Tuesday, January 14, 2025

शारदा शरण चतुर्वेदी "मौलिकबस्ती के छंदकार भाग 3 (कड़ी 4) - डा. मुनिलाल उपाध्याय एवं डा. राधेश्याम द्विवेदी

जीवन परिचय:- 

सुकवि शारदा शरण चतुर्वेदी 'मौलिक' का जन्म फाल्गुन शुक्ल एकादशी सं०1979 वि० में धनघटा के निकट मलौली नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता पंडित राम नारायण चतुर्वेदी रंगयुग के प्रतिष्ठित कवि थे तथा उनके बड़े भाई सुकवि ब्रज बिहारी 'व्रजेश' जनपद के उच्चस्तरीय छंदकार है। जूनियर हाई स्कूल की शिक्षा के बाद मौलिक जी ने नार्मल की परीक्षा पास करने के बाद अपने गाँव मलौली के प्राइमरी पाठशाला के सहायक अध्यापक नियुक्त हुये । कुछ दिनों के बाद जब उन्हें बँटवारे में बकौली की सम्पत्ति मिली तो यह मलौली से बकौली के गांव में रहने लगे और बैंडा बाजार के प्राइमरी स्कूल मे सहायक अध्यापक के पद पर स्थानान्तरित हो गये। मौलिक जी सुकवि रामदेव सिंह "कलाधर” के योग्य शिष्यों में से थे। यह बड़े ही प्रतिभाशाली छन्दकार थे।समस्या- पूर्तिया इनकी जबान पर रहती थीं। हिन्दी के लोकगीत के ये अच्छे गायक थे। पहली जून 1957 को एक भयंकर आंधी आई और मौलिक जी के ऊपर एक पेड़ की डाल गिर पड़ी । उसी दिन से बेहोशी की हालत में ये मरणासन्न हो गये और दिनांक 07-6-1957 ई को वे दिवंगत हो गये।

- (सुकवि कलाधर के प्रदत्त अभिलेखों के आधार पर।)

     मौलिक जी के साहित्य के संदर्भ में मुझे बकौली जाना पड़ा। किन्तु वहां पर मौलिक जी के साहित्य से सम्बन्धित कोई भी सामग्री नहीं मिल सकी। उनका कारण था कि मौलिक जी के निधन के समय उनके दो अबोध बच्चों पर विपत्ति का पहाड़ गिर पड़ा। मौलिक जी के छन्दों की सुरक्षा कौन करता? इनके सारे छन्द जिस मिट्टी निकले थे उसे उसी में विलीन हो गये। पुन: प्रयास करने पर मौलिक जी के कुछ छन्द तत्त्कालीन साहित्य पत्रिका 'रसराज' प्रकाशन स्थल, कानपुर संपादक सुदर्शन जी  की पुरानी कापियों के रूप में सुकवि कलाधर जी के सौजन्य से प्राप्त हुए हैं। उन कापियों है कुछ छन्द यहाँ प्रस्तुत हैं- 

घर घर  झोपडी पड़ी है मन मारे हुये, 

दीनता से दबी वृत्ति रासै ना छदाम की। 

अति दृष्टि अनावृष्टि आधि-व्याधियों से, 

व्यथित विकल दुहाई  रही राम की । 

घर के उजाले को स्नेह के हैं लाले पड़े,

लज्जा लूटी जा रही है बस बिनु दाम की। 

सारे ये सुधार भी बेकार बने जा रहे हैं, 

मौलिक ना पूछो दशा भारतीय ग्राम की। 

- (रसराज" पूर्तिपटल, नवम्बर, 1956)

ग्राम के ऊपर यह समस्यापूर्ति बढी अनूठी है। इसी ही प्रकार से मौलिक जी के दो और छन्द युगानुरूप देखे जा सकते हैं- 

शान्ति के घेरे मैं पूर्ण ज्वलन्त, 

अशान्ति की दिखती ज्वाला है देख लो ।

होता सुधार विकार किये, 

अब भी गले में पड़ी माला है देख लो।

हा अधिकार में ही प्रतिकार ही,

का खड़ा रूप वो काला है देख लो।

होती समृद्धि की वृद्धि ये" मौलिक", 

वृद्धि का होता दिवाला ये देख लो।।

पुन: एक और छन्द भी दर्शनीय है - 

जो बलिदान की रक्त की बूंदों से, 

मौलिक पाला गया गणतन्त्र है।

मान्यता से अति दूर वही, 

भ्रमजाल में डाला गया गणतन्त्र है।

रूप ना कोई उड़ा करें जो 

उसी साँचे में ढाला गया गणतन्त्र है।

कुण्ड में डाला गया अभी कूप से, 

जो कि निकाला गया गणतन्त्र है ।।

- ( रसराज, सितम्बर अक्टूबर, 1956-)

      देश के प्रति कवि की आत्माभिव्यक्ति युगानुरूप थी। उसके स्वर में हजारों भारतीय जनजीवन का स्वर था। मौलिक जी ने अपने दो दुर्मिल सवैया छन्द रसराज के सम्पादक के पास भेजा। सम्पादक जी ने इन दोनों छन्दों को बहुत पसन्द किया और इसे "रसराज” के मुख्यपृष्ठ पर छापा 

है - 

दुख गाथा मेरी सुनि के हंसी खेल में 

नित्य ही टालने वाले बता। 

यह मेरा भी कष्ट हटेगा कभी, 

भ्रमजाल में डालने वाले बता ।

समता कभी आयेगी "मौलिक" केवल, 

पेट के पालने वाले बता । 

कभी लेगा स्वराज्य भान मुझे भी, 

स्वराज्य के ढालने वाले बता ।।1।।

कमनीय कलेवर से कभी प्रेम की, 

धारा बहेगी अरे कहो तो ।

कभी शान्ति का शासन पा जनता, 

सुखी नग्न रहेगी अरे कहो तो ।

अथवा कितने दिन और दबी हुई, 

कष्ट सहेगी अरे कहो तो । 

यदि एक नहीं सुनता फिर दूसरे, 

से भी कहेगी अरे कभी तो ।।2।।

 - (स्वराज, नवम्बर, 1956)

       मौलिक जी के इन छन्दों में तत्कालीन आवश्यकताओं की मौलिकता है। देश को आजादी एक तरफअपनी दसवीं वर्ष में प्रवेश कर चुकी थी दूसरी तरफ भुखमरी, शोषण, महंगाई, अशिक्षा असुरक्षा आदि पराधीनता का स्मरण करा रहे थे। कविगण समस्या-पूर्तियों में अपने विचारों को छन्दों  के माध्यम से प्रस्तुत करने के होड़ मे लगे हुये थे। मौलिक जी के सशक्त छन्द पत्र-पत्रिकाओं में छप करके उनके कवि रूप को निखार रहे थे । मौलिक जी छन्दों को पत्रिकाएं धड़ल्ले से छाप देती थी। मौलिक जी ऐसा स्पष्टवादी कवि बस्ती के रंगमंच पर देखते ही देखते छा गया । इन्हें अपने साहित्य संरचना के समय अच्छी ख्याति मिलने लगी किन्तु माँ भारती के लाडले इसके छन्दों को इस धरती ने अपने अंक में समेटते हुये रंचमात्र भी संकोच नहीं किया। उनका एक छंद यहां प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने पुग पर करारा व्यंग किया है- 

अभिशापों से थे भयभीत परन्तु, हमें वरदानों ने लूट लिया।

किया पापों से मुक्ति के हेतु जिन्हें, उन्हें "मौलिक” दानों ने लूट लिया ।

रजनी भर प्राची की ओर थी दृष्टि, वे स्वर्ण बिहानों ने लूट किया। 

बचा जो था अरे उन वचकों से, घर के भगवानो नै लूट लिया ।।

- ( उपहार पृष्ठ 34)

    मौलिक जी केन्द्रों ने भविष्य का बढ़ा सटीक संकेत है। यह छन्द जीवन का अंतिम छंद बनकर रसराज के पन्ने को एक कवि की कहानी देकर अमर हो गया। इस छन्द में कवि का अन्तस्वर बोल उठा है, इसी के साथ जुड़ा हुआ है इसका जीवन दर्शन भी।।

क्षण-क्षण क्षीर्णआयु होती चली जा रही है, 

भूल मत समझो जवानी रह जायेगी।

काल का कुचक्र चक्र चलता रहेगा सदा,

राजा रह जायेगा ना रानी रह जायेगी ।

धन- धाम  वैभव समृ‌द्धि वृद्धि नश्वर है, 

मौलिक मनोहर ये बानी रह जायेगी ।

अच्छे बुरे कर्म अनुसार ही जगत बीचः 

कहने को कैवल कहानी रह जायेगी। 

- (रसराज" पूर्तिपटल, मई, 1957)

    मौलिक जी ब्रजभाषा, खड़ी बोली और भोजपुरी के अच्छे कवि थे।समस्या-पूर्ति के ये बड़े जादूगर थे। सनेही जी ने इनके छन्दों  की प्रशंसा किया था। घनाक्षरी और सवैया इनके प्रधान छन्द थे। "उपहार" तथा “पूर्वाचला” के अनुसार "अमूल्या" और "स्वर्गीय संगीत" इनकी अनूठी कृतिया थीं जो अनुपलब्ध है।

      प्रस्तोता डा. राधे श्याम द्विवेदी 

मलौली का चतुर्वेदी सप्तक (बस्ती के छन्दकार 27 ) मूल लेखक:आचार्य डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' ; संपादन:आचार्य डा.राधेश्याम द्विवेदी

बस्ती के कवियों का पारिवारिक घराना
पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के महान शिक्षाविद राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित स्मृतिशेष माननीय डा. मुनिलाल उपाध्याय ' सरस' कृत : "बस्ती के छन्दकार" शोध ग्रन्थ के आधार पर यह विश्लेषण तैयार किया गया है। उनके शोध प्रबंध के तीनों भोगों के अनुसार बस्ती मंडल ( बस्ती , सिद्धार्थ नगर और सन्त कबीर नगर जिलो) के कवि परम्पराओं में निम्न लिखित कवियों का पारिवारिक घराना प्रमुख रहा हैं-
1. महुली-महसों का ब्रह्मभट्ट कविकुल घराना।
2. मलौली का चतुर्वेदी कवि सप्तक घराना।
3.लाल त्रिलोकी ,रुद्रनाथ और श्री कंठ का धेनुगवा का कविकुल घराना।
4. पाल और दीन द्विजेंदु का हरिहरपुर का कविकुल घराना।
5 बढ़नी मिश्र के पंचानन और दीन पिता पुत्र का कविकुल घराना।
6.भास्कर और राम कृपाल पांडे का घपोखर का कविकुल घराना।
7. पण्डित बल राम मिश्र 'द्विजेश' और उनके पुत्र श्री प्रेम शंकर मिश्र मिसरैलिया बस्ती का घराना।
8. पंडित भगवती प्रसाद मिश्र नंदन व उनके पुत्र पं० उमाकान्त मिश्र क्रंदन  ग्राम पटखौली खलीलाबाद का घराना ।
       मलौली संत कबीर नगर का 
   चतुर्वेदी सप्तक कवि कुल घराना 
मलौली गाँव उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर के घनघटा तालुका में स्थित है । यह धनघटा से 2 किमी तथा संत कबीर नगर जिला मुख्यालय से 28 किमी दूर स्थित है। हैसर धनघटा नगर पंचायत में गांव सभा मलौली शामिल हुआ है । इसे वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । इस गांव ने सर्वाधिक सात कवियों को जन्म दिया है। 
     प्रस्तुत है मलौली सप्तक के ये सात सरस्वती पुत्रों का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय - 
  1.राम गरीब चतुर्वेदी 'गंगाजन’
           प्रथम कुल पुरुष
       पंडित राम गरीब चतुर्वेदी 'गंगाजन’ श्रावण कृष्ण 11 संवत् 1822 विक्रमी को संत कबीर नगर के घनघटा तालुका के मलौली गाँव में पैदा हुए थे। हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत में गांव सभा मलौली शामिल हुआ है । इसे वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है। यहां हॉस्पिटल और कईअन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठान भी बने हुए हैं। यहां पर नगर पंचायत का कार्यालय भी बन रहा है।      
      पंडित राम गरीब चतुर्वेदी इस वंश के उत्तरवर्ती ज्ञात छः कवियों के मूल पुरुष रहे। इनके पिता ईश्वर प्रसाद धनघटा के पास मनौली के मूल निवासी थे,जो महसों राज के अन्दर आता था। ये ज्योतिष, संस्कृत और आयुर्वेद के विद्वान थे। सशक्त छंदकार होने के साथ साथ वे कवियों का बहुत आदर और सम्मान करते थे। पंडित राम गरीब जी 'गंगाजन' उप नाम अपने लिए प्रयुक्त करते थे। उनके छंदों पर रीति कालीन साहित्य का पूरा प्रभाव परिलक्षित होता है। सवैया और मनहरन उनके प्रिय छंद थे। इनके कुछ छंद इनके वंश परम्परा के कवि ' ब्रजेश' जी के संकलन से ज्ञात हुआ है – 
सुन्दर सुचाली ताली रसना रसीली वाली,
द्विजन प्रणाली लाली हेमवान वाली है।
लोचन विशाली मतवाली विरुद वाली,
चेत पर नाली वरदान वाली काली है।
दास अघ घाली खरसाली मुंडमाली,
संघ सोहत वैताली दुखभे की कह ब्याली है।
गंगाजन पाली करूं कृपा मातु हाली,
कार्य साधिए उताली तोहि शपथ कपाली हैं।।
    गंगाजन काली मां के भक्त थे। उन्होंने काली मां की अर्चना में 105 छंदों वाली 'काली शतक' लिखा है जो अप्राप्य है। इनका एक अन्य छंद डा. 'सरस' जी ने अपने शोध ग्रन्थ 'बस्ती के छंदकार' नामक ग्रन्थ के भाग 1 के 11वें पृष्ठ पर इस प्रकार उद्धृत किया है – 
उमड़ी घुमड़ी गरजै बरसै,
गिरि मन्दिर ते झरनाय झरें।
पिक दादुर मोरन सोरन सो,
विरही जन होत न चित्तथिरै।
युत वास कदम्ब के वात चलें,
गंगाजन हिय विच भाव घिरें।
झक केतु के पीरते आली पिया,
बिनु शीश जटा लटकाय फिरें।।
     पंडित राम गरीब रईस परम्परा के कवि थे। उनके समकालीन कवि राम लोचन भट्ट आदि बड़ा आदर पाते थे। इलाहाबाद, वाराणसी और विंध्याचल जाने के अलावा बस्ती जिले के महसों राजा के यहां इनका बड़ा आदर था। भवानी बक्श और बल्दी कवि का 'गंगाजन' के यहां बड़ा आदर होता था। कार्तिक सुदी दशमी संवत 1913 विक्रमी में 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने शरीर का परित्याग किया था। इन्होंने अपने पीछे अब तक ज्ञात छ: कवियों की एक श्रृंखला जोड़ रखी है।

