुखी   से   अन्न - धन - वस्त्र   आदि   देते   हैं।   हिन्दू   धर्म   में   प्रत्येक   शुभ   कार्य   पर   दान   देने   की   प्रथा   है।   ‘ दान ’  की   परम्परा   के   पीछे   यह   तथ्य   है   कि   हम   इस   मायारूपी   संसार   में   आकर   अन्न - धन - राज्य - संपत्ति   इन   सबसे   लोभ   व   मोह   करते   हुए ,  इनका   संग्रह   कर   देना   प्रारम्भ   कर   देते   हैं ,  किन्तु   हम   भूल   जाते   हैं   कि   वास्तव   में   संसार   से   परे   जो   चीज   या   वस्तु   जा   सकती   है ,  वह   यह   भौतिक   वस्तुयें   नहीं   है।   अतः   ‘ दान ’  कर   हम   दूसरों   के   साथ   परोपकार   करने   के   साथ   ही   अपना   उस   संपत्ति   के   प्रति   मोह   का   भी   त्याग   करते   हैं।   जिससे   जीवन   का   चरम   लक्ष्य   ‘ मोक्ष ’  प्राप्त   किया   जा   सकता   है।   ‘ मानस ’  में   गोस्वामीजी   ने   भी   हर   एक   शुभ   कार्य   करने   के   बाद   विशेष   रूप   से   ब्राह्मणों ,  मुनियों   को   राजा   द्वारा   दान   देने   की   परम्परा   को   वर्णित   किया   है।   श्रीराम   व   तीनों   कुमारों   के   जन्म   पर ,  राम   के   विवाह   की   सूचना   पर ,  श्रीराम   के   विवाह   के   पश्चात्   दशरथ   व   कौशल्या   द्वारा ,  श्रीराम   को   युवराज   पद   मिलने   पर   कौशल्या   द्वारा ,  राजा   दशरथ   की   मृत्यु   पर   भरत   द्वारा   आदि   अनेक   प्रसंगों   में   गोस्वामीजी   ने   ‘ दान ’  की   महिमा   का   गुणगान   किया   है।   ऐसा   ही   एक   प्रसंग   है   जब   श्रीराम - सीता   का   विवाह   सम्पन्न   होकर ,  वे   अयोध्या   नगरी   आते   हैं   तब   वशिष्ठजी   उन्हें   वेदों   और   लोक   में   प्रचलित   विधि   का   ज्ञान   कराते   हैं   और   तब   रानियाँ  ( दशरथ   की   पत्नियाँ )  ब्राह्ममणों   के   चरण   धोकर ,  सबको   स्नान   कराती   हैं   और   राजा   दशरथ   उनका भलीभांति पूजन   करके   भोजन  कराते   हैं। तत्पश्चात्   आदर , दान और  प्रेम   से   पुष्ट  हुए  वे  सभी  ब्राह्ममण  मन  से आशीर्वाद  देते  हैं -

‘ पाय परवारि सकल अन्हवाए। पूजि भली विधि भूप जेवाँए।।

आदर   दान   प्रेम  परिपोषे।  देत  असीत चले  मन  तोषे।। ’  दया   उपकार   और   क्षमा का महत्व :-  दया  उपकार   और   क्षमा   का   ही   हिन्दू   धर्म   के   साथ   ही   बौद्ध ,  जैन   धर्म   में   अत्याधिक   महत्त्व   है।   अनेक   लोककथाओं   में   भी   इसके   महत्त्व   पर   चर्चा   की   गई   है।   हिन्दू   धर्म   तो   सदैव   से   ही   अहिंसा   मूलक  रहा   है।   अतः   हमारे   समाज   में   इनका   महत्त्वपूर्ण   स्थान   है।   माना   जाता   है   कि   जीवों   पर   दया   करने   वाले   से   ईश्वर   सदैव   प्रसन्न   रहते   हैं।     मानस में   राम   कृपालु   होने   के   साथ - साथ   दयालु   भी   हैं।   उनके   लिए   ही   अनेक   स्थान   पर   ‘ दीनदयाल ’  शब्द   का   प्रयोग   किया   गया   है।   श्रीराम   ने   ‘ रावण ’  पर   दया   कर   उसे   अपने   धाम   में   स्थान   दिया।   श्रीराम   की   दयालुता   का   एक   प्रसंग   तब   है   जब   उनके   चरणों   से   अहिल्या   का   उद्धार   होता   है ,  तब   गोस्वामी   जी   कहते   हैं   कि -

‘ अस   प्रभु   दीनबंधु   हरि   कारन   रहित   दयाल।

तुलसीदास सठ   तेहि  भजु   छाड़ि कपट जंजाल।। ’

             अर्थात्   श्रीरामचन्द्रजी   ऐसे   दीनबन्धु   और   बिना   ही   कारण   दया   करने   वाले   हैं।   तुलसीदास   जी   कहते   हैं   कि   हे   मन  !  तू   कपट - जंजाल   छोड़कर   उन्हीं   का   भजन   कर। 

क्षमा की महत्ता:- ‘ क्षमा ’  हिन्दू   धर्म   के   साथ   ही   अनेक   धर्मों   में   परोपकार   का   माध्यम   माना   जाता   है।   क्षमा   की   प्रक्रिया   में   हम   अपने   ‘ अहम् ’  का   त्याग   कर   उससे   ऊपर   उठते   हैं ,  जिससे   हम   अधिक   सुख   पाते   हैं।   यह   एक   मनोवैज्ञानिक   प्रक्रिया   भी   है।   यदि   हम   किसी   गलती   के   लिए   क्षमा   नहीं   करेंगे   तो   स्वयं   उस   पीड़ा   से   ग्रसित   रहेंगे।   अतः   ‘ क्षमा ’  धार्मिकता   के   साथ   ही   व्यक्तित्व   को   विकास   भी   करता   है।   ‘ क्षमा ’  भी   एक   प्रकार   का   दान   है।   श्रीराम   ने   ‘ रावण ’  के   कुकत्यों   के   बाद   उसका   वध   किया   किन्तु   इसके   बाद   ही   वे   उसे   क्षमा   करके   परमधाम   भेज   देते   हैं   और   विभिषण   से   शोक   त्यागकर   उसकी   अन्त्येष्टि   क्रिया   का   आग्रह   करते   हैं -

‘ कृपादृष्टि प्रभु ताहि  बिलोका।

करहु  क्रिया परिहरि सब  सोका।।

 ’श्रीराम   समुद्र   द्वारा   क्षमा   मांगने   पर   उसे   क्षमा   प्रदान   करते   हैं।   यह   तो   ‘ ईश्वरीय   व   राजा   राम ’  की   क्षमा ,  दया ,  दान   की   व्याख्या   हुई   है।   मानवीय   रूप   व   गुण   में   ‘ राम ’  हनुमान   द्वारा   सीता   का   संदेश   लाने   पर   उनका   उपकार   मानते   हुए   कहते   हैं   कि -

