Thursday, March 12, 2026

"उपाध्याय इस्टेट” नगर बाजार बस्ती का विकासशील केदारनाथ का समय ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

               प्रतीकात्मक चित्र

बस्ती जिले के नगर बाजार स्थित उपाध्याय इस्टेट के संपूर्ण विकास क्रम को तीन काल खण्डों में बांटा गया है- 


1.प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड 

2.प्राचीन विकासशील कालखण्ड 

3. वर्तमान विस्तारवादी काल खण्ड 

साधु और गृहस्थ के जीवन में अंतर ~

संसार में हर व्यक्ति को, चाहे वह गृहस्थ हो या त्यागी, उसे बाहर की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है ,संघर्ष करना पड़ता है और अपने आप को सम्भालकर चलना पड़ता है। यह हम लोगों की वास्तविक परिस्थिति हुई । चाहे गृहस्थ हो या साधु, दोनों के लिए परिस्थिति समान है। दोनों के जीवन में कौन सी चीज का अंतर है? 

सकामता और निष्कामता - 

 दोनों के जीवन में केवल एक ही वस्तु का अंतर रहता है - सकामता और निष्कामता। स्वार्थ की भावना और निःस्वार्थ कीभावना। गृहस्थ संग्रहकर्ता होता है जबकि त्यागी दानकर्ता। गृहस्थ को बटोरना अच्छा लगता है, क्योंकि बटोरने से संपन्नता का आभास होता है, भले ही वह मिथ्या आभास हो। साधु संग्रहवृत्ति का त्याग कर चुका है। उसका देने का स्वभाव होता है। अगर बटोरता भी है, तो देने के लिए ही बटोरता है। उपाध्याय इस्टेट के केदार नाथ में यही भाव था। वे परिवार समाज के बंधन में होकर बटोरते तो थे, परन्तु अपना सब कुछ दूसरों पर न्योछावर भी कर देते थे।

गृहस्थ में ही योगवृत्ति - 

दोनों की परिस्थितियां एक जैसी हैं, केवल मानसिकता और दृष्टिकोण अलग हो जाता है। एक की मानसिकता भोग वृत्ति द्वारा प्रभावित और निर्देशित होती है, दूसरे की योग वृत्ति द्वारा। जब गृहस्थ में भोगवृत्ति प्रबल होती है, तब वह संसारी कहलाता है।जब गृहस्थ में ही योगवृत्ति प्रबल होती है, तब वह सद्गृहस्थ या साधु पुरुष कहलाता है। जिस साधु में भोग की वृत्ति प्रबल हो गई, वह ढोंगी कहलाता है। जिस साधु में योग की वृत्ति प्रबल हो गई वह संत कहलाता है। 

ईश्वराभिमुख मानव - 

आध्यात्मिकता के आने से मनुष्य ईश्वराभिमुख होता है और अपने जीवन में ईश्वर के अस्तित्व को "सत्यम्-शिवम्- सुंदरम्" के रूप में जानने लगता है। आध्यात्मिक वृत्ति का प्रयोजन जीवन में शांति और शक्ति प्रदान करना है, अपने आराध्य के साथ एक अटूट संबंध को स्थापित करना है। गृहस्थ के लिए भी शांति,शक्ति और संबंध उतने ही आवश्यक हैं, जितने एक साधु के लिए। हम सब शांति, शक्ति और संबंध को स्थापित करने के लिए काम करते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके घर में शांति, सुख, आराम और सुविधा रहे। हर व्यक्ति चाहता है कि उसमें अपने सभी दायित्वों का निर्वाह करने और अपने आप को समाज में प्रतिष्ठित करने का सामर्थ्य, शक्ति, प्रतिभा और कार्यक्षमता हो। हर व्यक्ति एक संबंध को स्थापित करना चाहता है, जिसके द्वारा उसकी पहचान बढ़े। लेकिन साधु का दृष्टिकोण इन तीन चीजों को संसार से जोड़ने के बजाए ईश्वर से जोड़ने का होता है। वह ईश्वर से संबंध जोड़ता है, ईश्वर से शक्ति प्राप्त करता है और शांति उसे ईश्वर के समीप ले जाती है। 

