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Saturday, March 4, 2023

जीवात्मा के उत्कृष्टता की परम अवस्था का नाम "अवधू" या "अवधूत" है ----✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

भारतीय साहित्य में यह 'अवधू' शब्द कई संप्रदायों के सिद्ध आचार्यों के अर्थ में व्यवहुत हुआ है। साधारणत: जागातिक द्वंद्वों से अतीत, मान- अपमान-विवर्जित, पहुँचे हुए योगी को अवधूत कहा जाता है। यह शब्द मुख्यतया तांत्रिकों, सहज यानियों और योगियों का है। सहजयान और वज्रयान नामक बौद्ध तांत्रिक मतों में 'अवधूती वृत्ति' नामक एक विशेष प्रकार की यौगिक वृत्ति का उल्लेख मिलता है। मत्स्येंद्रनाथ गोरखनाथ को अवधू. कह कर संबोधित करते थे । नाथ संप्रदाय को 'अवधू संप्रदाय' आचार्यगण सहजवस्था की बात करते हैं। सहजावस्था को प्राप्त करने पर ही साधक अवधूत होता है।
       निर्गुण भक्ति में साधक कवियों द्वारा बार बार अवधू या अवधूत शब्दों का प्रयोग भजन गायन में देखने को मिलता है। निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख संत कवियों में कबीर, कमाल, रैदास या रविदास, धर्मदास, गुरू नानक, दादूदयाल, सुंदरदास, रज्जब, मलूकदास, अक्षर अनन्य, जंभनाथ, सिंगा जी, हरिदास निरंजनी आदि रहे। नाथ पंथी गोरखनाथ इस सम्प्रदाय के प्रथम गुरु एवं आराध्य हैं। अवधू शब्द का प्रयोग संन्यास आश्रम में रहने वाला तथा उसके नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति होता है।कबीरदास ने प्रायः अपने पदों में अवधू संबोधन का प्रयोग किया है। यहाँ 'अवधू' शब्द का प्रयोग नाथपंथियों के  अनुगामी साधक  नहीं, अपितु प्रतिपक्षी, प्रतिद्वंद्वी के लिए प्रयुक्त किया है, जिसको वे उद्बोधन के लिए चुनौती -सी देते दिखाई देते हैं ।
अवधू का अर्थ हैः-  
अवधू शब्द का अर्थ है ‘वधू जाके न होई, सो अवधू कहावे।’ जिसको दूसरे की जरूरत न रही; वधू यानी दूसरा। किसी को पत्नी की जरूरत है; किसी को मकान की जरूरत है; किसी को दूकान की जरूरत है; किसी को मित्र की जरूरत है; किसी को बेटे की, बेटी की; कोई न कोई जरूरत है। किसी को धन की, किसी को पद की। जब तक दूसरे की जरूरत है, तब तक तुम अवधू नहीं। जो ‘पर’ से मुक्त हो गया, जिसको दूसरे की जरूरत न रही; जो अकेला काफी है; जो अपने में पूरा है; ऐसा सब छोड़ कर जो चला गया; संसार से बिलकुल विरक्त हो गया, परिपूर्ण हो गया ,संसार से पीठ मोड़ ली, वह  अवधू या अवधूत होता हैइस अनोखे शब्द अवधूत का अर्थ होता है - जिसने सब कुछ छोड़ा। जो त्यागी हो गया– परमहंस– जिसने क्रमशः घर-द्वार छोड़ा, गहराई से देखा जाए तो वर्ण-व्यवस्था छोड़ी, समाज छोड़ा, सभ्यता छोड़ी–इतना ही नहीं अंत मे सम्पूर्ण रूप से संन्यास भी जिसने छोड़ा। अवधूत एक परम उत्कृष्ट अवस्था होता है।
भारत का चमत्कारिक शब्द:-
संपूर्ण विश्व में एक अद्वितीय शब्द, भारत में निर्मित हुआ जिसका नाम "अवधूत" है। यह अवधूत एक ऐसा शब्द है जो बड़ा कीमती है और जिसका आशय उससे भी ज्यादा कीमती है क्योंकि यह अवस्था, दुर्लभ अवस्था होती है। ऐसे व्यक्ति को संभालना वर्तमान के हिसाब से थोड़ा तो कठिन है, क्योंकि यह समाज से बिल्कुल हटके  होते हैं,लेकिन कुछ सम्प्रदाय में यह अवधूत का आशय हट के प्रतीत होता है। इनको सुरक्षा देना इनके अनुरूप वातावरण तैयार करना काफी हद तक सरल होता है ।
अवधुत शब्द की व्युत्पत्ति:-
विद्वानों ने अवधुत शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई है-- अ+वधू यानी जिसकी वधू न हो अर्थात अकेला, सांसारिक बंधनो से मुक्त । भाव ग्रहण करने के स्तर पर तो यह व्युत्पत्ति आनंदित कर सकती है मगर यह सही नहीं है।अवधूत बना है संस्कृत के धूत शब्द में अव उपसर्ग लगने से । अव + धूत = अवधूत।  अव उपसर्ग का मतलब होता है दूर, परे, फासले पर ,नीचे,अवतल। धूत शब्द भी मूलतः धू धातु से बना है जिसका अर्थ है- झकझोरना, हिलाना, अपने ऊपर से उतार फेंकना, हटाना आदि। इससे बने धूत शब्द में हटाया हुआ, भड़काया हुआ, फटकारा हुआ, तिरस्कृत, परित्यक्त, पापमुक्त जैसे भाव उजागर होते हैं।  इस तरह देखें तो अवधूत का मतलब निकलता है वह सन्यासी जिसने सांसारिक बंधनों तथा विषय वासनाओं का त्याग कर दिया है। सभी प्रकार से मुक्त, धूत अर्थात परिष्कृत ।व्यक्ति पहले गृहस्थ होता है,फिर ग्रहस्थ से संन्यस्त बनता है,और एक दिन ऐंसा भी घटित होता है कि फिर संन्यस्त के भी पार हो जाता है।  जीवात्मा के उत्कृष्टता की परम अवस्था ही अवधूत अवस्था होता है।
