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Monday, March 6, 2023

श्रीकृष्णदास पयहारी ने नाथपंथी संत को शेर से गदहा बनाया ✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी



जाके सिर कर धर्यो तासु कर तर नहीं आद्यो ।
अर्प्यो पद निर्बान सोक निर्भय करि छाड्यो ॥
तेजपुंज बल भजन महामुनि ऊँधरेता ।
सेवत चरणसरोज राय राणा भुवि जेता ॥
दाहिमा बंस दिवसकर उदय संत कमल हय सुख दियो ।
निर्वेद अवधि कलिकृष्णदास अन परिहरी पय पान कियो।।
( भक्तमाल पद संख्या 38 गीता प्रेस)
पयहारी कृष्‍णदास जी गालव-ऋषि आश्रम के प्रसिद्ध संत थे। जयपुर में गलता नाम का एक प्रसिद्ध स्‍थान है, जो गालव-ऋषि का आश्रम "गलता गादी" माना जाता है। आपने आजन्‍म पय (दूध) का ही आहार किया, जिससे आप पयहारीबाबा के नाम से विख्‍यात हैं। आपकी जाति दाहिमा (दाधीच) ब्राह्मण थी। आप बाल ब्रह्मचारी थे। उदासीनता (वैराग्‍य) की तो पयहारी कृष्‍णदास मर्यादा ही थे। भारतवर्ष के छोटे बड़े जितने राजा महाराजा थे, वे सभी आपके श्री चरणों की सेवा करते थे। उन्होंने जिस किसी के शिर पर हाथ रखा उसे बड़ा से बड़ा वरदान दिया। भगवद्भजन में लवलीन रहना, यही आप का रात-दिन का काम था।
वैष्‍णवद्रोही योगियों को चमत्कारिक छवि प्रस्तुत करना:-
भक्ति आंदोलन के पूर्व देश में विशेषत: राजपूताने में नाथपंथी कनफटे योगियों का बहुत प्रभाव था, जो अपनी सिद्धि की धाक जनता पर जमाए रहते थे। जब सीधे सादे वैष्णव भक्ति मार्ग का आंदोलन देश में चला तब उसके प्रति दुर्भाव रखना उनके लिए स्वाभाविक था। कृष्णदास पयहारी जब पहले पहल गलता पहुँचे, तब वहाँ की गद्दी नाथपंथी योगियों के अधिकार में थी। वे रात भर टिकने के विचार से वहीं धूनी लगाकर बैठ गए। पर कनफटे नाथ पंथियों ने उन्हें उठा दिया।  इस पर पयहारीजी ने भी अपनी सिद्धि दिखाई और वे धूनी की आग एक कपड़े में उठाकर दूसरी जगह जा बैठे। कपड़े का न जलना देखकर योगियों के महंथ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बाघ बनकर उनकी ओर झपटा। इस पर पयहारीजी के मुँह से अनायास ये शब्द निकला कि 'तू कैसा गदहा है?' वह महंथ तुरंत गदहा हो गया और फिर लाख कोशिश करके अपने बल से मनुष्‍य न बन सका। उस कनफटों की मुद्राएँ उनके कानों से निकल निकल कर पयहारीजी के सामने इकट्ठी हो गईं और वे सब प्रभावहीन होती गई । आमेर के राजा पृथ्वीराज इसकी दुर्दशा नहीं देख पाये। वे आपकी सेवा में जाकर जब बड़ी प्रार्थना की, तब पयहारी बाबा ने अपनी सिद्धियों के बल पर गदहा बने महंथ को फिर आदमी बनाया । आपने गधे को फिर आदमी बनने की इस प्रकार आज्ञा दी कि- "इस जगह को तुम सब छोड़कर अलग रहो और इस आश्रम की धूनी में लकड़ियाँ पहुँचाया करो।" उन सब नाथ पंथियों ने इस शर्त को  स्‍वीकार किया ।इन्ही ऋषि ने जिस धूनी पर तपस्या की थी, वो धूनी आज तक यहां जल रही है. वहीं उन्होंने नाथ संप्रदाय को निर्देश दिया था कि उसकी धूनी बुझनी नहीं चाहिए और इसलिए ही नाथ संप्रदाय इस धूनी को जलाये रखता है।राजा पृथ्‍वीराज भी पयहारीजी के शिष्य हो गए और गलता की गद्दी रामानंदी वैष्णवों का अधिकार में पुनः आ गया । 
पयोहारी ऋषि की रहस्यमयी गुफा:-
यह रहस्यमयी बातें यही नहीं खत्म होती, धाम में पयोहारी ऋषि एक गुफा में रहते हैं, जो धूनी के ठीक सामने है. कहा जाता है कि ये गुफा पाताल तक जाती है और इसके अंदर जो भी गया, वो कभी वापस नहीं लौटा है, इसलिए ही इस गुफा को बंद कर दिया गया है.
