Sunday, January 18, 2026

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का भारत में आगमन और उनकी गतिविधियां ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


      सनातन शास्त्रों में “द्वीप” शब्द का अर्थ केवल जल से घिरा भूखंड नहीं होता, बल्कि “संस्कृति क्षेत्र” या “आध्यात्मिक भूभाग” भी होता है। शाक द्वीप का उल्लेख विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण और ब्रहमाण्ड पुराण में विस्तार से मिलता है। 
                  राजा मेधातिथी 

मनु पौत्र मेधातिथी प्रथम शासक :- 
शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था

      भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये।तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।

द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था।

सांब के कुष्ठ रोग का निदान 

बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया। 



      भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। ये आठों सूर्यपुत्र सामगान करते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगे कि हे परम पिता हमारे लिये क्या आज्ञा है ? भगवान सूर्य ने कहा शाकद्वीप में मेघातिथी ने मेरा विशाल मंदिर बनवाया है। तुम लोग वहां जाकर मंदिर में मेरी प्राण प्रतिष्ठा करो, मेरी पूजा-अर्चना विधि विधान से कर इनका कृत्य सुधारो तथा धर्म का प्रचार करो।
      इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।
अनेक विविधताएं :- 
शाक द्वीप के अलग अलग वर्ण, उपद्वीप, पर्वत, सागर, इष्टदेव, नदियाँ तथा शासक हुए। शाकद्वीप में सात उपद्वीप बने थे। जिनका नाम क्रमश: पुरोजव, मनोजव, पवमान, धुम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और चित्रधार पड़ा। इन उपद्वीपों का नाम मेधातिथि से जो पुत्र हुए, उन पुत्रों के नाम पर ही रखा गया था। मेधातिथि के पुत्रों ने इन उपद्वीपों पर हजारों वर्षों तक राज किया।
         Brahman pray God Sun 
      भागवत पुराण (5.23.9–10) के अनुसार - शाकद्वीप में सूर्यदेव की पूजा विशेष रूप से की जाती है। वहाँ के ब्राह्मण “माघ, मारिच, भृगु, अंगिरस, कश्यप” वंश से जुड़े हुए हैं। ये ‘मघा उपासक’ कहे गए हैं। अर्थात - शाकद्वीप में रहने वाले ब्राह्मण सूर्योपासक थे, जिन्हें “माघ ब्राह्मण” या “माघ सूर्योपासक ब्राह्मण” भी कहा गया है।
सूर्य के अंश स्वरूप :
ये ब्राह्मण योनिज नहीं थे अतः दिव्य कहलाये। ये ब्राह्मण हमेशा से ही अग्रणी सूर्योपासक रहे हैं। मनुस्मृति के अनुसार सूर्यास्त के पश्चात श्राद्ध कर्म निषेध है। कहते हैं कि श्राद्ध कर्म करते वक़्त सूर्य अगर अस्त हो जाए, या किसी कारण वश अगर सूर्यास्त के बाद श्राद्ध करना ज़रूरी हो जाए तो ऐसे में एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण को सूर्य वरण करके श्राद्ध संपन्न किया जा सकता है क्योंकि शाकद्वीपीय ब्राह्मण में सूर्य-अंश (सूर्यांश) होता है। 
          Nav grah panel 
नवग्रह का वास :- 
कहा यह भी गया है कि एक शाकद्वीपी ब्राह्णण के सम्पूर्ण शरीर में नवग्रह का वास होता है। 

शीर्षे सूर्यो विधु नेत्रि मुखे सोमो हच्पिसर्बुधः।
नाभिभिश्दे देशे गुरुश्चैव पृष्ठदेशे च भार्गवः।।
शनि जेहनुधितिश्चैव राहुकेतो पदद्वये ।
ग्रहविप्रशरीरेषु ग्रहाः स्यु: सुविराजिताः ।।”

