Friday, December 26, 2025

पण्डित चन्द्र शेखर मिश्र की निर्गुण रचना "झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

कवि का परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली।कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाह संस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।
पुरस्कार एवं सम्मान - 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

"झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" निर्गुण भक्ति की काल जयी रचना

झूलनी का रंग सांचा हमार पिया (चंद्रशेखर मिसिर रचित निरगुणिया गीत) भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र की यह कालजयी रचना है। निर्गुणिया भाव की यह रचना वर्षों से लोकप्रिय है।इसका इस्तेमाल लोक जीवन और फिल्मों में भी हुआ। चंद्रशेखर मिश्र ने शरीर को झूलनी का रूप देते हुए जितने कमाल तरीके से माया,ईश्वर आदि के संबंधों को जोड़ा है, वह कमाल है। भाव सहज है कि यह झूलनी एक बार मिला है। इसे बनानेवाला सुनार जब एक बार बना देता है, तो उसका दूसरा सांचा नहीं रखता। यह पांच तत्वों से बना हुआ है।
निहितार्थ - 
"झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" का निहितार्थ यह है कि शरीर (झुलनी) नश्वर है और इसे बनाने वाला (सुनार, यानी ईश्वर) एक ही होता है, जिसका साँचा (शरीर) बार-बार नहीं बनता; यह भोजपुरी निर्गुण गीत आत्मा और परमात्मा के रिश्ते, जीवन की क्षण भंगुरता, और शरीर को एक अनमोल रचना मानकर उसका सही उपयोग करने का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह गीत बताता है कि यह शरीर क्षणभंगुर है, और इसे बनाने वाला सुनार (ईश्वर) इसे एक ही बार बनाता है. इसलिए, इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए. संक्षेप में, यह एक निर्गुण गीत है जो जीवन की सच्चाई, शरीर की नश्वरता और ईश्वर के प्रति समर्पण का गहरा दार्शनिक संदेश देता है,  है.अवधी के  निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है।जिसे भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र ने रचा है ।एसा ही एक मनोहारी युगल  गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है - 

                  मूल गीत

झुलनी का रंग साँचा हमार पिया 
कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया ,  
रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया
सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै , 
दै अगनी  का  आँचा हमार पिया। 
छिति जल पावक गगन समीरा ,   
तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया। 
रतन से बनी रे झुलनिया ,    
जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया। 
जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,  
गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया। 
टूटी  झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,  
फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया। 
सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया , 
केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया। 
एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,
इतना सांई मोहे राचा हमार पिया। 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

    इस विजुवल लिंक से इसे और अच्छी तरह देख और समझ सकते हैं - 
https://www.facebook.com/share/v/1DJxMkvE6S/

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



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