बन में गाय के दूध का दिव्य प्रबंध:-
वन में गौएँ श्रीपयहारी जी को आप-से-आप दूध देती थीं।
जब वे कुल्लू के पहाड़ी की एक गुफा में भजन करने लगे तो दूध का प्रबंध नहीं था। वहां ग्वालों के गायों के समूह की एक गाय वहां आ जाती और स्वम दूध देने लगती। बाबा उसे अपने कमंडल में रख लेते और पी जाते। गाय अपने झुंड में रोज चली जाती थी।एक दिन गाय का मालिक ग्वाला गाय को गुफा में जाते देख उसके पीछे चला आया। उसने बाबा का दर्शन कर गाय को बहुत धन्यवाद दिया।बना ने उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने अपने राजा का खोया राज वापस करने को कहा। ग्वाले के माध्यम से राजा आया और विना प्रयास के बाबा की कृपा से अपना राज वापस पा लिया। कुल्लू राज के लोग बाबा के भक्त बन गए।
कुल्लू राजा के बेटे को जीवनदान दिया:-
एक बार पुजारी भगवान का भोग लगाने के लिए जिलेबी लेकर जा रहा था।एक गिरा टुकड़ा राजकुमार ने खा लिया। बिना भोग लगे खाने पर राजा ने तलवार तानकर बच्चे को मारना चाहा। पयहारी बाबा ने बच्चे को बचा लिया।और अपना शिष्य बना लिया। वह बहुत धर्मनिष्ट भगवद भक्त बन गया। पयहारी बाबा ने आमेर की एक गणिका को भी उपदेश दिया था, जिसने परम गति पायी।
चमत्कारिक श्रीद्वारकाधीश के दर्शन का प्रसंग :-
कहते हैं कि एक समय राजा पृथ्‍वीराज जी ने पयहारी जी से श्रीद्वारकाधीश के दर्शन करने के लिये द्वारका चलने की प्रार्थना की। तब आपने राजा की भक्ति देख अपनी यो‍ग-सिद्धि से आधी रात के समय राजमहल में प्रकट हो राजा को श्रीद्वारकाधीश के दर्शन वहीं करा दिये। फिर राजा ने द्वारका चलने को कभी नहीं कहा--
कृष्‍णदास कलि जीति, न्‍यौति नाहर पल दीयो।
अतिथि धर्म प्रतिपालि, प्रकट जस जग में लीयो।।
उदासीनता अवधि, कनक कामिनि नहिं रातो।
राम चरन मकरंद रहत निसि दिन मद-मातो।।
गलतें गलित अमित गुन, सदाचार, सुठि नीति।
दधीचि पाछें दूसरि करी कृष्‍णदास कलि जीति।।

अपने शरीर का दान:-
जैसे दधीचि ऋषि ने देवताओं के माँगने से अपना शरीर दे दिया, ऐसे ही दधीचि-गोत्र में उत्‍पन्‍न स्‍वामी श्रीकृष्‍णदास पयहारी जी ने कलिकाल को जीतकर दधीचि की तरह दूसरी बार अपना शरीर बाघ को खाने के लिए दे दिया था। एक समय पयहारी कृष्‍णदास की गुफा के सामने बाघ आया तो आपने उसको अतिथि जान, नेवता देकर आतिथ्‍य धर्म-प्रतिपालन पूर्वक अपना पल (मांस) काटकर दिया।धर्म पालन देख रामजी ने उनके शिर पर अपना हाथ रखा तो पायहारी जी पुनः पूर्ववत शरीर प्राप्त कर लिए। इस प्रकार के प्रसिद्ध यश को आप जग में प्राप्‍त हुए।
संसारिक्ता से दूर रहे:-
उदासीनता (वैराग्‍य) की तो पयहारी कृष्‍णदास मर्यादा ही थे। इस संसार सागर में जो कनक-कामिनी रूप दो भँवर सबको डुबा देने वाले हैं, उन दोनों के रंग से आप नहीं रँगे। केवल श्रीरामचरण कमल के अनुराग रूपी मकरन्‍द से भ्रमर के सदृश मदमत्त-आनन्दित रहते थे। संतों के अमित दिव्‍य गुणों से गलित अर्थात परिपक्‍व, सदाचार एवं सुन्‍दर नीतियुक्त, ‘गलते’ गादी में आप विराजमान हुए।
उत्तर तोताद्रि' की रामानंदी गद्दी:-
अनंतानंदजी के शिष्य कृष्णदास पयहारी जी ने गलता में रामानंद संप्रदाय की गद्दी स्थापित की। यही पहली और सबसे प्रधान गद्दी हुई। रामानुज संप्रदाय के लिए दक्षिण में जो महत्व तोताद्रि का था वही महत्व रामानंद संप्रदाय के लिए उत्तर भारत में गलता को प्राप्त हुआ। यह 'उत्तर तोताद्रि' कहलाया। 
भक्त पारायण शिष्योंकी लम्बीसूची : -
कील्ह अगर केवल चरनब्रत हठी नारायण ।99
सूरज पुरुष पृथु त्रिपुर हरिभक्ति परायण॥
पद्मनाभ गोपाल टेक टीला गदाधारी।
देवा हेम कल्याण गंगा गंगासम नारी॥
विष्णुदास कन्हर रंगा चाँदन सबिरी गोबिन्द पर।
पहाड़ी परसाद तेन सिश्य सबै भाए पारकर ॥ 
( भक्तमाल पद संख्या 39 गीता प्रेस)  
(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)







Tuesday, August 30, 2022

