Monday, April 4, 2022

भू उपवन का बन प्रसून डा. राधे श्याम द्विवेदी



खिला प्रसून इक आँगन में,मन हृदय कमल सा खिल उठता ।
दिल के प्यारे वन उपवन में,तन मन प्रमुदित हो झूम उठता।।

मन भौरा झूमें इधर उधर, आँगन में भटके इतर उतर।
बिखरे खुशबू जगह जगह, सराबोर करता हर प्रहर।।

हम माली हैं इस बगिया के अपनी कोई चिंता नहीं।
रूखे सूखे लूले लंगड़े हमें अपनी कोई परवाह नहीं।।

तुम प्रसून जिस बगिया के वह मुरझाए कभी नहीं।
बाग से बढ़ फैले खुशबू प्रमुदित करते सब जगही।।

हंसते और खेलते रहें जन लेकर खुशबू का गंध सभी।
दुनिया सारी गम गम गमके मिलेगा इससे हमें खुशी।।

फैलाकर अपनी सुगंध को महकाता है तन मन को।
रंग-बिरंगी दुनिया में अपनी, सजाता मेरे उपवन को।

रंग बिरंगे प्यारे दीखते हैं हमको भी प्यारे लगते हैं।
कितने कोमल कितने नाजूक अपनी ओर खींचते हैं।

खुशबू दूर दूर तक फैलाते सबको अपने पास बुलाते।
भू उपवन का बन प्रसून हम सभी खुशी से सजवाते।।







