श्री राम जी की नगरी अयोध्या क्षेत्र में लगभग 8,000 मठ, मंदिर, आश्रम और आवासीय भवन हैं, जिनमें से लगभग 1,080 को मठों, आश्रमों और मंदिरों के रूप में पहचाना गया है, जबकि बाकी आवासीय हैं। जर्जर मंदिरों की संख्या 182 से 500+ तक बताई गई है, लेकिन कोई निश्चित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इन मंदिरों में सनातन धर्म अनुसार विविध उपासना पद्धति का पालन किया जाता है । इससे यह संदेश दिया जाता है कि विविधता होने पर भी हिन्दू धर्म का सूत्र एक ही है । हिन्दू धर्म के प्रत्येक समुदाय को श्रीराम पूज्य तथा स्वीकार्य हैं ।
अयोध्या की सामाजिक समरसता भगवान राम के आदर्शों, 'राम राज्य' की अवधारणा और विभिन्न धर्मों के सह-अस्तित्व पर आधारित है, जहाँ मंदिर निर्माण में भी समरसता का संदेश दिया गया, जैसे कि अलग-अलग जातियों के पुजारियों का चयन, और यह शहर अब धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ समृद्धि और भाईचारे का केंद्र बन रहा है, जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सभी के सम्मान पर जोर देता है। अयोध्या भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को मजबूत कर रही है, जहाँ सभी वर्ग एक साथ मिलकर देश के विकास में योगदान कर रहे हैं।
5 गुरुद्वारे और 7 जैन मंदिर अयोध्या की शान बढ़ा रहे हैं
अयोध्या धर्मनगरी में 5 गुरुद्वारे और 7 जैन मंदिर हैं जिनके माध्यम से बड़ी संख्या में गैर सनातनी भी अपनी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्राचीन काल से अस्तित्व में रहे ये गुरुद्वारे हिन्दू तथा सिख धर्म के बीच एकता का प्रतीक भी हैं । सिख एवं जैन धर्मियों के धार्मिक स्थल भी श्रीराम से पुराना संबंध दर्शाते हैं ।
1.ब्रम्ह कुण्ड सिक्ख गुरूद्वारा
इस गुरूद्वारे के समीप प्राचीन ब्रम्ह कुण्ड था । कहा जाता है कि ब्रम्हा जी ने इस स्थान पर 5000 वर्षों तक तपस्या किया। ब्रम्ह कुण्ड व उसी सीढ़ी सरयू में विलीन हो चुकी है। ब्रम्ह कुण्ड के कुछ भग्नावशेष हैं । या स्थान अतिरमणीक है इस स्थान से सरयू का विहंगम् दर्शन होता है। आषाढ़ माह में ब्रम्ह कुण्ड पर खड़े होने पर जल ही जल दिखाई देता है। प्रथम गुरू श्री गुरू नानक देय जी महाराज ने हरिद्वार से जगन्नाथपुरी की यात्रा समय सम्वत् 1557 में इसी स्थान पर बैठकर पण्डितों को सत्य उपदेश दिया था। नवम् गुरू श्री गुरू तेग बहादुर जी महाराज आसाम से आनन्दपुर साहब (पंजाब) जाते समय विक्रम सम्वत् 1725 में उक्त स्थान में श्री गुरू नानक देव जी मंत्री साहब पर मत्था टेककर सामने बैठकर 48 घन्टे तक अखण्ड तप किया। अपने चरण कमल की निशानी चरण पादुका (खडाऊँ) यहां के ब्राम्हण सेवक को प्रदान किया जिसका दर्शन गुरूद्वारे में होता हैं ।
2.गुरुद्वारा नजरबाग
अयोध्या में नजर बाग मोहल्ले में गुरूनानकपुरा फैजाबाद की एक शाखा स्थापित है। इस स्थान पर भी गुरू गोविन्द सिंह जी आये थे और इस स्थान पर एक छोटी बीड़ (गुरू ग्रन्थ साहब हस्तलिपि) प्राप्त हुई थी। यह स्थान राजा मानसिंह ने गुरूद्वारा हेतु भेंट किया है।
3. गुरुद्वारा गुरु नानकपूरा, फैजाबाद
4. गुरुद्वारा अमानीगंज
आवास विकास कालोनी, इनर रोड अमानीगंज
5. परमहंस आश्रम गुरुद्वारा
कारसेवक पुरम अयोध्या
जैन मंदिर
पवित्र शहर में कई जैन मंदिर फैले हुए हैं-
1. दिगम्बर जैन का मंदिर/धर्मशाला