        2. रीति कालीन कवि 
          श्री बलराम चतुर्वेदी 

      रीति कालीन परम्परा के सुकवि बलराम चतुर्वेदी श्रावण शुक्ल 5 संवत् 1922 विक्रमी को संत कबीर नगर के घनघटा तालुका के मलौली गाँव में बलराम चतुर्वेदी के पुत्र के रूप में पैदा हुए थे। हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत में गांव सभा मलौली शामिल हुआ है । इसे वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । यहां मलौली हॉस्पिटल और कई अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठान भी बने हुए हैं। यहां पर नगर पंचायत का कार्यालय बन रहा है। 
        बलराम चतुर्वेदी श्री रामगरीब चतुर्वेदी 'गंगाजन' के गाँव में पैदा हुए थे। ये राम गरीब चतुर्वेदी 'गंगाजन' के प्रपौत्र रहे हैं । इनके पिता का नाम बेनी दयाल चतुर्वेदी था। ये तीन भाई थे - घनश्याम, ईशदत्त और बेनीशंकर इनके छोटे भाई थे। इनके छंदों पर रीति कालीन परम्परा का प्रभाव था। फुटकर छंदों के अतिरिक्त हनुमान शतक इनका बहु चर्चित कृति थी। उन्होंने 111 छंदों में हनुमान जी की स्तुति की है। उनकी भाषा ओजपूर्ण ब्रज भाषा है। छंदों में लालित्य है और काव्य में ओज। सभी छंद भक्ति से परिपूर्ण थे, परन्तु पांडुलिपि गायब हो गई है। कवि बलराम चतुर्वेदी मृत्यु संवत् 1997 विक्रमी को हुई थी। 
      जीवन में कभी-कभी ऐसी परेशानियां आ जाती हैं कि व्यक्ति बिल्कुल निराश हो जाता है। उसे समझ नहीं आता किआखिर किस तरह से अपनी मुसीबतों से छुटकारा पाया जाया। ज्योतिष के मुताबिक घर में हनुमान जी की पंचमुखी तस्वीर लगाने से घर पर किसी तरह की विपत्ति नहीं आती है। हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। उनके स्मरण मात्र से हर तरह की समस्या से मुक्ति मिल जाती है। पंचमुखी हनुमान के पांचों मुख का अलग-अलग महत्व है। इसमें भगवान के सारे मुख अलग-अलग दिशाओं में होते हैं। पूर्व दिशा की ओर हनुमान जी का वानर मुख है जो दुश्मनों पर विजय दिलाता है। पश्चिम दिशा की तरफ भगवान का गरुड़ मुख है जो जीवन की रुकावटों और परेशानियों को खत्म करते हैं। उत्तर दिशा की ओर वराह मुख होता है जो प्रसिद्धि और शक्ति का कारक माना जाता है। दक्षिण दिशा की तरफ हनुमान जी का नृसिंह मुख जो जीवन से डर को दूर करता है।आकाश की दिशा की ओर भगवान का अश्व मुख है जो व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। 
   पंचमुखी हनुमान जी के विग्रह से संबंधित सुकवि बलराम चतुर्वेदी का एक छंद द्रष्टव्य है - 
पूरब बिकट मुख मरकट संहारे शत्रु 
दक्षिण नरसिंह जानें दानव वपुश को।
पश्चिम गरुण मुख सकल निवारै विष
उत्तर बाराह आनें सर्प दर्प सुख को। 
ऊर्ध्व हैग्रीव पर यंत्र मंत्र तन्त्रन को 
करत उच्चांट बलराम दीह दुख को।
बूत करतूत सुनि भागे जगदूत भूत 
बंदों सो सपूत पवन पूत पंच मुख को।।

       3.शृंगार रस के कवि 
     भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी 'दिनेश’
      भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया संवत 1930 विक्रमी में 
हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत के गांव सभा मलौली में हुआ है । यह वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी 'दिनेश’ के पिता का नाम कृष्ण सेवक चतुर्वेदी था। भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी 'दिनेश' जी के पिता कृष्ण सेवक चतुर्वेदी के छः पुत्र थे - प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं। राम नारायण उच्च स्तर के छंदकार रह चुके हैं। उनका रंग परिषद में बड़ा सम्मान था। भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी श्री नारायण चतुर्वेदी और राम नारायण चतुर्वेदी के भाई थे।
        भास्कर प्रसाद शृंगार रस के कवि 
साहित्य के अनुसार नौ रसों में से एक रस जो सबसे अधिक प्रसिद्ध है और प्रधान माना जाता है । जब पति-पत्नी या प्रेमी- प्रेमिका के मन में रति नाम का स्थायी भाव जागृत होकर आस्वादन के योग्य हो जाता है, तो इसे शृंगार रस कहते हैं. शृंगार रस को रसराज भी कहा जाता है. यह नौ रसों में से एक है।
जाको थायी भाव रस,
सो शृंगार सुहोत।
मिलि विभाव अनुभाव पुनि 
संचारिन के गोत। 
   इसमें नायक - नायिका के परस्पर मिलन के कारण होने वाले सुख की परिपुष्टता दिखलाई जाती है । इसका स्थायी भाव रति है । आलंबन विभाव नायक और नायिका हैं । उद्दीपन विभाव सखा, सखी, वन, बाग आदि, विहार, चंद्र- चंदन, भ्रमर, झंकार, हाव भाव, मुसक्यान तथा विनोद आदि हैं । यही एक रस है जिसमें संचारी विभाव, अनुभाव सब भेदों सहित होता है; और इसी कारण इसे रसराज कहते हैं । इसके देवता विष्णु अथवा कृष्ण माने गए हैं और इसका वर्ण श्याम कहा गया है । यह दो प्रकार का होता है- एक संयोग और दूसरा वियोग या विप्रलंभ । नायक नायिका के मिलने को संयोग और उनके विछोह को वियोग कहते हैं ।
   शृंगार रस की प्रधानता मुख्यतःरीतिकाल में है। हिंदी साहित्य में कविवर बिहारीलाल जी शृंगार रस के प्रसिद्ध कवि थे। शृंगार रस के लोकप्रिय कवि बिहारी लाल का नाम हिन्दी साहित्य के रीति काल के कवियों में महत्त्वपूर्ण है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में अधिकांशतः शृंगार रस का प्रयोग किया है । इनके बारे में कहा जाता है कि इन्होंने अपनी कृतियों में गागर में सागर भर दिया है। उनकी लिखी हुई शृंगार रस कविता इस प्रकार है - 
तुम बिन हम का हो सजनी,
तुम बिन हम का हो सजनी।
परुष समान पुरुष में तुमने,
भर दी अपनी कोमलता।
बेतरतीब पड़े जीवन में,
लाई तुम सुगढ सँरचना।
छोड्के निज घर बार सजाया, 
दूर नया सन्सार हो सजनी।
तुम बिन हम का हो सजनी।
तुम बिन हम का हो सजनी।।
     बिहारी का शृंगार रस से परिपूर्ण एक और दोहा दृष्टव्य है -
"बतरस लालच लाल की मुरलीधरीलुकाय।
सौंह करै भौंहनु हँसे , दैन कहै , नटि जाय।"
"कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत , लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सों बात।"
"पतरा ही तिथी पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौई रहे, आनन-ओप उजास।"
"अंग अंग नग जगमगत दीपसिखा सी देह।
दिया बुझाय ह्वै रहौ, बड़ो उजेरो गेह।"
" तंत्रीनाद, कवित्त-रस, सरस राग, रति-रंग।
अनबूड़े बूड़े , तिरे जे बूड़े सब अंग।”
        मलौली धनघटा सन्त कबीर नगर निवासी भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी शृंगार रस के बड़े कवि थे। 52 छंदों की शृंगार बावनी इनकी रचना बताई जाती है। यह ब्रज भाषा में लिखा गया है। सभी मनहरन और घनाक्षरी छंद में लिखे गए हैं। एक छंद (डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत 'बस्ती के छंदकार' भाग 1, पृष्ठ 13 के अनुसार ) द्रष्टव्य है - 
 प्यारी सुकुमारी की बड़ाई मै कहां लौ करौ, रति तन कोटिन निकाई परयो हलके।
सुन्दर गुलाब कंज मंजुल सुपांखुरिन 
धोए पद कंजन में जात परे झलके।
कंच कुच भार को सम्हारि न सकत अंग,चौंकि चौंकि उठति सुरोज कंज दलके।
ऐसी सुकुमारता दिनेश जी कहां लौ कहूं, गड़िजात पांव में बिछौना मखमल के।।
     इस छंद में अतिशयोक्ति बिहारी जी की नायिकाओं से भी बढ़कर है। दिनेश जी रईस परम्परा के कवि थे जहां रीतिशास्त्र के भरमीआचार्यों का सम्पर्क बड़ी सुगमता से उपलब्ध हो जाता रहा। यही कारण रहा है कि इनके अधिकांशतः छंद शृंगार की वल्लरी में भौतिक शृंगार की अभिव्यंजना तक सीमित रह सके।
      शृंगार बावनी की तरह शिवा बावनी भूषण द्वारा रचित बावन (52) छन्दों का काव्य है जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम आदि का ओजपूर्ण वर्णन है। रतन बावनी (लगभग 1581) केशव दास की सबसे पहली रचना रही है। इसी से मिलता जुलता शृंगार मंजरी को केशव दास ने लिखा था। श्री नागरी देव जी ने श्रृंगार रस का पद इस प्रकार लिखा है - 
विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी।
हरषि गुलाल उडाइ लाडिली, सम्पति कुसमाकर की।
कसुंभी सारी सोधें भीनी, ऊपर बंदन भुरकी।
चोली नील ललित अञ्चल चल, झलक उजागर उरकी।
मृदुल सुहास तरल दृग कुंडल, मुख अलकावलि रुरकी।
श्रीनागरीदासि केलि सुख सनि रही, मैंन ललक नहिं मुरकी।।

   4.एक और पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी

    श्रीनारायण चतुर्वेदी का नाम सुनते ही उत्तर-प्रदेश के इटावा जनपद में जन्मे महान कवि, पत्रकार, भाषा-विज्ञानी तथा लेेखक का स्वरूप आंखों के सामने आ जाता है जिनके पिता श्री द्वारिका प्रसाद शर्मा चतुर्वेदी अपने समय के संस्कृत भाषा के नामी विद्वान थे। उनकी शिक्षाइलाहाबाद विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से हुई थी। जो स्वतंत्रता से पूर्व उन्होंने सन् 1926 से 1930 तक जिनेवा में भारतीय शैक्षिक समिति के प्रमुख तथा कई वर्षो तक उत्तर प्रदेश सरकार के शैक्षिक विभाग के भी प्रमुख रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत उन्होंने आल इंन्डिया रेडियो के उप महानिदेशक (भाषा) के रूप में तैनात रहकर हिंदी भाषा विज्ञान के विकास के संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हुये सेवानिवृत हुये थे।
      मलौली के श्रीनारायण चतुर्वेदी
    इटावा वाले चतुर्वेदी के अलावा एक और पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी उत्तर प्रदेश के सन्तकबीर नगर के मलौली गाँव में प्रसिद्ध साहित्यिक कुल में भी हुआ था जिसमें अभीतक ज्ञात सात उच्चकोटि के छंदकार अवतरित हुए हैं।इस पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी का जन्म कार्तिक कृष्ण 15,संवत् 1938 विक्रमी को दीपावली के दिन हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत के गांव सभा मलौली में हुआ था । जो अब नवगठित नगर पंचायत हैसर बाजार-धनघटा के वार्ड नंबर 6 में आता है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचो बीच है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । 
    श्रीनारायण चतुर्वेदी के पिता का नाम कृष्ण सेवक चतुर्वेदी था। जिनके छः पुत्र थे - प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं। ये सभी भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी 'दिनेश' के भाई थे। श्री नारायण बचपन में बड़े प्रतिभाशाली थे। अपने छः भाइयों में श्रीनारायण इतने कुशाग्र थे कि कोई भी भाई इनसे तर्क- वितर्क नहीं कर पाता था। संस्कृत, फारसी, आयुर्वेद और ज्योतिष पर इनका पूर्ण नियंत्रण था। वे महीनों सरयू नदी और गंगा नदी के तट पर कल्पवास किया करते थे। 
      अनेक लहरियों के मध्य सरयू लहरी 
पदमाकर जी के गंगा लहरी की भांति श्री नारायण जी ने 109 छंदों की सरयू लहरी लिखा था जो दुर्भाग्य बस गायब हो गया। इससे पहले महाकवि सूरदास ने साहित्य लहरी नामक 118 पदों की एक लघु रचना लिखी है। पंडित जगन्नाथ मिश्र द्वारा संस्कृत में रचित गंगा लहरी में 52 श्लोक हैं। इसमें उन्होंने गंगा के विविध गुणों का वर्णन करते हुए उनसे अपने उद्धार के लिए अनुनय किया गया है। इसी प्रकार त्रिलोकी नाथ पाण्डेय ने प्रेम लहरी, जम्मू के जाने-माने साहित्यकार प्रियतम चंद्र शास्त्री की शृंगार लहरी रचना है। बद्री नारायण प्रेमधन की लालित्य लहरी आदि लहरी रचनाएँ रही हैं। मूलतः लहरियों में धारा प्रवाह या भाव प्रभाव रचनाओं की अभिव्यंजना मिलती है। इसी तरह भारतेंदु हरिश्चंद्र' ने भी “सरयूपार की यात्रा” नामक एक यात्रा वृतांत लिखा है है। जिसका रचनाकाल 1871 ईस्वी के आसपास माना जाता है।
     रीतिकालीन शृंगार का प्रस्फुटन श्री नारायण चतुर्वेदी रीति शास्त्र के ज्ञाता थे। उन्होंने देव बिहारी और चिन्तामणि के छंदों को कंठस्थ कर लिया था। लोग घण्टों उनके पास बैठ कर श्रृंगार परक रचना का रसास्वादन किया करते थे। उन्हें भाषा ब्रज, छंद मनहरन और सवैया प्रिय था। उनका श्रृंगार रस का एक छंद (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत 'बस्ती के छंदकार' भाग 1, पृष्ठ 13 - 14 के अनुसार ) द्रष्टव्य है - 
कंज अरुणाई दृग देखत लजाई खंग 
समता न पायी चपलायी में दृगन की।
वानी सरसायी दीन धुनिको लजायी 
पिक,
समता न पायी वास किन्हीं लाजवन की।
जंघ चिकनाई रम्भा खम्भ हू न पायी 
नाभि,
भ्रमरी भुलाई मन नीके मुनिजन की।
बुद्धि गुरुवायी श्री नारायण की जाती फंसि 
देखि गुरुवायी बाल उरज सूतन की।।
     एक अन्य छंद भी द्रष्टव्य है - 
बाल छबीली तियान के बीच सो बैठीप्रकाश करै अलगै।
चंद विकास सो हांसी हरौ उपमा कुच कंच कलीन लगै।
दृग की सुधराई कटाछन में श्रीनारायणखंज अली बनगै।
मृदु गोल कपोलन की सुषमा त्रिवली भ्रमरी ते मनोज जगै।।
     श्रीनारायण कवि का यह छंद शृंगार की अभिव्यक्ति का प्रतीक है। ये मलौली के कवि परम्परा के प्रथम चरण के अंतिम कवि थे।

