पण्डित चंद्रशेखर मिश्र जी का जीवन परिचय
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्र धाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया।
एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाह संस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।
पुरस्कार एवं सम्मान -
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है।
राष्ट्र जागरण के लिए रची “कुंवर सिंह”
कुंवर सिंह (1777 – 26 अप्रैल 1858) 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान एक उल्लेखनीय नेता थे। वह वर्तमान में जगदीसपुर के शाही उज्जैनिया (पंवार) राजपूत घर से संबंधित थे, वर्तमान में भारत के बिहार, भोजपुर जिले का हिस्सा है।
पण्डित चन्द्र शेखर मिश्रजी के लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचानकर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। 'कुँअर सिंह' की भूमिका सम्पूर्णानंद जी लिखी इस प्रकार लिखी है -
झूमत बा इतिहास जहां
तहँ कईसे भूगोल रही ख़तरे में।
xxxxxxxxxxxxxxxxxx
छुरी कटारी बिकय सगरों,
चूड़हारिन गांव में आवत नाहीं।
यह महाकव्य 1966 में प्रकाशित हुआ है। 1958 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। उस समय बाबू रघुबंश नारायण सिंह जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली भोजपुरी मासिक पत्रिका में बाबू कुंअर सिंह पर एक बड़ा लेख 'बिहार केशरी बाबू कुंअर सिंह' पर आया । इस लेख का असर पं चंद्रशेखर मिश्र जी पर इतना पड़ा कि इस महाकाव्य का सृजन हुआ। इससे उनकी लोक प्रियता में चार चांद लग गये। कवि सम्मेलनों में लोग आग्रह पूर्वक इसके अंश सुनते थे। इसे सुनकर लोगों का देश प्रेम हिलोरें लेने लगता था। युवक तो इसके दीवाने ही हो गये।
कुंवर सिंह महा काव्य के संक्षिप्त आत्म कथ्य काव्य द्वार के कुछ अंश -
बाबू कऽ फिरल दोहाई, गाँवन-गाँवन में डुप्पो बाजल
सोहा चबाइ के नेवता बा, सब साजइ आपन दल बादल ।।
बा कोखि जुझावई के नेवता, सेन्हर पोंछवावइ के नेवता ।
बरी फोरवावद के नेवता, बा रोड़ कहावद के नेवता ॥
जे हउ हमार ते साथ देई, जे हउ हमार ते माथ देइ।
के हउ हमार अब दुख बूझड, जे हउ हमार ते अब जूझइ ।
बा इहाँ न मोका समझइ के, बा इहां न मौका बझड़ के ।
की तउ फेरऽ नेवता हमार, की तउ तयार हो जझड़ के ।।
'नेवता कबूल बा हमहन के' सब गाँवन कऽ मुखिया बोलल।
मेवता कबूल बा हमहन के' सुखिया बोलल, दुखिया बोलल ।।
महलन से निकलि जवान चले, मड़हन से निकलि जवान चले ।
सड़हर से निर्काल जवान चले, घर-घर से निकलि जवान चले ।।
माई कऽ बन्दि कटावइ के, बलहीन चले, बलवान चले।
भारत का बड़ा पार करइ, कंगाल चले कंकाल चले ।।
अवाज गइल सुनि पड़ल मुनादी कऽ पुकार बुढ़वन के कान फर फर फर देहियाँ करकरानि, फेरि गइल जवानी याद भइन ।।
मोठन पर ताउ पड़ल अउ हथियारन की ओर नजर घूमल ।
बनराज जवानी के पंजन कऽ पउरुख सुमिरि-सुमिरि झूमल ।।
आँगन में लड़िकन के बटोरि हर घर में माई बोलि उठलि ।
बस एहो समइया के खातिर बंटवा तोहके पाललि-पोसलि
हमरे दूबे कऽ लाज रखड घर-घर में महतारी बोललि ।
हमरे सेन्हरे क लाज रखड घर-घर में मेहरारू बोललि ।॥
हमरो राखी कऽ लाज रखड घर-घर में बहिनो बोलि उठलि
पाकल मोछा क लाज रखड ई बूढ़ बाप फ बोल रहलि ।।
हुकार उठल जब सेना कऽ गूजलि आवाज नभ चोर गइल।
केउ बोर तपल बा भरत खंड में सरगे में अल सोर भइल ।
फर फर फर देहियाँ फर फरानि घरती क बात इयाद भइल
फेरि धरमराज के आगे हमरे पुरखन कऽ फरियाद गइल।