Friday, April 1, 2022

रामानंद सम्प्रदाय में मंत्र साधना और दीक्षा की परंपरा डा. राधे श्याम द्विवेदी

श्री अयोध्या के राम मंत्रार्थ मण्डपम में राम मंत्र के बारे में लिखा है। राम जी ने स्वम यह महामंत्र सीता जी को दिया, सीताजी ने हनुमान को, हनुमान नें ब्रह्मा जी को, ब्रह्मा नें वाशिष्ट, वाशिष्ट नें पराशर को, व्यास, शुकदेव से होती हुए इसमें जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने स्वामी राघवानंद से मंत्र दीक्षा स्वीकार की। राघवानन्द को रामानन्द का गुरु माना गया है। स्वामी राघवानन्द हिन्दी भाषा में भक्तिपरक काव्य रचना किया करते थे। रामानन्द को रामभक्ति गुरु परंपरा से ही मिली थी। ' भक्तमाल' में नाभादासजी ने गुरु राघवानन्द को ही रामानन्द का गुरु माना है। राघवानन्द की एक हिन्दी रचना सिद्धान्त पंचमात्रा' से ही स्पष्ट हो जाता है कि राघवानन्द जी योग-मार्ग की साधना से परिचित थे और अंत:साधना और अनुभवसिद्ध ज्ञान की महिमा के विश्वासी थे।
रामानन्द सम्प्रदाय :-
किंवदन्ती है कि रामानन्द के गुरु पहले कोई दण्डी संन्यासी थे, बाद में राघवानन्द स्वामी हुए। 'भविष्यपुराण', 'अगस्त्यसंहिता' तथा 'भक्तमाल' के अनुसार राघवानन्द ही रामानन्द के गुरु थे। एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार यह भी माना जाता है कि छुआ-छूत मतभेद के कारण गुरु राघवानन्द ने ही रामानन्द को नया सम्प्रदाय चलाने की अनुमति दी थी। स्वामी रामानंद को मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का महान संत माना जाता है। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाया। वे पहले ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया। उनके बारे में प्रचलित कहावत है कि - द्रविड़ भक्ति उपजौ-लायो रामानंद। यानि उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय स्वामी रामानंद को जाता है। स्वामी जी ने बैरागी सम्प्रदाय की स्थापना की, जिसेे रामानन्दी सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। रामानंद अर्थात रामानंदाचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित और व्यवस्थित करने के अथक प्रयास किए। उन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय को पुनर्गठित किया तथा वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया। रामानंद वैष्णव भक्तिधारा के महान संत हैं। सोचें जिनके शिष्य संत कबीर और रविदास जैसे संत रहे हों तो वे कितने महान रहे होंगे।
             बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने हिंदू जनता और साधुओं पर हर तरह की पाबंदी लगा रखी थी। इन सबसे छुटकारा दिलाने के लिए रामानंद ने बादशाह को योगबल के माध्यम से मजबूर कर दिया। अंतत: बादशाह ने हिंदुओं पर अत्याचार करना बंद कर उन्हें अपने धार्मिक उत्सवों को मनाने तथा हिंदू तरीके से रहने की छूट दे दी।
            रामानंदजी का जन्म माघ माह की सप्तमी संवत 1356 अर्थात ईस्वी सन 1300 को कान्यकुब्ज ब्राह्मण के कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम पुण्य शर्मा तथा माता का नाम सुशीलादेवी था। आठ वर्ष की उम्र में उपनयन संस्कार होने के पश्चात उन्होंने वाराणसी पंच गंगाघाट के स्वामी राघवानंदाचार्यजी से दीक्षा प्राप्त की। तपस्या तथा ज्ञानार्जन के बाद बड़े-बड़े साधु तथा विद्वानों पर उनके ज्ञान का प्रभाव दिखने लगा। इस कारण मुमुक्षु लोग अपनी तृष्णा शांत करने हेतु उनके पास आने लगे।संवत्‌ 1532 अर्थात सन्‌ 1476 में आद्य जगद्‍गुरु रामानंदाचार्यजी ने अपनी देह छोड़ दी। उनके देह त्याग के बाद से वैष्ण्व पंथियों में जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य पद पर 'रामानंदाचार्य' की पदवी को आसीन किया जाने लगा।
             रामानंदी सम्प्रदाय, बैरागियों के चार सम्प्रदायों में अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय को बैरागी सम्प्रदाय, रामावत सम्प्रदाय और श्री सम्प्रदाय भी कहते हैं। इस सम्प्रदाय का सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहलाता है। काशी में स्थित पंचगंगा घाट पर रामानंदी सम्प्रदाय का प्राचीन मठ बताया जाता है।
प्रमुख शिष्य : स्वामी रामानंदाचार्यजी के कुल 12 प्रमुख शिष्य थे: 1. संत अनंतानंद, 2. संत सुखानंद, 3. सुरासुरानंद , 4. नरहरीयानंद, 5. योगानंद, 6. पिपानंद, 7. संत कबीरदास, 8. संत सेजा न्हावी, 9. संत धन्ना, 10. संत रविदास, 11. पद्मावती और 12. संत सुरसरी।
रामानंदाचार्य पूर्ण पुरुषोत्तम राम जी के अवतार-
    "रामानान्दः स्वयम रामः प्रादुर्भूतो महीतले।"
अर्थात रामानंदाचार्य स्वयं श्री पूर्ण पुरुषोत्तम राम जी के अवतार थे ! ब्रह्माण्ड के द्वादश आचार्य रामानंद के शिष्य के रूपा में अवतरित हुए तथा इस संप्रदाय का चतुर्दिक विकास किया राम जी का तारक मंत्र रां रामाय नमः है! इस महामंत्र को मंत्रराज तथा महामंत्र उपधितन प्राप्त हैं ! इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति साकेत लोक प्राप्त करता है ! यह मंत्र श्री राम से प्रारंभ होने वाली गुरु परंपरा से चलता आ रहा है ! श्री राम इसके अद्धिष्ठाता देव हैं ! यह श्री वैष्णव संप्रदाय का मंत्र है जिसके परम आचार्य श्री जगद्गुरु रामनान्दचार्य रहें है !