अयोध्या - काशी के बाद मथुरा विवाद समाधान की तरफ बढ़ा डा. राधे श्याम द्विवेदी

पौराणिक साहित्य में मथुरा के कई नाम हैं जैसे शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा, मथुरा आदि। जहां कृष्ण का जन्म हुआ, कंस के राज में वह स्थान एक कारागार था जहां वसुदेव और देवकी को कंस ने कैद कर रखा था।

महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से पता चलता है कि वसु नाम के व्यक्ति ने यहां कृष्ण जन्म स्थान पर पहला मंदिर बनाया था। इसके बहुत समय बाद विक्रमादित्य के काल में यहां दूसरा मंदिर बनवाया गया। इस मंदिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनी ने तोड़ दिया।

बाद में सन् 1150 ई. में महाराजा विजय पाल देव के शासन में जज्ज नामक व्यक्ति ने यहां फिर एक विशाल मंदिर बनवाया। इसे 16वीं सदी की शुरुआत में सिकंदर लोधी ने नष्ट करवा दिया।मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने श्रीकृष्ण जन्म स्थली पर बने प्राचीन केशवनाथ मंदिर को नष्ट करके उसी जगह 1669-70 में शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था। 1770 में गोवर्धन में मुगलों और मराठाओं में जंग हुई। इसमें मराठा जीते। जीत के बाद मराठाओं ने फिर से मंदिर का निर्माण कराया। 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 13.37 एकड़ की भूमि बनारस के राजा कृष्ण दास को आवंटित कर दी। 1951 में श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने ये भूमि अधिग्रहीत कर ली। मुस्लिम समाज इससे संतुष्ट नहीं हुआ और विवाद बनाए रखा।क्योंकि शाही ईदगाह मस्जिद मथुरा शहर में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर से सटी हुई है। 12 अक्तूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के साथ एक समझौता किया। समझौते में 13.37 एकड़ जमीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों के बने रहने की बात तय हुई थी । पूरा विवाद इसी 13.37 एकड़ जमीन को लेकर है। इस जमीन में से 10.9 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान और 2.5 एकड़ जमीन शाही ईदगाह मस्जिद के पास है। इस समझौते में मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्जे की कुछ जगह छोड़ी और मुस्लिम पक्ष को बदले में पास में ही कुछ जगह दी गई थी।

इस अस्थाई समाधान से दोनों पक्ष संतुष्ट नहीं हुए। वाद विवाद और व्यापक राष्ट्र की अस्मिता को देखते हुए मंदिर के हिन्दू पक्ष पूरी 13.37 एकड़ जमीन पर कब्जे की मांग करने लगे । राम जन्मभूमि की लंबी लड़ाई अपने पक्ष में आने और मुस्लिम पक्ष द्वारा अंतिम समय तक जद्दोजहद करने के कारण हिन्दू पक्ष में नया उत्साह आया और वह निरंतर जिला अदालत में कृष्ण जन्म भूमि के पूरे भाग को पाने के लिए अपनी अर्जी लगता रहा।जब मथुरा की जिला अदालत हिला हवाली करने लगा तो याचिका कर्ता मनीष यादव ने हाईकोर्ट का रूख किया।
आज हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा
मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर विवाद है। 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व की मांग को लेकर मथुरा कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में पूरी जमीन लेने और श्री कृष्ण जन्मभूमि के बराबर में बनी शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने विवादित स्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराने की भी मांग की थी। निचली अदालत में ये मामला लंबित है। लगातार देरी होने के चलते याचिकाकर्ता मनीष यादव ने हाईकोर्ट का रूख किया। मनीष ने हाईकोर्ट में भी यही मांग की। इसके बाद कोर्ट ने निचली अदालत से आख्या मांगी थी। इस मामले में हाईकोर्ट में आज सुनवाई हुई। कोर्ट ने यहां वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी सर्वे