Wednesday, March 19, 2025

बस्ती मण्डल के उदीयमान कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 19)

बस्ती मण्डल के उदीयमान कवि 
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 19)
डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
बस्ती के छंदकार शोध प्रबंध के चतुर्थ चरण में नामोल्लेखित कवि :- 

इस शीर्षक के अन्तर्गत ऐसे छन्दकारो और कवियों को प्रस्तुत किया जा रहा है जो उस समय अपनी काव्यसेवा के द्वारा जनपद को अत्यन्त साहित्यिक सहयोग देने में लगे हुए हैं। इस सूची में तत्कालीन वरिष्ठ छंदकार भी हो सकते हैं और वे भी हो सकते हैं जो कम प्रचार प्रसार में रहे हों। चूंकि ये सूची लगभग 41 साल बाद प्रकाश में आ पा रही है इसलिए अनेक सुधी छंदकारों का वर्तमान परिवेश के मुताबिक सम्यक मूल्यांकन नहीं कहा जा सकता है। चूंकि मैं स्मृति शेष डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' के पुराने कार्य को प्रकाश में लाने की कोशिश कर रहा हूं इसलिए सभी सुधी साहित्यकारों और उनके उत्तरजीवियों से क्षमा याचना के साथ ही ये पुरातन विवरण देने का प्रयास कर रहा हूं। कोई साहित्य प्रेमी अध्येता इस सूची को और अद्यतन बना कर संशोधित और परिमार्जित भी कर सकता है। यदि समय परिस्थितियां और स्वास्थ्य अनुकूल रहा तो मैं भी इस सूची को परिपूर्ण करने का प्रयास करूंगा।

1.धर्मेन्द्र त्रिपाठी (जन्म 1981 विo)

यह ग्राम गजाधरपुर के निवासी हैं। यह बहुत अच्छे छन्दकार और प्रत्तिभाशाली व्यक्ति है। यह मुण्डेरवा इण्टर कालेज के भूतपूर्व प्राचार्य भी रहे हैं। इन्होंने सवैया और धनाक्षरी में बहुत काम किया है। इन्होंने बस्ती शहर के महरीखांवा मोहल्ले में अपना अंतिम समय गुजारा था 

2. पं० सुरेशधर "भ्रमर" (जन्म स० 1978 वि०)

भ्रमर जी जनपद के बड़े ही अच्छे कवि और छन्दकार है। ये सर्वत्र सम्मादृत होते रहे है। ये कविताएँ खड़ी बोली में अधिक लिखे हैं। अपने समय यह वकालत भी करते रहे हैं। नवोदित कवियों के लिए अपना स्नेह देते हुए समादर के पात्र हैं। अच्छी कविताओं के बड़े पक्षधर है।

3. पं० हरिशंकर मिश्र (जन्म सन 1928 ई०)

इनका मूल निवास ग्राम रिउना है । ये जनपद के एक वर्चस्वी हिन्दी सेवी है। इनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का स्वर अधिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्य की प्रधानता है। अपने कोकिल कंठ से ये काव्य मंचों पर सदैव समाद्रित होते रहे हैं। ये इण्टर कालेज में संस्कृत के प्रवक्ता रहे है।

4.हरिनाथ उपाध्याय "अटल"

जनपद के बहुचर्चित छन्दकार है। इनके छन्दो और गीतों में श्रृंगार की प्रधानता है। राष्ट्रीयता के पक्षधर हैं। ये सक्सेरिया इण्टर कालेज में अध्यापक रहे है।

5 . रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी

यह मधुर कठ के कवि और छन्दकार हैं। यह सकोरिया इण्टर कालेज के अवकाश प्राप्त अध्यापक है। इन्होंने ब्रजभाषा में घनाक्षरी और सवैया के दर्जनों छन्द लिखा है।

6. लम्बोदर पाण्डेय "अरुण" ( जन्म सन 1929 ई )

यह जनपद के अच्छे छन्दकार हैं। इन्हें कवि सम्मेलनों में अच्छी ख्याति मिलती रही है।

7. जगई भइया (जन्म 1929 ई )

यह दोहा, घनाक्षरी, सवेया छन्दों के मजे मंजाये कवि होने के साथ लोकगीतों के अच्छे गायक है।

8. परमानन्द आनन्द (जन्म सन 1930 ई)

ये संस्कृत के अच्छे विद्वान होने के साथ ब्रज भाषा और  खड़ी  बोली के अच्छे कवि है। सभी छन्दों में प्राकृतिक सौन्दर्य अधिक है।

9. पंडित चन्द्रशेखर पाण्डेय "शास्त्री"

पाण्डेय जी गीतों के साथ सवैया और घनाक्षरी के बहुत अच्छे छन्दकार हैं। इनके गीतों में राष्ट्रीयता के साथ-साथ श्रृंगार रस की प्रधानता है। छन्दों में सस्कृत का पुट दिखता है।

10. रामरक्षा भारती "विकल"

यह संत कबीर नगर के हरिहरपुर इण्टर कालेज में भाषाध्यापक रहे है। इन्होंने बड़ा सुन्दर दोहा और  सवैया छन्द लिखा है। इनकी कुछ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। यह तामेश्वरनाथ मन्दिर के जीर्णोद्वार में सदैव लगे रहते हैं तथा यहाँ प्रति वर्ष कवि सम्मेलन कराते रहे हैं।

