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Friday, September 23, 2022

श्री सम्प्रदाय के आचार्य श्री रंगनाथमुनि (15वीं कड़ी)

श्री सम्प्रदाय के आचार्य श्री रंगनाथमुनि 
श्री सनातन सम्प्रदाय परम्परा (15वीं कड़ी)       
आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी
शंकराचार्य के सिद्धांत के विरोधी प्रथम आचार्य :-
सातवी से चौदहवी शताब्दि के बीच दक्षिण के द्रविड क्षेत्र में अनेक आलवार भक्त हुए, जो भगवद् भक्ति में लीन रहते थे और भगवान् वासुदेव नारायण के प्रेम, सौन्दर्य तथा आत्मसमर्पण के पदो की रचना करके गाते रहते थे। उनके भक्तिपदों को वेद के समान पवित्र और सम्मानित मानकर उसे 'तमिलवेद' कहा जाता रहा है। श्री सम्प्रदाय के आद्य आचार्य रंगनाथ मुनि और उनके पौत्र यामुनाचार्य ने इसे बढाया और रामानुजाचार्य ने इसे गौरव के शिखर पर पहुँचाया है। इसे आजकल रामानुज सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी 'श्री वैष्णव' कहलाते हैं। इनका दार्शनिक सिद्धान्त 'विशिष्टाद्वैत' है। ये भगवान् लक्ष्मीनारायण की उपासना करते है। श्री सम्प्रदाय के आचार्यों में परिगणित मुनि त्रय में श्री नाथमुनी बहुत लोकप्रियता रूप में जाने जाते है ।मेरी समझ से श्री संप्रदाय के मुनि त्रय के दो अन्य किरदार यामुनाचार्य और रामानुजाचार्य रहे। आचार्य रंगनाथ मुनि या नाथ मुनि वेदशास्त्र वा पुराणादि के प्रकाण्ड विद्वान सिद्ध और जीवन मुक्त महात्मा थे। शंकराचार्य के सिद्धांत का विरोध करने वाले वे प्रथम आचार्य कहे जाते हैं।
वे एक वैष्णव धर्मशास्त्री थे जिन्होंने नलयिर "दिव्य प्रबंधम" को एकत्र और संकलित किया था । श्री वैष्णव आचार्यों में से पहला ग्रंथ माना जाता है । वही नाथमुनि योगरहस्य , और न्यायतत्व के लेखक भी हैं ।
 परिचय :-
उनका जन्म का नाम अरंगनाथन था। उन्हें नाथमुनि या शाब्दिक रूप से संत भगवान ( नाथन- लॉर्ड, मुनि- संत) के रूप में जाना जाता था । आपका जन्म द्रविण देश के चिदंबरम क्षेत्र के तिरुनारायण पुरम ( कार्टू मन्नार,वर्तमान वीरना -रायण पुरम) में 824 ई में हुआ था।आपके पिता का नाम ईश्वर भटटर था । आपका विवाह वंगीपुराचार्य की पुत्री अरविंदजा से हुआ था।जिससे ईश्वरमुनि पुत्र का जन्म हुआ था।ईश्वरमुनि के पुत्र यमुनाचार्य जी हुए थे। ये श्री सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य हुए थे। श्री नाथ मुनि को ब्रज भूमि और यमुना बहुत प्रिय था।इस कारण वे अपने पोते का नाम यमुनाचार्य रखा था। प्रतीत होता है इनका नाम संभवतः एक तीर्थयात्रा की स्मृति में रखा गया था , जिसे नाथमुनि अपने बेटे (ईश्वर मुनि) और बहू के साथ यमुना के तट पर ले गए थे। श्रीरंगम में अपने दो भतीजों को भजन सिखाने के अलावा , उन्होंने उन्हें श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम में श्रीरंगम मंदिर सेवा में पेश किया , जहां वे मंदिर प्रशासक रहे थे। 
तीर्थ यात्रा को बढ़ावा:-
उन्होंने उत्तर भारत के अनेक तीर्थों की यात्रा में बहुत समय बिताया था। ब्रज की प्रेम लक्षणा नारदीय भक्ति का उन्होंने दक्षिण में व्यापक प्रचार किया था। आपने आलवारोंं के प्रबंधों के खोज के लिए अनेक यात्राएं की।आप सिद्ध योगी थे।समाधि अवस्था में आपको श्री शठकोपाचार्य का साक्षात्कार हुआ था। उनके कृपा प्रसाद से आपको 4000 दिव्य प्रबंधों की प्राप्ति हुई थी। आपने चार भागों में दिव्य प्रबंधकम का संकलन किया है।
समाधि अवस्था में आपने श्री शठकोपा जी से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त की थी। आपने रहस्यार्थ सहित मंत्रों का ज्ञान प्राप्त किया था ।आपके ही प्रयत्नों से श्रीरंगम में भगवान के मंदिर में आलवार भक्तों के पद्यों के संगीत मय गायन का प्रारम्भ हुआ था। (संदर्भ: गीताप्रेस भक्त माल पृष्ठ 336)
