Friday, December 19, 2025

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की राजभाषा विषयक विसंगतियां नियमों का उल्लंघन

एक राजपत्रित अधिकारी होते हुए बिना किसी और सहयोगी को दिए मुझसे लगभग एक दशक तक राजभाषा विभाग और प्रकाशन विभाग का काम की अतिरिक्त जिम्मेदारी डाली गई थी । मेरे समय में एक बार संसदीय कमेटी का निरीक्षण भी कराया था।इस कारण मेरे मेलिंग पते पर कभी कभी विभागीय सूचनाएं आ जाती हैं। चूंकि जो सूचनाएं और बिंदु इंगित किया गया है वह वाकई विचारणीय हैं। अस्तु इन्हें जन हित में सार्वजनिक किया जा रहा है।

सेवा में,
संयुक्त सचिव
राजभाषा विभाग
गृह मंत्रालय, भारत सरकार
नई दिल्ली – ११०००१

विषय - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राजभाषा अधिनियम, 1963 एवं राजभाषा नियम- 1976 का उल्लंघन। 

माननीय महोदय/महोदया,

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राजभाषा अधिनियम, 1963 एवं राजभाषा नियम, 1976 का व्यापक और निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है। ई  पर्यटन पोर्टल, पुरातात्विक सूचना, संग्रहालय अभिलेख और जनसुविधा प्रणाली को केवल अंग्रेज़ी में रखना राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) और राजभाषा नियम 11 का सीधा, जानबूझकर किया गया और अस्वीकार्य उल्लंघन है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एक राष्ट्रीय संस्थान है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक है। ऐसे में राजभाषा हिन्दी के प्रति इसका उदासीन व्यवहार न केवल कानूनी उल्लंघन है, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और भाषाई अन्याय भी है।

2. विशेष चिंताएँ: सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व

भारत की सांस्कृतिक विरासत और हिन्दी भाषा का अविच्छेद्य संबंध

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रधान संरक्षक संस्थान है। ताजमहल, खजुराहो, अजंता-एलोरा, कोणार्क सूर्य मंदिर, सांची स्तूप जैसे महत्वपूर्ण स्थल एएसआई के अधीन हैं। इन स्थलों की जानकारी का भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिन्दी में उपलब्ध न होना अपने आप में एक सांस्कृतिक संकट है।

प्रमुख चिंताएँ:

•       जनता से विमुखता: भारत भारत के करोड़ों हिन्दी-भाषी नागरिक अपनी ही ऐतिहासिक विरासत से अंग्रेज़ी के माध्यम से जुड़ने को बाध्य हैं।

•  शिक्षा पर प्रभाव: छात्रों को ऐतिहासिक शोध के लिए हिन्दी संसाधन न मिलना एक बड़ी कमी है।

•       पर्यटन में असमानता: विदेशी और अंग्रेज़ी-भाषी पर्यटकों को विस्तृत जानकारी मिलती है, जबकि भारतीय पर्यटकों को सीमित जानकारी।

•       वैज्ञानिक दस्तावेज़: पुरातात्विक शोध, संरक्षण रिपोर्ट, और वैज्ञानिक अध्ययन केवल अंग्रेज़ी में हैं, जिससे हिन्दी माध्यम के शोधकर्ताओं को हानि पहुँचती है।

•       राजभाषा नीति का उपहास: एक सरकारी संस्थान के रूप में एएसआई का यह रवैया राजभाषा नीति का खुला उपहास है।

3. त्वरित एवं विधिसम्मत कार्रवाई हेतु विस्तृत अनुरोध

उपरोक्त गंभीर उल्लंघनों को समाप्त करने तथा डिजिटल एवं सूचना सेवाओं में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग को तत्काल सुनिश्चित करने के लिए आपसे निम्नलिखित त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया जाता है:

1.    तत्काल पूर्ण द्विभाषीकरण (नियम 11): एएसआई की वेबसाइट asi.nic.in को तीन महीने के भीतर पूर्णतः द्विभाषिक (हिन्दी और अंग्रेज़ी) बनाया जाए, जिसमें:

•       सभी वेब पृष्ठ, लिंक, और नेविगेशन हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध हों

•       होमपेज पर हिन्दी को प्रमुख स्थान दिया जाए

•       सभी ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी द्विभाषिक हो

2.ई पर्यटन पोर्टल का द्विभाषीकरण: ऑनलाइन टिकट बुकिंग, अनुमति आवेदन, और पर्यटन संबंधी सभी सेवाएँ तत्काल हिन्दी में उपलब्ध कराई जाएँ।

3.    संग्रहालय सामग्री का हिन्दी अनुवाद: सभी महत्वपूर्ण पुरातात्विक सूचना, संग्रहालय लेबल और निर्देश तीन महीने के भीतर हिन्दी में अनुदित किए जाएँ।

4.    शोध और वैज्ञानिक दस्तावेज़: एएसआई द्वारा प्रकाशित सभी शोध रिपोर्ट, संरक्षण अध्ययन, और वैज्ञानिक पत्रों का हिन्दी सारांश/अनुवाद उपलब्ध कराया जाए।

5.    राजभाषा समिति का गठन: एएसआई के निदेशक की अध्यक्षता में एक स्थायी राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की जाए, जो तिमाही प्रगति रिपोर्ट तैयार करे।

6.    कर्मचारी प्रशिक्षण (नियम 13): सभी कर्मचारियों को हिन्दी में कार्य करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाए, विशेषकर जनसंपर्क और पर्यटन विभाग के कर्मचारियों को।

7.    पारदर्शिता और जवाबदेही (नियम 12):

•       एएसआई की वेबसाइट पर एक समर्पित "राजभाषा कोना" बनाया जाए

•       मासिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए

•       राजभाषा नीति और कार्यान्वयन रणनीति वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए

8.    क्षेत्रीय कार्यालयों का समन्वय: एएसआई के सभी क्षेत्रीय कार्यालय व शाखाएँ अपने स्तर पर द्विभाषिक सेवाएँ सुनिश्चित करें।

9.    जवाबदेही व्यवस्था: जो अधिकारी राजभाषा नियमों का उल्लंघन करते हैं, उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

आपसे निवेदन है कि इस शिकायत को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए निम्नलिखित कार्य करें:

1.    तत्काल निरीक्षण: एएसआई के निदेशक स्तर पर तुरंत निरीक्षण कराया जाए और वर्तमान स्थिति की रिपोर्ट माँगी जाए।

2.    समय-सीमा निर्धारण: द्विभाषीकरण के लिए स्पष्ट समय-सीमा (अधिकतम 6 महीने) निर्धारित की जाए।

3.    जवाबदेही: एएसआई के मुख्य प्रशासन को निर्देशित किया जाए कि वे राजभाषा अनुपालन को अपना अनिवार्य लक्ष्य बनाएँ।

4.    अन्य सांस्कृतिक संस्थानों का पर्यवेक्षण: यह शिकायत एक उदाहरण बनकर अन्य सभी सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों को भी सचेत करे।

