शाकद्वीपीय ब्राह्मणों (जिन्हें मग ब्राह्मण या भोजक भी कहते हैं) ने भारत में सूर्योपासना, ज्योतिष और आयुर्वेद चिकित्सा परंपराओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उन्हें सूर्य के अंश से उत्पन्न दिव्य ब्राह्मण माना जाता है और वे सूर्य मंदिरों के पुरोहित, ज्योतिषी व वैद्य के रूप में जाने जाते हैं, जिनका उल्लेख वेद-पुराणों में भी है, खासकर भविष्य पुराण में। शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का मुख्य देव भगवान सूर्य रहे हैं। इनकी उपासना पद्धति में आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य सहस्रनाम और अश्विनीकुमारों का विशेष महत्व रहा है। अश्विनीकुमार वैदिक काल के दिव्य चिकित्सक थे, और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने उन्हीं की परंपरा को आयुर्वेद और रसायन शास्त्र में जीवित कर रखा है।
बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास रही है - उदाहरणार्थ देव-औरंगाबाद (बिहार) , कोणार्क, मोढेरा, उनाओ- दतिया (मध्यप्रदेश) के सूर्य मंदिर इत्यादि।
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने निम्न लिखित क्षेत्रों में अपना बहुमूल्य योगदान प्रस्तुत किया है-
1.ज्योतिष और गणित में योगदान:-
भविष्य पुराण और ब्रह्मांड पुराण में वर्णित है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण बृहस्पति के वंशज माने जाते हैं, जिन्होंने ज्योतिष के सिद्धांतों को समाज में प्रचारित किया।सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय और पंचांग गणना में इनके योगदान के प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं। भारत के अनेक पंचांगों की गणना पद्धति आज भी शाकद्वीपीय परंपरा से प्रभावित है। भविष्य पुराण में बृहस्पति का वचन आज भी गूँजता रहता है -
“यत्र सूर्यस्तिष्ठति, तत्र ब्राह्मणाः प्रकाशयन्ति लोकम्।”
(जहाँ सूर्य स्थित है, वहाँ ब्राह्मण लोक को प्रकाशित करते हैं।) भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35, श्लोक 20-23) के अनुसार -
शाकद्वीपो नाम द्वीपो यत्र दिवाकरः स्वयं।देवपूजनमासीनः सर्वं लोकं प्रकाशयेत्॥ तत्र ब्राह्मण जातीनां बृहस्पतेः सुतेन हि।प्रतिष्ठापितावंशाःस्युःयथाज्योतिषविशारदाः
इसका शाब्दिक अर्थ होता है - शाकद्वीप नामक द्वीप है, जहाँ सूर्यदेव स्वयं देवपूजन में संलग्न होकर सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं। वहाँ ब्राह्मण जातियाँ बृहस्पति के पुत्र द्वारा स्थापित की गईं हैं , जो ज्योतिष में पूर्ण निपुण हैं। यह स्पष्ट प्रमाण है कि शाकद्वीप शक आक्रमण कारियों का प्रदेश नहीं रहा, बल्कि यह सूर्योपासक, ब्राह्मण संस्कृति का केंद्र रहा है, जिसकी स्थापना गुरु बृहस्पति के वंशजों ने की थी।
2. सूर्योपासना का केंद्र की बहुलता:-
ये सूर्य के उपासक हैं, जिन्होंने सूर्यदेव की पूजा पद्धति (जैसे आदित्यहृदय स्तोत्र, गायत्री मंत्र) को लोकप्रिय बनाया और सूर्य मंदिरों की स्थापना की। वायु पुराण (अध्याय 45, श्लोक 12-14)
में आया है -
शाकद्वीपे नृपश्रेष्ठ सूर्यपूजाः प्रकल्पिताः।
अत्राश्विनौ च देवौ च चिकित्सा-विदुषां गुरू॥
भावार्थ यह है - शाकद्वीप में सूर्य की विशेष पूजा की जाती थी और अश्विनी कुमार (वैदिक चिकित्सक देवता) यहाँ के ब्राह्मणों के गुरु माने गए हैं। अर्थात आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र का यहाँ विशेष रूप से विकास हुआ है।
3. महाभारत का भूगोल वर्णन:-