 चार प्रमुख श्लोक:-
नाथमुनि स्वामीजी के प्रयास से प्राप्त इन दिव्य प्रबंधों, के कारण ही आज श्री वैष्णव साम्प्रदाय का ऐश्वर्य हमें प्राप्त हुआ हैं । इनके बिना यह प्राप्त होना दुर्लभ था । आल्वन्दार स्वामीजी , नाथमुनि स्वामीजी के पौत्र अपने स्तोत्र रत्न में नाथमुनि की प्रशंसा शुरुआत के तीन श्लोकों मे करते है ।
पहले श्लोक में बताते हैं की ” मैं उन नाथमुनि को प्राणाम करता हुँ जो अतुलनीय हैं, विलक्षण हैं और एम्पेरुमानार् के अनुग्रह से अपरिमित ज्ञान भक्ति और वैराग्य के पात्र हैं ।
दूसरे श्लोक में कहते हैं की ” मैं उन नाथमुनि जी के चरण कमलों का, इस भौतिक जगत और अलौकिक जगत में आश्रय लेता हूँ जिन्हें मधु राक्षस को वध करने वाले (भगवान श्री कृष्ण) के श्री पाद कमलों पर परिपूर्ण आस्था , भक्ति और शरणागति ज्ञान हैं” ।
तीसरे श्लोक में कहते हैं की ” मैं उन नाथमुनिजी की सेवा करता हूँ जिन्हें अच्युत के लिए असीमित प्रेम हो निजज्ञान के प्रतीक हैं , जो अमृत के सागर हैं , जो बद्ध जीवात्माओ के उज्जीवन के लिए प्रकट हुए हैं, जो भक्ति में निमग्न रहते हैं और जो योगियों के महा राजा हैं ।
उनके अन्तिम और चौथे श्लोक में एम्पेरुमान् से विनति करते हैं की, उनकी उपलब्धियों को न देखकर , बल्कि उनके दादा की उपलब्धिया और शरणागति देखकर मुझे अपनी तिरुवेडी का दास स्वीकार किया जाय । इन चारो श्लोक से हमें नाथमुनि जी के महान वैभव की जानकारी होती हैं ।
दीर्घ जीवी:-
उन्हें दीर्घ जीवी 400 साल जीवित होने की बात भी कही जाती है।यह संभावना है कि चोल राजाओं द्वारा नियंत्रित उस क्षेत्र में अपनी महानता के शिखर पर पहुंचने से पहले नाथमुनि सौ वर्षों से थोड़ा अधिक समय तक रहे। माना जाता है कि वह मधुरकवि अलवर की परम्परा के जीवनकाल में ही रहे थे । नाथमुनी के साथ संपर्क में था नम्मलवार द्वारा सत्यापित किया जाता है गुरु-परम्परा , दिव्या सूरी चरित , और प्रप्पन्नामरता भी साक्षी है।
अद्भुत मृत्यु :-
अपना अंतिम समय निकट जान कर नाथमुनि स्वामीजी, आस पास की परिस्थिथो से विस्मरित हो एम्पेरुमान के ध्यान में निमग्न रहते थे । एक दिन उनसे मिलने राजा और रानी आते है । ध्यानमग्न स्वामीजी को देख , राजा और रानी लौट जाते है । प्रभु प्रेम , लगन और भक्ति में मग्न, नाथमुनि स्वामीजी को ऐसा आभास होता है की भगवान श्री कृष्ण गोपियों के साथ आए और उनको ध्यानमग्न अवस्था में देखकर वापस लौट गये है, अपने इस आभास से दुखी हो श्रीनाथमुनि राजा और रानी की ओर दौड़ते है |
अगली बार शिकार से लौटते हुए राजा, रानी, एक शिकारी, एक वानर के साथ उनसे मिलने के लिए आते हैं । इस बार भी नाथमुनि स्वामीजी को ध्यान मग्न देख , राजा फिर से लौट जाते हैं । नाथमुनि जी को इस बार यह लगता हैं की श्री राम चन्द्र, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी उन्हें दर्शन देने पधारे हैं , पर उन्हें ध्यान मग्न देख लौट गये और इसी आभास में , नाथमुनि उनके दर्शन पाने उनके पीछे दौड़ते हैं । जब वह छवि उनकी आँखों से ओझल हो जाती हैं, भगवान से वियोग सहन न कर पाने के कारण नाथमुनि मूर्छित हो 924 ई में प्राणों को छोड़ देते हैं और परमपद प्राप्त कर लेते है । यह समाचार सुनकर तुरन्त ईश्वर मुनि , शिष्य बृंद के साथ वहाँ पहुँचते हैं और उनके अन्तिम कर्म संपन्न करते है ।
           आईये उनकी वैभवता जान, उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करे की हमे भी उन्हि की तरह अच्युत और अल्वार आचार्यो के श्रीचरणों में अटूट् विश्वास और प्रेम प्राप्त हो |