कराने का आदेश दिया है। चार महीने में ये सर्वे पूरा करना होगा। इसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट में जमा करनी होगी। इसके लिए एक वरिष्ठ अधिवक्ता को इस सर्वे के लिए कमिश्वर और दो अधिवक्ताओं को सहायक कमिश्नर के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। इस सर्वे कमीशन में वादी और प्रतिवादी के साथ-साथ प्रशासनिक अफसर भी शामिल होंगे। हाई कोर्ट के आदेश से अब मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस में वीडियो और फोटोग्राफी होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को चार महीने के अंदर सर्वे कराकर रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया है। इसके मुताबिक, शाही ईदगाह मस्जिद की भी वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी होगी।  कोर्ट के इस आदेश के बाद एक बार फिर से श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा गर्म हो गया है। 
                     आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी


 

Sunday, August 28, 2022

शिव पुराण की पार्वती से रामायण की सीता तक का पतिव्रत धर्म की विवेचना आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी


शिव पुराण का आधार
शिव पुराण के रुद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड के अध्याय 54 में राजा हिमवान की पत्नी मेना की इच्छा के अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नी द्वारा शिव पार्वती विवाह के उपरान्त पार्वती जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिलाया गया है। इसी को बाद में तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में माता अनसूया द्वारा सीता जी को भी सुनाया गया है। यहां शिव पुराण के वर्णन को आधार बनाया गया है। वर्तमान समय के माताए और बहन बेटियां यदि इसका अनुसरण करेंगी तो उनका लौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन में पूर्णता आएगी।
आगामी दिनों में कजरी तीज हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला खास त्योहार है जिस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। महिलाएं इस दिन अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं और भोलेनाथ-पार्वती माता से घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने की मनोकामना करती हैं। 
शिव पार्वती विवाह के उपरान्त ब्रह्मा जी कहते हैं-
नारद ! तदनन्तर सप्तर्षियों ने हिमालय से कहा-‘गिरिराज ! अब आप अपनी पुत्री पार्वती देवी की यात्रा का उचित प्रबन्ध करें।’ मुनीश्वर! यह सुनकर पार्वती के भावी विरह का अनुभव करके गिरिराज कुछ काल तक अधिक प्रेम के कारण विषाद में डूबे रह गये। कुछ देर बाद सचेत हो शैलराज ने ‘तथास्तु’ कहकर मेना को संदेश दिया। मुने! हिमवान् का संदेश पाकर हर्ष और शोक के वशीभूत हुई मेना पार्वती को विदा करने के लिये उद्यत हुईं।
शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने विधिपूर्वक वैदिक एवं लौकिक कुलाचार का पालन किया और उस समय नाना प्रकार के उत्सव मनाये। फिर उन्होंने नाना प्रकार के रत्नजटित सुन्दर वस्त्रों और बारह आभूषणों द्वारा राजोचित श्रृंगार करके पार्वती को विभूषितकिया। तत्पश्चात् मेना के मनोभाव को जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मण पत्नी ने गिरिजा को उत्तम पातिव्रत्य की शिक्षा दी।
ब्राह्मण पत्नी बोली-