‘ सुनु   कपि   तीहि   समान   उपकारी।

नहिं   कोउ   सुर   नर   मुनि   तनुधारी।।

प्रति   उपकार   करौं   का   तोरा।

सनमुख   होइ   न   सकत   मन   मोरा।। ’

          अर्थात्   हे   हनुमान  !  सुनो ,  तुम्हारे   समान   मेरा   कोई   उपकारी   देवता ,  मनुष्य   अथवा   मुनि   कोई   भी   शरीरधारी   नहीं   है।   मैं   तेरा   प्रत्युपकार  ( बदले   में   उपकार )  तो   क्या   करूँ ,  मेरा   मन   भी   तेरे   सामने   नहीं   हो   सकता।  सब   पर   उपकार   करने   वाले   ईश्वर   जब   मानवीय   स्वरूप   में   पृथ्वी   पर   अवतरित   हैं ,  तो   भी   वह   हनुमान   द्वारा   किए   गए   उपकार   का   ऋण   चुकाने   में   असम्भव   है।   जीवन   में   इन   सब   नैतिक   आचरणों   के   प्रयोग   से   ही   मानव   अपनी   तुच्छ   वृत्ति   छोड़कर   शान्ति ,  सुख ,  आनन्द   अथवा   सच्चिदानंद   को   प्राप्त   कर   सकता   है।   ‘ मानस ’  में   तुलसी   ने   भी   मानव ,  पशु - पक्षी ,  वनस्पतियों ,  वृक्षों   आदि   अनेक   साधनों   से   हिन्दू   परम्परा   में   इन   आचरणों   को   ग्रहण   करने   का   अन्यत्र   वर्णन   किया   है   जिससे   ही   परमब्रह्म   ‘ श्रीराम ’  की   प्राप्ति   सम्भव   है ,  स्वयं   यह   गुण   ईश्वर   द्वारा   भी  ग्रहण  किए  गए   हैं।

1. संस्कृतिक   संरक्षण: - भारतीय   संस्कृति   में   ‘ वसुदैव   कुटुम्बकम् ’  की   भावना   प्राचीन - काल   से   स्थापित   रही   है।   “ भारतीय   संस्कृति   की   यह   अवधारणा   है   कि   मनुष्य   प्रकृति   की   श्रेष्ठतम्   कृति   है ,  अतः   यदि   प्रकृति   का   पोषण   होता   रहा   तो   उसके   माध्यम   से   विकसित   व्यक्तित्व   संस्कृति   का   रक्षण   करने   में   सक्षम   हो   सकेंगे   तथा   संस्कृति   के   प्रमुख   उत्पादन   जिनमें   कला ,  साहित्य ,  संगीत   एवं   नैतिक   मूल्य   अक्षुण्ण   रह   सकते   हैं। ”सांस्कृतिक   संरक्षण   की   कितनी   अधिक   आवश्यकता   है ,  इसे   हम   वर्तमान   के   संदर्भ   से   भी   समझ   सकते   हैं।   संस्कृति   ही   हमें   हमारे   मूल   अस्तित्व   से   जोड़ती   है।   अतः   इसका   संरक्षण   करना   आवश्यक   भी   है।   आज   विश्व   के   लगभग   हर   संविधान   में   संस्कृति   संरक्षण   और   संवर्द्धन   के   अधिकार   का   उल्लेख   मिलता   है।   भारतीय   संविधान   में   भी   सांस्कृतिक   चेतना   संवर्द्धन   व   संरक्षण   पर   प्रमुखता   से   उल्लेखित   है।   भारत   सरकार   के   संस्कृति   मंत्रालय   द्वारा   सांस्कृतिक   सम्पदा   के   संरक्षण   के   लिए   ‘ राष्ट्रीय   सांस्कृतिक   संपदा   संरक्षण   अनुसंधान   प्रयोगशाला ’  नामक   वैज्ञानिक   संस्था   का   भी   निर्माण   किया   गया   है।   यह   सांस्कृतिक   संरक्षण   की   आवश्यकता   की   ओर   ही   इंगित   करती   है। 

         भारतीय   चिंतन   परम्परा   में   ‘ संस्कृति ’  सदैव   से   ही   एक   आवश्यक   घटक   रहा   है।   संस्कृति   से   कटे   हुए   राष्ट्र   को   दिशा   देने   में   असफल   भी   रहते   हैं।   अतः   राष्ट्र  ( राज्य )  की   जिम्मेदारी   लोगों   में   सांस्कृतिक   चेतना   को   बनाए   रखने   के   लिए   जागरूक   करने   की   होती   है।   ‘ मानस ’  में   तुलसीदासजी   ने   भारतीय   संस्कृति   के   विविध   मान्यताओं ,  कलाओं ,  क्रिया - कलापों   को   वर्णित   किया   है। इस्लाम   के   प्रवेश   के   कारण   जब   भारतीय  ( हिन्दू )  संस्कृति   संकट   की   अवस्था   में   थी ,  तब   गोस्वामीजी   ने   ‘ मानस   की   रचना   कर   सामान्य   जनों   में   उनके   सांस्कृतिक   महत्त्व   और   चेतना   को   पुनर्जिवित   करने   का   सफल   प्रयास   किया   था। 