श्री कृष्ण के पौत्र साम्ब का इलाज :- 
महाभारत में ऐसा वर्णित है कि जब श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ट रोग हो गया तब वे अत्यंत चिंतित हो गए। यहाँ उनका भरपूर इलाज किया गया लेकिन कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ तब यहाँ के चिकित्सकों ने उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी दी जो शाकद्वीप में रहती थी। भगवान कृष्ण नें शाकद्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बूद्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक व आयुर्वेदिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया। बाद में वे मगध (वर्तमान का बिहार) में आकर बस गए। 
पौराणिक उल्लेख:- 
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का उल्लेख स्कंद पुराण,भविष्य पुराण, विष्णु पुराण, साम्ब पुराण, पद्म पुराण, वायु पुराण, श्रीमद् भागवतपुराण और महाभारत के भूगोल वर्णनों में स्पष्ट और विस्तार से देखने को मिलता है। इसका प्राचीन संदर्भ भविष्य पुराण का भी अति विश्वसनीय प्रमाण है। भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35, श्लोक 20-23) में वर्णन इस प्रकार व्यक्त किया गया है - 
शाकद्वीपो नाम द्वीपो यत्र दिवाकरः स्वयं।
देवपूजनमासीनः सर्वं लोकं प्रकाशयेत्॥
तत्र ब्राह्मण जातीनां बृहस्पतेः सुतेन हि।
प्रतिष्ठापिता वंशाःस्युः यथा ज्योतिष विशारदा:।
शाब्दिक अर्थ:- 
शाकद्वीप नामक द्वीप है, जहाँ सूर्यदेव स्वयं देवपूजन में संलग्न होकर सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं। वहाँ ब्राह्मण जातियाँ बृहस्पति के पुत्र द्वारा स्थापित की गईं, जो ज्योतिष में निपुण हैं।
      इससे यह स्पष्ट होता है कि शाकद्वीप शक आक्रमणकारियों का प्रदेश नहीं था। कुछ इतिहासकार इसे शक कुषाण से जोड़ते हैं । वास्तव में यह सूर्योपासक, ब्राह्मण संस्कृति का केंद्र था, जिसकी स्थापना गुरु बृहस्पति के वंशजों ने की थी। वहां बृहस्पति के आदेश के अनुसार ब्राह्मण वंशजों का वास है, जो ज्योतिष और चिकित्सा के द्वारा लोक कल्याण करते रहे है। 
दिव्य ब्राह्मण :- 
महाभारत काल में इन्हें शाक द्वीप से जम्बू द्वीप लाया गया था। इनमे सूर्य के समान ही तेज था। ये सभी ब्राह्मण मूलतः शाकद्वीप में निवास करते थे तथा योनिज न होने के कारण ये दिव्य कहलाते हैं। ये लोग अग्रणी सूर्योपासक माने जाते हैं। मनुस्मृति के अनुसार सूर्यास्त के पश्चात श्राद्ध कर्म निषेध है, ऐसे में एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण को सूर्य वरण करके श्राद्ध कार्य संपन्न कराया जा सकता है। यह बात उनकी विशिष्टता तथा दिव्यता का सूचक है। ये लोग आध्यात्मिक शास्त्र, तंत्र विद्या, भविष्य ज्योतिष, तथा पुरातन विशिष्ट चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में एकाधिकार प्राप्त थे । भविष्य पुराण आदि में भी इन्हें दिव्य ब्राह्मण के रूप में जाना गया है।
सूर्य भगवान ने भी बुलवाया था :- 
