Sunday, December 28, 2025

घुष्मा की भक्ति से बना शिव का यह धाम घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


घृणेश्वर शब्द का अर्थ है घृणा पर करुणा करना होता है और जो इसे नियंत्रित करने वाले स्वामी को घृष्णेश्वर कहते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी परम शिव भक्त घुश्मा नामक महिला और उनकी निस्वार्थ भक्ति से जुड़ी है, जिन्होंने अपनी बहन के पति से विवाह के बाद, ईर्ष्यालु सौतन द्वारा मारे गए अपने बेटे को भगवान शिव की कृपा से पुनर्जीवित करवाया था और शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में वास किया। जिससे यह स्थान घृष्णेश्वर कहलाया, जहाँ हर संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिवजी ने भक्त घुश्मा की प्रार्थना स्वीकार की और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. घुश्मा के नाम से ही यह ज्योतिर्लिंग 'घृष्णेश्वर' (घुश्मा के ईश्वर) कहलाया।
घृष्णेश्वर मंदिर की अवस्थिति 
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र केऔरंगाबाद (संभाजी नगर) जिले के वेरुल गाँव में स्थित शिव का एक हिंदू मंदिर है । यह एक राष्ट्रीय संरक्षित स्थल है, जो एलोरा गुफाओं से डेढ़ किलोमीटर दूर औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर उत्तर- पश्चिम में और मुंबई से 300 किलोमीटर पूर्व-उत्तर- पूर्व में स्थित है । 

           ऐतिहासिक पृष्ठभूमि/ 
            ज्योतिर्लिंग की कथा
घृष्णेश्वर का उल्लेख शिव पुराण स्कंद पुराण , रामायण और महाभारत में मिलता है । यह सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है जो भगवान शंकर को समर्पित है और इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम (बारहवां) ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
     दक्षिण देश में, देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम का एक बहुत ही तेजस्वी तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। सुदेहा संतानोत्पत्ति के लिए बहुत उत्सुक थी। ज्योतिषीय गणनाओं से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति संभव नहीं थी।     
     निःसंतान रहने के भय से सुदेहा 
ने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन घुश्मा से विवाह करने का आग्रह किया। उन्होंने घुश्मा को भगवान शिव की आराधना करने, 101 शिवलिंग बनाने और उन्हें जल में विसर्जित करने की सलाह भी दी। 
      पहले तो सुधर्मा ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन अंत में उन्हें अपनी पत्नी के आग्रह के आगे झुकना पड़ा और अपनी पत्नी की छोटी बहन घुष्मा से विवाह कर उन्हें घर ले आए। घुष्मा अत्यंत विनम्र और गुणी स्त्री थीं। वे शिव की परम भक्त थीं। प्रतिदिन वे एक सौ एक शिवलिंग बनातीं और सच्ची श्रद्धा से उनकी पूजा करतीं।
      कुछ दिनों बाद शिव ने घुश्मा के गर्भ से एक बेहद सुंदर और स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उनके दिन बड़े आराम से बीत रहे थे।
     कुछ समय बाद सुदेहा के मन में एक बुरा विचार आया। उसने सोचा, "इस घर में मेरा कुछ नहीं है। यहाँ सब कुछ किसी और के वश में हो गया है। उसने मेरे पति पर भी अपना अधिकार जमा लिया है। बच्चा भी उसी का है।" यह बुरा विचार धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगा। इसी बीच घुश्मा का बच्चा भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसकी शादी भी हो गई और बहू भी घर आ गई।
      एक दिन, सुदेहा ने रात में सोते समय घुष्मा के बेटे की हत्या कर दी। उसने उसके शव को उठाया और उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुष्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित किया करती थी। सुबह सबको इस बात का पता चला। पूरे घर में अफरा- तफरी मच गई। सुधर्मा और उनकी बहू दोनों सिर पीटते हुए फूट-फूट कर रोने लगे।
   अगले दिन, पुत्र की पत्नी ने पलंग पर खून के धब्बे देखे और पाया कि उसका पति गायब है। घुश्मा अपनी प्रार्थना कर रही थीं, तभी उनकी बहू ने आकर उन्हें अपने पुत्र के बारे में बताया। घुश्मा ने उसकी बातों को अनसुना कर अपनी प्रार्थना जारी रखी। उन्हें विश्वास था कि भगवान शिव उनके पुत्र की रक्षा करेंगे। उसने मंत्रो का उच्चारण शुरू किया और प्रार्थना के बाद वह शिवलिंग को जल में विसर्जित करने के लिए चली। जब वह तालाब से लौटने लगीं, तो उन्होंने अपने प्रिय पुत्र को तालाब के अंदर से निकलते हुए देखा। वह घुष्मा के चरणों में गिर पड़ा।
     उसी समय शिवजी भी पास ही में प्रकट हुए। वे सुदेहा के जघन्य कृत्य से बहुत क्रोधित थे। वे अपने त्रिशूल से उसका गला काटने को उतावले थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर शिव से कहा, 'प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी उस अभागी बहन को क्षमा कर दीजिए। उसने घोर पाप किया है, लेकिन आपकी कृपा से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब हे प्रभु, उसे क्षमा कर दीजिए! घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने एक और बरदान मांगने को कहा। इस पर घुश्मा ने कहा,मेरी एक यही प्रार्थना है, जन कल्याण के लिए आप सदा यहीं निवास करें।'
      शिव ने इन दोनों बातों को स्वीकार कर लिया। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वे वहीं निवास करने लगे। सती शिव भक्त घुश्मा की पूजा के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

