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Sunday, April 12, 2026

रामजी के ही सहचर- सखी सखाओं का रामसखा सम्प्रदाय---- डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

              (राम सखा बगिया अयोध्या)
            ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। 
           भए समर सागर कहँ बेरे।। 
            मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। 
            भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
                   (राम चरित मानस)
 अपने सहचर सखाओं की प्रशंसा करते हुए श्रीराम गुरुदेव वशिष्ठ से उक्त बचन कहे थे। भक्तमाल के बीसवें छ्न्द में नाभादास ने राम के विशाल सहचर वर्ग को गिनाया है। इसके अलावा अन्यानेक सहचर , बीरों और भक्तों के नाम भी मिलते हैं। कुछ की कुछ - कुछ सूचनाएं भी मिलती है और कुछ का केवल नाम ही मिलते हैं। ये सब सखा किसी ना किसी देवी या देव के अंश से या अर्जित किए हुए कृपा या महान पुण्यों के फल स्वरूप उत्पन्न हुए थे। ब्रह्मा जी के आदेश से इन लोगों ने बानर , रीछ और भक्त गण का शरीर रामकाज के लिए धारण किया था। इनमें अथाह पौरुष और बल था। भगवान इन सबको अपना सखा मानते थे। रावण की मृत्यु के बाद उनके अनुचर सखा गण को रामजी ने आभार सहित अपने - अपने धाम को जाने को कहा था , पर कोई नहीं वापस गया। सभी राम जी के वनवास से वापस आने के अवसर पर सजी- धजी अयोध्या देखने आ गए थे। 
         कंचन कलस बिचित्र संवारे। 
          सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥ 
           बंदनवार पताका केतू। 
           सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। 
        छः माह तक उन सब की खूब आव - भगत अयोध्या में होती रही। उन्हें उपहार, वस्त्र और आभूषण देकर विदा किया गया।वे राम की छवि अपने हृदय में बसाकर लौट गए ,परंतु कई वीर सखा स्थाई रूप से अयोध्या वासी हो गए। जब रामजी बैकुंठ जा रहे थे तो अपने इन सखा वीरों को रामकोट , अयोध्या और भी मंडल की रखवाली का दायित्व भी दे दिया था।
        श्री रुद्रयामलोक्त अयोध्या महात्म्य के अध्याय 6 श्लोक 30 से 46 के मध्य रामकोट की सुरक्षा में लगे सभी वीरों और सखाओं के स्थान के बारे में विस्तार से जानकारी दिया गया है। इनमे अनेक स्थल तो राम जन्म भूमि न्यास के अधिग्रहण क्षेत्र की सीमा में आते हैं। कुछ को तो न्यास अपनी नई संरचना में स्थान भी दे रहा है। इस सब के अलावा भक्ति भाव में अनेक सन्त और महात्मा प्रभु से समीपता प्राप्त कर भगवान की सखा और सभी भाव से आराधना साधना और पूजा की थी। जिसके उपरान्त सखा और सखी भाव की भक्ति का संचार हुआ था। अयोध्या में अष्ट राम तथा अष्ट जानकी जी सखियों के नाम को आत्मसात करती हुई अनेक मंदिरों की संरचना व अराधना हो रही है।        
सखी- सखा सम्प्रदाय का विस्तार:-
'सखी या सखा भाव का सम्प्रदाय' 'निम्बार्क मत' की एक शाखा है। इस संप्रदाय में भगवान श्रीकृष्ण या राम की उपासना सखी- सखा भाव से की जाती है। कवि नाभादास जी ने अपने 'भक्तमाल' में कहा है कि- "सखी सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण की उपासना और आराधना की लीलाओं का अवलोकन साधक सखीभाव से कहता है। इस संप्रदाय के प्रसिद्द मंदिर वृंदावन मथुरा में श्री बांके बिहारी जी, निधिवन, राधा वल्लभ और प्रेम मंदिर आदि हैं। इसमें माधुर्य भक्ति और प्रेम भक्ति की जाती है ।वृन्दावन और अयोध्या दोनों स्थानों पर प्रेमलक्षणा और राधा भाव का इतना व्यापक प्रभाव किसी काल में पहुँचा था कि राम और सीता को राधा-कृष्ण की छाया में ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया गया और उसी शैली में काव्य-रचना होने लगी। 