11. सरस्वती प्रसाद शुक्ल "चंचल"

चंचल जी जनता इण्टर कालेज, लालगंज, मे सहायक अध्यापक रहे है। इनके भोजपुरी के छन्द बड़े ही मधुर और श्रृंगारपूर्ण होते हैं। मंचों पर सवैया और घनाक्षरी छन्द यह बड़े मजेदारी के साथ पढ़ते हैं। इनके दर्जनो छन्द इनकी डायरियों में हैं, जिनके प्रकाशन के लिए प्रयासरत रहे है।

12. रामनरेश सिंह "मंजुल"

यह नेशनल इण्टर कालेज हर्रैया में प्रधानाचार्य पद पर रहे है। यह गीतो के साथ खड़ी बोली और व्रजभाषा में सवैया और धनाक्षरी छन्दों को लिखने और पढ़ने में बड़ी पटुता रखते हैं। रेडियो स्टेशन से इनकी कविताएँ प्राय: प्रसारित होती रहीं है।

13. रामदास पाण्डेय "गम्भीर"

यह देशराज नारंग इण्टर कालेज गोविन्द नगर वाल्टरगंज  में प्रवक्ता रहे है। बाद में इनकी नियुक्ति बाहर के किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य के पद पर हुआ था। यह अपने दार्शनिक कविताओं के लिए बहुचर्चित हैं। इनके द्वारा लिखा गया "झंपा शतक" बड़ी उत्कृष्ट रचना है। इनका "प्रसून" नामक काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुका है। इनकी कविताओं में दानवता के कारण दुरूहता है। “अनेक किन्तु एक” नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया है।

14. प० केशरीधर द्विवेदी

यह काव्य मंच के मंजे मंजाये कवि एवं गीतकार हैं। तमाम कवि सम्मेलनों का आयोजन करकै बस्ती काव्यधारा के विकास में लगे हुए हैं। ये पेशे से वकील है और द्विजेश परिषद के मंत्री भी है।

15.उमाकान्त मिश्र "कुन्दन"

यह सुप्रसिद्ध छन्दकार नन्दन जी के पुत्र हैं। दोहा, घनाक्षरी, सवैया के साथ-साथ भोजपुरी के लोकगीत सुन्दर लिखते हैं।

16. श्याम लाल यादव

यह जनपद के बड़े ही वर्चस्वी  गीतकार हैं। इनके गीतों में ग्राम्य जीवन को चित्रण अधिक पाया जाता है। यह कम्युनिस्ट विचारधारा के कवि है। पेशे से ये वकील थे।

17.ठाकुर जगदम्बिका प्रसाद सिंह उर्फ लल्लू बाबू

यह रईसी घराना के गीतकार रहे हैं। इनके गीतों में शृंगार की प्रधानता तथा संवेदना की गहराई है।

18. रामेश्वर वर्मा

यह अच्छे छन्दकार है। ये डाक -तार विभाग में कार्यरत रहे हैं। यह अधिकतर नयी कविता लिखने के पक्षधर है।

19 डा. माहेश्वर तिवारी ' शलभ '          (जन्म 1938 ई )

ये राष्ट्रीय स्तर के गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं। इनके बारे में बहुत लोग जानते हैं।

20. डॉ० श्याम तिवारी

काशी विद्यापीठ, वाराणसी में हिन्दी के उपाचार्य पद पर कार्यरत है। डॉ० तिवारी हिन्दी के उच्च कोटि के छन्दकार व्यंग्यकार के रूप मे बहुश्रुत हैं।

21. दिवंगत सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बस्ती की माटी से ही उगकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करने में सफल हुए।

22. माधव सिंह गौतम

यह जनपद के अच्छे छन्दकार और कवि हैं। इनके छन्दो मे श्रृंगार की प्रधानता रहती है।

23. श्री (डा.)राधेश्याम द्विवेदी "नवीन

नवोदित गीतकारों में श्री राधेयाम द्विवेदी “नवीन" अच्छी ख्याति प्राप्त कर चुके है। उनके छन्दों में राष्ट्रीयता के स्वर के साथ-साथ युगबोध की भाव धारा दिखाई पड़ती है।

24. भद्रलेन सिंह "भ्रान्त"

भद्रसेन सिंह "भ्रान्त" जनपद के अच्छे कवियों में से हैं। उनके गीतो और छन्दों को रेडियो पर अच्छा स्थान मिलता है।

25. गोपाल जी शुक्ल 

ये हास्य और व्यंग के अच्छे छन्दकार हैं। इनके छन्दों में लोक जीवन का  व्यंग्यात्मक संस्पर्श दिखायी पढ़ता है। कवि सम्मेलनों में इन्हें अच्छा स्थान मिलता है।

26. कृष्णदत्त तिवारी "प्रेम"

गीतों के सर्जनाकारों में प्रेम जी का अच्छा स्थान है। ये अपने सुरीले कण्ठों से श्रोताओं को मंत्रमुध कर लेते हैं।

27. शिवपूजन राय

श्री राय राजकीय इण्टर काकेर बस्ती में स्काउट मास्टर रहे हैं। ये अच्छे गीतों के साथ-साथ छन्द भी लिखते हैं। राष्ट्रीयता प्रधान इनकी कवितायें बड़ी ही गेय होती हैं।