श्री राम जी के विविध मंत्र
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का यह मंत्र अति गोपनीय है। यह मंत्र स्वयं सिद्ध मंत्र है। इस मंत्र के प्रभाव से भगवान श्री राम की असीम कृपा प्राप्त होती है और जीव को मोक्ष गति मिलती है। श्री राम कई जप मंत्र हैं ,जो इस प्रकार है-
"राम रामेति रमे रामे मनोरम:
सहस्त्र नामांग तातुलंग
श्रीराम नामे वर: नम: ।।"
षडक्षर राम मंत्र-
ऊॅँ रां रामाय नम:।।
यह भी बहुत पावन मंत्र है। इसका प्रतिदिन ग्यारह माला जप करें और एक माला जप करते हुए लाल कमल के पुष्पों से हवन करें। ऐसा करने से धन की प्राप्ति होगी। दूर्वा से हवन करने से शरीर निरोगी रहेगा।
शक्तिदायक राम मंत्र-
ह्रीं रामाय नम:
आत्मज्ञान प्रदायक राम मंत्र-
ऊॅँ रामाय नम:
विद्या प्रदायक राम मंत्र-
श्रीं रामाय नम:
स्वंय सिद्ध सबसे बड़ा मंत्र-
राम नाम ही स्वंय सबसे बड़ा और सिद्ध मंत्र है। जो व्यक्ति रोजाना राम नाम का जप करता है उस पर किसी भी प्रकार का कोई संकट नहीं आता है।
 षडक्षर राम मंत्र-
ऊॅं रां रामाय नम:
इस मंत्र का जप करने से सभी विपदाएं दूर हो जाती हैं। भगवान राम का यह मंत्र काफी प्रभावशाली और शक्तिशाली है। 
ऊॅं रामचंद्राय नम:
जो व्यक्ति इस मंत्र का जप करता है, उस पर भगवान राम की विशेष कृपा रहती है। इस मंत्र का जप करने से घर में सुख- समृद्धि का वास होता है। भगवान राम की पूजा करते समय इस मंत्र की एक माला का जप अवश्य करें।
ॐ रामभद्राय नम:
श्रीराम के इस सिद्ध मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। इस मंत्र का जप करने से सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं और भगवान राम का आर्शावाद प्राप्त होता है।
ॐ जानकी वल्लभाय स्वाहा' 
इस मंत्र का जप करने प्रभु श्री राम और माता सीता का आर्शीवाद प्राप्त होता है। 
दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी' 
इस मंत्र का जप करने से सभी तरह के संकटों से छुटकारा मिल जाता है। जीवन में आ रही किसी भी तरह की परेशानी को दूर करने के लिए इस मंत्र का जप करें।
मंत्र जाप करने की विधि
जो राम मंत्र में आपको बताने जा रहा हूं उनको बीज मंत्र के नाम से जाना जाता है जिनको हम नहा धो के एक जगह आसन लगाकर प्रभु का ध्यान कर कर जाप किया जाता है इनको आप चलते फिरते बोल नहीं सकते हो इनका नियम के अनुसार ही करना चाहिए इन मंत्रों का जाप करने से हमारे कहीं फायदे होते हैं। अगर आप राम मंत्र का जाप करते हो तो लाल रंग का आसन अगर आप लेते हो नीचे बिछाने के लिए तो वह आपको अच्छा रहेगा।जब आप मंत्र जाप करने बैठते हो तो अपने शरीर पर बिना सिले हुए कपड़े पहनना चाहिए मतलब आपको धोती लगाना चाहिए और शरीर पर कुछ अलग प्रकार का वस्त्र धारण कर लेना चाहिए। फिर आप राम जी का ध्यान कर आप इन मंत्रों का जाप कर सकते इनमें से कोई सा भी मंत्र आप ले सकते हैं।
यहां पर आपको अलग-अलग प्रकार के राम मंत्र मिल जाएंगे आप अपने हिसाब से एक राम मंत्र का जाप आप कर सकते हैं या फिर सभी मंत्रों का जाप भी आप कर सकते हैं।
राम जी के चमत्कारी मंत्र।
1- 'राम' नाम का यह महामंत्र जिसे तारक मंत्र भी कहा जाता है, इसका रोज 108 बार जप करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती हैं ।
2- 'रां रामाय नम:' मं‍त्र का जप करने से राज्य, लक्ष्मी पुत्र, आरोग्य की प्राप्ति के साथ वि‍पत्तियों की नाश हो जाता है ।
3- क्लेश दूर करने के लिए इस मंत्र का जप करें- 'ॐ रामचंद्राय नम:' ।
 श्री राम तारक मंत्र साधना
4- कार्यों में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए इसका जप करें- 'ॐ रामभद्राय नम:'।
5- 'ॐ जानकी वल्लभाय स्वाहा' इस मंत्र का जप मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है ।
6- कलयुग में मंत्र जाप करने का सर्वश्रेष्ठ साधन मंत्र -
हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । 
इस मंत्र का जाप करने से सारे कार्य सरल हो जाते हैं
7- विपत्ति-आपत्ति के निवारण हेतु- 'ॐ नमो भगवते रामचंद्राय' मंत्र का जप करे ।
8- 'श्रीराम जय राम, जय-जय राम' यह मंत्र सबसे अधिक असरकारक माना जाता हैं ।
9- श्रीराम गायत्री मंत्र के जप से समस्त संकटों का शमन होने के साथ ऋद्धि-सिद्धि देने वाला है- 'ॐ दशरथाय विद्महे सीता वल्लभाय धीमहि तन्नो श्रीराम: प्रचोदयात् ।'
10- 'ॐ नम: शिवाय', 'ॐ हं हनुमते श्री रामचंद्राय नम:। इस मंत्र का जप करने से एक साथ कई कार्य सिद्ध हो जाते है 
11- 'ॐ रामाय धनुष्पाणये स्वाहा:' मंत्र का जप करने से शत्रु शमन, न्यायालय, मुकदमे आदि की समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है ।
12- रामनवमी के दिन श्रीरामरक्षास्तोत्र, सुंदरकांड, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, इत्यादि का पाठ करने से भी अद्भूत लाभ प्राप्त किया जा सकता है । यह जीवन में दीर्घकालिक समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है ! यह भविष्य में आने बाले बड़े संकटों से निजात दिलाता है ! कहा जाता है कि अगर गृह क्लेश रहता हो तो इन मंत्र का जाप करना चाहिए।