महाभारत, भीष्म पर्व (अध्याय 6, श्लोक 29-33) में शाकद्वीप का वर्णन है कि यह समुद्र से घिरा हुआ एक पवित्र द्वीप है, जहाँ के लोग सूर्योपासक, सत्यवादी और चिकित्सा-कला में प्रवीण हैं।
4. गुरु बृहस्पति और शाकद्वीपीय ब्राह्मण:-
भविष्य पुराण के अनुसार, सूर्यदेव ने अपनी पूजा के लिए बृहस्पति से योग्य ब्राह्मणों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया था। तब बृहस्पति ने अपने पुत्रों और शिष्यों को शाकद्वीप भेजा। यही वंश आगे चलकर शाकद्वीपीय ब्राह्मण कहलाया। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्न लिखित थीं-
1·ज्योतिष में निपुणता (कालगणना, ग्रह-नक्षत्र का ज्ञान)।
2· आयुर्वेद और रसायन विद्या में दक्षता।
3·सूर्योपासना और यज्ञ-विधि में विशेषज्ञता।
5.भौगोलिक प्रमाण और आज का प्रसार :-
पुराणों में वर्णित शाकद्वीप की स्थिति मेघालय और अरब सागर के पार या ईरान-अफगानिस्तान के निकट मानी गई है, लेकिन यह भौगोलिक वर्णन प्रतीक के तौर पर भी हो सकता है। आज के समय में शाकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में पाए जाते हैं, और सूर्य मंदिरों में इनकी परंपरागत पुरोहिताई अब भी जीवित है।
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की गौरवगाथा :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का निम्न लिखित क्षेत्रों में आधिकारिक योगदान रहा है -
1. आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र में योगदान :-
इन्हें आयुर्वेदिक वैद्य माना जाता है, जो समाज में बिना शुल्क के चिकित्सा सेवा प्रदान करते थे और तंत्र-मंत्र के जानकार होते थे। शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी विशेषता रही है - वैद्यक विद्या में पारंगत होना। यह परंपरा सीधे अश्विनी कुमारों से जुड़ी है जिन्हें वैदिक काल के देव वैद्य कहा जाता है। ऋग्वेद (मंडल 1, सूक्त 116, मंत्र 15) के अनुसार -
अश्विना यद्वामवथः पिप्यनं जनं, भूयिष्ठं वाजिनावथः पुरंध्यम्॥
भावार्थ:अश्विनीकुमारों ने अपनी चिकित्सा विद्या से अनेक जनों को पुनः स्वस्थ किया और उन्हें दीर्घायु प्रदान की।
भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35) में स्पष्ट है कि अश्विनीकुमारों ने शाक द्वीपीय ब्राह्मणों को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा दी। यही कारण है कि ऐतिहासिक काल में अनेक सूर्य मंदिरों के पुरोहित वैद्यक कार्य में भी निपुण थे।
2.ज्योतिष - कालगणना में निपुणता:-
प्राचीन काल से ही ये खगोल विज्ञान और ज्योतिष के ज्ञाता रहे हैं, और कई पंचांगों की गणना पद्धति आज भी इनकी परंपरा से प्रभावित है। आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषियों का संबंध इनसे जोड़ा जाता है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्य सिद्धांत, पंचांग गणना और मुहूर्त निर्धारण में विशेष रूप से प्रसिद्ध रहे। सूर्योपासना के कारण इनकी खगोलीय गणना अत्यंत सटीक मानी जाती थी। भविष्य पुराण (प्रथम खंड, 35/22) के अनुसार -
ज्योतिषं च विशेषेण ज्ञातव्यमिति मे मतिः।तस्मादेषां वंशजाः सदा ज्योतिष विशारदाः
भावार्थ: सूर्यदेव का मत है कि इन ब्राह्मणों को विशेष रूप से ज्योतिष का ज्ञान होना चाहिए, इसलिए इनके वंशज सदैव ज्योतिष में पारंगत रहे।
देव-औरंगाबाद(बिहार) सूर्य मंदिर के महंत पंडित आदित्यनारायण शाकद्वीपी द्वारा पंचांग निर्माण हुआ है । मोढेरा (गुजरात) सूर्य मंदिर में शाकद्वीपीय पुरोहितों की खगोलीय गणना, जिससे संक्रांति और विषुव के समय मंदिर में सूर्य की किरणें मूर्ति पर पड़ती थीं।