2. सामाजिक   समानता -वैदिक   काल   में   हमें   वर्ण - व्यवस्था   देखने   को   मिलती   है।   जिसमें   समाज   चार   वर्णों   ब्राह्ममण ,  क्षत्रिय ,  वैश्य ,  शूद्र   में   विभाजित   था।   इन   सबके   कत्र्तव्य   विभाजित   थे।   समाज   में   सबसे   निम्न   स्थान   शूद्रों   को   प्राप्त   था।   ज्ञातव्य   है   कि   यह   व्यवस्था   प्रारम्भ   में   मनुष्यों   के   कर्म   पर   आधारित   थी   किन्तु   पूर्व   वैदिक   काल   तक   आते - आते   वर्ण - व्यवस्था   जनन   पर   आधारित   हो   गई।   जिसके   विरोध   में   अनेक   धर्मों   का   उदय   हुआ   यथा   बौद्ध   एवं   जैन   धर्म।   किन्तु   राजनीतिक ,  सामाजिक   एवं   धार्मिक   परिवर्तनों   के   मध्य   सामाजिक   जीवन   जटिल   बनता   गया   और   ‘ जाति - व्यवस्था ’  का   निर्माण   हो   गया।   भारत   में   आने   वाली   अनेक   संस्कृतियों   के   कारण   जातीय   बहुरूपता   विकसित   होती   है।   और   सामाजिक - राजनीतिक   वर्चस्व   की   जटिल   प्रक्रिया   में   शूद्रों   को   निचले   स्तर   पर   रखकर   उन्हें   ‘ अस्पृश्य ’  माना   गया।   जो   जन्म   आधारित   थी। गोस्वामी   तुलसीदास   के   जीवन - काल   में   यह   समस्या   बनी   हुई   थी   जिस   कारण   राष्ट्र   की   एकता   भी   बिखर   गई   थी।   स्वयं   को   उच्च   जाति   कहने   वाले   ‘ ब्राह्मणों ’  की   नैतिकता   पर   तुलसी   ने   ही   प्रश्न   खड़े   किए।   वे   कहते   हैं   कि -  ‘ विप्र   निरक्षर   लोलुप   कामी।   निराचार   सठ   वृषली   स्वामी।। ’  किन्तु   तुलसी   पर   लगातार   वर्ण - व्यवस्था   और   जाति - व्यवस्था   को   मानने   के   आरोप   लगाए   जा   रहे   हैं।   यद्यपि   यह   सत्य   है   कि   तुलसी   वर्ण - व्यवस्था   के   समर्थक   थे   किन्तु   उनकी   वर्ण - व्यवस्था   में   अस्पृश्यता   नहीं   थी   वरन्   चारों   वर्णों   का   एक   ही   घाट   पर   स्नान   करना   था।सुन्दरकाण्ड   के   एक   प्रसंग   में   जब   हनुमान   सीता   को   खोजते   हुए   लंका   पहुँचते   हैं   तो   अशोक   वन   में   सीता   उनसे   प्रश्न   करती   हैं   कि   नर  ( राम )  और   वानर  ( हनुमान )  का   संगम   कैसे   हुआ   ?

‘ नर   वानरहि ’  संग   कहु   कैसें।

कही   कथा   भइ   संगति   जैसे।। ’

       यह   उस   समय   आश्चर्य   की   ही   बात   थी   मनुष्यों   में   मनुष्य   के   लिए   जब   विभाजक   रेखा   बनी   हुई   थी ,  ऐसे   में   रीछ - बन्दर   से   मनुष्य   कैसे   संयोग   किया।   विश्वनाथ   त्रिपाठी   इस   सम्बन्ध   में   लिखते   हैं   कि   ये   बन्दर - भालू - रीछ   उपेक्षित   जाति   के   प्रतीक   हैं।   उनके   अनुसार   ” बन्दर - भालू   सर्वहारा   के   भी   प्रतीक   बन   सकते   हैं ,  जिनके   पास   लड़ने   के   लिए   केवल   नाखून   और   दाँत   हैं ,  जो   समाज   में   प्रतिष्ठित   नहीं   है ,  जंगल   में   रहते   हैं।   राम   के   सबसे   निकट   और   आत्मीय   कौन   लोग   हैं -  पति - परित्यक्ता   अहिल्या ,  जनकपुर   के   सामान्य   बालक - राजकुमार   नहीं ,  अयोध्या   के   सामान्य   नागरिक ,  वन - मार्ग   में   मिलने   वाले   ग्रामीण ,  केवट ,  शबरी ,  बन्दर - भालू , राजा   सुग्रीव   और   युवराज   अंगद   से   कहीं   अधिक   प्रिय   और   आत्मीय   हनुमान ,  पक्षिराज   गुरूड़   नहीं ,  पक्षियों   में   भी   निम्न   गीध   और   काकभुशुंडि। ”

यह   सत्य   है   कि   तुलसी   के   यहाँ  सामाजिक - समानता   की   स्थिति   इतनी   वैधानिक   नहीं   है ,  जितनी   की   वर्तमान   समय   में।   फिर   भी   तुलसीदास   ने   नैतिक   कत्र्तव्यों   पर   सामाजिक   समानता   का   ढांचा   खड़ा   किया   था।   वे   अपने   समकालीन   कवियों   का   भांति   केवल   इस   विकृत - व्यवस्था   का   विरोध   नहीं   करते   हैं   अपितु   इस   विकृत - व्यवस्था   में   सुधार   करने   के   लए   विकल्प   व   समाधान   भी   तलाशते   हैं। 

3. विविध   कलाओं   का   संरक्षण -मानस ’  में   वर्णित   विविध   कलाओं   पर   हमने   पिछले   अध्यायों   में   भी   चर्चा   की   है।   ‘ मानस ’  में   विविध   कलाओं   व   कलाकारों   को   राजा   व   राज्य   द्वारा   प्रश्रय   प्रदान   किया   गया   है।   जिसका   सबसे   महत्त्वपूर्ण   उदाहरण   ‘ जनकपुर ’  में   देखने   को   मिलता   है।   जिसमें   सीताजी   के   लिए   मण्डप   बनवाने   के   लिए   अनेक   कारीगरों   को   बुलाया   जाता   है।   इस   मण्डप   की   व्याख्या   तुलसी   ने   अति   सुन्दर   की   है।   जिसके   एक   चैपाई   में   वे   कहते   हैं   कि -

" तेहिं   के   रचि   पचि   बंध   बनाए।

विच   बिच   मुकुता   दाम   सुहाए।।

मानिक   मरकत   कुलिस   पिरोजा।

चीरि   कोरि   पचि   रचे   सरोज।। ”

अर्थात्   मण्डप   में   नाग   बेलि   रचकर   और   पच्चीकारी   करके   बन्धन  ( बाँधने   के   लिए   रस्सी )  बनाए   गए।   बीच - बीच   में   मोतियों   की   सुन्दर   झालरें   हैं।   माणिक ,  पन्ने ,  हीरे   और   फिरोजे ,  इन   रत्नों   को   चीरकर ,  कोरकर   और   पच्चीकारी   करके ,  इनके   कमल   बनाए   गए   हैं।  इसके   अतिरिक्त   शिल्पकारों   द्वारा   मूर्तियों   को   गढ़कर   निकालने   की   प्रक्रिया   का   भी   वे   वर्णन   करते   हैं -

‘ सुर   प्रतिमा   खंभन   गढ़ि   काढ़ीं।

मंगल   द्रब्य   लिएँ   सब   ठाढ़ीं।। ’

अनेक   स्थान   पर   परोक्ष   रूप   में   वस्त्रों   को   सिलने - काढ़ने   वाले   कारीगरों   का   उल्लेख   है।   जानकी   विवाह   में   ऐसे   सुन्दर   और   उत्तम   बंदनवार   बनाये   गए   हैं   मानो   कामदेव   ने   कंदे   सजाए   हों।   अनेकों   मंगल   कलश   और   सुन्दर   ध्वजा ,  पताका ,  परदे   और   चेंवर   बनाए   गए   हैं -