🌹देवी जागरण भंडारा और निःशुल्क चिकित्सा शिविर 🌷

         आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि विक्रम नव संवत्सर और नवरात्रि के द्वितीय दिवस पर रविवार दिनांक
3 अप्रैल 2022 को पूर्वान्ह ग्राम सीतारामपुर, पोखरनी ,नगर बाजार बस्ती के काली मां के स्थान पर मां भागवती का देवी जागरण और भजन का आयोजन किया जा रहा है। 
          डा. सौरभ द्विवेदी,ओर्थोपैडिक् सर्जन, नोवा हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेण्टर ,कैली रोड, बस्ती और डा. तनु मिश्रा रेडियोलॉजिस्ट, ऐपेक्स डाइग्नोस्टिक कैली रोड, बस्ती के सौजन्य से एक चिकित्सा शिविर दिनांक दोपहर 12 बजे से अपरान्ह 4 बजे तक भी आयोजित किया जा रहा है। जिसमे रोगों का परीक्षण निदान और निशुल्क दवा वितरित की जाएगी।              
          शाम को एक प्रीति भोज का आयोजन राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित स्वर्गीय डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' और उनके अनुज प्रख्यात समाज सेवी श्री बशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय के सीतारामपुर पोखरनी स्थित पैतृक आवास पर प्रस्तावित है।
           क्षेत्रीय भगवत्प्रेमी जनता को अवगत किया जाता है कि उक्त दिवस को अपनी सुबिधानुसार अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर इन आयोजनों को सफल बनाने की कृपा करें। 
                         
             

एपेक्स डायग्नोस्टिक बस्ती में 5 डी अल्ट्रासाउंड एवम अन्य सेवायें शुरू

बस्ती। अब 5 डी अल्ट्रासाउंड के साथ कई अन्य सेवाएं बस्ती के एपेक्स डायग्नोस्टिक में खुल गई है। इस सेंटर पर 5D ,4D,3D अल्ट्रासाउंड आदि सभी प्रकार के अल्ट्रासाउंड से परीक्षण किया जाता है। इसके साथ मल्टी स्लाइस एडवांस्ड सी टी स्कैन आदि सभी प्रकार के सी टी स्कैन परीक्षण किए जाते हैं। तरह - तरह के पैथोलॉजी जांच केंद्र पर तथा मरीज के आग्रह पर उसके घर या अस्पताल से भी लेने की सुविधा दे जा रही है। यहां पर इ.सी. जी. और ई. ई. जी. का परीक्षण भी किया जाता है। साथ ही साथ इंटरवेंशन प्रोसीजर से भी रोगों की पहचान कराई जाती है।
एक समय ऐसा था जब हमें गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण की गति विधि वा उसके विकास के बारे में हमें कुछ पता नहीं चल पाता था। अब 5 डी अल्ट्रासाउंड की नई तकनीक विकसित हो गई है। 5 डी अल्ट्रासाउंड तकनीक ने अब बहुत कुछ संभव कर दिया है। आज हम अल्ट्रासाउंड की मदद से भ्रूण की पल- पल की खबर रख सकते हैं। इससे गर्भस्थ शिशु की दिल की धमनियों, रक्त संचार के साथ सभी अंगों को देख सकते हैं। यह गर्भस्थ शिशु की जन्मजात विकृति की जांच और इलाज में ज्यादा कारगर है। अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्भस्थ की हर तरह की बीमारियों का पता करने के के साथ गर्भ में ही शिशु का इलाज किया जा सकता है।             एपेक्स डायग्नोस्टिक का सहयोगी प्रतिष्ठान                           नोवा हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर
गर्भस्थ शिशु में सबसे पहले दिल की धड़कन सुनाई देती है, पांच सप्ताह में दिल विकसित होने लगता है। नौ सप्ताह में यह पूरी तरह बन जाता है। 5 डी अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्भस्थ शिशु के दिल की धमनियों और रक्त के संचार एवम हर अंग को देख व परख सकते हैं। इसी तरह से गर्भस्थ शिशु के दिमाग से जुड़ी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रॉक की आशंका, सिर में पानी भरने का पता चल सकता है। नाभि एवं पेट की सतह में विकार, गुर्दे, हाथ-पैरों की विषमताओं को देखा जा सकता है। 
महिलाओं की भांति कुछ जटिल बीमारियां पुरुषों में ही होती हैं, जैसे पेशाब की थैली में रुकावट, किडनी का स्थान और साइज, दिल में छेद व दिल से संबंधित अन्य बीमारियों आदि का पता लगाया जा सकता है। कुछ बीमारी गर्भस्थ शिशु के सेक्स ऑर्गन को देखने के बाद भी पता चल जाता है। अब अल्ट्रासाउंड से महिला व पुरूष बांझपन का पता लगने के साथ इलाज की दिशा निश्चित करने में भी सहायता मिलती है। 
                             डा.तनु मिश्रा
"डा.तनु मिश्रा M D रेडियोलॉजी आर. एम. एल. संस्थान लखनऊ,से पास आउट हैं। वह बस्ती की प्रथम महिला M.D.एवम मेधावी युवा रेडियोलॉजिस्ट हैं। उन्होंने RIMS सैफई से गोल्ड मेडल के साथ MBBS पास किया था। वह एम. बी.बी. एस. और एम. डी.परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक लाकर महामहिम राज्यपाल महोदय उत्तर प्रदेश द्वारा गोल्ड मेडल अर्जित कर चुकी हैं। वह अपने रेडियो डाइग्नेसिस परीक्षण में बहुत छोटी से छोटी और जटिल बीमारियों के निदान में अपना परामर्श प्रदान करती हैं। डा. तनु मिश्रा के द्वारा बस्ती के प्रथम 5 डी अल्ट्रासाउंड सेंटर एपेक्स डायग्नोस्टिक कैली रोड पर बस्ती मे अपनी सेवाएं दे रही हैं। सभी जांचे खुद डा.तनु मिश्रा M. D. रेडियोलॉजी द्वारा अपनेे  सहयोगियों  के साथ मिलकर कर रही हैं। 
अन्य सुविधायें :-
(1) 5D ,4D,3D अल्ट्रासाउंड (सभी प्रकार के अल्ट्रासाउंड )
 (2) मल्टी स्लाइस एडवांस्ड सी टी स्कैन (सभी प्रकार के सी टी    स्कैन) (3) पैथोलॉजी ( 4) इसीजी , ईईजी (5) इंटरवेंशन प्रोसीजर आदि।      