गिरिराज किशोरी! तुम प्रेमपूर्वक मेरा यह वचन सुनो। यह धर्म को बढ़ानेवाला, इहलोक और परलोक में भी आनन्द देने वाला तथा श्रोताओं को भी सुख की प्राप्ति कराने वाला है। संसार में पतिव्रता नारी ही धन्य है, दूसरी नहीं। वही विशेष रूपसे पूजनीय है। पतिव्रता सब लोगों को पवित्र करने वाली और समस्त पाप राशि को नष्ट कर देने वाली है। शिवे! जो पति को परमेश्वर के समान मानकर प्रेम से उसकी सेवा करती है, वह इस लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में कल्याणमयी गतिको पाती है।सावित्री,लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिली, शतरूपा,अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना और स्वाहा-ये तथा और भी बहुत-सी स्त्रियाँ साध्वी कही गयी हैं। यहाँ विस्तार भय से उनका नाम नहीं लिया गया।
वे अपने पातिव्रत्य के बलसे ही सब लोगों की पूजनीया तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं मुनीश्वरों की भी माननीया हो गयी हैं। इसलिये तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये। वे दीनदयालु, सबके सेवनीय और सत्पुरुषों के आश्रय हैं। श्रुतियों और स्मृतियोंमें पातिव्रत्यधर्मको महान् बताया गया है। इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसा दूसरा धर्म नहीं है-यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है।
पातिव्रत्य-धर्ममें तत्पर रहने वाली स्त्री अपने प्रिय पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करे। शिवे! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्री को भी खड़ी ही रहनी चाहिये। शुद्धबुद्धि वाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पति के सो जाने पर सोये और उसके जागने से पहले ही जग जाय। वह छल-कपट छोड़ कर सदा उसके लिये हितकर कार्य ही करे। शिवे! साध्वी स्त्री को चाहिये कि जबतक वस्त्रा भूषणोंसे विभूषित न होले तब तक वह अपने को पति की दृष्टि के सम्मुख न लाये। यदि पति किसी कार्य से परदेश में गया हो तो उन दिनों उसे कदापि श्रृंगार नहीं करना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कभी पतिका नाम न ले। पति के कटु वचन कहने पर भी वह बदले में कड़ी बात न कहे। पति के बुलाने पर वह घर के सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाय और हाथ जोड़ प्रेम से मस्तक झुकाकर पूछे-‘नाथ! किसलिये इस दासी को बुलाया है? मुझे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कृपा से अनुगृहीत कीजिये।’ फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदय से पालन करे। वह घरके दरवाजे पर देरतक खड़ी न रहे। दूसरेके घर न जाय। कोई गोपनीय बात जानकर हर एक के सामने उसे प्रकाशित न करे पति के बिना कहे ही उनके लिये पूजन-सामग्री स्वयं जुटा दे तथा उनके हितसाधन के यथोचित अवसर की प्रतीक्षा करती रहे। पति की आज्ञा लिये बिना कहीं तीर्थयात्रा के लिये भी न जाय। लोगों की भीड़ से भरी हुई सभा या मेले आदिके उत्सवों का देखना वह दूरसे ही त्याग दे। जिस नारी को तीर्थ यात्रा का फल पानेकी इच्छा हो, उसे अपने पति का चरणोदक पीना चाहिये। उसके लिये उसीमें सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं है।
पतिव्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रसाद मानकर शिरोधार्य करे। देवता, पितर, अतिथि, सेवकवर्ग, गौ तथा भिक्षु समुदाय के लिये अन्नका भाग दिये बिना कदापि भोजन न करे। पातिव्रत- धर्म में तत्पर रहनेवाली गृहदेवी को चाहिये कि वह घर की सामग्रीको संयत एवं सुरक्षित रखे। गृहकार्यमें कुशल हो, सदा प्रसन्न रहे। और खर्चकी ओरसे हाथ खींचे रहे। पतिकी आज्ञा लिये बिना उपवासव्रत आदि न करे, अन्यथा उसे उसका कोई फल नहीं मिलता और वह परलोकमें नरकगामिनी होती है।
पति सुखपूर्वक बैठा हो या इच्छानुसार क्रीडा विनोद अथवा मनोरंजन में लगा हो, उस अवस्थामें कोई आन्तरिक कार्य आ