28. सतीश श्रीवास्तव 

नयी विधा के अच्छे छन्दकार है। ये शायरे आजम "नाशाद" जी के पुत्र हैं।

29. पं० विद्याधर द्विवेदी प्रधानाचार्य

30. श्री रामशरण जायसवाल

रामशरण जायसवाल जाने गीतो के लिए अच्छी ख्याति पा चुके हैं।

31.श्री चन्द्र पटवा

32.नरेन्द्र कुपार पाण्डेय

33. डॉ० सत्यदेव द्विवेदी सत्य" 

34.रामदेव मिश्र "पिंगल"

35.सत्यप्रकाश शास्त्री 

36.अतुल द्विवेदी

37.कैलाश नाथ ओझा 

क्रम संख्या 31 से 37 तक के नवोदित छन्दकार जनपद की काव्यधारा के विकास में अपना अच्छा योगदान दे रहे हैं।

        चतुर्थ अथवा आधुनिक चरण के छन्दकारों का सामान्य सर्वेक्षण करने से जो सामग्री यहा प्रस्तुत की गई है, उसके आधार पर यदि देखा जाय तो इस चरण में छन्दकारो की सख्या बहुत अधिक हो गई है। इसका कारण यह हो सकता है कि पिछले 25 वर्षों से बस्ती जन्पद के छन्दकारों को बस्ती की धरती पर राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन देखने को मिलते रहे हैं। इस चतुर्थ चरण में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के छन्दकार और गीतकारों ने मण्डल के गौरव को आगे बढ़ाया है। गीतों के साथ नवगीत और नवगीतों के साथ आधुनिक तथा प्राचीन छन्दो की वह धारा जो पीताम्बर और लछिराम के समय से धरती पर प्रवाहित हुई है, आज भी अपने अजस्र प्रवाह से बस्ती की काव्यधारा कोअभिसिन्ति कर रही है।


Friday, March 14, 2025

केरल की सबसे ऊंचा गंगाधरेश्वर आझिमाला शिवमंदिर// आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


भारत के केरल के तिरुवनंतपुरम जिले में विझिनजाम के पास अरब सागर के तट पर पुलिन्कुडी, विझिनजाम में स्थित यह एक भव्य दिव्य एक हिंदू शैव मंदिर है। यह विझिनजाम - पूवर रोड से 0.8 किमी दूर समुद्र तट से सटी एक चट्टान के पास स्थित है। आझि' का अर्थ है समुद्र और 'माला' का अर्थ है पहाड़ी- और मंदिर का नाम इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अरब सागर के सुनहरे तट पर थोड़े ऊंचे मंच पर स्थित है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, आझिमाला शिव मंदिर महान भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर 18 मीटर (58 फीट) ऊंची गंगाधरेश्वर मूर्ति के लिए जाना जाता है, जो केरल की सबसे ऊंची शिव मूर्ति है।  मंदिर तमिलनाडु की वास्तुकला से मिलती-जुलती शैली में बनाया गया है । इसका संचालन आझिमाला शिव मंदिर देवस्वोम ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। 
मंदिर की स्थापत्य शैली:- 
मंदिर की स्थापत्य शैली तमिलनाडु के मंदिरों के समान है। बाहरी दीवार और गोपुरम को गणेश , अय्यप्पन , विष्णु , कार्तिकेय और हनुमान जैसे विभिन्न हिंदू देवताओं की रंगीन मूर्तियों से सजाया और सजाया गया है। मुख्य देवता और अन्य अधीनस्थ देवताओं के मंदिर भी नक्काशी, भित्ति चित्र और सजावट के साथ जीवंत हैं । यह द्रविड शैली का मंदिर है।
गंगाधरेश्वर शिव की विशाल मूर्ति 
मंदिर के अंदर, गंगाधरेश्वर आकृति में शिव की 18 मीटर (58 फीट) ऊंची कंक्रीट की मूर्ति है। इस मूर्ति को 29 वर्षीय कलाकार पीएस देवदथन ने बनाया है जो अझिमाला के मूल निवासी हैं।  मूर्तिकला का निर्माण 2 अप्रैल 2014 को शुरू हुआ और 31 दिसंबर 2020 को पूरा होकर जनता के लिए खोल दिया गया। यह वर्तमान में भारत की सबसे ऊंची गंगाधरेश्वर मूर्ति और केरल की सबसे ऊंची शिव मूर्ति है। 
विझिनजाम के अझिमाला के सुरम्य गांव में, दिव्यता और प्रकृति का एक अद्भुत मिश्रण है। जहां खूबसूरत समुद्र तट और हरा-भरा वातावरण यात्रियों को आकर्षित करता है, वहीं अझिमाला शिव मंदिर इस जगह को एक रहस्यमय स्पर्श देता है। समुद्र से सटी चट्टान पर बना यह मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो पूरे क्षेत्र को एक पवित्र आभा से आच्छादित करता है। यह मंदिर भगवान शिव की 58 फीट ऊंची गंगाधरेश्वर रूप की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, जो पूरी तरह से कंक्रीट से बनी है। शिव के बाल हवा में लहराते हुए और देवी गंगा को पकड़े हुए इस विशाल संरचना का अपना आकर्षण है और यह मंदिर को एक शानदार आकर्षण देता है। मूर्ति में चार भुजाओं वाले शिव को बैठे हुए मुद्रा में दर्शाया गया है। पीछे के दाहिने हाथ में डमरू है , सामने का दाहिना हाथ दाहिनी जांघ पर टिका हुआ है, पीछे के बाएं हाथ में त्रिशूल है और सामने का बायां हाथ जटा के भीतर उठा हुआ है , जिसमें गंगा है । मूर्ति 6.1 मीटर (20 फीट ) की ऊंचाई पर एक चट्टान पर स्थापित है।  शिव की 58 फीट ऊंची गंगाधरेश्वर प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है, जो पूरी तरह कंक्रीट से बनी है । शिव के बाल हवा में लहराते हुए और देवी गंगा को थामे हुए इस विशाल संरचना का अपना अलग ही आकर्षण है और यह मंदिर को एक शानदार आकर्षण प्रदान करता है।
अन्य देव गण:- 
मंदिर के मुख्य देवता शिव हैं । गणेश और पार्वती अय्यप्पन , विष्णु , कार्तिकेय और हनुमान जैसे अधीनस्थ देवता हैं। यहां योगेश्वर के लिए एक छोटा मंदिर भी है ।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