"अवधू" बड़ा ही गहरा शब्द है । इसका अर्थ है:-"वधू जाके न होई,अवधू कहावे सोई ।" अब जिसको दूसरे की जरूरत न रहे वह अवधू । वधू से मतलब होता है दूसरा। जीवन मे किसी को पत्नी की जरूरत है, किसी को मकान की जरूरत है,किसी को दूकान की जरूरत है, किसी को मित्र की जरूरत है,किसी को बेटे की, बेटी की, कोई न कोई जरूरत बनी ही रहती है। इतना ही काफी नहीं किसी को धन की, किसी को पद की,किसी को प्रतिष्ठा की भी जरूरत भी होती है। जब तक दूसरे की जरूरत है,तब तक आप अवधू नहीं हैं। अब जो ‘पर’ से मुक्त हो गया, जिसको दूसरे की जरूरत बिल्कुल भी न रही, जो अकेला ही काफी है,जो अपने में ही पूरा है । ऐसा सब छोड़ कर जो चला गया। संसार से बिलकुल विरक्त हो गया, परिपूर्ण हो गया और पीठ मोड़ ली, वह है- अवधू= मतलब अवधूत बन गया।
संसार और परमात्मा के बीच समन्वय :-
कबीर दास जी कहते हैंः अवधूत से भी ऊपर एक दशा है; और वह दशा है–जल में कमलवत रहना। संसार में होकर भी संसार को अपने में न होने देना। कबीर उसके पक्षपाती है। अवधूत के प्रति उनका सम्मान है। वे कहते हैंः कुछ तो किया; कुछ तो अपने को बदला; ‘पर’ से मुक्त हुआ। संसार से मुक्त हुआ। लेकिन कबीर कहते हैं कि संसार से मुक्त होने से भी बड़ी बात हैः संसार में मुक्त होना। वह कबीर की संसार और परमात्मा के बीच संधि है; संसार और परमात्मा के बीच समन्वय है। संसारी से बेहतर है त्यागी। लेकिन त्यागी से भी बेहतर है वह, जो संसार में है और संन्यस्त है।यही मेरे संन्यास की धारणा भी है। तुम जहां हो, वहीं; जैसे हो वैसे ही; ठीक उसी दशा में तुम्हारे भीतर रूपांतरण हो जाए। क्योंकि रूपांतरण मनःस्थिति का है परिस्थिति का नहीं।
अवधूतों के चार प्रकार :- 
तंत्र-ग्रंथों में चार प्रकार के अवधूतों की चर्चा है- ब्रह्मावधूत, शैवावधूत, भक्तावधूत और हंसावधूत। हंसावधूतों में जो पूर्ण होते हैं वे परमहंस और जो अपूर्ण होते हैं वे परिव्राजक कहलाते हैं ('प्राण्तोषिणी')। परंतु कबीरदास ने न तो इतने तरह के अवधूतों की कहीं कोई चर्चा ही की है और न ऊपर 'निर्वाण-तंत्र' के बताए हुए अवधूत से उनके अवधूत की कोई समता ही दिखाई है। 'हंसा' की बात कबीरदास कहते ज़रूर हैं पर वे हंस और अवधूत को शायद ही कहीं एक समझते हों। वे बराबर हंस या पक्षी शुद्ध और मुक्त जीवात्मा को ही कहते हैं। इसी भाव को बताने के लिए भर्तृहरि ने कहा है कि इस अवधूत मुनि की बाह्य क्रियाएँ प्रशमित हो गई हैं। वह न दु:ख समझता है, न सुख को सुख। वह कहीं भूमि पर सो सकता है कहीं पलंग पर, कहीं कंथा धारण कर लेता है कहीं दिव्य वसन, कहीं मधुर भोजन पाने पर उसे भी पा लेता है। 'किंतु कबीरदास इस प्रकार योग में भोग को पंसद नहीं करते। यद्यपि इन योगियों के संप्रदाय के सिद्धों को ही कबीर अवधूत कहते हैं तथापि वे साधारण योगी अवधूत के फ़र्क़ को बराबर याद रखते हैं। साधारण योगी के प्रति उनके मन में वैसा आदर का भाव नहीं है जैसा अवधूत के बारे में है। कभी-कभी उन्होंने स्पष्ट भाषा में योगी को और अवधूत को भिन्न रूप से याद किया है। इस प्रकार कबीरदास का अवधूत नाथपंथी सिद्ध योगी है।
अवधूत में अक्‍खड़ता पूरे सबाब पर :-
अक्‍खड़ता कबीरदास का सर्वप्रधान गुण नहीं हैं । जब वे अवधूत या योगी को संबोधन करते हैं तभी उनकी अक्‍खड़ता पूरे चढ़ाव पर होती है । वे योग के बिकट रूपों का अवतरण करते हैं गगन और पवन की पहेली बुझाते
रहते हैं, सुन्न और सहज का रहस्‍य पूछते रहते हैं, द्‌वैत और अद्‌वैत के सत्‍त्व की चर्चा करते रहते हैं-
अवधू, अच्छरहूँ सों न्यारा ।
जो तुम पवना गगन चढ़ाओ, गुफा में बासा ।
गगना पवना दाेनों बिनसैं,कहँ गया जोग तुम्‍हारा ।
गगना-मद्धे जोती झलके, पानी मद्धे तारा ।
घटिगे नींर विनसिने तारा, निकरि गयौ केहि द्‌वारा ।
फक्‍ कड़ता अवधू का स्‍वभाव:-
