Monday, December 15, 2025

देवरहा श्रद्धार्चन स्तुति और आरती। संकलन: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

        देवरहा श्रद्धार्चन

बन्दे देवरहाख्यमद्भुततमं देवं सुमञ्चेस्थितम्, कारुण्यातिभरेण 
चार्द्रहृदयं सत्पालनेतत्परम् । 
सिद्धं योगसमाधिजन्यपरमानन्दे 
निमग्रं प्रभुम्, 
अन्तर्दृष्टिपरं तथाप्यभयदं 
प्रत्यक्षतो दैवतम् ॥

(अनन्तश्री विभूषित योगिराज जी जो अत्यंत अद्भुत देवता हैं तथा मंच पर विराजमान हैं तथा जिनका हृदय करुणा के कारण अत्यंत कोमल है, जो सत्पुरुषों के पालन में तत्पर हैं और जो योगसमाधि के द्वारा उत्पन्न परमानन्द में निमग्न रहते हैं जो सदा अन्तर्मुखी दृष्टि से रहते हुए भी लोगों को अभयदान देते रहते हैं, जो प्रत्यक्ष में देवस्वरूप हैं को मैं नमस्कार करता हूँ।)

आर्त्तानां शरणं त्रितापहरणं शोकाग्निनिर्वापणम्, भीतानामभयं 
प्रसन्नवदनं प्रेमामृतास्वादनम् ।
नित्यं ब्रह्मरसप्रलीनहृदयं 
शान्तं जगत्पावनम्, 
ज्ञानानन्दघनस्वरूपममलं 
वन्दे गुरुं वत्सलम् ॥

(आर्त्त व्यक्तियों को शरण देने वाले, त्रिविध दुःखों का हरण करने वाले, शोक की अग्नि का शमन करने वाले, डरे हुए व्यक्तियों को अभय देने वाले, प्रसन्नमुख प्रेमामृत का आस्वादन करने वाले, सदा ब्रह्मानन्द में निमग्न रहने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, निर्मल तथा कृपालु गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।)

यस्य दर्शनयोगेन सर्वाबाधा पलायते । 
वंदे देवराहा बाबां लोकानुग्रहकारिणम् ॥

(जिनके दर्शन से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं, ऐसे लोक कल्याणकारी श्री देवराहा बाबा की मैं वंदना करता हूं।।

       ब्रह्मर्षि श्री देवराहा स्तुति

मंचात्प्रयच्छन् विपुलं प्रसादं
लोके वितन्नन् शुभदां सुबुद्धिम्।
जीवेषु कुर्वन्निह चानुकम्पा 
सः पातु नः शक्तिपतिर्हि बाबा।।


(मंच से विपुल प्रसाद प्रदान करते हुए, लोक में शुभ प्रदान करने वाली सद्बुद्धि का विस्तार करते हुए और जीवों के ऊपर अनुकम्पा प्रदान करते हुए वे शक्तियों के स्वामी महाराज देवराहा बाबा हमारी रक्षा करें।)

न शक्तिर्न भक्तिः न युक्तिः न मुक्तिः 
समृद्धिर्न सिद्धिर्न मे निर्मला धीः । 
ममाज्ञस्य त्राणं त्वदीयानुकम्पा 
परित्राणदाता प्रसीद प्रसीद ॥

(हे महाराज ! न मुझमें शक्ति है, न भक्ति, न युक्ति, न मुक्ति, न सुखोपभोग व ऐश्वर्य है न ही कोई सिद्धि और मेरी बुद्धि भी निष्कलुष नहीं है। मुझ अज्ञ की रक्षिका एकमात्र आपकी अनुकम्पा ही है। हे त्राणदाता! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों।)

ब्रीडा न मे विश्वभृतं हि याचे, 
बाबा अचिन्त्यं स्वगुणौ निगूढ़म् । 
यः सर्वशक्तिः करुणार्णवं तं, 
मंचाधिरुढं सततं नतोऽस्मि ॥

(विश्व का भरण करने वाले, अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न, अनन्त गुणों से युक्त होने के कारण अगम्य योगिराज देवराहा बाबा से याचना करने में मुझे कोई लज्जा नहीं है। मंच पर रहने वाले, सर्वशक्तिमान, करुणावरुणालय, ब्रह्मर्षि देवराहा बाबा को मैं निरन्तर नमन करता हूँ।)

   ब्रह्मर्षि योगिराज देवराहा आरती

मंगल आरती श्रीगुरुवर की, 
सत्-चित्-आनंद, विधि हरि-हर की।

अतुल-अनंत-अनामय-अव्यय, 
गुरु-परमातम, सिद्ध बोधमय;
दया-क्षमा-करुणा-वरुणालय-
भगत-वत्सल, भगवंत प्रवर की।
मंगल आरति

आदि-अनादि-अगोचर-अविचल, 
पालक-पोषक-रक्षक प्रतिपल।
स्नेह-सुधामय गुरु-गंगाजल-
गति-मति-सद्गति सचराचर की।।
मंगल आरति

,मात-पिता-भर्त्ता-गुरु-स्वामी 
सखा-शरण-प्रिय-अन्तर्यामी;
अखिल जगत के संबल नामी-
तन-मन-धन-आशा हर घर की। ।
मंगल आरति

काम-क्रोध-मद-लोभनिवारो, 
टारो; शोक-मोह-भय विभ्रम।
वरद हस्त सत्वर सिर धारो -
निर्मल ज्योति करो अंतर की। ।
मंगल आरति

धूप-दीप-नैवेद्य न पाऊँ 
पास तुम्हारे कैसे आऊँ;
श्री चरणों में सीस नवाऊँ-
गाऊँ गुन यश आरति-हर की। ।
मंगल आरति

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