Sunday, January 23, 2022

बारह वसिष्टों की वसिष्ठ - व्यास परंपरा (भगवत प्रसंग -3)

 बारह वसिष्ठों की वसिष्ठ - व्यास परंपरा (भगवत प्रसंग -3)
आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी
           ब्रह्मा जी सृष्टि के सूत्रधार रहे। उन्होने चारों वेदों- वेदांग एवम छब्बीस ऋषियों मुनियों की उत्पत्ति की है। इनके नाम हैं -- नारद, क्रतु, अरुण,रुचि,रुद्र, सनक, सनातन, सनंदन, सनतकुमार, मनु, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, भृगु, अंगिरा, ऋतु, वसिष्ठ, वोढू या वोध्य,कपिल, आसुरी, कवि, शंकु, पंचशिख, प्राचेतस और दक्ष प्रजापति इत्यादि। इनमें वसिष्ठ का स्थान भी कम महत्व पूर्ण नहीं है।
          महर्षि -मुनि वसिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों में विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। वह परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि कहे जाते हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है। महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के 7 वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर 10 वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है। वशिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि, ब्रह्मा के मानस पुत्र और सप्तऋषियों में से एक है। 
        वसिष्ठ के बारे में जितनी तरह की कथाएं और विवरण हमें मिलती है वे सभी एक वसिष्ठ के लिए नहीं है, अलग-अलग वसिष्ठों के लिए हैं। यानी वसिष्ठ वंश में पैदा हुए अलग-अलग मुनि-वसिष्ठों के हैं। वसिष्ठ एक जातिवाची नाम है आजकल भी जातिवादी नाम पीढ़ी दर पीढ़ी व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहकर चलता रहता है। वैसी ही परम्परा पुराने काल से चलती आ रही है। पौराणिक उल्लेख -वेद, इतिहास व पुराणों में वसिष्ठ के अनगिनत कार्यों का उल्लेख किया गया है।
वशिष्ठ शब्द का अर्थ क्या है
वशिष्ठ, यह नाम वसु, शब्द से आया है, जिसका अर्थ है कुबेर, अर्थात धन, तथा समृद्धि। चूंकि ऋषि वशिष्ठ के पास कामधेनु नामक एक चमत्कारी तथा दैवीय शक्तियों से युक्त गाय थी, जो कि उनके नाम के अर्थ को साकार करती थी। इसके अलावा वशिष्ठ का अर्थ यह भी बताया गया है कि ऐसा व्यक्ति जो सभी वस्तुओं पर नियंत्रण रखता है। वसिष्ठ का अर्थ है- सबसे प्रकाशवान, सबसे उत्कृष्ट, सबमें श्रेष्ठ और महिमावंत। वसिष्ठ मूलतः ‘वस’ शब्द से बना है जिसका अर्थ – रहना, निवास, प्रवास, वासी आदि होता है । इसी आधार पर ‘वस’ शब्द से वास का अर्थ निकलता है। वरिष्ठ, गरिष्ठ, ज्येष्ठ, कनिष्ठ आदि में जिस ष्ठ का प्रयोग है, उसका अर्थ – सबसे ज्यादा यानी सर्वाधिक बड़ा होता है। ‘वसिष्ठ’ का अर्थ सर्वाधिक पुराना निवासी होता है। महर्षि वशिष्ठ का तपस्या स्थल को वशिष्ठ कहा गया है। वशिष्ठ नाम से कई ऋषि हो गए हैं। वशिष्ठ ऋषि की संपूर्ण जानकारी वायु, ब्रह्मांड एवं लिंग पुराण में मिलती है। वशिष्ठ कुल ऋषियों एवं गोत्रकारों की नामावली मत्स्य पुराण में दर्ज है। सब मिलाकर पुराणों में बारह वशिष्ठों का उल्लेख मिलता है।वेदव्यास की तरह वशिष्ठ भी एक परंपरागत पद हुआ करता था।
प्रथम जन्म में आद्य वसिष्ठ:-
हिमालय में ही रहते थे और जिनके नाम का ठीक-ठीक पता नहीं था, को खतरा महसूस हुआ कि इतना शक्तिशाली और ऐश्वर्य सम्पन्न राजा उन्मत्त हो सकता है।राजदंड कहीं उन्मत्त और आक्रामक न हो जाए, इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है। ऐसे राजदंड पर नियंत्रण करने के लिए कोई बड़ा राजदंड काम नहीं आ सकता था, बल्कि ज्ञान का, त्याग का,अपरिग्रह का, वैराग्य का, अंहकार-हीनता का ब्रह्मदण्ड ही राजदंड को नियमित और नियंत्रित कर सकता था। वसिष्ठ के अलावा यह काम और किसी के वश का नहीं था। यह वसिष्ठ ने अपने आचरण से ही आगे चलकर सिद्ध कर दिया। एक बड़े विचार या आदर्श की स्थापना जितनी मुश्किल होती है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल उस पर आचरण होता है। अगर वसिष्ठों का खूब सम्मान इस देश की परम्परा में है तो जाहिर है कि इस आदर्श का पालन करने में वसिष्ठों ने अनेक कष्ट भी सहे होंगे। कुछ कष्ट हमारे इतिहास में भी दर्ज हैं। प्रथम जन्म में वे ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे गये हैं। जो ब्रहमा के सांस (प्राण) से उत्पन्न हुए हैं। वशिष्ठ ब्रह्मा के नाम से ही कुल परंपरा का प्रारंभ हुआ तो आगे चलकर उनके कुल के अन्य वेदज्ञों लोगों ने भी अपना नाम वशिष्ठ रखकर उनके कुल की प्रतिष्ठा को बरकरार रखा। पहले वशिष्ठ की मुख्यत: दो पत्नियां थीं। पहली अरुंधती और दूसरी उर्जा। उर्जा प्रजापति दक्ष की तो अरुंधती कर्दम ऋषि की कन्या थी। प्रारंभिक वशिष्ठ शंकर भगवान के साढू तथा सतीदेवी के बहनोई थे। वशिष्ठ ने ही श्राद्धदेव मनु (वैवस्तवत मनु) को परामर्श देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बटवाकर दिलाया था। 
          वशिष्ठ का कामधेनु और सूर्यवंश की पुरोहिताई के कारण ऋषि विश्वामित्र से झगड़ा हुआ था। ब्रह्मा के मानसपुत्रों में जिन्होंने गृहस्थ धर्म को अपनाया उनमे से एक ये भी हैं। अपनी पत्नी अरुंधति के साथ महर्षि वशिष्ठ एक आदर्श, श्रेष्ठ एवं उत्तम गृहस्थ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गऊओं में श्रेष्ठ कामधेनु एवं उनकी पुत्री नंदिनी इन्ही की क्षत्रछाया में सुखपूर्वक रहती हैं। इसी कामधेनु गाय के लिए इनमे और महर्षि विश्वामित्र में विवाद हुआ और विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ के चिर प्रतिद्वंदी बन गए। किन्तु अंततः महर्षि वशिष्ठ की महानता के आगे राजर्षि विश्वामित्र को झुकना पड़ा। 
            प्रथम जन्म के वसिष्ठ की मृत्यु दक्ष के यज्ञ कुण्ड में हुई थी। माना जाने लगा कि वसिष्ठ जैसा महान व्यक्ति सामान्य मनुष्य तो हो नहीं सकता। उसे तो लोकोत्तर होना चाहिए। इसलिए उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र मान लिया गया और उनका विवाह दक्ष नामक प्रजापति की पुत्री ऊर्जा से बताया गया जिससे उन्हें एक पुत्री और सात पुत्र पैदा हुए।आद्य वसिष्ठ, सबसे पुराने वसिष्ठ थे। वे कोशल देश की राजधानी अयोध्या में आकर बसे वे स्मृति परम्परा के मुताबिक हिमालय से वहां आए थे और अयोध्या में आकर रहने से पहले का विवरण चूंकि हमारे ग्रंथों में खास मिलता नहीं, इसलिए उन्हें ब्रह्मा का पुत्र मानने की श्रद्धा से भरी तो कभी ऋग्वेद के मुताबिक ‘वरूण-उर्वशी’ की सन्तान मानने की रोचक कथाएं मिल जाती है। प्रथम वशिष्‍ठ ही पुष्कर में प्रजापति ब्रह्मा के यज्ञ के आचार्य रहे थे। 
