क्या अयोध्या मंदिर के चंदे का विवाद 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों को प्रभावित करेगा ?
( Courtesy: ‘The New Indian Express' 18 June 2026)उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही, अयोध्या राम मंदिर में कथित दान अनियमितताओं की जांच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है और चुनावी चर्चाओं को प्रभावित कर सकती है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है , ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अयोध्या राम मंदिर में श्रद्धालुओं के दान के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं की जांच का परिणाम राजनीतिक परिदृश्य को आकार दे सकता है और चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
जो मामला प्रारंभिक जांच के रूप में शुरू हुआ था, वह अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदल गया है , जिसके चलते एसआईटी जांच शुरू की गई है, एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है, विपक्षी दलों द्वारा आलोचना की गई है और मामले की न्यायिक निगरानी की मांग की गई है।
जांचकर्ता न केवल इस दावे की जांच कर रहे हैं कि 5 करोड़ से 7 करोड़ रुपये के बीच की राशि का गबन किया गया हो सकता है, बल्कि उन आरोपों की भी जांच कर रहे हैं कि भारत और विदेश के भक्तों द्वारा दान की गई सोने, चांदी और हीरे जड़ी लगभग 1,250 बहुमूल्य श्री राम शिलाएं गायब हो गई हैं।
यह सब राम मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों से शुरू हुआ, जिन्होंने दावा किया कि राम मंदिर में प्राप्त दान के प्रबंधन में अनियमितताएं थीं। सिंह ने आरोप लगाया कि आंतरिक स्तर पर चिंताएं उठाई गईं, लेकिन उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इन आरोपों को आगे बढ़ाते हुए, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को उठाया और आरोप लगाया कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए करोड़ों रुपये गायब हो गए हैं।
अयोध्या में स्थित राम मंदिर इस वक्त चर्चाओं में है। मंदिर परिसर के दानपात्रों से 'गबन' का आरोप इस चर्चा की वजह है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है।
कब से कब तक हुआ राम मंदिर में दान राशि का गबन?
आरोप है कि राम मंदिर के दान की राशि में गबन का यह सिलसिला करीब सवा साल तक बेरोकटोक चल रहा था। दान की रकम पार करने वाले संदिग्ध नियमित रूप से दानपात्रों से इकट्ठा रकम इधर से उधर कर रहे थे। कुछ मौकों पर ये हेरफेर अपने चरम पर रही।
महाकुंभ और माघ मेले के दौरान: पिछले साल हुए महाकुंभ और इस साल माघ मेले के समय जब प्रयागराज से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु अयोध्या दर्शन के लिए भी पहुंचे, तो चढ़ावे की राशि में बेशुमार बढ़ोतरी हुई। कथित गबन करने वालों के लिए यह समय बहुत सुनहरा साबित हुआ और गिनती करने वाले लोगों ने इसका फायदा उठाते हुए एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक चंदे की राशि से पार किए।
आखिरी के महीनों में ज्यादा गबन:
यह बात भी सामने आई कि पकड़े जाने से ठीक पहले, यानी आखिरी के कुछ महीनों में इन कर्मचारियों द्वारा बहुत बड़ी-बड़ी रकम पार की गई थी। इस तरह महाकुंभ से शुरू हुई यह चंदा चोरी लगातार सवा साल तक चलती रही और अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद किसी को इसकी भनक तक नहीं लग पाई। सोशल मीडिया पर गबन की गई राशि 200 करोड़ से लेकर 1400 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है।
कैसे हुआ राम मंदिर से इतना बड़ा गबन?