दिगम्बर जैन का मंदिर/धर्मशाला रायगंज में स्थापित है । यहीं पर श्री श्री 108 भगवान श्री ऋषभदेव जी की 31 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित है । अनादिकाल से इसी भूमि पर 24 तीर्थकरों का जन्म होता आया है, 5 तीर्थकरों का जन्म अयोध्या में हुआ है । इन तीर्थकरों की प्रतिमा इस मंदिर में स्थापित है।दिगम्बर जैन इसकी स्थापना वर्ष 1965 में की गयी जिसमें 31 फीट ऊंची व वृषभदेव (आदिनाथ) के साथ ही चार अन्य तीर्थकरों श्री अनन्त नाथ, श्री अजित नाथ, श्री सुमति नाथ, श्री अभिनन्दन नाथ तथा चन्द्र प्रभु जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
2. श्वेताम्बर जैन मंदिर
श्वेताम्बर जैन यह कटरा मोहल्ले में स्थित है । इस मंदिर का जीर्णोध्दार जैन सम्प्रदाय द्वारा बर्ष 2000 में बनाया गया । इसमें तीर्थकर अजित नाथ, सुमतिनाथ, अभिनन्दननाथ, अनन्तनाथ की पद्मासन मुद्रा में प्रतिमाएं स्थापित है । इसके अतिरिक्त 19 कल्याण के चरण चिन्ह बनाये गये हैं।
3.आदिनाथ मंदिर, स्वर्गद्वार
4.अनंतनाथ मंदिर, गोलाघाट
5.सुमंतनाथ मंदिर,रामकोट
6.अजितनाथ मंदिर सप्तसागर
7. अभिनंदननाथ मंदिर सराय
पूजा और गृहस्थी के सामान के निर्माता मुस्लिमों की भागीदारी
खड़ाऊं, कंठी-माला, भगवान की पोशाक से लेकर मुकुट बनाने तक में जहां मुस्लिम परिवारों की भूमिका वर्षों से चली आ रही है.
पुरानी अयोध्या में व्यापार के प्रमुख साधनों में खड़ाऊं, बेलन-चौका, रामनामी, सिंदूर-बिंदी, प्रसाद के रूप में लैया-खील बताशे, फूल- माला, प्रभु की ड्रेस-मुकुट आदि ही रहे हैं. और इन सबमें मुस्लिम समुदाय की भूमिका दर्ज की जाती रही है. मंदिरों में सेवक के रूप में भी मुस्लिम समुदाय अपना योगदान देता आया है. वे वर्षों से इस कम आय वाले व्यापार में भी खुश हैं।
ध्वस्त बाबरी मस्जिद के चारों ओर मुसलमानों के कब्रिस्तान
ध्वस्त मस्जिद के चारों ओर 4-5 एकड़ जमीन" को लेकर केंद्र को मनमानी का आरोप लगाया जाता है।आसपास के 1,480 वर्ग मीटर के आसपास के क्षेत्रों में मुसलमानों के कब्रिस्तान पर नए राम मंदिर का निर्माण में प्रयुक्त होने की बात भी कही जा रही है।
बेलारीखान गांव में हिंदू ने अपनी जमीन कब्रिस्तान में दान की
गोसाईंगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बेलारीखान गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनोखी मिसाल देखने को मिली है. यहां दोनों समुदायों के बीच दशकों से दुश्मनी की वजह बनी एक जमीन को कब्रिस्तान के लिए मुस्लिमों को दे दिया गया. 20 जून को स्थानीय संत सूर्य कुमार झींकन महाराज और अन्य आठ लोगों ने 1.25 विसवा जमीन की रजिस्ट्री कब्रिस्तान कमेटी के पक्ष में कराकर इस दुश्मनी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया.
टेढ़ी बाजार चौराहा निषाद राज चौराहे के रूप में परिवर्तित
अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि को जाने वाला प्रवेश मार्ग जो टेढ़ी बाजार चौराहे के नाम से जाना जाता था, उसका नाम अब बदल गया है. अब ये चौराहा निषाद राज चौराहे के नाम से जाना जाएगा।
उदया चौराहा लता मंगेशकर चौराहे के रूप में परिवर्तित
उदया चौराहा को लता मंगेशकर चौराहे के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है जो अयोध्या की शोभा में चार चांद लगा रहे हैं।
महबरा चौराहा चूड़ामणि चौराहा बना
अयोध्या के महोबरा चौराहे पे लगा माता सीता का चूड़ा,महोबरा चौराहे का नाम बदल कर चूड़ामणि चौराहा किया गया है।
अयोध्या मकबरे और स्मारको का शहर
यह शहर सिर्फ़ मंदिरों ही नहीं मकबरों और स्मारकों से भी भरा हुआ है जो देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब या हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों के आपसी मेल का प्रतीक है।
अयोध्या में आज भी गली-गली में मस्जिद, मजार, कब्रिस्तान इस बात की गवाही देते हैं कि भगवान राम के मंदिरों के इस छोटे से शहर में सामाजिक समरसता आज भी कायम है.