             प्रतीकात्मक चित्र

उपाध्याय इस्टेट के केदारनाथ परिवार के मालिक हुए- 

आज हम द्वितीय प्राचीन विकासशील कालखण्ड पर विचार करेंगे। महाराज राम 1870 ई. में पैदा हुए थे। उनकी शादी माधवपुर में हुई थी जिनसे  परमेश्वर नाथ 1894 ई. में, ईश्वरनाथ 1896 ई. में, केदारनाथ 1898 ई. में, तामेश्वर नाथ 1900 ई. में पहली पत्नी से पैदा हुए थे। पहली पत्नी का निधन होने के बाद 1903 ई. में उन्होंने दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा तहसील हरैया जिला बस्ती में किया जिनसे 1908 ई. में चंद्रिका प्रसाद का जन्म हुआ था।

     बड़े भाई परमेश्वरनाथ की राय से केदारनाथ जी को घर का मालिक बनाया गया एवं तमेश्वरनाथ गल्ले व खेती के व्यवस्थापक हुए। रामबरन, रामसुन्दर ने घरेलू समस्त कार्यों की देख-रेख अपने हाथ में सम्हाला हुआ था। पूरा परिवार संगठित होकर काम करने लगा था। चन्द्रिका प्रसाद के दो लड़के कपिलदेव व सर्वदेव तथा तमेश्वरनाथ के एकलौते लड़के वंशमणि अब स्कूल जाने लगे थे। इन सभी को पढ़ने-पढ़ाने का काम चन्द्रिकाप्रसाद को सौंपा गया था। दूध देने वाले जानवरों की अधिकता से घर में गोरस का बाहुल्य हो गया था। अपने खान पान के लिए अब केदारनाथ जी का उपाध्याय वंश क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया था।

उच्चकोटि के गृहस्थ सन्त हुए - 

'साधु' केदारनाथ एक उच्चकोटि के गृहस्थ सन्त थे, जिनको क्षेत्र के हजारों लोग गौरव से देखते थे। इनका जीवन अनुकरणीय था। ये घर के आदर्श मालिक थे जो लखपती होते हुये भी सदैव खाली हाथ रहते थे। मरते समय इनके पास कफन का पैसा भी नहीं था। धर्मशास्त्र में पुराण का अच्छा ज्ञान था। गृह कार्य में दक्ष होते हुये अनाशक्ति भाव से परिवार की सेवा करते परिवार के 40 से 50 सदस्य इन्हें सब बराबर थे । कोई अपना पराया नहीं था। इनका जीवन सामाजिक था। सैकड़ों लोगों से सम्पर्क था। पढ़े कम थे किन्तु कुशाग्र बुद्धि के थे। एक बार जो सुनते थे उसे तुरन्त स्मरण करके दूसरों तक पहुँचा देते थे। सत्संग में कथा कहने के ये शौकीन थे। ईश्वर के प्रति इनकी आस्था गहरी थी। ये गुरु परम्परा की पूजा में विश्वास करते थे । रामायण और सुखसागर के आधार पर राम और कृष्ण अवतार की सारी कथायें इन्हें स्मरण थी। ये कबीरपंथी साधुओं से काफी जमकर सत्संग करते थे। मूर्ति पूजा के समर्थक तथा वृक्षों से लेकर पशु पक्षियों के प्रति श्रृद्धा रखते थे। मानवों के प्रति इनकी ईश्वरीय निष्ठा थी। कीर्तन भजन में पूर्ण विश्वास के साथ साधु-संतों और कलाकारों का सहयोग करते थे।

