Saturday, March 15, 2025

डा.मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ का रचना संसार : (बस्ती के छन्दकार भाग3 कड़ी 16)


डा.मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ का रचना संसार : (बस्ती के छन्दकार भाग3 कड़ी 16) मूललेखक डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस', सम्पादन अद्यतन व संशोधन :        आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी  

गौतम क्षत्रियों के पुरोहितो का कुल :- शैक्षिक प्रमाणात्र के आधार पर सरस जी का जन्म दिनांक 10-4-1942 ईसवी को (सं०1999 वि०,) को माना जाता है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बस्ती सदर तहसील के बहादुर व्लाक में नगर क्षेत्र में खड़ौवा खुर्द नामक गांव के आस पास इलाके में नगर राज्य में गौतम क्षत्रियों के पुरोहित के रूप में भारद्वाज गोत्रीय इस वंश के पूर्वजों का आगमन के हुआ था । नगर के राजा उदय प्रताप सिंह के सम- कालीन उपाध्याय कुल के पूर्वज लक्ष्मन दत्त एक फौजी अफसर थे। इसी संस्कार युक्त कुल परम्परा में 'सरस' जी के पिता पं. केदार नाथ उपाध्याय का जन्म हुआ था।उनका जन्म स्थान ग्राम सीतारामपुर, पत्रालय नगर बाजार ,जिला बस्ती था। उनकी पढ़ाई 1947 से नगर के प्राइमरी विद्यालय में शुरू हुआ,जिसे पास कर वह नगर के मिडिल स्कूल में दाखिला लिये थे। 1955 में कक्षा 5 पास करके सरस जी ने खैर इन्टर कालेज बस्ती में प्रवेश लिया था। 1956 तक यह एक संयुक्त परिवार की शक्ल में रहा। इसी बीच 12.10.1957 को सरस जी के पिता की असामयिक मृत्यु हो गयी। उस समय सरस जी 16 साल के तथा कक्षा 11 के छात्र थे। वह श्री गोविन्द राम सक्सेरिया इन्टर कालेज में पढते थे। उनके पिता काअसमय निधन हो जाने के कारण उन पर घर परिवार की सारी जिम्मेदारी आ गयी थी। उनकी मां ने बहुत मेहनत और त्याग करके उनकी अधूरी शिक्षा पूरी कराई थी। वह 1958 में सक्सेरिया इन्टर कालेज से इन्टर, 1962 में किसान डिग्री कालेज बस्ती से बी. ए. तथा 1963 में साकेत डिग्री कालेज फैजाबाद से बी.एड्. की परीक्षायें  पास किये थे।

शिक्षा-दीक्षा:- 

अध्यापन के साथ ही साथ सरस जी ने हिन्दी, संस्कृत, मध्यकालीन इतिहास, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विषय से एम. ए. करने के बाद हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग का साहित्यरत्न, तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का साहित्याचार्य उपाधि भी प्राप्त किये थे। 

विद्वान कवि इतिहासकार और शिक्षक 

डा. सरस 01जुलाई 1963 से किसान इन्टर कालेज मरहा,कटया बस्ती में सहायक अध्यापक के रूप में पहली नियुक्ति पाये थे, जहां वह जून 1965 तक अध्यापन किये थे। वे जुलाई 1965 से 2006 तक जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नगर बाजार बस्ती में आजीवन प्रधानाचार्य पद के उत्तरदायित्व का निर्वहन भी किये। वे अच्छे विद्वान कवि तथा शिक्षा जगत के एक महान हस्ती थे। उन्हें राष्ट्रपति द्वारा दिनांक 5.9.2002 को वर्ष 2001 का शिक्षक सम्मान भी प्राप्त किए हैं। 