       5.शृंगार रस के कवि 
    पण्डित राम नारायण चतुर्वेदी 

पंडित राम नारायण चतुर्वेदी का जन्म बैसाख कृष्ण 12, संवत् 1944 विक्रमी को उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर के हैसर बाजार-धनघटा नगर पंचायत के ग्राम सभा मलौली में हुआ था। यह क्षेत्र इस समय वार्ड नंबर 6 में आता है। जो पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर है । इनके पिता पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी जी थे। यह बस्ती मण्डल का एक उच्च कोटि का कवि कुल घराना रहा है। पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी के छः पुत्र थे - प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं।
       पंडित राम नारायण जी का रंग परिषद में भी बड़ा आदर और सम्मान हुआ करता था। घनाक्षरी और सवैया छंदों की दीक्षा उन्हें रंगपाल जी से मिली थी। वे भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी श्री नारायणचतुर्वेदी और राम नारायण चतुर्वेदी के भाई थे। राम नारायण की शिक्षा घर पर ही हुई थी। इनके चार पुत्र बांके बिहारी, ब्रजबिहारी, वृन्दावन बिहारी और शारदा शरण थे। जिनमें ब्रज बिहारी 'ब्रजेश' और शारदा शरण 'मौलिक' अच्छे कवि रहे। 
     पंडित राम नारायण जी अंग्रेजी राज्य में असेसर (फौजदारी मामलों में जज / मजिस्ट्रेट को सलाह देने के लिए चुना गया व्यक्ति) के पद पर कार्य कर रहे थे। एक बार असेसर पद पर कार्य करते हुए उन्होंने ये छंद लिखा था जिस पर जज साहब बहुत खुश हुए थे - 
दण्ड विना अपराधी बचें कोऊ,
दोष बड़ों न मनु स्मृति मानी।
दण्ड विना अपराध लहे कोऊ, 
सो नृप को बड़ा दोष बखानी।
राम नारायण देत हैं राय,
असेसर हवै निर्भीक है बानी।
न्याय निधान सुजान सुने,
वह केस पुलिस की झूठी कहानी।।
ब्रज भाषा और शृंगार रस
कवि राम नारायण जी ब्रज भाषा के शृंगार रस के सिद्धस्थ कवि थे। सुदृढ़ पारिवारिक पृष्ठभूमि और रंगपाल जी का साहश्चर्य से उनमें काव्य कला की प्रतिभा खूब निखरी है। उनका अभीष्ट विषय राधा- कृष्ण के अलौकिक प्रेम को ही अंगीकार किया है। शृंगार की अनुपम छटा उन्मुक्त वातावरण में इस छंद में देखा जा सकता है। एक छंद द्रष्टव्य है - 
कौन तू नवेली अलबेली है अकेली बाल,
फिरौ न सहेली संग है मतंग चलिया।
फूले मुख कंज मंजुता में मुख नैन कंज,
मानो सरकंज द्दव विराजे कंज कलिया।
करकंज कुचकंज कंजही चरण अरु 
वरन सुकन्ज मंजु भूली कुंज अलियां।
तेरे तनु कंज पुंज मंजुल परागन के,
गंध ते निकुजन की महक उठी गालियां।।
घनाक्षरी का नाद-सौष्ठव
सुकवि रामनारायण की एक घनाक्षरी का नादसौष्ठव इस छंद में देखा जा सकता है- 
मंद मुस्काती मदमाती चली जाती कछु,
नूपुर बजाती पग झननि- झननि- झन ।
कर घट उर घट मुख ससीलट मंजु,
पटु का उडावै वायु सनन- सनन- सन।
आये श्याम बोले वाम बावरी तु बाबरी पै,
खोजत तुम्हें हैं हम बनन- बनन- बन।
पटग है झट गिरे घट-खट सीढ़िन पै,
शब्द भयो मंजु अति टनन-टनन- टन।।
वैद्यक शास्त्रज्ञ
सुकवि राम नारायण जी कविता के साथ साथ वैद्यक शास्त्र के भी ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित आवले की रसायन पर एक छंद इस प्रकार देखा जा सकता है - 
एक प्रस्त आमले की गुठली निकल लीजै,
गूदा को सुखाय ताहि चूरन बनाइए।
वार एक बीस लाइ आमला सरस पुनि,
माटी के पात्र ढालि पुट करवाइए।
अन्त में सुखाद फेरि चुरन बनाई तासु,
सम सित घृत मधु असम मिलाइये।
चहत जवानी जो पै बहुरि बुढ़ापा माँहि,
दूध अनुपात सो रसायन को खाइये।।
ज्योतिष के मर्मज्ञ 
सुकवि राम नारायण जी को कविता , वैद्यकशास्त्र के साथ साथ ज्योतिष पर भी पूरा कमांड था। उनके द्वारा रचित एक छंद नमूना स्वरूप देखा जा सकता है- 
कर्क राशि चन्द्र गुरु लग्न में विराजमान,
रूप है अनूप काम कोटि को लजावती।
तुला के शनि सुख के समय बनवास दीन्हैं 
रिपु राहु रावन से रिपुवो नसावाहि।
मकर के भौम नारि विरह कराये भूरि,
बुध शुक्र भाग्य धर्म भाग्य को बढ़ावहीं ।
मेष रवि राज योग रवि के समान तेज,
राम कवि राज जन्म पत्रिका प्रभावहीं।।
ब्रजभाषा की प्रधानता 
इस परम्परागत कवि से तत्कालीन रईसी परम्परा में काव्य प्रेमी रीतिकालीन शृंगार रस की कविता को सुन-सुन कर आनंद लिया करते थे।कवि रामनारायण भोजपुरी क्षेत्र में जन्म लेने के बावजूद भी ब्रजभाषा में ही कविता किया करते थे। उनका रूप- सौंदर्य और नख-सिख वर्णन परंपरागत हुआ करता था। उन्होंने पर्याप्त छंद लिख रखें थे पर वे उसे संजो नहीं सके। कविवर ब्रजेश जी के अनुसार पंडित रामनारायण जी चैत कृष्ण नवमी सम्बत 2011 विक्रमी को अपना पंचभौतिक शरीर को छोड़े थे । 
बस्ती के छंदकार शोध ग्रन्थ के भाग 1 के पृष्ठ 122 से 126 पर स्मृतिशेष डॉक्टर मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने पंडित राम नारायण जी के जीवन वृत्त और कविता कौशल पर विस्तार से चर्चा किया है।
     6. ब्रज बिहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश' 

   ब्रज बिहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश' संवत् 1974 विक्रमी और मृत्यु संवत् 1947 विक्रमी को सन्त कबीर नगर के मलौली गांव में हुआ था। हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत में गांव सभा मलौली शामिल हुआ है । इसे वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । यहां मलौली हॉस्पिटल और कई अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठान भी बने हुए हैं। यहां पर नगर पंचायत का कार्यालय बन रहा है।
     ब्रज बिहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश' मलौली का चतुर्वेदी कविकुल परम्परा के कवि पंडित श्रीराम नारायण चतर्वेदी के पुत्र थे। उन्होंने अपने बारे में खुद लिखा है – 
सम्बत सन् उन्नीस सौ अरु चौहत्तर मान।
ज्येष्ठ त्रयोदस कृष्ण शनि जन्म ब्रजेश सुजान।
चौबे वुल सुपुनीत भू ग्राम मलौली खास।
रामनरायण सुकवि के पूर्व किएअभिनाश।।
     ये बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले थे। ये रंगपाल जी के घर हरिहरपुर बराबर आया जाया करते थे। मैथिलीशरण गुप्त तुलसी बिहारी और देव,कलाधर, द्विजेश बद्री प्रसाद पाल, गया प्रसाद शुक्ल सनेही, जगदम्बा प्रसाद हितैषी तथा रीवा के बृजेश कवि से प्रभावित रहें हैं। जमींदारी टूटने से परेशान होते हुए भी वे साहित्य के लिए समय निकल लेते थे। अंधे होते हुए भी वह लिखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। वे 40 वर्षों तक जिले के छंद परम्परा के विकास में जुड़े रहे।
रचनाएं 
इन्होंने तीन रचनाएं लिखी थीं।
कवित्त मंजूषा 
इसमें 1000 छंद होना कहा जाता है। दोहा, सवैया, मनहरन, कुण्डली, रोला तथा मधुरा आदि में रचनाएं लिखी गई हैं।
प्राकृतिक वर्णन, सरयू वर्णन , केवट प्रसंग, व्यंग्य रमोमा, लंका दहन, बबुआ अष्टक आदि प्रसंगों का मनोहारी निरूपण किया गया है। ब्रजेश सतसई दो भाग में लिखी गई है।
ब्रजेश सतसई भाग- 1
सतसई के प्रथम भाग में श्रृंगार परक, भक्ति परक और नीति परक दोहों की रचना की गई है। श्रृंगार में वियोग परक दोहे मिलते हैं। पौराणिक प्रसंग के दोहे मन को आह्लादित करती हैं।
ब्रजेश सतसई भाग - 2 
ब्रजेश सतसई भाग 2 में नीति , वैराग्य और गंगा जी पर भक्ति परक दोहे आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
राम चरितावली 
इसमें राम चरित मानस की तरह वृहद रूप राम कथा लिखने का प्रयास किया गया है। विविध छंदों में नैनी जेल में बन्द स्वतंत्रता सेनानियों को लक्ष्य करके पण्डित मदन मोहन मालवीय जी के मुख से राम कथा कहलवाई गई है। कालिदास से प्रेरित रघुवंश के इच्छाकु से लेकर राम जी सम्पूर्ण चरित्र को उजागर किया गया है।भारत महिमा से ग्रन्थ का श्री गणेश किया गया है।
श्रृंगार और नीति के कवि
ब्रजेश जी मूलतः श्रृंगार और नीति के कवि थे। ब्रज भाषा के पक्षधर थे। संस्कृत के ज्ञान के शब्दों में लालित्य अपने आप आता गया है। अलंकारों में उत्प्रेक्षा उपमा रूपक संदेह भ्रतिमान अनन्वय तदगुण श्लेष आदि का प्रयोग इनके दोहों में बड़ी उत्कृष्टता के साथ हुआ है। शब्दों की सफाई के साथ भावों का अभिव्यक्ति करण बड़ा ही प्रवाह मय है। शब्दों में विषयबोध के प्रति पर्याप्त शालीनता है।
शोधकर्ता स्मृति शेष डा 'सरस' ने पृष्ठ 170 पर ब्रजेश जी का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है -
ब्रजेश जी का बस्ती मंडल के छंदकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान है।विद्वानों के बीच में ब्रजेश जी अपने पांडित्य के लिए सदैव सम्मादृत रहे हैं।  --- उनकी ब्रजेश मंजूषा और ब्रजेश सतसई हिन्दी कीअनूठी निधि है। यह प्रकशित होते ही मंडल की छंद परम्परा को ये गौरव शाली कृतियां महत्व ही नहीं प्रदान करेगी अपितु इस चरण के साहित्यिक गौरव को बढ़ाने में सक्षम होगी।छंद परम्परा के विकास में ब्रजेश जी के कई पीढ़ी की कवियों ने जो गौरव दिया है उसके स्थाई स्तम्भ के रूप में ब्रजेश जी सदैव सम्मादृत रहेंगे।”