‘ रचे   रूचिर   बर   बंदनिवारे।

मनहुँ   मनोभवँ   पांद   सँवारे।।

मंगल   कलस   अनेक   बनाए।

ध्वज   पताक   पट   चमर   सुहाए।।

अयोध्या   से   बारात   जाते   समय   उसमें   मगध ,  सूत ,  भाट   विविध   लोग   है ,  जो   राजा   की   प्रशंसा   में   गीत   गाते   थे।   ये   राजा   के   आश्रित   होते   थे।   राम - सीता   विवाह   में   बारात   जनकपुर   पहुँचने   पर   यह   दशरथ   का   सुयश   गाते   हैं -

‘ सुर   सुमन   बरिसहिं   सूत   मागध   बंदि   सुजसु   सुनावहीं।। ’

राम   की   बारात   में   पट्टेबाज ,  विदूषक ,  नट   आदि   कलाओं   को   दिखाने   वाले   भी   सम्मिलित   हैं -

‘ घंट   घंटि   धुनि   व   रनि   न   जाहीं।

सख   करहिं   पाइक   फहराहीं।।

करहिं   बिदूषक   कौतुक   नाना।

हास   कुसल   कल   गान   सुजाना।। ’

घोड़ों   के   करतब   दिखाने   वाले   नगाड़े   और   मृदंग   के   शब्द   सुनकर   उन्हीं   के   अनुसार   इस   प्रकार   नचा   रहे   हैं   कि   वे   ताल   के  बंधन   से  जरा  भी  डिगते  नहीं   हैं -

‘ तुरग   नचावहिं   कुअँर   बर   अकनि   मृदंग   निसान।

नागर   नट   चितवहिं   चकित   डगहिं   न   ताल   बँधान। ’

इसके   अतिरिक्त   वस्त्र - आभूषण   कला ,  संगीत   व   वाद्य   मंत्रों   को   बजाने   वाले ,  पाक - कला   के   जानकारों   को   भी   राज्य   व   राजा   द्वारा   प्रश्रय   दिया   जाता   था।   जिसका   उल्लेख   तुलसीदास   ने   भी   ‘ रामचरितमानस ’  ने   किया   है।  

राम चरित मानस में पुरूषार्थ का विशेष विधान डा. राधे श्याम द्विवेदी

            भारतीय जीवन - दर्शन   में भौतिक   तथा  आध्यात्मिक   सुख   दोनों   का   महत्त्व   है   तथा   दोनों   के   समन्वित   रूप   से   ही   व्यक्ति   तथा   समाज   का   उत्कर्ष   सम्भव   है।   हिन्दू धर्मशास्त्रों   में   इसी   कारण   ‘ आश्रम - व्यवस्था'     निर्मित   की   गई   थी   जिसमें   लौकिक   तथा   पारलौकिक   लक्ष्य   की   प्राप्ति   हेतु   ‘ पुरूषार्थ ’  को   आधार   माना   गया   है।   आश्रम - व्यवस्था   में   वह   भौतिक   पदार्थों ,  सुखों   व   भोग   करते   हुए   अन्त   में   ‘ परमात्मा   प्राप्ति ’  की   ओर   उन्मुख   होता   है।   यह   चार   पुरूषार्थ   ‘ धर्म ’, ‘ अर्थ ’, ‘ काम ’  और   ‘ मोक्ष ’  हैं।   इन्हें   ‘ चतुर्वर्ग ’  कहते   हैं।   पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है ('पुरुषैर्थ्यते इति पुरुषार्थः')। पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ =पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति ही पुरुषार्थ है। प्रायः मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसलिए इन्हें 'पुरुषार्थचतुष्टय' भी कहते हैं। महर्षि मनु पुरुषार्थ चतुष्टय के प्रतिपादक हैं। बाद   में   मोक्ष   को   अंतिम   व आध्यात्मिक पुरुषार्थ मानकर   प्रथम तीन   लौकिक पुरूषार्थ   ‘ धर्म ;  अर्थ ; ‘ काम ’  पर   विशेष   बल   दिया   गया।   जिसे   ही   ‘ त्रिवर्ग ’  कहा   गया।   इस   प्रकार   मनुष्य   धर्म ,  अर्थ ,  काम   का   अनुसरण   करता   है ;  जिससे   एक   ‘ आदर्श   समाज ’ का निर्माण होता है।  तुलसीदास   बालकाण्ड   में   इसे  इस तरह वर्णित   किया   है   - - 
“ अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।
नव   रस जय जोग बिरागा।  ते सब जलचर चारू तड़ागा।। ”
    अर्थात्   धर्म ,  अर्थ ,  काम ,  मोक्ष - ये   चारों ,  ज्ञान -  विज्ञान   का   विचार   के   कहना ,  काव्य   के   नौ   रस ,  जप ,  तप ,  योग   और   वैराग्य   के   प्रसंग - ये   सब   इस   सरोवर   के   सुन्दर   जलचर   जीव   हैं।   तुलसीदास   ने   मनुष्य   जीवन   में   ही   ‘ पुरूषार्थ ’  के   महत्त्व   को   अंकित   नहीं   किया   बल्कि   यह   भी   बताया   कि   काव्य   को   भी   इनका  ( पुरूषार्थ )  अनुसरण   करने   वाला   तथा   इनकी   ओर   प्रेरित   किए   जाने   वाला   होना   चाहिए।  तुलसीदास   अपनी   श्रीराम   के   प्रति   भक्ति - भावना   का   वर्णन   करते   हुए   कहते   हैं   कि   श्रीराम   के   प्रभाव   से   चारों   पदार्थ  ( धर्म ,  अर्थ ,  काम ,  मोक्ष )  भी   मुट्ठी   में   आ   जाते   हैं।   राज्य   का   भी   यह   कर्तव्य   होता   है   कि   इन   चारों   को   प्राप्त   करने   में   प्रजा   की   सहायता   करें।   गोस्वामी   जी   कहते   हैं   कि   राजा   के   पास   चारों   पुत्र   ऐसी   शोभा   पा   रहे   हैं   मानो   अर्थ ,  धर्म ,  काम   और   मोक्ष   शरीर   धारण   किए   हों।   राजा   के   लिए   भी   धर्म ,  अर्थ ,  काम ,  मोक्ष   अत्यन्त   आवश्यक   माना   गया   है।   अतः   तुलसीदास   भी   ‘ मानस ’  में   चित्रित   करते   हैं   कि   ‘ श्रीराम - सीता   के   विवाह   के   पश्चात्   सब   पुत्रों   को   बहुओं   सहित   देखकर   अवधेश   नरेश   दशरथजी   ऐसे   आनन्दित   हैं ,  मानो   वे   राजाओं   के   शिरोमणि   क्रियाओें   साहित   चारों   फल  ( धर्म ,  अर्थ ,  काम ,  मोक्ष )  पा   गए   हों - 
‘ मुदित अवधपति   सकल ’  सुत  बधुन्ह  समेत  निहारि।
जनु   पाए   महिपाल   मनि  कृयन  सहित  फल  चारि।। ’
        हिन्दू   धर्म   में   मानव - जीवन   का  पुरूषार्थ   ही   उद्देश्य   अथवा   लक्ष्य   माना   जाता   है।   ‘ तुलसीदास ’  भी   पुरूषार्थ  ( चतुर्वर्ग )  अथवा   त्रिवर्ग   को   अनेक   स्थानों   पर   सम्पादित   होते   हुए   अभिव्यक्त   किया   है   और   अंत   में   ‘ श्रीराम ’  के   चरणों   में   ही   मोक्ष   या   परमानंद   की   अवस्था   मानी   है।