5.    जनता को सूचित करें: एएसआई और राजभाषा विभाग के बीच के पत्राचार को सार्वजनिक किया जाए ताकि नागरिक समाज भी निरीक्षण कर सके।

कृपया इस शिकायत पर की गई त्वरित प्रगति रिपोर्ट मुझे भी भेजी जाए।

भवदीय,

विपुल कुमार जैन 

प्रतिलिपि सूचनार्थ

1.    माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार
2.    सचिव, राजभाषा विभाग, भारत सरकार
3.    सचिव, संसदीय राजभाषा समिति
4.    महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली
5.    संयुक्त सचिव (संस्कृति), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
6.    सचिव, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

Monday, December 15, 2025

देवरहा श्रद्धार्चन स्तुति और आरती। संकलन: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

        देवरहा श्रद्धार्चन

बन्दे देवरहाख्यमद्भुततमं देवं सुमञ्चेस्थितम्, कारुण्यातिभरेण 
चार्द्रहृदयं सत्पालनेतत्परम् । 
सिद्धं योगसमाधिजन्यपरमानन्दे 
निमग्रं प्रभुम्, 
अन्तर्दृष्टिपरं तथाप्यभयदं 
प्रत्यक्षतो दैवतम् ॥

(अनन्तश्री विभूषित योगिराज जी जो अत्यंत अद्भुत देवता हैं तथा मंच पर विराजमान हैं तथा जिनका हृदय करुणा के कारण अत्यंत कोमल है, जो सत्पुरुषों के पालन में तत्पर हैं और जो योगसमाधि के द्वारा उत्पन्न परमानन्द में निमग्न रहते हैं जो सदा अन्तर्मुखी दृष्टि से रहते हुए भी लोगों को अभयदान देते रहते हैं, जो प्रत्यक्ष में देवस्वरूप हैं को मैं नमस्कार करता हूँ।)

आर्त्तानां शरणं त्रितापहरणं शोकाग्निनिर्वापणम्, भीतानामभयं 
प्रसन्नवदनं प्रेमामृतास्वादनम् ।
नित्यं ब्रह्मरसप्रलीनहृदयं 
शान्तं जगत्पावनम्, 
ज्ञानानन्दघनस्वरूपममलं 
वन्दे गुरुं वत्सलम् ॥

(आर्त्त व्यक्तियों को शरण देने वाले, त्रिविध दुःखों का हरण करने वाले, शोक की अग्नि का शमन करने वाले, डरे हुए व्यक्तियों को अभय देने वाले, प्रसन्नमुख प्रेमामृत का आस्वादन करने वाले, सदा ब्रह्मानन्द में निमग्न रहने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, निर्मल तथा कृपालु गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।)

यस्य दर्शनयोगेन सर्वाबाधा पलायते । 
वंदे देवराहा बाबां लोकानुग्रहकारिणम् ॥

(जिनके दर्शन से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं, ऐसे लोक कल्याणकारी श्री देवराहा बाबा की मैं वंदना करता हूं।।

       ब्रह्मर्षि श्री देवराहा स्तुति

मंचात्प्रयच्छन् विपुलं प्रसादं
लोके वितन्नन् शुभदां सुबुद्धिम्।
जीवेषु कुर्वन्निह चानुकम्पा 
सः पातु नः शक्तिपतिर्हि बाबा।।


(मंच से विपुल प्रसाद प्रदान करते हुए, लोक में शुभ प्रदान करने वाली सद्बुद्धि का विस्तार करते हुए और जीवों के ऊपर अनुकम्पा प्रदान करते हुए वे शक्तियों के स्वामी महाराज देवराहा बाबा हमारी रक्षा करें।)

न शक्तिर्न भक्तिः न युक्तिः न मुक्तिः 
समृद्धिर्न सिद्धिर्न मे निर्मला धीः । 
ममाज्ञस्य त्राणं त्वदीयानुकम्पा 
परित्राणदाता प्रसीद प्रसीद ॥

(हे महाराज ! न मुझमें शक्ति है, न भक्ति, न युक्ति, न मुक्ति, न सुखोपभोग व ऐश्वर्य है न ही कोई सिद्धि और मेरी बुद्धि भी निष्कलुष नहीं है। मुझ अज्ञ की रक्षिका एकमात्र आपकी अनुकम्पा ही है। हे त्राणदाता! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों।)

ब्रीडा न मे विश्वभृतं हि याचे, 
बाबा अचिन्त्यं स्वगुणौ निगूढ़म् । 
यः सर्वशक्तिः करुणार्णवं तं, 
मंचाधिरुढं सततं नतोऽस्मि ॥

(विश्व का भरण करने वाले, अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न, अनन्त गुणों से युक्त होने के कारण अगम्य योगिराज देवराहा बाबा से याचना करने में मुझे कोई लज्जा नहीं है। मंच पर रहने वाले, सर्वशक्तिमान, करुणावरुणालय, ब्रह्मर्षि देवराहा बाबा को मैं निरन्तर नमन करता हूँ।)

   ब्रह्मर्षि योगिराज देवराहा आरती

मंगल आरती श्रीगुरुवर की, 
सत्-चित्-आनंद, विधि हरि-हर की।

अतुल-अनंत-अनामय-अव्यय, 
गुरु-परमातम, सिद्ध बोधमय;
दया-क्षमा-करुणा-वरुणालय-
भगत-वत्सल, भगवंत प्रवर की।
मंगल आरति

आदि-अनादि-अगोचर-अविचल, 
पालक-पोषक-रक्षक प्रतिपल।
स्नेह-सुधामय गुरु-गंगाजल-
गति-मति-सद्गति सचराचर की।।
मंगल आरति

,मात-पिता-भर्त्ता-गुरु-स्वामी 
सखा-शरण-प्रिय-अन्तर्यामी;
अखिल जगत के संबल नामी-
तन-मन-धन-आशा हर घर की। ।
मंगल आरति

काम-क्रोध-मद-लोभनिवारो, 
टारो; शोक-मोह-भय विभ्रम।
वरद हस्त सत्वर सिर धारो -
निर्मल ज्योति करो अंतर की। ।
मंगल आरति

धूप-दीप-नैवेद्य न पाऊँ 
पास तुम्हारे कैसे आऊँ;
श्री चरणों में सीस नवाऊँ-
गाऊँ गुन यश आरति-हर की। ।
मंगल आरति