कबीर स्‍वभाव से फक्‍कड़ थे । अच्छा हो या बुरा, खरा हो या खोटा, जिससे एक बार चिपट गए उससे जिंदगी भर चिपटे रहो, यह सिद्धांत उन्हेें मान्य नहीं था । वे सत्‍य के जिज्ञासु थे और कोई माेह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती थी । वे अपना घर जलाकर हा‍थ में मुराड़ा लेकर निकल पड़े थे और उसी को साथी बनाने को तैयार थे जो उनके हाथों अपना भी घर जलवा सके -
हम घर जारा अपना, लिया मुराड़ा हाथ ।
अब घर जारों तासु का,जो चलै हमारे साथ।
कबीर मस्‍त-मौला भी:-
वे सिर से पैर तक मस्‍त-मौला थे । मस्त-जो पुराने कृत्‍यों का हिसाब नहीं रखता, वर्तमान कर्मों को सर्वस्‍व नहीं समझता और‍ भविष्‍य में सब-कुछ झाड़-फटकार निकल जाता है । जो दुनियादार किए-कराए का लेखा-जोखा दुरुस्‍त रखता है वह मस्‍त नहीं हो सकता । जो अतीत का चिट्ठा खोले रहता है वह भविष्‍य का क्रांतदर्शी नहीं बन सकता । जो मतवाला है वह दुनिया के माप-जोख से अपनी सफलता का हिसाब नहीं करता । कबीर जैसे फक्‍कड़ को दुनिया की होशियारी से क्‍या वास्‍ता ? ये प्रेम के मतवाले थे मगर अपने को उन दीवानों में नहीं गिनते थे जो माशूक के लिए सर पर कफन बाँधे फिरते हैं 
हमन हैं इश्क मस्‍ताना, हमन को होशियारी क्‍या ।
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्‍या ।
जो बिछुड़ै हैं पियारे से, भटकते दर-बदर फिरते ।
हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्‍या।
अखंड आत्‍मविश्वास:-
कबीर की यह घर-फूँक मस्‍ती, फक्‍कड़ना, लापरवाही और निर्मम अक्‍खड़ता उनके अखंड आत्‍मविश्वास का परिणाम थी । उन्होंने कभी अपने ज्ञान को, अपने गुरु को और अपनी साधना को संदेह की नजरों से नहीं देखा । अपने प्रति उनका विश्वास कहीं भी डिगा नहीं । कभी गलती महसूस हुई तो उन्होंने एक क्षण के लिए भी नहीं सोचा कि इस गलती के कारण वे स्‍वयं हो सकते हैं । उनके मत से गलती बराबर प्रक्रिया में होती थी, मार्ग में होती थी, साधन में होती थी । उनका विश्वास ही इस प्रेम की कुंजी है। उनके विश्वास है जिसमें संकोच नहीं, द्‌विधा नहीं, बाधा नहीं है। वे कहते हैं--
प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-परजा जिस रुचे, सिर दे सो ले जाय ।।
सूरै सीस उतारिया, छाड़ी तन की आस ।
आगेथैं हरि मुलकिया, आवत देख्या दास ।।
कबीर साहेब का यह संदेश भी कम महत्व पूर्ण नही है --
अवधू भूले को घर लावे ,
सो जन हमको भावै ।।
घर में जोग भोग घर में ही ,
घर तजि बन नहीं जावै ।
बन को गए कलपना उपजै ,
तब धौं कहाँ समावै ।।
घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में ,
जो गुरु अलख लखावै ।
सहज सुन्न में रहे समाना,
सहज समाधि लगावै ।।
उनमुनि  रहे ब्रह्म को चिन्है,
परम तत्त को ध्यावै ।
सूरत –निरत को मेला करिके,
अनहद नाद बजावै ।।
घर में वसत वस्तु भी घर है,
घर ही वस्तु मिलावै।
कहै कबीर सुनो हो अवधू,
ज्यों का त्यों ठहरावै ।।
युग प्रवर्तक कबीर :-
युगावतारी शक्ति आैर विश्वास लेकर पैदा हुए थे और युगप्रवर्तक की दृढ़ता उनमें वर्तमान थी इसीलिए वे युग प्रवर्तन कर सके । एक वाक्‍य में उनके व्यक्‍तित्‍व को कहा जा सकता हैः वे बेपरवाह , दृढ़, उग्र, कुसुमादपि कोमल, वज्रादपि कठोर सिर से पैर तक मस्‍त-मौला सन्त थे।
अवधूत अवस्था को प्राप्त दो सम्प्रदाय हैं :-
अवधूत अवस्था को प्राप्त सन्यासी दोनो ही सम्प्रदाय से सम्बन्धित होते हैं -पहला शैव और दूसरा वैष्णव शैव अवधूत वे हैं जो कठोर साधना में जीवन व्यतीत करते हैं। तथा भस्म को पूरे शरीर में लगाकर अधिकतर मौन,बिना कपड़ों के रहकर ही तपस्या रत होते हैं।इस सम्प्रदाय में विशेष रूप से विचित्र अवधूत के रूप में गुरु गोरखनाथ जी को जाना जाता है।
          वैष्णव अवधूत वे हैं जो  प्रमुख रूप से ग्रहस्थ रहकर सन्यस्त हो सकते हैं। जिनके मन की अवस्था कुछ  ऐंसी है कि आप जहां हो, वहीं। जैसे हो वैसे ही । ठीक उसी दशा में आपके भीतर रूपांतरण हो जाए।  रूपांतरण मनःस्थिति का है–परिस्थिति का नहीं। अर्थात सन्यासी और गृहस्थी एक साथ जरा भी भेद नहीं । कबीर दास जी भी इस विधि से सहमत हैं।
कबीर दास जी का अवधूत:-