दूसरे देवराज वशिष्ठ :-
इक्ष्वाकु ने 100 रात्रि का कठोर तप करके सूर्य देवता की सिद्धि प्राप्त थी की और वशिष्ठ को गुरु बनाकर उनके उपदेश से अपना पृथक राज्य और राजधानी अयोध्यापुरी स्थापित कराई और वे प्राय: वहीं रहने लगे। हिमालय से उतरकर वसिष्ठ जब अयोध्या आए, तब मनु के पुत्र इक्ष्वाकु राज्य कर रहे थे। इक्ष्वाकु ने उन्हें अपना कुलगुरू बनाया । इक्ष्वाकु वंश के पुरोहित महर्षि वशिष्ठ ब्रहमा के हवन कुण्ड से ही उन्होंने दूसरी बार जन्म लिया था। इस बार उनकी पत्नी का नामअक्षमाला था। जो अरुन्धती का पुनर्जन्म था।इस कारण इन्हें अग्निपुत्र भी कहा गया है। इस जन्म में वह इक्ष्वाकु राजा निमि और त्रिशंकु के पुरोहित बताए जाते थे। 
        जब इनके पिता ब्रह्मा जी ने इन्हें मृत्युलोक में जाकर सृष्टि का विस्तार करने तथा सूर्यवंश का पौरोहित्य कर्म करने की आज्ञा दी, तब इन्होंने पौरोहित्य कर्म को अत्यन्त निन्दित मानकर उसे करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। ब्रह्मा जी ने इनसे कहा- ‘इसी वंश में आगे चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अवतार ग्रहण करेंगे और यह पौरोहित्य कर्म ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा।’ फिर इन्होंने इस धराधाम पर मानव-शरीर में आना स्वीकार किया।
          निमि राजा के विवाह के बाद वसिष्ठ ने सूर्य वंश की दूसरी शाखाओं का पुरोहित कर्म छोड़कर केवल इक्ष्वाकु वंश के राजगुरु पुरोहित के रूप में कार्य किया। सामाजिक अव्यवस्था से निजात पाने के लिए ही जन समाज ने मनु को अपना पहला राजा बनाया और मनु ने समाज और शासन के व्यवस्थित संचालन के लिए नियमों की व्यवस्था दी । 
              अयोध्या के ही एक राजा सत्यव्रत त्रिशंकु ने जब अपने मरणशील शरीर के साथ ही स्वर्ग जाने की पागल जिद पकड़ ली और अपने कुलगुरु देवराज वसिष्ठ से वैसा यज्ञ करने को कहा तो वसिष्ठ ने साफ इनकार कर दिया और उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ा। पर जब इसी वसिष्ठ ने एक बार यज्ञ में नरबलि का कर्मकाण्ड करना चाहा तो फिर विश्वामित्र ने उसे रोका और देवराज की काफी थू-थू हुई। इसके बाद जब वसिष्ठों को वापस हिमालय जाने को मजबूर होना पड़ा।
         इस वसिष्ठ ने विश्वामित्र को ब्राह्मण मानने से इनकार कर दिया था। विश्वामित्र से कामधेनु को लेकर उनके युद्ध हुए, उन्होंने विश्वामित्र को ऋषि तो माना पर ब्रह्मर्षि नहीं, सिर्फ राजर्षि माना था और बहुत समय बाद उन्हें ब्रह्मर्षि माना था।
तीसरे अपव वशिष्ठ:-
 कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए वशिष्ठ को अपव वसिष्ठ कहते थे। हैहय राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने उनका आश्रम जला डाला। सहस्रबाहु का वध परशुराम ने किया था।परशुराम ने वशिष्ठ का सहयोग और समर्थन लेकर ही यह लक्ष्य प्राप्त किया था।। इस प्रकार से वशिष्ठ अपव और परशुराम एक ही समय में हुए थे।
चौथे वशिष्ठ अथर्वनिधि 'प्रथम':-
ये तब हुआ करते थे जब अयोध्या में राजा बाहु का राज था. राजा बाहु ही थे, जिन्होंने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से हर जाति को उनके काम पर लगाया था।
पांचवे वशिष्ठ श्रेष्ठभाज :-
ये राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाए। इक्ष्वाकु के कुल में एक कल्माषपाद नाम का एक राजा हुआ। राजा एक दिन शिकार खेलने वन में गया। वापस आते समय वह एक ऐसे रास्ते से लौट रहा था। जिस रास्ते पर से एक समय में केवल एक ही आदमी गुजर सकता था। उसी रास्ते पर मुनि वसिष्ठ के सौ पुत्रों में से सबसे बड़े पुत्र शक्तिमुनि उसे आते दिखाई दिये। राजा ने कहा तुम हट जाओ मेरा रास्ता छोड़ दो तो कल्माषपाद ने कहा आप मेरे लिए मार्ग छोड़े दोनों में विवाद हुआ तो शक्तिमुनि ने इसे राजा का अन्याय समझकर उसे राक्षस बनने का शाप दे दिया। उसने कहा तुमने मुझे अयोग्य शाप दिया है ऐसा कहकर वह शक्तिमुनि को ही खा जाता है। बादमे वसिष्ठ उन्हें अपने याद बल से जीवित कर देते हैं।
छठे वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय)
छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। दिलीप की गो सेवा को कालीदास कवि ने बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है।
सातवें महर्षि वसिष्ठ :-
महर्षि वसिष्ठ ने सूर्यवंश का पौरोहित्य करते हुए अनेक लोक- कल्याणकारी कार्यों को सम्पन्न किया। इन्हीं के उपदेश के बल पर भगीरथ ने प्रयत्न करके गंगा-जैसी लोक कल्याण कारिणी नदी को हम लोगों के लिये सुलभ कराया। दिलीप को नन्दिनी की सेवा की शिक्षा देकर रघु-जैसे पुत्र प्रदान करने वाले तथा महाराज दशरथ की निराशा में आशा का संचार करने वाले महर्षि वसिष्ठ ही थे। इन्हीं की सम्मति से महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया। दशरथ से ऋष्यश्रृंग की देखरेख में पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। जिससे भगवान श्री राम का अवतार हुआ। उन्होंने राम आदि का नामकरण किया, उन्हें शिक्षा-दीक्षा दी। भगवान श्री राम को शिष्य रूप में प्राप्त कर महर्षि वसिष्ठ का पुरोहित-जीवन सफल हो गया। भगवान श्री राम के वन गमन से लौटने के बाद इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ। गुरु वसिष्ठ ने श्री राम के राज्यकार्य में सहयोग के साथ उनसे अनेक यज्ञ करवाये। उनके कहने पर राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए दशरथ का मन बनाया। पर इनका अलग से नाम नहीं मिलता। वसिष्ठ ने दशरथ से कहा कि राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दो, उन्होंने दशरथ की मृत्यु के बाद कोशल राज्य को संभाला।अनेक बार आपत्ति का प्रसंग आने पर तपोबल से उन्होंने राजा प्रजा की रक्षा की। राम को शस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी। वसिष्ठ के कारण ही ‘रामराज्य’ की स्थापना संभव हुई। 
आठवें महाभारत कालीन वशिष्ठ