धरती पर हमके भेजि देहु हम सरगे में नाहीं रहबे
घेरे विपत्ति भारत के वा हमहू चलि के लोहा गहवं ॥
हम बड़ठि इहाँ लूटो बहार, हमरी धरती पर दाग लगढ़।
अइसन सुख हम नाहीं भोगब तोहरे बैकुण्ठं झागि लगद ।।
हमरी माई की छाती पर जब दुश्मन पाँउ धरत होई
नाहॅक जनमौली हम बेटवा, कहि धाड़ मारि रोवत होई ॥
पोहें छोटो पिचक्का लोहून कऽ लोथिन पर लोथिया भहराई।
अनजाने में कतहू थ्रोट से अगिन बान गोली आई ।।
हम कोटि-कोटि रे साँड़ असत बेटवा जनमाके का कइलो ।
नाहॅक एतना पीड़ा सहली, काहे न निपूतो हम भइली ।
अपनी माई कऽ रोइब सुनि ना फटल करेजा टूक-टूक ।
जीनी छातो में देस-प्रेम उकसउलेसि नाहीं यार हूक ।।
बेटवा लेडके पनहीं घूमद, माई सेवइ दासी बनिके ।
जेकर बरी सुख से सोवई धिक्कार यार ओहि जीवन के ।।
जेके प्यारी घर कऽ तिरिया ऊलौटि घरे के चला जाइ ।
जेके प्यारी भारत माता रण में चढ़ि के लोहा चवाइ ।।
बाब क बोली गोली अस लगि गइल जवानन की छातो ।
तुराई माई क दूध पिया का हमहन नोर पिये बाटो ॥
गंगा भागई सागर ताकई सागर भागइ तउ कहाँ जाइ ।
भोजपुरिया भागई ए बाबू! केहि कायर के पोछे लोकाइ ॥
कहूँ भोजपुरी भागत पउलऽ सरदार हमें बतलाइ देउ।
संका मन में राखउ नाहों, रन में चड़िके अजनाइ लेउ ।
मारे लोहन के गोरन के लोथिन पर लोथि गिराइ देव।
हाड़न में नून समायल वा बदले में खून बहाइ देव।
हम निमक हरामो ना करवं, करतब हमार गोहरावत बा।
इतिहास कार बोरन कऽ गाथा पोथी में दोहरावत बा ।।.
अइसन मोका फेरि ना लागे मरि जायेके, मिटि जायेके ।
छुटही खटिया से प्रान तजे श्रोकर जस-गाथा गाये के ।
रन में चढ़िके तरुयारी से ठाकुर तू चिन्ह खचाइ विरऽ ।
ओहि चिन्हीं से पीछे आई तउ माथ हमार उतारि लिहऽ ।।
घउग्र देखिहुड जजउ छाती में तउ छाती से चपकाइ लिहऽ ।
पीठो में घाउ लक्ष्य हमरे त लातन मारि गिरा बिहुऽ ॥
जेकर वंरी बत्ति जाइ आजू ओकरी तरुवारी के धिकार।
जं बिनु मारे लोटड घरके ओवकरी तैयारी के धिकार ।।
जेकर गोछा नोचे झुकिया ओकरी सरदारी के चिकार ।
जंकरों पोटी में घाउ लगइ, आकरी महतारी के चिकार ।।
अँगरेजन क छोटका टावू गेना अस नाजु उठाइ लेव ।
हम मारव ठोकर लाते से सागर में कतउँ निराद्ध देव ।।
लागे न पता श्रोहि देसवा कऽ नकसा से नाउँ निकालि देव ।
एकउ न पूत बचिहैं दादा ! हम खोजि बोन के बालि देव ।
भोजपुरियन कऽ हूं'कार सुनत हर हर हर सागर हरि गयन ।
कंपिनी कंपलि इंगलंड महरानी कऽ आसन थहरि गइल
ना पुरुवइया, ना पछ ग्रयाँ ना बहलि बयरिया चौमुखिना ।
एह भाजपुरो तप्पा में खाली लप लप लपकलि तरुश्ररिवा।
कुंवर सिंह खण्ड काव्य की कुछ चयनित पंक्तियां इस प्रकार है -
नेवता बलि बेदी क छोड़िके,
औरन कs कबहूँ यह आवत नाहीं ।
मारू, जुझारू बजई बजना,
केहु दोसर राग बजावत नाहीं ॥
छोड़ि के बीर भरी कविता,
रस दूसर में केहू गावत नाहीं ।
छूरी-कटारी बिकइ सगरउँ ,
चुरिहारिन गाउँ में आवत नाहीं ॥
पूतन से बुढवा कहले,
रन कइसे चली रहली न जवानी ।
पेड़ किनारे क जानs हमईँ,
बस चार दिना क बची जिनगानी ॥
वेद के मंत्र से पिंड ना लेबइ,
बोलs तबउ जय देस क बानी ।
पानी बचाई के ना रखबs ,
तब ना हम लेबइ सराध में पानी ॥
छाँटली बाँह गिरि छप से,
किछु दूरी बनी तब लाल निसानी ।
भोजपुरी भुइयाँ हुलसी,
कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी ॥
भागीरथी से कहै धरती ,
जब लेइ लहरा नदिया इतरानी ।
बोलs ई नीर तोहार हु या,
हमरे बेटवा के कटार के पानी ॥
आचार्य डॉ .राधेश्याम द्विवेदी
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
No comments:
Post a Comment