कबीर दास जी ने अवधूत के विषय मे बड़ी ही अद्भुत बात कही है।  कबीर दास जी के मन में अवधूत का सम्मान है। लेकिन वे उनकी जीवन व्यवस्था से वे कतई राजी नहीं हैं। कारण यह है कि कबीर दास जी कहते हैं- कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं,सब कुछ जहां हैं वहीं हो सकता है। जो व्यक्ति दौड़-दौड़ कर, भाग-भाग कर, जंगल-पहाड़ में तप करते हैं, वह तो बाजार में भी हो सकता है। इतने दूर जाने की जरूरत ही क्या? परमात्मा दूर नहीं–पास है। परमात्मा आपके हृदय में विराजमान है।  कबीर दास जी का यह अत्यंत ही अनमोल वचन यह है कि संसार छोड़ना, संसार में रहने से बड़ी बात है। लेकिन संसार में रहना और संसार को छोड़कर रहना, संसार छोड़ने से भी कीमती बात है। कबीर दास जी कहते हैंः अवधूत से भी ऊपर एक दशा है । और वह दशा है–जल में कमलवत, संसार में होकर भी संसार को अपने में न होने देना। कबीर उसके पक्षपाती है। आगे वे कहते हैं कि संसार से मुक्त होने से भी बड़ी बात है, संसार में मुक्त होना। वह कबीर दास जी का संसार और परमात्मा के बीच का जोड़ है । संसार और परमात्मा के बीच का समन्वय है। एक बात तो निश्चित है कि संसारी से बेहतर है त्यागी। लेकिन त्यागी से भी बेहतर है वह, जो संसार में है और संन्यस्त है। इस तरह शैव और वैष्णव दोंनो ही सम्प्रदाय में यह उपयोगी रहस्य है जो हमारे जीवन को बदल सकता है। चाहे शेव की तरह अवधूत हो कोई या फिर वैष्णव की तरह से यह अवधूत शब्द की रचना ईश्वर के निकट में रहने की अवस्था है। इतने निकट की उसी में हम जीने लगें। हर सांस में ईश्वर ही वस जाए। ऐंसा है अवधूत का रहस्य ।
भैरवनाथ भी अवधूत रहे  :-
वैष्णोवी देवी धाम के भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। और विशेष इन्हे योगी भी कहते और जोगी भी कहा जाता हैं। देवो के देव महादेव जी स्वयं शिव जी ने नवनाथो को खुद का नाम जोगी दिया हैं। इन्हें तो नाथो के नाथ नवनाथ भी कहा जाता हैं। नाथ सम्प्रदाय में योगी और जोगी एकही सिक्के के दो पहलू हैं, एक जो सन्यासी जीवन और दुसरा गृहस्थ जीवन हैं। इनके कुछ गुरुओं के शिष्य मुसलमान, जैन व हिन्दू भी हुए हैं।
तुलसीदास का अवधूत:-
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥
   (अर्थात चाहे कोई मुझे धूर्त कहे अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की बेटी से तो बेटे का ब्याह करना नहीं है, न मैं किसी से संपर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाड़ूँगा। तुलसीदास तो श्रीराम का प्रसिद्ध ग़ुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँग के खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है, न किसी से एक लेना है, न दो देना है।) ( कवितावली  पृष्ठ 120) ।
इसलिए मेरा मंतव्य है कि --
अवधू बनो ,अवधू बनो ,अवधू बनो रे।
सब त्याग दो ,सब त्याग दो ,परम सत्य में मिलो रे।।

(लेखक : सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

Thursday, January 27, 2022

शक्ति वसिष्ठ और राजा सौदास/कल्मषपाद (भागवत प्रसंग 6)डा. राधे श्याम द्विवेदी

  भगवान राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व 10 जनवरी को दिन के 12.05 पर हुआ था। भगवान राम के पूर्वजों की वंशावली इस प्रकार मिलती है।
            1. मनु 2. इक्ष्वाकु 3. शशाद 4. ककुत्स्थ 5. अनेनस 6. पृथु 7. विश्वगाश्व आर्द्र 8. युवनाश्च 9. श्रावत्स 10. वृहदश्व 11. कुवलयाश्व 12. दृढ़ाश्व 13. प्रमोद 14. हर्यश्रव 15. निकुम्भ 16. संहताश्व 17. कृशाश्व 18. प्रसेनजित 19. युवनाश्च 20. मान्धातु 21. पुरुकुत्स 22. त्रसदस्यु 23. सम्भूत 24. अनरण्य 25. पृषदश्व 26. हर्यश्रव 27. वसुमनस 28. तृधन्वन 29. त्रैयारुण 30. त्रिशंकु 31. हरिश्चन्द्र 32. रोहित 33. हरित 34.चंचु 35. विजय 36. रुरुक 37. वृक 38. बाहु 39. सगर 40. असमज्जस 41. अंशुमन 42. दिलीप 43. भगीरथ 44. श्रुत 45. श्रुत 46. नाभाग 47. अम्बरीष 48. सिंधुदीप 49. अयतायुस 50. ऋतुपर्ण 51. सर्वकाम 52. सुदास 53. सौदास/ कल्माषपाद 54. अश्मक 55. मूलक 56. शतरथ 57. वृद्धशर्मन 58. विश्वसह 59. दिलीप 2 60. दीर्घबाहु 61. रघु 62. अज 63. दशरथ 64. रामचन्द्र।