अयोध्या की समरसता ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


श्री राम जी की नगरी अयोध्या क्षेत्र में लगभग 8,000 मठ, मंदिर, आश्रम और आवासीय भवन हैं, जिनमें से लगभग 1,080 को मठों, आश्रमों और मंदिरों के रूप में पहचाना गया है, जबकि बाकी आवासीय हैं। जर्जर मंदिरों की संख्या 182 से 500+ तक बताई गई है, लेकिन कोई निश्चित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इन मंदिरों में सनातन धर्म अनुसार विविध उपासना पद्धति का पालन किया जाता है । इससे यह संदेश दिया जाता है कि विविधता होने पर भी हिन्दू धर्म का सूत्र एक ही है । हिन्दू धर्म के प्रत्येक समुदाय को श्रीराम पूज्य तथा स्वीकार्य हैं ।
      अयोध्या की सामाजिक समरसता भगवान राम के आदर्शों, 'राम राज्य' की अवधारणा और विभिन्न धर्मों के सह-अस्तित्व पर आधारित है, जहाँ मंदिर निर्माण में भी समरसता का संदेश दिया गया, जैसे कि अलग-अलग जातियों के पुजारियों का चयन, और यह शहर अब धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ समृद्धि और भाईचारे का केंद्र बन रहा है, जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सभी के सम्मान पर जोर देता है। अयोध्या भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को मजबूत कर रही है, जहाँ सभी वर्ग एक साथ मिलकर देश के विकास में योगदान कर रहे हैं। 
5 गुरुद्वारे और 7 जैन मंदिर अयोध्या की शान बढ़ा रहे हैं 
अयोध्या धर्मनगरी में 5 गुरुद्वारे और 7 जैन मंदिर हैं जिनके माध्यम से बड़ी संख्या में गैर सनातनी भी अपनी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्राचीन काल से अस्तित्व में रहे ये गुरुद्वारे हिन्दू तथा सिख धर्म के बीच एकता का प्रतीक भी हैं । सिख एवं जैन धर्मियों के धार्मिक स्थल भी श्रीराम से पुराना संबंध दर्शाते हैं ।

1.ब्रम्ह कुण्ड सिक्ख गुरूद्वारा
इस गुरूद्वारे के समीप प्राचीन ब्रम्ह कुण्ड था । कहा जाता है कि ब्रम्हा जी ने इस स्थान पर 5000 वर्षों तक तपस्या किया। ब्रम्ह कुण्ड व उसी सीढ़ी सरयू में विलीन हो चुकी है। ब्रम्ह कुण्ड के कुछ भग्नावशेष हैं । या स्थान अतिरमणीक है इस स्थान से सरयू का विहंगम् दर्शन होता है। आषाढ़ माह में ब्रम्ह कुण्ड पर खड़े होने पर जल ही जल दिखाई देता है। प्रथम गुरू श्री गुरू नानक देय जी महाराज ने हरिद्वार से जगन्नाथपुरी की यात्रा समय सम्वत् 1557 में इसी स्थान पर बैठकर पण्डितों को सत्य उपदेश दिया था। नवम् गुरू श्री गुरू तेग बहादुर जी महाराज आसाम से आनन्दपुर साहब (पंजाब) जाते समय विक्रम सम्वत् 1725 में उक्त स्थान में श्री गुरू नानक देव जी मंत्री साहब पर मत्था टेककर सामने बैठकर 48 घन्टे तक अखण्ड तप किया। अपने चरण कमल की निशानी चरण पादुका (खडाऊँ) यहां के ब्राम्हण सेवक को प्रदान किया जिसका दर्शन गुरूद्वारे में होता हैं ।

2.गुरुद्वारा नजरबाग 
अयोध्या में नजर बाग मोहल्ले में गुरूनानकपुरा फैजाबाद की एक शाखा स्थापित है। इस स्थान पर भी गुरू गोविन्द सिंह जी आये थे और इस स्थान पर एक छोटी बीड़ (गुरू ग्रन्थ साहब हस्तलिपि) प्राप्त हुई थी। यह स्थान राजा मानसिंह ने गुरूद्वारा हेतु भेंट किया है। 

3. गुरुद्वारा गुरु नानकपूरा, फैजाबाद 

4. गुरुद्वारा अमानीगंज
आवास विकास कालोनी, इनर रोड अमानीगंज 

5. परमहंस आश्रम गुरुद्वारा
कारसेवक पुरम अयोध्या 

जैन मंदिर
पवित्र शहर में कई जैन मंदिर फैले हुए हैं- 

1. दिगम्बर जैन का मंदिर/धर्मशाला
दिगम्बर जैन का मंदिर/धर्मशाला रायगंज में स्थापित है । यहीं पर श्री श्री 108 भगवान श्री ऋषभदेव जी की 31 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित है । अनादिकाल से इसी भूमि पर 24 तीर्थकरों का जन्म होता आया है, 5 तीर्थकरों का जन्म अयोध्या में हुआ है । इन तीर्थकरों की प्रतिमा इस मंदिर में स्थापित है।दिगम्बर जैन इसकी स्थापना वर्ष 1965 में की गयी जिसमें 31 फीट ऊंची व वृषभदेव (आदिनाथ) के साथ ही चार अन्य तीर्थकरों श्री अनन्त नाथ, श्री अजित नाथ, श्री सुमति नाथ, श्री अभिनन्दन नाथ तथा चन्द्र प्रभु जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
2. श्वेताम्बर जैन मंदिर
श्वेताम्बर जैन यह कटरा मोहल्ले में स्थित है । इस मंदिर का जीर्णोध्दार जैन सम्प्रदाय द्वारा बर्ष 2000 में बनाया गया । इसमें तीर्थकर अजित नाथ, सुमतिनाथ, अभिनन्दननाथ, अनन्तनाथ की पद्मासन मुद्रा में प्रतिमाएं स्थापित है । इसके अतिरिक्त 19 कल्याण के चरण चिन्ह बनाये गये हैं।

3.आदिनाथ मंदिर, स्वर्गद्वार 

4.अनंतनाथ मंदिर, गोलाघाट 

5.सुमंतनाथ मंदिर,रामकोट

6.अजितनाथ मंदिर सप्तसागर

7. अभिनंदननाथ मंदिर सराय

पूजा और गृहस्थी के सामान के निर्माता मुस्लिमों की भागीदारी
खड़ाऊं, कंठी-माला, भगवान की पोशाक से लेकर मुकुट बनाने तक में जहां मुस्लिम परिवारों की भूमिका वर्षों से चली आ रही है. 
पुरानी अयोध्या में व्यापार के प्रमुख साधनों में खड़ाऊं, बेलन-चौका, रामनामी, सिंदूर-बिंदी, प्रसाद के रूप में लैया-खील बताशे, फूल- माला, प्रभु की ड्रेस-मुकुट आदि ही रहे हैं. और इन सबमें मुस्लिम समुदाय की भूमिका दर्ज की जाती रही है. मंदिरों में सेवक के रूप में भी मुस्लिम समुदाय अपना योगदान देता आया है. वे वर्षों से इस कम आय वाले व्यापार में भी खुश हैं।

ध्वस्त बाबरी मस्जिद के चारों ओर मुसलमानों के कब्रिस्तान 
ध्वस्त मस्जिद के चारों ओर 4-5 एकड़ जमीन" को लेकर केंद्र को मनमानी का आरोप लगाया जाता है।आसपास के 1,480 वर्ग मीटर के आसपास के क्षेत्रों में मुसलमानों के कब्रिस्तान पर नए राम मंदिर का निर्माण में प्रयुक्त होने की बात भी कही जा रही है।

