तमिनलाडु के एक मन्दिर द्वारा एक स्तम्भ पर कार्तिक मास में वर्ष में एक बार एक दीपक प्रज्ज्वलित किया जाता रहा । यह मन्दिर एक पहाड़ी के बगल में स्थित है। पहाड़ी पर एक दरगाह भी बाद का बना हुआ स्थित है। मन्दिर दरगाह से काफी पुराना है। दरगाह वालों ने वर्ष में एक बार जलाए जाने वाले दीपक को अपने धर्म के खिलाफ बता दिया था। जिस स्तम्भ पर दीपक जलाया जाता है, वह दरगाह से करीब 164 फीट दूर स्थित है। हाईकोर्ट में मुकदमा चला। निर्णय मन्दिर के पक्ष में आया।
दरगाह वालों को खुश करने की मंशा
तमिलनाडु में इस समय दरगाह वालों को खुश करने वालों की सरकार है इसलिए हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद वह दीपक नहीं जलाने दिया गया। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, मगर यह विवाद यही नहीं रुका। डीएमके सरकार चाहती है कि उस जज की नौकरी छीन ली जाए जिसने यह आदेश पारित किया है।
जज को पद से हटाने के लिए महाभियोग
डीएमके ने हाईकोर्ट के उस जज को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला किया जिस पर 100 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर हैं। जिन लोगों ने हस्ताक्षर किया है उनमें कांग्रेस और सपा के भी सांसद शामिल हैं। इतना ही नहीं, याचिका देते समय अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी कनिमोझी के संग अगली कतार में दिख रहे थे।
एंटी हिन्दू पॉलिटिक्स
डीएमके आज भी ब्रिटिश कालीन एंटी- हिन्दू पॉलिटिक्स करती है। इसलिए उसका स्टैण्ड समझ में आता है मगर अखिलेश जी और प्रियंका जी भी क्या यह मान चुके हैं कि जजों को मन्दिर के पक्ष में फैसला देने पर संसद में इमपीच किया जाएगा। तमिलनाडु में उठे इस विवाद को अभी से कुछ पर्यवेक्षक राज्य का अयोध्या मोमेंट बताने लगे हैं। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मंत्री ने जब बाबरी बनाने की घोषणा तब उन्होंने उन्हें पार्टी से निष्कासित करके अपना दामन बचाना चाहा मगर हुमायूँ कबीर के लक्षण देखकर लगता नहीं है कि यह मामला दबने वाला है।
मन्दिरवादी पार्टी को लाभ होगा
अगर ये मामले बढ़े तो इनका सीधा लाभ मन्दिरवादी पार्टी को मिलना तय है। भारत का स्वघोषित लिबरल और प्रोग्रेसिव तबका आज भी ब्रिटिश कालीन एंटी-हिन्दू नरेटिव को आईक्यू मानकर चलता है। यह तबका इस समय चुप्पी साधे हुए है। पश्चिम बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में सत्ता से एक कदम दूर है। तमिलनाडु में बीते लोक सभा चुनाव में भाजपा वोट शेयर के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है।
प्रज्वलित ना कर पाने का आगामी चुनावों पर असर
इन नए संवेदनशील मुद्दों का सम्बन्धित राज्यों की राजनीति पर क्या असर होगा, ये वक्त बताएगा मगर अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी को तैयार रहना चाहिए कि यूपी चुनाव में ये तस्वीर में हर घर घर पहुँचने से कोई रोक नहीं पाएगा। इसका खमियाजा इन दोनों मुख्य विपक्षी दलों को भुगतना ही पड़ेगा।
1400 वर्षों से चल रही परम्परा
थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर के शिखर पर दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलित करने की परंपरा करीब 1400 वर्षों से चल रही है।
कुछ दिन पहले तमिलनाडु में कार्तिगई दीपम उत्सव था जिसमें हिंदुओं को थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर के शिखर पर दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलित करना
था । कोर्ट ने आदेश दे दिया था और सीआईएसएफ की टीम को भक्तों की सुरक्षा के लिए लगाया था। बावजूद डीएमके की पुलिस ने इसे जबरन रुकवा दिया और पहाड़ी के नीचे मंदिर के परिसर में ही दीप जलाने को मजबूर कर दिया।
हिंदुओं ने विरोध किया तो उनपर शक्ति प्रदर्शन करके दबा दिया गया। जिस पर कोर्ट ने भी अवमानना लगाने को लेकर सुनवाई चल रही है। ये वहीं मंदिर है जिसकी पहाड़ी परमुस्लिम पीर की दुहाई देकर पूरे पहाड़ी पर दावा कर रहे थे और बकरीद के टाइम भी विवाद हुआ था।