 प्रथम वशिष्ठ की पत्नीं अरुंधती से उत्पन्न पुत्रों के कुल में ही आगे चलकरआठवें वसिष्ठ महाभारत के काल में प्रसिद्ध ऋषि हुए थे । महाभारत में महर्षि वशिष्ठ के सूत्र कुछ इस तरह जुड़े हैं मानो वे ही धृतराष्ट्र व पाण्डु के आदि-पूर्वज हैं। महाभारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र वशिष्ठ की कथाएं छाई हुई हैं। इन्हें 21 प्रजापतियों में एक बताया गया है और इनका आश्रम बादरीपाचन में है। ये ब्रह्मा से संवाद करते हैं और कुरुवंश के प्रवर्तक राजा कुरु के लिए कुरुक्षेत्र में यज्ञ करते हैं। वसिष्ठ ही द्वापर युग में महाभारत के समय ये महर्षि व्यास को तत्वज्ञान भी देते हैं और पितामह भीष्म के भी गुरु बनते हैं। भीष्म ने वेदों का ज्ञान इन्हीं से पाया था और शरशय्याधारी होने पर भीष्म को घेरकर खड़े ऋषियों में ये भी सम्मिलित थे। अर्जुन के जन्म के समय उपस्थित सात महर्षियों में भी ये एक थे।
नौवें शक्ति मुनि या शक्ति वशिष्ठ :-
महाभारत कालीन वशिष्ठ के पुत्र का नाम शक्ति मुनि या शक्ति
वशिष्ठ था। शक्ति वसिष्ठ के साथ विश्वामित्र का भयानक संघर्ष हुआ, वे शक्ति वसिष्ठ थे। महर्षि वसिष्ठ क्षमा की प्रतिपूर्ति थे। एक बार श्री विश्वामित्र उनके अतिथि हुए। महर्षि वसिष्ठ ने कामधेनु के सहयोग से उनका राजोचित सत्कार किया। कामधेनु की अलौकिक क्षमता को देखकर विश्वामित्र के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस गौ को वसिष्ठ से लेने की इच्छा प्रकट की। कामधेनु वसिष्ठ जी के लिये आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महत्त्वपूर्ण साधन थी, अत: इन्होंने उसे देने में असमर्थता व्यक्त की। विश्वामित्र ने कामधेनु को बलपूर्वक ले जाना चाहा। वसिष्ठ जी के संकेत पर कामधेनु ने अपार सेना की सृष्टि कर दी। विश्वामित्र को अपनी सेना के साथ भाग जाने पर विवश होना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये और उन्हें क्षत्रिय बल को धिक्कार कर ब्राह्मणत्व लाभी के लिये तपस्या हेतु वन जाना पड़ा।विश्वामित्र की अपूर्व तपस्या से सभी लोग चमत्कृत हो गये। सब लोगों ने उन्हें ब्रह्मर्षि मान लिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मर्षि कहे बिना वे ब्रह्मर्षि नहीं कहला सकते थे। वसिष्ठ विश्वामित्रके बीच के संघर्ष की कथाएं सुविदित हैं। वसिष्ठ क्षत्रिय राजा विश्वामित्र को ‘राजर्षि’ कह कर सम्बोधित करते थे। विश्वामित्र की इच्छा थी कि वसिष्ठ उन्हें ‘महर्षि’ कहकर सम्बोधित करें। एक बार रात में छिप कर विश्वामित्र वसिष्ठ को मारने के लिए आये। एकांत में वसिष्ठ और अरुंधती के बीच हो रही बात उन्होंने सुनी। वसिष्ठ कह रहे थे, ‘अहा, ऐसा पूर्णिमा के चन्द्रमासमान निर्मल तप तो कठोर तपस्वी विश्वामित्र के अतिरिक्त भला किस का हो सकता है? उनके जैसा इस समय दूसरा कोई तपस्वी नहीं।’ एकांत में शत्रु की प्रशंसा करने वाले महापुरुष के प्रति द्वेष रखने के कारण विश्वामित्र को पश्चाताप हुआ। शस्त्र हाथ से फेंक कर वे वसिष्ठ के चरणों में गिर पड़े। वसिष्ठ ने विश्वामित्र को हृदय से लगा कर ‘महर्षि’ कहकर उनका स्वागत किया। इस प्रकार दोनों के बीच शत्रुता का अंत हुआ।
 दसवें पराशर वशिष्ठ :-
पराशर एक मन्त्रद्रष्टा ऋषि, शास्त्रवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी एवं स्मृतिकार है। येे महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा और ग्रंथकार भी हैं। पराशर शर-शय्या पर पड़े भीष्म से मिलने गये थे। परीक्षित् के प्रायोपवेश के समय उपस्थित कई ऋषि-मुनियों में वे भी थे। वे छब्बीसवें द्वापर के व्यास थे। जनमेजय के सर्पयज्ञ में उपस्थित थे। 
          कलमाश द्वारा शक्ति और वशिष्ठ मुनि के और पुत्रों के भक्षण के कारण पुत्रों की मृत्यु पर अधीर होकर वसिष्ठ आत्म हत्या के कई प्रयास भी किये थे। उनके पीछे उनकी पुत्रवधू भी चल रही थी। एक बार महषि वसिष्ठ अपने आश्रम लौट रहे थे तो उन्हे लगा कि मानो कोई उनके पीछे वेद पाठ करता चल रहा है। पुत्रवधू के गर्भ में शिशु वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहा था। वसिष्ठ बोले कौन है तो आवाज आई मैं आपकह पुत्र-वधु शक्ति की पत्नी अदृश्यन्ती है। इसे सुनकर उनमें आशा संचार हुआ और वे मृत्यु का इरादा त्यागकर अपने भावी उस उत्ताधिकारी को पालने के लिए पुनः धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करने लगे थे। 
यही बालक आगे चलकर आठवें महाभारत कालीन वशिष्ठ के पौत्र और शक्ति के पुत्र का पराशर ऋषि के रुप में प्रसिद्ध हुए। 
ग्यारहवें वेद व्यास वशिष्ठ:-
एक धीवर कन्या मत्स्यगंधा से पराशर ऋषि का विवाह हुआ था।
समय आने पर एक द्वीप पर सत्यवती गर्भ से वेद वेदांगों में पारंगत वेदव्यास नामक पुत्र एक पुत्र हुआ। जन्म होते ही वह बालक बड़ा हो गया और अपनी माता से बोला, "माता! तू जब कभी भी विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी, मैं उपस्थित हो जाउँगा।" इतना कह कर वे तपस्या करने के लिये द्वैपायन द्वीप चले गये। द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा उनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा। आगे चल कर वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास के नाम से विख्यात हुये, जो वेदव्यास द्वैपायन के नाम से प्रसिद्ध हुए और बाद में महाभारत की रचना किये थे ।
बारहवें मैत्रावरूण वशिष्ठ:-
मैत्रावरूण वसिष्ठ हुए जिनके 97 सूक्त ऋग्वेद में मिलते हैं, जो ऋग्वेद का करीब-करीब दसवां हिस्सा है। इतना विराट बौद्धिक योगदान करने वाले कुल में एक शक्ति वसिष्ठ हुए जिनके पास कामधेनु थी जिसका दुरूपयोग कर अहंकार पालने का मौका उन्होंने कभी भी नहीं दिया। पर घमंडी विश्वामित्रों को ऐसी गाय न मिले, इसके लिए अपने पुत्रों का बलिदान देकर भी एक भयानक संघर्ष उन्होंने विश्वामित्रों के साथ किया था।
कुछ अन्य वसिष्ठ :-
उपरोक्त के अलावा वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी उल्लेख आता है। एक अल्प शाखा भी है, जो जातुकर्ण नाम से जानी जाती है।
वसिष्ठों द्वारा लिखे कुछ प्रमुख ग्रंथ :-
 वशिष्ठ वंश के ऋषियों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थ अभी उपलब्ध हैं। जैसे योगवासिष्ठ रामायण, वसिष्ठ धर्मसूत्र,धनुर्वेद, वशिष्ठ कल्प, वशिष्ठ शिक्षा, वशिष्ठ तंत्र, वशिष्ठ पुराण, वशिष्ठ स्मृति, वशिष्ठ श्राद्ध कल्प, आदि इनमें प्रमुख हैं।वशिष्ठ ने वशिष्ठ संहिता ग्रन्थ की रचना भी की. वशिष्ठ संहिता में ज्योतिष विद्या और वैदिक प्रणाली का वर्णन किया गया है. 