Wednesday, March 12, 2025

राममूर्ति मिश्र "सुधाकर" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 14)

राममूर्ति मिश्र "सुधाकर"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 14)
डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

जीवन परिचय :- 
कलाधर जी के अनुसार राममूर्ति सुधाकर का जन्म स० 1999 वि० मे बेलहर ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम शिवराज मिश्र था। शोध के प्रकरण से सुधाकर जी का पता लगाया गया किन्तु कुछ लोगों ने बताया कि ये बाहर रहते हैं, इसलिए कलाधर जी के बताने के अनुसार ही सुधाकर जी पर प्रकाश डाला जा रहा है। सुधाकर जी दस वर्ष की अवस्था से ही हिंदी लिखने लगे थे। इन्होंने कलाधर जी को अपना साहित्य गुरु बनाया था। सुधाकर जी के बारे मे "रसराज" कानपुर के सम्पादक आचार्य शिवदुलारे शर्मा सितम्बर 1958 के अंक 2 पृष्ठ 14 पर लिखते हैं "सवैया, घनाक्षरी तथा अन्य मात्रिक छन्दों के प्रयोग में सुधाकर जी सिद्धहस्त कवि हैं। इनके कुछ छन्द जो "रसराज" में छपे हैं, प्रस्तुत है।
 - ( 'रसराज’, कानपुर, शिव अभिनंदन 
     ग्रंथ नवम्बर 1957, पृष्ठ 26 )
      श्री शिवदुलारे जी के प्रति लिखा गया उनका छन्द बड़ा ही कलात्मक है-
कार्तिक की पूर्णिमा कापुण्यपर्व धन्यधन्य 
जन्म लियो शिव शिव सुकवि समाज के । 
जा रहे मनाने धूम धाम से जयन्ती शुचि 
कलाधर सुधाकर कवि गण आज के । 
प्रवृत्ति प्रदत्त बनी देख जो लुटाते आज 
पानिप के झले हुए मोती साथ साज के ।
बोलते विहंग नहीं विधि से मनाते वही
युग युग जीयें ये विधाता रसराज के।।
      - (वही, पृष्ठ 26)
      "इसी तरह से रह जायेगी" की पूर्ति सुधाकर जी ने भी "मृदुल " और "मौलिक"जी की परम्परा में किया है-
ऐसी धृष्टता है दुष्ट करता क्यो रात दिन, 
जैसी करता था नित्य कालीनाग पानी में।
याद कर सर्वदा अच्छे दिन रहते हैं ,
एक दिन अवश्य लगेगा दाग पानी में।
तेरी यह ऊँची पाग जाएगी रसातल मे ,
प्रलय में डूबता ज्यो भूमि भाग पानी में। 
गिर ना "सुधाकर नहीं तो बुझ जायेगा ,
गिर कर बुझ जाती जैसे आग पानी में। 
        - (वही, सितम्बर, 1957)
     इस छन्द के माध्यम से कवि ने कुविचारियों को बड़ी अच्छी चेतावनी दिया है। इसी संदर्भ में एक छन्द और प्रस्तुत है-
ऊंचे ऊंचे भवनों की भव्यता रहेगी नहीं 
दृढ से भी दृढ़ भीति गिरि ढह जायेगी ।
लोभ बस दूसरे की सम्पत्ति को लूट रहे 
वह काल नद में जरूर बह जायेगी। 
सर्वदा सनेह से सनेह चमकाते जिसे
एक दिन वही दिव्य देह ढह जायेगी । 
चुको ना 'सुधाकर' सदैव शुभ कार्य करो 
कहने को केवल कहानी रह जायेगी।।
         - ( वही, मई 1957)
      मई 1957 में लिखा गया यह छन्द तीन कवियों में रसराज में छपने के लिए भेजा था। तीनों की समस्या पुर्तियां छपी थी। तीनो ने संसार की नश्वरता को हृदय से स्पर्श लिया था किन्तु सुधाकर के लिए यह उच्च प्रेरणास्पद हुआ, जो मौलिक के लिए दुखान्त का नाटक और मृदुल के लिए आशा का प्रतीक रहा। 
        पुन: ;एक छन्द जिसने तत्कालीन राजनीति पर करारा व्यंग्य है, प्रस्तुत किया जा रहा है - 
ये रे कलिकल तेरो राज काज राजनीति 
देखि एक दूसरे के रक्त करषत है। 
द्रव्य लुटि लुटि लोग बनि धनवान रहे 
भोजन औ वस्त्र हेतु दीन तरसत हैं। 
एक दिन तेरी भी अवधि बीति जाये मूढ़
मान सच तेरे अंग अंग झरसत हैं। 
पाये ना पियूष तु "सुधाकर" से स्वप्न में भी
देखि एक दूसरे के रक्त करषत है।।
- (वही, जून 1968,)
       "सुधाकर" जी का एक छन्द "प्रभु" शीर्षक यहाँ प्रस्तुत है- 
मुद्दतों मनाते आप नाते पर पाते नहीं 
आप छिपे पता नही कैसे किस फूल में।
खोज खोज रोज-रोज घूम रहा बन बन 
मिलते सरोज में न मिलते बबूल में।
कहां कहां जाये जहां दिखवायें बार बार
 एक बार प्रतिमा दिखाये इसी धूल में।
आकर सुधाकर के सीतल बनाये गात 
अन्तर न पायें प्रभु प्रार्थना के भूल मे ।। 
      - (वही, अक्टूबर, 1958)
    इसी क्रम में "परिवर्तन” शीर्षक पर एक कविता द्रष्टव्य है- 
हरी भरी पावस लतिकाएं , 
नदिया उमड़ी जाती है।
मंद मंद मलियानिल चलता 
कलिकाये मुस्काती है। 
रंग-बिरंगी चित्रित सारी 
इन्द्रबधू फैलाती है। 
कभी-कभी धनघोर घटाएं 
अमृत बूंद बरसाती है।।
             - (वही, जुलाई 1960)
     ईश्वरीय विधान के संदर्भ में एक कविता है-
उसका विधान कभी कोई जान पाता नही 
करता अंधेरा कभी करता प्रभात है। 
कभी मायापति बन माया दिखलाता खड़ा 
कभी वह सुन्दर खिलाता जनजात है। 
कभी अत्याचारियों के नाश करने के हेतु
करता महान से महान उत्पात है। 
कभी पूरी सृष्टि ही सुधाकर डुबाता वह 
तब सूझता ही नहीं दिन और रात है। 
            - (वही, नवम्बर, 1958)
      सुधाकर जी आधुनिक चरण के कलाधर परम्परा के उच्चस्तरीय छन्दकार हैं। इनके छन्दों में युग-विम्व अधिक है। भाषा खड़ी बोली के साथ कहीं-कहीं भोजपुरी और ब्रजभाषा के शब्दों से युक्त है। छन्दों में शिल्प की कसावट है। अलंकारों का अभाव होते हुए भी कथन में चमत्कार है। इनसे जनपदीय छन्द परम्पराओं को अच्छी आपेक्षाएँ है।