बानप्रस्थी जीवन 

सेवामुक्त होने के बाद वह अयोध्या के नये घाट बासुदेव घाट मोहल्ले में स्थित परिक्रमा मार्ग पर केदार आश्रम बनवाकर रहने लगे थे । उनका जीवन एकाकी एक बानप्रस्थी जैसा हो गया था और वह निरन्तर भगवत् नाम व चर्चा से जुड़े रहे। 70 वर्षीया डा. सरस की मृत्यु 30 मार्च 2012 को लखनऊ के बलरामपुर जिला चिकित्सालय में हुई थी। उनकी मृत्यु से शिक्षा तथा साहित्य जगत में एक बहुत ही अपूर्णनीय क्षति हुई थी। लक्ष्मी और सरस्वती की अति कृपा होने तथा अपने जीवन की ऊंची से ऊंची बुलन्दियों को छूने के बावजूद आज जनपद में उनके स्मरण में ना तो कोई कार्यक्रम होते हैं और ना ही उनके अपने व जिन को उन्होने उपकृत्य किया है, ही कुछ कर पा रहे है।

पुरस्कार-सम्मान-

बाल कल्याण संस्था कानपुर,नागरी बालसाहित्य संस्थान बलिया से उन्हें सम्मानित होने का गौरव मिला था। वह जून 2006 तक अपने पद पर रहकर लगभग 42 साल तक शिक्षा जगत जे जुड़े रहे। अगौना कलवारी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल स्मारक व्याख्यान माला, कवि सम्मेलन तथा कन्याओं के विद्यालय को खुलवाने में उनकी महती भूमिका रही है। 

यायावरी जीवन और यात्रा वृतांत :-

हिन्दी साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान होने के कारण कविता , नाटक कथा उपन्यास तथा यात्रा वृतान्त डा. सरस जी के प्रिय विषय व अभिरूचि हो गया था। वह एक शिक्षाविद् प्रतिष्ठित कवि एवं उत्कृष्ट साहित्यकार के रूप में जाने जाते थे। काव्य गोष्ठियों में आने जाने के कारण उनमें यायावरी प्रवृति आ गई थी। फलतः वे भारत के कोने से कोने सभी क्षेत्रों का अनेक बार भ्रमण किये हंै। 1975 में नागपुर में होने वाले प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में समलित होकर बस्ती जनपद का प्रतिनिधित्व किया था। इसके उपरान्त उन्होने कामरूप, गोहाटी, शिलांग, चेरापूंजी, जयगांव, गंटोक, कोलकाता , गंगा सागर, जगन्नाथपुरी, जमशेदपुर, गया ,वैद्यनाथ धाम, कोणार्क , नन्दन कानन,नाथद्वारा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, उदयपुर, अजमेर, जोधपुर ,आगरा, दिल्ली, मथुरा, नैनीताल ,मंसूरी ,हरिद्वार, ऋषिकेश, काठमाण्डू, पोखरा , तानसेन, दाड़ग, नेल्लौर, तिरूपति, मदुरै, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, धनुषकोटि, मद्रास, कांचीपुरम, महाबली पुरम, हैदराबाद, सासाराम, मुम्बई , नसिक, औरंगाबाद, एलोरा, देवगिरि, त्रयम्बकेश्वर, खुल्दाबाद, ओंकारेश्वर, भोपाल, झांसी, मथुरा,उज्जैन, चित्रकूट, रेणकूट , हरिद्वार, देहरादून, यमनोत्री, गंगोत्री, केदानाथ, त्रिजुगी नारायण, बद्रीनाथ, देवप्रयाग, जोशीमठ मैहर, पन्ना,खजुराहो, जम्बू, पठान कोट, चण्डीगढ़, अम्बाला, वैष्णवदेवी, शिमला, चम्बा, डलहौजी, कुल्लू, मनाली, टनकपुर कांगड़ा, मैसूर ,द्वारका, पोरबन्दर, सोमनाथ, जूनागढ़, अहमदाबाद, माउन्ट आबू, बडोदरा ,उज्जैन,नरायण सरोवर भुज, बंगलौर, तिरूवन्तपुरम, गोवा, कांगड़ा मैसूर, कालीकट, उदुपी, उड़मंगलम तथा वृन्दावन गार्डन आदि स्थलों को अनेकों बार भ्रमण किया है। जिनका पूरा वृतान्त भी तीन भागों में लिखकर प्रकाशित कराया है।

