Wednesday, March 4, 2026

नगर के गौतम राज्य का प्रारंभिक इतिहास ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


अर्गल से प्रवासित होकर आए घोलराव इस वंश के आदिपुरुष संस्थापक रहे - 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित था। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है।

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पूर्वांचल के महान कवि साहित्यकार एवं इतिहासविद् डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘‘सरस’’ ने अनुश्रुतियों को आधार लेकर लिखा है कि तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा  नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बस गए थे। चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन खिलजी के उत्तर भारत में आक्रामक विजय अभियानों विशेषकर 1301-1311 के दौरान के चलते, अरगल राज्य के गौतम गोत्री राजपूत नृपति घोलराव ने अपना राज्य छोड़ दिया था ।
डॉ. ज्ञानेंद्र नाथ श्रीवास्तव पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद की प्रतिक्रिया 
डॉ. ज्ञानेंद्र नाथ श्रीवास्तव पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद जो मूलतः फतेह पुर के निवासी हैं मेरे फेसबुक लिंक पर निम्नवत प्रतिक्रिया दी है - 
"फतेहपुर जिला गौतम ठाकुरों के लिये फेमस है, फतेहपुर नगर में गौतमाना नामक एक बहुत बड़ा मोहल्ला है। यह स्थान गौतम ठाकुरों का गढ़ कहा जाता है। यहाँ से कालाकांकर के राजा दिनेश सिंह और राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह अनेकों बार सांसद रहे हैं।"
     अरगल राज्य के गौतम गोत्री राजपूत नृपति घोलराव अवध के बस्ती क्षेत्र में आकर बस गए और यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया। यह पलायन खिलजी के खौफ और राज्य विस्तार नीति का परिणाम स्वरूप बना हुआ था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच एक लघुराज्य की स्थापना किये थे। प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग) पर बाद में नगर खास/बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे।

बैरागल (राम जानकी मार्ग) में हुई थी लड़ाई  - 

नगर साम्राज्य पहले राहिला नामक डोम कटार राजाओं के अधीन रहा। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही समृद्ध और स्वतंत्र शासकों के अधीन रहा है। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। पठानों की बहुत बड़ी सेना नई राजधानी की तरफ आगे बढ़ी। राव जगदेव ने उनका मुकाबला करते हुए उनके कमानडर को मौत के घाट उतार कर बैरागल की लड़ाई जीत लिया।

     17वीं-18वीं शताब्दी तक आते आते नगर के गौतम राजाओं का इस क्षेत्र पर काफी प्रभाव हो गया था और बाद में अंग्रेजी शासन के दौरान भी इनका उल्लेख मिलता है। राव जगदेव, अरगल का एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में निरीक्षण अभियान पर थे। उस समय इस भूभाग पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। वह गौतम राजपूतों से पराजित हुआ। बैरागल का युद्ध अर्गल के महाराजा ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें (बैरागल) नगर के पड़ोसी क्षेत्र का राजा घोषित किया।

राजा जगदेव सिंह ने नगर राजधानी बनाई

इस वंश के गौतमवंशी संस्थापक जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। इनकी पत्नी विसेन वंशी क्षत्रिय कन्या थी। राव जगदेव, अरगल के एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में अभियान पर थे। उस समय नगर पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। ये लोग गौतम राजपूतों द्वारा पराजित कर भगा दिये गये थे। 

खूबसूरत और आकर्षक चन्दो ताल- 

प्राकृतिक सौंदर्य को खुद में समेटे बस्ती जनपद का चन्दो ताल देखने में बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक है। बाद में इस ताल को पक्षी विहार का भी दर्जा प्राप्त हो गया है। यह बस्ती जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर चंदों गांव में स्थित है। 5 किमी. लम्बी व 750 हेक्टेयर में फैला यह ताल 17 वीं शताब्दी का बना हुआ है।17 वीं शताब्दी में यह ताल राजभरो के चंद्रनगर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इनके अवशेष यहां पर तालाब की खुदाई के दौरान मिले भी थे। राव जग देव गौतम ने चन्दो तालाब के किनारे राजा का कोट नामक अपना किला बनवाया था। इसे राजा का कोट कहा जाता है। वर्तमान समय में यह अवशेष रूप में देखा जा सकता है।

बैरागल की लड़ाई के बाद राजा घोषित- अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव की बहादुरी के लिए उन्हें बैरागल (वर्तमान नगर) का राजा घोषित किया। उनके राज्याभिषेक के बाद, बड़े सैनिकों के साथ पठानों ने बैरागल के नए राज्य पर चढ़ाई कर दी थी। राव जगदेव ने वीरतापूर्वक युद्ध किया। पठानों के सेनापति को मार डाला और बैरागल की लड़ाई जीत ली। 

राजा भगवन्त राव - 

जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी।  अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था ।

राजा चंदे राव- 

बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हरा उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना  नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।

डोंगरापुर युद्ध- 

कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह थे जो नगर के राजा बने। एक युद्ध में राजा हरबंस सिंह वीरगति मिली जिसके परिणाम स्वरूप राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। उन्होंने डोंगरापुर युद्ध में अपनी विरासत का हिस्सा खोया था। डोंगरापुर संभवतः कलवारी के पास स्थित डींगरापुर मुस्तकम, डींगरापुर एहतमाली गांव हो सकता है। जिसके युद्ध में हरबंस सिंह  वीरगति को प्राप्त हुए और इस एवज़ में राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने।

     राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी ग्राम पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं। 

गनेशपुर भी रहा मुख्यालय - 

राजा गजपति राव ने अपना मुख्यालय गनेशपुर ले आये थे। उनके चार पुत्रों को गनेशपुर के 54 गांव प्राप्त हुये थे। ये नगर के गौतम वंशी राजाओं के हिस्से में आया था। इन लोगों ने यहां मिट्टी का एक किला बनवाया था जिसके किनारे -किनारे खाईयां लगवाई थी। इसके चारों ओर बॉस के बेड़े से सुरक्षित घेरा बनाया गया था । 

    व्रिटिस काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ था। उनके पौत्र राजा जय प्रताप सिंह डेंगरपुर के मिल्कियत के लिए हुए दंगे में मारे गये थे।

     नगर के राजा गजपतिराव सिंह के वारिस उनके बड़े पुत्र हरवंश सिंह हुए जिन्होने अपने छोटे पुत्र को 60 गांव दिया। इसके पांच पीढ़ी के बाद  राजा अम्बर सिंह के समय 60 और गांव या तो निकल गये या तो वेंच दिये गये। जिससे लगान की भरपाई की गई थी । यद्यपि राजा ने अपने आदमियों से बराबर के गांवों को जप्त कर लिया था। अम्बर सिंह के पौत्र निःसंतान थे। सम्पत्ति पुनः पैतृक शाखा में वापस चली आयी।

   1811-12 में राजस्व न दे पाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने इस संपत्ति को पिंडारियो को बेच दिया गया।1818 में बीबी मोती खानम द्वारा राजस्व ना दे पाने के कारण इस सम्पत्ति को पुनः बेच दिया गया। सरकार को उस समय रु 8343/– मिले थे। इसे अमीर खान पिंडारी के सेनापति कादिर बक्स ने ले लिया था। जिसने मराठा युद्ध के समय अपने को यहां सुरक्षित किया था और उसे पारितोषिक के रूप में मिला था। (संदर्भ : बस्ती का गजेटियर 1983 पृष्ठ 254-55)

विश्वनाथ सिंह पिपरा राज्य के राजा - 

इसी वंश परम्परा में विश्वनाथ सिंह शासक बने। उन्होंने नगर राज्य (पिपरा तालुक) का शासन संभाला था। राजा गजपति के छोटे पुत्रों को 60 गाँवों वाला पिपरा तालुक प्राप्त हुआ था । पिपरा के राव राम बक्श सिंह; उनके वंशजों ने इस तालुक पर शासन किया। इनके भाग के बारह गांव लगभग 7000 एकड़ वाला क्षेत्र ब्रिटिश अधिकारी मि. कुक को दिया गया। इसके बावजूद गौतमों ने उसे अपने नियंत्रण में ही ले रखा था। ये क्षेत्र पिपरा ,कलवारी, दुखरा और कनौला में लगभग 10,000 एकड़ में फैला हुआ था। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्ति पिपरा के राम बक्श सिंह थे। (नेविल का 1907 का गजेटियर पृष्ठ 248 )


रुधौली का बझेरा राज्य - 

राजा गजपति सिंह (गौतम राजपूत) उत्तर प्रदेश के बस्ती के रुधौली क्षेत्र के ऐतिहासिक "नगर" तालुके के भी प्रमुख शासक थे, जो अपनी वीरता और गौतम राजपूत वंश से संबंध के लिए जाने जाते हैं। यह यह रुधोली का प्रमुख गांव है जो बांसी के श्रीनेत्र राजा द्वारा स्वीकृत उत्तर वशी और रिश्तेदारों को मिला था। रुधौली के आसपास बझेरा एक प्रमुख भू भाग रहा है जो बरसात में पानी से भर जाता था । यह लगभग 1,792 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें लगभग 1,000 एकड़ में खेती होती है। इसका राजस्व रुपया 1,505 बनता है। ज्यादातर भूमि 1,565 एकड़ भैया जय लाल सिंह आनरेरी मजिस्ट्रेट के कब्जे में रहा है। भैया माधो प्रसाद सिंह के कब्जे में 4,338 एकड़ भू भाग रहा है। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ 260 )

अठदमा स्टेट - 

अठदमा के भैया बद्री प्रसाद के पास इस परगना की लगभग 8,572 एकड़ भूमि रही है। जिनके साथ अच्छा नहीं हुआ। वे आपस के काश्तकारों में उलझे रहे।इस प्रकार यह जिले का सबसे खराब गांव के रूप में बन गया था। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ  260 ) बाद में इस कुल ने अपनी स्थिति मजबूत की । ये अठदमा गांव के 'विलास कुंज' में अपना आशियाना बनाए। रुधौली के अंतर्गत अठदमा के राजा आदित्यविक्रम सिंह के पिता स्वर्गीय दिवाकर विक्रम सिंह यूपी सरकार में कई बार मंत्री और विधायक भी रह चुके हैं, उनकी इस विरासत को उनके बेटे आदित्य विक्रम सिंह ने भी संभाला और वे भी रुधौली सीट से विधायक बनते रहे। अब उनकी इस राजनीतिक विरासत को उनके बेटे पुष्कर विक्रम सिंह भी संभाल रहे हैं।



लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


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