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भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं।
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा, सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र जी की द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है द्रौपदी की करुण पुकार-
खींच दु:शासन, जोर लगाई के
टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।
बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,
मोहन ना हमके बिसरईहें।
देर लगी, ना अबेर लगी,
बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।
भउजी के गोदी में होइहें तबो,
मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।
गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs
हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।
तू बहिना बहिना कहबs,
पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।
सावन में तोहें बांधे बदे,
जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।
आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,
भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।
इन छंदों को साथ में दिए लिंक से सुनकर आप अपने को धन्य अनुभव कर सकते हैं।
https://www.facebook.com/reel/922493309599814/?app=fbl
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