बाल साहित्य और साहित्यकारो को प्रोत्साहन

उन्होंने बाल साहित्य कला विकास संस्थान की स्थापना करके अखिल भारतीय बाल साहित्यकार सम्मेलन करके 50 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के बाल साहित्यकारों को सम्मानित किया है। साथ ही ‘‘बालसेतु’’ नामक त्रयमासिक पत्रिका प्रकाशन भी किया है।

प्रकाशित पुस्तको की सूची

उनकी लगभग 4 दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इस शोध ग्रन्थ के संकलन के समय उनकी निम्न दस कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। बहुत सारी कृतियां बाद में प्रकाशित हुई हैं। मित्र छन्दकारों की प्रेरणा से अपनी भी बात उन्हें बाध्य होकर कहना पड़ रहा है। कृतियों का परिचय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। समीक्षा साहित्य सुधी स्वयं करेंगे।

1-गूंज 

2 नैसर्गिकी 

3.विजयश्री

4.मधुरिमा

5.बलिदान खण्ड काव्य

6.बासन्ती

7.वृत्तान्त 

8- अंतर्ध्वनि 

9. संकुल 

10. सौरभ

अप्रकाशित पुस्तके

1.जयभरतखण्ड-काव्य

2- चन्द्रगुप्त प्रवन्ध-काव्य

3. क्षमा प्रतिशोध,

4.नगर से नागपुर, 

5.बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 3 

 6.विषपान, 

7.छन्द बावनी आदि।

कुछ प्रमुख रचनाओं का संक्षिप्त परिचय :- 

1. गूंज 

यह प्रथम काव्यसंग्रह फरवरी 1972 में सरस साहित्य कुटीर, नगर बाजार, बस्ती से प्रकाशित हुआ है। इसका मुद्रण राजपूत मुद्रण प्रतिष्ठान, गांधी नगर, बस्ती से हुआ है। इस पुस्तक में कुल 90 पृष्ठ है। जिसमें 82 पृष्ठ कविताएँ हैं। इस काव्य- संग्रह में ग्यारह कविताएँ हैं। भारती स्तवन , नववर्ष, नव ज्योति जगाओ, प्रयाणगीत, वृक्षों के प्रति,मानवता का सस्वार, गणतंत्र दिवस, छत्रपत्ति का विजय प्रयाण, जय बांगला, क्रान्ति की गूंज आदि पर लिखी गई हैं।

2.नैसर्गिकी 

नैसर्गिकी इस पुस्तक का प्रकाशन सरस साहित्य कुटीर, नगर बाजार द्वारा राजपूत मुद्रण प्रतिष्ठान, गांधीनगर, बस्ती के माध्यम से मेरी तौसवीं वर्षगांठ 10-4-1972 को हुआ। इसमे कुत्र 76 पृष्ठों में कविताएँ है। सात वस्तुविषय क्रमशः भारती स्तवन, वसन्त, ग्रीष्म, पावस, शरद, हेमन्त, शिशिर 12 कविताएँ प्रस्तुत की गई है। यह संक्षिप्त में एक ऋतु काव्य है।

3. विजयश्री' 

इसका प्रकाशन 17-10-72 वो हुआ। यह एक लघुनाट्य है। इसके बीच-बीच में कविताएँ भी है।

4.मधुरिमा 

इसका प्रकाशन 26-1-72 को सरस साहित्य कुटीर, नगर बाजार,बस्ती के माध्यम से हुआ। यह गीत और कविताओ का संग्रह है। इसमें कुल 21 शीर्षकों पर कविताएँ  लिखी गई हैं। उसके पूर्वार्द और उत्तरार्द्ध दो भाग हैं।