जन जन की आराध्य देवी महाकाली डा. राधे श्याम द्विवेदी

' आद्या शक्ति काली' ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति से पूर्व घोर अंधकार से उत्पन्न होने वाली महाशक्ति हैं या यूं कहे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करने वाली शक्ति, 'आद्या या आदि शक्ति' के नाम से जानी जाती हैं। अंधकार से जन्मा होने के कारण वह 'काली' नाम से विख्यात हैं। देवी पुराण में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण माता महाकाली के अवतार थे और देवी राधा जी स्वंय भगवान शिवशंकर का अवतार थी। धरती से अधर्म और असुरों के नाश के लिए देवताओं और ऋषियों के निवेदन पर द्वापरयुग में महाकाली माता ने श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से जन्म लिया था। भगवान शिवशंकर जी ने वृषभानु की पुत्री श्री राधा जी के रूप में जन्म लिया था।
महाकाली मधु और कैटभ को संहार करने के लिए ब्रह्मा स्तुति से प्रकट हुई:-
जब सम्पूर्ण जगत् जलमग्न था और भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ दो भयंकर राक्षस उत्पन्न हुए। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक राक्षसों को अपने पास आया और भगवान को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करनेवाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करनेवाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी ने कहा- देवि! तुम्हीं इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली हो। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ- ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो-इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबके परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान शंकर को तथा भगवान विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? देवि! ये जो दोनों दुर्धर्ष राक्षस मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान राक्षसों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो। इस प्रकार स्तुति करने पर तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर ब्रह्माजी के समक्ष उपस्थित हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर भगवान जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। उन्होंने दोनों पराक्रमी असुरों को देखा जो लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने का उद्योग कर रहे थे। तब भगवान श्रीहरि ने दोनों के साथ पाँच हजार वर्षो तक केवल बाहुयुद्ध किया। इसके बाद महामाया ने जब दोनों दैत्यों को मोह में डाल दिया तो वे बलोन्मत्त होकर भगवान से ही वर माँगने को कहा। भगवान ने कहा कि यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे हाथों मारे जाओ। राक्षसों ने कहा जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो, वहीं हमारा वध करो। तब भगवान ने तथास्तु कहकर दोनों राक्षसों के मस्तकों को अपनी जाँघ पर रख लिया तथा चक्र से काट डाला। इस प्रकार देवी महामाया (महाकाली) ब्रह्माजी की स्तुति करने पर प्रकट हुई। कमलजन्मा ब्रह्माजी द्वारा स्तवित महाकाली अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। त्रिनेत्रा भगवती के समस्त अंग दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं।
रक्तबीज संहार के लिए महाकाल शिव की पत्नी और शिव का स्वरूप ही महाकाली
महाकाली विनाश और प्रलय की पूजनीय देवी हैं। महाकाली सार्वभौमिक शक्ति, समय, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म और मुक्ति की देवी हैं। वह काल (समय) का भक्षण करती है और फिर अपनी काली निराकारता को फिर से शुरू कर देती है। वह महाकाल की पत्नी भी हैं, महाकाली भगवान शिव का ही एक रूप है। संस्कृत में महाकाली महाकाल का नारीकृत रूप है, पार्वती और उनके सभी रूप महाकाली के विभिन्न रूप हैं। 
महाकाली की उत्पत्ति 
रक्तबीज नाम का एक राक्षश था ,उसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था, के उसे स्त्री के आलावा और कोई मार नहीं सकता था।
उसे यह भी वरदान था के उसके खून की एक बूँद ज़मीं पर गिरे तो एक और रक्तबीज राक्षश पैदा हो जाये। उसने देवताओ और ब्राह्मणो पर अत्याचार करके तीनो लोको में कोहराम मचा रखा था। देवता इस वरदान के कारण रक्तबीज को मारने में असमर्थ थे। युद्ध के मैदान में, जब देवता उसे मारते हैं, तो उसके खून की हर बूंद जो जमीन को छूती है, खुद को एक नए और अधिक शक्तिशाली रक्त बीज में बदल देती है, और पूरे युद्ध के मैदान को लाखों रक्त बीज के साथ से युद्ध करना पड़ता। निराशा में देवताओं ने मदद के लिए भगवान शिव का रुख किया। लेकिन जैसे ही भगवान शिव उस समय गहरे ध्यान में थे, देवताओं ने मदद के लिए उनकी पत्नी पारवती की ओर रुख किया। देवी ने तुरंत काली के रूप में इस खूंखार दानव से युद्ध करने के लिए निकल पड़े।