बेलारीखान गांव में हिंदू ने अपनी जमीन कब्रिस्तान में दान की 
गोसाईंगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बेलारीखान गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनोखी मिसाल देखने को मिली है. यहां दोनों समुदायों के बीच दशकों से दुश्मनी की वजह बनी एक जमीन को कब्रिस्तान के लिए मुस्लिमों को दे दिया गया. 20 जून को स्थानीय संत सूर्य कुमार झींकन महाराज और अन्य आठ लोगों ने 1.25 विसवा जमीन की रजिस्ट्री कब्रिस्तान कमेटी के पक्ष में कराकर इस दुश्मनी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

टेढ़ी बाजार चौराहा निषाद राज चौराहे के रूप में परिवर्तित 
अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि को जाने वाला प्रवेश मार्ग जो टेढ़ी बाजार चौराहे के नाम से जाना जाता था, उसका नाम अब बदल गया है. अब ये चौराहा निषाद राज चौराहे के नाम से जाना जाएगा।

उदया चौराहा लता मंगेशकर चौराहे के रूप में परिवर्तित
उदया चौराहा को लता मंगेशकर चौराहे के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है जो अयोध्या की शोभा में चार चांद लगा रहे हैं।

महबरा चौराहा चूड़ामणि चौराहा बना 
अयोध्या के महोबरा चौराहे पे लगा माता सीता का चूड़ा,महोबरा चौराहे का नाम बदल कर चूड़ामणि चौराहा किया गया है।

अयोध्या मकबरे और स्मारको का शहर
यह शहर सिर्फ़ मंदिरों ही नहीं मकबरों और स्मारकों से भी भरा हुआ है जो देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब या हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों के आपसी मेल का प्रतीक है। 
अयोध्या में आज भी गली-गली में मस्जिद, मजार, कब्रिस्तान इस बात की गवाही देते हैं कि भगवान राम के मंदिरों के इस छोटे से शहर में सामाजिक समरसता आज भी कायम है.

एक ही परिसर में मस्जिद-मंदिर दोनों का अस्तित्व
अयोध्या की टेढ़ी बाजार के पास मुख्य रूप से बाबरी मस्जिद (अब राम मंदिर स्थल) और उससे जुड़े ऐतिहासिक स्थल हैं, जहाँ पहले बाबरी मस्जिद थी और अब भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है; वहीं, मस्जिद के आसपास, खासकर धार्मिक स्थलों के कारण, कई पुराने मकबरे और छोटे मुस्लिम कब्रिस्तान भी मौजूद हो सकते हैं, जो शहर के समृद्ध मुगलकालीन और मध्ययुगीन इतिहास का हिस्सा हैं। बाबरी मस्जिद को पहले 'मस्जिद-ए-जन्म अस्थान' भी कहा जाता था, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को बताता है। श्रीराम जन्मभूमि के आसपास टेढ़ी बाजार और आसपास के मोहल्लों में बनी मस्जिदें- मजारें आज भी सामाजिक समरसता की उदाहरण है, जहां पांचों वक्त की नमाज अता की जा रही है। कुछ प्रमुख मस्जिदें निम्न लिखित हैं - 

बेगमपुरा मास्क तुलसी नगर अयोध्या 

मदीना मस्जिद धोबरी साईं नगर अयोध्या 

नबी ग्रेव शीस, कामी गंज अयोध्या 

मस्जिद-ई-अयशा,आशापुर विलेज दर्शन नगर अयोध्या 

चौक मस्जिद, शक्ति विहार कोलोनी फैजाबाद 

मोती महल मस्जिद, गुदरी बाजार फैजाबाद 

मरकज़ी जमा मस्जिद तातशाह,नरेंद्र देव नगर
फैजाबाद 

मोती मस्जिद मकबरा फातेहगंज रोड सुभाष नगर फैजाबाद 

नूर आलम पर श्री राम ट्रस्ट का भंडारा
 नूर आलम खुद को भगवान राम का पड़ोसी बताते हैं। पिछले साल 22 जनवरी 2024 को जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह हुआ उस समय नूर आलम चर्चा में आए थे। यूसुफ आरा मशीन के मालिक नूर आलम राम मंदिर परिसर से सटी हुई जमीन के मालिक हैं। पिछले साल प्राण प्रत‍िष्‍ठा के समय उन्‍होंने यहां राम भक्तों के लिए भंडारे और आवास की व्यवस्था करने के लिए प्रदान की, जिसमें लगभग 20,000 लोगों के लिए भोजन और आश्रय शामिल था। 

मुस्लिम बहुल मोहल्ला कजियाना
अयोध्या में अधिग्रहीत परिसर से सटा एक मुस्लिम बहुल मोहल्ला है। इसका नाम कजियाना है। बाबरी मस्जिद का पक्षकार रहा इक़बाल अंसारी भी इसी मोहल्ले का निवासी है। अयोध्या के धर्मक्षेत्र में रहने वाले अधिकतर मुस्लिम कारपेंटिंग, सैलून, जूते-चप्पल और सिलाई जैसे कारोबार से जुड़े हैं। अयोध्या के विकास के साथ इनके कारोबार में भी चार चाँद लगे हैं। 
      कजियाना मोहल्ले के पास वशिष्ठ कुंड पर हर साल मुस्लिम समुदाय के लोग अपने सभी त्यौहार धूमधाम से मनाते हैं। रामभक्तों और हजारों संत-महंतों की मौजूदगी रहती है लेकिन इसके बावजूद यहाँ अकेली मुस्लिम महिला को अपने बच्चे के साथ खरीदारी करते और किसी भी समय निश्चिन्त होकर अपना काम करते देखा जा सकता है। संतों के समावेशी व्यवहार ने इन्हें कभी भी पराया नहीं समझा।

गंज शहीदान अधिग्रहीत क्षेत्र में शामिल
श्री रामलला के गर्भ गृह के निकट स्थित 5 एकड़ जमीन पर मुसलमानों की कब्र थी इसलिए वहां पर राम मंदिर निर्माण न किया जाए। फैजाबाद गैजेटियर में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि बाबरी मस्जिद तीन तरफ से कब्रगाह से गिरी थी। और यह इलाका ‘गंज शहीदान’ के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1855 के युद्ध के बाद 75 मुस्लिमों को इसी ‘गंज शहीदान’ में दफनाया गया था। वर्ष 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के बाद यहां दफन किए जाने का काम बंद कर दिया गया। इस जमीन पर धार्मिक रूप से इबादत और मस्जिद निर्माण की मनाही है। रामलला विराजमान मुकदमे में यह भी हिस्सा था। तत्कालीन केंद्र सरकार ने कानून व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द के मद्देनजर पूरी जमीन का अयोध्या एक्ट के तहत अधिग्रहण कर लिया था।