5. वृत्तान्त 

इस पुस्तक वृत्तान्त का प्रकाशन नववर्ष 1975 के उपलक्ष्य में हुआ। इसमें 54 पुष्ठ में कविताएँ छपी है। कविताओं के शीर्षक क्रमशः वाणी, जप, पुस्तक, धरती, दीपक, आकाश, अग्नि, प्रकृति, वायु, प्रहरी है। इस पुस्तक में रानप्रताप त्रिपाठी, सहायक मंत्री, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की प्रशस्ति भी है।

6. वासंती 

इसका प्रकाशन बसंत पंचमी को सन् 1975 में सरस साहित्य कुटीर, नगर बाजार, बस्ती के गाध्यम से प्रकाश प्रिंटिंग प्रेस, बस्ती से हुआ। इसमे कुष 34 पृष्ठों में कविताएँ हैं जो बसन्त से प्रारंभ होकर बासन्ती तक में तेरह शीर्षकों को जोड़ती है। इस पुस्तक की प्रशस्ति में प्रारंभ में लगभग आठ विद्वानों की शुभ कामनाएं हैं।

7.बलिदान 

बलिदान का प्रकाशन क्रम पाचवा है। यह एक ऐतिहासिक खण्ड काव्य जिसका प्रकाशन सरस साहित्य कुटीर, नगर बाजार, बस्ती से हुआ और मुद्रण जीवन शिक्षा मुद्राणालय गोल घर वाराणसी से हुआ। इसका प्रथम संस्करण 1973 में प्रकाशित हुआ। इसमें कुल सात सर्ग हैं तथा 81पृष्ठ में रचना प्रस्तुत की गई है। इस ऐतिहासिक खण्डकाव्य की सराहना माने जाने विद्वानों ने किया है। खड़ी बोली मैं लिखे गये इस खण्ड काव्य में लगभग 400 से ऊपर छन्द हैं।

8.अंतर्ध्वनि 

आठवी पुस्तक अंतर्ध्वनि का प्रकारान 1977 में  सरस साहित्य कुटीर, नगर वाजार बस्ती के माध्यम से हुआ। इसमें कुल 30 विषयों पर क विताएँ लिखी गई है जो 60 पृष्ठ में हैं।

9.संकुल 

यह सरस साहित्य माला का नवम प्रसून है। इसमे कुल 80 पृष्ठ है। इसका प्रकारान 1979 में विजय दशमी के पर्व पर हुआ। इसमें कुश 29 विषयों पर कविताएँ हैं।

10.सौरभ 

यह सरस साहित्य माला का दशम प्रसून है। इसका प्रकाशन 1981 में हुआ। 26 वर्ण्य विषयों पर कुल 60 पृष्ठ में कविताएं लिखी गई हैं।

अप्रकाशित पुस्तक 

। .जय भरत खण्ड काब्य 

यह खण्ड काव्य छः सगाँ में लिखा गया है। इसकी पाण्डुलिपि प्रकाशनाधीन है। उसने कुल लगभग 100 पुष्ठ हैं। है। यह खण्ड काव्य की पृष्ठभूमि में लिखा गया है।

2 .चन्द्रगुप्त 

यह एक प्रबन्ध काव्य है। इस समय यह लिखा जा रहा था जिसे नौ सगों में पूर्ण किया जायेगा। अभी तक चार सगाँ तक लगभग 500 छन्द हो चुके हैं।

कुछ चयनित छन्द 

ये सम्पूर्ण कृतियां  सुधी समीक्षको की समीक्षा के लिए प्रस्तुत है। उदाहरण के लिए  कुछ छन्द प्रस्तुत हैं - 