    उपाध्याय वंश के छोटे लोग इन्हें “साधू दादा” और बड़े लोग इन्हें “साधू बाबू” कहकर सम्मान देते थे। ये राम और कृष्ण को अपना भगवान मानते हुये गोचारण भी करते थे तथा बांसुरी खूब अच्छी तरह से बजाते थे। शंकर जी की पूजा में त्रिशूल के साथ डमरू भी रखते थे। सुबह-शाम जब इनका डमरू बजता था तो गाँव के लड़के इकट्ठा हो जाते थे और कभी गुड़ कभी बताशा कभी लड्डू का प्रसाद यह मुक्त हस्त से प्रदान करते थे। त्यौहारों के दिन 25 किलो तक चने के बेसन के लड्डू बनते थे। 

केदार आश्रम कुटी सीतारामपुर- 

वे एक छप्पर की कुटी बनाकर रहते थे और साधु सन्यासियो की सेवा करते थे। कोई न कोई साधु उनके पास जरूर रहता था। उनके भाई तमेश्वरनाथ उनके लिए दूध-दही, घी, आदि का खूब प्रबन्ध किये रहते थे। क्योंकि वे एक ही बार दिन में भोजन करते थे। केदारनाथ की भागवत भक्ति से उनके माता-पिता बहुत प्रसन्न रहते थे। - ( संदर्भ वही पृष्ठ 40)

     परिवार के साथ-साथ गाँव के लोग की बिना भेदभाव के परिवार से जुड़े रहते थे। इनके सत्संग में दूर-दूर के संत केदार आश्रम में आते थे। इनका निवास कुटी मे था, जब कि इनके पास तीन किता का मकान था।  ये बच्चों के प्रति अनाशक्त रहते थे। लेकिन इनके छोटे भाई तमेश्वर नाथ अन्य लोगों को अपने लड़के से भी अधिक मानते थे। परमेश्वरनाथ जी के पुत्र रामबरन सबके प्रति अगाध निष्ठा रखते थे। 1955 ई. में जब मुनिलाल जी जू. हा. नगर से कक्षा 8 उत्तीर्ण किया तो रामबरन ने ही उनका नाम बस्ती जिले के खैर इण्टर कालेज में लिखवाया था और आकर कभी - कभी देख - रेख भी किया करते थे।

    रामबरन जी अपने भैवादी में सबसे बड़े थे। चन्द्रिका प्रसाद इनसे दो वर्ष छोटे थे। दोनों लोग सन् 1930 ई.से ही घर का कार्यभार सम्हालने लगे थे । किसी भी जिम्मेदारी के कार्य में परमेश्वरनाथ और  केदारनाथ इन्हीं लोगो को आगे किये रहते थे। दस बैलों की खेती 10 भैंस व 25 गायों की देखरेख चरवाहे और घर के इन्हीं व्यक्तियों की देखरेख में होती थी। सन् 1945 ई.के पश्चात् सर्वदेव पहलवान गाय भैंसों की देखरेख करते थे। जवार के लोग इस पट्टी को काफी सम्मान देते थे। दो चार पट्टीदार के लोग दोपहर का भोजन घर के लोगों के साथ करते थे। दिन में कम से कम बाहरी लोग 50 से 100 तक के लोग इस  घर पर जलपान करते थे। पट्टीदारी के सत्यनारायण उपाध्याय, रिस्तेदारी के रामलगन तिवारी, शिवमूर्ति उपाध्याय आदि हप्ते में तीन चार दिन आया - जाया करते थे। गाँव के असामी खेती आदि कार्य में सहयोग देते थे। तमेश्वरनाथ की अगुवाई में 10-10 वर्ष का जड़हन केदारनाथ के ही परिवार में मिलता था । उस समय लाल मधुकर जड़हन यहाँ खूब होता था,जो वायु विकार वाले अक्सर लोग खाते थे। रोगियों को केदारनाथ उपाध्याय द्वारा मुक्त दान में दिया जाता था। इनके द्वारा अपने साधुओं को अंचला, ब्राह्मणों को अन्न-वस्त्र और लड़कियों की शादी में अन्न आदि का सहयोग मुफ्त व रुपये पैसे का योगदान, कुछ मुफ्त कुछ बिना सूद के दिया जाता था। 