पड़े तो भी पतिव्रता स्त्री अपने पति को कदापि न उठाये। पति नपुंसक हो गया हो, दुर्गति में पड़ा हो, रोगी हो, बूढ़ा हो, सुखी हो अथवा दुःखी हो, किसी भी दशामें नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्लंघन न करे। रजस्वला होनेपर वह तीन रात्रि तक पति को अपना मुँह न दिखाये अर्थात् उससे अलग रहे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तब तक अपनी कोई बात भी वह पति के कानों में न पड़ने दे। अच्छी तरह स्नान करने के पश्चात् सबसे पहले वह अपने पतिके मुख का दर्शन करे, दूसरे किसी का मुँह कदापि न देखे अथवा मन-ही-मन पतिका चिन्तन करके सूर्य का दर्शन करे। पति की आयु बढ़ने की अभिलाषा रखने वाली पतिव्रता नारी हल्दी, रोली, सिन्दूर, काजल आदि;चोली, पान, मांगलिक आभूषण आदि; केशों का सँवारना, चोटी गूँथना तथा हाथ- कान के आभूषण-इन सबको अपने शरीर से दूर न करे। धोबिन, छिनाल या कुलटा, संन्यासिनी और भाग्यहीना स्त्रियोंको वह कभी अपनी सखी न बनाये। पति से द्वेष रखने वाली स्त्रीका वह कभी आदर न करे। कहीं अकेली न खड़ी हो। कभी नंगी होकर न नहाये। सती स्त्री ओखली, मूसल,झाडू, सिल, जाँत और द्वारके चौखट के नीचे वाली लकड़ी पर कभी न बैठे।
मैथुनकाल के सिवा और किसी समय में वह पति के सामने धृष्टता न करे जिस-जिस वस्तुमें पति की रुचि हो, उससे वह स्वयं भी प्रेम करे। पतिव्रता देवी सदा पतिका हित चाहने वाली होती है। वह पति के हर्षमें हर्ष माने। पति के मुख पर विषादकी छाया देख स्वयं भी विषाद में डूब जाय तथा वह प्रियतम पति के प्रति ऐसा बर्ताव करे, जिससे वह उन्हें प्यारी लगे। पुण्यात्मा पतिव्रता स्त्री सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके लिये एक-सी रहे। अपने मनमें कभी विकार न आने दे और सदा धैर्य धारण किये रहे। घी, नमक, तेल आदिके समाप्त हो जाने पर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे सहसा यह न कहे कि अमुक वस्तु नहीं है। वह पति को कष्ट या चिन्ता में न डाले। देवेश्वरि! पतिव्रता नारीके लिये एकमात्र पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी अधिक माना गया है। उसके लिये अपना पति शिवरूप ही है। जो पति की आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिके नियम का पालन करती है , वह पति की आयु हर लेती है और मरने पर नरक में जाती है। जो स्त्री पति के कुछ कहने पर क्रोध पूर्वक कठोर उत्तर देती है वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे, दुष्ट पुरुष के निकट न जाय और पति से कभी कातर वचन न बोले किसी की निन्दा न करे। कलहको दूरसे ही त्याग दे। गुरुजनोंके निकट न तो उच्चस्वरसे बोले और न हँसे। जो बाहरसे पतिको आते देख तुरंत अन्न, जल, भोज्य वस्तु, पान और वस्त्र आदिसे उनकी सेवा करती है, उनके दोनों चरण दबाती है, उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतम के खेद को दूर करने वाले अन्यान्य उपायों से प्रसन्नता पूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है, उसने मानो तीनों लोकोंको तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया। पिता, भाई और पुत्र सुख देते हैं, परंतु पति असीम सुख देता है। अत: नारी को सदा अपने पति का पूजन- आदर-सत्कार करना चाहिये। पति ही देवता है,पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है; इसलिये सबको छोड़ कर एकमात्र पतिकी ही आराधना करनी चाहिये।जो दुर्बुद्धि नारी अपने पतिको त्याग कर एकान्त में विचरती है ( या व्यभिचार करती है), वह वृक्षके खोखले में शयन करने वाली क्रूर उलूकी होती है। जो पराये पुरुषको कटाक्ष पूर्ण दृष्टिसे देखती है, वह ऐंचातानी देखने वाली होती है। जो पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है, वह गाँव में सूअरी होती है अथवा बकरी होकर अपनी ही विष्ठा खाती है। जो पति को तू कहकर बोलती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ईष्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुष पर दृष्टि डालती है , वह कानी, टेढ़े मुँह वाली तथा कुरूपा होती है। जैसे निर्जीव शरीर तत्काल अपवित्र हो जाता है, उसी तरह पतिहीना नारी भलीभाँति