Monday, March 10, 2025

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्मारक राम नाथ पुरम //डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रीय स्मारक भारत गणराज्य के पूर्व  राष्ट्रपति ए. पीजे अब्दुल कलाम को समर्पित एक स्मारक है जो भारत के तमिलनाडु के रामेश्वरम के पेइकरुम्बु में स्थित है । इस स्मारक को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा कलाम को श्रद्धांजलि देने और भारत की सांस्कृतिक विरासत और जातीय विविधता को प्रदर्शित करने के लिए डिज़ाइन और निर्मित किया गया था। इसका आधिकारिक उद्घाटन 22 जुलाई 2017 को भारत गणराज्य के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। राष्ट्रीय एकता का प्रतीक, यह स्मारक मुगल और भारतीय वास्तुकला का एक समामेलन है ।        27 जुलाई 2015 को कलाम का निधन हो गया, कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में "एक रहने योग्य ग्रह पृथ्वी का निर्माण" विषय पर व्याख्यान देने के लिए शिलांग गए थे । व्याख्यान 4000 शब्दों का होना था, लेकिन शुरुआती दो वाक्य बोलने के बाद ही कलाम बेहोश हो गए और बाद में अस्पताल में अचानक हृदयाघात से उनकी मृत्यु की पुष्टि हुई।  कलाम के पार्थिव शरीर को भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर से शिलांग से गुवाहाटी ले जाया गया , जहाँ से 28 जुलाई की सुबह उसे नई दिल्ली ले जाया गया। 
कलाम की मृत्यु के बाद, भारतीय गृह मंत्री ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद की एक आपात बैठक बुलाई , जिसमें भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया । बैठक में, "डॉ एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रीय स्मारक" बनाने के प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया गया। भारत सरकार ने नई दिल्ली में राजघाट-(एकता स्थल) पर कलाम का अंतिम संस्कार करने और वहां एक स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा । कलाम के परिवार ने आपत्ति जताई, क्योंकि कलाम अपने गृहनगर रामेश्वरम में दफन होना चाहते थे , और भारत सरकार परिवार की इच्छा के साथ जाने के लिए सहमत हो गई, और उसी वर्ष कलाम की जन्म तिथि पर जो 15 अक्टूबर को है, रामेश्वरम में एक स्मारक पर निर्माण कार्य शुरू करने की घोषणा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी। 27 जुलाई 2017 को, कलाम की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर, स्मारक का उद्घाटन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। 
संरचना, वास्तुकला और परिदृश्य
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्मारक के डिजाइन और निर्माण की पहल की,  और दिसंबर 2015 में निर्माण शुरू हुआ। जुलाई 2016 में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कलाम की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर आधिकारिक तौर पर आधारशिला रखी। निर्माण एक वर्ष के भीतर पूरा हो गया,  500 श्रमिकों की भागीदारी के साथ, और कभी-कभी काम चौबीसों घंटे चलता था। इस काम की देखरेख डीआरडीओ के मुख्य निर्माण इंजीनियरों कर्नल बी. चौबे और कर्नल बी. के. सिंह ने की। 
स्मारक 2.11 एकड़ भूमि पर फैला है, निर्मित क्षेत्रफल 1,425 वर्ग मीटर है,  और निर्माण की लागत 1.2 ₹ बिलियन तक है । मकबरा ग्रेनाइट , संगमरमर और प्रबलित कंक्रीट से बना है । निर्माण सामग्री भारत के विभिन्न हिस्सों से मंगवाई गई थी और निर्माण स्थल तक पहुँचाई गई थी; पत्थर के स्तंभ बैंगलोर से मंगवाए गए हैं , पत्थर की परत जैसलमेर और आगरा में डिजाइन की गई थी , जबकि मुख्य प्रवेश द्वार के लकड़ी के दरवाजे तंजावुर में तैयार किए गए हैं और संगमरमर कर्नाटक से लाया गया था ।
     मुगल और भारतीय वास्तुकला के समामेलन के साथ , स्मारक को भारत की सांस्कृतिक विरासत और जातीय विविधता को प्रदर्शित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है , जो इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाता है। संरचना में तीन प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से मुख्य प्रवेश द्वार दिल्ली के इंडिया गेट जैसा दिखता है , जबकि इसका दालान तंजावुर के बृहदिश्वर मंदिर जैसा दिखता है , और लकड़ी के दरवाजे चेट्टीनाड शैली में डिज़ाइन किए गए हैं । स्मारक के उत्तरी छोर पर एक गोलाकार कब्र है जिसमें कलाम की कब्र है। मुख्य गुंबद राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय गुंबदों में से एक जैसा दिखता है और इसमें वीणा बजाते हुए कलाम की कांस्य प्रतिमा है। केंद्रीय गुंबद लगभग 2500 वर्ग फीट के चार प्रदर्शन हॉलों से जुड़ा हुआ है- (प्रत्येक हॉल चरणों में कलम के जीवन को दर्शाता है, और उन्हें बच्चों के वर्ग, वैज्ञानिक वर्ग, प्रेरणा वर्ग और व्याख्यान वर्ग के रूप में डिज़ाइन किया गया है), जिसमें रॉकेट और मिसाइलों की प्रतिकृतियां, 900 पेंटिंग हैं ; जिसमें शामिल हैं,  भित्ति चित्र ( हैदराबाद , शांति निकेतन , कोलकाता और चेन्नई से प्राप्त ),  शेखावाटी पेंटिंग , 200 तस्वीरों का एक संग्रह जो डीआरडीओ, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ उनके लंबे जुड़ाव और भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल विकास प्रयासों में उनकी भागीदारी को उजागर करता है। ऐसी पेंटिंग और आदमकद मूर्तियां हैं जो अलग-अलग उम्र में कलाम को चित्रित करती हैं स्मारक में एक वैज्ञानिक और भारत के राष्ट्रपति के रूप में कलाम के उद्धरण शामिल हैं।
स्मारक के चारों ओर बाहरी परिसर में भूनिर्माण किया गया है , जिसमें पड़ोसी राज्यों आंध्र प्रदेश , कर्नाटक और तेलंगाना से पौधे मंगाए गए हैं । परिदृश्य को मुगल उद्यान शैली में डिज़ाइन किया गया है, जिसमें कलाम द्वारा डिज़ाइन किए गए मिसाइलों के मॉडल के साथ पर्गोला मार्ग हैं।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