     जो भी बीमार होता था लक्खू बैद को महराजराम अपने खर्चे से बुलाते थे। सन 1950 ई. तक बंसमणि कपिलदेव सर्वदेव  रामबरन व रामसुन्दर के सहयोग में कृषि कार्य में लग गये थे। रामबरन जी बैलगाडी चलवाते थे। सन 1950 ई. तक वंशमणि कपिलदेव सर्वदेव आदि युवक रामबरन चलवाते थे, जिससे गन्ना बोने का कार्य होता था। गन्ना भी आय का साधन था।  इस खानदान के दस बैल पूरे क्षेत्र में मशहूर थे। राजा पोखरनी की देखा-देखी यहाँ भी एक बाल्टी गुड की चाय भैंस के दूध में बनती थी। जिसे पटटीदार समेत लगभग 100 लोग प्रातःकाल पीते थे। ओरी खवास के सहयोग से  केदारनाथ एक लोटा चाय पीते थे।

वैवाहिक एवं परिवारिक स्थिति - 

केदारनाथ जी महराजराम के योग्य पुत्र में बड़े ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी प्रथम ससुराल रेंगी तिवारी, दूसरी ससुराल भरथापुर कप्तानगंज और तीसरी ससुराल लहूरादेवा तिवारी खानदान में थी। केदारनाथ की दो पत्नियाँ मर चुकी थीं। कोई सन्तान नहीं थी। महराजराम और उनकी पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने 42 वर्ष की अवस्था में तीसरी शादी किया था। केदारनाथ जी को अपना योग्य पुत्र समझकर उनके पिता महराजराम बहुत खुश थे। मां भी केदारनाथ को अपना प्यारा पुत्र मानकर काफी सम्मान देती थीं। केदारनाथ को विवाह उपरान्त उनके पुत्र के रुप में मुनिलाल उपाध्याय सन् 1940 ई. में आश्विन मास की एकादशी को उत्पन्न हुए और उसके बाद एक उनकी बहन शोभावती तथा सन् 1950 ई. में वशिष्ठ प्रसाद नामक छोटा पुत्र  उत्पन्न हुआ था। केदारनाथ जी ईश्वर की तरफ ध्यान अधिक देते थे। इसलिए केदारनाथ की मां मुनिलाल और उनकी माँ को बहुत अधिक मानती थीं। वह कहती थीं कि यह लड़का ऊसर का बीज है। इसकी रक्षा मैं करूँगी।

वैराग्यमय जीवन - 

ईश्वरनाथ की असामयिक मृत्यु को देखकर केदारनाथ के मन में विराग हो गया था। वे पढ़े-लिखे अधिक तो नहीं थे। किन्तु अध्ययनशील और सत्संगी थे। बड़े-बड़े साधु-सन्तों का आदर वे जीखोलकर करते थे। माता-पिता की सेवा में अधिक समय देते थे। उनका सादा जीवन उच्च विचार देखकर उनकी मां बहुत खुश रहती थी। वे भी माता पिता को ईश्वर के समान मानते थे।

सामूहिक गुरुमुख दीक्षा

महसों का शुक्ल उनके घराने के कुलगुरु थे। उन्हें गंगाजली बाबा भी कहा जाता था। वे गांव में जब आए हुए थे तो उनके सम्मुख जैसे केदारनाथ जी आये उन्होंने कहा, “तुम तो सन्त स्वभाव के लग रहे हो।” विनम्रता की मुद्रा में केदारनाथ जी ने कहा, “महराज जी ! भगवान ही सब कुछ करता है। आज आप आ गये मानो भगवान आ गये । मेरा मन ईश्वरनाथ बाबू के मरने से बेचैन है। आप मुझे गुरुमुख करा दीजिए।” उनके साथ गांव के 10 अन्य लोगों  भी गुरुमुख दीक्षा ली थी । गुरुमुख होने के पश्चात् केदारनाथ उपाध्याय अध्यात्म की तरफ आकर्षित हो गए थे। वे प्रतिदिन प्रातःकाल का दो घण्टे का समय पूजा पाठ में लगाने लगे। - ( संदर्भ वही पृष्ठ 33,34)