सूफी संतों के दरगाहें

1.बाबा शाह इब्राहीम शाह अड़गड़ा की मजार
स्वर्गद्वार मोहल्ले में स्थित बाबा शाह इब्राहीम शाह मजार पर तीन दिन का मेला हर साल लगता आ रहा है. यह मजार सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है, जो स्वर्गद्वार के पास अड़गड़ा में स्थित है और हिंदू-मुस्लिम सभी धर्मों के लोग अपनी परेशानियों के समाधान और बीमारियों के इलाज के लिए यहां दुआ करने आते हैं। यह दरगाह सूफी परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ लोग मन्नतें मांगते हैं और सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर दुआ पूरी होती है, ऐसा माना जाता है।
        यहां धूनी रमाने वाले सूफी संतों ने सैय्यद मुहम्मद इब्राहिम शाह प्रमुख थे। इनका समय पूर्व मध्यकाल माना जाता है। ये ताशकंद के राजकुमार थे और आला रूहानियत से प्रेरित हो युवावस्था में ही सुदीर्घ जल मार्ग से अयोध्या आ पहुंचे।यह सूफी संत हजरत इब्राहिम शाह से जुड़ी है, जो ताशकंद के शहज़ादे थे और अयोध्या आकर बस गए थे। चमत्कारिक रूहानी हैसियत के साथ इब्राहिम शाह प्रेम एवं मानवता का संदेश देने के कारण दोनों समुदायों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उन्हें पर्दानशीं हुए छह सौ वर्ष हुए पर अड़गड़ा के नाम से मशहूर उनकी दरगाह अभी भी जीवंत मानी जाती है। यहीं अड़गड़ा मस्जिद भी है. यहां आज भी नमाज अता होती है. यह मस्जिद-मजार एक ही परिसर में है और चारों ओर भगवान के मंदिर हैं. बावजूद इसके ढेरों तनाव के बीच भी कभी बाधा नहीं पहुंची.

2. इब्राहिम शाह की दरगाह
हरगरा में सैयद इब्राहिम शाह की दरगाह है, जो कि अयोध्या का सबसे बड़ा तीर्थस्थल, और दोनों धर्मों के लोग अक्सर इसे देखने और दुआ मांगने यहां आते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, शहर में कम से कम 80 सूफी तीर्थस्थल हैं, जिन्हें मथुरा और वाराणसी के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल माना जाता है। 

3. शेख जमाल 'गुज्जरी' 
प्रसिद्ध शेख जमाल 'गुज्जरी', जो फिरदौसिया सूफी संप्रदाय के थे, मुगल काल से पहले के एक अन्य मुस्लिम संत थे, अत्यधिक पूजनीय हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, वे अपने सिर पर चावल का एक बड़ा बर्तन लेकर गरीबों और निराश्रितों में बांटते रहते थे।

 4.नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली
ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के एक प्रमुख शिष्य, हजरत नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली (नसीरुद्दीन महमूद) थे, जो मूल रूप से अयोध्या या उसके आसपास से दिल्ली आए थे और अपने गुरु के निधन के बाद 'चिराग-ए- दिल्ली' कहलाए।उन्हें राजधानी में दफनाया गया था। उन्होंने औलिया के साथ रहने के लिए 40 के दशक में शहर छोड़ दिया था। शहर में उनके शिष्यों की कब्रें भी हैं।

5.पैगम्बर हजरत नूह की दरगाह
अयोध्या में इस्लाम के दो पैगम्बर हजरत नूह और हजरत शीश की दरगाह भी है। हजरत नूह ने पृथ्वी पर भारी बाढ़ से जीवन को बचाया और हजरत शीश हजरत आदम के पुत्र थे, जो पृथ्वी पर पहले व्यक्ति थे । वे लगभग 1,000 सालों तक जीवित रहे।अयोध्या पुलिस स्टेशन के पीछे स्थित हज़रत नूह की कब्र नव विवाहितों, विशेष रूप से हिंदुओं में बहुत लोकप्रिय है, जो एक सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उनका आशीर्वाद लेने आते हैं। मुस्लिम और हिंदू दोनों भक्त हर गुरुवार को उनकी कब्र पर इबादत करते हैं। विभिन्न धर्मों के लोग आध्यात्मिक उपचार के लिए दरगाह जाते हैं, खासकर तब जब उनके "अपने प्रियजनों पर बुरी आत्माओं का साया आता है"।

6. हजरत शीश पैगम्बर की दरगाह मणि पर्वत
अयोध्या के मणि पर्वत ऐतिहासिक टीले के पीछे आदम हौआ के बेटे हजरत शीश पैगम्बर की कब्र है। कहा जाता है कि हजरत शीश पैगम्बर इस पृथ्वी पर 1300 वर्षों तक जीवित रहे और उनका स्वरुप 70 गज का था वर्तमान में इस स्थान पर आराम कर रहे है । इस स्थान पर 7 गज की इनकी कब्र है। इनके 145 औलाद हुई । उनके पूरे परिवार में सेवकों की कब्र उसी स्थान पर बनी हुई हैं । थोडी दूर से चहारदीवारी बना दी गयी है। जिसके अन्दर उनकी पत्नी बीबी हूर चार लड़के और एक बहू की भी कब्र है । अन्य कब्रें इस चहारदीवारी के बाहर है। इस परिसर में एक मस्जिद है जिसमें नमाज अदा होती है। 

अयोध्या की ऐतिहासिक मस्जिदें:- 

चौक मस्जिद यह अयोध्या की सबसे पुरानी और प्रमुख मस्जिदों में से एक है, जो शहर के पुराने चौक इलाके में स्थित है.

फतेहगंज चौराहा मस्जिद यह मस्जिद भी अयोध्या के एक महत्वपूर्ण चौराहे पर स्थित है और स्थानीय लोगों के लिए अहम है.

मोती महल मस्जिद यह मस्जिद अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है.

मरकज़ी जामा मस्जिद तातशाह के पास स्थित यह मस्जिद भी एक महत्वपूर्ण इबादतगाह है.

मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद 
यह भी अयोध्या में एक प्रमुख मस्जिद है जिसका जिक्र मिलता है. 