 राम-काव्य के सुधी विद्वान् भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। फादर डॉ. कामिल बुल्के भी श्रृंगारी राम-काव्यों के संविधान में- भाव, साधना और शैली- सभी दृष्टियों से श्रृंगारिक कृष्ण काव्य-साधना के प्रभाव को स्वीकार करते हैं। वे हिन्दी साहित्य कोश में लिखते हैं- इस भक्ति पर कृष्ण-राधा संबंध साहित्य का प्रभाव भी पड़ा और बाद में उत्तरोत्तर बढ़ने लगा । रामभक्ति प्रधानतया दास्यभाव की न रह कर कुछ सम्प्रदायों में मधुरोपासना में परिणत हुई। अनुसन्धायकों के अतिरिक्त साहित्य के इतिहासकारों ने भी इस तथ्य को लक्ष्य किया है। आचार्य शुक्ल इनमें अग्रगण्य है। उनके अतिरिक्त आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपने इतिहास में इस धारणा की स्पष्ट-घोषणा की है। तदनुसार- 17वीं शताब्दी के बाद भक्ति-साहित्य में सखी-भाव की साधना का प्राधान्य हो गया। इसका प्रभाव रामभक्ति शाखा पर भी पड़ा है। वृन्दावन की भाँति अयोध्या भी सखी सम्प्रदाय के भक्तों का केन्द्र बन गई। राम जी के अभिन्न सहचर सखाओं ने भी राम सखा संप्रदाय की स्थापना करके अपने प्रभु से जुड़ने और उनकी भक्ति को और गहरी बनाने का उपक्रम किया है। राधा कृष्ण की भांति सीताराम की उपासना में सखी भाव में उपासना होती है। स्वामी रामानन्द जी, गोस्वामी तुलसी दास जी, कवि नाभा दास जी और कवि अग्रदास जी इस कड़ी को आगे बढ़ाए हैं। इस माधुर्य उपासना में सखी भाव प्रिया - प्रियतम के प्रेम मिलन के भाव से पूजा और आराधना की जाती है। कन्हैया कभी अपने दोस्त को पीठ पर लाद लेते हैं तो कभी दोस्त के पीठ पर बैठ लेते थे। कभी गेंद के लिए तो कभी फलादि के लिए लड़ते क्रीड़ा करते देखे गए हैं। इसी तरह सीताराम जी की उपासना में भगवान के चारो भाई, हनुमान जी ,भगवान शिव शंकर और भक्त व मित्र का बराबर बराबर का भाव देखने को मिलता है। 
पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
श्रीमद् सखेंद्र जी निध्याचार्य जी महराज का जन्म विक्रम संवत के आखिरी चरण चैत्र शुक्ल में राम नवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने श्री वशिष्ठ मुनि से गुरु दीक्षा प्राप्त की। राजस्थान में गलिता के आचार्य ने उन्हें रामसखा की उपाधि दी थी। वे दक्षिण के उडीपि कर्नाटक में गये जहां बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा की थी। उनका निवास नृत्य राघव कुंज के नाम से प्रसिद्व हुआ था । सखेंद्र जी महाराज को जब लगा कि भगवान राम ने उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में स्वीकार कर लिया है। उसी क्षण महाराज जी ने घर छोड़ दिया और विराट वैष्णव बन गए। उनकी जन्मस्थली होने के कारण वे जयपुर छोड़कर अयोध्या पुरी चले गए। अयोध्या आकर उन्होंने सरयू नदी के तट के अलावा एक पर्णकुटी में भगवान को याद करने के लिए जीवन बिताया। राम सखेंदु जी महाराज ने अठारहवीं संवत में राम सखा सम्प्रदाय की स्थापना की थी। सखी सम्प्रदाय तो सनातन काल से ही राम सखा ,राम सखी ,सीता सखी ,कृष्ण सखा ,कृष्ण सखी और राधा सखी आदि विविध रुपों में पुराणों व भक्ति साहित्य में पाया जाता रहा है। राम सखा जी के शिष्य गुरु की तरह निध्याचार्य उप नाम प्रयुक्त करने लगे थे। शील निधि सुशील निधि और विचित्र निधि उनके परम शिष्य थे।
          श्रीमद् सखेंद्र जी महाराज ने माध्य संप्रदाय के आचार्य श्री वशिष्ठ तीर्थ से गुरु दीक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने लिखा है -   
       "मध्य माध्य निज द्वैत मन मिलन द्वार हनुमान।
        राम सखे विद सम्पदा उडुपी गुरु स्थान।।"
रामसखा जी का अयोध्या में आगमन:-
अयोध्या आकर राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे। 

राम सखे जी (अवध वासी) के बारे मे दृष्टांत :- 
दोहाः- 
तन मन प्रेम से भाव मम, हरि हमरे हैं मीत।
एक दिवस हरि मिलि गये उर लगाय कह्यौ मीत।१। 
अन्त समय हरि धाम को गयों हर्षि चढि यान। 
राम सखे कहैं बचन मम, सत्य लीजिये मान।२। 
(सन्दर्भ:श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' लेखक: परमहंस राम मंगल दास जी।(भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ग्रन्थ - 1,भाग - २, दिसम्बर २००१ )

चित्रकूट में आगमन:-