3. सूर्योपासना और धार्मिक नेतृत्व:- शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जीवन सूर्य आराधना के इर्द-गिर्द रहा है। इनकी पूजा-पद्धति में अर्घ्यदान, आदित्य हृदय स्तोत्र, सप्ताश्वरथ पूजा विशेष स्थान रखते हैं। स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, अध्याय 19, श्लोक 8-9) के अनुसार -
सूर्यः सर्वेषु लोकेषु दाता पुष्टिप्रदः प्रभुः।
तस्मात्सूर्यं समर्च्यन्ति ब्राह्मणाःशाकद्वीपजाः
भावार्थ: सूर्य समस्त लोकों में पुष्टिकारक और प्रभु हैं, अतः शाकद्वीपीय ब्राह्मण उन्हें विशेष रूप से पूजते हैं।
सूर्योपासना के प्रमुख केंद्र अधोलिखित हैं। वैसे तो पूरे भारत में सूर्य मंदिर बिखरे हुए हैं परंतु कुछ खास अधोलिखित हैं -
1· देव सूर्य मंदिर (बिहार)।
3· कोणार्क सूर्य मंदिर (ओडिशा)।
3· मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात)।
4· उज्जैन का ऊंकारेश्वर क्षेत्र।
इन सभी में प्राचीन काल से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की पुरोहिताई के प्रमाण हैं।
4. शिक्षा और वेदाध्ययन में योगदान:-
शाकद्वीपीय ब्राह्मण न केवल ज्योतिषी और वैद्य थे, बल्कि वेदवेत्ता भी थे।गुरुकुल प्रणाली में इन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, और आयुर्वेद संहिताओं का प्रचार-प्रसार किया। भविष्य पुराण ( प्रथम खंड, 35/30) के अनुसार -
वेदविद्या परं ज्नानं यैरालम्ब्य स्वकर्मसु।
ते ब्राह्मणाःसदा लोके पूज्यन्ते देववत्सदा।
भावार्थ: जो ब्राह्मण वेदविद्या के परम ज्ञान को धारण कर अपने कर्म करते हैं, वे सदैव लोक में देववत पूजनीय होते हैं।
5. सामाजिक एकता और नेतृत्व,:-
इतिहास बताता है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ा है।
1·विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश, संतानोत्पत्ति आदि में शुभ मुहूर्त निर्धारण किया जाना।2·कृषि और वर्षा के पूर्वानुमान हेतु पंचांग और ग्रह-नक्षत्र विश्लेषण किया जाना। 3· रोग-निवारण के लिए औषधि और यज्ञ का संयोजन हो।
4· चिकित्सा, ज्योतिष, सूर्योपासना और शिक्षा में अनुपम योगदान हुआ है।
5· पुराणों के प्रमाण से सिद्ध कि इनकी विशेषज्ञता ईश्वरीय आदेश का परिणाम थी।
6· सामाजिक एकता और लोककल्याण में इनकी भूमिका सर्वमान्य रही।
शाकदीपी पर हमले, चुनौतियाँ और भविष्य की दिशाएं:-
1.हमलों का कारण ऐतिहासिक विश्लेषण
(क) श्रेष्ठता से उपजी ईर्ष्या -
भविष्य पुराण और वायु पुराण दोनों स्पष्ट करते हैं कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण ज्योतिष, आयुर्वेद और सूर्योपासना में अतुलनीय थे।
जब कोई समाज-वर्ग किसी क्षेत्र में निरंतर श्रेष्ठता बनाए रखता है, तो अन्य प्रतिस्पर्धी वर्गों में हीनता-बोध और ईर्ष्या उत्पन्न होती है। वैदिक काल में हमारी पंचांग गणना और चिकित्सा विद्या को अन्य ब्राह्मण वर्ग भी मानते थे।परंतु कालांतर में, जब इन क्षेत्रों में आर्थिक लाभ और प्रतिष्ठा बढ़ी, तो कुछ ने हमें प्रतिस्पर्धी समझा।
(ख)धार्मिक केंद्रों पर नियंत्रण कीकोशिश- सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास थी, कई बार दूसरे वर्गों ने इन स्थानों पर अधिकार करने के लिए हमारी प्रतिष्ठा को गिराने के प्रयास किए हैं। उदाहरण स्वरूप मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात) में 18वीं शताब्दी में पुरोहिताई को लेकर विवाद हुआ था।