     रामचरितमानस व श्रीम‌द्भागवत पुराण की कथाओं का अध्ययन करके वे सत्संग में रुचि लेने लगे। उनके भाई तमेश्वरनाथ ने सारा कार्यभार अपने ऊपर ले लिया। केदारनाथ जी घर की अगुवाई के साथ-साथ ईश्वर आराधना से सुखी रहने लगे। उन्होंने सर्वप्रथम ऐसे सन्त, जो पास-पड़ोस में थे, से सत्संग करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने योगी सुन्दरदास कुदरहा, समबाबा गोरयानाला मन्दिर भरवलिया तथा पं. गोमती पुजारीभर, कामता प्रसाद पाण्डेय अठदमा व शरणदास महाराज कपरफोर से चर्चा चलने लगा था। पटटीदारी के सत्यनारायण जी जो इनके समवयस्कर इनके साथ सत्संग में लगे रहते थे।

अचला और लंगोटी धारण किया - 

केदारनाथ जी भगवान के प्रति इतने भावुक हो गये कि उन्होंने वस्त्र छोडकर अचला और लंगोटी पहनावा ग्रहण किया। एक बार भोजन करके अधिक समय में सन्त सेवा में लगाने लगे। सन्तों का आगमन खूब होने लगा। सारा समाज इन्हें “साधू बाबू” कहने लगा। चार बजे ये दो घण्टे जोर-जोर की आवाज में “राम-राम” रटते थे, जो पड़ोस तक सुनाई देता था ।

      गृहस्थआश्रम में रहते हुए भी केदार नाथ उपाध्याय इस्टेट के चर्चित व्यक्तियों में गिने जाने लगे। इनकी कर्मठता से लछिमन दत्त का कुल साहबराम ,महराज राम को लेकर केदारनाथ तक एक सदकुलीन स्वर्णाभूषित मुक्ताहार हो गया था। केदारनाथ ने तमेश्वरनाथ को घर का अधिकांशतः कार्यभार सौंप दिया और उनके साथ चंद्रिका प्रसाद व रामबरन व रामसुन्दर  को लगा दिए थे। संतों के आगमन से गांव और ज़वार के वरिष्ठ नागरिकों का जमावड़ा होने लगा था। रामचरितमानस की कथा हफ्तों चलने लगी थी। कृष्ण भक्त सन्तों ने श्रीमद् भागवत पुराण और सुखसागर को आधार बनाया हुआ था। - (वही पृष्ठ 40, 41)

तीर्थ यात्रा पर - 

सीतारामपुर के पड़ोस के गांव मदारपुर के भवानी भीख मौर्य इलाहाबाद में रहते थे। जिन्होंने इस गांव के दर्जनों परिवार के लोगों को प्रयाग राज का संगम स्नान, अक्षय वट का दर्शन, प्रयाग किला , लेटे हनुमान मंदिर का दर्शन तथा अन्य छोटे - मोटे मंदिरों का दर्शन कराया था। यहां से भारद्वाज आश्रम के पावन स्थलों का दर्शन कराया गया। फिर विंध्याचल के लिए प्रस्थान कर गंगा स्नान, मां विंध्यवासिनी जी का दर्शन तथा विंध्याचल पहाड़ी का भ्रमण कर प्राकृतिक छटाओं का सम्यक अवलोकन किया। तीसरे दिन अयोध्या सरयू स्नान हनुमान गढ़ी, कनक भवन, राजा ददुवा के राजमहल और अन्य प्रमुख मन्दिरों का दर्शन कर सीतारामपुर अपने-अपने घर वापस आ गए।  

असमय मृत्यु- 

सन् 1956 ई.में परमेश्वर नाथ जी दिवंगत हो गये उनके दिवंगत होने से केदारनाथ बेचैन हो गये जहाँ जाय रोते हुये यही कहते बाबू चले गये। एक वर्ष के अन्दर बेचैन रहने वाले केदारनाथ 12 अक्टूबर 1957 ई. को इस आसार संसार से सदा सदा के लिए विदा हो गए।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

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