राम मंदिर से दान राशि का इतना बड़ा गबन किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था, बल्कि यह नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, सुरक्षा में भारी चूक और गिनती की प्रक्रिया में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर किया गया एक सुनियोजित खेल था।
1. नियुक्तियों में खेल और 'टिन्नू' का नेटवर्क
मंदिर को हर दिन मिलने वाले चढ़ावे की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को मिली थी। हालांकि, बैंक ने चंदा गिनने वाले कर्मचारियों को एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से रखा था। इसमें खेल यह किया गया कि कंपनी में वही लोग चंदा गिनने के लिए रखे गए, जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। ये लोग ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों के रिश्तेदार या परिचित थे। इसमें 'टिन्नू' नाम के व्यक्ति की मुख्य भूमिका सामने आई है, जिसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए करीब 35 से 40 अपने ही लोगों को नौकरी पर रखवा लिया था।
2. गिनती के दौरान ही पार होती थी रकम
चोरी का तरीका बेहद शातिराना था। गिनती शुरू करने से पहले सभी दानपात्रों को खोलकर पूरी रकम एक जगह इकट्ठा कर ली जाती थी, जिससे पहले से यह पता नहीं रहता था कि कुल कितनी रकम है। इसी का फायदा उठाकर कर्मचारी गिनती के दौरान ही रकम पार कर देते थे। अंत में जोड़-घटाकर जो रकम बचती, उसी का विवरण दर्ज कर दिया जाता था, जिससे चोरी पकड़ में नहीं आती थी।
3. बिना तलाशी के कर्मियों की आवाजाही
मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से रखे गए ये कर्मचारी गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के कोने-कोने तक बेखौफ आते-जाते थे। सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो कोई तलाशी ली जाती थी और न ही इनका सत्यापन किया गया था। आरोप है कि महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब चढ़ावा कई गुना बढ़ गया था, तो इसका फायदा उठाकर इन चोरों ने लंबी गिनती का फायदा उठाया और एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार कर दिए।
4. कम वेतन की आड़ में बड़ा खेल
पकड़े गए कर्मचारी मात्र 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम कर रहे थे। इतने कम वेतन के बावजूद वे दिन-रात मंदिर में लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उन्हें वेतन से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वे चढ़ावे की करोड़ों की रकम पार कर रहे थे। चूंकि ये कर्मचारी ट्रस्ट की सिफारिश पर रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों ने भी इनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए। इस पूरे मामले में बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
5. सीसीटीवी और निगरानी तंत्र की विफलता
भले ही परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन निगरानी व्यवस्था और ऑडिट पूरी तरह से अप्रभावी रहे। वास्तव में सीसीटीवी कैमरों ने घटनाओं को रिकॉर्ड किया था, लेकिन रियल-टाइम मॉनिटरिंग न होने के कारण चोरी का तुरंत पता नहीं चला। अब एसआईटी की जांच शुरू होने के बाद इन सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में कब्जे में लिया गया है, जिनसे मामले में कई अहम खुलासे होने के अनुमान हैं। हालांकि, ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि आठ महीने के सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिए गए थे।
राम मंदिर में गबन के मामले का खुलासा कैसे हुआ?
राम मंदिर में चल रहे गबन के इस बड़े मामले का खुलासा मुख्य रूप से दो चरणों में हुआ। बताया जाता है कि चढ़ावे की राशि में हेरफेर की भनक लगी, तो व्यवस्था की निगरानी की गई और तब जाकर इस पूरे खेल का उजागर हुआ। हालांकि, प्रकरण के सामने आने के बाद शुरुआत में ट्रस्ट ने इस मामले को बेहद गोपनीयता के साथ दबाए रखा था।
अखिलेश यादव के आरोप
इस विवाद ने सार्वजनिक रूप से तब तूल पकड़ा जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दान के करोड़ों रुपये गायब होने का खुला आरोप लगाया। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट करते हुए कहा था कि चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पाई गई है, जो बेहद शर्मनाक है। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग भी की।
अखिलेश यादव के आरोपों के बाद यह मामला धीरे-धीरे उजागर होना शुरू हुआ। इसके बाद अयोध्या से लेकर पूरे देश में राम मंदिर में सवा साल तक चले इस गबन को लेकर हड़कंप मच गया। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने शुरुआत में चुप्पी साध ली। मामले के बाहर आने पर ट्रस्ट ने खुद ही गोपनीय स्तर पर संदिग्ध कर्मचारियों को पकड़ा और उनसे पूछताछ की। विवाद बढ़ने लगा तो ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की। इसके बाद राज्य सरकार की तरफ से विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया, जो अब मंदिर पहुंचकर इस पूरे घोटाले की गहन तफ्तीश कर रही है।
किस-किस पर इस घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे हैं?