सृजन  का अनुराग लेकर

कौन मुखरित प्राण करता ।

और किससे गंध लेकर 

चल रहा सुरभित मलय है।

कौन करता वेणु स्वर

है गुंजरित जिसमें दिशाएँ

और किसको तृप्ति देती

चातकी की वीन लय है।

कौन सायं रजत कर से

विश्व को विश्राम देता ।

और किसके स्वर्ण किरणों से

दमक उठता निलय है।

कौन नीले व्योम पट पर 

तारिका दीपक लजाता ।

और किसके एक जितवन से

हुआ करता प्रलय है।।

पुन: एक सवैया छन्द -

रीझ औ खीझ के बीच सदा 

मन का मनुहार छिपा रहता है।

सूझ औ बूझ के बीच सदा 

उर का मृदु प्यार छिपा रहता है। 

दारुण शीत में ज्योति लिये 

सुख का उपहार छिपा रहता है। 

सांझ के गोद में मोट भरा 

जग की भिनुसार छिपा रहता है।

आत्म कथ्य 

"छन्द परंपरा से मुझे प्रगाढ़ स्नेह है। रंगपाल जी के फाग गीत बचपन से ही मुझे अच्छे लगते थे और उसी समय से मुझे रंगपालजी के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हुई। हिन्दी से एम०ए० करने के बाद जनपद के उच्च स्तरीय छन्दकारों का सान्निध्य मिया। उनकी प्रेरणा से मेरी प्रारंभिक कविताएं गूंज के माध्यम से गूंज उठी। बाद में सहृदयी छन्दकारो से मुझे बड़ी प्रेरणा मिली। गूंज के प्रकाशन के यही कारण रहा कि जब मेरे अन्दर शोध उपाधि प्राप्त करने की  उत्सुकता हुई तो मैंने अपने जनपद के छंदकारों के प्रति अपने शोध का भाव सुमन अर्पित करना उचित समझा । पहले तो मुझे छन्दकारों के सम्पर्क के लिए जनपद (वर्तमान बस्ती मण्डल) का कोना- कोना छानना पड़ा। इस साहित्यिक यात्रा ने दर्जनों साहित्यकार ऐसे मिले जिनके वारे में जनपद का इतिहास पुर्णतया मूक है । यह मेरी प्रथम उपलब्धि है कि मुझे अपने पूर्ववर्ती के छंदकारों के सुयश के गुणगान करने का अवसर मिला । काव्य- सृजन एक साधना है जिसके लिए वर्चस्वी विद्वानों का साहचर्य बड़ी शक्ति देता है। मुझे भी छन्दकारों के चरित्र व्यक्तित्व और कृतित्व को उजागर करने के लिए माननीय डॉ०  केशव प्रसाद सिह, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, काशी विद्यापीठ, वाराणसी, की कृपा मिली। उन्हीं की कृपा से मुझमें जो भी शक्ति आई । उसी के संबल से साहित्य महोदधि में जनपदीय साहित्यकारों के मोतियों को संजो- सँजो करके यह  शोध की साहित्यिक माला तैयार किया। जो  सहृदयों के मनोरम हृदय प्रदेश को प्रसाधित  एवं अलंकृत करेगी, ऐसा विश्वास है।

'बाल त्रिशूल' विधा का प्रवर्तन

' सरस जी ने ' बाल त्रिशूल' नामक एक नई विधा का प्रवर्तन किया है। उन्होंने बाल पत्रिका 'बालसेतु' (मासिक हिंदी बाल पत्र);का संपादन-प्रकाशन किया। वे बाल साहित्यकारों के लिए भी एक सेतु जैसे थे।अपने खर्चे पर बस्ती में बाल साहित्यकार सम्मलेन किया करते थे। वे बहुत मिलनसार और सह्रदय इंसान थे। बालसाहित्य- विवेकानंद, साहित्य परिक्रमा; बाल बताशा,  विवेकानंद बाल खंड काव्य,बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 1 व 2 व 3 उनकी कृतियां हैं। नेहा- स्नेहा, जलेबी, बाल प्रयाण, बाल त्रिशूल भाग 1,2 व 3 , बाल बताशा, पुलुू-लुलू झॅइयक झम,गाबड़गिल, चरणपादुका, बाल कथाएं, साहित्य - परिक्रमा भाग 1 , 2 इत्यादि। उनकी परवर्ती कृतियां थीं। वे आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से भी जुड़े रहकर दर्जनों प्रसारण कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर का लाभ उठाए थे। 




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