       भगवान के पूर्वजों में मनु के 53वें और इक्ष्वाकु के 52वें पीढ़ी में सौदास नामक राजा हुए थे। ईक्ष्वाकु वंशी राजा सौदास का उल्लेख अनेक हिन्दू पौराणिक ग्रंथों एवं महाभारत में हुआ है। विष्णु पुराण के अनुसार राजा सौदास इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजा ऋतुपर्ण का प्रपौत्र, राजा सर्वकाम का पौत्र तथा राजा सुदास का पुत्र था। सुदास का पुत्र होने के कारण इसे सौदास कहा जाता था।रामायण में सौदास के पिता सुदास का नाम रघु कहा गया है। कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि कलमाशपाद का जन्म नाम मित्रसाह था, लेकिन उन्हें उनके संरक्षक सौदास से जाना जाता था। विष्णु पुराण पर एक टिप्पणीकार का कहना है कि मित्र-साह (शाब्दिक रूप से, "जो एक मित्र को मना करता है") एक विशेषण है जिसे राजा ऋषि शक्ति वशिष्ठ के शाप से प्राप्त करता है । राजा अपने मित्र ( मित्र )शक्ति वशिष्ठ के श्राप के प्रतिशोध से ( साह ) को रोकता है , हालांकि उसके पास ऐसा करने की शक्ति है। 
       कुल पुरोहित महर्षि वसिष्ठ के आशीर्वाद से राजा सुदास और सौदास ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया था। एक बार राजा सुदास अरण्य में आखेट खेलने गया। वहाँ राजा सौदास ने दो भयंकर राक्षसों को देखा। उनमें से एक राक्षस को राजा सौदास ने मार दिया किंतु दूसरा राक्षस भयभीत होकर अदृश्य हो गया तथा उसने राजा सौदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया। राजा सुदास भी अरण्य से अपनी राजधानी अयोध्या लौट आया और अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ को अश्वमेध यज्ञ में आमंत्रित करता है । कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा से राजा सौदास ने एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा एवं रानी ने गुरु महर्षि वसिष्ठ सहित समस्त ब्राह्मणों को भोजन करवाया। जिस मायावी राक्षस ने राजा सुदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया था। उसे इस यज्ञ के बारे में ज्ञात हो गया और वह अपने साथी दैत्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए वेश बदल कर राजा सौदास के महल में आया। राक्षस के वेश में धोखा खाकर कलमाशपाद अपनी रानी के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाता है और उसे मांस भेंट करता है। उस दैत्य ने अवसर पाकर शक्ति वसिष्ठ के भोजन में नरमांस मिला दिया। रानी दमयंती ने अत्यंत श्रद्धा से वह भोजन कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ को परोसा। वर्जित भेंट देखकर ऋषि अपमानित महसूस करते हैं । उन्होंने राजा को श्राप दिया- ‘हे सौदास! तूने मुझे खाने के लिए नरमांस दिया है, इसलिए तू राक्षस हो जा और यही भोजन कर।’
        इस पर राजा सौदास कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ पर क्रुद्ध हुआ और बोला- ‘आपने बिना सोचे-समझे हमें निरपराधी होते हुए भी इतना भयानक श्राप दिया है, अतः मैं भी आपको श्राप दूंगा।’
राजा ने कुलगुरु को श्राप देने के लिए अपने हाथ में जल लिया तो रानी मदयंती राजा के पैरों में गिर पड़ी और प्रार्थना करने लगी- ‘कुलगुरु को श्राप देना उचित नहीं है।’
       इस पर राजा सौदास ने अपने हाथ का जल अपने पैरों पर गिरा दिया। इस जल के स्पर्श से राजा सौदास के पैर काले हो गए तथा तभी से राजा को कल्मषपाद कहा जाने लगा। शाप के प्रभाव से राजा उसी क्षण राक्षस बन गया।
          उसी समय महर्षि वसिष्ठजी को राक्षस द्वारा भोजन में नरमांस मिलाए जाने की बात ज्ञात हुई और उन्होंने कल्मषपाद राक्षस बने राजा सौदास से कहा- ‘मेरे शाप का प्रभाव बारह वर्ष तक रहेगा। जब आप श्राप के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे, तब आपको श्राप काल की घटनाएं स्मरण नहीं रहेंगी।’
        राक्षस कल्पषपाद अपनी राजधानी छोड़कर जंगलों में चला गया और प्राणियों को मार कर खाने लगा। एक बार कल्पषपाद अरण्य में एक संकरे पथ पर जा रहा था। उसी संकरे पथ पर सामने से महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति आ रहा था। इस बात पर दोनों में बहस छिड़ गई कि कौन किसके लिए मार्ग छोड़ेगा!
        महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति ऋषि वेश में था, इसलिए वह चाहता था कि राजा अपने गुरुपुत्र के सम्मान में मार्ग छोड़े। जबकि राजा चाहता था कि ऋषिपुत्र एक चक्रवर्ती सम्राट के लिए मार्ग छोड़े। जब गुरुपुत्र ने राजा के लिए मार्ग नहीं छोड़ा तो कल्मषपाद गुरुपुत्र को रस्सी के कोड़े से मारने लगा। बदले में, ऋषि राजा को 16 साल तक जंगल में भटकने का श्राप देते हैं।
         संयोगवश महर्षि विश्वामित्र भी वहाँ आ निकले। उन्होंने एक वृक्ष के पीछे खड़े होकर यह समस्त दृश्य देखा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी महर्षि वसिष्ठ के पुत्र शक्ति को संत्रास देने के लिए किंकर नामक एक राक्षस की सृष्टि की तथा उसे राजा कल्पषपाद के शरीर में प्रवेश करा दिया। इस कारण कल्मषपाद ने और भी भयंकर रूप धारण कर लिया। उन नृपश्रेष्‍ठ ने कुछ ही दिनों बाद उस शक्ति मुनि को अपने सामने देखकर कहा-। चूंकि तुमने मुझे यह सर्वथा अयोग्‍य शाप दिया है, अत: अब मैं तुम्‍हीं से मनुष्‍यों का भक्षण आरम्‍भ करुंगा। यों कहकर राजा ने तत्‍काल ही शक्ति के प्राण ले लिये और जैसे बाघ अपनी रुचि के अनुकूल पशु को चबा जाता है, उसी प्रकार वे भी शक्ति को खा गये। शक्ति को मारा गया देख विश्वामित्र बार-बार वसिष्ठ के पुत्रों पर ही आक्रमण करने के लिये उसे राक्षस को प्रेरित करते थे। जैसे क्रोध में भरा हुआ सिंह छोटे मृगों को खा जाता है।
     विश्वामित्र राजा की मदद से अपने दुश्मन के परिवार को नष्ट करने की साजिश रचते हैं। राक्षस के प्रभाव में , राजा एक ब्राह्मण को मानव मांस परोसता है, जो शक्ति के श्राप को प्रभाव में डालता है। राजा नरभक्षी राक्षस में बदल जाता है ।   
          एक बार राक्षस कल्मषपाद ने एक ब्राह्मण युगल को रति के क्षणों में देखा। कल्मषपाद ने ब्राह्मण को मार दिया। इस पर ब्राह्मण-पत्नी ने दुःखी होकर कहा- ‘तू जब भी अपनी पत्नी के पास जाएगा, तू भी इसी तरह मर जाएगा, जिस तरह तूने आज मेरे पति को मारा है।’
          एक बार राक्षस कल्मषपाद अरण्य में घूमता हुआ ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में जा पहुंचा। वहाँ उसने वसिष्ठ के पुत्रों को यज्ञ करते हुए देखा तो कल्मषपाद वसिष्ठ के पुत्रों को खा गया। महर्षि वसिष्ठ ने अपने पुत्रों के शोक में अपने शरीर का अंत करने का निश्चय किया तथा उन्होंने पर्वत से गिरकर, समुद्र में डूबकर, अग्नि में जलकर देहत्याग करने का निश्चय किया किंतु देवताओं ने उन्हें मरने नहीं दिया। इस पर महर्षि वसिष्ठ अपना शरीर लताओं से बांधकर एक तेज प्रवाहयुक्त नदी में कूद गए। यहाँ भी देवताओं ने उन्हें लताओं के पाश से मुक्त कर दिया। ऋषि बच गए तथा उसी दिन से उस नदी का नाम ‘विपाशा’ हो गया जिसे अब हम ‘व्यास’ नदी कहते हैं।
         जब महर्षि विपाशा में जीवित बच बए तो उन्होंने एक अन्य नदी में कूदकर प्राण त्यागने का निश्चय किया। जैसे ही ऋषि वसिष्ठ ने नदी में प्रवेश किया, नदी सौ धाराओं में बंट गई और महर्षि स्वतः उससे बाहर निकल गए। उस दिन से उस नदी का नाम ‘शतुद्रि’ हो गया जिसे अब हम ‘सतलुज’ के नाम से जानते हैं।
         एक बार महर्षि वसिष्ठ अपनी पुत्रवधु अदृश्यंति के साथ अरण्य में काष्ठ एकत्रित कर रहे थे। तब महर्षि को क्षीण स्वर में वेदमंत्र सुनाई दिए। इस पर महर्षि ने अपनी पुत्रवधु से पूछा- ‘ये वेदमंत्र कौन बोल रहा है।’
       इस पर अदृश्यंति ने कहा- ‘विगत 12 वर्षों से मेरे गर्भ में आपके पुत्र शक्ति का पुत्र वेदघोष कर रहा है।’
        जब महर्षि को ज्ञात हुआ कि मेरे कुल का सम्पूर्ण विनाश नहीं हुआ है तो महर्षि ने देह-त्याग करने का निश्चय छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् अदृश्यंति के गर्भ से पराशर ऋषि ने जन्म लिया। पराशर का शब्दिक अर्थ होता है- ‘प्राण बचाने वाला।’ चूंकि उन्होंने अपने पितामह वसिष्ठ के प्राण बचाए थे, इसलिए वे पराशर कहलाए।
