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Sunday, June 18, 2023

अमेरिकी प्रभाव वाला नहीं भारतीय संस्कृति वाला पितृ दिवस मनाएं --- डा. राधे श्याम द्विवेदी

हमारा समाज और पिता की भूमिका :-
समाज केवल स्त्री को ही स्त्री नहीं बनाता बल्कि एक पुरुष को भी पुरुष बनने और बने रहने को बाध्य करता है। पुरुषत्व के कारण एक पुरुष दहाड़ मारकर रो नहीं सकता, सिसक नहीं सकता, गृहस्थी में हाथ बंटा नहीं सकता, बच्चों और अपनी पत्नी के प्रति प्रेम की अभिवयक्ति खुलकर नहीं कर सकता क्योंकि इसकी इजाजत उसे समाज नहीं देता। समाज पुरुष को कठोर बने रहने, भावनाओं को काबू मे करने, परिवार को, समाज को यहां तक की देश को नियंत्रण मे रखने की शिक्षा देता है। 
       पिता पेड़ की वो छाँव है जिसमे बच्चे आराम से पलते है। बाहर से सख्त और कठोर दिल के दिखने वाले पिता हमारे दोस्त और गुरु दोनों होते हैं। उनकी सलाह से हमेशा आगे बढ़ने की सीख मिलती है। पिता एक ऐसा शब्द जिसके बिना किसी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह एक ऐसा पवित्र रिश्ता जिसकी तुलना किसी और रिश्ते से नहीं हो सकती है । बच्चा का पहला शब्द माँ हो सकता है लेकिन ऊँगली वो पिता का ही थामता है और उसकी बाँहों में रहकर बहुत सुकून पाता है।
365 दिन ताउम्र जिंदगी में पिता का स्थान अति उत्तम है:-
गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में लिखा है _
गुर पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥
गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राण के समान करनी चाहिए। ये सेवा और त्याग को केवल एक दिन फादर्स डे में नही समेटा जा सकता है अपितु इसके लिए 365 दिन यानी ताउम्र जिंदगी भी कम है। हम पाश्चात्य अमेरिका का नकल कर एक दिन पिता को सम्मान देकर अपना कर्तव्य पूर्ण मान लेते हैं और अपने शास्त्र परंपरा और संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। अमेरिका के ईसाई परिवार ने इस परम्परा का शुरुवात किया था।
पाश्चात्य अमेरिका प्रभाव वाला फादर्स डे :-
फादर्स डे हर वर्ष भीषण गर्मी के जून महीने के तीसरे रविवार को मनाया जाता है. यह दिन पिता और उनके प्यार और त्याग के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित है. पिता परिवार के वह सदस्य होते हैं जिनके बच्चे के पालन-पोषण में योगदान की अक्सर अनदेखी की जाती है. बिना किसी शिकायत के वे हर वो काम करते हैं जो उनके बच्चों और परिवार के लिए जरूरी होता है. एक पिता अपने परिवारों को स्वस्थ और खुश रखने के लिए दिन-रात काम करते हैं। इन अनजाने प्रयासों को अक्सर हल्के में लिया जाता है और उनकी जिम्मेदारियों में बदल दिया जाता है.  
     फादर्स डे को सबसे पहले यूएसए में सोनोरा स्मार्ट डोड द्वारा प्रस्तावित किया गया था. साल 1909 में एक अमेरिकी लड़की सोनोरा स्मार्ट डोड ने पिता के सम्मान के लिए एक विचार का प्रस्ताव रखा. कई स्थानीय पादरियों ने इस विचार को स्वीकार किया, और 19 जून, 1910 को सोनोरा स्मार्ट डोड द्वारा स्पोकेन, वाशिंगटन में पहला फादर्स डे समारोह मनाया गया. 
     भारत में Father’s Day का मूल रिवाज नहीं है, बल्कि इसे पश्चिमी देशों के प्रभाव से मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई आदि जैसे कुछ बड़े शहरों में मनाया जाता है. दुनिया भर में Fathers Day अपने पिता को यह बताने के लिए होता है कि वे उनके जीवन में कितना महत्व रखते हैं साथ ही यह दिन पिता को धन्यवाद करने और उन्हें सम्मानित करने के मकसद से मनाया जाता है। अपने पापा को विशेष महसूस कराने के लिए, या मृत पिता को श्रध्दांजलि देने के लिए या उन्हें याद करते हुए भी पिता दिवस मनाया जा सकता है।
 भारत में सर्वपितृपक्ष अमावस्या को विसर्जनी या महालया अमावस्या भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, 16 दिन से धरती पर आए हुए पितर इस अमावस्या के दिन अपने पितृलोक में पुनः चले जाते हैं. पितृ विसर्जन के दिन पवित्र नदी में स्नान कर तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध कर कर पितरों को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है. 
माता-पिता और गुरु तीनों का सर्वोच्च स्थान:-
हमारे सनातन ग्रन्थों में माता-पिता और गुरु तीनों को ही देवता माना गया है। जिस स्थूल जगत् में हम हैं, उसमें वही हमारे वास्तविक देवता हैं। इनकी सेवा और भक्ति में कसर रह जाए तो फिर ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं। और अगर हमने इनकी सेवा पूरे मन से की तो भगवान स्वयं कच्चे धागे से बंधे भक्त के पीछे-पीछे चल पड़ते हैं। आखिर श्रवण कुमार में ऐसा क्या ख़ास था कि किसी भी भगवान से उनकी अहमियत कम नहीं है। माता-पिता की भक्ति और सेवा ने उसे भक्त प्रह्लाद और ध्रुव के बराबर का आसन दिलाया है।