    7.शारदा शरण चतुर्वेदी "मौलिक 

जीवन परिचय:- 
     सुकवि शारदा शरण चतुर्वेदी 'मौलिक' का जन्म फाल्गुन शुक्ल एकादशी सं०1979 वि० में धनघटा के निकट मलौली नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता पंडित राम नारायण चतुर्वेदी रंगयुग के प्रतिष्ठित कवि थे तथा उनके बड़े भाई सुकवि ब्रज बिहारी 'व्रजेश' जनपद के उच्चस्तरीय छंदकार है। जूनियर हाई स्कूल की शिक्षा के बाद मौलिक जी ने नार्मल की परीक्षा पास करने के बाद अपने गाँव मलौली के प्राइमरी पाठशाला के सहायक अध्यापक नियुक्त हुये । कुछ दिनों के बाद जब उन्हें बँटवारे में बकौली की सम्पत्ति मिली तो यह मलौली से बकौली के गांव में रहने लगे और बैंडा बाजार के प्राइमरी स्कूल मे सहायक अध्यापक के पद पर स्थानान्तरित हो गये। मौलिक जी सुकवि रामदेव सिंह "कलाधर” के योग्य शिष्यों में से थे। यह बड़े ही प्रतिभाशाली छन्दकार थे।समस्या- पूर्तिया इनकी जबान पर रहती थीं। हिन्दी के लोकगीत के ये अच्छे गायक थे। पहली जून 1957 को एक भयंकर आंधी आई और मौलिक जी के ऊपर एक पेड़ की डाल गिर पड़ी । उसी दिन से बेहोशी की हालत में ये मरणासन्न हो गये और दिनांक 07-6-1957 ई को वे दिवंगत हो गये।
- (सुकवि कलाधर के प्रदत्त अभिलेखों के आधार पर।)
असामयिक निधन:- 
     मौलिक जी के साहित्य के संदर्भ में मुझे बकौली जाना पड़ा। किन्तु वहां पर मौलिक जी के साहित्य से सम्बन्धित कोई भी सामग्री नहीं मिल सकी। उनका कारण था कि मौलिक जी के निधन के समय उनके दो अबोध बच्चों पर विपत्ति का पहाड़ गिर पड़ा। मौलिक जी के छन्दों की सुरक्षा कौन करता? इनके सारे छन्द जिस मिट्टी निकले थे उसे उसी में विलीन हो गये। पुन: प्रयास करने पर मौलिक जी के कुछ छन्द तत्त्कालीन साहित्य पत्रिका 'रसराज' प्रकाशन स्थल, कानपुर संपादक सुदर्शन जी की पुरानी कापियों के रूप में सुकवि कलाधर जी के सौजन्य से प्राप्त हुए हैं। उन कापियों है कुछ छन्द यहाँ प्रस्तुत हैं- 
घर घर झोपडी पड़ी है मन मारे हुये, 
दीनता से दबी वृत्ति रासै ना छदाम की। 
अति दृष्टि अनावृष्टि आधि-व्याधियों से, 
व्यथित विकल दुहाई रही राम की । 
घर के उजाले को स्नेह के हैं लाले पड़े,
लज्जा लूटी जा रही है बस बिनु दाम की। 
सारे ये सुधार भी बेकार बने जा रहे हैं, 
मौलिक ना पूछो दशा भारतीय ग्राम की। 
- (रसराज" पूर्तिपटल, नवम्बर, 1956)
      ग्राम के ऊपर यह समस्यापूर्ति बढी अनूठी है। इसी ही प्रकार से मौलिक जी के दो और छन्द युगानुरूप देखे जा सकते हैं- 
शान्ति के घेरे मैं पूर्ण ज्वलन्त, 
अशान्ति की दिखती ज्वाला है देख लो ।
होता सुधार विकार किये, 
अब भी गले में पड़ी माला है देख लो।
हा अधिकार में ही प्रतिकार ही,
का खड़ा रूप वो काला है देख लो।
होती समृद्धि की वृद्धि ये" मौलिक", 
वृद्धि का होता दिवाला ये देख लो।।
       पुन: एक और छन्द भी दर्शनीय है - 
जो बलिदान की रक्त की बूंदों से, 
मौलिक पाला गया गणतन्त्र है।
मान्यता से अति दूर वही, 
भ्रमजाल में डाला गया गणतन्त्र है।
रूप ना कोई उड़ा करें जो 
उसी साँचे में ढाला गया गणतन्त्र है।
कुण्ड में डाला गया अभी कूप से, 
जो कि निकाला गया गणतन्त्र है ।।
- ( रसराज, सितम्बर अक्टूबर, 1956-)
      देश के प्रति कवि की आत्माभिव्यक्ति युगानुरूप थी। उसके स्वर में हजारों भारतीय जनजीवन का स्वर था। मौलिक जी ने अपने दो दुर्मिल सवैया छन्द रसराज के सम्पादक के पास भेजा। सम्पादक जी ने इन दोनों छन्दों को बहुत पसन्द किया और इसे "रसराज” के मुख्यपृष्ठ पर प्रकाशित किया है - 
दुख गाथा मेरी सुनि के हंसी खेल में 
नित्य ही टालने वाले बता। 
यह मेरा भी कष्ट हटेगा कभी, 
भ्रमजाल में डालने वाले बता ।
समता कभी आयेगी "मौलिक" केवल, 
पेट के पालने वाले बता । 
कभी लेगा स्वराज्य भान मुझे भी, 
स्वराज्य के ढालने वाले बता ।।1।।
कमनीय कलेवर से कभी प्रेम की, 
धारा बहेगी अरे कहो तो ।
कभी शान्ति का शासन पा जनता, 
सुखी नग्न रहेगी अरे कहो तो ।
अथवा कितने दिन और दबी हुई, 
कष्ट सहेगी अरे कहो तो । 
यदि एक नहीं सुनता फिर दूसरे, 
से भी कहेगी अरे कभी तो ।।2।।
 - (स्वराज, नवम्बर, 1956)
       मौलिक जी के इन छन्दों में तत्कालीन आवश्यकताओं की मौलिकता है। देश को आजादी एक तरफअपनी दसवीं वर्ष में प्रवेश कर चुकी थी दूसरी तरफ भुखमरी, शोषण, महंगाई, अशिक्षा असुरक्षा आदि पराधीनता का स्मरण करा रहे थे। कविगण समस्या-पूर्तियों में अपने विचारों को छन्दों के माध्यम से प्रस्तुत करने के होड़ मे लगे हुये थे। मौलिक जी के सशक्त छन्द पत्र-पत्रिकाओं में छप करके उनके कवि रूप को निखार रहे थे । मौलिक जी छन्दों को पत्रिकाएं धड़ल्ले से छाप देती थी। मौलिक जी ऐसा स्पष्टवादी कवि बस्ती के रंगमंच पर देखते ही देखते छा गया । इन्हें अपने साहित्य संरचना के समय अच्छी ख्याति मिलने लगी किन्तु माँ भारती के लाडले इसके छन्दों को इस धरती ने अपने अंक में समेटते हुये रंचमात्र भी संकोच नहीं किया। उनका एक छंद यहां प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने पुग पर करारा व्यंग किया है- 
अभिशापों से थे भयभीत परन्तु, हमें वरदानों ने लूट लिया 
किया पापों से मुक्ति के हेतु जिन्हें, उन्हें "मौलिक” दानों ने लूट लिया ।
रजनी भर प्राची की ओर थी दृष्टि, वे स्वर्ण बिहानों ने लूट किया। 
बचा जो था अरे उन वचकों से, घर के भगवानो नै लूट लिया ।।
- ( उपहार पृष्ठ 34)
    मौलिक जी केन्द्रों ने भविष्य का बढ़ा सटीक संकेत है। यह छन्द जीवन का अंतिम छंद बनकर रसराज के पन्ने को एक कवि की कहानी देकर अमर हो गया। इस छन्द में कवि का अन्तस्वर बोल उठा है, इसी के साथ जुड़ा हुआ है इसका जीवन दर्शन भी।
क्षण-क्षण क्षीर्णआयु होती चली जा रही है, 
भूल मत समझो जवानी रह जायेगी।
काल का कुचक्र चक्र चलता रहेगा सदा,
राजा रह जायेगा ना रानी रह जायेगी ।
धन- धाम वैभव समृ‌द्धि वृद्धि नश्वर है, 
मौलिक मनोहर ये बानी रह जायेगी ।
अच्छे बुरे कर्म अनुसार ही जगत बीचः 
कहने को कैवल कहानी रह जायेगी। 
- (रसराज" पूर्तिपटल, मई, 1957)
    मौलिक जी ब्रजभाषा, खड़ी बोली और भोजपुरी के अच्छे कवि थे।समस्या-पूर्ति के ये बड़े जादूगर थे। सनेही जी ने इनके छन्दों की प्रशंसा किया था। घनाक्षरी और सवैया इनके प्रधान छन्द थे। "उपहार" तथा “पूर्वाचला” के अनुसार "अमूल्या" और "स्वर्गीय संगीत" इनकी अनूठी कृतिया थीं जो अनुपलब्ध है।
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मूल लेखक   
आचार्य डॉ. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ जी का जन्म 10.04.1942 ई. मेंबस्ती जिले के सीतारामपुर में श्री केदारनाथ उपाध्याय के परिवार में हुआ था।1965 से 2006 तक जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नगर बाजार बस्ती आजीवन प्रधानाचार्य पद के उत्तरदायित्व का निर्वहन भी किये।
उन्हें राष्ट्रपति द्वारा दिनांक 5.9.2002 को वर्ष 2001 का शिक्षक सम्मान भी मिल चुका है। सेवामुक्त होने के बाद अयोध्या के नयेघाट स्थित परिक्रमा मार्ग पर ‘केदार आश्रम’ को अपनाआखिरी पड़ाव बनाया। उन्होंने बाल साहित्य कला विकास संस्थान की स्थापना करके अखिल भारतीय बाल साहित्यकार सम्मेलन करके 50 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के बाल साहित्यकारों को सम्मानित किया है। साथ ही ‘‘बालसेतु’’ नामक त्रयमासिक पत्रिका प्रकाशन भी किया है। 70 वर्षीया डा. सरस की मृत्यु 30 मार्च 2012 को लखनऊ के बलरामपुर जिला चिकित्सालय में हुई थी। 
प्रकाशित पुस्तकें :- गूंज, नौसर्गिकी , विजयश्री, बलिदान, मधुरिमा, बासन्ती, वृतान्त, संकुल, सौरभ, जय भरत, विवेकानन्द, बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 1, 2 और 3,
बाल साहित्य:- नेहा, स्नेहा, जलेबी, बाल प्रयाण, बाल त्रिशूल भाग 1,2 व 3 , विवेकानन्द, बाल बताशा, पुलु-लुलू झॅइयक झम, गाबड़गिल, चरणपादुका, बाल कथाएं, साहित्य परिक्रमा भाग 1 , 2 इत्यादि।
अप्रकाशित काव्य:-
चन्द्रगुप्त महाकाव्य,जय भरत, क्षमा प्रतिशोध,नगर से नागपुर, बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 3 विषपान, छन्द बावनी आदि।
बालसाहित्य :- विवेकानंद, साहित्य परिक्रमा; बाल बताशा विवेकानंद बालखंडकाव्य, नेहा-सनेहा, जलेबी, झँइयक झम, चरण पादुका; आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से दर्जनों प्रसारण। 
       आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

संपादक का परिचय
(संपादक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321, वर्डसैप्प नम्बर।    +91 9412300183)
ब्लॉग पर विचार आमंत्रण 
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Monday, January 13, 2025

बस्ती के छंदकार भाग 3 की पूर्व पीठिका एवं प्रस्तावना (कड़ी-1) लेखक:डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' ; संपादक: आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

शोध निर्देशक द्वारा प्रदत्त प्रमाण पत्र 

मुझे यह प्रमाणित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध शीर्षक "बस्ती जनपद के छन्दकार" शोधकर्ता श्री मुनि लाल उपाध्याय "सरस" के कठिन अध्यवसाय का प्रतिफल है, जो शोधकर्ता द्वारा ही संकलित शोध-सामग्री पर आधारित सर्वथा मौलिक है। मैं इसे मूल्यांकन हेतु परीक्षकों के पास प्रेषित करने की संस्तुति करता हूँ।

डॉ० केशव प्रसाद सिंह, 

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, 

काशी विद्यापीठ, वाराणसी।


संपादकीय टिप्पणी

आलोच्य शोध प्रबंध "बस्ती जनपद के छन्दकार" आज से लगभग 50 साल पहले से शुरू होकर लगभग दस साल के अथक प्रयास और भागम भाग के उपरान्त स्मृति शेष डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने लिखा जो 1984 में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से सफल प्रमाणित (awarded) घोषित हुआ है। 40- 50 साल का समय बहुत बड़ा होता है जिसमें दो - तीन पीढ़ी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे देती हैं। तब से यह जनपद से मण्डल बन गया और बहुत ही भौगोलिक राजनीतिक परिवर्तन और विकास हुआ है। अपने जीवन काल में आदरणीय "सरस" जी ने इस प्रबंध के प्रारंभिक तीन अध्यायों को दो पृथक-पृथक लघु पुस्तकों के रूप में क्रमशः 2006 ई.और 2008 ई. में प्रकाशित कराया था। उनकी इच्छा शेष भाग को तीसरे पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने की रही,जो ईश्वरेच्छा से अब तक पूर्ण ना हो सकी थी। उनका आखिरी समय बहुत झंझावातों का रहा और असमय में दिवंगत हो जाने के कारण उनकी यह इच्छा अधूरी ही रही। उनकी पांडुलिपि बहुत खोजनेपर भी नहीं मिली। संयोग से इसे खोजने में आदरणीय 'सरस' जी के पौत्र इंजीनियर श्री शांतनु ने प्रयास करके शोधगंगा के संग्रह से खोज निकाला, हम इसे प्रकाशित व सार्वजनिक कर उनके अधूरे काम को पूरा करने का एक छोटा प्रयास कर रहे हैं। - आचार्य डा राधे श्याम द्विवेदी ।

स्मृतिशेष डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' 

मूल प्रस्तावना

डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 

    मेरै शोध का विषय बस्ती जनपद के छन्दकार" जनपदीय छन्दकारों के साहित्यिक एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण से संबंधित है। इसके अन्तर्गत मैने जनपद की 250 वर्षों की उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रमुख छन्दकारों की समीक्षा करने का प्रयास किया है। भाषायी दृष्टिकोण से इस जनपद का आधा पश्चिमी भूभाग अवधी और बाधा पूर्वी भूभाग भोजपुरी भाषा बोलता है। किन्तु आलोच्य शोध काल के अधिकांशत छन्दकारों ने ब्रजभाषा को अपनी काव्यभाषा बनाकर रचना किया है। इसका एक मात्र कारण यहा के छंदकारों का रीति साहित्य एवं ब्रजभाषा के कवियों के प्रति अत्यधिक झुकाव है। काव्य-सृजन के दुष्टिकोण से बस्ती जनपद में ब्रज, अवधी, खड़ी बोली एवं भोजपुरी भाषाओं में छंदकारों का विशिष्ट स्थान रहा है। शोध काल के अधिकाश छन्दकारों की रचनाएं साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व पूर्ण रही है। बहुत से कवि राष्ट्रीय स्तर के छंदकार  होते हुए भी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रह गये। कुछ की पाण्डुलिपियाँ एवं डायरियों में उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ स्वान्त: सुखाय तक सीमित होने के कारण प्रचार-प्रसार के अभाव में साहित्यिक और ऐतिहासिक मूल्यांकन से वंचित रह गई हैं। मेरा उ‌द्देश्य उन प्रमुख छन्दकारों को प्रकाश में लाना है, जिनको हिन्दी साहित्य के इतिहास मे समुचित स्थान मिना वाहिए। हिन्दी साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान, सुधी समीक्षक आचार्य पंडित रामचन्द्र शुक्ल इसी जनपद में पैदा हुए थे और इस जनपद के परवर्ती रीति कालीन प्रमुख कवि आचार्य लक्षिराम भट्ट को उन्होंने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में समुचित स्थान प्रदान किया है।

      साहित्यिक सर्वेक्षण से ऐसा देखने को मिला है कि अधिकांश छन्दकारों ने रीति कालीन काव्यधारा के सनिकट होकर रीतिकालीन आचार्यों और उनके लक्षण ग्रन्थों का अध्ययन एवं अनुशीलन बड़ी तत्परता के साथ किया है और उनसे प्रभावित होकर दोहा, मनहरण, घनाक्षरी, सवैया, कुण्डलिया, आदि के साथ-साथ दर्जनो मात्रिक और वर्षिक छन्दों को अपनाकर अपना काव्य-सृजन किया है। छन्द परंपरा का ऐतिहासिक सर्वेक्षण करते हुए इन छन्दकारों के छन्दों को छन्द के निष्कर्ष पर कसते हुए उन्हें संग्रहीत करने का प्रयास भी किया गया है। इस प्रसंग में मैने संस्कृत के छन्दशास्त्र से संबंधित ग्रन्ध "वृत्त रत्नाकर, रचयिता भट्ट केदार एवं हिन्दी के "छन्द प्रभाकर" रचयिता जगन्नाथ प्रसाद भानु आदि को सन्दर्भित ग्रन्थ मानकर छन्दकारों के छन्दों को समीक्षा की है। छन्दो को उदाहरण स्वरूप इस हेतु प्रस्तुत किया गया है कि छन्दों के महोदधि में इन छन्दकारों की रसज्ञता  का योगदान प्रकट हो सके ।

      प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध छ अध्यायों में विभक्त है। शोध के प्रथम चार अध्यायों में मैंने इस जनपद के छंदकारों को चार चरणों ( चार कालावधि) में उनकी रचनाओं, प्रवृत्तियों, उपलब्धियों एवं छन्दकारिता के कार्यावधियो की दृष्टि से विभाजित किया है। पाँचवा अध्याय छन्द और  छन्दकारों के छन्दो से संबंधित है। छठें अध्याय में उपसंहार प्रस्तुत किया गया है। इन अध्यायों का सामान्य अध्ययन अधोलिखित रूप से किया जा सकता है।

          विषय वस्तु:- 

1.प्रथम अध्याय-आदिचरण अथवा प्रथम चरण अथवा पीताम्बर लक्षीराम चरण

2. द्वितीय अध्याय - मध्य चरण अथवा द्वितीय चरण अथवा रंगपाल चरण।

3. मध्यौत्तर चरण अथवा तृतीय  चरण अथवा कलाधर-पाल-ब्रजेश चरण ।

4.आधुनिक चरण अथवा चतुर्थ चरण ।

5. छंद विधान और छन्दकार ।

6. उपसंहार ।

1.आदि चरण अथवा पीताम्बर-लछिराम चरण :- 

प्रथम अध्याय का नामांकन आदि चरण अथवा पीताम्बर-लछिराम चरण नाम से किया गया है। इसमें सर्वश्री पीताम्बर भट्ट, भवानी बक्स, बलदेव उर्फ बलदी, हनुमन्त कवि, रामगरीब चतुर्वेदी "गगाजन", भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी "दिनेश", श्रीनारायण चतुर्वेदी, रामलोचन भट्ट, विश्वेश्वर वत्स पाल, महाराज शीतला बक्स  सिंह "महेश", लाल त्रिलोकी नाथ भुवनेश, पण्डित गौरीनाथ शर्मा, आचार्य लछिराम भट्ट सहित कुल 14 छंदकारों का ऐतिहासिक परिचय उनकी कृतियों की समीक्षा के साथ प्रस्तुत किया गया है।