पत्रकार पंडित रामसेवक पाण्डेय के निधन पर शोक

पत्रकार पंडित रामसेवक पाण्डेय के निधन पर शोक
रिपोर्ट डा. राधे श्याम द्विवेदी
बस्ती: वरिष्ठ पत्रकार एवम उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसियेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पंडित रामसेवक पाण्डेय का निधन 22 जनवरी 2022 को प्रातः उनके निज आवास पर हो गया। उनकी उम्र लगभग 66 वर्ष की थी ।वह पिछले दो महीने वे बीमार चल रहे थे। उनका इलाज लखनऊ में चल रहा था। स्वास्थ्य में सुधार हो जाने के बाद वे अपने निज आवास पर आकर स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। उनका जन्म 24 जनवरी1956 को हुआ था। वे ब्राहमण सभा, नारायण सेवा संस्थान तथा उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसियेशन की बस्ती इकाई में सक्रिय रुप से जुड़े हुए थे। वह उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसियेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे तथा नारायण सेवा संस्थान से विकलांग और गरीबों को चिकित्सीय सुधायें और सहयोग दिलवाते रहते थे। वह हनुमान जी के अनन्य भक्त थे । वह फेसबुक पर नारायण सेवा संस्थान द्वारा 27 मार्च 2021तक हनुमानगढ़ी अयोध्या के चित्र शेयर करते रहे। 256ब्राहमण राज नामक वर्डसैप ग्रुप के माध्यम से 8 जनवरी 2022 तक नियमित हनुमान जी के चित्र व वीडियो लोड करते रहे।
उनके निधन पर वरिष्ठ पत्रकार जयंत मिश्र, स्कन्द शुक्ला, अरूणेश श्रीवास्तव, राकेश चन्द्र बिन्नू, डा0 सत्यव्रत, रमेश चन्द्र मिश्र, सर्वेश कुमार श्रीवास्तव, राजेन्द्र कुमार उपाध्याय, अनुराग श्रीवास्तव ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि श्री रामसेवक पाण्डेय मिलनसार एवं अत्यंत मृदुल स्वभाव के थे। वे उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष थे। वे अपने कार्यों के प्रति सदा ही निष्ठावान और जीवनपर्यन्त पत्रकारिता के लिए समर्पित रहे। हम सब पत्रकार सदस्य उनके परिवार के इस दुःख की घड़ी में साथ हैं और हर संभव सहायता के लिए तत्पर हैं।
उनकी मृत्यु पर वरिष्ठ पत्रकार दिनेश चन्द्र पाण्डेय, एस0के0 सिंह, प्रकाश चन्द्र गुप्ता, आलोक मणि त्रिपाठी, विनोद कुमार उपाध्याय, विपिन त्रिपाठी, पत्रकार लक्ष्मी नरायन पाण्डेय, राजेन्द्र नाथ तिवारी, हरिप्रकाश चौहान, संतोष तिवारी, मजहर आजाद, प्रदीप चन्द्र पाण्डेय, महेन्द्र तिवारी, आलोक त्रिपाठी, वशिष्ठ कुमार पाण्डेय, अमित सिंह, डा0 वी0के0 वर्मा, मनोज कुमार यादव, रजनीश त्रिपाठी, विश्राम प्रसाद, चन्द्रप्रकाश शर्मा, मो0 अली तवरेज, राकेश तिवारी, लवकुश सिंह, सर्वेश श्रीवास्तव तरूण मित्र, अनिल श्रीवास्तव चेतना, प्रवीण कुमार पाण्डेय, आशुतोष नारायण मिश्र, सुनील मिश्रा, प्रमोद श्रीवास्तव, जयप्रकाश उपाध्याय, कौशल किशोर श्रीवास्तव, पुनीत दत्त ओझा, वीरेन्द्र पाण्डेय, सुरेन्द्र पाण्डेय, राघवेन्द्र मिश्रा उर्फ पट्टू, राकेश गिरि, सुदृष्टि नारायण त्रिपाठी, शिवप्रकाश गौड़, धनंजय श्रीवास्तव, अमर वर्मा, संदीप यादव, अनिल सिंह, श्रीमती कमलेश गुप्ता, सोहन सिंह, सुनील पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय, संजय विश्वकर्मा, रामकृष्ण लाल जगमग, गोकरन नाथ पाण्डेय, धनन्जय श्रीवास्तव, राजेश पाण्डेय, राजेश मिश्रा, अनिल श्रीवास्तव भेलखा, बृजेश प्रताप सिंह, बृजेन्द्र तिवारी, कृष्ण कुमार उपाध्याय, संदीप गोयल, ऐश्वर्य मणि त्रिपाठी, सज्जाद रिजवी, बिन्देश्वरी लाल श्रीवास्तव, संजय राय, शिवराज सिंह, कृष्णदेव मिश्र, संजय कुमार अग्रवाल, अभिनव कुमार दूबे, डा0 दिव्या तिवारी, जीशान हैदर रिजवी, काजी मुनीर अहमद, सुरेश सिंह गौतम, संतोष श्रीवास्तव, गुलाम नवी आजाद, रामेश्वर दत्त ओझा, संजय शुक्ल, संदीप शुक्ल, सरदार जगवीर सिंह, चन्द्रभूषण श्रीवास्तव, उमेश कुमार मद्धेशिया, वसीम अहमद सिद्दीकी, शंहशाह आलम, रियाज अहमद, अजय श्रीवास्तव, शिवशंकर लाल श्रीवास्तव, अश्वनी शुक्ल, प्रेमनाथ गौड़, श्रीप्रकाश श्रीवास्तव, कामेश्वर नाथ ओझा, इमरान अली, विवेक कुमार चौधरी, संदीप कुमार ओझा, लव कुमार अग्रवाल, पाराशर पाण्डेय, दयाशंकर सिंह, दिनेश सिंह, प्रेरक कुमार मिश्रा, सलामुद्दीन कुरैशी, डा0 आकाश चन्द्र गुप्ता, राजकुमार शुक्ला, राघवेन्द्र सिंह, पारसनाथ मौर्य, आनन्द कुमार गुप्ता, सद्दाम हुसेन, दिनेश पाण्डेय, कौशल ओझा, सतीश श्रीवास्तव, लवकुश यादव, हिफाजुर्रहमान, दिलीप पाण्डेय, रचना दूबे, अजय श्रीवास्तव, रोहित त्रिपाठी, राहुल त्रिपाठी, विकास पाण्डेय, संजय कुमार शर्मा, रामकुमार, विनीता पाण्डेय, सुभाष पाण्डेय, राधेश्याम दूबे, वीर कुमार तिवारी, माता प्रसाद पाण्डेय, सर्वजीत सिंह, विशाल पाण्डेय, अतुल कुमार सोनी, महेन्द्र सिंह, बसंतलाल आदि ने शोक व्यक्त किया।


Thursday, January 20, 2022

डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को ‘भारत गौरव’ सारस्वत सम्मान

बस्ती । विक्रमशिला हिन्दी विद्या पीठ द्वारा वरिष्ठ कवि डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को उनके योगदान के लिये ‘भारत गौरव’ सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया है। गुरूवार को उनके सम्मान में वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति एवं प्रेमचन्द साहित्य एवं जन कल्याण संस्थान की ओर से कलेक्टरी परिसर में एक संगोष्ठी आयोजित कर वक्ताओं ने उनका उत्साहवर्धन करते हुये अंग वस्त्र एवं फूल मालाओं के साथ स्वागत किया।
शिव हर्ष किसान पी.जी. कालेज के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रामदल पाण्डेय ने कहा कि हिन्दी कविता के क्षेत्र में डॉ. जगमग की साहित्य यात्रा स्वंय में विविधता लिये हुये हैं। उनकी कृति ‘चाशनी’ से लेकर ‘ किसी की दिवाली किसी का दिवाला’ विलाप खण्ड काव्य, ‘हम तो केवल आदमी है’ ‘ सच का दस्तावेज’ ‘बाल सुमन’ आदि कृतियों में वे कभी हास्य तो कभी गंभीर दर्शन के रूप में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त करते हुये उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। डा.पाण्डेय ने कहा कि इन दिनों जगमग जी स्वामी विवेकानन्द पर केन्द्रित महाकाव्य का सृजन कर रहे हैं, निश्चित रूप से उनका साहित्यिक संसार घोर तमस में समाज का पथ पदर्शन करेगा।
कवि एवं चिकित्सक डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि डा. जगमग ने जहां स्वयं अनेकों कृतियां समाज को दिया वहीं वे पूर्वान्चल में समर्थ कवियों की पीढी तैयार कर रहे हैं। निश्चित रूप से यह कठिन कार्य है, नई पीढी उनसे बहुत कुछ सीख सकती है। वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि डा. जगमग का रचना संसार जन सरोकारों से जहां सीधा जुड़ा है। उनके कटाक्ष और तीखे व्यंग्य श्रोताओं की जुबान पर चढ़े हुये है। डॉ. त्रिभुवन प्रसाद मिश्र ने कहा कि डॉ. जगमग का जीवन साहित्य को समर्पित है। कवि सम्मेलनों में वे आम आदमी की भावना को सहज रूप में छू जाते हैं।
अपनों द्वारा किये गये सम्मान से अभिभूत डा. जगमग ने कहा कि उन्होने जिस तरह से जीवन को देखा उसे शव्दों में उतार दिया। यह क्रम अनवरत जारी है।
डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को सम्मानित किये जाने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य रूप से श्याम प्रकाश शर्मा, विनय कुमार श्रीवास्तव, ओम प्रकाश धर द्विवेदी, रमाकान्त तिवारी, पेशकार मिश्र, दीपक सिंह प्रेमी, शाद अहमद शाद, दीनानाथ यादव, गणेश आदि अनेक विद्वत जनों ने उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।