राम मंदिर के दान घोटाले में अब तक कई स्तर पर लोगों के शामिल होने के आरोप और संदेह सामने आए हैं।
चंदा गिनने वाले पांच मुख्य कर्मचारी:
इस गबन को सीधे तौर पर अंजाम देने में मुख्य रूप से पांच कर्मचारियों- लवकुश मिश्रा, अवनीश, अनुकल्प, करुण (या करुणे) और रमाशंकर के नाम सामने आए हैं। इन्होंने चोरी कुबूल की है और इन्हीं की निशानदेही पर अब तक करोड़ों रुपये की रिकवरी की जा चुकी है। लवकुश के घर से करीब 10-12 लाख रुपये और अवनीश के बैंक खाते से 5 लाख रुपये बरामद किए गए हैं।
'टिन्नू' और उसकी तिकड़ी:
इस पूरे खेल के मुख्य सूत्रधार के रूप में टिन्नू, उसके बेटे और भतीजे की तिकड़ी की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। टिन्नू ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी का बेहद करीबी है और उसने अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल करके करीब 35-40 अपने परिचितों को चंदा गिनने के काम पर रखवाया था। पकड़े गए पांच कर्मचारियों में शामिल रमाशंकर भी टिन्नू का ही रिश्तेदार है। टिन्नू का भतीजा तो मामले के पहले ही दिन पकड़ लिया गया था।
जांच में पता चला है कि टिन्नू के पास अयोध्या और लखनऊ में करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्तियां हैं। वह कभी ऑटो रिक्शा चलाता था। अयोध्या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास उसका एक 70 कमरों वाला छात्र छात्रावास भी है। एसआईटी जल्द ही इस छात्रावास की भी जांच कर सकती है।
पदाधिकारियों के रिश्तेदार और मध्यस्थ:
जांच में यह भी सामने आया है कि हेरफेर में ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी के भतीजे की भी शुरुआती भूमिका थी, जिसकी शह पर अन्य लोग चोरी को अंजाम दे रहे थे, हालांकि बाद में टिन्नू ने उसे किनारे करवा दिया था। इसके अलावा रवि मिश्रा का नाम भी सामने आया है, जो आरोपी लवकुश का रिश्तेदार (समधी) है और उसी ने लवकुश को मंदिर में काम पर लगवाया था।
सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर सोमेश आनंद भी आया है। वह मंदिर निर्माण के मुख्य प्रभारी गोपाल राव का कथित भतीजा बताया जा रहा है। सोमेश ने एक साल में देश के विभिन्न राज्यों की 50 से अधिक संदिग्ध यात्राएं की हैं। वह अयोध्या रेलवे स्टेशन से बोरों में भारी सामान भरकर ट्रेन से दक्षिण भारत जाता था। वापसी में वह हवाई जहाज से खाली हाथ अयोध्या लौटता था। फिलहाल सोमेश के बैंक खातों और हवाई टिकटों की बारीकी से जांच की जा रही है।
इस मामले में केडी तिवारी का नाम भी सामने आया है। उनके पास रामलला के आभूषणों को संभालने की मुख्य प्रशासनिक जिम्मेदारी थी। सुरक्षा अधिकारियों ने उनके आवास पर भी छापेमारी की थी। केडी तिवारी द्वारा हाल ही में खरीदी गई डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन का सौदा जांच के दायरे में है। उन्होंने मीडिया से कहा, "मेरी ड्यूटी महज श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए आभूषणों को तौलकर उन्हें रसीद देने तक सीमित थी, उसके बाद मैं उसे ट्रस्ट के वरिष्ठों को सौंप देता था; आगे गहनों के साथ क्या खेल होता था, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है।
वीट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी: सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कई बड़े पदाधिकारी भी शक और जांच के घेरे में हैं। मंदिर की व्यवस्थाओं और चढ़ावे की गिनती के लिए मुख्य रूप से चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे पदाधिकारी जिम्मेदार हैं। इसके बावजूद चढ़ावे की रकम का गबन होना कई सवाल खड़े कर रहा है। ये सभी जिम्मेदार घटना के उजागर होने के बाद से खामोश हैं। एक भी पदाधिकारी की तरफ से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया।। एसआईटी यह जांच कर रही है कि क्या इस गबन में शीर्ष स्तर से कोई संरक्षण या मिलीभगत तो नहीं थी।
बैंक अधिकारी और कर्मचारी:
इस पूरी हेराफेरी में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। बैंक ने जिस आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए कर्मचारियों को रखा, उसमें वही लोग भर्ती किए गए जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। बैंक अधिकारियों ने इन सिफारिशी कर्मचारियों के काम और ऑडिट पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया, जिससे उनकी मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता।
कितनी राशि के गबन की हो रही बात?