राम चरित मानस में प्रजा के रक्षा का विधान। डा. राधे श्याम द्विवेदी

मानस एक विश्वस्तरीय महाकाव्य है क्योंकि इसके केंद्र में लोकमंगल है। राम चरित मानस में ऐसा लोकमंगल जिसकी परिधि में राम राज्य की विराट संकल्पना समाहित है तथा जो समूचे विश्व द्वारा वंद्य और अनुकरणीय है। गोस्वामी तुलसी दास ने ‘रामचरित मानस’ में सुशासन का आदर्श ऐसे समय में स्थापित किया जब विदेशी आक्रान्ताओं की दमनकारी नीति चरम पर थी। भारतीय संस्कृति को विध्वंस करने का सिलसिला अनवरत जारी था। जन-मन आहत एवं राजतंत्र दिशाहीन था। धर्म दिग्भ्रमित व अर्थाभाव चतुर्दिक था। ऐसे परिदृश्य में स्वान्तः सुखाय की रघुनाथ गाथा लोकचेतना की संवाहक बनी। ‘मानस’ लोक के लिए मंत्र बन गया। जन आकांक्षा रामराज्य के अयोध्यावासियों-सी होने लगी। ‘मानस’ को पाकर ‘हर्षित भए गये सब सोका’ की स्थिति बनने लगी। निराशा में आकंठ डूबे समाज के लिए यह महाकाव्य ‘असरन सरन बना। राज्य   के   गठन   के   साथ   ही   राज्य   के   सर्वोच्च   अधिकारी   राजा   का   कर्तव्य   प्रजा - हित   में   कार्य   करना   होता   है।   जो   शासक   अपनी   प्रजा   की   रक्षा   न   कर   सके ,  उसे   अयोग्य   माना   जाता   है।   इतिहासकार   रामशरण   शर्मा   लिखते   हैं   कि   “ चूंकि   प्राचीन   परम्पराओं   में   शासक   या   दंड   के   अभाव   को   संपत्ति ,  परिवार   और   वर्णव्यवस्था   के   लिए   बहुत   बड़ा   खतरा   समझा   गया   है ,  इसलिए   राज्य   इनकी   रक्षा   के   निमित्त   ही   उदित   हुआ। ”   वह   उनकी   रक्षा   करता   था   तथा   इसके   बदले   में   वह   प्रजा   से   कर  (टैक्स) प्राप्त   करता   था।   मानस   के   बालकाण्ड   के   प्रसंग   में   ऋषि   विश्वामित्र   जो   राक्षसों   के   कारण   यज्ञादि   धर्मकार्य   नहीं   कर   पा   रहे   थें ,  राजा   दशरथ   ने   राम   को   मांगने   आते   हैं ,  ताकि   वो   उनकी   रक्षा   कर   सकें।   श्रीराम   मुनि   विश्वामित्र   के   साथ   जाकर   मारीचि   आदि   राक्षसों   का   नाश   करते   हैं   और   मुनियों   से   निडर   होकर   यज्ञादि   करने   को   कहते   हैं।   स्वयं   राम   यज्ञ   की   रखवाली   करते   हैं।   श्रीराम   वनवास   जाने   के   पश्चात्   भरत   भी   राजपाठ   का   त्याग   करने   लगते   हैं   तब   ऋषि   वशिष्ट   भरत   को   राजा   का   धर्म   स्मरण   कराते   हुए   कहते   हैं   कि   आपको   व्यर्थ   चिंता   करने   की   आवश्यकता   नहीं   है   और   किसी   को   दोष   देने   से   कोई   लाभ   नहीं   है   अपितु   ” चिंता   वह   राजा   करें ,  जिसने   नीति   का   पालन   नहीं   किया   हो   तथा   जिसको   प्रजा   प्राणों   के   समान   प्यारी   न   हों - 
             सोचिउ   नृपति   जो   नीति   न   जाना।
             जेहि   न   प्रजा   प्रिय   प्रान   समाना। ’
             अतः   भरत   प्रजा   का   पालन   कर   कुटुम्बियों   का   दुःख   हरो।   इसके   बाद   ही   वैराग्य   का   ध्यान   छोड़कर   भरत   अयोध्याजी   का   राजकाज   सँभालते   हैं।   जिसके   कारण   अयोध्या   के   नगरवासी   सुखपूर्वक   रहने   लगते   हैं।
 प्रजा   को   धर्मिक कार्यों   में   लगाना :- 
  राजा   का   कर्तव्य   प्रजा   की   रक्षा   करने   के   साथ   ही   उसे   धर्म   की   ओर   प्रेरित   करना   भी   था।   गोस्वामीजी   ने   अनेक   बार   उल्लेख   किया   है   कि   राजा   के   राज्य   अथवा   नगरी   में   सभी   स्त्री - पुरूष   धर्म   का   पालन   करते   हैं।   उत्तर काण्ड   में   राम राज्य   की   स्थापना   हो   जाने   के   बाद   ‘ सभी   दम्भ रहित   हो   जाते   हैं , धर्मपरायण   और   पुण्यात्मा   हो   जाते   हैं।   पुरूष   और   स्त्री   सभी   चतुर   और   गुणवान्   हैं।   सभी   गुणों   का   आदर   करने   वाले   और   पण्डित   हैं   तथा   सभी   ज्ञानी   हैं।   सभी   कृतज्ञ   हैं ,  कपट - चतुराई  ( धूर्तता )  किसी   में   नहीं   है - 
‘ सब   निर्दंभ   धर्मरत पुनी। नर  अरु  नारि  चतुर सब  गुनी।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतज्ञ  नहिं कपट समानी।।
         वास्तव   में   सम्पूर्ण   ‘ मानस ’  से   ही   अयोध्या   के   राजा   दशरथ   व   राम   द्वारा   जनता   को   धर्म   हित   के   कार्यों   को   करने   के   लिए   प्रेरित   किया   गया   है।  