2.मध्य चरण अथवा रंगपाल चरण:- 

द्वितीय अध्याय को मध्य वरण अथवा रंगपाल चरण के नाम से प्रस्तुत किया गया है। क्योंकि इस चरण के प्रतिष्ठित कवि बाबू रंगपाल जी" वीरेश" थे। इस अध्याय में सर्वश्री बाबू रंगनारायण पाल 'वीरेश’, पंडित वलराम मिश्र "द्विजेश, पंडित बुद्धि सागर मिश्र "पंचानन", पं० रामचरित्र पाण्डेय "पावन" "लुञ्चेश" "गंवार”, पंडित रामनारायण चतुर्वेदी, लाल रुद्रनाथ सिंह "पन्नगेश", पंडित भगौतीप्रसाद मिश्र "नन्दन”, पंडित रामभरोसे पाण्डेय "सूर्य", पंडित रामाज्ञा द्विवेदी "समीर" पंडित जनार्दन नाथ त्रिपाठी "गोपाल", आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सहित 11 छंदकारों का उनके कृतित्व का समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। आचार्य शुक्ल जी को हिन्दी साहित्य के स्मृति- स्वरूप यहाँ रखा गया है।

3.मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल- ब्रजेश चरण:

तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। इस अध्याय ने सर्वश्री भास्कर प्रसाद "भास", राजाराम शर्मा "अंचल", बद्री प्रसाद मिश्र "हरीश, रानी सौभाग्य सुन्दरी "सुन्दरअली", लालश्रीकण्ठ सिंह "ब्रजदेव ", बाबू श्री बद्रीप्रसाद "पाल", श्रीरामदेव सिंह "कलाधर ", श्री अब्बास अली "वास", पण्डित मातादीन त्रिवाठी "दीन", श्रीगणेशदत्त पाण्डेय "विशिख", श्री सरस्वती प्रसाद शर्मा "वारिज, पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन", प० राम नारायण पाण्डेय "पागल,श्री केदारनाथ मिश्र "दीन”, पंडित रामचरित्र उपाध्याय, ,पंडित व्रज विहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश', श्री रामलाल श्रीवास्तव 'लाल', पण्डित अद्या प्रसाद पाण्डेय 'द्विजेंद्र' , श्री राम कृपाल पाण्डेय ,श्री राम आश्रय सिंह 'रसिकेन्दु' सहित बीस कवियों पर ऐतिहासिक  परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। साथ ही साथ इसी अध्याय में इसी चरण के छन्दकार सर्व श्री बुध यदुनाथ जी, आचार्य धनराज शास्त्री, महात्मा गुंगदास, पण्डित चिन्तामणि त्रिपाठी, पं० सीताराम शुक्ल, सत अखंडानंद जी, सत्यदेव ब्रह्मचारी "सत्य" ,पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र "अग्र", सन्त फागूदास, रामयज्ञ त्रिपाठी "कंचन", चन्द्र शेखर भारती, राम लखन मिश्र "रामायणी", कमला पति त्रिपाठी "जोकरेश", सुकवि रतिनाथ जी, मातादीन लाल "मुख्तार" , श्रीनरदेव पाण्डेय "साहित्यरत्न", सुकवि चन्द्रवली त्रिपाठी, बासदेव लाल "मुख्तार" सहित 18 छन्दकार जिनके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं उपलब्ध हो सकी है, का सामान्य परिचय उनकी कृतियों के माध्यम से तथा "उपहार" और "पूर्वांचला" के प्रकाशित सूत्रों से प्रस्तुत किया गया है।इन छन्दकारों के बारे में जनपद के वयोवृद्ध छन्दकारों ने भी अपना बहुमूल्य सहयोग देने का प्रयास किया है।

      4.आधुनिक चतुर्थ चरण 

चतुर्थ अध्याय को आधुनिक चरण अथवा चतुर्थ चरण के नाम से सदर्भित किया गया है। इस अध्याय में सर्वश्री राम लखन मिश्र "मुदुल", शारदा शरण चतुर्वेदी "मौलिक" रामनरेश पाण्डेय "पद्‌मेश", घनश्याम  प्रजापति "दंगल", चिन्ताहरण  पाण्डेय "फूल", प्रेमशंकर मिश्र, जनार्दन नाथ पाण्डेय "ईश, पं० राम सुमिरन पाण्डेय "सुमन", पण्डित कंदर्प नारायण शुक्ल "कंदर्प", ठाकुर भूरी सिंह "बालसोम" गौतम,  पण्डित ब्रजभूषण उपाध्याय "ब्रजचंद , प० राममूर्ति मिश्र "सुधाकर", कृष्ण विहारी लाल "राही", मुनि लाल उपाध्याय "सरस", राम कृष्ण लाल "जगमग", राम लखन मौर्य "मयूर", आदि 16 छन्दकारों का परिचय उनके उपलब्ध साहित्य के अनुसार समालोचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कुछ ऐसे छन्दकार जिनके बारे में पर्याप्त सामग्री के अभाव के कारण विस्तृत परिचय नहीं दिया जा सका है, उनका सामान्य परिचय दिया गया है। इस कोटि के छन्दकारों में सर्व श्री  धर्मेन्द्रनाथ त्रिपाठी, पं० सुरेश धर "भ्रमर", प० हरिशंकर मिश्र, पण्डित हरिनाथ उपाध्याय "अटल", पण्डित रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी, पण्डित लम्बोदर पाण्डेय "अरुण", सुकवि जगई भइया, पं० परमानन्द आनन्द, चन्द्रशेखर पाण्डेय, रामरक्षा भारती "विकल", पण्डित सरस्वती प्रसाद शुक्ल  "चंचल", रामनरेश सिंह "मंजुल", पण्डित रामदास पाण्डेय गम्भीर", पं० केशरीधर द्विवेदी, पं० उमाकान्त मिश्र "क्रंदन", श्याम लाल यादव , ठाकुर जगदंबिका सिंह उर्फ "लल्लू बाबू",रामेश्वर वर्मा ,माहेश्वर तिवारी "शलभ", डा श्याम तिवारी, स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना , माधव सिंह गौतम, डा. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन", भद्र सेन सिंह "भ्रांत", गोपाल जी शुक्ल , कृष्ण दत्त तिवारी "प्रेम", गीतकार श्री शिव पूजन राय , श्री सतीश श्रीवास्तव , श्री विद्याधर द्विवेदी , श्री राम शरण जायसवाल , श्री चन्द पटवा , श्री नरेंद्र कुमार पाण्डेय , डा. सत्य देव द्विवेदी "सत्य",श्री रामदेव मिश्र "पिंगल", डा.सत्य प्रकाश उपाध्याय शास्त्री ' सत्य‘,इंजीनियर श्री अतुल द्विवेदी और श्री कैलाश नाथ ओझा आदि का परिचय संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जा सका है।

               पंचम अध्याय

छन्द, छन्द विधान एवं छन्दकार

पांचवे अध्याय के अन्तर्गत छन्द की परिभाषा, स्वरूप, परिचय, प्रयोजन गण, गणों के नाम, मात्रिक तथा वर्णिक छन्दो के भेद आदि पर प्रकाश डालते हुए आलोच्य शोध से संदर्भित छन्दकारों के छन्दो को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इस अध्याय में आचार्य परम्परा के छन्दकारो छन्द उदाहरण स्वरूप अधिक लिये गये हैं। पुन. इस अध्याय में 30 मात्रिक तथ 32 वर्णिक छन्द जिनका प्रयोग जनपदीय छन्दकारों ने अपने काव्य मे किया है, की परिभाषा देते हुए उसके उदाहरण छन्दकारों के छन्दों से प्रस्तुत किया गया है। अन्त में लगभग 60 लयात्मक छन्द जिनका प्रयोग बाबू रंग नारायण पाल "वीरेश", सुकवि बद्रीपाल जी तथा बाबू रामाश्रय सिंह "रसिकेन्दु" ने अपने लोक साहित्य में साहित्यिक पुट के साथ किया है, का भी परिचय छन्द के नाम के साथ उदाहरण देते हुए प्रस्तुत किया गया है।

     षष्ठ अध्याय : उपसंहार

शोध-प्रबंध का षष्ठ अध्याय उपसंहार का है जिसमे मैंने अपने शोध की प्रमुख विशेषताजों का समाहार प्रस्तुत किया है।जनपद की विस्तृत छन्द परंपरा को देखकर उसे शोध रूप देने हेतु मेरी जिज्ञासा ने मुझे उत्सुक किया कि मैं अपने जनपदीय छन्दकारों पर ऐतिहासिक शोध प्रस्तुत करूँ। अभी तक जनपदीय छन्दकारों पर कोई भी उच्च स्तरीय ऐतिहासिक एवं साहित्यिक शोध नहीं प्रस्तुत किया जा सका है। जिन छन्दकारों के विस्तृत परिचय को ऐतिहासिक और समीक्षात्मक रूप दिया गया है, वह मेरे मौलिक प्रयास द्वारा सम्पन्न हुआ है। यद्यपि मेरी स्थापनाएँ भी इस शोध के अन्तर्गत सबंधित छन्दकारों पर प्रस्तुत की गई हैं, निर्विवाद नहीं है, किन्तु इसमें मेरा अपना मौलिक प्रयास है। अब तक जनपदीय छन्दकारों पर ऐतिहासिक और साहित्यिक समालोचनात्मक परिचय विस्तृत ढंग से मेरे अतिरिक्त किसी और ने नहीं प्रस्तुत किया है। मेरा यह प्रयास प्रथम है, ऐसा मेरा विश्वास है।

       बस्ती जनपद के छन्द-साहित्य की विखरी पड़ी सामग्री के संयोजन मे एवं छन्दकारों के जीवन और कृतित्व पर प्रकाश डालने मे जिन विद्वानों और साहित्य प्रेमियो ने मुझे सहयोग दिया है, उनका मैंने यथास्थान तो उल्लेख किया ही है परन्तु उनके प्रति अपनी कृतज्ञता भी अर्पित करता हूँ।

       शोध-प्रबंध की सामग्री हेतु अपने जनपद के कोने-कोने में ही नहीं, अपि आवश्यकतानुसार अन्य जनपदो के पुस्तकालयों एवं वयोवृद्ध छन्दकारों से भी सम्पर्क करने पड़े हैं। इन जाने-अनजाने सभी विद्वानों का मै ऋणी हूं।

     शोध-प्रबन्ध की सामग्री हैतु सुकवि रामदेव सिंह "कलाधर" धनघटा, बाबु भद्रसेन पाल हरिहरपुर, पं० बद्री प्रसाद पाण्डेय वैभरिया, पं० मातादीन त्रिपाठी "दीन", भगवानदास गुप्त, सुकवि द्विजेन्दु हरिहरपुर,  कृष्ण बिहारी लाल "राही", पण्डित रामनारायण पाण्डेय "पागल", सुकवि रामकृष्ण लाल "जगमग" बस्ती, श्री रामलाल श्रीवास्तव "लाल" महसो, प्रेनशंकर मिश्र बस्ती मिश्रौलिया अब्बास अली "बास" एवं उमाकान्त मिश्र "क्रंदन" खलीलाबाद , बाबा राम कुमार दास, मणिपर्वत अयोध्या, ब्रजबिहारी चतुर्वेदी "ब्रजेश" बकौली , श्री अमर सिह धनघटा, पंडित स्वामीनाथ त्रिपाठी, श्री सुरेन्द्र बहादुर सिह दुबौलिया बाजार, पं० उमा शंकर पाण्डेय - बांसी आदि साहित्यकारों ने सदैव सहयोग प्रदान किया है। इनका भी मैं कृतज्ञ हूँ।

     सबंधित शोध हेतु डॉ० राम जवाहिर द्विवेदी-टांडा, डॉ० रामफेर त्रिपाठी, डॉ० परमात्मा नाथ द्विवेदी, डॉ० रामदल पाण्डेय, डॉ० मधुर नारायण मिश्र, डॉ० रामनारायण पाण्डेय, डॉ० श्याम तिवारी आदि हिन्दी के वर्चस्वी विछानो ने सदैव प्रौत्साहन दिया है। इनका भी मै कृतज्ञ  हूँ।

    इस शोध-प्रबन्ध को सुलेख देने में श्री राम लखन मौर्य "मयूर" शास्त्री, श्री राधेश्याम द्विवेदी "नवीन" साहित्याचार्य सहोदर श्री बशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय, श्री धनश्याम द्विवेदी "साहित्यरत्न" मेरे सुपुत्र डॉ० सत्यप्रकाश शास्त्री एवं ज्ञानप्रकाश शास्त्री तथा सुपुत्री श्रीमती कमला शास्त्री आदि ने सदैव बहुमूल्य समय दिया है। इनका में सस्नेहिल हृदय से कृतज्ञ हूं।

      प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के निर्देशक डॉ० केशव प्रसाद सिह, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, काशी विद्यापीठ, वाराणसी, का मै आजीवन ऋणी रहूँगा जिन्होंनेअपने कुशल निर्देशन में इसे पूर्ण कराया। उनका स्नेह एवं औदार्य कभी विस्मृत नहीं होगा।

      श्री जगत नारायण पाण्डेय तथा श्री हर प्रसाद मिश्र की सेवाओं को भी कभी नहीं भूलूगा जिन्होंने अपना बहुमूल्य समय देकर टंकण कार्य सम्पन्न किया।

     जनपदीय छन्दकारों पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करते हुए मैं अपने जनपद के छन्दकारों के साथ-सा अन्य सुधीविद्वानो का कृतज्ञ रहूँगा जो इस शोध सामग्री का समादर करेंगे और छन्दकारों की स्मृतियों में प्रस्तुत इस शोध- दस्तावेज को हिन्दी की सफल कृति समझेगे।

            डा.मुनि लाल उपाध्याय "सरस"

15 अगस्त, 1984


Saturday, January 4, 2025

बस्ती की हस्ती:प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल कासमग्र मूल्यांकन#आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