राम मंदिर से गबन की गई राशि का कोई एक सटीक और आधिकारिक आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है, क्योंकि चंदा चोरों ने बहुत ही शातिराना तरीके से गिनती होने से पहले ही रकम पार कर दी थी। गिनती के बाद जो रकम बचती थी, केवल उसी का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता था, इसलिए कुल कितने रुपये चोरी हुए, इसका सटीक अंदाजा लगाना जांच एजेंसियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
शुरुआती जांच और पकड़े गए संदिग्धों से पूछताछ के आधार पर आठ करोड़ रुपये से अधिक के हेरफेर के सीधे संकेत मिले हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ (लगभग 200 करोड़ रुपये) तक पहुंचने की बात कही जा रही है। हालांकि, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
चौंकाने वाली बात यह है कि चोरी केवल नकदी तक सीमित नहीं थी। दान में आए करोड़ों रुपये के सोने-चांदी के जेवरात भी गायब किए जाने के आरोप लगे हैं। चर्चा तो यह भी है कि असली सोने के आभूषणों को हटाकर उनकी जगह नकली जेवरात रख दिए गए और यहां तक कि दान में मिली दो किलो की सोने की गदा भी गायब बताई जा रही है।
अब कैसे चल रही इस कथित गबन की जांच?
मामले में अब उच्च स्तरीय जांच की जा रही है। इसके लिए एसआईटी का गठन हुआ। इस दल में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज लखनऊ किरन एस और विशेष वित्त सचिव नील रतन शामिल हैं। सरकार ने एसआईटी को सात दिन के भीतर अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और 15 दिन में अंतिम (फाइनल) रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश दिया है।
अभी कहां तक पहुंची एसआईटी की जांच
टीम ने मंदिर परिसर स्थित ट्रस्ट के कार्यालय पहुंचकर दान राशि से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड, दस्तावेज और वित्तीय अभिलेख अपने कब्जे में ले लिए हैं।एसआईटी ने घटना से जुड़े अहम सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के तौर पर कब्जे में लिया है। टीम ने इस बात की भी बारीकी से जांच की है कि दानपात्र कहां रखे जाते हैं, गिनती से पहले उन्हें किस कमरे में ले जाया जाता है और वहां निगरानी की क्या व्यवस्था है।
एसआईटी ने पकड़े गए संदिग्ध कर्मचारियों से पूछताछ करने के साथ-साथ बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी तलब किया है।बैंक कर्मियों से विशेष रूप से यह पूछा जा रहा है कि गिनती करने वाले कर्मचारियों की भर्ती किस तरह और किसकी सिफारिश पर की गई थी।
यह जांच केवल वित्तीय हेरफेर तक सीमित नहीं है। एसआईटी यह भी गहराई से खंगाल रही है कि क्या इस गबन के पीछे किसी बड़े पदाधिकारी, ट्रस्टी याशक्तिशाली व्यक्ति का संरक्षण, मिलीभगत या लापरवाही थी। बताया गया है कि किसी ट्रस्टी की संलिप्तता या गंभीर प्रशासनिक चूक पाई जाती है, तो उनके अधिकार सीमित किए जा सकते हैं।
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, इस जांच के दो मुख्य पहलू हैं- पहला इस आपराधिक कृत्य की तह तक जाना और दूसरा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तंत्र स्थापित करना।
अखिलेश यादव ने जांच की मांग की:-
"भक्तों की आस्था सर्वोपरि है। भगवान राम के नाम पर चढ़ाया गया हर रुपया भक्तों का है। सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए," अखिलेश यादव ने हाल ही में इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए यह बात कही ।
उनके आरोपों ने एक तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी, जिसमें विपक्षी दलों ने मंदिर प्रशासन पर दान के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया। मंदिर के कर्मचारियों द्वारा कथित तौर पर अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने की खबरें सामने आने के बाद यह मुद्दा राजनीति से परे जाकर तेजी से फैल गया, जिसके चलते उत्तर प्रदेश सरकार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करना पड़ा।
एसआईटी की चल रही जांच:-
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, ध्यान लेखा अभिलेखों से हटकर मंदिर की दान प्रबंधन प्रणाली की कार्यप्रणाली पर केंद्रित हो गया। एसआईटी ने चढ़ावे की गिनती के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों से पूछताछ की, सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा की और भक्तों द्वारा जमा की गई नकदी, आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुओं की सुरक्षा प्रक्रिया की जांच की। सूत्रों ने बताया कि जांचकर्ताओं ने विशेष रूप से यह जानने की कोशिश की कि क्या दान की गिनती में शामिल कर्मचारियों की संग्रह केंद्रों से निकलते समय तलाशी ली जाती है, मूल्यवान वस्तुओं की आवाजाही की निगरानी कौन करता है और क्या सीसीटीवी निगरानी प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर रही है।