एक ही परिसर में मस्जिद-मंदिर दोनों का अस्तित्व
अयोध्या की टेढ़ी बाजार के पास मुख्य रूप से बाबरी मस्जिद (अब राम मंदिर स्थल) और उससे जुड़े ऐतिहासिक स्थल हैं, जहाँ पहले बाबरी मस्जिद थी और अब भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है; वहीं, मस्जिद के आसपास, खासकर धार्मिक स्थलों के कारण, कई पुराने मकबरे और छोटे मुस्लिम कब्रिस्तान भी मौजूद हो सकते हैं, जो शहर के समृद्ध मुगलकालीन और मध्ययुगीन इतिहास का हिस्सा हैं। बाबरी मस्जिद को पहले 'मस्जिद-ए-जन्म अस्थान' भी कहा जाता था, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को बताता है। श्रीराम जन्मभूमि के आसपास टेढ़ी बाजार और आसपास के मोहल्लों में बनी मस्जिदें- मजारें आज भी सामाजिक समरसता की उदाहरण है, जहां पांचों वक्त की नमाज अता की जा रही है। कुछ प्रमुख मस्जिदें निम्न लिखित हैं -
बेगमपुरा मास्क तुलसी नगर अयोध्या
मदीना मस्जिद धोबरी साईं नगर अयोध्या
नबी ग्रेव शीस, कामी गंज अयोध्या
मस्जिद-ई-अयशा,आशापुर विलेज दर्शन नगर अयोध्या
चौक मस्जिद, शक्ति विहार कोलोनी फैजाबाद
मोती महल मस्जिद, गुदरी बाजार फैजाबाद
मरकज़ी जमा मस्जिद तातशाह,नरेंद्र देव नगर
फैजाबाद
मोती मस्जिद मकबरा फातेहगंज रोड सुभाष नगर फैजाबाद
नूर आलम पर श्री राम ट्रस्ट का भंडारा
नूर आलम खुद को भगवान राम का पड़ोसी बताते हैं। पिछले साल 22 जनवरी 2024 को जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह हुआ उस समय नूर आलम चर्चा में आए थे। यूसुफ आरा मशीन के मालिक नूर आलम राम मंदिर परिसर से सटी हुई जमीन के मालिक हैं। पिछले साल प्राण प्रतिष्ठा के समय उन्होंने यहां राम भक्तों के लिए भंडारे और आवास की व्यवस्था करने के लिए प्रदान की, जिसमें लगभग 20,000 लोगों के लिए भोजन और आश्रय शामिल था।
मुस्लिम बहुल मोहल्ला कजियाना
अयोध्या में अधिग्रहीत परिसर से सटा एक मुस्लिम बहुल मोहल्ला है। इसका नाम कजियाना है। बाबरी मस्जिद का पक्षकार रहा इक़बाल अंसारी भी इसी मोहल्ले का निवासी है। अयोध्या के धर्मक्षेत्र में रहने वाले अधिकतर मुस्लिम कारपेंटिंग, सैलून, जूते-चप्पल और सिलाई जैसे कारोबार से जुड़े हैं। अयोध्या के विकास के साथ इनके कारोबार में भी चार चाँद लगे हैं।
कजियाना मोहल्ले के पास वशिष्ठ कुंड पर हर साल मुस्लिम समुदाय के लोग अपने सभी त्यौहार धूमधाम से मनाते हैं। रामभक्तों और हजारों संत-महंतों की मौजूदगी रहती है लेकिन इसके बावजूद यहाँ अकेली मुस्लिम महिला को अपने बच्चे के साथ खरीदारी करते और किसी भी समय निश्चिन्त होकर अपना काम करते देखा जा सकता है। संतों के समावेशी व्यवहार ने इन्हें कभी भी पराया नहीं समझा।
गंज शहीदान अधिग्रहीत क्षेत्र में शामिल
श्री रामलला के गर्भ गृह के निकट स्थित 5 एकड़ जमीन पर मुसलमानों की कब्र थी इसलिए वहां पर राम मंदिर निर्माण न किया जाए। फैजाबाद गैजेटियर में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि बाबरी मस्जिद तीन तरफ से कब्रगाह से गिरी थी। और यह इलाका ‘गंज शहीदान’ के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1855 के युद्ध के बाद 75 मुस्लिमों को इसी ‘गंज शहीदान’ में दफनाया गया था। वर्ष 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के बाद यहां दफन किए जाने का काम बंद कर दिया गया। इस जमीन पर धार्मिक रूप से इबादत और मस्जिद निर्माण की मनाही है। रामलला विराजमान मुकदमे में यह भी हिस्सा था। तत्कालीन केंद्र सरकार ने कानून व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द के मद्देनजर पूरी जमीन का अयोध्या एक्ट के तहत अधिग्रहण कर लिया था।
