Friday, January 2, 2026

नीलकंठ वर्णी स्वामिनारायण की अयोध्या से बांसी होते हुए मुक्ति तीर्थ की यात्रा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

स्वामिनारायण का सामान्य परिचय :- 

श्री घनश्याम पांडे उपाख्य स्वामिनारायण जी  2 अप्रैल 1781 -1 जून 1830 ई.तक इस धरा पर विराजमान रहे।वे हिंदू धर्म केस्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक और इष्ट देवता रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के छपिया में हुआ था। उनके माता पिता का नाम धर्मदेव और भक्ती माता था। बाल्य काल में विद्या ग्रहण करके उन्होंने गृह त्याग किया था। सन 1792 ई.में, उन्होंने नीलकंठ वर्णी नाम को अपनाते हुए, 11 वर्ष की आयु में भारत भर में सात साल की तीर्थ यात्रा और तपस्चर्या की थी। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने कल्याणकारी गतिविधियां की और इस यात्रा के 9 वर्ष और 11 महीने के बाद, वह सन 1799 ई. के आसपास गुजरात राज्य में बस गए थे । सन 1800 ई.में, उन्हें अपने गुरु स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय में शामिल किया गया और उन्हें सहजानंद स्वामी का नाम दिया गया। सन 1802 ई . में अपने गुरु के द्वारा, उनकी मृत्यु से पहले, उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया गया था । सहजानंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और स्वामीनारायण मंत्र को पढ़ाया। तब से, वह स्वामीनारायण के रूप में जाने जाते हैं । 

उन्होंने 3000 से अधिक संतों को दीक्षा दी और लाखो अनुयायी बनाये। उनके जीवन काल में ही लाखों लोग भगवान स्वामी नारायण को परमात्मा मान कर उनकी भक्ति करने लगे थे। 

नीलकंठ वर्णी रूप में तपस्या:- 

अपनी माता और पिता के मृत्यु के बाद ग्यारह वर्षीय बालक घन श्याम पांडे घर छोड़कर जंगल में तपस्या करने चले गए। उनके तेजस्वी रुप और तपस्या शिवजी जैसी होने के कारण लोग स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी नाम से जानने लगें। नीलकंठ वर्णी ने सात वर्षों तक देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा की थी। उन्होंने हिमालय में कठिन तपस्या और भारत के समस्त तीर्थो की यात्रा की थी। बाद में उन्होंने गुजरात के रामानंद स्वामी से दीक्षा धारण कर उन्हे अपना गुरु बनाया। रामानंद स्वामी के देहांत के बाद उन्होंने स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना और प्रचार किया था। 

       "भगवान श्री स्वामीनारायण: एक दिव्य जीवन गाथा"लेखक : साधु अक्षर जीवन दास , प्रकाशक: स्वामीनारायण अक्षर पीठ अहमदाबाद, अगस्त 2022 पृष्ठ 46- 47 के विवरण के अनुसार -" भगवान श्री स्वामी नारायण संवत 1849 तदनुसार सन 1793 ई.में पंजाब के राजा रणजीतसिंह से दो बार भेंट किए थे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह तीर्थयात्रा करते हुए बदरीनाथ आए थे तब इस छोटे ब्रह्मचारी के प्रथम बार दर्शन किये थे। उनकी भीतर की मुमुक्षुता जाग गई थी। उम्र तेरह वर्ष की होने से उनका स्वामी जी से अधिक लगाव हो गया था। दंडवत्-प्रणाम करके वे ब्रह्मचारी के चरणों में बैठ गए थे। उनके हृदय में शान्ति छा गई थी । वे बोले,'मुझको शरण में लीजिए, इच्छा होती है कि सदैव आपके साथ रहूँ।' 

    ब्रह्मचारी ने कहा, 'राजन् ! हमारा और आपका रहन-सहन भिन्न है। आप भोगी हो, हम जोगी हैं। हम इस जगत से सदा उदासीन हैं, आप विषय विलासी हो। हम दोनों में भारी अन्तर है। इसलिए साथ निभाना कठिन है, फिर भी भगवान का शासन अपने सिर ढोते हुए प्रजा का पालन कीजिए। हम पुनः नीचे होडा मिलेंगे, अब तो हम यहाँ से गंगोत्री जाएँगे।' 