विभीषण कोद्ण्ड स्वामि मंदिर को चक्रवात भी नुकसान नहीं पहुंचा पाया

विभीषण कोद्ण्ड स्वामि मंदिर को चक्रवात भी नुकसान नहीं पहुंचा पाया
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 
तमिलनाडु के रामेश्वरम में कोथंडा रामस्वामी मंदिर हिंदू देवता राम को समर्पित एक तीर्थस्थल है।  यह मंदिर 1964 के चक्रवात से बची एकमात्र ऐतिहासिक संरचना है, जिसने धनुषकोडी को बहा दिया था पर इस मन्दिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सका था। मंदिर में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और विभीषण को देव स्वरूप स्थापित किया गया है।
    रामायण के मुताबिक, भगवान राम ने अपने भक्त विभीषण को अमरता का वरदान दिया था। विभीषण को यह वरदान उनकी अटूट भक्ति और धर्म के प्रति निष्ठा के लिए मिला था। उसने  अपने भाई रावण का साथ न देकर भगवान राम और सत्य का साथ दिया था। उसने अपने बड़े भाई रावण और सभी राक्षसों को अनीति के रास्ते पर चलने से मना किया था।वह परिवार से अधिक नीति और धर्म का साथ दिया । विभीषण को चिरंजीवी माना जाता है।विभीषण राक्षस कुल में पैदा होने के बाद भी नीति और सत्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहा। उसका यह मंदिर चारों ओर समुद्र से घिरा हुआ है और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। रामेश्वरम् के टापू के दक्षिण भाग में, समुद्र के किनारे, एक और दर्शनीय मंदिर है। यह मंदिर रमानाथ मंदिर से पांच मील दूर पर बना है। यह कोदंड ‘स्वामी का मंदिर’ कहलाता है। कहा जाता है कि विभीषण ने यहीं पर राम की शरण ली थी। रावण-वध के बाद राम ने इसी स्थान पर विभीषण का राजतिलक कराया था। इस मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां के साथ ही विभीषण की भी मूर्ति स्थापित है।अनुमान है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 500-1000 वर्ष पहले हुआ था।माना जाता है कि यह मंदिर वह स्थान है जहाँ रावण के छोटे भाई विभीषण ने राम और उनकी वानर सेना से शरण माँगी थी। इस परंपरा के अनुसार, सीता के अपहरण के बाद, विभीषण ने रावण को सलाह दी कि वह सीता को राम को लौटा दे। रावण ने सलाह नहीं मानी, जिसके कारण विभीषण लंका से भाग गए और राम की सेना में शामिल हो गए। जब विभीषण ने राम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तो वानर सेना ने राम से विभीषण को जासूस समझकर स्वीकार न करने का आग्रह किया। हालाँकि, हनुमान के आग्रह पर राम ने विभीषण को स्वीकार कर लिया और कहा कि उनके सामने आत्मसमर्पण करने वालों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। यह भी कहा जाता है कि रावण के वध के बाद, राम ने इसी स्थान पर विभीषण के लिए "पट्टाभिषेकम" (लंका के राजा के रूप में आरोहण) किया था। इस कहानी को मंदिर के अंदर की दीवारों पर पेंटिंग में दर्शाया गया है।
यह मंदिर समुद्र के किनारे बना है और राम को समर्पित है। इस मंदिर में विभीषण के साथ-साथ राम, लक्ष्मण, सीता, और हनुमान की भी मूर्तियां हैं। यह मंदिर रामेश्वरम से 13 किलोमीटर दूर है. यह मंदिर बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी से घिरे एक द्वीप पर बना है।