प्रमुख कब्रिस्तान 

करबला, मोहम्मदपुर  
यह अयोध्या के पास एक जाना-माना कब्रिस्तान है, जहां लोग धार्मिक स्थलों के रूप में जाते हैं।

भदवल  
यह भी अयोध्या क्षेत्र में एक और कब्रिस्तान है, जिसका उल्लेख मिलता है।

अन्य स्थानीय कब्रिस्तान: 
अयोध्या के आसपास के विभिन्न मुस्लिम मोहल्लों और गांवों में भी कब्रिस्तान मौजूद हैं, जो स्थानीय आबादी की जरूरतों को पूरा करते हैं। 

अयोध्या धाम जंक्शन के सामने मस्जिद
इसके अलावा अयोध्या धाम जंक्शन से निकलते ही 100 मीटर से भी कम दूरी पर मस्जिद मौजूद है। इसके विशाल गुंबद दूर से हरे रंग में चमकता दिखाई पड़ेगा। यहाँ भी अक्सर अकीदतमंदों की भीड़ दिखाई देती है।

विद्याकुंड के पास 2 कब्रिस्तान
धर्मक्षेत्र में विद्याकुंड के आसपास मौजूद 2 कब्रिस्तानों का दौरा किया। यहाँ हमें सैकड़ों की तादाद में पक्की कब्रें दिखीं। पक्की कब्रों पर बाकायदा अरबी भाषा में पत्थर भी लगे हुए हैं। यहाँ अभी भी आसपास के मुस्लिम इंतकाल हुए अपने परिजनों को दफनाने आते हैं। अयोध्या धर्मक्षेत्र में ऐसे कब्रिस्तानों की संख्या 4 से अधिक बताई जा रही है। राम नाम के सर्व समावेशी होने के इस प्रमाण को अभी तक वामपंथी या चरमपंथी विचारधारा रखने वालों ने स्वीकार नहीं किया।

अरुंधति कॉम्प्लेक्स में मुस्लिमों की भी दुकानें

धर्मक्षेत्र टेढ़ी बाजार में बने नए बहुमंजिला शॉपिंग काम्प्लेक्स अरुंधति में मुस्लिमों को भी दुकानें आवंटित हुई हैं। इनमें जूते का कारोबार करने वाले बाबू भाई उर्फ़ मोईन अहमद शामिल हैं। ये कॉम्प्लेक्स खासतौर पर उन कारोबारियों के लिए बनाया गया है, जिनके प्रतिष्ठान नगर के नवनिर्माण के दायरे में आ गए थे।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



 

Friday, December 12, 2025

कोणार्क सूर्य मंदिर के गर्भगृह का 122 वर्ष से बंद रास्ता मिला: ए एस आई की नई खोज: प्रस्तुति आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


कोणार्क सूर्य मंदिर के गर्भगृह का रास्ता मिल गया है। 9 मीटर की ड्रिलिंग के बाद रास्ता मिलने की सूचना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सुपरिटेंडेंट डी.बी. गडनायक ने दी।मंदिर की दीवारों की स्थिति जानने के लिए 17 इंच की कोर ड्रिलिंग की जा रही थी। मंदिर के पश्चिम दिशा की पहली पिंढ़ी पर 16 इंच की पाइप से 9 मीटर तक नो-वाइब्रेशन ड्रिलिंग की गई थी। 13वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर के गर्भगृह को 1903 में ब्रिटिश प्रशासन ने संरचनात्मक कारणों से रेत और पत्थरों से भरकर सील कर दिया था। तब से लेकर अब तक पूरे 122 वर्षों तक यह बंद रहा। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सोमवार को गर्भगृह में भरी रेत को हटाने की प्रक्रिया पारंपरिक विधि-विधानों के साथ शुरू की।एएसआई की विशेषज्ञ टीम ने गर्भगृह के प्रथम मंडप के पश्चिमी हिस्से में 4 फुट × 4 फुट की सुरंग बनाकर रेत हटाने का कार्य आरंभ किया। इसके साथ ही दीवार की मजबूती का आकलन करने के लिए 17 इंच की कोर ड्रिलिंग भी की गई। पूरी प्रक्रिया एएसआई अधीक्षक डीबी. गड़नायक और क्षेत्रीय निदेशक दिलीप खमारी की देखरेख में हुई।
विशेषज्ञों की टीम  द्वारा जांच 
       10 विशेषज्ञों की टीम ने स्थल की संरचनात्मक स्थिति की बारीकी से जांच की।विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया से मंदिर की मूल संरचना, प्राचीन निर्माण तकनीक और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी कई अहम जानकारियाँ सामने आने की संभावना है।स्थानीय लोग और इतिहासकार इस खबर को मंदिर के संरक्षण इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।

Thursday, December 11, 2025

गिरिमिटिया मजदूर गरीब राम की दास्तान ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

बस्ती (उत्तर प्रदेश)। खून के रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं, वे वर्षो, दशकों क्या सैकड़ों वर्ष बाद भी अपनों के मिलने के लिए सात समुंदर पार की सीमा भी नाघ जाते हैं।अपनों से मिलने के लिये बेचैन रहते हैं। मन में एक अलग तरह की टीस बनी रहती है और अपने जड़ों से जुड़ने के लिए बेताब रहते हैं।

विश्व में बड़ी संख्या में भारतीय द्वीप

मेलानेशिया द्वीप
दुनिया के लगभग हर देश में, हर कोने में भारतीय रहते हैं। कुछ-कुछ देश तो ऐसे हैं जहां भारतीयों की आबादी बहुत ज्यादा है। ऐसे देशों को अगर हम 'मिनी इण्डिया' कहें तो गलत नहीं होगा। दक्षिण प्रशांत महासागर के मेलानेशिया में भी ऐसा ही एक द्वीपीय देश है, जहां की करीब 37 फीसदी आबादी भारतीय है और वो सैकड़ों साल से इस देश में रहते चले आ रहे हैं। यही वजह है कि यहां की राजभाषा में हिंदी भी शामिल है, जो अवधी के रूप में विकसित हुई है।  