            रक्तबीज का वध करने के बाद महाकाली माता का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनका अति विक्राल स्वरुप के सामने आने से सब लोग डरने लगे,और उनके सामने जो भी आता उनका विनाश कर देती,उनको स्वयं ही नहीं पता था के वह क्या कर रही है। देवताओ की चिंता बढ़ गई के महाकाली माँ का गुस्सा कैसे शांत करे। तब देवता महादेव के पास गए और उनको विनंती की के माता को शांत करने का कोई मार्ग बताये। तब स्वयं भगवन शिव ने अनेक उपायों किये पर माता शांत न हो पाई। आखिर शिव जी ने खुद को माता के पैरो के बिच गिरा दिया और जैसे ही माता को शिवजी का स्पर्श हुआ। माता शांत हो गई, और महाकाली से पारवती बन गई। फिर सारे देवतागण जय जयकार करने लगे।
काली मां का हाथी के स्वरूप में पूजा का प्रचलन
हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हाथियों का जन्म चार दांतों वाले ऐरावत नाम के सफेद हाथी से माना जाता है। मतलब यह कि जैसे मनुष्‍यों का पूर्वज बाबा आदम या स्वयंभुव मनु है उसी तरह हाथियों का पूर्वज ऐरावत है। ऐरावत की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई थी और इसे इंद्र ने अपने पास रख लिया था। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को 'ऐरावत' नाम दिया गया है। इसीलिए इसका 'इंद्रहस्ति' अथवा 'इंद्रकुंजर' नाम भी पड़ा। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन में हाथियों में ऐरावत हूं।
इस पशु का संबंध विघ्नहर्ता गणपति जी से है। गणेश जी का मुख हाथी का होने के कारण उनके गजतुंड, गजानन आदि नाम हैं। इसलिए भी हाथी हिन्दू धर्म में सबसे पूज्जनीय पशु माना जाता है। हिन्दू धर्म में अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन गजपूजा व्रत रखा जाता है। सुख-समृद्धि की इच्छा से हाथी की पूजा करते हैं। हाथी को पूजना अर्थात गणेशजी को पूजना माना जाता है। हाथी शुभ शकुन वाला और लक्ष्मी दाता माना गया है।
           श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हाथी द्वारा विष्णु स्तुति का वर्णन मिलता है। कहते हैं कि क्षीरसागर में त्रिकुट पर्वत के घने जंगल में बहुत से हाथियों के साथ ही हाथियों का मुखिया गजेंद्र नामक हाथी भी रहता था। गजेन्द्र मोक्ष कथा में इसका वर्ण मिलेगा। गजेन्द्र नामक हाथी को एक नदी के किनारे एक मगरमच्छ ने उसका पैर अपने जबड़ों में पकड़ लिया था जो उसके जबड़े से छूटने के लिए विष्णु की स्तुति की। श्री हरि विष्णु ने गजेन्द्र को मगर के ग्राह से छुड़ाया था। 
                 पाद्म कल्प में देवराज इंद्र की एक भूल की वजह से गणेशजी को गज का सिर लगाना पड़ा। एक समय देवराज इंद्र पुष्प भद्रा नदी के तट पर टहल रहे थे। उस निर्जन वन में कोई जीव जंतु नहीं था। संयोगवश रंभा नामकी अप्सरा उस समय वन में आराम कर रही थी। देवराज इंद्र ने जब रंभा को देखा तो उनके मन में काम भाव जागृत हो गया। दोनों एक-दूसरे को आकर्षित होकर देख रहे थे। संयोगवश उस वन में दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ बैकुंठ से होकर लौट रहे थे। देवराज इंद्र ने जैसे ही दुर्वासा को देखा तो सकुचा गए और तुरंत ही प्रणाम किया। दुर्वासा ने आशीर्वाद स्वरूप भगवान विष्णु द्वारा प्राप्त पारिजात पुष्प देवराज इंद्र को दे दिया और कहा यह पुष्प जिसके मस्तक पर होगा वह तेजस्वी, परम बुद्धिमान होगा। देवी लक्ष्मी की उस पर कृपा रहेगी और वह भगवान विष्णु के समान ही पूजित होगा।
           कामासक्त देवराज ने पुष्प का अनादर किया और उसे हाथी के सिर पर रख दिया। ऐसा करते ही देवराज इंद्र का तेज समाप्त हो गया। अप्सरा रंभा भी इंद्र को वियोग में छोड़कर चली गई। हाथी मतवाला होकर इंद्र को छोड़कर चला गया। वन में एक हथिनी उस हाथी पर मोहित हो गई और उसके साथ रहने लगी। हाथी अपने मद में वन के प्राणियों को पीड़ित करने लगा। तभी देवराज इंद्र ने एरावत को श्रीहीन होने का श्राप दे दिया। वह उत्तर दिशा में भटक रहा था। इस हाथी के मद को कम करने और शाप से उद्धार के लिए ही ईश्वरीय लीला हुई ।
         मां पार्वती के पुत्र गणेश जी को शिव के त्रिशूल ने अचेतन कर दिया था। पार्वती काली मां का रूप धारण कर जगत में उत्पात मचा रखी थी। सभी देव और मानव परेशान हो रहे थे।भगवान शिव की प्रेरणा और गणेश जी की इच्छा से एरावत का शिर विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से काटकर उसे श्राप मुक्त किया और शिव जी ने शल्य चिकित्सा से वही शिर गणेश के धड़ पर जोड़ कर उन्हें पुनः जीवन दान प्रदान किया।
             उस हाथी का सिर काटकर गणेशजी के धड़ से लगाया गया और पारिजात पुष्‍प को प्राप्त वरदान गणेशजी को मिला। मां काली अपने पुत्र को जीवन दान देने वाले हाथी पर प्रसन्न होकर अपना प्रतीक हाथी को स्वीकार कर लिया। तभी से संसार में मां काली के स्वरूप में हाथी को मान कर पूजा आराधना किया जाने लगा। तब से हर गांव कस्बे में गांव कस्बे के पूरब दिशा में हाथी स्वरूप वाली काली मां की प्रतिमा स्थापित होने लगा। कही कही काल को समय मान समय मां की मूर्ति की पूजा का विधान मिलता है। ये गांव कस्बे की रक्षा अपने भक्त क्षेत्रपाल डीवहारे बाबा के सहयोग से करते हैं।