     राजा अपने साज-समान के साथ कुछ समय वहाँ रहे थे।

     ब्रह्मचारी दुर्गम पथ से गंगोत्री की ओर चल दिए। वहाँ जाकर हिमालय पर बैठकर स्नान किया। फिर हर की पौडी पर जब आए तब रणजीत सिंह से पुनः भेंट हुई। ब्रह्मचारी की ओर वे बहुत आकर्षित हुए थे। राजधर्म एवं मोक्ष की रीति उपदेश पाकर वे कृतार्थ हो गए थे। बार-बार ब्रह्मचारीजी के चरणों में मस्तक रख उन्होंने उनसे अच्छी तरह प्रजा का पालन करने का आशीर्वाद माँगा था।

    यहाँ से ब्रह्मचारी को मुक्तिनाथ (नेपाल) की ओर जाना था। वे इस दौरान अयोध्या वापस लौट आए थे। वे सरयू तट पर एकाध घंटा बैठे रहे । गृहत्याग किए आज बराबर एक वर्ष पूर्ण गया था। अयोध्या के नागरिक सब अपनी अपनी गत में मग्न थे। किसी से कुछ भी पूछे बिना ब्रह्मचारी ने मुक्तिनाथ का मार्ग ले लिया।"

हरैया गांव होकर यात्रा :- 

वर्तमान बस्ती जिले का हरैया गाँव (जो वर्तमान में तहसील है और राष्ट्रीय राज मार्ग 28 के किनारे बसा है।) होते हुए वे बंसीपुर में आए थे।



इस स्थान का मूल नाम 'हरि-रहिया' था, जो अवधी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ 'भगवान का मार्ग' है, क्योंकि भगवान राम इस रास्ते से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और मिथिला गए थे। बंसीपुर को आधुनिक बांसी कहा जाता है, जहां श्रीनेत राजाओं का उस समय शासन था। उस समय सर्वजीत सिंह वहां के राजा थे। जिनके राज में भगवान स्वामी नारायण का पावन आगमन हुआ था।

तत्कालीन राजनीतिक अशांत परिस्थितियां 

श्रीनेत क्षत्रिय - सूर्यवंशी हैं। उनका गोत्र- भारद्वाज, गद्दी - श्रीनगर (टेहरी गढ़वाल) है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, सन्त कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर,गोरखपुर तथा बस्ती जिले में बांसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी ये लोग रह रहे हैं।


     बांसी के राजा तेज सिंह सन 1743 ई .में दिवंगत हुए थे उनके तीन पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े रंजीत सिंह (1743- 1748 ई.) थे। इस राजा को अपने भाई दलजीत सिंह से लड़ना पड़ा था जो कानपुर के शिवराज पुर के राजा का शरण लिए हुए था। यहां वह अवध के नबाब शुजाउद्दौला के पक्ष में रहा। उसकी सहायता से यह अपने भाई पर पुनः आक्रमण किया था । यह युद्ध बांसी से 6 मील पूर्व पनघटा घाट पर हुआ था। पनघटा घाट, बांसी, सिद्धार्थनगर, राप्ती नदी के किनारे स्थित एक स्थानीय स्थान है, जो बांसी शहर का हिस्सा है और स्थानीय लोगों के लिए नदी तक पहुँचने का एक बिंदु है। यह क्षेत्र बांसी के विकास और प्रस्तावित नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पास के गाँव और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। योगमाया मंदिर भी यहीं है। इस घाट पर हुई लड़ाई में दोनो भाई रंजीत सिंह और दलजीत सिंह मारे गये थे। परिणाम स्वरुप रणजीत और दलजीत के शिशु लड़के राजा बहादुर सिंह ( सन 1748- 1777 ई.) और सर्वजीत सिंह (सन 1777- 1808 ई.) में संयुक्त रुपसे बांसी के राजा हुए थे । बाद में ये नरकटा में रहने लगे थे। बहादुर सिंह सन 1777 ई. में निःसंतान मर गया था। जगत सिंह ने उनके हिस्से को जप्त करने के लिए आक्रमण किया परन्तु सर्वजीत सिंह ने बुटवल के राजा से सहायता लेकर खुला युद्ध किया और पूरे क्षेत्र का राजा बन बैठा था ।अपने सम्बंधियों और आश्रितों को राजघराने का ( BIRTS) ब्रिटिस हिस्सा देने के बावजूद सम्पत्ति समय के साथ साथ कम होती गयी।