        इस तरह लगभग 12 वर्ष होने को आए। एक दिन राक्षस कल्मषपाद ने महर्षि वसिष्ठ को अरण्य में संचरण करते हुए देखा। वह महर्षि को खा जाने के लिए उन पर झपटा। महर्षि ने दया करके उसे शाप-मुक्त कर दिया। राजा शापमुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हुआ तथा पुनः अपनी राजधानी अयोध्या में लौट आया। 
         जब राजा सौदास को राज्य करते हुए बहुत दिन बीत गए तो उसे चिंता हुई कि उसका कोई पुत्र नहीं है। ब्राह्मणी के शाप के कारण राजा अपनी रानी से पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकता था। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार जब लम्बे समय तक राजा सौदास को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो महर्षि वसिष्ठ ने राजा सौदास के अनुराध पर रानी मदयंती को मंत्रों के बल पर गर्भाधान कराया। इससे रानी मदयंती गर्भवती हो गई किंतु सात वर्ष तक बालक गर्भ से बाहर नहीं आया। इस पर वसिष्ठ ने रानी के गर्भ पर ‘अश्म’ अर्थात् पत्थर से प्रहार किया जिससे रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। उस बालक का नाम ‘अश्मक’ हुआ। उसे वीरसह अथवा मित्रसह भी कहते थे। राजा सौदास के बाद यही अश्मक अयोध्या का राजा हुआ। अश्मक के पुत्र का नाम मूलक था। उसके पुत्र का नाम शतरथ था।उसके पुत्र का नाम वृद्धशर्मन था। उसके पुत्र का नाम नाम विश्वसह था। उसके पुत्र का नाम दिलीप था। उसके पुत्र का नाम दीर्घबाहु था। उसके पुत्र का नाम रघु था। उसके पुत्र का नाम अज था। उसके पुत्र का नाम दशरथ था। उसके पुत्र का नाम रामचन्द्र लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न था। कुछ नाम भिन्नता के साथ रामायण और पुराण में वाशिष्ठ वंश के ऋषियों की गतिविधियों की जानकारी मिलती है।




Wednesday, January 12, 2022

माता सीता और मंगल देव पृथ्वी मां की संतानें

          देवी सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं। इसलिए इन्हें ‘जानकी, जनकात्मजा, जनकसुता, वैदेही भी कहा जाता है। राजा जनक को खेत में हल जोतते समय माता सीता मिली थी। माता सुनयना ने मातृत्व को स्वीकार कर पालन किया। भूमी से उत्पन्न होने के कारण ही ‘भूमिपुत्री’ या ‘भूसुता’ कहा जाता है। मिथिला की राजकुमारी होने से ‘मैथिली’ नाम से प्रसिद्ध है।
          मार्गशीर्ष (अगहन) मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि में भगवान श्रीरामचन्द्र तथा जनकपुत्री माता जानकी (सीता) का विवाह हुआ था, तभी से इस पंचमी को ‘विवाह पंचमी पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि विवाह के समय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र उपस्थित थे। कहा जाता है कि उनका विवाह देखने को स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आए थे। दूसरी ओर सभी देवी और देवता भी विभिन्न वेश में उपस्थित थे। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म की बारी आई। इस रस्म में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। विवाह करवाने वाले पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई को बुलाने के लिए कहा तो वहां समस्या खड़ी हो गई, क्योंकि उस समय तक जनक का कोई पुत्र नहीं था। ऐसे में सभी एक दूसरे से विचार करने लगे। इसके चलते विवाह में विलंब होने लगा।
            वाल्मीकी रामायण, श्रीरामचरितमानस आदि प्रसिद्ध ग्रंथों में सीताजी के किसी भी भाई का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता, किंतु कई ग्रंथों में सीताजी के भाई का परिचय प्राप्त होता है।
          श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने 'जानकी मंगल' में मंगल और देवी सीता के बीच भाई-बहन के स्नेह के एक दुर्लभ दृश्य के संकेत दिए गए हैं। जानकी मंगल के अनुसार, देवी सीता की शादी के वक्त जब लावा परसाई रस्म का समय आया तो शादी करा रहे ऋृषिवर ने दुल्हन के भाई को बुलाया। 
           अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देखकर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। तभी अकस्मात एक रक्तवर्ण का युवक उठा और इस रस्म को पूरा करने के लिए आकर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मैं हूँ इनका भाई। दरअसल, वह और कोई नहीं बल्कि स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीरामचन्द्र और सीता का विवाह देखने हेतु वहां उपस्थित हुए थे। चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इसी सम्बन्ध से मंगलदेव माता सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आए।