सूफी संतों के दरगाहें
1.बाबा शाह इब्राहीम शाह अड़गड़ा की मजार
स्वर्गद्वार मोहल्ले में स्थित बाबा शाह इब्राहीम शाह मजार पर तीन दिन का मेला हर साल लगता आ रहा है. यह मजार सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है, जो स्वर्गद्वार के पास अड़गड़ा में स्थित है और हिंदू-मुस्लिम सभी धर्मों के लोग अपनी परेशानियों के समाधान और बीमारियों के इलाज के लिए यहां दुआ करने आते हैं। यह दरगाह सूफी परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ लोग मन्नतें मांगते हैं और सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर दुआ पूरी होती है, ऐसा माना जाता है।
यहां धूनी रमाने वाले सूफी संतों ने सैय्यद मुहम्मद इब्राहिम शाह प्रमुख थे। इनका समय पूर्व मध्यकाल माना जाता है। ये ताशकंद के राजकुमार थे और आला रूहानियत से प्रेरित हो युवावस्था में ही सुदीर्घ जल मार्ग से अयोध्या आ पहुंचे।यह सूफी संत हजरत इब्राहिम शाह से जुड़ी है, जो ताशकंद के शहज़ादे थे और अयोध्या आकर बस गए थे। चमत्कारिक रूहानी हैसियत के साथ इब्राहिम शाह प्रेम एवं मानवता का संदेश देने के कारण दोनों समुदायों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उन्हें पर्दानशीं हुए छह सौ वर्ष हुए पर अड़गड़ा के नाम से मशहूर उनकी दरगाह अभी भी जीवंत मानी जाती है। यहीं अड़गड़ा मस्जिद भी है. यहां आज भी नमाज अता होती है. यह मस्जिद-मजार एक ही परिसर में है और चारों ओर भगवान के मंदिर हैं. बावजूद इसके ढेरों तनाव के बीच भी कभी बाधा नहीं पहुंची.
2. इब्राहिम शाह की दरगाह
हरगरा में सैयद इब्राहिम शाह की दरगाह है, जो कि अयोध्या का सबसे बड़ा तीर्थस्थल, और दोनों धर्मों के लोग अक्सर इसे देखने और दुआ मांगने यहां आते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, शहर में कम से कम 80 सूफी तीर्थस्थल हैं, जिन्हें मथुरा और वाराणसी के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल माना जाता है।
3. शेख जमाल 'गुज्जरी'
प्रसिद्ध शेख जमाल 'गुज्जरी', जो फिरदौसिया सूफी संप्रदाय के थे, मुगल काल से पहले के एक अन्य मुस्लिम संत थे, अत्यधिक पूजनीय हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, वे अपने सिर पर चावल का एक बड़ा बर्तन लेकर गरीबों और निराश्रितों में बांटते रहते थे।
4.नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली
ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के एक प्रमुख शिष्य, हजरत नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली (नसीरुद्दीन महमूद) थे, जो मूल रूप से अयोध्या या उसके आसपास से दिल्ली आए थे और अपने गुरु के निधन के बाद 'चिराग-ए- दिल्ली' कहलाए।उन्हें राजधानी में दफनाया गया था। उन्होंने औलिया के साथ रहने के लिए 40 के दशक में शहर छोड़ दिया था। शहर में उनके शिष्यों की कब्रें भी हैं।
5.पैगम्बर हजरत नूह की दरगाह
अयोध्या में इस्लाम के दो पैगम्बर हजरत नूह और हजरत शीश की दरगाह भी है। हजरत नूह ने पृथ्वी पर भारी बाढ़ से जीवन को बचाया और हजरत शीश हजरत आदम के पुत्र थे, जो पृथ्वी पर पहले व्यक्ति थे । वे लगभग 1,000 सालों तक जीवित रहे।अयोध्या पुलिस स्टेशन के पीछे स्थित हज़रत नूह की कब्र नव विवाहितों, विशेष रूप से हिंदुओं में बहुत लोकप्रिय है, जो एक सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उनका आशीर्वाद लेने आते हैं। मुस्लिम और हिंदू दोनों भक्त हर गुरुवार को उनकी कब्र पर इबादत करते हैं। विभिन्न धर्मों के लोग आध्यात्मिक उपचार के लिए दरगाह जाते हैं, खासकर तब जब उनके "अपने प्रियजनों पर बुरी आत्माओं का साया आता है"।