     मूल बांसी शाखा के राजा सर्वजीत सिंह बिना किसी असली वारिस के सन 1808 ई. में दिवंगत हो चुके थे।पांच वर्ष तक बांसी का राज्य उनकी विधवा रानी रंजीत कुंवर (सन 1808-1813 ई.) ने संभाला था। इनकी दो बेटियां इला और सुशीला थी। इनकी ही शादी के लिए राजा सर्वजीत सिंह ने बालक नील कण्ठ वर्णी को पसन्द कर लिया था। पुत्ररत्न ना होने के कारण राजा सर्वजीत ने अपने सहयोगी राज्य उनौला के राजा हरिहर सर्फराज सिंह के पुत्र श्रीप्रकाश सिंह (सन 1813-1840 ई.) को दत्तक पुत्र के रुप में ग्रहण कर लिया था। 

भगवान स्वामी नारायण का आगमन :- बांसी राज्य की सीमा में भगवान स्वामी नारायण पीपल वृक्ष के नीचे मृगचर्म बिछाकर ध्यानस्थ हुए थे। बंसीपुर (बांसी) का राजा वहाँ आया। ब्रह्मचारी का कमलपत्र समान नयन एवं चंद्र को लज्जित करे ऐसा मुखमंडल देख राजा मंत्रमुग्ध हो गया था। चरणों में माथा टेकते हुए वह बोला, 'मेरे भवन पधारिए, प्रभु !'

     ब्रह्मचारी ने उसका भाव पहचानकर 'हाँ' कहा। अपने घोड़े पर उन्हें बैठाकर राजा स्वयं लगाम थामकर पैदल चलने लगा था । यह देखकर प्रजा चकित रह गई थी। राजमहल में कृष्णभक्ति का वातावरण जम गया था। राजा- रानी एवं दो कुँअरियों इला- सुशीला की श्रद्धा को पुष्ट करने ब्रह्मचारी ने यहाँ राजमहल को पावन किया था। दूध में पकाई मिठाई का थाली तैयार करके राजा स्वयं आया था। शालिग्राम भगवान को भोग लगाकर ब्रह्मचारी ने किंचित् प्रसाद भी ग्रहण किया था। बाद में पूरा थाली-प्रसाद सभी को बँटवा दिया था  

       राजा-रानी के भीतर ब्रह्मचारी की मूरत बैठ गई थी। दोनों के मन में कुत्सित विचार आया कि दोनों बेटियों का ब्याह इसके साथ कर दिया जाए। 

     'राजन् ! तुम जो सोच रहे हो, सब मैं जानता हूँ। मैं तो भव-भटकन से जीवों को उबारने आया हूँ।' ऐसा कहकर ब्रह्मचारी ने अपना सही रूप दर्शा दिया था।

विवाह प्रस्ताव को ना मानने पर बन्दी बनाए गए थे स्वामिनारायण।

     दंपति की जीवदशा थी अतः बेटियों को ब्याहने की इच्छा वैसी की वैसी बनी रही। शाम ढलते ब्रह्मचारी जब जाना चाहा तब उनको राजा ने  बंदी बना लिया गया था। रात डेढ़ पहर शेष रहने पर चौकीदारों को गहरी नींद में डालकर ब्रह्मचारी वहाँ से मुक्ति क्षेत्र के लिए प्रस्थान कर गए थे। 

सोते पहरेदारों को चकमा देकर प्रभु आगे बढ़ गए थे।

    मुक्तिक्षेत्र वह स्‍थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसी स्‍थान से होकर उत्‍तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्‍बत गए थे।

    बालक नील कण्ठ वर्णी घोर जंगल में से जा रहे थे। वर्षाऋतु थी। मेघमाला छाई हुई थी। मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली चमक रही थी। वन, वृक्ष, प्राणी सभी के चेतनसृष्टि में आनन्द छाया हुआ था। सृष्टि सो रही थी तब बारह वर्षीय यह बालक श्याम पर्वत की ओर चला जा रहा था। मुक्तिनाथ मंदिर नेपाल के मुस्तांग जिले में, थोरोंग ला दर्रे की तलहटी में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध तीर्थस्थल है, जिसे 'मोक्ष के देवता' के रूप में जाना जाता है और यह समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ 108 पवित्र झरनों में स्नान करने और कागबेनी में पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


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