फ़िजी द्वीप
फ़िजी दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित एक सुंदर द्वीप देश है,जो 300 से अधिक द्वीपों से बना है और अपनी खूबसूरत समुद्र तटों, हरियाली और समृद्ध भारतीय संस्कृति के लिए जाना जाता है, इसे भी "मिनी इंडिया" कहते हैं, यहाँ बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। फिजी में हिंदी (अवधी-भोजपुरी मिश्रित) बोली जाती है, और पर्यटन व चीनी निर्यात यहाँ अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं, इसकी राजधानी सुवा है।  
      यहां भारतीय प्रवासियो की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं।ब्रिटेन ने वर्ष1874 में इस द्वीप को अपने नियंत्रण में लेकर इसे अपना उपनिवेश बना लिया था। इसके बाद वे हजारों भारतीय मजदूरों को यहां पांच साल केअनुबंध पर गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले आए थे, जो वापस नहीं जा सके। इनकी जड़ें 1879 में ब्रिटिश गिरमिटिया श्रम प्रणाली के तहत लाए गए मजदूरों से जुड़ी हैं, जिन्होंने गन्ने के खेतों में काम किया और फिजी की संस्कृति व अर्थ व्यवस्था को समृद्ध किया।1920 और 1930 के दशक में हजारों भारतीय स्वेच्छा से आकर भी यहां बस गए थे। 
      आज वे फिजी के सामाजिक- आर्थिक ताने-बाने का अभिन्न अंग हैं, वे 'फिजी हिंदी' बोलते हैं, और 'छोटा भारत' के रूप में जाने जाते हैं, वे दिवाली और होली जैसे त्योहार मनाते हैं और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
     फिजी द्वीपसमूह में कुल 322 द्वीप हैं, जिनमें से 106 द्वीप ही स्थायी रूप से बसे हुए हैं। यहां के दो प्रमुख द्वीप विती लेवु और वनुआ लेवु हैं, जिन पर इस देश की लगभग 87 फीसदी आबादी निवास करती है। फिजी के अधिकांश द्वीपों का निर्माण 15 करोड़ साल पहले ज्वालामुखी के विस्फोटों के कारण हुआ है। यहां अभी भी कई ऐसे द्वीप हैं,जहां प्रायःज्वालामुखी विस्फोट होते रहते हैं। फिजी को मिनी इंडिया भी कहा जाता है, यहां करीब 37 प्रतिशत आबादी भारतीयों की है।
बस्ती के कबरा गांव के राम गरीब की                          कहानी 
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बस्ती सदर तहसील में बनकटी ब्लॉक में कबरा खास नामक एक गांव है,जो कुवानो नदी के किनारे बसा हुआ है। इस गांव में छोटी- बड़ी जाति सब तरह के लोग रहते थे और प्राय: सभी खेती-बाड़ी करते थे । उन दिनों अंग्रेज हुकूमत के विरुद्ध लोग कभी-कभी आवाज भी उठा देते थे।
      भारतीय मूल के और वर्तमान में फिजी द्वीप के निवासी रविन्द्र दत्त बताते है कि उनके परदादा का नाम गरीब राम था, जो अंग्रेजों से लोहा लेकर सरकार के विरुद्ध कोई अपराध कर लिया था। 18 वर्ष के उनके परदादा जी को अंग्रेजी हुकूमत ने बन्दी बना लिया था। अन्य लोग कहते हैं कि उनके हाथ किसी की हत्या जैसी कोई वारदात हो गई थी , जिसमें उन्हें सजा हो गई थी और सजा के तौर पर गरीब राम को वर्ष 1910 जून में ब्रिटिश हुकूमत ने कोलकाता जेल में बंद कर दिया था। जहां उन जैसे हजारों कैदियों को रखा गया था। इनसे बेगार कराया जाता थाऔर कभी- कभी इन्हें दंड के रूप में दूर-दराज के इलाके में काले पानी जैसे इतना दूर भेज दिया जाता था कि वे अपने मातृभूमि और अपने लोगों से हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाते थे। उन्हें कभी संपर्क में आने की संभावना भी नहीं रहती थी। इस तरह के सभी भारतीय बंदियों को पानी के जहाज से हिन्द- प्रशांत महासागर से होकर फिजी नामक एक टापू पर ले जाकर छोड़ दिया था। जहां इन्हें गिरगिटिया मजदूर के रूप में रखकर बर्बर अत्याचार किया जाता था। उनसे वीरान द्वीप में गन्ने की खेती करवाई जाती थी। उन्हें भारत लौटने नहीं दिया जाता था। इन परिस्थिति में उस गरीब राम का परिवार वहीं बस गया था। गिरमिटिया किसान बहुत मेहनती होते थे और अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार भी होते थे। खुद का कष्ट झेल लेते लेकिन अपने मालिक को तनिक भी आंच नहीं आने देते थे।

भारतप्रेमी रविन्दर का जुनून परवान चढ़ा 
बस्ती जनपद के बनकटी विकास खण्ड क्षेत्र के कबरा गांव में 115 साल बाद फिजी से अपने परिवार को ढूढने के लिए एक परिवार बहुत ही बेताब रहा। पीढ़ी दर पीढ़ी का फ़ासला भी उसके जुनून को कम ना कर सका।


इन्हीं भारतीय फिजी के चौथी पीढ़ी के निवासी रवींद्र दत्त, और इनकी पत्नी केशनी जो फिजी देश के निवासी है,पिछले कई साल से भारत आ- जा रहे है। इन्हें अपना मूल गांव और परिवार की खोज में लगे थे, जो अब तक नहीं मिल पाया था।
     रविन्द्र दत्त ने बताया कि अंग्रेजी शासन काल के दौरान 1910 में भारत से कई लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनाकर फिजी भेजा गया था। उनमें उनके परदादा गरीब राम भी शामिल थे। उनसे मजदूरी कराई गई और उन्हें भारत नहीं आने दिया गया। गरीब राम जैसे लोग काफी संघर्ष करने के बाद फिजी के आदिवासियों के साथ मिलकर अंग्रजों से लड़ाई लड़ी तो 1970 में फिजी को स्वतंत्र कराया और वहां ही बस गए थे।


राम लला के दरबार में अर्जी 
कई साल तक अपने परिवार के सदस्यों को खोजते हुए यह परिवार वर्ष 2019 में अयोध्या आए हुए थे, जहां उन्होंने भगवान राम के दर्शन किए और मन्नत मांगी कि भगवान श्री राम उन्हें उनके बिछड़े परिवार से मिलने की मनोकामना पूरी करें। 

2025 में रविन्द्र दत्त का दुबारा आये 
2025 में रविन्द्र दुबारा भारत आए और अपने परिवार के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। इस बार फिर वे अयोध्या गए और भगवान राम से मन्नत मांगी कि उन्हें उनके बिछुड़े परिवार से मिला दें। तब तक कई सालों तक इंटरनेट से जानकारी इकठ्ठा कर भी लिए थे। वे लोगों से बात करने के बाद रविन्द्र 5 दिसंबर 2025 को बस्ती के कबरा गांव पहुंचे । 6 साल बाद राम की कृपा उन्हें प्राप्त हुई दिखी । 
कबरा के प्रधान का पूरा सहयोग
बस्ती के बनकटी ब्लॉक के कबरा गांव में उन्हें अपने परिवार का विश्वस्त सूत्र मिलता गया। खोजबीन करने के बाद रविन्द्र दत्त को अपने परदादा गरीब राम का एक इमिग्रेशन पास मिल गया था, जिसमें उनके बारे में काफी जानकारी लिखी थी। इस पास के मिलने के बाद से वे अपने परिवार के बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया। कई साल तक इंटरनेट से जानकारी इकठ्ठा करने और लोगों से बात करने के बाद 5 दिसंबर 2025 को वे बस्ती जनपद के कबरा गांव आ गए। 
      काबरा के प्रधानअभिषेक चौधरी ने कबरा गांव को आदर्श गांव के रूप में विकसित किया है । लाइट, नालियां, खड़ंजा और बहुत कुछ नगर और शहर जैसा विकसित किया है । इनके प्रतिनिधि रवि प्रकाश चौधरी भी बहुत कर्मठ व्यक्ति हैं। वे रविंद्र दत्त के आगमन पर उन्हें भरपूर सुविधा मुहैया कराया। उन्हें पता चला कि गरीब राम इसी गांव के निवासी थे, उनके पिता का नाम रामदत्त था, और उनका शेष परिवार आज भी इस गांव में निवास करता है।
     कबरा भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के बनकटी ब्लॉक में एक गाँव और ग्राम पंचायत भी है। इस गांव के प्रधान श्री अभिषेक चौधरी हैं। इस गांव का पोस्ट मुंडेरवा है। यह यह जिला मुख्यालय बस्ती से पूर्व में 17 किमी दूर स्थित है। बनकटी से गूगल मैप के अनुसार लगभग 12.6 किलोमीटर दूर है। राज्य की राजधानी लखनऊ से यह लगभग 224 किमी दूर स्थित है । कबरा गाँव की इस समय की जनसंख्या 1903 है और घरों की संख्या 272 है। वर्तमान समय में इस गांव के पास ही में महाराज पैलेस एक विवाह मंडप और विधान परिषद सदस्य माननीय श्री सुभाष रघुवंशी का आवास भी है। कुवानो नदी गांव के पास से ही बहती है। गांव में एक मन्दिर शेष बहादुर यादव के घर के पास स्थित भी है। यह स्थान बस्ती जिले और संत कबीर नगर जिले की सीमा पर है। पड़ोस के गांव सिसई बाबू में मॉडल प्राइमरी स्कूल भी है। काबरा में भी प्राइमरी विद्यालय है। बनकटी से मथौली देवीसांड मार्केट होकर यहां पहुंचने का रास्ता है।
      राम गरीब के चार पुत्र थे जगन्नाथ, राम अवतार, बैजनाथ और गीता नारायण। बैजनाथ के पुत्र रविंद्र दत्त और उनके पुत्र कौशल दत्त और उनके पुत्र रोशनी दत्त हैं ये सब अब फिजी के निवासी हैं। वहां उनके लगभग 150 परिवारी जन भी निवास कर रहे हैं।
    