Saturday, March 19, 2022

पर्यावरण के नैतिक संरक्षण के उपाय डा. राधे श्याम द्विवेदी

           गोस्वामी तुलसीदास   जी  के समय   पर्यावरण   प्रदूषण   कोई   समस्या   नहीं   थी।   पृथ्वी   का  अधिकांश   भू - भाग   पर   वन - क्षेत्र   होता   था। उस समय के ‘ पर्यावरण ’  की   संकल्पना   अत्यन्त  ही   वृहद   है।   हमारी   संस्कृति   में   पर्यावरण   का   सम्बन्ध   धर्माचरण   से   है ,  अतः   पर्यावरणीय   चेतना   व   कार्यों   के   प्रति   अरूचि ,  उदासीनता   अथवा   इनके   प्रति   बने   नियमों   का   उल्लंघन   ‘ अधर्म ’  की   श्रेणी   में   आता   है।   वैदिक   ग्रन्थों   में   ‘ मा   हिंस्यात्   सर्वभूतानि ’  अर्थात्   किसी   भी   जीव   की   हत्या   करना   निषिध   था।   ‘ अहिंसा ’  पर्यावरण   संतुलन   एवं   संरक्षण   के   प्रति   एक   दृष्टिकोण   ही   है।   प्रकृति   में   उपस्थित   वृक्षों ,  पर्वतों ,  नदियों   आदि   से   बने   प्राकृतिक   पर्यावरण   के   अतिरिक्त   सामाजिक   पर्यावरण   की   निर्मिति   भी   की   गई।   जिसमें   विभिन्न   नैतिक   एवं   सांस्कृतिक   मूल्यों   के   माध्यम   से   ‘ राज्य ’  तथा   ‘ समाज ’  का   विकास   सम्भव   होता   है।   इस   ‘ मूल्यबोध ’  को   बनाए   रखना   समाज   के   साथ   ‘ राज्य ’  का   भी   कर्तव्य  होता   है।   संस्कृत   साहित्य   में   वैदिक   युग   से   ही   नीति   परक   उपदेशों   की   परम्परा   चली   आ   रही   है ,  जिनमें   शुक्र   नीति ,  चाणक्य   नीति ,  विदुर   नीति ,  हितोपदेश   आदि   अत्यन्त   प्रसिद्ध   हैं।   ‘ नीति ’  का   प्रयोग   मनुष्य   में   ‘ नैतिकता ’  के   विकास   के   लिए   किया   जाता   है   और   इससे   ‘ नैतिक   पर्यावरण ’  भी   बनता   है।   समाज   में   रहने   वाले   प्रत्येक   व्यक्ति ,  वर्ग ,  जाति ;  राष्ट्र   को   एक - दूसरे   के   प्रति   कैसा   व्यवहार   करना   चाहिए ;  इसके   लिए   बनाए   गए   नियमों   से   ही   नैतिक   पर्यावरण   का   संरक्षण   किया   जाता   है।   भारत   में   संस्कार ,  पुरूषार्थ ,  कर्मकाण्ड   आदि   का   निर्माण   भी   सांस्कृतिक   पर्यावरण   के   संरक्षण   के   लिए   ही   हुआ   है।   पर्यावरण   संरक्षण   में   रामचरितमानस   की   भूमिका   को   हम   विभिन्न   रूपों   में   देखते   हैं।
नैतिक   संरक्षण की प्रमुखता:-
नैतिकता   वह   गुण   है   जिससे   मनुष्य   में   समस्त   क्रिया - कलाप   व   व्यक्तित्व   प्रभावित   होता   है।   यह   कत्र्तव्य   की   आंतरिक   भावना   होती   है ,  जो   विवेक   के   बल   पर   संचालित   होती   है।   यही   विवेक   उचित - अनुचित   का   निर्णय   करने   में   सहायक   होता   है।   जीवन   में   नैतिक   मूल्यों   को   आवश्यक   माना   जाता   है।   नैतिक   मूल्य   के   कारण   ही   मानव   पशुत्व   आचरण   से   इतर   ‘ मानवीय   प्राणी ’  ( मानवीय   आचरण   युक्त )  कहलाता   है।  
मनुष्यों   द्वारा   अपनाए   जाने   वाले   नैतिक   मूल्य   समाज   के   विकास   के   साथ   बदलते   हैं ,  अतः   एक   ही   समाज   में   विभिन्न   युगों   में   नैतिक   मूल्य   बदल   जाते   हैं।   इस   प्रकार   नीति   मनुष्य   के   जीवन   के   वास्तविक   लक्ष्य   को   प्राप्त   करने   में   सहायता   करती   है।  नैतिकता   हमें   धर्म ,  अनुशासन ,  आचरण ,  कानून   आदि   से   जोड़ती   है।   चाणक्य   भी   नीति   शास्त्र   में   लिखते   हैं   कि -  ‘ सुखस्य   मूलं   धर्मः। ’  सुख   का   मूल   आधार   धर्म   है।   वास्तव   में   देखा   जाए   तो   धर्म   एवं   कानून   का   निर्माण   ही   नैतिक   मूल्यों   के   संरक्षण   हेतु   किया   गया   है।   ‘ मानस ’  के   श्रीराम   तो   नैतिकतामय   जीवन   के   आदर्श   प्रतीक   स्वयं   हैं।
भारतीय   साहित्य   परम्परा   व   जीवन   में   नैतिक   मूल्य   की   आवश्यकता   एवं   महत्त्व   को   केन्द्र   में   रखा   गया   है।   नैतिकता   से   मनुष्य   के   साथ - साथ   राष्ट्र   का   उत्थान   भी   होता   हैं।   जो   समाज   नैतिकता   से   विमुख   हो   जाता   है ,  उसकी   अवनति   तय   है।   ‘ मानस ’  में   ‘ रावण ’  की   गति   द्वारा   इसे   समझा   जा   सकता   है।   इस   उपखण्ड   में   हम   नैतिक   संरक्षण   के   अन्तर्गत   न्याय ,  त्रिवर्ग ,  धर्म ,  प्रजा   की   रक्षा   हेतु   राजा   के   कर्तव्य ,  उपकार ,  दान ,  दया ,  क्षमा   आदि   पर   चर्चा   करेंगे।  हिन्दू   धर्म   में   नैतिकता   के   अन्तर्गत   दान ,  उपकार ,   दया ,  क्षमा ,  तय   आदि   का   विशेष   महत्त्व   है।   इन   कार्यों   को   धार्मिकता   से   जोड़   दिया   गया   ताकि   समाज   ईश्वरोपदेश   मानकर   इन   कर्तव्यों   को   पूरा   करे।   