Thursday, December 25, 2025

चन्द्र शेखर मिश्र का भीषम खण्ड काव्य✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

भीष्म खण्ड काव्य
कुँअर सिंह, द्रौपदी, सीता जैसे महान काव्यों की रचना के बाद भोजपुरी में तीसरा और हिन्दी भोजपुरी के चौथा  बेहतरीन खण्डकाव्य इन्होंने 'भीषम' खण्डकाव्य लिखा है। जो महाभारत के भीष्म के जीवन पर आधारित खण्ड काव्य  है । इसमें वीर रस और करुण रस का अदभुत समन्वय है। यथा - 

जानि परइ सुनले होइहैं हरि, 
भीषम से रण में पड़े पाला।
ठान हमार सुने डरि गइलन, 
लागत बा किछ बाल में काला।

गाण्डीव की टनकार न होत, 
ध्वजा पर ना हनुमान देखाला ।
प्रायः बीर सबइ रण अइलें, 
पे आयल नाहीं पितम्बर वाला ।

देखव पउरुख युद्ध में विड-न 
छोड़ब चक बिना उठवाये।
बाको जउ ना अइहुई रण में तब, 
व्यर्थ हवा में के बान बलाये ?

केकर छाती बनी अस बज्जर, 
जौनो से सायक मोर झेलाये ? 
पारथ अइले न पारथ सारथी, 
युद्ध में कोन मजा तब आये।


आइ जवानी भले हरि के, 
पर छटल नाहीं प्रबड़ बचकाना।
संभव बा समूहें नहि आवड, 
जाइ चला कहीं कड़के बहाना ।

अउ फेरि ना करजा मोर खइलन, 
जेकर मारब बाद में ताना ।
श्रावड न सावह लड़ड अनतें कहीं, 
बा छलिया कर कौन ठेकाना ।

जंगल सून जहाँ बिचरड, त
ड़पड, गरजइ नहि बाध-बघेला ।
जीवन सून बिना पुरुषारथ, 
आंगन सून न खेलइ गदेला ।

भक्ति बिना सब सून नदी-नद-
सून न जीने में नीर बहेला ।
तइसइ इ कुरुखेत पितंबर-
धारी बिना हमइ सून लगेला।

युद्ध में आजु पता चलिहद्द, लुटि 
जइहद्द बड़े-बड़े अस्त्र क थाती ।
कोवव में रणबीच अनेकन,
बंस क आज बतइहई बाती।

चातक माधव को छतिया, 
जेकरे बड़े बान हमार सेवाती ।
के मोरे बान क घाउ सहे, 
तजि कृष्ण के के कर बज्जर छाती ?

या तः चला जदहद ब्रज में, 
जिनगी फेरि माखन माँगि बितद हैं।
या हमरे रणकौशल से थकि, 
अन्त में चक्र जरूर उठइहैं।

द्वारिका ले हम खोदिके' मारव, 
माघव ठाँव कहीं नर्नाह पहहैं।
पं एक सोच इहद मन में-
कुरुखेत ओन्हइ बिनु सून देखइहैं।


मारि-मारि बानन के चक्र उठवाइ देव, 
देखबह में बातें जोर केतना जबानी में।
कइसे प्रण कइ जाला, 
कइसे निरबाहि जाला,
डूनउ कथा जुटे आज हमरी कहानी में।

सुनीला कि मोरे सात-सात बड़ भाइन के,
गंगा माई बोरि देलों धार को रवानी में।
हमई भी उचित वा कि जउ न प्रण दूर करो, 
बूड़ि मरि जाई कहीं चुल्लू भरि पानी में।

xxxxxxxxxxxxxxxxx

छतिया उतान कइले भीषम तड़पि बोले,
रण बीच फैसला हमार बा तोहार बा ।
भाग्यमान जसुदा के कौन बा अभाव नाथ,
घीउ-दुध माखन कs लागल पहाड़बा ।

मोरे गंगा माई के त पास खाली पानी बाटै,
पनिया में का बा इहै मछरी सेवार बा ।
तबौ कुरुखेत बीच फैसला ई होइ जाई
दूध धार-दार बा कि पानी पानीदारबा ।

के रण जीतल हारल के,
कहइँ भीषम, केसव तू ही बतावs ।
जौन करइ के ना उ कइलs अब,
मारै बदै मति कष्ट उठावs ।

चूवत लोहू तरातर बा थकि-
जइबs न भूमि कठोर पै धावs ।
मैं रखि देब गला खुद चक्र पै,
मोहन माधव केसव आवs ।।

       आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


No comments:

Post a Comment