(ग) राजनीतिक परिस्थितियाँ-
मुगल और औपनिवेशिक काल में हमारी परंपराएँ बाधित हुईं। सूर्य मंदिरों पर कर और प्रतिबंध। आयुर्वेद और ज्योतिष को “अंधविश्वास” कहकर अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली में हाशिये पर डालना।
2. वर्तमान चुनौतियाँ :-
1. पहचान का संकट – युवाओं में अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी का अभाव है।
2. संगठनहीनता – विभिन्न राज्यों में बिखरे होने से एकजुट आवाज़ का अभाव है।
3. आधुनिक प्रतिस्पर्धा – आयुर्वेद और ज्योतिष के क्षेत्र में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, जिससे परंपरागत ब्राह्मण वर्ग पिछड़ रहा है।
4. भ्रामक प्रचार – सोशल मीडिया पर “शाकद्वीपी = शक” जैसी गलत धारणाओं का प्रसार हो रहा है।
3. पुनरुत्थान की रणनीति:-
(क) इतिहास का प्रलेखन और प्रकाशन-
भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण, महाभारत आदि के संदर्भों को पुस्तक और डिजिटल रूप में प्रकाशित करना।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में शोधपरक व्याख्यान आयोजित करना।
(ख) सांस्कृतिक पुनर्जागरण-
सूर्योपासना पर्व (जैसे छठ महापर्व) में शाकद्वीपीय परंपरा की विशेष प्रस्तुति।
आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर और ज्योतिष परामर्श केंद्र स्थापित करना।
(ग) संगठन और नेटवर्किंग-
अखिल भारतीय शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासंघ जैसे मंच को मजबूत करना।
युवाओं को इतिहास, संस्कृति और आधुनिक शिक्षा-दोनों में प्रशिक्षित करना।
(घ) भ्रम-निवारण अभियान चलाना।
सोशल मीडिया और लेखों के माध्यम से “शाकद्वीपी ≠ शक” का तथ्य-आधारित प्रचार किया जाय ।डॉक्यूमेंट्री और यूट्यूब चैनल के जरिए हमारी विरासत को जन-जन तक पहुँचाया जाए ।
4. भविष्य की दिशा :-
भविष्य पुराण का यह शाश्वत संदेश है -
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, ऐसा सत्य न बोलो जो अप्रिय हो, और प्रिय बात झूठ न हो- यही सनातन धर्म है। हमारा भविष्य इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। सत्य का प्रचार (शाकद्वीपीय इतिहास के वास्तविक तथ्य) हो। प्रियता का संवर्धन हो। अन्य वर्गों से संवाद और सहयोग पर आधारित हो। संस्कृति का संरक्षण (आयुर्वेद, ज्योतिष, सूर्योपासना का पुनर्जागरण) किया जाए।
उपसंहार :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मण भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिन्होंने सूर्य, ज्योतिष और आयुर्वेद के क्षेत्र में गहरा योगदान दिया है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण केवल एक जाति नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा का जीवित प्रतीक हैं। हम पर हमले इसीलिए हुए क्योंकि हमने ज्ञान, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलकर समाज में एक ऊँचा स्थान बनाया है । आज आवश्यकता है कि हम फिर से संगठित हों, अपनी जड़ों को पहचानें और आधुनिक साधनों के माध्यम से अपने गौरव को पुनः स्थापित करें। जैसे सूर्य को कोई बादल सदा ढक नहीं सकता, वैसे ही सत्य और संस्कृति की ज्योति को कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह काल और समय के हर थपेड़ों को सहते सहते अपनी अस्मिता बनाए रखने में सक्षम रहेगा।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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