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Sunday, August 16, 2026

“वंदे मातरम” की 150 साल की कहानी✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


1875 में श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला ‘वंदे मातरम’ अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का जयघोष बन गया था। 1937 में इसके दो छंद ही राष्ट्रीय आयोजनों तक सीमित कर दिये गए थे।1950 में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा  मिला पाया है।

150 साल के इस सफर में इस गीत ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं।अब 2026 में पूरे छह छंद फिर चर्चा में आ गया है । इसे अपना असली स्वरूप और मान्यता मिल पाया है। करीब 150 साल पहले लिखे गए इन दो शब्दों ने भारत की आजादी की लड़ाई में ऐसा रंग भरा कि यह गीत धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की पहचान बन गया। जुलूस निकले तो “वंदे मातरम” के नारे लगे। आंदोलन हुए तो इसकी आवाज सुनाई दी। अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की तो आंदोलन कारियों ने और जोर से गाया। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।  पूरे गीत के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद भी रहा। इसी वजह से सार्वजनिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में लंबे समय तक इसके शुरुआती दो छंद ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

अब 2026 में ‘वंदे मातरम’ फिर चर्चा में आ गया है। केंद्र सरकार ने इसी साल फरवरी में पहली बार राष्ट्रीय गीत के लिए विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल जारी किया है। इसके मुताबिक, जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों किसी कार्यक्रम में गाए या बजाए जाएंगे, तो पहले “वंदेमातरम” और उसके बाद “जन गण मन” होगा। आधिकारिक छह-छंद वाले संस्करण की अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड है। इसे आधिकारिक मौकों पर बजाने या गाने के दौरान सभा को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने की हिदायत दी गई है। 

हाल ही 2026 में समाप्त हुए मानसून सत्र के दौरान सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव किया है। संसद से ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। अब “वंदे मातरम” को “राष्ट्रीय गान” के साथ कानूनी संरक्षण मिला है।जानबूझकर इसके गायन को रोकने या इसमें बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। 26 मार्च 2026 से आकाशवाणी ने भी अपने सुबह के प्रसारण में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे करीब 65 सेकंड के दो-छंद वाले संस्करण की जगह छह-छंद वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण प्रसारित करना शुरू किया। और अब 15 अगस्त 2026 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस समारोह में “वंदे मातरम” राष्ट्रगान से पहले गाया गया। 

वंदे मातरम 1875 में लिखा गया-

वंदे मातरम के रचयिता बंगाल के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना। सरकार केवल प्रारंभिक 2 छंद ही प्रसारित कराती है। शेष 4 छंद नेहरू जी के जमाने से ही मुस्लिम लींग की आपत्ति के कारण प्रतिबंधित रहे हैं । इसे पूरा दिखाने में स्वतंत्र भारत में अब किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

वंदे मातरम’ का सरल अर्थ है- ‘मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।’ यहां मां से आशय मातृभूमि से है। आनंदमठ की कहानी संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें ‘संतान’ कहा गया है। ये लोग अपनी मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करते हैं। इसी कहानी में ‘वंदे मातरम’ गीत आता है। गीत में मातृभूमि को मां के रूप में देखा गया है और उसकी धरती, हरियाली, पानी, फसल और सुंदरता का वर्णन किया गया है।

1896 में पहली बार कांग्रेस के मंच पर गूंजा वंदे मातरम -

वंदे मातरम को राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी पहचान 1896 में मिली। कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहां रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम गाया। यही वह समय था जब यह गीत साहित्य की दुनिया से निकलकर देश के राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनने लगा। इसके बाद कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों में भी ‘वंदे मातरम’ की मौजूदगी बढ़ती गई।

1905 में वंदे मातरम नारे में बदल गया-

वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से ‘वंदे मातरम’ सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।