स्नान करनेपर भी सदा अपवित्र ही रहती है। लोकमें वह माता धन्य है, वह जन्मदाता पिता धन्य है तथा वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता देवी वास करती है। पतिव्रताके पुण्यसे पिता, माता और पति के कुलों की तीन-तीन पीढ़ियों के लोग स्वर्गलोक में सुख भोगते हैं। जो दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनों के कुलोंको नीचे गिराती हैं तथा इस लोक और परलोकमें भी दुःख भोगती हैं। पतिव्रता का पैर जहाँ-जहाँ पृथ्वीका स्पर्श करता है, वहाँ-वहाँ की भूमि पाप हारिणी तथा परम पावन बन जाती है। भगवान् सूर्य, चन्द्रमा तथा वायुदेव भी अपने-आपको पवित्र करनेके लिये ही पतिव्रता का स्पर्श करते हैं और किसी दृष्टिसे नहीं। जल भी सदा पतिव्रता का स्पर्श करना चाहता है। और उसका स्पर्श करके वह अनुभव करता है कि आज मेरी जडताका नाश हो गया तथा आज मैं दूसरोंको पवित्र करने वाला बन गया। भार्या ही गृहस्थ आश्रमकी जड़ है , भार्या ही सुखका मूल है, भार्यासे ही धर्मके फल की प्राप्ति होती है तथा भार्या ही संतानकी वृद्धिमें कारण है। क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्य- पर गर्व करनेवाली स्त्रियाँ नहीं हैं? परंतु पतिव्रता स्त्री तो विश्वनाथ शिवके प्रति भक्ति होने से ही प्राप्त होती है। भार्यासे इस लोक और परलोक दोनों पर विजय पायी जा सकती है। भार्या हीन पुरुष देवयज्ञ, पितृयज्ञ और अतिथियज्ञ करनेका अधिकारी नहीं होता। वास्तवमें गृहस्थ वही है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। दूसरी स्त्री तो पुरुषको उसी तरह अपना ग्रास ( भोग्य) बनाती है, जैसे जरावस्था एवं राक्षसी।
जैसे गंगास्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीका दर्शन करनेपर सब कुछ पावन हो जाता है।पति को ही इष्टदेव मानने वाली सती नारी और गंगामें कोई भेद नहीं है। पतिव्रता और उसके पतिदेव उमा और महेश्वर के समान हैं, अत: विद्वान् मनुष्य उन दोनों का पूजन करे। पति प्रणव है और नारी वेद की ऋचा; पति तप है और स्त्री क्षमा; नारी सत्कर्म है और पति उसका फल। शिवे! सती नारी और उसके पति-दोनों दम्पती धन्य हैं।
गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मैंने तुमसे पतिव्रताधर्मका वर्णन किया है।अब तुम सावधान हो आज मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक पतिव्रताके भेदोंका वर्णन सुनो। देवि ! पतिव्रता नारियाँ उत्तमा आदि भेदसे चार प्रकारकी बतायी गयी हैं, जो अपना
स्मरण करनेवाले पुरुषोंका सारा पाप हर लेती हैं। उत्तमा, मध्यमा, निकृष्टा और अतिनिकृष्टा-ये पतिव्रताके चार भेद हैं।
अब मैं इनके लक्षण बताती हूँ। ध्यान देकर सुनो। भद्रे! जिसका मन सदा स्वप्नमें भी अपने पतिको ही देखता है, दूसरे किसी पर पुरुषको नहीं, वह स्त्री उत्तमा या उत्तम श्रेणीकी पतिव्रता कही गयी है।
शैलजे! जो दूसरे पुरुषको उत्तम बुद्धिसे पिता, भाई एवं पुत्रके समान देखती है, उसे मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है।
पार्वती! जो मनसे अपने धर्मका विचार करके व्यभिचार नहीं करती, सदाचार में ही स्थित रहती है, उसे निकृष्टा अथवा निम्न श्रेणी की पतिव्रता कहा गया है जो पतिके भयसे तथा कुल में कलंक लगने के डरसे व्यभिचार से बचने का प्रयत्न करती है,
उसे पूर्वकालके विद्वानोंने अतिनिकृष्टा अथवा निम्नतम कोटिकी पतिव्रता बताया है।
शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ समस्त लोकोंका पाप नाश करनेवाली और उन्हें पवित्र बनानेवाली हैं। अत्रिवीकी स्त्री अनसूया ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीनों देवताओंकी
प्रार्थना से पातिव्रत्य के प्रभावका उपभोग करके वाराह के शाप से मरे हुए एक ब्राह्मणको जीवित कर दिया था। शैलकुमारी शिवे ! ऐसा जानकर तुम्हें नित्य प्रसन्नतापूर्वक पति की सेवा करनी चाहिये। पति सेवन सदा समस्त अभीष्ट फलों को देने वाला है।