रवि की मुहिम रंग लाई
रविंद्र दत्त कुछ लोगों को साथ लेकर तहसील और ग्राम प्रधान और सम्भ्रांत लोगों से मिलकर गांव के लोगों का सजरा खोजवाया। वे गांव के बुजुर्गों से परदादा गरीब राम के बारे में जानकारी ली और उनके परदादा के नाम कुछ जमीन भी मिली। रविन्द्र दत्त को उनके परिवार से मिलाने में काफी अहम भूमिका निभाने वाले कबरा गांव के प्रधान प्रतिनिधि रवि प्रकाश चौधरी ने बताया कि जैसे ही उन्हें पता चला कि फिजी देश से दो प्रवासी बस्ती आए है और अपने परिवार को खोज रहे है।
      लालगंज के पास भी एक कबरा गांव है तथा दूसरा गांव बनकटी विकास खंड में है। फोन से कोई सूत्र उस गांव का नहीं मिला। उन्होंने रविंद्र दत्त तथा उनकी पत्नी केशनी हरे को गांव को ढूंढ़ने में मदद करने के साथ-साथ उनके परिजनों को तलाशने के लिए तहसील से लगायत अन्य दस्तावेजों को खंगाला।
     रवि प्रकाश ने रविन्द्र दत्त से उनके खानदान का पूरा सेजरा समझने के बाद अपने गांव के रामदत्त के पूर्व परिवार के पास गए, जहां पर चला कि इस परिवार के पास एक बहुत पुराना दस्तावेज फारसी में है, उन्होंने उसका हिन्दी अनुवाद भी करा रखा था, जिसमें सभी नाम मिलने लगे। गरीब राम के पिता रामदत्त की पुष्टि होते ही रविन्द्र दत्त और केशनी को उनका परिवार के बारे में जानकारी मिली और उनका बिछड़ा परिवार मिल गया।
    रविप्रकाश ने अथक प्रयास कर वर्षो से बिछड़ों को अपनों से मिलाया। रामदत्त के परिवार के पास ले गए और उनका बिछुड़ा परिवार मिल गया। इस दौरान पता चला कि गरीब राम के परिवार से जुड़े हुए भोला चौधरी, गोरखनाथ, विश्वनाथ, दिनेश, उमेश राम उग्रह सहित परिवार के अन्य सदस्य गरीब राम के ही खानदान के हैं। 

जड़ों से जुड़ने हुए खुशी 
गरीब राम के काबरा निवासी रिश्ते में नाती भोला चौधरी, गोरखनाथ, विश्वनाथ, दिनेश, उमेश, रामउग्रह सहित परिवार के तमाम सदस्यों से दोनों ने मुलाकात किया।
रविन्द्र दत्त जब गरीब राम के काबरा निवासी नातियों से मिले तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था, आंखों में खुशी के आंसू थे। रविन्द्र और उनकी पत्नी केशनी इस कदर खुश थे कि जैसे उन्हें अपनी खोई हुई सबसे प्रिय चीज मिल गई हो। खुशी के मारे इनकी आंखें छलक गई और ये भाव बिभोर होकर अपनों के बीच नाचने लगे। वैसे तो यह कई सालों से अपनों से मिलने के लिए बेताब रहे लेकिन अभी हाल ही में यह भारत आकर अपनी जड़ों को खोजने में कामयाब हो पाये । 

यादों को कैमरे में कैद
इस दौरान उन्होंने गांव का एक-एक कोना देखा तथा अपने परिवार के बारे में अन्य जानकारियां लेने के साथ-साथ बहुत सारे फोटो को यादों के रूप में कमरे में कैद किया।
 
विद्यालय के बच्चों के साथ कुछ पल
रवीन्द्र दत्त और उनकी पत्नी केशनी ने प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के साथ कुछ पल बिताया और बाबा साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। जिसके बाद वे उनसे मिले और फोटो को यादों के रूप में कैमरे में कैद किया। 

वृद्धा आश्रम खोलने का वादा 
फिजी में रह रहे रविंद्र दत्त बनकटी ब्लॉक के कबरा गांव में अपनों से मिलने के बाद 
अपनों से विदाई लेते के वक्त उनके तथा उनकी पत्नी केशनी की आंखों से आंसू छलक आए थे तो खानदानी भी फफक पड़े। जाते वक्त पुरखों की माटी में परदादा गरीब राम के नाम वृद्धा आश्रम खोलने 
की इच्छा व्यक्त की। 

परिवार को फिजी देश आने का न्योता 
रविंद्र दत्त का कहना है कि अपने पुरखों के परिवार से मिलने से उन्हें काफी हर्ष है और अब मिलने जुलने का यह सिलसिला चलता रहेगा। हम चाहेंगे कि हमारे परिवार के लोग फिजी भी टहलने आएं। रविन्द्र दत्त ने अपने परिवार को फिजी देश आने का न्योता भी दे दिया और कहा अब भारत से उनका गहरा नाता बन गया है इसलिए हर सुख दुख में वे अपने परिवार के पास आते रहेंगे। 
       कबरा गांव से विदाई लेने के बाद वह दिल्ली में भी रुकने की योजना थी। वहां भी खानदान के लोग रहते हैं। इनसे मेल- मिलाप के बाद 9 दिसंबर 2025 को फिजी रवाना हो गए होगे।

लेखक :आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
मकान नम्बर 8/2785, निकट लिटिल फ्लावर स्कूल, आनन्द नगर कटरा बस्ती 272001, उत्तर प्रदेश, INDIA 
मोबाइल नंबर 9412300183