यह   जिम्मेदारी   समाज   की   ही   नहीं   अपितु   राज्य   व   शासक   की   भी   होती   थी।  ‘ मानस ’  में   तुलसीदास   जी   ने   नैतिक   पर्यावरण   की   पराकाष्ठा   चित्रित   की   है   तथा   इन   दान ,  क्षमा ,  दया   आदि   कार्यों   द्वारा   उसका   संरक्षण   करने   की   महत्ता   को   भी   प्रदर्शित   किया   है।  न्याय -  प्राचीन   समय   में   भी   भारतीय   राज   व्यवस्था   में   मनुष्य   तथा   समाज   को   व्यवस्थित   और   नियंत्रित   रखने   के   लिए   अनेक   प्रथाओं ,  परम्पराओं   तथा   विधानों   को   सृजित   किया   था।   अतः   इसके   विरूद्ध   कार्य   करने   वाले   के   लिए   दण्डविधान   भी   था।   श्रीमद्भागवद्गीता   में   श्रीकृष्ण   अर्जुन   को   उपदेश   देते   हुए   कहते   हैं   कि - 
‘ तस्माच्छास्त्रं   प्रमाण   ते   कार्याकार्यव्यस्थितौ।
ज्ञात्वा   शास्त्रविधानोक्तं   कर्म   कर्तुमिहार्हसि।। ’
            अर्थात्   हे   अर्जुन।   कर्तव्य आकर्तव्य   के   निर्णय   करने   में   तुम्हारे   लिए   शास्त्र   ही   प्रमाण   हैं ,  शास्त्रों   के   कहे   गये   कर्म   को   तुम्हें   इस   संसार   में   करना   चाहिए।   अतः   यदि   शास्त्र - विरुद्ध   कार्य   अथवा   अनैतिक   कार्य   का   ‘ न्याय ’  द्वारा   ही   विनाश   किया   जायेगा   तथा   जिससे   पुनः   धर्म   की   स्थापना   होगी।   इस   दृष्टि   से   धर्मशास्त्रों   का   निर्माण   न्याय ,  दण्ड ,  विधि   के   नियमों   पर   ही   किया   गया   है।   ‘ मानस ’  में   बालि - वध   के   प्रसंग   में   देखें   तो   श्रीराम   द्वारा   बालि   को   छिपकर   मारे   जाने   पर   बालि   प्रश्न   करता   है   कि -
“ धर्म   हेतु   अवतरेहु   गोसाईं। 
  मारेहु   मोहि   ब्याध   की   नाई।।
मैं   बैरी   सुग्रीव   पिआरा।  
 अवगुन   कवन   नाथ   मोहि   मारा।। ”
“ अनुज   बधू   भगिनी   सुत   नारी।  
 सुनु   सठ   कन्या   सम   ए   चारी।
इन्हहि   कुदृष्टि   बिलोकई   जोई।   
ताहि   बधें   कछु   पाप   न   होई।। ”
           अर्थात्   हे   मूर्ख।   सुनो   जो   छोटे   भाई   की   स्त्री ,  बहिन ,  पुत्र   की   स्त्री   और   कन्या - ये   चारों   समान   हैं।   इनको   जो   बुरी   दृष्टि   से   देखता   है ,  उसे   मारने   में   कुछ   भी   पाप   नहीं   होता   है।  बालि   ने   अपने   अनुज   सुग्रीव   की   पत्नी   को   छीन   लिया   था , अतः   बालि   को   छिपकर   मारने   में   भी   कोई   अपराध   नहीं   था ,  अपितु   यह   सुग्रीव   व   उनकी   पत्नी   के   साथ   किया   गया   ‘ न्याय ’  था।   बालि   ने   नीति - नियमों ,  परम्पराओं   के   विरूद्ध   कार्य   किया ,  अधर्म   किया।   इसलिए   वह   ‘ दण्ड ’  का   भागी   भी   बना।  साहित्यकार रामशरण   शर्मा   लिखते   हैं   कि   ” राज्य   की   अखण्डता   और   एकता   बनाए   रखने   के   लिए   प्लेटो   राज्यधर्म   का   विधान   करता   है ,  जिसका   मतलब   यह   हुआ   कि   कुछ   धार्मिक   विश्वासों   और   प्रथाओं   को   सभी   वर्गों   के   लोगों   द्वारा   आधारित   करवाना   चाहिए।   इनका   उल्लंघन   करने   वालों   के   लिए   कारावास   या   मृत्युदंड   तक   का   भी   विधान   किया   गया   है। ”  जिससे   ‘ न्याय - व्यवस्था ’  बनी   रहें   तथा   समाज   नीति   का   निरन्तर   पालन   करता   करें।   राम   ‘ रावण ’  का   वध   कर   न्याय ,  नीति ,  धर्म   की   ही   स्थापना   करते   हैं।   गोस्वामीजी   रावण   वध   के   बाद   इन्द्र   द्वारा   राम   की   स्तुति   करते   हुए   कहते   हैं   कि - 
‘ परद्रोह   रत   अति   दुष्ट।   पायो   सो   फलु   पापिष्ट।।
अब   सुनहु   दीन   दयाल।   राजीव   नयन   बिसाल।। ’
        अर्थात्   वह   दूसरों   से   द्रोह   करने   में   तत्पर   और   अत्यन्त   दुष्ट   था।   उस   पापी   ने   वैसा   ही   फल   पाया।   स्पष्ट   है   कि   यद्यपि   वर्तमान   समय   में   विध   व   कानूनी   प्रक्रियायें   अत्यन्त   जटिल   हो   गई   हैं   फिर   इन   प्रक्रियाओं   में   धन   व   समय   अत्यधिक   लगता   है   जिससे   न्यायार्थी   को   कई   बार   अपने   सम्पूर्ण   जीवन   में   भी   न्याय   नहीं   मिल   पाता।  
           भारत   में   आए   अनेक   विदेशी   शासन   प्रणाली   से   ही   हमारी   न्याय - व्यवस्था   भी   प्रभावित   हुई   है।   आज   स्थिति   विकट   है।   ‘ मानस ’  व   भारतीय   धर्मग्रन्थों   के   माध्यम   से   समझा   जा   सकता   है   कि   राज्यव्यवस्था   और   न्यायव्यवस्था   के   साथ   ही   समाज   व   व्यक्ति   में   व्याप्त   नैतिक   आचरण   से   ही   एक   सभ्य ,  संस्कारी ,  शिक्षित   व   अपराध   मुक्त   सामाजिक - सांस्कृतिक - नैतिक   पर्यावरण   निर्मित   हो   सकता   है।  