जब भारत में सूर्योपासना की परंपरा मंद हुई, तब सूर्यदेव ने अपने शिष्य सम्भर ऋषि को शाकद्वीप से ब्राह्मण बुलाने का आदेश दिया। ये ब्राह्मण भारत आए और सूर्य मंदिरों के पुजारी बने। उनकी स्थापना कश्यप गोत्रीय सूर्योपासक ब्राह्मणों के रूप में हुई।
       “शाकद्वीपसम्भवाः ब्राह्मणाः 
            सूर्यदेवस्य अर्चकाः।”
(-भविष्य पुराण, सूर्य उपाख्यान)
गोत्र और प्रवर :- 
“शाकद्वीपं ततो यान्ति ब्राह्मणाः सूर्यसेवकाः।
ते कश्यपप्रवराः सर्वे, मन्त्रज्ञाः सर्वकर्मसु॥”
(- भविष्य पुराण, अध्याय २३, सूर्यकाण्ड)
शाकद्वीपीय ब्राह्मण सामान्यतः कश्यप वंशीय माने जाते हैं, परंतु उनके भीतर कश्यप काश्यप, अवत्सार, नैद्रुव सूर्योपासना आदि उपगोत्र भी पाए जाते हैं।
सप्त मर्यादापर्वत :- 
शाकद्वीप में ईशान, उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस नामक सप्त मर्यादापर्वत विद्यमान थे। 
सप्त नद्यः :- 
वहां अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्ठि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति नामक सात नदियाँ थी।
शाक ब्राह्मण जातियाँ :- 
शाकद्वीप की जातियाँ (वर्ण) ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत तथा अनुव्रत के नाम से जानी जाती थी तथा इनके इष्टदेव श्रीहरि को माना गया।
पूर और खाप :- 
भारत के पूर्व और उत्तर में बसे शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का विभक्तिकरण ‘पूर’ के अनुसार हुआ है। कुल पुरों की संख्या हालाकि 72 ही है, लेकिन इनमें कुछ और भी विभक्तिकरण हुए हैं जिससे कि यह संख्या 100 के पार चली गई है । पूर्व और उत्तर में बसे शाकद्वीपीय ब्राह्मणों में पाए जाने वाले आस्यपद (उपाधि) का नाम साधारणतया मिश्र, पाण्डेय, पाठक, पंडित, ओझा, शुक्ल, बाजपेयी, उपाध्याय, शर्मा, गर्ग और भट्ट हैं। पश्चिम में बसे शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का विभक्तिकरण ‘खाप’ के अनुसार हुआ है। कुल मुख्य खापों की संख्या 18 ही है, लेकिन इनमें आगे चलकर कुछ और भी वर्गीकरण हुए हैं जिससे की यह संख्या 20 के पार चली जाती है । पश्चिम में बसे शाकद्वीपीय ब्राह्मणों में पाए जाने वाले आस्यपद (उपाधि) का नाम साधारणतया सेवग, शर्मा, भोजक, कुवेरा, हटीला, कटारिया, मथुरिया, लोधा, जंगला, छापरवाल, बलध, आसिवाल, मुन्धाडा, देवेरा, लल्लड, भरतानी, सांवलेरा, हिरगोला, भीनमाल, मेडतवाल या फिर अबोटी आदि उद्बोधन रहे हैं।
मग और भोजक दो मुख्य शाखाएं :- 
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं, जबकि भोजक ब्राह्मणों का निवास क्षेत्र मूल रूप से राजस्थान तथा गुजरात के भूभाग रहे हैं । मग ब्राह्मणों में पूर का विवरण मिलता है जबकि भोजक ब्राह्मणों में पूर की जगह खाप का बिवरण मिलता है।
प्रमुख उपनाम :- 
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को भोजक, मग ब्राह्मण, सेवग व्यास, याजक, मागी तथा दिव्य ब्राह्मण के नाम से भी जाना जाता है। इनके वर्तमान उपनाम दीक्षित, मिश्र, पाठक, झा, पाण्डेय, भट्ट, ओझा आदि हैं।
शाकद्वीपी ब्राह्मणों की विभूतियाँ :- 