Sunday, January 16, 2022

बाबूजी स्वर्गीय शोभाराम दूबे की पुण्य तिथि 17 जनवरी पर सादर श्रद्धांजलि

मेरे परम पूज्य बाबूजी स्वर्गीय शोभाराम दूबे का जन्म 15 जून 1929 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के हर्रैया तहसील के कप्तानगंज विकास खण्ड के दुबौली दूबे नामक गांव मे एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार का पालन पोषण तथा शिक्षा के लिए बाबूजी को उनके पिताजी पंडित मोहन प्यारे जी लखनऊ लेकर चले गये थे। जहां उन्होने 1945 में लखनऊ के क्वींस ऐग्लो संस्कृत हाई स्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा उस समय ‘प्रथम श्रेणी’ से अंग्रेजी, गणित, इतिहास एवं प्रारम्भिक नागरिक शास्त्र आदि अनिवार्य विषयों तथा हिन्दी और संस्कृत एच्छिक विषयों से उत्तीर्ण की है। उन्होंने इन्टरमीडिएट परीक्षा 1947 में कामर्स ग्रुप से द्वितीय श्रेणी में अंग्रेजी, बुक कीपिंग एण्ड एकाउन्टेंसी, विजनेस मेथेड करेसपाण्डेंस, इलेमेन्टरी एकोनामिक्स एण्ड कामर्सियल ज्याग्रफी तथा स्टेनो- टाइपिंग विषयों से उत्तीर्ण किया था।
          दादाजी पण्डित मोहनप्यारे द्विवेदी के शिक्षण तथा व्यवहार से प्रभावित सहकारिता विभाग के किसी अधिकारी ने गुरुदक्षिणा के रुप में बाबूजी को पहले कम उम्र के कारण अस्थाई रुप में तथा बादमें 18 साल की उम्र होने पर स्थाई रुप में सरकारी सेवा में लिपिक पद पर नियुक्ति दिलवा दिया था। बाद में बाबूजी ने विभागीय परीक्षा देकर लिपिक से आडीटर के पद पर अपनी नियुक्ति करा लिये थे।
           बाबूजी अपने सिद्धान्त के बहुत ही पक्के थें उन्होने अनेक विभागीय अनियमितताओं को उजागर किया था । इसका कोप भाजन भी उन्हें बनना पड़ा था। प्रताड़ना स्वरूप उनकी उल्टी -सीधी पोस्टिंग दी जाती रही। टेहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल जो उस समय यूपी में था, की चढ़ाई करना पड़ा था।
          फैजाबाद में सहकारिता विभाग का एक बहुत बड़ा घोटाला जिसमें कांग्रेसी नेता विश्वनाथ कपूर संलिप्त थे,बाबूजी के द्वारा ही उजागर हुआ था। अयोध्या का क्षेत्र फैजाबाद सदर विधानसभा क्षेत्र के तहत तब आता था।1967 के चुनाव में अयोध्या अलग विधान सभा सीट बना था। जहां 1969 में कांग्रेस के विश्वनाथ कपूर जीतने में कामयाब रहे।1969  में आईएनसी के विश्वनाथ कपूर  19569 तथा उनके प्रतिद्वंदी बीकेडी के  राम नारायण त्रिपाठी को 15652 मत मिले थे।उनके द्वारा हुए घोटाले का स्थानीय और फिर उच्च न्यायालय में विचारण हुवा था। जिला सहकारी बैंक फैजाबाद, जिसमें श्री विश्वनाथ कपूर, अधिवक्ता प्रबंध निदेशक थे और श्री जोखान सिंह कैशियर थे और एलन खान कार्यवाहक प्रबंधक थे और महराज बक्स सिंह सामग्री समय पर सहायक लेखाकार थे, राज्य अधिनियम द्वारा या उसके तहत स्थापित एक निगम है और , इसलिए उक्त आरोपी व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 21 खंड 12वीं के अर्थ में लोक सेवक थे।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन हाई कोर्ट में  स्टेटऑफ़ यूपी बनाम विश्वनाथ कपूर और अन्य केस चला था। इसका निस्तारण 14 जनवरी 1980 को न्यायमूर्ति टी मिश्रा द्वारा हुवा था। इस संदर्भित प्रश्न का न्यायमूर्ति का उत्तर इस प्रकार रहा है- यूपी सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत एक सहकारी समिति एक केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके तहत स्थापित निगम नहीं है ।इस उत्तर के साथ कागजात माननीय एकल न्यायाधीश के समक्ष रखे जाने का आदेश पारित किया गया था।
       इस प्रकार विभागीय घोटालों को प्रकाश में लाने पर मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी श्री अवधेश चंद्र दुबे ने बाबू जी को लखनऊ में बुलाकर सिस्टम को सुधारने को छोड़ अपना कार्यकाल सामान्य रूप में बिताने की नसीहत दी थी।
         बाबूजी का आडीटर के बाद सीनियर आडीटर के पद पर प्रोन्नति पा गये थे। सीनियर आडीटर के जिम्मे जिले की पूरी जिम्मेदारी होती थी। बाद में यह पद जिला लेखा परीक्षाधिकारी के रुप में राजपत्रित हो गया। कभी- कभी बाबूजी को दो- दो जिलों का प्रभार भी देखना पड़ता था। जब कोई अधिकारी अवकाश पर जाता था तो पास के अधिकारी के पास उस जिले का अतिरिक्त प्रभार भी संभालना पड़ता था। बहराइच में सेवा के दौरान 1975  में बाबूजी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी. ए. की उपधि प्राप्त की थी।
        विभाग में अच्छी छवि होने के कारण बाबूजी को प्रतिनियुक्ति पर उ. प्र. राज्य परिवहन में भी कार्य करने का अवसर मिला था। ये क्षेत्रीय प्रबन्धक के कार्यालय में बैठते थे और उस मण्डल के आने वाले सभी कार्यालयों के लेखा का सम्पे्रेक्षण करते थे। उनकी नियुक्ति कानपुर के केन्द्रीय कार्यशाला में 23.12.1982 को हुआ था। यहां से वे औराई तथा इटावा के कार्यालयों के मामले भी देखा करते थे। अपनी सेवा का शेष समय बाबूजी ने राज्य परिवहन में पूरा किया था। 1985 में वह कानपुर से गोरखपुर कार्यालय में सम्बद्ध हो गये थे। यहां से वे आजमगढ़ के कार्यालय के मामले भी देखा करते थे। गोरखपुर कार्यालय से वे 30.06.1987 में सेवामुक्त हुए थे।
            संयोग से उनके सेवामुक्त होने के पहले 12 मार्च 1987 को मैं बडौदा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अपना दायित्व निभाना शुरु कर दिया था।  बाबूजी अपने पैतृक जन्मभूमि दुबौली दूबे पर कम तथा  नेवासा वाले जगह मरवटिया पाण्डेय पर ज्यादा रहने लगे थे। मेरे बाबूजी घर पर कम समय दे पाते थे। हां, महीने में एक दो चक्कर जरुर लग जाता था। सेकण्ड सटरडे के साथ सनडे को वह जरुर घर आते थे। वे बाहर अकेले रहते थे। माता जी को बहुत कम अपने पास रख पाते थे , क्योकि घर पर नानाजी भी तो अकेले थे। हमें जब भी अपने पढ़ाई तथा बच्चे के पढ़ाई से समय मिलता मैं उनके आवास मरवटिया पाण्डेय यानी अपने ननिहाल स्वयं, पत्नी तथा बच्चे के साथ अवश्य जाता और वह बहुत ही प्रसन्न होते थे। हमारे आगरा में सरकारी सेवा के दौरान अपनी मातृ भूमि पर 17 जनवरी 2011को उन्होंने आखिरी सांसें ली थी और हमारे परिवार पर उनका शाया हमेशा हमेशा के लिए उठ गया। सोचा था कि जब मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हूंगा तो बाबूजी के साथ समय बिताउगां। उनके सुख दुख में भागी बनूंगा। पर ईश्वर ने एसा करने का अवसर नहीं दिया। हमें थोड़े-थोड़े समय के लिए उनके साथ रहने का अवसर ही मिल पाया।  इस कारण जब मैं इस स्थिति में हुआ कि मेरे बच्चे अकेले मेरे देखरेख में रहने के लिए उपयुक्त हो गये तो मैं अपनी पत्नी को अपनी मांजी की सेवा के लिए घर पर कर दिया और अपने जिन्दगी के आखिरी के लगभग 8 साल मुझे अकेले बाहर गुजारना पड़ा है।
           बाबू जी को परमधाम गए ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गए।उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धा के प्रसून अर्पित करते हुए उनके शांतिमय पारलौकिक जीवन की परमपिता से प्रार्थना करता हूं।

Thursday, January 13, 2022

भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र नैमिषारण्य:- डा. राधे श्याम द्विवेदी