एक अहम मोड़ तब आया जबजांचकर्ताओं ने मंदिर के कर्मचारी तिन्नू सिंह के घर से नकदी बरामद की। तिन्नू सिंह मंदिर के कामकाज से जुड़ने से पहले ऑटो-रिक्शा चालक का काम करते थे। इस बरामदगी से दान-संग्रह से जुड़े कर्मचारियों की जांच तेज हो गई और निगरानी तंत्र पर नए सवाल खड़े हो गए। जांचकर्ता दान-संग्रह से जुड़े अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं और खबरों के अनुसार वे वित्तीय लेनदेन, संपत्ति अधिग्रहण और आवागमन के रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि राम शिलाओं के लापता होने के आरोपों के सामने आने के बाद विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया। सोने और चांदी की ये ईंटें या 'शिलाएं' राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में एक विशेष स्थान रखती हैं।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में, भारत और विदेशों से भक्तों ने आंदोलन में भागीदारी के प्रतीक के रूप में भगवान राम के नाम से खुदी हुई विशेष रूप से निर्मित ईंटें भेजीं। इनमें से अधिकांश प्रतीकात्मक थीं, जबकि कुछ कीमती धातुओं से बनी थीं या रत्नों से जड़ी थीं।
कीमती शिलाओं का अब पता नहीं लगाया जा सकता :-
आरोपों के अनुसार, ऐसी 1000 से अधिक बहुमूल्य शिलाएँ अब लापता हैं। इनमें मॉरीशस से भेजी गई सोने की परत चढ़ी राम शिला और मुंबई के एक व्यवसायी द्वारा दान की गई हीरे जड़ी शिला भी शामिल हैं। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो इन शिलाओं का गायब होना न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि जनभागीदारी और आस्था पर आधारित इस आंदोलन के लिए एक प्रतीकात्मक झटका भी होगा।
जैसे-जैसे आरोप बढ़ते गए, इस मुद्दे ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग ले लिया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंदिर के दान के प्रबंधन पर बार-बार सवाल उठाए और पूरी पारदर्शिता की मांग की। आरोपों का जिक्र करते हुए यादव ने कहा कि भगवान राम का पैसा लेने वालों को उसे लौटा देना चाहिए और जोर देकर कहा कि भक्तों के चढ़ावे से जुड़ी कोई भी अनियमितता "सनातन धर्म का अपमान" है।
समाजवादी पार्टी ने इस विवाद को जवाबदेही की परीक्षा के रूप में पेश करने की कोशिश की है और तर्क दिया है कि लाखों श्रद्धालुओं से दान प्राप्त करने वाली संस्था जांच से परे नहीं रह सकती। पार्टी नेताओं ने मांग की है कि एसआईटी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं और यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए।
कांग्रेस भी इस बहस में शामिल हो गई और उसने उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में समयबद्ध न्यायिक जांच की मांग की। पार्टी नेताओं ने तर्क दिया कि मंदिर को प्राप्त होने वाले दान की विशाल मात्रा को देखते हुए स्वतंत्र निगरानी आवश्यक है और यदि भक्तों के चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर प्रश्न बने रहते हैं तो केवल न्यायिक जांच ही जनता का विश्वास बहाल कर सकती है।
इस बीच, भाजपा ने एसआईटी जांच का समर्थन करते हुए इस मुद्दे का राजनीति करण करने के प्रयासों को खारिज कर दिया है। वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने जांच समिति गठित करके त्वरित कार्रवाई की है और जोर देकर कहा है कि अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। पार्टी ने विपक्ष पर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है।
इस विवाद में एक और मोड़ जोड़ते हुए, भाजपा के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह ने हाल ही में दावा किया कि उन्हें मामले से संबंधित घटनाक्रमों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से विवरण प्रकट करने से परहेज किया। उन्होंने कहा, "अगर मैं सच बताऊँगा, तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊँगा," उनके इस बयान ने जांच को लेकर अटकलों को और हवा दी।
ट्रस्ट का कहना है कि जांच पूरी होने तक इंतजार करें :-
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट लगातार यही कहता रहा है कि जांच पूरी होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि ट्रस्ट जांचकर्ताओं के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और उनका मानना है कि अटकलों के बजाय एसआईटी जांच के माध्यम से ही तथ्य सामने आने चाहिए। ट्रस्ट के अधिकारियों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि पारदर्शिता सभी के हित में है और जांच से सच्चाई सामने आएगी।
राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े कई लोगों के लिए यह विवाद विशेष रूप से पीड़ादायक है क्योंकि मंदिर का निर्माण दशकों के जन आंदोलन और बलिदान के फलस्वरूप हुआ था। मंदिर आंदोलन से जुड़े एक अनुभवी कारसेवक संतोष दुबे ने कहा कि भक्तों ने न केवल धन दान किया बल्कि रामशिला जैसी भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण भेंट भी चढ़ाईं। उन्होंने कहा, "भक्तों की आस्था सर्वोपरि है। सच्चाई जो भी हो, एक पारदर्शी जांच के माध्यम से सामने आनी चाहिए।"
क्या इस विवाद का असर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा ?