कला जगत के अप्रतिम हस्ताक्षर :- 
समकालीन महत्त्वपूर्ण चित्रकार, कला- समीक्षक और लेखक प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल का समय (1925 - 2016) रहा। वे चित्रकला की काशी शैली और समीक्षावाद से संबद्ध रहे । कला जगत में उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई क्योंकि वे प्रसिद्धि पाने की होड़ में नहीं थे बल्कि नया सृजन करने और नये कला सिद्धांत गढ़ने के लिए वह सरल ढंग से कला की राह में चल रहे थे। आधुनिक सामाजिक जन आंदोलनों के दौरान कला और साहित्य में भी बदलाव आया जिस की वजह से कला साहित्य में भी विश्व आंदोलनों से जुड़ने की कोशिश होती रही। विभिन्न विचारधाराओं का असर कला पर भी पड़ा। भारत में भी शिक्षित कलाकारों की एक पीढ़ी आई जिनका उद्देश्य ही था कि कला-कौशल, तकनीक के साथ चिंतन और लेखन पर उनकी पकड़ हो। इन कलाकारों ने समय समय पर अपनी लेखनी से कलाकृतियों और दर्शकों के बीच दूरी को कम किया है। कला छात्रों में भी कला के प्रति वैचारिक समझ पैदा करने की कोशिश की है। ये देश के कला गुरु भी थे।
भारतीय कला जगत में अनगिनत ऐसे कला गुरुओं को बिसार दिया गया तथा उन्हें ज्यादा तवज्जो भी नहीं दी गई क्योंकि वे प्रसिद्धि पाने की होड़ में नहीं थे बल्कि नया सृजन करने को और नये कला सिद्धांत गढ़ने की सरल ढंग से कला की राह में चल रहे थे।इन्हीं में से एक चित्रकार प्रोफेसर रामचंद्र शुक्ल जी भी थे। वे स्नेहिल सरल स्वभाव वाले थे और छात्रों की मदद हेतु हमेशा तैयार रहते थे।
जन्म भूमि:- 
हिंदी साहित्य के आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय में चित्रकला के विभागाध्यक्ष रह चुके कला गुरु रामचंद्र शुक्ल मूल रूप से बस्ती उत्तर प्रदेश के ही थे। चित्रकार प्रोफेसर रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1 मार्च 1925 को शुक्ल पुरवा गांव, हरैया,जिला बस्‍ती, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह जनपद के दुबौलिया विकास खंड के शुक्लपुरा गांव के मूल निवासी थे। 
शिक्षा तथा कार्यक्षेत्र :- 
बहुमुखी प्रतिभा के धनी शुक्ल ने 1943 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. किया। उनके प्रथम कला गुरु क्षितिन्द्र नाथ मजूमदार थे। वे देश के पहले चित्रकार थे, जिन्हें फ्रांस सरकार ने सम्मानित किया। प्रोफेसर शुक्ल ने कला के साथ फिल्मों का निर्देशन भी किया। इलाहाबाद विश्व विद्यालय के पूर्व कुलपति अमरनाथ झा के प्रयास से उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वॉश तकनीक से चित्रकारी को बढ़ावा दिया। बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में दृश्य कला विभाग में 1948 से 1985 तक सेवारत रहे। जहां पर वे विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। बी.एच.यू. से सेवानिवृत्त होने के बाद चित्रकार रामचंद्र शुक्ल इलाहाबाद में ही रहने लगे थे। उन्होंने छात्रों को कला की बेहतर शिक्षा प्रदान की। जाने माने चित्रकार व कला समीक्षक प्रो. रामचंद्र शुक्ल का 3 सितंबर 2016 को 92 वर्ष की अवस्था में इलाहाबाद के बैराना स्थित आवास में निधन हो गया। 
व्यक्तित्व :- 
ललित कला अकादमी के सदस्य रहे प्रो. शुक्ल का अपने गांव से काफी लगाव था। जब तक शरीर में चलने फिरने की ताकत रही वह अक्सर अपने गांव आया करते थे। गांव के लोगों ने बताया कि वह जब भी आते थे किसी न किसी की कच्ची दीवार पर चित्रकारी किया करते थे। गांव के लोग उनकी सज्जनता और सरलता की आज भी चर्चा करते हैं। प्रो. शुक्ल की पांच पुत्र व दो पुत्रियां हैं। जो इलाहाबाद सहित देश के अन्य शहरों में रहते हैं। परिजनों ने रविवार को इलाहाबाद के दारागंज घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया था।
कार्य क्षेत्र:- 
काशी हिंदू विश्व विद्यालय वाराणसी में दृश्य कला विभाग में 1948 से 1985 सेवारत रहे। जहां से विभागाध्यक्ष पद सेसेवानिवृत्त हुए। उनको उत्तर प्रदेश सरकार ने कला भूषण से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्होंने अन्य कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त किए तथा कई किताबें भी लिखीं। रामचंद्र शुक्ल एक उत्कृष्ट चित्रकार, कला समीक्षक के साथ ही कुशल कला आचार्य भी थे। उन्होंने कई कला शैलियों को अपनाया जो यूरोपीय चित्र कला शैली पर भी आधारित थीं। उन्होंने समीक्षावाद करके एक चित्रकला शैली भी चलाई। उस कला शैली की हिंदी भाषी कला जगत के एकाध महत्वपूर्ण लोगों ने हंसी भी उड़ाई। जिन लोगों ने रामचंद्र शुक्ल की हंसी उड़ाई थी वे अभी उन्हीं रास्ते पर अस्तरीय कला सृजन कर रहे हैं और लोगों की वाहवाही पा रहे हैं जो महत्वपूर्ण कला संस्थानों से प्रशिक्षित होकर निकले कलाकारों को भी बीसों वर्षों तक तूलिका घिसने के बावजूद हासिल नहीं है। शुरूआती दौर में हिंदी भाषा भाषी क्षेत्र के कलाकारों पर जल्दी किसी का ध्यान ही नहीं जाता था। क्योंकि उस समय अंग्रेजी भाषा का बोलबाला था। हिंदी भाषी कलाकार अपनी बात हिंदी में ही रख सकते थे और पिछड़े माने जाते थे। ऐसे में प्रोफेसर रामचंद्र शुक्ल जैसे चित्रकारों ने कला पर उत्कृष्ट लेखन किया और अपनी बात गवंई, कस्बाई क्षेत्रों से आए कला छात्रों तक संप्रेषित किया।
प्रोफ़ेसर शुक्ल की रचनाएँ:- 
राम चंद्र शुक्ल ने कला पर कई पुस्तकें भी लिखीं। आधुनिक कला समीक्षावाद, चित्रकला का रसास्वादन, कला दर्शन, कला प्रसंग, रेखावली, कला और आधुनिक प्रवृतियां, आधुनिक भारतीय शिक्षण पद्धति आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। 
कला लेखन की पुस्तक : "आधुनिक कला की मनोवृत्ति" रचनाकार : प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल :- 
वर्तमान समय में कला लेखन और कला पुस्तकों के प्रकाशन संबंधी एक प्रश्न के जवाब में शुक्ल जी ने कहा, "आज जो प्रकाशक हैं उनको वह चीज चाहिए जो‌ हाॅट केक की तरह बिकती है या कोर्स में पढ़ाई जाती हो। चित्रकला की कोई पुस्तक हाई स्कूल और इंटर के कोर्स में नहीं पढ़ाई जाती है। इसीलिए कला पर जो पुस्तकें निकलतीं हैं बड़ी मुश्किल से निकलती हैं, उनके लिए प्रकाशक नहीं मिलते हैं। वे कहते हैं इसमें पैसा भी लगता है चित्र भी पड़ते हैं। उसे बेचना भी मुश्किल है। इसीलिए हिंदी में बहुत कम ही पुस्तकें बिकती हैं।”
रामचंद्र शुक्ल मूल रूप से खुद को चित्रकार ही मानते थे। उन्होंने निरंतर चित्र सृजन किया है। विभिन्न माध्यमों में उन्होंने चित्र बनाए। प्रारंभ में शुक्ल जी ने जलरंग वाश चित्रण किया। इसके बाद के उनके चित्र, लोक चित्रकला विशेष कर बनारस की लोक चित्रण शैली और भारत की लघु चित्रण शैली से प्रभावित हैं। अपने इस दौर की चित्रकला में चित्रकला शैली को काशी शैली नाम दिया था। एक समय में उनके द्वारा चित्रकला में चलाया गया आंदोलन, समीक्षावाद देश में चर्चा का विषय बना। दरअसल शुक्ल जी के समीक्षावाद चित्र आंदोलन का उद्देश्य था तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को चित्रों में प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक ढंग से दर्शाना इसके लिए रामचंद्र शुक्ल ने आम लोगों के समझ में आने वाले व्यंग्य पूर्ण चित्र बनाएं।
प्रोफेसर रामचंद्र शुक्ल के कुछ शिष्यों ने समीक्षावाद के तहत चित्र अंकित किए। अच्छे उद्देश्य से शुरु किया गया यह कला आंदोलन ज्यादा समय नहीं चला। लोगों का ख़याल है कि “कला में आनंद पाना सार्वजनिक नहीं है और इसमें आनंद उसी को मिल सकता है जो स्वयं कलाकार है या जिसने थोड़ा-बहुत कला का अध्ययन किया है। कला में प्रवीणता या उसमें रस पाना एक ईश्वरीय वरदान है। यह कथन और भी सत्य प्रतीत होता है जब हम देखते हैं कि आधुनिक समाज में कला को कोई स्थान नहीं। कलाकार जीवन भर रचना का कार्य करता है पर अक्सर वह समाज में अपना स्थान नहीं बना पाता, न समाज उसके परिश्रम का मूल्य ही देता है। कला की साधना कलाकार के लिए जीवन से लड़ना है। कितने ही कलाकार अपने लहू से रचना करके मिट गए पर समाज उन्हें जानता तक नहीं, उनकी कला का रस लेना तो दूर रहा। ऐसा समाज यह भी कहता है कि कला एक साधना है जिसके लिए मर मिटना कलाकार का कर्तव्य है। बिना बलिदान के कला प्राप्त नहीं हो सकती। इतना ही नहीं, लोगों का विश्वास है कि कलाकार उच्च रचना तभी कर सकता है जब दुनिया भर का दुख वह भोग ले और तड़पन की ज्वाला में भुजता हुआ जब उसके मुँह से आह निकलने लगे, तभी वह सफल रचना कर सकता है। शायद ऐसा समाज इस आह में सबसे अधिक रस पाता है। रोम का शासक विख्यात नीरो सबसे महान व्यक्ति था और उसे कला की सबसे ऊँची परख थी, इसीलिए वह मनुष्यों को ख़ूँख़ार भूखे शेरों के कटघरों में डालकर उन व्यक्तियों के मुँह से निकले हुए ‘आह!’ का रसास्वादन सुनहले तख़्त पर बैठकर शराब की चुस्कियाँ लेता हुआ करता था, और तारीफ़ यह कि वह उसका आनंद लेने के लिए अपने समाज के अन्य व्यक्तियों को भी निमंत्रित करता था और हज़ारों की तादाद में लोग इकट्ठा होकर इस ‘आह!’ का रसास्वादन करते थे। यह सत्य है कि भावों के उद्वेग में ही कला की उत्पत्ति होती है, परंतु भाव से कलाकार पैदा नहीं होते, कलाकार भाव पैदा करते हैं। एक भूखे से पूछिए कला कहाँ है तो कहेगा रोटी में, एक अंधे से पूछिए, तो कहेगा अँधेरे में, राजा कहेगा महलों में और रंक कहेगा झोपड़ी में, राजनीतिज्ञ कहेगा राजनीति में, धार्मिक कहेगा धर्म में। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति की जैसी दशा होगी उसी रूप में वह अपने वातावरण को समझेगा; जिस प्रकार लाल चश्मा लगा लेने पर सारी दुनिया लाल दीखती है। यह चश्मा कला का गला घोटता है, सत्य पर पर्दा डाल देता है। सच्चा कलाकार वही है जो इस चश्मे को उतार फेंकता है और पैनी आँखों से सत्य की ओर देखता है। कलाकार भाव का ग़ुलाम नहीं होता, भाव कलाकार का ग़ुलाम होता है। इसी प्रकार वह रचना जो चश्मे के आधार पर हुई है, वह कभी सफल तथा सत्य या सुंदर नहीं कही जा सकती है। सच्ची कला की रचना तब होती है जब कलाकार कमल की भाँति कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से ऊपर होता है और ऊपर रहकर भी अपनी जड़ उसी कीचड़ में रखता है और उससे भी अपनी ख़ुराक लेता है। अर्थात् सच्चा कलाकार वह है जो नीचे रहकर भी ऊपर को जान लेता है और ऊपर होकर भी नीचे को पहिचानता है, वह समदर्शी होता है। वह भावों का ग़ुलाम नहीं होता, भावों को वह पैदा करता है।
जब कथाकार ने प्रेम करना छोड़ दिया हो तब प्रेम-संबंधी कथा साहित्य का निर्माण सबसे अच्छा होता है। जिस समय कथाकार स्वयं प्रेम में अंधा रहता है, उस समय यदि वह प्रेम पर कुछ लिखे तो वह प्रेम की सच्ची अनुभूति का वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि उस समय वह प्रेम में अंधा भी हो सकता है। जब कथाकार प्रेम कर चुकता है, उससे काफ़ी अनुभव प्राप्त कर चुकता है, और स्वयं हृदय तथा मस्तिष्क से किए हुए अनुभव पर पुनः मनन करता है, तब उसे सच्ची अनुभूति प्राप्त होती है और उसकी रचना स्वस्थ तथा सुंदर होती है, क्योंकि अब प्रेम का ग़ुलाम कथाकार नहीं है बल्कि कथाकार का ग़ुलाम प्रेम है। कथाकार प्रेम में अंधा होकर नहीं लिख रहा बल्कि प्रेम से ऊपर होकर प्रेम पर शुद्ध रूप से विचार कर रहा है। इसी प्रकार क्षणिक भावावेश में आकर बिना भली-भाँति मनन किए उत्कृष्ट रचना नहीं हो सकती और अगर ऐसे समय रचना होती है तो वह सुदृढ़ नहीं हो सकती। इस प्रकार यह समझना कि सच्ची कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार भूखा हो, दरिद्र हो और दुनिया की मुसीबतों से जर्जरित हो गया हो, नितांत मूर्खता है। ऐसी भावना उन्हीं लोगों की होती है जो कलाकार से उसी प्रकार की ‘आह!’ सुनने को उत्सुक होते है जिसे नीरो मनुष्य को शेर के कटघरे में डाल कर सुनता था।