अक्टूबर 1905 में'वंदे मातरम संप्रदाय' बना -

वंदे मातरम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। अक्टूबर 1905 में उत्तरी कलकत्ता में 'वंदे मातरम संप्रदाय' नाम से एक समूह बनाया गया। इसके सदस्य हर रविवार प्रभात फेरियां निकालते और वंदे मातरम गाते थे। वे मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इन प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ ठाकुर भी शामिल होते थे। यानी गीत अब किताब और कांग्रेस के मंच से आगे निकलकर आम लोगों के बीच पहुंच चुका था।

अंग्रेजों ने 'वंदे मातरम' पर की सख्ती-

ब्रिटिश सरकार को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि वंदे मातरम लोगों को आंदोलन से जोड़ रहा है। इसीलिए इसे रोकने की कोशिश शुरू हुई। नवंबर 1905 में बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया। उन पर वंदे मातरम का जाप करने का आरोप था। पूर्वी बंगाल में स्कूल-कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या इसका नारा लगाने पर रोक लगाने वाले आदेश भी जारी किए गए। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। जिस गीत को रोकने की कोशिश की गई, उसकी आवाज और दूर तक पहुंचने लगी।

1906 में बारीसाल सम्मेलन में इस नारे पर रोक -

1906 में बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों का जुलूस एकत्र हो गया था।अप्रैल 1906 में बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम के नारे लगाने पर रोक लगा दी। सम्मेलन को भी रोक दिया गया। इसके बावजूद प्रतिनिधियों ने नारे लगाना जारी रखा और पुलिस की कार्रवाई का सामना किया। इसके बाद 20 मई 1906 को बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने वंदे मातरम के झंडे लेकर जुलूस निकाला। खास बात यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग शामिल थे। यह घटना बताती है कि शुरुआती दौर में ‘वंदेमातरम’ को लेकर आंदोलन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी भी थी।

1907-08 में देश के दूसरे हिस्सों में भी गूंजा -

‘वंदे मातरम’ का असर बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1907 में लाहौर में युवाओं के प्रदर्शनों में इसके नारे लगे। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में मजदूर आंदोलन के दौरान भी ‘वंदे मातरम: के नारे सुनाई दिए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मुकदमे के दौरान मुंबई में भी बड़ी संख्या में लोगों ने वंदे मातरम गाकर उनके प्रति समर्थन जताया। यानी बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में वंदे मातरम देश के अलग-अलग हिस्सों में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन चुका था।

पूरे ‘वंदे मातरम’ में विवाद का कारण-

यहीं से ‘वंदे मातरम’ की कहानी का सबसे संवेदनशील अध्याय शुरू होता है। ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता, हरियाली, पानी, फसल और मां के रूप में देश की तस्वीर दिखाई गई है। लेकिन बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों का जिक्र आता है। यही हिस्से बाद में विवाद का कारण बने। कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इन हिस्सों पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि सार्वजनिक राष्ट्रीय गीत में ऐसे धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सभी समुदायों के लिए सहज नहीं होगा। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब 1930 के दशक में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा समुदायों को साथ लेकर कैसे चलाया जाए।

वंदे मातरम’ के छंद कब और क्यों विवादित हुआ -

1930 के दशक में जब मोहम्मद अली जिन्ना की धर्म आधारित राजनीति उभार पर थी, तब ‘वंदे मातरम’ का विरोध शुरू हो गया। खासकर ‘वंदे मातरम’  के आखिरी चार छंदों को धार्मिक बताकर मुस्लिमों ने इसका विरोध किया। यह वही समय था, जब जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के अलग अधिकारों की वकालत की थी। बताया जाता है कि कांग्रेस ने अपने स्वतंत्रता आंदोलन को एकजुट रखने के लिए ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ दो ही छंदों के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। 1937 के फैजाबाद अधिवेशन में सीडब्ल्यूसी ने इससे जुड़ा प्रस्ताव पेश किया और कहा कि ‘वंदे मातरम’ के जो दो छंद सबसे ज्यादा गाए जाते हैं, उन्हें ही राष्ट्रीय आयोजनों में आगे गाया जाएगा। 