रामचरितमानस में पर्यावरण संरक्षण डा. राधे श्याम द्विवेदी

          गोस्वामी तुलसीदास   जी  के समय   पर्यावरण   प्रदूषण   कोई   समस्या   नहीं   थी।   पृथ्वी   का  अधिकांश   भू - भाग   पर   वन - क्षेत्र   होता   था।   शिक्षा   के   केन्द्र   आबादी   से   दूर   ऋषि -  मुनियों   के   वनों   में   स्थित   आश्रम   हुआ   करते   थे।   श्रीरामचन्द्र   जी   ने   भी   अपने   भाईयों   सहित गुरु वशिष्ठ और  महर्षि   विश्वामित्र   जी   से   उनके   आश्रम   में   ही   शिक्षा   ग्रहण   की   थी।   समाज   में   इन   ऋषि  -  मुनियों   का   बड़ा   सम्मान   था।   प्रतापी   राजा -  महाराजा   भी   इन   ऋषि - मुनियों   के   सम्मुख   नतमस्तक   होने   में   अपना   सौभाग्य   समझते   थे।   यही   करण   है   कि   जब   श्रीराम   को   बनवास   हुआ   तो   उन्हें   सर्वाधिक   प्रसन्नता   इसी   बात   की   हुई   थी   कि   वन - क्षेत्र   में   ऋषि - मुनियों   के   सत्संग   का   लाभ   प्राप्त   होगा -
मुनिगन   मिलन   विषेष   वन ,  सबहिं   भांति   हित   मोर। 
         श्रीराम   को   भविष्य   में   रामराज्य   की   स्थापना   करनी   थी    जिसमें   मानव - जीवन   को   सुखमय   बनाने   हेतु   मानव - प्रकृति - जीव - वनस्पति   सभी   में  सामजस्य   पर   आधारित   समवेती   विकास   सम्भव   हो   सके।   रामचरित   मानस   में   पाते   है   कि   विभिन्न   प्राकृतिक   अवयवों   को   मात्र   उपभोग   की   वस्तु   नहीं   माना   गया   है   बल्कि   सभी   जीवों   तथा   वनस्पतियों   से   प्रेम   का   सम्बन्ध   स्थापित   किया   गया   है।   प्रकृति   के   अवयवों   का   उपभोग   निषिद्व   न   होकर आवयकता के अनुसार   कृतज्ञता पूर्वक   उपभोग   की   संस्कृति   प्रतिपादित   की   गयी   है ।  जैसे   वृक्ष   से   फल   तोड़कर   खाना   तो   उचित   है   लेकिन   वृक्ष   को   काटना   अपराध   है -
‘ रीझि   खीझी   गुरूदेव   सिख   सखा   सुसाहित   साधु।
तोरि   खाहु   फल   होई   भलु   तरु   काटे   अपराधू। 
           रामराज्य   धरती   पर   अनायास   स्थापित   नहीं   किया   जा  सकता   है   इसके   लिए   प्राकृतिक   पर्यावरण   संरक्षण   की   संस्कृति   विकसित   करने   की  आवश्यकता   है ।  तुलसीदास   जी   ने   रामचरितमानस   में   वर्णित   किया   है   कि   जब   श्रीरामचन्द्र   जी   के   विवाहोपरान्त   बारात   लौटकर   अयोध्या   आती   है   तो   अयोध्या   नगरी   में   विविध   पौधों   का   रोपण   किया   गया -
      “ सफल   पूगफल   कदलि   रसाला। 
          रोपे   बकुल   कदम्ब   तमाला।। ”
       पौधा - रोपण   की   संस्कृति   को   विकसित   करने   के   लिए   श्रीराम   ने   अपने   वन - प्रवास   के   दिनों   में   सीता   जी   व   लक्ष्मण   जी   के   साथ   विस्तृत   पौधारोपण   की   ओर   सकेंत   करते   हुए   कहा   कि - 
         “ तुलसी   तरुवर   विविध   सुहाए।
       कहुँ   कहुँ   सिएँ ,  कहूँ   लखन   लगाये।। ”
           पारिवारिक शुभ   अवसरो पर   पौधा - रोपण   की   संस्कृति   से   आज   के   सबसे   भयावह   संकट -  पर्यावरण   प्रदूषण   से   मुक्ति   संभव   है।   इसीलिए   रामराज्य   में   प्रकृति   के   उपहार   स्वतः   प्राप्त   थे।   तुलसीदास   जी   ने   रामराज्य   में   वनों   की   छटा   और   उनसे   मिलने   वाले   उपहारों   का   संजीव   चित्रण   करते   हुए   वर्णन   किया   है   --

फूलहिं   फरहिं   सदा   तरु   कानन।   
रहहि   एक   संग   गज   पंचानन।।
खग   मृग   सहज   बयरु   बिसराई।  
 सबन्हिं   परस्पर   प्रीति   बढ़ाई।।
कूजहिं   खग   मृग   नाना   वृंदा।  
 अभय   चरहिं   बन   करंहि   अनंदा।।
सीतल   सुरभि   पवन   बह   मंदा।  
 गुंजत   अति   लै   चलि   मकरंदा।।
लता   बिटप   माँगे   मधु   चवहीं।
  मन   भावतो   धेनु   पय   स्रवहीं।।
ससि   सम्पन्न   सदा   रह   धरनी।  
त्रेता   भइ   कृतयुग   के   करनी।।
प्रगटी   गिरिन्ह   विविध   मनि   खानि।   
जगदातमा   भूप   जग   जानी।।
सरिता   सकल   बहहिं   बर   बारी।   
सीतल   अमल   स्वाद   सुखकारी।।
सागर   निज   मरजादा   रहहीं।   
डॉरहिं   रत्न   तटन्हि   नर   लहहिं।।
सरसि   संकुल   सकल   तड़ागा।   
अति   प्रसन्न   दस   दिसा   विभागा।।
बिधु   महि   पूर   मयूखन्हि   रवि   जय   जेतनेहिं   काजा।।
मांगे   बारिद   देहिं   जल   रामचन्द्र   के   काज।।
       प्रकृति   का   सीमित   दोहन   ही   मानव - जीवन   के   सुखमय   भविष्य   की   गारंटी   है।   प्रकृति   द्वारा   प्रदत्त   वस्तु   का   उपयोग   हमें   प्रकृति   से   अनावश्क  छेड़छाड़   किये   बिना   करना   चाहिए।   ऐसी   सामाजिक   संस्कृति   को   पुनः   प्रतिष्ठित   करने   की   आवश्यकता   है  जिसका   वर्णन   तुलसीदास   जी   ने   रामचरितमानस   में  बखूबी किया   है।