सच्ची और उत्कृष्ट कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार के मन, मस्तिष्क में और शरीर में सुडौलता रहती है। यदि एक कलाकार जिसको हज़ार कोशिश करने पर भी दोनों समय का खाना नहीं जुटता, कविता की रचना करना चाहे तो उसके मन में सुडौलता कभी नहीं रह सकती, या तो वह भूख तड़पन से पीड़ित रचना करेगा और समाज के अन्य व्यक्तियों के प्रति आग उगलेगा या जिस प्रकार भूखा कुत्ता किसी को कुछ खाते देखकर जीभ हिलाता है और लार टपकाता रहता है, दया का पात्र बनेगा, दूसरों को कुछ देना तो दूर रहा।
सच्ची कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार सुखी और संपन्न हो, हृष्ट-पुष्ट हो, सुडौल विचार वाला हो, समाज से घृणा न करता हो, किसी के प्रति द्वेष न हो, जीवन का मूल्य समझता हो। इसका यह तात्पर्य नहीं कि आज तक जितने उत्कृष्ट कलाकार हुए है उनको यह सब प्राप्त था, मेरा तो यह कहना है कि अगर उनको यह सब भी प्राप्त होता तो और भी ऊँची कला का निर्माण हुआ होता और आज उनकी देन से हमारा समाज और ऊँची तथा सुडौल परिस्थिति में होता। कलाकार एक घड़े के समान है। जैसा जिसका घड़ा होता है, संसार से वह उतना ही उसमें भर पाता है। अगर घड़ा टेढ़ा-मेढ़ा है, फूटा हुआ है, तो उसमें क्या रह सकेगा, यह साफ़ है। सुडौल, मज़बूत तथा बड़ा घड़ा ही अपने अंदर कोई बडी वस्तु रखने की कल्पना कर सकता है।
इस प्रकार उत्कृष्ट रचना के लिए यह आवश्यक है कि कलाकार हर प्रकार से सुडौल हो, विशाल व्यक्तित्व वाला हो। उसे किसी प्रकार की लालसा न हो, अर्थात् बनारसी भाषा में ‘मस्त’ रहने वाला हो। इसी मस्ती में ही कुछ रचना की उम्मीद की जा सकती है। कलाकार चिंता से रहित हो। एक योगी के समान हो जिसे कुछ पाने की लालसा न हो अपितु समाज को कुछ देने की क्षमता हो। वह अपने लिए चिंतित न हो बल्कि समाज की शुभ कामना करता हो। समाज का व्यक्ति होते हुए भी समाज के दायरे से ऊपर उठकर समाज का निरीक्षण कर सकने की क्षमता रखता हो। अपने को अकेला न समझे बल्कि घट-घट में व्याप्त होने की क्षमता रखता हो। अपनीभावनाओं में बहने वाला न हो बल्कि दूसरों के भावों में प्रवेश करने की क्षमता हो। अपना दर्द लिए समाज को दर्दीला न बनावे बल्कि समाज के दर्द में रोने वाला हो। अपनी ख़ुशी में मस्त न हो बल्कि समाज की ख़ुशी में हिस्सा लेने वाला हो।समाज के साधारण व्यक्ति के समान मुसीबतों में रोने वाला न हो बल्कि समाज का पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता रखता हो।
संसार में जीव जो कुछ करता है, सुख पाने की लालसा से करता है। सुख की वृद्धि के लिए ही समाज भी बनता है। जब व्यक्ति अकेले सुख प्राप्त करने में बाधाएँ देखता है तब उसे समाज की शरण लेनी पड़ती है। समाज से उसे बल मिलता है। समाज की शक्ति उसे अधिक सुख की प्राप्ति करने में सहायक होती है। मनुष्य बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक समाज पर आश्रित रहता है। वह जो कुछ सीखता है, अनुभव करता है या प्राप्त करता है उसका आधार समाज ही होता है। व्यक्ति समाज का एक अंग है जो समाज के द्वारा पोषित होता है। व्यक्ति का जो स्वरूप बनता है वह उसका अपना रूप नहीं है और अगर है तो बहुत थोड़ा-सा, अधिकतर समाज का ही दिया हुआ हिस्सा होता है। समाज यदि जननी है तो व्यक्ति उसका बालक। जिस प्रकार बालक माता-पिता के गुणों को संचित कर आगे बढ़ता है, उसी प्रकार व्यक्ति समाज के गुणों को संचित करता है। मेंढ़क का बच्चा मेंढ़कों-सा ही व्यवहार सीखता है और मेंढ़कों के ही समाज में रहना चाहता है। वह उनसे कभी अलग हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार व्यक्ति सब कुछ समाज से ही सीखता है और उसी का व्यवहार करता है, अपने जीवन में। उसके किसी व्यवहार को हम असामाजिक व्यवहार नहीं कह सकते, क्योंकि वह समाज का ही बनाया हुआ है, और उसके उचित या अनुचित कार्यों का उत्तरदायित्व भी उसी समाज पर है, जिसका वह एक अंग है।
जब व्यक्ति समाज का ही बनाया हुआ है, समाज पर ही आश्रित रहता है, तब यह कहा जा सकता है कि उसे अपनी सारी शक्ति का उपयोग समाज के हित तथा प्रगति के लिए ही करना चाहिए। यही उचित है और न्याय-संगत है। जब हम किसी से लेते हैं, तो उतना ही उसे देना भी चाहिए। अगर यह ठीक है तो व्यक्ति समाज को उतना ही दे सकता है जितना पाया है। कलुषित समाज में पैदा हुआ तथा पला-पोसा व्यक्ति समाज को कालिमा ही देगा, यह स्वाभाविक है। मेंढ़क मेंढ़कों से पैदा होकर तथा तालाब के वातावरण में रहकर वही कार्य कर सकेगा जो अन्य मेंढ़क करते है और जो तालाब के वातावरण में हो सकता है; मेंढ़क न घड़ियाल बन सकता है, न तालाब का स्वच्छ कमल। उसका आचरण सदैव मेंढ़को का ही होगा। परंतु मेंढ़क और मनुष्य में अंतर माना गया है। अंतर है मस्तिष्क का। मस्तिष्क की शक्ति अपार है, कल्पना से भी अधिक। मनुष्य का मस्तिष्क भी मनुष्य का ही मस्तिष्क है, उसी दायरे में है, उससे परे नहीं है। मनुष्य वही कर सकता है जो मनुष्य की क्षमता के अंदर है, जिस प्रकार मेंढ़क तालाब में रहकर वही कर सकता है जो मेंढ़कों की क्षमता के भीतर है। अब प्रश्न यह है कि मनुष्य की क्षमता क्या है और कितनी है? कभी-कभी तो मनुष्य की क्षमता को भी अपार माना गया है। यह क्षमता क्या है और कहाँ से आती है, समझ में नहीं आता। जो भी हो, साधारण दृष्टि से मनुष्य की क्षमता वही हो सकती है जो मनुष्य की क्षमता है, मनुष्य अपनी शक्ति का उपयोग भी समाज में ही करता है; समाज से जो लिया है उसे समाज को ही देना है।
इस विचार से कला, कला के लिए है—यह न्याय-संगत नहीं मालूम पड़ता। कला मनुष्य का कार्य है, एक शक्ति है। मेंढ़कों का कूदना, फुदकना, टर्र-टर्र करना भी एक प्रकार की कला है, और जिस प्रकार उसकी इस कला का उपयोग उसके लिए तथा उसके समाज के अन्य मेंढ़कों के लिए है, उसी प्रकार मनुष्य की कला का उपयोग भी उसके लिए तथा केवल मनुष्य के समाज के लिए ही है। मनुष्य की कला मेंढ़कों के लिए नहीं हो सकती, उसका उपयोग मनुष्य के समाज के लिए ही है। मेंढ़कों ने फुदकना तथा टर्र-टर्र करना मेंढ़कों से ही सीखा है। उसकी इस कला का गुरु उसके माता-पिता तथा उसका मेंढ़कों का समाज ही है। इसी प्रकार मनुष्य भी कलाओं को अपने समाज से ही सीखता है, कला का कार्य करने की प्रेरणा भी उसे अपने सामाजिक जीवन की अनुभूतियों से ही प्राप्त होती है। उसकी कला का रूप उसकी अनुभूति ही होती है, फिर ‘कला, कला के लिए है’—यह कैसे कहा जा सकता है? लेकिन 'कला, कला के लिए है’, यह विचार बड़ा प्राचीन है और इसमें विश्वास करने वाले आज भी बहुत हैं। आधुनिक पिकासोवाद, सूक्ष्मवाद, क्यूबिज़म, सर्रियलिज़म इत्यादि सभी को ‘कला, कला के लिए है’ से प्रभावित कहा जा सकता है, क्योंकि इन सभी प्रकार की शैलियो में सामाजिक चित्रण बहुत कम मिलता है और मिलता भी है तो ज़ोर अन्य वस्तुओं पर दिया होता है, ख़ासकर रूप तथा रंग पर। ऐसे चित्रों मे विषय गौण रहता है। इन चित्रों का आनंद साधारण समाज नहीं ले पाता, परंतु कलाकार इसमें बहुत आनंद पाता है। ऐसे कलाकारों से लोग शिकायत करते हैं कि उनके यह चित्र जनता की समझ में नहीं आए। उस पर आधुनिक कलाकार चुप रहता है और इसकी चिंता नहीं करता कि उसके चित्र समाज को पसंद हैं या नहीं। ऐसी स्थिति में ही कला को कला के लिए समझा जाता है। कलाकार समाज का ख़याल करता हुआ नहीं दिखाई पड़ता। ऐसी स्थिति को देखकर ही फ़्रांसीसी विचारक लकांत द लिस्ल (Leconte do lisle) ने कहा है—
''The tendency of the artist to accept the theory of art for art's sake arises when he finds himself in disaccord with the society in which he lives.''
“कलाकार उसी समय इस विचार की ओर झुकता है कि 'कला, कला के लिए है’, जब वह अपने को अपने समाज से भिन्न पाता है, अर्थात् जब समाज कलाकार की कृतियों का मूल्य समझने में असफल होता है और कला का आदर करना छोड़ देता है, तब कलाकार निराश होकर कला का कार्य करना ही नहीं छोड़ देता, बल्कि कला की रचना करता जाता है, और उसका आनंद स्वयं लेता है, उसे समाज से प्रशंसा की आशा नहीं रहती। ऐसे समय जब उससे कोई कुछ पूछता है तो वह यह न कहकर कि वह समाज के लिए कला की रचना करता है, कहता है कि वह अपनी रचना कला के लिए करता है, अर्थात् क्योंकि उसे उसमें मज़ा आता है, इसीलिए करता है। वह ऐसा दूसरों को दिखाने के लिए नहीं करता। ठीक भी है उसका ऐसा कहना, क्योंकि अगर वह कहे कि वह अपनी रचना समाज के लिए करता है, तो लोग कहेंगे कि समाज तो उसकी रचना को समझ ही नहीं पाता, न उसका कोई आनंद ही ले पाता है, तब कैसे वह कहता है कि वह अपनी रचना समाज के लिए करता है? इसीलिए कलाकार यही कहना उचित और हितकर समझता है कि कहे 'कला, कला के लिए है’।
एक बार किसी गाँव का एक धनी व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ पहली बार शहर घूमने आया। बाज़ार में एक दूकान पर बड़ी भीड़ लगी थी और तरह-तरह के स्त्री-पुरुषों की तस्वीरें टँगी थी। दोनों वहीं रुक गए और यह जानने का प्रयत्न करने लगे कि आख़िर माजरा क्या है? एक अन्य देहाती को दूकान से बाहर निकलते हुए देखकर अपनी भाषा में उससे पूछा— का गुरु, काहे का भीड़ लागल बा? बाहर निकलते हुए देहाती ने अपनी तथा अपनी स्त्री का फ़ोटो दिखाकर कहा—गुरु देखअ, कैसन निम्मन बनौलेस हौ। हमारे देहाती की स्त्री इन चित्रों को देखकर अपना फ़ोटो खिंचवाने के लिए मचल पड़ी। दोनों दुकान में गए और फ़ोटो खिंचवाया। फ़ोटो जब हाथ में आई तो सज्जन अपनी स्त्री का चित्र देखकर बड़े प्रसन्न हुए पर जब स्त्री ने अपने पतिदेव का चित्र देखा तो उसे बड़ा अचंभा हुआ। पतिदेव की एक आँख का चित्र में नामोनिशान भी न था। स्त्री ने पति के कान में कुछ कहा। पति ने मारे नाराज़गी के चित्र दुकान पर पटक दिया और कहा—मखौल करत हौवा महराज; वह डंडा संभाल रहा था कि दुकान वाले ने हाथ जोड़ा और दंडवत कर उन्हें किसी तरह विदा किया। समाज के इस देहाती का फ़ोटोग्राफर ने ख़याल नहीं किया, क्योंकि उसने इस देहाती का फ़ोटो खींचा था जिसमें केवल एक ही आँख दिखाई पड़ती है। परंतु उस बेचारे देहाती ने तो यही समझा कि फ़ोटोग्राफर ने उसे काना बना दिया। फ़ोटोग्राफर का चित्र, उसकी मिहनत, उसकी कला सब बेकार हो गई, क्योंकि समाज के देहाती को वह ख़ुश न कर सका।
इसी प्रकार एक बार विश्व-विख्यात डच कलाकार रेम्ब्रा (Rembrandt) को किसी खेलाड़ियों की टोली ने अपना ग्रुप चित्रित कराने के लिए ऑर्डर दिया। कई महीनों बाद चित्र तैयार हुआ परंतु खेलाड़ियों को यह चित्र पसंद न जाया। कारण यह था कि रेम्ब्रा अपने चित्रों में छाया का उपयोग अधिक करता था और प्रकाश को कहीं-कही डालकर चित्र के पात्रों को चमकाता था, जिससे चित्र में एक विलक्षणता आ जाती थी। और ऐसे चित्र में पात्र का रूप बिलकुल साफ़-साफ़ नहीं दिखाई पड़ता, कभी-कभी पात्र अँधेरे में पड़ जाता है। यही हाल हुआ; खेलाड़ियों में से कुछ जो प्रकाश में थे, उनका रूप साफ़-साफ़ था तथा पहिचाना जाता था, पर अँधेरे में पड़े खेलाडियों का रूप धूमिल था और पहिचान में नहीं आता था। ऐसे खेलाडियों ने चित्र को नापसंद कर दिया। रेम्ब्रा कुछ न बोला और चाक़ू से उस बड़े चित्र को टुकड़े-टुकडे कर डाला। पेशगी ली हुई रकम वापस करके, खेलाड़ियों को बाहर कर दरवाज़ा बंद कर लिया। ऐसे समय में रेम्ब्रा अगर कहे कि—'कला, कला के लिए है' तो क्या अनुचित है!
कलाकार, दार्शनिक या वैज्ञानिक समाज के उपयोगी अंग हैं। यह तो आज कोई नहीं कह सकता कि कला, दर्शन या विज्ञान ने समाज को लाभ नहीं पहुँचाया, परंतु आज भी कलाकार, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक का स्थान समाज में निराला होता है। इनका जीवन प्राय अधिक सामाजिक नहीं हो पाता। साधारण लोग इनके गुणों तथा कार्यों से भी परिचित नहीं हो पाते और यही कारण है कि इनका सामाजिक जीवन संकीर्ण हो जाता है। फिर भी समाज इनको एक ऊँचा स्थान देता है, और देना भी चाहिए।
स्रोत पुस्तक : सम्मेलन पत्रिका (पृष्ठ 51) 
अन्य रचना: पुस्तक का नाम : “गोस्वामी तुलसी दास” रचनाकार : प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल।प्रकाशक : इंडियन प्रेस, इलाहाबाद
प्रकाशन वर्ष : 1933, पृष्ठ : 196
सहयोगी : सरदार शहर पब्लिक लाइब्रेरी।
            लेखक संपादक 
     आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 