6. हजरत शीश पैगम्बर की दरगाह मणि पर्वत
अयोध्या के मणि पर्वत ऐतिहासिक टीले के पीछे आदम हौआ के बेटे हजरत शीश पैगम्बर की कब्र है। कहा जाता है कि हजरत शीश पैगम्बर इस पृथ्वी पर 1300 वर्षों तक जीवित रहे और उनका स्वरुप 70 गज का था वर्तमान में इस स्थान पर आराम कर रहे है । इस स्थान पर 7 गज की इनकी कब्र है। इनके 145 औलाद हुई । उनके पूरे परिवार में सेवकों की कब्र उसी स्थान पर बनी हुई हैं । थोडी दूर से चहारदीवारी बना दी गयी है। जिसके अन्दर उनकी पत्नी बीबी हूर चार लड़के और एक बहू की भी कब्र है । अन्य कब्रें इस चहारदीवारी के बाहर है। इस परिसर में एक मस्जिद है जिसमें नमाज अदा होती है।
अयोध्या की ऐतिहासिक मस्जिदें:-
चौक मस्जिद यह अयोध्या की सबसे पुरानी और प्रमुख मस्जिदों में से एक है, जो शहर के पुराने चौक इलाके में स्थित है.
फतेहगंज चौराहा मस्जिद यह मस्जिद भी अयोध्या के एक महत्वपूर्ण चौराहे पर स्थित है और स्थानीय लोगों के लिए अहम है.
मोती महल मस्जिद यह मस्जिद अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है.
मरकज़ी जामा मस्जिद तातशाह के पास स्थित यह मस्जिद भी एक महत्वपूर्ण इबादतगाह है.
मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद
यह भी अयोध्या में एक प्रमुख मस्जिद है जिसका जिक्र मिलता है.
प्रमुख कब्रिस्तान
करबला, मोहम्मदपुर
यह अयोध्या के पास एक जाना-माना कब्रिस्तान है, जहां लोग धार्मिक स्थलों के रूप में जाते हैं।
भदवल
यह भी अयोध्या क्षेत्र में एक और कब्रिस्तान है, जिसका उल्लेख मिलता है।
अन्य स्थानीय कब्रिस्तान:
अयोध्या के आसपास के विभिन्न मुस्लिम मोहल्लों और गांवों में भी कब्रिस्तान मौजूद हैं, जो स्थानीय आबादी की जरूरतों को पूरा करते हैं।
अयोध्या धाम जंक्शन के सामने मस्जिद
इसके अलावा अयोध्या धाम जंक्शन से निकलते ही 100 मीटर से भी कम दूरी पर मस्जिद मौजूद है। इसके विशाल गुंबद दूर से हरे रंग में चमकता दिखाई पड़ेगा। यहाँ भी अक्सर अकीदतमंदों की भीड़ दिखाई देती है।
विद्याकुंड के पास 2 कब्रिस्तान
धर्मक्षेत्र में विद्याकुंड के आसपास मौजूद 2 कब्रिस्तानों का दौरा किया। यहाँ हमें सैकड़ों की तादाद में पक्की कब्रें दिखीं। पक्की कब्रों पर बाकायदा अरबी भाषा में पत्थर भी लगे हुए हैं। यहाँ अभी भी आसपास के मुस्लिम इंतकाल हुए अपने परिजनों को दफनाने आते हैं। अयोध्या धर्मक्षेत्र में ऐसे कब्रिस्तानों की संख्या 4 से अधिक बताई जा रही है। राम नाम के सर्व समावेशी होने के इस प्रमाण को अभी तक वामपंथी या चरमपंथी विचारधारा रखने वालों ने स्वीकार नहीं किया।
अरुंधति कॉम्प्लेक्स में मुस्लिमों की भी दुकानें
धर्मक्षेत्र टेढ़ी बाजार में बने नए बहुमंजिला शॉपिंग काम्प्लेक्स अरुंधति में मुस्लिमों को भी दुकानें आवंटित हुई हैं। इनमें जूते का कारोबार करने वाले बाबू भाई उर्फ़ मोईन अहमद शामिल हैं। ये कॉम्प्लेक्स खासतौर पर उन कारोबारियों के लिए बनाया गया है, जिनके प्रतिष्ठान नगर के नवनिर्माण के दायरे में आ गए थे।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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