Wednesday, March 30, 2022

राजा हरिश्चंद्र के कमजोर वंशज(राम के पूर्वज 16) डा. राधे श्याम द्विवेदी

राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे जो सत्यव्रत के पुत्र थे। ये अपनी सत्यनिष्ठा के लिए अद्वितीय हैं और इसके लिए इन्हें उनकी रानी तारा (शैव्या) अनेक कष्ट सहने पड़े। रोहिताश्व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र थे। इनके एक प्रेमिका रही जिसके लिए उन्होंने अयोध्या से बहुत दूर रोहतास में एक नगर बसाया था।अपने जीवनकाल में रोहिताश्व ने एक आदिवासी कन्या से विवाह कर लिया था। फिर इसी गढ़ में उनके वंशजों ने सदियों तक शासन किया। पर मुस्लिम आक्रमणों के बाद उनके हाथ से यह गढ़ निकल गया। आदिवासी कन्या से हुए रोहिताश्व के वंशज आज भी जीवित हैं पर अब इस गढ़ पर उनका राज नहीं है। वे अब जंगलों की खाक छान रहे हैं।
         रोहित (रोहिताश्व) का पुत्र हरित था।हरित से चम्प हुआ। उसी ने चम्पापुरी बसायी। चम्प से सुदेव और उसका पुत्र विजय हुआ। विजय का पुत्र भरूरक था। भरूरुक का पुत्र वृक था। वृक का पुत्र बाहुक था।ये सब निहायत कमजोर शासक थे। इनकी सूची तो मिलती है पर ज्यादा गतिविधियां नही मिलती है।
          शत्रुओं ने बाहुक से राज्य छीन लिया, तब वह अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वन में जाने पर बुढ़ापे के कारण जब बाहुक की मृत्यु हो गयी, तब उसकी पत्नी भी उसके साथ सती होने को उद्यत हुई। परन्तु महर्षि और्व को यह मालूम था कि इसे गर्भ है। इसलिये उन्होंने उसे सती होने से रोक दिया। जब उसकी सौतों को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उसे भोजन के साथ गर (विष) दे दिया। परन्तु गर्भ पर उस विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विष को लिये हुए ही एक बालक का जन्म हुआ, जो गर के साथ पैदा होने के कारण ‘सगर’ कहलाया। सगर बड़े यशस्वी राजा हुए।