Wednesday, January 1, 2025

बस्ती के ब्रजबिहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश' (बस्ती के छंदकार 26)#आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


ब्रजबिहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश' संवत् 1974 विक्रमी और मृत्यु संवत् 1947 विक्रमी को उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर के मलौली गांव में हुआ था। जो अब हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत मे वार्ड नंबर 6 में रखा गया है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । ये इस परम्परा के कवि पंडित श्रीरामनारायण चतर्वेदी के पुत्र थे। उन्होंने अपने बारे में खुद लिखा है – 
सम्बत सन् उन्नीस सौ अरु चौहत्तर मान।
ज्येष्ठ त्रयोदस कृष्ण शनि जन्म ब्रजेश सुजान।
चौबे वुल सुपुनीत भू ग्राम मलौली खास।
रामनरायण सुकवि के पूर्व किए अभिनाश।।
ये बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले थे। ये रंगपाल जी के घर हरिहरपुर बराबर आया जाया करते थे। मैथिलीशरण गुप्त तुलसी बिहारी और देव,कलाधर, द्विजेश बद्री प्रसाद पाल, गया प्रसाद शुक्ल सनेही, जगदम्बा प्रसाद हितैषी तथा रीवा के बृजेश कवि से प्रभावित रहें हैं। जमींदारी टूटने से परेशान होते हुए भी वे साहित्य के लिए समय निकल लेते थे। अंधे होते हुए भी वह लिखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। वे 40 वर्षों तक जिले के छंद परम्परा के विकास में जुड़े रहे।
रचनाएं :- 
इन्होंने तीन रचनाएं लिखी थीं।
कवित्त मंजूषा 
इसमें 1000 छंद होना कहा जाता है। दोहा, सवैया, मनहरन, कुण्डली, रोला तथा मधुरा आदि में रचनाएं लिखी गई हैं।
प्राकृतिक वर्णन, सरयू वर्णन,केवट प्रसंग, व्यंग्य रमोमा, लंका दहन, बबुआ अष्टक आदि प्रसंगों का मनोहारी निरूपण किया गया है।
ब्रजेश सतसई दो भाग में ( भाग 1)
सतसई के प्रथम भाग में श्रृंगार परक, भक्ति परक और नीति परक दोहों की रचना की गई है। श्रृंगार में वियोग परक दोहे मिलते हैं। पौराणिक प्रसंग के दोहे मन को आह्लादित करती हैं।
ब्रजेश सतसई भाग 2 
इसमें नीति , वैराग्य और गंगा जी पर भक्ति परक दोहे आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
राम चरितावली :- 
इसमें राम चरित मानस की तरह वृहद रूप राम कथा लिखने का प्रयास किया गया है। विविध छंदों में नैनी जेल में बन्द स्वतंत्रता सेनानियों को लक्ष्य करके पण्डित मदन मोहन मालवीय जी के मुख से राम कथा कहलवाई गई है। कालिदास से प्रेरित रघुवंश के इच्छाकु से लेकर राम जी सम्पूर्ण चरित्र को उजागर किया गया है।भारत महिमा से ग्रन्थ का श्री गणेश किया गया है।
शृंगार और नीति के कवि :- 
ब्रजेश जी मूलतः श्रृंगार और नीति के कवि थे। ब्रज भाषा के पक्षधर थे। संस्कृत के ज्ञान के शब्दों में लालित्य अपने आप आता गया है। अलंकारों में उत्प्रेक्षा उपमा रूपक संदेह भ्रतिमान अनन्वय तदगुण श्लेष आदि का प्रयोग इनके दोहों में बड़ी उत्कृष्टता के साथ हुआ है। शब्दों की सफाई के साथ भावों का अभिव्यक्ति करण बड़ा ही प्रवाहमय है। शब्दों में विषयबोध के प्रति पर्याप्त शालीनता है। बस्ती के छंदकार शोध प्रबंध के शोधकर्ता स्मृतिशेष डा.मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने पृष्ठ 170 पर ब्रजेश जी का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है -
ब्रजेश जी का बस्ती मंडल के छंदकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान है। विद्वानों के बीच में ब्रजेश जी अपने पांडित्य के लिए सदैव सम्मादृत रहे हैं। —-- उनकी ब्रजेश मंजूषा और ब्रजेश सतसई हिन्दी की अनूठी निधि है। यह प्रकशित होते ही मंडल की छंद परम्परा को ये गौरव शाली कृतियां महत्व ही नहीं प्रदान करेगी अपितु इस चरण के साहित्यिक गौरव को बढ़ाने में सक्षम होगी।छंद परम्परा के विकास में ब्रजेश जी के कई पीढ़ी की कवियों ने जो गौरव दिया है उसके स्थाई स्तम्भ के रूप में ब्रजेश जी सदैव सम्मादृत रहेंगे।”

        आचार्य डा राधे श्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321, वर्डसैप्प नम्बर+ 91 9412300183)








Monday, December 30, 2024

शृंगार रस के कवि : पण्डित राम नारायण चतुर्वेदी (बस्ती के छंदकार 25)# आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


पंडित राम नारायण चतुर्वेदी का जन्म बैसाख कृष्ण 12, संवत् 1944 विक्रमी को उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर के हैसर बाजार-धनघटा नगर पंचायत के ग्राम सभा मलौली में हुआ था। यह क्षेत्र इस समय वार्ड नंबर 6 में आता है। जो पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर है । इनके पिता पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी जी थे। यह बस्ती मण्डल का एक उच्च कोटि का कवि कुल घराना रहा है। पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी के छः पुत्र थे - प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं। पंडित राम नारायण जी का रंग परिषद में भी बड़ा आदर और सम्मान हुआ करता था। घनाक्षरी और सवैया छंदों की दीक्षा उन्हें रंगपाल जी से मिली थी। वे भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी श्री नारायण चतुर्वेदी और राम नारायण चतुर्वेदी के भाई थे। राम नारायण की शिक्षा घर पर ही हुई थी। इनके चार पुत्र बांके बिहारी, ब्रज बिहारी, वृन्दावन बिहारी और शारदा शरण थे। जिनमें ब्रज बिहारी ब्रजेश और शारदा शरण मौलिक अच्छे कवि रहे। 
पंडित राम नारायण जी अंग्रेजी राज्य में असेसर (फौजदारी मामलों में जज / मजिस्ट्रेट को सलाह देने के लिए चुना गया व्यक्ति) के पद पर कार्य कर रहे थे। एक बार असेसर पद पर कार्य करते हुए उन्होंने ये छंद लिखा था जिस पर जज साहब बहुत खुश हुए थे - 
दण्ड विना अपराधी बचें कोऊ,
दोष बड़ों न मनु स्मृति मानी।
दण्ड विना अपराध लहे कोऊ, 
सो नृप को बड़ा दोष बखानी।
राम नारायण देत हैं राय,
असेसर हवै निर्भीक है बानी।
न्याय निधान सुजान सुने,
वह केस पुलिस की झूठी कहानी।।
ब्रज भाषा और शृंगार रस
कवि राम नारायण जी ब्रज भाषा के शृंगार रस के सिद्धस्थ कवि थे। सुदृढ़ पारिवारिक पृष्ठभूमि और रंगपाल जी का साहश्चर्य से उनमें काव्य कला की प्रतिभा खूब निखरी है। उनका अभीष्ट विषय राधा- कृष्ण के अलौकिक प्रेम को ही अंगीकार किया है। शृंगार की अनुपम छटा उन्मुक्त वातावरण में इस छंद में देखा जा सकता है। एक छंद द्रष्टव्य है - 
कौन तू नवेली अलबेली है अकेली बाल,
फिरौ न सहेली संग है मतंग चलिया।
फूले मुख कंज मंजुता में मुख नैन कंज,
मानो सरकंज द्दव विराजे कंज कलिया।
करकंज कुचकंज कंजही चरण अरु 
वरन सुकन्ज मंजु भूली कुंज अलियां।
तेरे तनु कंज पुंज मंजुल परागन के,
गंध ते निकुजन की महक उठी गालियां।।
घनाक्षरी का नाद-सौष्ठव
सुकवि राम नारायण की एक घनाक्षरी का नाद सौष्ठव इस छंद में देखा जा सकता है- 
मंद मुस्काती मदमाती चली जाती कछु,
नूपुर बजाती पग झननि- झननि- झन ।
कर घट उर घट मुख ससीलट मंजु,
पटु का उडावै वायु सनन- सनन- सन।
आये श्याम बोले वाम बावरी तु बाबरी पै,
खोजत तुम्हें हैं हम बनन- बनन- बन।
पटग है झट गिरे घट-खट सीढ़िन पै,
शब्द भयो मंजु अति टनन-टनन- टन।।
वैद्यक शास्त्रज्ञ
सुकवि राम नारायण जी कविता के साथ साथ वैद्यक शास्त्र के भी ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित आवले की रसायन पर एक छंद इस प्रकार देखा जा सकता है - 
एक प्रस्त आमले की गुठली निकल लीजै,
गूदा को सुखाय ताहि चूरन बनाइए।
वार एक बीस लाइ आमला सरस पुनि,
माटी के पात्र ढालि पुट करवाइए।
अन्त में सुखाद फेरि चुरन बनाई तासु,
सम सित घृत मधु असम मिलाइये।
चहत जवानी जो पै बहुरि बुढ़ापा माँहि,
दूध अनुपात सो रसायन को खाइये।।
ज्योतिष के मर्मज्ञ 
सुकवि राम नारायण जी को कविता , वैद्यकशास्त्र के साथ साथ ज्योतिष पर भी पूरा कमांड था। उनके द्वारा रचित एक छंद नमूना स्वरूप देखा जा सकता है- 
कर्क राशि चन्द्र गुरु लग्न में विराजमान,
रूप है अनूप काम कोटि को लजावती।
तुला के शनि सुख के समय बनवास दीन्हैं 
रिपु राहु रावन से रिपुवो नसावाहि।
मकर के भौम नारि विरह कराये भूरि,
बुध शुक्र भाग्य धर्म भाग्य को बढ़ावहीं ।
मेष रवि राज योग रवि के समान तेज,
राम कवि राज जन्म पत्रिका प्रभावहीं।।
ब्रजभाषा की प्रधानता 
इस परम्परागत कवि से तत्कालीन रईसी परम्परा में काव्य प्रेमी रीतिकालीन शृंगार रस की कविता को सुन-सुन कर आनंद लिया करते थे। कवि राम नारायण भोजपुरी क्षेत्र में जन्म लेने के बावजूद भी ब्रजभाषा में ही कविता किया करते थे। उनका रूप-सौंदर्य और नख-सिख वर्णन परंपरागत हुआ करता था। उन्होंने पर्याप्त छंद लिख रखें थे पर वे उसे संजो नहीं सके। कविवर ब्रजेश जी के अनुसार पंडित रामनारायण जी चैत कृष्ण नवमी सम्बत 2011 विक्रमी को अपना पंच भौतिक शरीर को छोड़े थे । 
बस्ती के छंदकार शोध ग्रन्थ के भाग 1 के पृष्ठ 122 से 126 पर स्मृतिशेष डॉक्टर मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने पंडित राम नारायण जी के जीवन वृत्त और कविता कौशल पर विस्तार से चर्चा किया है।

लेखक परिचय

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321, वर्डसैप्प नम्बर+ 91 9412300183)



















Wednesday, December 25, 2024

एक और पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी (बस्ती के छंदकार 24)#आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

श्रीनारायण चतुर्वेदी का नाम सुनते ही उत्तर-प्रदेश के इटावा जनपद में जन्मे महान कवि, पत्रकार, भाषा-विज्ञानी तथा लेेखक का स्वरूप आंखों के सामने आ जाता है जिनके पिता श्री द्वारिका प्रसाद शर्मा चतुर्वेदी अपने समय के संस्कृत भाषा के नामी विद्वान थे।उनकी शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से हुई थी। जो स्वतंत्रता से पूर्व उन्होंने सन् 1926 से 1930 तक जिनेवा में भारतीय शैक्षिक समिति के प्रमुख तथा कई वर्षो तक उत्तर प्रदेश सरकार के शैक्षिक विभाग के भी प्रमुख रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत उन्होंने आल इंन्डिया रेडियो के उप महानिदेशक (भाषा) के रूप में तैनात रहकर हिंदी भाषा विज्ञान के विकास के संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हुये सेवानिवृत हुये थे।

बस्ती के पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी 

इटावा के अलावा एक और पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर के मलौली गाँव में प्रसिद्ध साहित्यिक कुल में भी हुआ था जिसमें अभी तक ज्ञात सात उच्च कोटि के छंदकार अवतरित हुए हैं। इस पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी का जन्म कार्तिक कृष्ण 15,संवत् 1938 विक्रमी को दीपावली के दिन हैसर बाजार धनघटा नगर पंचायत के गांव सभा मलौली में हुआ था । जो अब नवगठित नगर पंचायत हैसर बाजार-धनघटा के वार्ड नंबर 6 में आता है। यह पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचो बीच है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर स्थित है । 

छः भाइयों में सबसे कुशाग्र 

    श्रीनारायण चतुर्वेदी के पिता का नाम कृष्ण सेवक चतुर्वेदी था।  जिनके छः पुत्र थे - प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं। ये सभी भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी 'दिनेश' के भाई थे। श्री नारायण बचपन में बड़े प्रतिभाशाली थे। अपने छः भाइयों में श्रीनारायण इतने कुशाग्र थे कि कोई भी भाई इनसे तर्क वितर्क नहीं कर पाता था। संस्कृत, फारसी, आयुर्वेद और ज्योतिष पर इनका पूर्ण नियंत्रण था। वे महीनों सरयू नदी और गंगा नदी के तट पर कल्प वास किया करते थे। 

अनेक लहरियों के मध्य "सरयू लहरी "

पदमाकर जी के गंगा लहरी की भांति श्री नारायण जी ने 109 छंदों की "सरयू लहरी" लिखा था जो दुर्भाग्य बस गायब हो गया। इससे पहले महाकवि सूरदास ने साहित्य लहरी नामक 118 पदों की एक लघु रचना लिखी है। पंडित जगन्नाथ मिश्र द्वारा संस्कृत में रचित गंगा लहरी में 52 श्लोक हैं। इसमें उन्होंने गंगा के विविध गुणों का वर्णन करते हुए उनसे अपने उद्धार के लिए अनुनय किया गया है। इसी प्रकार त्रिलोकी नाथ पाण्डेय ने प्रेम लहरी, जम्मू के जाने-माने साहित्यकार प्रियतम चंद्र शास्त्री की शृंगार लहरी रचना है। बद्री नारायण प्रेमधन की लालित्य लहरी आदि लहरी रचनाएँ रही हैं। मूलतः लहरियों में धारा प्रवाह या भाव प्रभाव रचनाओं की अभिव्यंजना मिलती है। इसी तरह भारतेंदु हरिश्चंद्र' ने भी “सरयूपार की यात्रा” नामक एक यात्रा वृतांत लिखा है है। जिसका रचनाकाल 1871 ईस्वी के आसपास माना जाता है।

रीतिकालीन शृंगार का प्रस्फुटन

श्रीनारायण चतुर्वेदी रीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। उन्होंने देव बिहारी और चिन्तामणि के छंदों को कंठस्थ कर लिया था। लोग घण्टों उनके पास बैठ कर श्रृंगार परक रचना का रसास्वादन किया करते थे। उन्हें भाषा ब्रज, छंद मनहरन और सवैया प्रिय था। उनका श्रृंगार रस का एक छंद (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत 'बस्ती के छंदकार' भाग 1, पृष्ठ 13 - 14 के अनुसार ) द्रष्टव्य है - 

कंज अरुणाई दृग देखत लजाई खंग 

समता न पायी चपलायी में दृगन की।

वानी सरसायी दीन धुनिको लजायी पिक,

समता न पायी वास किन्हीं लाजवन की।

जंघ चिकनाई रम्भा खम्भ हू न पायी नाभि,

भ्रमरी भुलाई मन नीके मुनिजन की।

बुद्धि गुरुवायी श्री नारायण की जाती फंसि,

देखि गुरुवायी बाल उरज सूतन की।।

एक अन्य छंद भी द्रष्टव्य है

बाल छबीली तियान के बीच सो बैठी प्रकाश करै अलगै।

चंद विकास सो हांसी हरौ उपमा कुच कंच कलीन लगै।

दृग की सुधराई कटाछन में श्रीनारायण खंज अली बनगै।

मृदु गोल कपोलन की सुषमा त्रिवली भ्रमरी ते मनोज जगै।

     श्रीनारायण कवि का यह छंद शृंगार की अभिव्यक्ति का प्रतीक है। ये मलौली के कवि परम्परा के प्रथम चरण के अंतिम कवि थे।

      आचार्य डॉक्टर राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास   करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321, वर्डसैप्प नम्बर+ 91 9412300183)