इस विवाद ने आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चर्चा छेड़ दी है। हालांकि आरोपों की अभी जांच चल रही है और किसी भी प्रकार की त्रुटि साबित नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े प्रश्न लगातार चर्चा में बने रहते हैं तो यह मुद्दा सार्वजनिक बहस का विषय बन सकता है।
लखनऊ स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख और राजनीतिक विश्लेषक शशिकांत पांडे ने कहा कि यह विवाद आस्था, शासन और जवाबदेही के संवेदनशील मुद्दों को छूता है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर से जुड़े मुद्दों का उत्तर प्रदेश में भावनात्मक और राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है और चुनाव प्रचार के दौरान अगर ये मुद्दे सुर्खियों में बने रहते हैं तो मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
भाजपा के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीक:-
उन्होंने कहा, “राम मंदिर भाजपा के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीकों में से एक है। यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो इस मुद्दे से शायद लंबे समय तक राजनीतिक नुकसान न हो। हालांकि, यदि जांच में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ावे से संबंधित अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो विपक्ष इसे केवल भ्रष्टाचार के बजाय विश्वास के प्रश्न के रूप में पेश करने का प्रयास करेगा।”
पांडे ने आगे कहा कि सरकारी विभागों से जुड़े भ्रष्टाचार के पारंपरिक आरोपों के विपरीत, मौजूदा विवाद भगवान राम के नाम पर लाखों भक्तों द्वारा किए गए दान से संबंधित है। उन्होंने कहा, "इसका राजनीतिक प्रभाव जांच के नतीजे पर निर्भर करेगा। मतदाता व्यक्तियों द्वारा कथित कदाचार और व्यापक धार्मिक आंदोलन के बीच अंतर कर सकते हैं। साथ ही, विपक्ष इस मुद्दे को जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस में बदलने का प्रयास करेगा।"
विपक्षी दलों ने पहले ही इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी ने मंदिर के दान के प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता की मांग की है, जबकि कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग करते हुए तर्क दिया है कि भक्तों के चढ़ावे के प्रबंधन में जनता का विश्वास सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
वहीं, भाजपा इस जांच को इस बात के सबूत के तौर पर पेश कर सकती है कि अधिकारी आरोपों की जांच करने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर कोई भी गलत काम साबित होता है तो सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और उन्होंने विरोधियों पर धार्मिक आस्था से जुड़े मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है।
फिलहाल, यह विवाद एक सिद्ध घोटाले के बजाय जांच के दायरे में है। हालांकि, उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर के केंद्रीय महत्व को देखते हुए, 2027 के विधानसभा चुनावों पर इसका संभावित प्रभाव काफी हद तक जांच के निष्कर्षों और आने वाले महीनों में मतदाताओं द्वारा इस मुद्दे को किस तरह से देखा जाता है, इस पर निर्भर करेगा।
जनवरी 2024 में राम लल्ला की प्रतिमा की स्थापना के बाद से मंदिर को सैकड़ों करोड़ रुपये के दान के साथ-साथ भारी मात्रा में सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। एसआईटी अब नकद दान, कर्मचारियों के आचरण, सुरक्षा प्रक्रियाओं और लापता सोने, चांदी और हीरे जड़े राम शिलाओं से संबंधित आरोपों की जांच कर रही है, जिससे जांच एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर गई है, जिसमें प्रारंभिक निष्कर्षों के आधार पर कई एफआईआर दर्ज की जा सकती हैं।
(हिंदी में प्रस्तुति: डॉ. राधेश्याम द्विवेदी)