           अनजान व्यक्ति को इस रस्म को निभाने को आता देख कर राजा जनक दुविधा में पड़ गए। जिस व्यक्ति के कुल, गोत्र एवं परिवार का कुछ आता पता ना हो उसे वे कैसे अपनी पुत्री के भाई के रूप में स्वीकार कर सकते थे। उन्होंने मंगल से उनका परिचय, कुल एवं गोत्र पूछा।
          राजा जनक के आपत्ति लिए जाने के बाद मंगलदेव ने कहा, ‘हे राजन! मैं अकारण ही आपकी पुत्री के भाई का कर्तव्य पूर्ण करने को नहीं उठा हूं। मैं इस कार्य के सर्वथा योग्य हूं। अगर आपको कोई शंका हो तो आप महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस विषय में पूछ सकते हैं।’
        एसी वाणी सुनकर राजा जनक ने महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस बारे में पूछा। दोनों ही ऋषि इस रहस्य को जानते थे अतः उन्होंने इसकी आज्ञा दे दी। 
        मंगल देव अपनी बहन सिया के हाथों में लाजा भर रहे हैं, सीताजी के कर कमलों से ही श्रीराम के भी कर कमल लगे हैं। ऋषिवर के मुख से उच्चारित इस मंत्र के उद्घोष के मध्य सीताजी अपने भाई मंगल द्वारा तीन बार प्रदत्त लाजा का पति श्रीरामचन्द्र संग अग्नि में होम कर रही हैं।
             ॐ अर्यमणं देवं। ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा।
                  ॐ इमांल्लाजानावपाम्यग्न।
                       (पार०गृ०सू० १ /६ /२) 
             इस प्रकार सभी की आज्ञा पाकर मंगलदेव ने माता सीता के भाई के रूप में सारी रस्में निभाई। जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ग्रन्थ जानकी मंगल में इस प्रकार किया है। 
             सिय भ्राता के समय भोम तहं आयउ।
             दुरीदुरा करि नेगु सुनात जनायउ॥
                         (जानकी मंगल १४८)
         जानकी मंगल में बताया गया है कि इस रस्म को मंगल द्वारा पूरा किया गया था। बताया जाता है कि मंगल यहां मां पृथ्वी के आदेश पर वेष बदलकर पहुंचे थे। गौरतलब है कि आज तक शादी में होने वाली लावा परसाई रस्म को दुल्हन का भाई ही पूरी करता है। अगर किसी को अपना भाई नहीं होता है तो दूर के भाई इस रस्म को पूरा करता है। इस तरह मंगल हमारे मामा हुए।
सीताजी यह भाई हैं: इसके अतिरिक्त जैन रामायण में सती सीता महाराज जनक की पुत्री थी | माता का नाम पृथ्वी और भाई का नाम भामंडल था |
           भगवान रामचन्द्र और माता सीताजी का विधिवत विवाह संस्कार हुआ एवं साथ में देवी उर्मिला- श्रीलक्ष्मणजी, देवी मांडवी- श्रीभरतजी एवं देवी श्रुतकीर्ति का विवाह श्रीशत्रुघ्नजी से विवाह संस्कार सम्पन्न हुआ।
           











 

Monday, November 15, 2021

यज्ञोपवीत की शास्त्र सम्मत विवेचना (1) डा. राधे श्याम द्विवेदी

 
ब्राह्मण ब्रह्म (ईश्वर) तेज से युक्‍त होता है। कहा गया है
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम।। 
गृ.सू. 2.2.11 में इस प्रकार महत्ता कही गई है
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ 
जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के16या 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।
यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।
अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।
सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है। 
यज्ञोपवीत संस्कार के अनेक चरण
वर्तमान में ये संस्कार सिर्फ ब्राह्मणों में ही किया जाता है। इस संस्कार में 10 साल से कम उम्र के ब्राह्मण बालकों को जनेऊ धारण करवाई जाती है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। जनेऊ पहनने से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है।
दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म या दूसरा व्यक्तित्व पाना।
.......क्रमशः(2) अगले पोस्ट में।