2003 में प्रकाशित हुई ‘वंदे मातरम’ किताब :-

द बायोग्राफी ऑफ अ सॉन्ग लिखने वाले सब्यसाची भट्टाचार्य के मुताबिक, 1937 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली एक समिति के मार्गदर्शन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कविता के उन हिस्सों को हटाने का फैसला किया, जिनमें खुले तौर पर मूर्ति पूजा वाले संदर्भ थे। इसी प्रारूप को बाद में संविधान सभा ने भी स्वीकार किया था।

1950 में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान, और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला ।

देश आजाद हो चुका था। अब सवाल था कि आजाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीक क्या होंगे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में इस पर फैसला हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान और दर्जा दिया जाएगा। 

वंदे मातरम’और ‘जन गण मन’ दोनों का महत्व कम नहीं -

वंदे मातरम आजादी के आंदोलन में बेहद लोकप्रिय था। लेकिन संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के बजाय राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। राष्ट्रगान के तौर पर जन गण मन को स्वीकार किया गया। वंदे मातरम को भी कम महत्व नहीं दिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि इसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा। इसलिए दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व दोनों का बहुत बड़ा है।

प्रथम छंद

वंदे मातरम्।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्।

वंदे मातरम्।।


इसमें मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है। जल से परिपूर्ण (सुजला), फलों से उपजाऊ (सुफला), मलय की हवाओं से शीतल और हरी-भरी फसलों से सुशोभित माँ (मातृभूमि) को प्रणाम है।

द्वितीय छंद

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्,

सुहासिनीं मधुरूभाषिणीम्,

सुखदां वरदां मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


चाँदनी रात की सुंदरता, खिले हुए फूलों वाले वृक्षों और माँ की मीठी हँसी व मधुर वाणी का वंदन किया गया है, जो सुख और वरदान देने वाली है।

तृतीय छंद 

कोटिकोटिकण्ठकलकल निनादकराले,

कोटि कोटि भुजैधृत खरकरवाले,

के बाले मा तुमि अबले,

बहुबलधारिणीं नमामी तारिणीम्,

रिपुदलवारिणीं मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


यह मातृभूमि की शक्ति और उसके रक्षक स्वरूप को समर्पित है। करोड़ों कंठों की आवाज़ और करोड़ों हाथों में तलवारें हैं; माँ अपने बाहुबल से शत्रुओं का नाश करने वाली और तारिणी (पार लगाने वाली) है।

चतुर्थ छंद

तुमि विद्या, तुमि धर्म,

तुमि हृदि, तुमि मर्म,

त्वं हि प्राणाः शरीरे।

बाहुते तुमि मा शक्ति,

,हृदये तुमि मा भक्ति,

तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।।

वंदे मातरम्।।


इसमें आध्यात्मिक व भक्ति भाव झलकता है। मातृभूमि ही विद्या, धर्म, हृदय और मर्म है; शरीर के प्राण है। भुजाओं में शक्ति और हृदय में भक्ति बनकर आप ही हर मंदिर में विराजमान हैं।

पञ्चम छंद

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,

कमला कमलदल विहारिणी,

वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,

नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,

सुजलां सुफलां मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


माँ को विभिन्न देवियों का स्वरूप – दस शस्त्रों को धारण करने वाली माँ दुर्गा, कमल पर विहार करने वाली कमला (लक्ष्मी) और विद्या देने वाली वाणी (सरस्वती) के रूप में नमन किया गया है।

षष्ठम छंद

श्यामलाम् सरलाम्  सुस्मिताम्भूषिताम्,

धरणीम् भरणीम् मातरम्।।

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्।।


यह अंतिम छंद मातृभूमि के सौम्य, सरल, सुंदर और पालनहार रूप को समर्पित है। सभी का भरण-पोषण करने वाली और वसुंधरा (धरणी) रूपी इस माता को शत-शत नमन है।



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA (मोबाइल नंबर +91 9412300183)