शाकद्वीपीय कुल में कई विद्वान हुए हैं जिनकी विद्वत्ता ने भारत को गौरवान्वित किया है। इन्होंने राजनीति, अध्यात्म, चिकित्सा, तन्त्र, खगोल विज्ञान आदि क्षेत्र में अपनी ख्याति दिखाई। आर्यभट, आचार्य चाणक्य, भारद्वाज आङ्गिरस , बृहस्पत्य वैदिक यज्ञकुशल, भृगु, च्यवन, जमदग्नि अग्नि वराहमिहिर, भास्कराचार्य, कमलाकर भट्ट, बाणभट्ट, शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन, पुष्यमित्र शुंग, श्रीभागवतानंद गुरु, कौटिल्य, विष्णु गुप्त, आचार्य विष्णु शर्मा और तप परंपरा के ऋषि आदि प्रमुख शाकद्वीपीय विद्वान् हुए हैं।
वर्तमान में कहाँ पाए जाते हैं :- 
आज के समय में “शाकद्वीपीय ब्राह्मण” मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में निवास करते हैं- उत्तर भारत में बिहार, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश के सूर्य मंदिर,नेपाल और तराई सूर्यवंशी ब्राह्मण, झारखंड, मध्यप्रदेश। पूर्व भारत में ओडिशा (कोणार्क सूर्य मंदिर), पश्चिम बंगाल। पश्चिम भारत में गुजरात, राजस्थान। माघ उपासकों में से अनेक गया, आरा, उज्जैन, देवघर, कोणार्क, लोढ़ेश्वर जैसे प्राचीन सूर्य मंदिरों के पुरोहित व वंशज हैं।
उपास्य देवता- सूर्य नारायण :- 
इनकी पूजा परंपरा वैदिक सूर्योपासना है, जिसमें “आदित्यहृदय स्तोत्र”, “गायत्री”, “सप्ताश्व रथ सूर्य” प्रमुख हैं।
प्रमुख देव :- 
 मित्र- आदित्य ,सविता ,मार्तण्ड सूर्य , सूर्यनारायण विष्णुरूप भी माने जाते हैं।
आध्यात्मिक धारा- सूर्योपासना, गायत्री मां।
सात्विक कर्मकाण्ड :- 
दिव्य शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का मुख्य पेशा पूजा-पाठ, पठन-पाठन, पुरोहिति, ज्योतिषी, आचार्य, आयुर्वेदिक् चिकित्सा करना था। इसके अलवा इनका काम कर्म काण्ड, तंत्र-मन्त्र सिद्धि तथा गीत-संगीत द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों का कार्य पालन व समापन आदि करना रहा है। इनका मुख्य शास्त्र आदित्य पुराण, सूर्य उपाख्यान, आरण्यक हैं।
त्रिसंस्कार परंपरा :- 
इनकी संस्कार परंपरा वैदिक- स्मार्त मिश्रितऔर वैष्णव प्रभाव से युक्त है।
मगध नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :- 
कालान्तर में मगध नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उप शाखाएँ हैं: भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक= सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है। 
                Raja pratardan 
      काशी के राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन थे, जो एक पराक्रमी योद्धा और राजर्षि थे, जिनका उल्लेख कौशीतकी उपनिषद में मिलता है । वह राजा दशरथ के मित्र थे और उनके अश्वमेध यज्ञ मेंआमंत्रित हुए थे, साथ ही वे रानी सुमित्रा के भाई और दशरथ के बहनोई भी थे। बाद में वे  भगवान राम के भक्त और मित्र भी बने थे। वे राजा दिवोदास (जो स्वयं धन्वंतरि के पौत्र थे) के वंशज थे और उन्होंने अपने पिता के राज्य काशी की रक्षा की थी ।शाम्ब-पुराण अध्याय 38 में लिखा है- 