नैमिषारण्य लखनऊ से ८० किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख ८८००० ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्म पुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं। वाराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमिष मात्र में दानवों का संहार होने से यह 'नैमिषारण्य' कहलाया। वायु, कूर्म आदि पुराणों के अनुसार भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल) यहीं विशीर्ण हुई (गिरी) थी, अतएव यह नैमिषारण्य कहलाया।
              प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।
               तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥
मियागंज कन्नौज की धर्मनिष्ठा :-
स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी महाराज के तीन शिष्य:-
कन्नौज के पूर्वी इलाके में स्थित मियागंज एक ऐसा ग्राम है जिसे अब ऋषि नगर के नाम से जानते हैं। वहां तीन महान संतों का अवतरण हुआ जिन्होंने पूरे देश में ख्याति अर्जित की जिनमे स्वामी सुखदेवानन्द, स्वामी नारदानंद और स्वामी भजनानंद जी हैं। स्वामी सुखदेवानन्द का गृहस्थ नाम प्रयाग नरायन था और स्वामी भजनानंद का नाम लङैते लाल था। बाबूराम स्वामी नारदानंद के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल की मिठाई की दुकान थी। तीनों स्वामी एकरसानंद सरस्वती के दर्शन करने गए और वहीं पर उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया। उसी समय सवामी विचारानंद और समतानंद भी उसी गाँव मे हुए और इसे संयोग ही कहा जायेगा कि पहले से ही विरक्त भाव मे चल रहे इन तीनो विभूतियों की पत्नियों ने एक एक कर संसार को छोड़ दिया और अपने पति को परमार्थ गमन के लिए मुक्त कर दिया। बाबूराम पांडेय स्वामी नारदानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल स्वामी भजनानंद के नाम से विख्यात हुए और प्रयाग नरायन स्वामी सुखदेवानंद के नाम से विख्यात हुए। तीनो ने एक साथ सन्यास ग्रहण किया।
स्वामी नारदानंद सरस्वती द्वारा अध्यात्म केंद्र की स्थापना:-
 यहां स्वामी श्रीनारदनंदजी महाराज का आश्रम तथा एक ब्रह्मचर्याश्रम है, जहां ब्रह्मचारी प्राचीन पद्धति से शिक्षा प्राप्त करते हैं। आश्रम में साधक लोग साधना की दृष्टि से रहते हैं। धारणा है कि कलियुग में समस्त तीर्थ नैमिष क्षेत्र में ही निवास करते हैं। नैमिषारण्य भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है, जिसे जगदाचार्य स्वामी नारदानंद सरस्वती जी ने यथासंभव संवारने का प्रयास किया था। स्वामी नारदानंद सरस्वती ने नैमिष में आश्रम बनाया जो आज अपने विशाल रूप में है। स्वामी नारदानंद सादगी के प्रतीक थे। स्वामी नारदानंद जी का जन्म कन्नौज के पास मिश्रागंज में ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह दो भाई-बहन थे। उनकी विवाह भी हुआ था। बाद में एकरसानंद से प्रभावित होकर घरबार छोड़कर समाज हित में अपने को लगा दिया था। उनकी कई वर्षो की तपस्या व आशीर्वाद से लाखों भक्तों का कल्याण हुआ। उन्होंने देश-विदेश में 286 आश्रमों का संचालन किया और नैमिषारण्य को अपनी तपस्थली बनाकर वहां चारों आश्रमों का संचालन किया। ब्रहमचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास वर्ण की अलग-अलग व्यवस्था की। इनका जन्म मास अगहन की शुक्लपक्ष सप्तमी को हुआ था। महाराज जी के सानिध्य में लाखों भक्तों का कल्याण हुआ और बहुत से विरक्त संत व आचार्यो की फौज तैयार कर जनसेवा में जीवन लगा दिया। उन्होंने बताया कि समस्त 286 आश्रमों पर वानप्रस्थ ब्रहमचारी को पूजा व देखरेख के लिए नियुक्त किया।
          स्वामी नारदानंद पहले स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी महाराज फिर पंडित मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आये और उनकी सम्मति से वर्णाश्रम खोलने की योजना बनाई। स्वामी नारदानंद ने उत्तर भारत में जनमानस को धर्म और आध्यात्म के प्रति प्रेरित किया। भारत भक्त समाज की स्थापना पर सन 1959 में स्वामी जी मे यह आह्वान किया। आओ उठो आज परमात्मा की स्वकर्तव्य द्वारा पूजा की शुभ बेला है।मातृभूमि की पुकार है। नैमिष व्यासपीठ की स्थापना की जो आज भी मिसाल वट वृक्ष की भांति विद्यमान है। 
          नारदानंद नके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी ने नैमिशारण्य में भव्य देवपुरी मंदिर का निर्माण कराया। उन्होंने एक हजार शिवलिंगों की भी स्थापना की तथा सरस्वती सरोवर का निर्माण कराया। 
        नारदानंद के ही प्रमुख शिष्य वेदांती स्वामी सर्वेश्वरानंद सरस्वती मूलत: हरदोई के रहने वाले थे। वह बाल्यकाल में ही घर परिवार त्याग कर नैमिष पीठाधीश्वर स्वामी नारदानंद सरस्वती के आश्रम पहुंच गए थे। वेद कंठस्थ होेने के चलते स्वामी सर्वेश्वरानंद को नैमिष अध्यात्मिक विद्यापीठ का संरक्षक बनाया गया था। स्वामी जी की मृत्यु के बाद उनका पार्थिव शरीर नैमिष आश्रम में ले जाया गया है। यहां उनको समाधि दी गई। 
            वर्तमान में उत्तराधिकारी स्वामी उपेंद्रानंद सरस्वती जी के संरक्षकत्व में संस्था सुचारु रुप से चल रही है।वे नारदानन्द आश्रम नैमिषारण्य के नैमिष व्यास पीठाधीश्वर हैं। आश्रम की व्यवस्था स्वामी नारदानन्द सरस्वती आध्यात्म विद्यापीठ ट्रस्ट द्वारा की जा रही है। 23 अप्रैल 2006 की आम सभा द्वारा सर्वसम्मति से उन्हें शिक्षा सुधार समिति सहित संरक्षक नियुक्त किया गया था।
ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत विद्यालय की स्थापना :-
स्वामी नारदानन्द जी महाराज ने साधकों के लिए एक आश्रम बनवाया था। आश्रम के समीप ब्रह्मचारियों को संस्कृत की शिक्षा देने के लिए ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत विद्यालय की स्थापना की थी। इस विद्यालय का विशाल परिसर इसके गौरवपूर्ण अतीत का बोध कराता है। कभी यहाँ सैकड़ों की संख्या में ब्रह्मचारी संस्कृत शिक्षा प्राप्त करते थे। यह नैमिषारण्य का सबसे समृद्ध और भव्य विद्यालय था। बटुक विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। संस्कृत विद्या और भारतीय संस्कृति से प्रेम करने वाले लोगों को चाहिए कि एऐसे संस्कृत विद्यालयों को गोद लेकर वहाँ शिक्षा और संसाधनों पर कुछ खर्च करें। इससे हमारी हिन्दू संस्कृति जीवन्त रह सके। हर हिन्दू भारतीयों को याद रखना चाहिए, जबतक संस्कृत विद्या जीवित है तभी तक हिन्दू संस्कृति भी जीवित है। अप्रैल से जुलाई के मध्य इन विद्यालयों में जाकर अपने सामर्थ्य के अनुसार पुस्तकें, वस्त्र, खाद्यान्न आदि दान देकर इन विद्यालयों को पोषण करना चाहिए। तीर्थ यात्रा का सच्चा फल तभी मिलेगा
प्रधानाचार्य राम चन्द्र पाण्डेय का लम्बा कार्य काल:-
नारदानन्द सरस्वती द्वारा संस्थापित संस्कृत विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य राम चन्द्र पाण्डेय ने अपने गुरुदेव की स्मृति में अध्यात्म विद्यापीठ ब्रह्मचर्याश्रम मे संस्कृत की शिक्षा गृहण कर रहे विद्यार्थियों को गर्म स्वेटर की वितरण किया और मन लगाकर शिक्षा अध्ययन करने के लिये प्रेरित किया। वे अपने गुरु ब्रह्मलीन स्वामी नारदानन्द सरस्वती का आदेश मानकर अपने जीवन के 45 वर्ष गुरुकुल की सेवा में अध्यापन करते हुये अर्पित किये। उन्होने बताया कि अपने घर से दूर नैमिष आश्रम में आवासीय गुरुकुल में रहकर संस्कृत और संस्कृति की शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र आगे चलकर देश देशांतर में धर्म का प्रचार प्रसार करते हुये भारतीय सनातन संस्कृति की धर्म पताका का संरक्षण व सम्वर्धन करते हैं, इन छात्रों को हम सभी को सहयोग कर उत्साह वर्धन का प्रसार करना चाहिये। 
पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी जी का भी साधना स्थल:-
पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी ’’मोहन’’ का जन्म संवत 1966 विक्रमी तदनुसार 01 अप्रैल 1909 ई. में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के हर्रैया तहसील के कप्तानगंज विकास खण्ड के दुबौली दूबे नामक गांव मे एक कुलीन परिवार में हुआ था। पंडित जी को पड़ोस के गांव करचोलिया में 1940 ई. में वहां के प्रधानजी के सहयोग तथा शिक्षा विभाग में भाग दौड़कर एक प्राइमरी विद्यालय खोलना पड़ा था। जो आज भी चल रहा है। 1955 में वह प्रधानाध्यापक पद पर वहीं आसीन हुए थे। इस क्षेत्र में शिक्षा की पहली किरण इसी संस्था के माध्यम से फैला था। राजकीय जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद वह देशाटन व धर्म या़त्रा पर प्रायः चले जाया करते थे। उन्हांने श्री अयोध्याजी में श्री वेदान्ती जी से दीक्षा ली थी। उन्हें सीतापुर जिले का नौमिष पीठ बहुत पसन्द आया था। वहां श्री नारदानन्द सरस्वती के सानिध्य में वह रहने लगे थे। एक शिक्षक अपनी शिक्षण के विना रह नही सकता है। इस कारण पंडित जी नैमिषारण्य के ब्रहमचर्याश्रम के गुरूकुल में संस्कृत तथा आधुनिक विषयों की निःशुल्क शिक्षा देने लगे थे। उन्हें वहां आश्रम के पाकशाला से भोजन तथा शिष्यों से सेवा सुश्रूषा मिल जाया करती थी। गुरूकुल से जाने वाले धार्मिक आयोजनों में भी पंडित जी भाग लेने लगे थे। अक्सर यदि कही यज्ञानुष्ठान होता तो पण्डित जी उनमें जाने लगे थे। वह अपने क्षेत्र में प्रायः एक विद्वान के रूप में प्रसिद्व थे । 15 अपै्रल 1989 को 80 वर्ष की अवस्था में पण्डित जी ने अपने मातृभूमि में अतिम सासें लेकर परम तत्व में समाहित हो गये थे।
नैमिषारण्य का वर्णन पंडित जी ने इस प्रकार किया है :-