वर्तमान मन्दिर का इतिहास
यह मंदिर कई बार बना और बिगड़ा है; मूल मंदिर 13वीं-14वीं शताब्दी में बना ।
13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत द्वारा मंदिर की संरचना को नष्ट कर दिया गया था । मुगल- मराठा संघर्ष के दौरान मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ और फिर से नष्ट हो गया।इसका शुरुआती पुनर्निर्माण शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने 16वीं सदी में कराया था। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद इंदौर की रानी गौतमा अहिल्या बाई होलकर के संरक्षण में 1729 में इसे इसके वर्तमान स्वरूप में पुनर्निर्मित किया । यह वर्तमान में हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण और सक्रिय तीर्थ स्थल है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। यद्यपि इसके प्राचीन अवशेष शिव पुराण और पद्म पुराण में भी मिलते हैं।

सर्व प्रवेश की अनुमति
घृष्णेश्वर मंदिर में सभी का प्रवेश खुला है।
कोई भी व्यक्ति मंदिर परिसर और उसके भीतरी कक्षों में प्रवेश कर सकता है, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए, स्थानीय हिंदू परंपरा के अनुसार पुरुषों को नंगे बदन जाना आवश्यक है। यह भारत के उन चुनिंदा ज्योतिर्लिंगों में से एक है जहाँ भक्त नंगे हाथों से शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं।

घृष्णेश्वर मंदिर की वास्तुकला
मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली में बनी है और यह औरंगाबाद के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। घृष्णेश्वर मंदिर का पांच मंजिला शिखर पारंपरिक मंदिर वास्तुकला शैली में शानदार ढंग से तराशा और निर्मित किया गया है। मंदिर परिसर में आंतरिक कक्ष और एक गर्भगृह शामिल हैं।यह संरचना लाल रंग के पत्थरों से बनी है। पूरा परिसर 44,400 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैली हुआ है। इन आयामों के साथ भी, घृष्णेश्वर मंदिर सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग मंदिर है। 