शाकद्वीपाधिपः पूर्वमासीद्राजा प्रतर्द्दनः।
स सदेहो रविं गन्तुञ्चकमे भूरिदक्षिणः॥
विप्रास्तम् प्राहुरीशानन्न सदेहो गमिष्यसि।
सौरयज्ञं वयं कर्त्तुन्नक्षमाः सर्वकामिकम्॥
तपस्तेपे नृपस्तीव्रं वर्षाणाञ्च शतत्रयम्।
ततः प्रसन्नो भगवानाह भूपं वरार्थिनम्॥
वरं वरय भूपाल, किंतेऽभीष्टं ददामि तत्।
सौरयज्ञं करिष्यामि याजकाः सन्ति नैव मे॥
यस्मिन् कृते मखे यामि सदेहस्त्वां दिवस्पते।
ततः स भगवान् दभ्योक्षणम्मीलितलोचनः॥
सूर्यप्रमा मण्डलतो ब्राह्मणाः सप्ततत्क्षणात्।
आविरासन् ब्रह्मविदो वेदवेदाङ्गपारगाः॥
ततस्तानाह भगवान् विप्रान्यज्ञान्तकर्मणि।
युष्माकं सन्ततिभूमौ यथा स्यादनपायिनी॥
पावनार्थञ्चलोकानान्तथा नीतिर्विधीयताम्।
ततस्ते जनयामासु र्मनसा तनयाञ्छुभान्॥
द्वेद्वे कन्ये सुतौ द्वौ द्वौ तेषां वृद्धिः क्रमादभूत्।।
(अर्थ - पूर्वकाल में प्रतर्द्दन शाकद्वीप का राजा था, उसकी यह कामना हुई कि हम सदेह सूर्य-लोक को चले जायँ। ब्राह्मणों ने उससे कहा कि हम लोग सारी कामनाओं का पूरा करनेवाला सौर यज्ञ नहीं करा सकते। इससे तुम सूर्य-लोक में सदेह न जाओगे। ब्राह्मणों के वचन सुन कर राजा ने 300 वर्ष तक कड़ी तपस्या की। तब सूर्य भगवान् प्रसन्न होकर प्रकट हुये और उनसे बोले हे राजा! जो चाहते हो, माँग लो, हम वही वर देंगे। राजा ने उत्तर दिया कि हम सौर यज्ञ करना चाहते हैं परन्तु हमको कोई यज्ञ कराने वाले नहीं मिलते। सौरयज्ञ कराने का हमारा प्रयोजन यह है कि हम सदेह आप के पास पहुँच जायँ। इस पर सूर्य भगवान् ने आँखें बन्द कर, एक क्षण ध्यान किया और उनके प्रभा-मण्डल से उसी क्षण सात ब्राह्मण प्रकट हुये। सातो ब्रह्म-ज्ञानी और वेद वेदाङ्ग के पारंगत थे। उनको सूर्य भगवान् ने यज्ञ का सम्पूर्ण कर्म बताया और कहने लगे कि तुम लोगों को ऐसा आचरण करना चाहिये जिससे लोकों को पवित्र करने के लिये पृथ्वी तल पर तुम्हारी सन्तान सदा बनी रहे। इस पर उन ब्राह्मणों ने मानस- सन्तान उत्पन्न की। प्रत्येक के दो-दो पुत्र और दो-दो पुत्रियाँ हुई और क्रम से उनकी संसार में वृद्धि होती रही।")
शाकद्वीपियों का भारत में बसने की परम्परा :- 
शाकद्वीपियों के इस देश में आकर बसने का कारण श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र शाम्ब अपने पिता के शाप से कोढ़ी हो गये थे। इस रोग से मुक्त होने का उपाय उनको यही सूझा कि सूर्य नारायण की उपासना करें। इस विचार से उन्होंने देवर्षि नारद से सूर्य नारायण की उपासना की विधि पूछी और उत्तर को चले गये। वहाँ उन्होंने कड़ी तपस्या की और रोग से मुक्त हुये। इधर अयोध्या के राजा बृहद्वल ने देवताओं की आराधना की विधि कुल-गुरु वसिष्ठ से पूछी। वसिष्ठ जी ने उनको सारी विधि बतलाई और नारद के उपदेश से रोग से मुक्त होने का वृतान्त कहा। इन घटनाओं को लेकर वेदव्यास ने शाम्ब पुराण रचा और यह पुराण सौनकादि की प्रार्थना से सूत ने नैमिषारण्य में सुनाया। शाम्ब पुराण में लिखा है कि कुष्ठ रोग से मुक्त होने पर शाम्ब चन्द्र-भागा नदी में स्नान करने के लिये गये। यहाँ उनको सूर्य नारायण की एक प्रतिमा देख पड़ी। शाम्ब