कोथंडारामस्वामी मंदिर की खास बातेंः- 
यह मंदिर 1964 के चक्रवात से बचा था।इस मंदिर में राम और विभीषण की मित्रता की कहानी बताने वाली दीवारों पर पेंटिंग हैं।इस मंदिर में एक दूरबीन भी है जिससे रामसेतु को देखा जा सकता है।इस मंदिर के पास बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी का समुद्र है।इस समुद्र में एक पत्थर का शिवलिंग है जिसे लोग पूजते हैं। मान्यता है कि इसी जगह पर भगवान राम ने विभीषण का राज्याभिषेक किया था।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

Sunday, March 9, 2025

ब्रजभूषण उपाध्याय "ब्रजचन्द" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 13)

ब्रजभूषण उपाध्याय "ब्रजचन्द"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 13)
डा. मुनि लाल उपाध्याय सरस 
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

जीवन परिचय:- 
ब्रजभूषण उपाध्याय का जन्म वैसाख शुक्ल तृतीया स० 1990 विक्रमी में मेहदावल के सन्निकट बनकटा नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं० रामहर्ष उपाध्याय था। ब्रजचन्द की शिक्षा-दीक्षा बी०ए० विशारद है। 1964 ई.मे जे०टी०सी० करने के बाद आप जिला परिषद के जूनियर हाई स्कूल के सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। भोजपुरी और खड़ी बोली के उभरते हुए छन्दकार के रूप में ब्रजचन्द काव्य- गोष्ठियो में विशेष सम्मान पाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक - 1. ललकार 
अप्रकाशित पुस्तक - 2. चेतक बावनी ।
       लोकगीतों के बड़े ही अच्छे कवि के रूप में ये सम्मान पाते रहे हैं। यह काव्य के प्रत्ति बड़े ही शौकीन रखते हैं।
"चेतक" के दो छन्द यहाँ प्रस्तुत है- 
हिम की हिमानी देखी देखी हैअपूर्ण प्रभा 
चन्दन सुगंध सदा उत्तर में हिन्दभाल।
देखी हरि गिरिकला शिव की समाधि देखी
देखी हैअखण्डज्योति उषा का अरुणकाल
शिवाकीभवानी भला किसकी है जानीनही 
राणा का भाला राजपूतों की अनोखीढाल।
स्वामिभक्त चेतक का देखा है अनुप रूप
देखी हल्दीघाटी कीलड़ाई कीकलाकमाल।
   पुनः एक दूसरा छन्द इस प्रकार है - कितने सपूत देखा मातु बलि वेदी पर 
प्राण पुष्प मुद्रित हो प्रेम से चढ़ाये थे।
कितने जवान देखा झूम झूम नाच नाच
हो हो कुर्बान देशभक्ति गान गाये थे। 
देश है चित्तौड़ यही वीर रस वीर रूप 
जौहरी अनेक जहां जौहर दिखाये थे । 
जिनकी कहानी थाती वीरता की "ब्रजचंद" 
बार बार लिखते अनेक कवि आये थे।।
       ब्रजचंद जी चतुर्थ चरण के एक नवोदित छन्दकार के रूप में काव्य-सेवा मे लगे हुए हैं। इनके भोजपुरी के मनोहारी गीत कवि सम्मेलनों के मचों पर काफी जमते हैं। इनके छन्दो पर कलाधर और अब्बासअली "बास" के काव्य का प्रभाव अधिक है। ब्रजचंद जी अपने आकर्षित प्रतिभा से कवि जनों को आत्मवत बना देने में बड़े सक्षम है।छन्दकारों से मिलते जुलते रहना इन्हें बहुत अच्छा लगता है। चतुर्थ चरण के नवोदित छन्दकारों में अपनी सेवाओ से ब्रजचंद सामादृत होगे, ऐसा विश्वास है।