विविध नक्काशियां
यह भारत का एकमात्र ज्योतिर्लिंग मंदिर है जहाँ भगवान शंकर का पूरा परिवार एक ही मूर्ति में विराजमान है, जिसमें भगवान शिव, देवी पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय नंदी पर विराजमान हैं, और भगवान शंकर ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया हुआ है। यह नक्काशीदार मूर्ति मंदिर के शिखर पर शीर्ष भाग में सफेद पत्थर में उकेरी गई है, और मंदिर के दक्षिण प्रवेश द्वार से स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
      मदिर के एक स्तंभ पर हाथी और नंदी की नक्काशीदार मूर्ति बनी हुई है। इस नक्काशी को हरी-हर मिलन (भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भेंट) का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, मंदिर के 24 स्तंभों पर यक्षों की आड़ी मूर्तियाँ उत्कीर्णन गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि यक्षों ने पूरे मंदिर का भार अपने कंधों और पीठ पर उठाया है।
      इसकी आंतरिक और बाहरी दीवारों पर विभिन्न मूर्तियां और सुंदर डिज़ाइन हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक ज्योतिर्लिंग मूर्ति स्थित है और मुख्य द्वार के सामने भगवान शिव के प्रिय भक्त नंदी की एक विशाल मूर्ति है। इस मंदिर में पांच मंजिला ऊंचा शिखर और कई स्तंभ हैं जिन पर जटिल पौराणिक नक्काशी की गई है। लाल पत्थर की दीवारों पर अधिकतर भगवान शिव और भगवान विष्णु के दस अवतारों की कथाएँ चित्रित हैं। गर्भगृह या पवित्रतम स्थान में शिवलिंग पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। गर्भ गृह का क्षेत्रफल लगभग 289 वर्ग फुट है और गलियारे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है।
      मंदिर का शिल्प देखकर आप प्रसन्न चित्त हो जायेंगे। हमारे देश के मंदिर अभूतपूर्व होते है। मंदिर के अंदर नंदी जी विशाल प्रतिमा के दर्शन होंगे। गर्भगृह के अंदर जाने पर घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का टकटकी लगाकर दर्शन करते रहे। शिव ज्योतिर्लिंग की छबि को अपने मन में उतार ले, ताकि जब भी आप दर्शन करना चाहे तो पलके बंद करके उनका ध्यान करने से ही दर्शन हो जाएँ। भगवान शिव के इस रूप को मन में बसा कर बाहर आ जाएँ। बाहर आकर मंदिर के बाहरी शिल्प और ख़ूबसूरती का दर्शन कीजिये। आपका मन आनंद से भर जायेगा।

शिवालय तीर्थ 
घृष्णेश्वर मंदिर के नजदीक ही शिवालय तीर्थ स्थित है। यह वही सरोवर है जहाँ घुश्मा भगवान शिव की पूजा करती थी और भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए थे। पौराणिक कथा के अनुसार एक राजा ने शिकार करते समय गलती से, जंगल में साधना करने वाले ऋषि मुनी के साथ रहने वाले पशु को मार डाला। इस घटना से क्रोधित होकर ऋषियों ने राजा को शाप दिया, जिससे उसके सम्पूर्ण शरीर में कीड़े लग गये। राजा पीड़ा ग्रस्त होकर जंगल में इधर उधर भटकता रहा। प्यास लगने पर उसे एक पानी का कुण्ड दिखाई दिया। राजा ने जैसे ही उस कुण्ड का पानी पिया तो एक चमत्कार हुआ और उसके शरीर में लगे कीड़े नष्ट हो गये। राजा एकदम स्वस्थ हो गया। तब राजा ने उसी जगह घोर तपस्या करके भगवान ब्रम्हा को प्रसन्न किया। ब्रम्हाजी ने एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया। जिसे पहले ब्रम्हा सरोवर कहा जाता था पर बाद में इसे लोग शिवालय तीर्थ के नाम से जानते है। वर्तमान शिवालय का निर्माण देवी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक ने स्वयं इस स्मारक का अवलोकन किया है। वॉट्सप नं.+919412300183)


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