एपेक्स डायग्नोस्टिक कैली रोड बस्ती

      बस्ती की स्वास्थ्य देखभाल में भाग लेने वाले एक चिकित्सा प्रतिष्ठान के रूप में, एपेक्स डायग्नोस्टिक्स निदान के क्षेत्र में अपने निवासियों को संबंधित सहायता प्रदान करता है।
कोई भी प्रमुख उपचार दिए जाने से पहले, एक विश्वसनीय निदान की आवश्यकता होती है। एपेक्स डायग्नोस्टिक्स आपके शरीर की स्थिति को सत्यापित करने में आपकी मदद कर सकता है चाहे वह नियमित निरीक्षण के लिए हो या आपकी बीमारी के महत्वपूर्ण विवरण का पता लगाने के लिए। फिर, लक्षणों और समग्र इतिहास के आधार पर, विशेष नैदानिक ​​प्रक्रियाएं आवश्यक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, शरीर की आंतरिक प्रक्रियाओं के बेहतर विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला निदान की आवश्यकता होती है जो अन्यथा आंखों से छिपी होती हैं। मोबाइल नंबर +919005199098पर कॉल करके आप अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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एपेक्स डायग्नोस्टिक कैली रोड बस्ती। मोबाइल नंबर +919005199098
जामडीह,  कैली रोड बस्ती।
डा.सौरभ द्विवेदी ऑर्थोपेडिक सर्जन :एक परिचय :-
डा. सौरभ द्विवेदी ऑर्थोपेडिक ट्रामा और ज्वाइंट रिप्लेसमेंट के सर्जन हैं। उन्होने एम .एस.ऑर्थोपेडिक एस.एन. मेडिकल कॉलेज आगरा से किया है। वह वर्तमान में ओपेक कैली हॉस्पिटल ए.एस.एम.सी. बस्ती में ऑर्थोपेडिक के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 
डा.सौरभ द्विवेदी बस्ती मंडल के सबसे युवा ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं जो जटिल से जटिल केसों का निदान करके अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। नोवा हॉस्पिटल और ट्रामा सेंटर में कम से कम पैसे में उत्तम से उत्तम सेवाओं के लिए डा. सौरभ द्विवेदी जाने पहचाने जाते हैं।
डा.सौरभ द्विवेदी ऑर्थोपेडिक सर्जन के विचार :
"डा.तनु मिश्रा M D रेडियोलॉजी आरएमएल अस्पताल लखनऊ,जो हमारी धर्म पत्नी और बस्ती की प्रथम महिला M.D. रेडियोलॉजी हैं के द्वारा बस्ती का प्रथम 5D अल्ट्रासाउंड सेंटर Apex Diagnostics/ एपेक्स डायग्नोस्टिक कैली रोड बस्ती मे खुला है। डा. तनु मिश्रा एक मेधावी युवा रेडियोलॉजिस्ट है जो एमबीबीएस और एमडी परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक लाकर महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश द्वारा गोल्ड मेडल अर्जित कर चुकी हैं। वह अपने रेडियो डाइग्नेसिस परीक्षण में बहुत छोटी और जटिल बिमारियों के निदान में अपना परामर्श प्रदान करती हैं।
अन्य सुविधा -
1) 5D ,4D,3D अल्ट्रासाउंड (सभी प्रकार के अल्ट्रासाउंड )
 2) मल्टी स्लाइस एडवांस्ड सीटी स्कैन (सभी प्रकार के सीटी स्कैन)
3) पैथोलॉजी
4)ECG,EEG/ इसीजी ईईजी
5) Intervention Procedure /इंटरवेंशन प्रोसीजर
नोट :-
सभी जांचे खुद डा.तनु मिश्रा M D रेडियोलॉजी द्वारा अपनेे सहयोगियों के साथ मिलकर करेंगी। 
क्या है ये 5डी अल्ट्रासाउंड-
इससे गर्भस्थ शिशु की दिल की धमनियों, रक्त संचार के साथ सभी अंगों को देख सकते हैं। यह गर्भस्थ शिशु की जन्मजात विकृति की जांच और इलाज में कारगर है। 5डी अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्भस्थ शिशु के दिल की धमनियों और रक्त के संचार को देख सकते हैं। इसी तरह से गर्भस्थ शिशु के दिमाग से जुड़ी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रॉक की आशंका, सिर में पानी भरने का पता चल सकता है। नाभि एवं पेट की सतह में विकार, गुर्दे, हाथ-पैरों की विषमताओं को देखा जा सकता है!