रामेश्वरम मन्दिर में दुर्लभ क्षण होता है नागमणि का दर्शन // आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

मणि का महत्व :- 
कहा जाता है कि महाकाल की भस्म आरती और रामेश्वरम का मणि दर्शन जिस भक्तों को हो जाते हैं उसका जीवन धन्य हो जाता है । मणि या नाग मणि का खासकर हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। इसे एक चमकदार और दिव्य वस्तु माना जाता है जो सिर्फ नागों के पास पायी जाती है। कुछ लोग इसे पाने के लिए कई तंत्र-मंत्र और टोने-टोटके करते रहते हैं, लेकिन इसे पाना तो दूर, देखना भी बेहद दुर्लभ होता है।  रामेश्वर मंदिर में इसे एक निश्चित समय पर देखा जा सकता है। कहा जाता है कि यह वही मणि है जो भगवान विष्णु के शेषनाग की मणि है।
    भारत की  धरती पर कई ऐसे स्थान हैं जो आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व से जुड़े हुए हैं। इन्हीं में से एक है तमिलनाडु का रामेश्वरम मन्दिर भी है , जो भारत के दक्षिणी भाग में स्थित है। यहाँ हिंदू धर्म का प्रभाव बहुत गहरा है। यहाँ की लगभग 88% जनसंख्या हिंदू धर्म को मानती है और यह राज्य भारतीय हिंदू धर्म की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ एक अनोखी घटना घटी थी, जो नाग मणि दर्शन के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर में, हर दिन सुबह-सुबह मणि दर्शन होता है । यह “मणि” “स्पटिक” से बनी होती है, जो “पवित्र शिवलिंग” के रूप में एक कीमती क्रिस्टल है। किंवदंती के अनुसार, यह “शेषनाग” (वह साँप जिस पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं) की “मणि” है। देखने में एक कांच के समान और रंगहीन के साथ पारदर्शी भी होता है इसे देख यह भ्रम भी पड़ सकता हैं कि यह कांच है या फिटकरी का टुकड़ा ? लेकिन यदि इसको तरासकर मोती या अन्य रूप दिया जाय तो यह बेहद मनमोहक हो सकता है। इस स्फटिक लिंगम को प्रकाश में रखने पर प्रकाश समान रूप से बिना किसी धुंधले या अपारदर्शी पैच के गुजरता है।
       रामेश्वरम की नागमणि केवल एक धार्मिक वस्तु नहीं, बल्कि यह एक अद्भुत कहानी और अनुभव का प्रतीक है। यहाँ आने वाले भक्त इस मणि के माध्यम से न केवल अपने आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध करते हैं, बल्कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति भी करते हैं। 
रामेश्वरम मणि दर्शन टाइमिंग और बुकिंग :- 
नागमणि के दर्शन के लिए श्रद्धालु को रामेश्वर मंदिर के भीतर ही जाना होता है । नागमणि दर्शन का समय केवल 1 घंटा सुबह 5 बजे से 6 बजे तक ही होता है। इसलिए, बेहतर यही है कि सुबह 4 बजे पहुंचकर मंदिर में प्रवेश के लिए लगने वाली कतार में खड़े हो जाएं और अपना टिकट ले लें। इसे बुक करने के लिए कोई ऑनलाइन बुकिंग सुविधा उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी भी वेबसाइट या धोखाधड़ी से सावधान रहना चाहिए।
रामेश्वरम मणि दर्शन के टिकट मूल्य :- 
रामेश्वरम मणि दर्शन के टिकट दो प्रकार के हैं। एक टिकट की कीमत 50 रुपये है और दूसरे टिकट की कीमत 200 रुपये है। हालांकि, दोनों ही टिकट से सबको नागमणि के दर्शन आसानी से हो जाते हैं। 200 रुपये वाले टिकट में दर्शन थोड़ा नजदीक से होते हैं। यह सेवा पूर्णतः सशुल्क है, नागमणि दर्शन के लिए कोई भी मुफ्त टिकट उपलब्ध नहीं होता है और ना ही कोई वीवीआईपी लाइन होती है।
रामेश्वरम मणि दर्शन हेतु ड्रेस कोड :- 
रामेश्वरम केवल एक मंदिर ही नहीं बल्कि एक धाम भी है, इसलिए ध्यान रहे कि यहाँ पर प्रवेश करते समय केवल उचित स्वदेशी परंपरागत कपड़े ही पहननें की अनुमति दी गई है। पुरुषों को धोती, साउथ की लुंगी, कुर्ता-पजामा,  यहाँ पर अनुमति है, लेकिन किसी भी प्रकार के शॉर्ट्स, लोवर, कैपरी आदि ना पहनने की हिदायत दी जाती है । व महिलाओं साड़ी या कुर्ता पहन सकती हैं, जींस या शॉर्ट्स
प्रवेश हेतु अमान्य है।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।