शुभ तपोभूमि ऋषि-मुनियों की, 
नैमिष’ ‘मिश्रिख’की पावन माटी।.
जहां अस्थिदान दे चुके दधीचि,
 यह त्याग तपस्या की परिपाटी।
यहां चक्र तीर्थ पावन पुनीत है,
 ललिता मैया की छवि सुभाटी ।
मैया सीता का धाम यहां , 
कण-कण में बसे श्रीराम सुहाटी।।1।।

तीर्थ नैमिष धाम की पहचान, 
बन रही यहां की गोमती मइया।
देव-ऋिषियों का गुणगान, 
कर रही यहां की प्यारी गइया।
ज्ञान गौरव भक्ति का भाव,
भर रही इसके तट के रहवइया।
तीर्थ-मठ-मंदिर-गुरु ऋषियों, 
का धाम यह है गुरुवइया।।2।।

धेनुए सुहाती हरी भूमि पर जुगाली किये, 
मोहन बनाली बीच चिड़ियों का शोर है।
अम्बर घनाली घूमै जल को संजोये हुए,
 पूछ को उठाये धरा नाच रहा मोर है।
सुरभि लुटाती घूमराजि है सुहाती यहां, 
वेणु भी बजाती बंसवारी पोर पोर है।
गूंजता प्रणव छंद छंद क्षिति छोरन लौ,
 स्नेह को लुटाता यहां नितसांझ भोर है।। 3।।

प्रकृति यहां अति पावनी सुहावनी है, 
पावन में पूतता का मोहन का विलास है।
मन में है ज्ञान यहां तन में है ज्ञान यहां,
 धरती गगन बीच ज्ञान का प्रकाश है।
अंग अंग रंगी है रमेश की अनूठी छवि,
 रसना पै राम राम रस का निवास है।
शान्ति सुहाती यहां हिय में हुलास लिये, 
प्रभु के निवास हेतु सुकवि मवास है।।4।।
            विद्यालय के वर्तमान प्रधानाचार्य जो पूर्व में एबीवीपी से सक्रिय रुप में जुड़े रहे आचार्य हरिओम शुक्ल की देखरेख विद्यालय अध्ययन -अध्यापन और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सुचारु रुप से संचालित कर रहा है।