तुम साक्षात् जगदम्बा महेश्वरी हो और तुम्हारे पति साक्षात् भगवान् शिव हैं। तुम्हारा तो चिन्तन-मात्र करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जायँगी। देवि! यद्यपि तुम्हारे आगे यह सब कहने का कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि आज लोकाचार का आश्रय ले मैंने तुम्हें सती-धर्मका उपदेश दिया है।
ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-पत्नी शिवा देवीको मस्तक झुका चुप हो गयी। इस उपदेशको सुनकर
शंकर प्रिया पार्वती देवी को बड़ा हर्ष हुआ।
तुलसीदास जी द्वारा वर्णित पतिव्रत धर्म
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित राम चरित मानस में श्रीराम बन गमन के समय श्रीराम अत्रि मुनि के आश्रम जाते हैं तब
श्री सीता-अनसूया मिलन भी हुआ है और श्री सीताजी को अनसूया जी के द्वारा पतिव्रत धर्म बतलाया गया है जो कुछ इस प्रकार है।
चौपाई :
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥1॥
भावार्थ:-फिर परम शीलवती और विनम्र श्री सीताजी अनसूयाजी (आत्रिजी की पत्नी) के चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषि पत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशीष देकर सीताजी को पास बैठा लिया॥1॥
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥2॥
भावार्थ:-और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य-नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषि पत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखान कर कहने लगीं॥2॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥3॥
भावार्थ:-हे राजकुमारी! सुनिए- माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही (सुख) देने वाले हैं, परन्तु हे जानकी! पति तो (मोक्ष रूप) असीम (सुख) देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती॥
 धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥4॥
भावार्थ:-धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-॥4॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥5॥
भावार्थ:-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥5॥
जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥
भावार्थ:-जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत में (मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है॥6॥
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। 
सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥7॥
भावार्थ:-मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो (अर्थात समान अवस्था वाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्न श्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥7॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥8॥
भावार्थ:-और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है॥8॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
भावार्थ:-क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है॥9॥
पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥10॥
भावार्थ:-किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है॥10॥
सोरठा :
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥5 क॥
भावार्थ:-स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी 'तुलसीजी' भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥5 (क)॥
सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥5 ख॥
भावार्थ:-हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्री रामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पतिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है॥5 (ख)॥