सूर्य-देव के भक्त थे ही उन्होंने यह संकल्प किया कि एक मन्दिर बनवा कर मूर्ति की उसमें स्थापना करा दें और एक योग्य ब्राह्मण को पूजा अर्चना के लिये नियत कर दें। ऐसे ब्राह्मण के लिये उन्होंने देवर्षि नारद से पूछा तो नारद ने उत्तर दिया कि इस विषय में तुम्हें सूर्यनारायण की आज्ञा लेनी चाहिये। इस पर शाम्ब फिर सूर्यदेव की तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने उनको दर्शन दिया और बोले कि इस देश में काल पड़ा हुआ है। शाक द्वीप में ऐसा ब्राह्मण मिल जायगा। तुम शाकद्वीप चले जाओ और वहाँ से द्वारका में उस ब्राह्मण को ले आओ। शाम्ब ने द्वारका जाकर श्रीकृष्ण जी से सारा वृत्तान्त कहा और उनकी आज्ञा से गरुड़ पर सवार होकर शाकद्वीप को गये और वहाँ से अट्ठारह ब्राह्मण लाये, जिनके नाम ये हैं:- १ मिहिरांशु, २ शुभाशु, ३ सुधर्म्मा, ४ सुमति, ५ बसु ; ६ श्रुतिकीर्ति, ७ श्रुतायु, ८ भरद्वाज, ९ पराशर, १० कौण्डिन्य, ११ कश्यप, १२ गर्ग, १३ भृगु, १४ भव्यमति, १५ नल, १६ सूर्यदत्त, १७ अर्कदत्त, १८ कौशिक।
मन्दिर का निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा :- 
फिर मन्दिर बनवा कर उस मूत्ति की प्रतिष्ठा की। जब ब्राह्मण लोग प्रतिष्ठा से निवृत्त हुये तो अपने देश को चले। श्रीकृष्ण जी ने उनसे कहा कि कुछ दिन यहाँ और ठहरो। इसके पीछे गरुड़ को आज्ञा दी गई इन ब्राह्मणों को शाक द्वीप पहुँचा दो । गरुड़ ने उन लोगों से यह प्रतिज्ञा करा ली कि जब शाकद्वीप को प्रस्थान करें तो बीच में कहीं न ठहरें। ब्राह्मण लोग 30 वर्ष तक द्वारका में रहे।
शाकद्वीप की स्थिति मध्य एशिया :- 
शाकद्वीप का सम्बन्ध आज के भारत में बसे शाकद्वीपीय ब्राह्मणों से है। कुछ आधुनिक विद्वानों के मतानुशार मध्य एशिया, पहले शकद्वीप के नाम से प्रसिद्ध था। यूनानी इस देश को ‘सीरिया’ कहते थे। उसी मध्य एशिया में रहनेवालों को शाक अथवा शक कहा जाता था। एक समय यहाँ रहने वाले लोग बड़े प्रतापशाली थे। ये लोग अपने आपको देवपुत्र मानते थे।भारत में प्रस्थिपित होने के पश्चात अपने यश और प्रताप के बदौलत इन्होने यहाँ भी अपना दबदबा कायम कर लिया था। इनलोगों ने करीब 200 वर्ष तक भारत में एकछत्र राज्य किया । कनिष्क और हविष्क नाम के इनके बड़े बड़े प्रतापशाली राजा हुए हैं।
शक प्राचीन आर्यों के सम्बन्धी भी रहे :- वैदिक काल में शक प्राचीन आर्यों के सम्बन्धी रहे हैं।भारत में प्रचलित शक संवत जो आज भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है, बहुत प्राचीन है। इसका संबंद्ध इन्ही शको से निकाला जाता है। 78 ई. पूर्व इस संवत को कुषाण राजा कनिष्क ने प्रारम्भ किया था। उन्होंने इसे अपने राज्य आरोहण की तिथि को एक उत्सव के रूप में मानाने तथा इसे यादगार बनाने के लिए शुरू किया था। शक राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने समाप्त कर दिया था लेकिन उनका शक संवत्‌ अभी तक भारतवर्ष में चल रहा है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)




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