सीता का जमीन में समाने का स्थान डा. राधेश्याम द्विवेदी

                               फलस्वाड़ी अयोध्या या सीतामढ़ी 
          रामायण में कथा है कि देवी सीता धरती से ही प्रकट हुई थीं और अंत में धरती में समा गईं। जिस स्थान पर देवी सीता भूमि में समाई थीं उस स्थान को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। 
           पहली बात तो यह कि माता सीता का धरती में समा जाने के प्रसंग पर मतभेद और विरोधाभाष है। पद्मपुराण की कथा में सीता धरती में नहीं समाई थीं बल्कि उन्होंने श्रीराम के साथ रहकर सिंहासन का सुख भोगा था और उन्होंने भी राम के साथ में जल समाधि ले ली थी।
           प्रमाणिक तौर ये बताना मुश्किल है कि मां सीता ने नैनीताल के सीताबनी पौड़ी के फलस्वाड़ी गांव ही धरती में समा गई थी या उत्तर प्रदेश के संत रविदास नगर (भदोई ) जिले में गंगा किनारे सीता मढ़ी स्थान पर समाधि ली थी टीवी धारावाहिक 'रामायण' के अनुसार, माता सीता ने अयोध्या में ही समाधि ली थी। ऐसे में ये बताना मुश्किल है कि माता सीता ने कहां भू-समाधि ली थी।
            वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के अनुसार प्रभु श्रीराम के दरबार में लव और कुश राम कथा सुनाते हैं। सीता के त्याग और तपस्या का वृतान्त सुनकर भगवान राम ने अपने विशिष्ट दूत के द्वारा महर्षि वाल्मीकि के पास सन्देश भिजवाया, 'यदि सीता का चरित्र शुद्ध है और वे आपकी अनुमति ले यहां आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित करें और मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें तो मैं उनका स्वागत करूंगा।
यह संदेश सुनकर वाल्मीकि माता सीता को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। काषायवस्त्रधारिणी सीता की दीन-हीन दशा देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों का हृदय दुःख से भर आया और वे शोक से विकल हो आंसू बहाने लगे।
        वाल्मीकि बोले, 'श्रीराम! मैं तुम्हें विश्‍वास दिलाता हूं कि सीता पवित्र और सती है। कुश और लव आपके ही पुत्र हैं। मैं कभी मिथ्याभाषण नहीं करता। यदि मेरा कथन मिथ्या हो तो मेरी सम्पूर्ण तपस्या निष्फल हो जाय। मेरी इस साक्षी के बाद सीता स्वयं शपथपूर्वक आपको अपनी निर्दोषिता का आश्‍वासन देंगीं।
           तत्पश्‍चात् श्रीराम सभी ऋषि-मुनियों, देवताओं और उपस्थित जनसमूह को लक्ष्य करके बोले, "हे मुनि एवं विज्ञजनों! मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के कथन पर पूर्ण विश्‍वास है परन्तु यदि सीता स्वयं सबके समक्ष अपनी शुद्धता का पूर्ण विश्‍वास दें तो मुझे प्रसन्नता होगी।"
            राम का कथन समाप्त होते ही सीता हाथ जोड़कर, नेत्र झुकाए बोलीं, "मैंने अपने जीवन में यदि श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्‍त कभी किसी दूसरे पुरुष का चिन्तन न किया हो तो मेरी पवित्रता के प्रमाणस्वरूप भगवती पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दें।" सीता के इस प्रकार शपथ लेते ही पृथ्वी फटी। उसमें से एक सिंहासन निकला। उसी के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने दोनों भुजाएं बढ़ाकर स्वागतपूर्वक सीता को उठाया और प्रेम से सिंहासन पर बिठा लिया। देखते-देखते सीता सहित सिंहासन पृथ्वी में लुप्त हो गया। सारे दर्शक स्तब्ध से यह अभूतपूर्व दृश्य देखते रह गए।इस सम्पूर्ण घटना से राम को बहुत दुःख हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे दुःखी होकर बोले, "मैं जानता हूं, मां वसुन्धरे! तुम ही सीता की सच्ची माता हो। राजा जनक ने हल जोतते हुए तुमसे ही सीता को पाया था, परन्तु तुम मेरी सीता को मुझे लौटा दो या मुझे भी अपनी गोद में समा लो।" श्रीराम को इस प्रकार विलाप करते देख ब्रह्मादि देवताओं ने उन्हें नाना प्रकार से सान्त्वना देकर सौंपा था।
समाधि स्थल पर संशय:-
हालांकि माता सीता ने समाधि कहां ली थी, इस पर संशय है! माता सीता द्वारा धरती में समा जाने की कथाओं में विभिन्न स्थानों का वर्णन है। ऐसे में माता सीता ने कहां पर समाधि ली थी, ये बताना मुश्किल है। 
नैनीताल का सीताबनी: -
एक मान्यता के अनुसार देवी सीता जहां धरती में समाई थीं वह स्थान आज नैनीताल में जिम कार्बेट नेशल पार्क है जो बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित है। यहां कभी महर्षि बाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। भगवान राम द्वार देवी सीता को अयोध्या से निकाले जाने के बाद लक्ष्मणजी देवी सीता को यहीं छोड़ आए थे। यहीं पर देवी सीता ऋषि के आश्रम में रहीं इसलिए इस स्थान को सीताबनी के नाम से जाना गया। जिस समय भगवान राम ने देवी सीता को वनवास का आदेश दिया था उस समय देवी सीता गर्भवती थीं। ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में ही इन्होंने अपने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया था और इनका पालन-पोषण किया था। इस घटना की याद मेंं सीताबनी में देवी सीता की प्रतिमा के साथ उनके दोनों पुत्रों को भी दिखाया गया है।सीताबनी का जिक्र कई धर्म ग्रंथों में मिलता है। रामायाण, स्कंदपुराण और महाभारत में भी इस तीर्थ के महत्व को दर्शाया गया है। महाभारत के 83वें अध्याय में वर्णित श्लोक संख्या 49 से 60 श्लोक तक सीताबनी का उल्लेख किया गया है। स्कंदपुराण में जिन सीतेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन किया गया है, वह यहीं विराजित हैं। स्कंदपुराण के अनुसार, कौशिकी नदी, जिसे वर्तमान में कोसी नदी कहा जाता है के बाईं ओर शेष गिरि पर्वत है। यह सिद्ध आत्माओं और गंधर्वों का विचरण स्थल है। इसी के पास स्थित है लक्ष्मणपुरा। जहां लक्ष्मणजी देवी सीता को अपने रथ से उताकर वन में छोड़ गए थे। तब उदास सीता ने बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में शरण ली थी।आश्रम के पास ही रामपुरा नामक स्थान है। जहां लव-कुश ने भगवान राम द्वारा छोड़ा गया अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ा था। यहां दो पहाड़ियों के बीच की खाई है,खाई में स्थित कुंज की वह स्थान है जहां से माता सीता धरती में समा गई थीं। देवी सीता की पुकार पर धरती माता ने पहाड़ी को दो भागों में चीर दिया था और देवी सीता को अपनी गोद में स्थान दिया।
उत्तराखंड का फलस्वाड़ी गांव:-
कुछ मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड के फलस्वाड़ी गांव में सीता माता ने भू-समाधि ली थी। माना जाता है कि पौड़ी के सितोलस्यूं में ही सीता ने भू-समाधि ली थी. यहां 11वीं शताब्दी के सीता मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और वाल्मीकि आश्रम मौजूद हैं. 
पुरातत्वविद् डॉक्टर यशवंत सिंह कठोच के अनुसार, माना जाता है कि फलस्वाड़ी गांव में ही सीता माता ने भू-समाधि ली थी. जनश्रुतियों के अनुसार यहां पर सीता माता का मंदिर भी था और बाद में वह भी धरती में समा गया था. इससे जुड़ी कथा के अनुसार, यहां नवंबर महीने मनसार का मेला लगता है।फलस्वाड़ी और कोट गांव, जहां लक्ष्मण मंदिर है, मिलकर इस मेले का आयोजन करते हैं. हर साल बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने आते हैं मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में ‘सीता माता सर्किट’ विकसित करने का ऐलान करते हुए कहा कि इन धार्मिक स्थलों की स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता है परंतु अन्य प्रदेशों के लोगों के इनके बारे कम जानकारी है. इसलिए देश भर के श्रद्धालुओं को यहां के धार्मिक महत्व के बारे बताने के लिए प्रचार प्रसार किया जाएगा उत्तराखंड के फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बनेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के अनुसार, यहां पर माता सीता का भव्य मंदिर बनने पर भगवान राम और सीता में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति फलस्वाड़ी गांव जरूर आना चाहेगा। इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु माता सीता के उस स्थल को भी देखना चाहेंगे, जहां पर माता सीता ने भू-समाधि ली थी। फलस्वाड़ी गांव में माता सीता का भव्य मंदिर बनान के लिए इस क्षेत्र के हार गांव से और हर घर से एक शिला एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपये दान स्वरुप लिए जाएंगे। 
रविदास नगर (भदोई )जिले का सीतामढ़ी मंदिर:-
वह गंगा किनारे एक स्थान पर समाधि ली थी। कहा जाता है कि मां सीता ने तब देखा कि लव और कुश भगवान राम का मुकुट लेकर आए गए तो उनसे रहा नहीं गया और वह दुखी होकर धरती में समा गईं। कुछ लोग बिहार स्थित सीतामढ़ी को उनका समाधि स्‍थल बताते हैं तो कई उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर व संत रविदास नगर में गंगा किनारे उनके रहने और समाध‌ि लेने की बात करते हैं। भदोई जिले का सीता समाहित स्थल सीतामढ़ी मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से ११ किलोमीटर गंगा के किनारे स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर माँ सीता से अपने आप को धरती में समाहित कर लिया था। यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है। स्वामी जितेंद्रानंद जी के असीम प्रयास से और श्री प्रकाश नारायण पुंज की मदद से ये स्थान पर्यटक स्थल के रूप में उभर कर आया है
अयोध्या का राज दरबार:-
 रामायण से जुड़ी अन्य किंवदंतियों के अनुसार लव और कुश के बड़े होने पर जब एक बार भगवान राम ने मां सीता को अपने दरबार में बुलाया और पुन: अपने शुद्धता की शपथ लेने की बात कही। तो मां सीता उनकी इस बात से आहत हो गई और धरती मां से उन्हें अपनी गोद में बैठाने का आग्रह किया। जिसके बाद भरे दरबार में धरती फट गई और मां सीता उनकी गोद में समा गईं। अगर इस किंवदंति को सच माना जाए तो माता सीता ने अयोध्या में समाधि ली थी।

Wednesday, January 12, 2022

विवाह के समय राम और सीता की उम्र

माता सीता के विवाह के लिए रखे गए स्वयंवर में श्री राम ने शिव धनुष को भंग कर माता सीता से विवाह किया था. रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने एक दोहा लिखा है, जिसे राम और सीता की आयु के बीच कितना अंतर था, यह साफ हो जाता है. मगर विवाह के समय दोनों की उम्र कितनी थी इसके बारे में वाल्मीकि रामायण में मालूम चलता है.

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरितमानस में एक दोहा आता है- “वर्ष अठ्ठारह की सिया, सत्ताईस के राम || 
               कीन्हो मन अभिलाष तब, करनो है सुर काम” ||

इस दोहे से यह साफ हो जाता है कि श्री राम और सीता की उम्र के बीच लगभग 9 वर्ष का अंतर था. मगर इनकी शादी किस उम्र में हुई थी. इसके बारे में वाल्मीकि रामायण में बताया गया है कि विवाह के समय भगवान राम की आयु 13 वर्ष और माता सीता की आयु 6 वर्ष थी.

वाल्मीकि रामायण के अनुसार
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, 18 वर्ष की आयु में माता सीता भगवान राम के साथ वन में चली गई थीं. 14 वर्षों के बाद वो वनवास से लौटीं और 33 वर्ष की आयु में अयोध्या की महारानी बनीं. वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में प्रभु राम और माता सीता की उम्र को लेकर एक प्रसंग मिलता है. इस प्रसंग में सीता, साधु के रूप में आए रावण को अपना परिचय इस प्रकार देती हैं.

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुंजना मानुषान् भोगान् सर्व कामसमृद्धिनी।1।
तत्र त्रयोदशे वर्षे राजामंत्रयत प्रभुः।
अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमंत्रिभिः।2।
परिगृह्य तु कैकेयी श्वसुरं सुकृतेन मे।
मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्।3।
द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।
मम भर्ता महातेजा वयसा पंचविंशक:।
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।।

वनवास के समय की आयु:-
सीता रावण से कहती हैं कि विवाह के बाद 12 वर्ष तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी सुख भोगे हैं. मैं वहां सदा मनोवांछित सुख- सुविधाओं से संपन्न रही हूं. इसके बाद वो कहती हैं कि वन जाते समय मेरे पति की आयु 25 साल थी और मेरे जन्म काल से लेकर वन के लिए प्रस्थान के वक्त तक मेरी अवस्था वर्ष गणना के अनुसार 18 साल की हो गई थी.