जिस पर कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पहाड़ी को हिंदू स्थल के रूप में माना क्योंकि हिंदू करीब 1400 वर्षों से वहां आराधना कर रहे है।
भगवान मुरुगन का छठा पवित्र स्थान
इसे भगवान मुरुगन का छठा पवित्र स्थान माना जाता है जो कि शैव धर्म के लोगो के लिए हजारों वर्षों से तपस्या और ध्यान का केंद्र रहा है। भगवान मुरुगन (Murugan), जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद, सुब्रह्मण्य और कुमार भी कहते हैं, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं, और दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु के रक्षक देवता हैं, जो युद्ध, बुद्धि और शक्ति के प्रतीक हैं और मोर पर सवार होकर भाला (वेल) धारण करते हैं, जिन्हें तमिल लोग 'तमीज़ कादुवुल' (तमिलों के देवता) कहते हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीराम ने कहा है कि तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित दरगाह के पास एक पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगई दीपम (दीपक) को जलाने को लेकर जिले के अधिकारियों द्वारा जताई जा रही सार्वजनिक अव्यवस्था उत्पन्न होने की आशंका ‘निराधार’ है और इसका उद्देश्य तमिल संस्कृति को बाधित करना है। श्रीराम ने कहा कि जब राज्य अपने अधिकारों को लागू करने के लिए ‘अनिच्छुक’ है, तो जनता उन्हें लागू करवाने की मांग कर सकती है।
उन्होंने कार्तिगई दीपम उत्सव पर ‘दीपाथून’ (पत्थर का स्तंभ) पर दीपक जलाने की अनुमति देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध अपील का विरोध कर रहे श्रद्धालुओं की ओर से अपनी दलील पेश की।
न्यायमूर्ति जी जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के के रामकृष्णन की खंडपीठ ने, न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन के एक दिसंबर के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों के एक समूह पर 17 दिसंबर 2025 को चौथे दिन सुनवाई करते हुए, यह जानना चाहा कि क्या श्रद्धालु बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अधिवक्ता ने इनकार कर दिया।
इस मामले में अपीलकर्ता राज्य, दरगाह, वक्फ बोर्ड, मदुरै जिला और मंदिर के अधिकारियों ने 16 दिसंबर को अपनी दलीलें पूरी कीं, जो लगातार तीन दिनों तक चली थी। श्रीराम ने दलील दी कि श्रद्धालुओं के पूजा-पाठ के अधिकार का स्वरूप वक्फ बोर्ड और एएसआई के अधिनियम के बीच विवाद और अंत:क्रिया का विषय बन गया है।
श्रीराम ने कहा, ‘‘सार्वजनिक व्यवस्था की दलील जिला प्रशासन की ओर से दी जा रही है, जिसने एकल न्यायाधीश (न्यायमूर्ति स्वामीनाथन) के समक्ष अपनी शिकायतें नहीं रखी हैं। सार्वजनिक व्यवस्था की दलील देना कोई बहाना या बचाव नहीं है, न ही जांच से बचने का कोई जरिया है।’’
जब उन्होंने कहा कि अधिकारी कह रहे हैं कि धार्मिक अधिकार को सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन रखा जाना चाहिए, तो न्यायमूर्ति जयचंद्रन ने कहा, ‘‘दीपक न जलाने के लिए कहकर वे कैसे हस्तक्षेप कर रहे हैं? सार्वजनिक व्यवस्था का तर्क भी अतिरंजित है, और आपका तर्क भी।’’
श्रीराम ने जोर देकर कहा कि दीपक जलाना एक हिंदू धार्मिक प्रथा है, लेकिन अधिकारियों ने यह कहकर इसका खंडन करने की कोशिश की कि किसी विशेष स्थान पर पूजा करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत अधिकार नहीं है।
श्रीराम ने कहा, ‘‘मेरे मामले में, अधिकारियों की सोच संकीर्ण है और उनका झुकाव दूसरी तरफ है। मैं उस समुदाय का नाम नहीं लेना चाहता। दीपक जलाना और पूजा करना तमिल संस्कृति का हिस्सा है। इसे केवल सार्वजनिक अव्यवस्था की निराधार चिंताओं के आधार पर बाधित करने की कोशिश की जा रही है।’’
No comments:
Post a Comment