अयोध्या में बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"
उचेहरा में अस्थाई प्रवास :-
कुछ महात्मा यह भी बताते हैं कि महाराज जी के एक शिष्य उनके साथ रहे। चित्रकूट में रहने के बाद महाराज जी उचेहरा (अब सतना जिला) में गए, उन्हें वहाँ बहुत अच्छा नहीं लगा और संवत 1831में मैहर चले गए।
मैहर में तपोसाधना :-
श्री राम सखा जू महाराज, हिंदू धर्म के माधव संप्रदाय के प्रतिपादक और अनुयायी थे, लगभग दो सौ साल पहले जयपुर से मैहर आए । मैहर आकार वह नीलमती गंगा के तट पर उन्होंने एक पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया। मैहर में एक मठ की स्थापना की, जिसे "श्री राम सखेंद्र जू का अखाड़ा" कहा जाता है। श्री सुखेन्द्र निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि बड़ा अखाड़े के रूप में मैहर में बहुत लोकप्रिय है । यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। बड़ा अखाड़ा में मंदिर और आश्रम दोनो देखने के लिए मिल जाता है। यहां पर शिव भगवान जी की बहुत बड़ा शिवलिंग मंदिर के छत पर बना हुआ है, जो बहुत ही सुंदर लगता है। इसके अलावा मंदिर के अन्दर में 108 शिवलिंग विराजमान है। यहां पर एक प्राचीन कुआं भी है। यहां पर राम जी का मंदिर, गणेश जी का मंदिर और हनुमान जी का मंदिर भी हैं। आश्रम का प्रवेश द्वार बहुत ही खूबसूरत है। आश्रम के प्रवेश द्वार में हनुमान जी और शंकर जी की प्रतिमा बनी है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। इस आश्रम के अंदर बगीचा भी है। यहां पर बहुत सारे ब्राह्मण विद्यार्थी रहते हैं, जिन्हें यहां पर शिक्षा दीक्षा दी जाती है। महाराज जी ने उन्नीसवीं संवत के प्रथम चरण यानी 1842 में मैहर में अमरता प्राप्त की। उनकी समाधि मैहर में ही है । यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। 
              रामसखा बड़ा अखाड़ा मैहर के परमपूज्य श्री श्री 1008 श्री सीताबल्लभ शरणजू महराज जी राम सुखेंद्र जू महराज की तपोभूमि (अखाड़े का ही भाग) है। श्री 1008 सुखेन्द्र निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि (देवी रोड) बहुत ही सिद्ध पीठ है।            श्री1008 श्री सीता शरण जी महाराज 
इस समय श्री श्री1008 श्री सीता शरण जी महाराज इस पीठ के स्वामी हैं।
राम नगरी अयोध्या में विशाल प्रयोग:-
राम नगरी अयोध्या में 11,000 से ज्यादा मंदिर हैं, पूरे विश्व में यह एक ऐसा स्थान है जहां इतनी बड़ी संख्या में मंदिर है. धर्म नगरी अयोध्या भगवान राम की जन्म स्थली के रूप में जानी जाती है. भगवान विष्णु के ही दूसरे अवतार कृष्ण का नाम पहले लिया जाता है। रासलीला, गोपलीला, राधा प्रेम जैसी कई कथाएं कृष्ण से सम्बन्धित हैं.     
सिर पर चुनरी डालकर उपासना :-
अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर से कुछ दूर कनक भवन स्थित है . रसिक संप्रदाय के लोग यहां सिर पर चुनरी डालकर भगवान की आरती करते हैं और राम संकीर्तन में खो जाते हैं. वह खुद का संबंध सीता से जोड़ते हैं और श्रीराम को दूल्हा मानते हैं।
श्रीराम दूल्हे के रूप में पूज्य:-
मान्यता है कि जब मिथिला में श्रीराम-सीता का विवाह हुआ तब उसके बाद उनकी सखियों ने विवाह ही नहीं किया. उन्हें इस युगल को देखकर ही जीवन का सारा ज्ञान मिल गया. उन्होंने वरदान मांगा कि हमारा जब भी जन्म हो, राम-सीता की भक्ति में ही जीवन कटे और हम अधिक से अधिक उनके निकट रहें. बिहार में सीतामढ़ी, जनकपुरी, दरभंगा, मैथिल आदि इलाकों में आज भी श्रीराम और यहां तक कि अयोध्या के हर वासी को वे पाहुन (ससुराल से आया अतिथि) मानते हैं. वह उन्हें दूल्हा ही मानते हैं. 
त्रेतायुग से रामरसिकों की सानिध्यता:-
राम रसिकों की मौजूदगी त्रेतायुग से ही है. अहिल्या और शबरी श्रीराम की नवधा भक्ति में समर्पित महिलाएं थीं. 
 एक खास बात ये भी है कि राम रसिक होने के बाद स्त्री-पुरुष का भेद मिट जाता है, सिर्फ आत्मा रह जाती है, जो किसी देह से बंधी सी है.
खाकी बाबा प्रिया अली सहचरी भाव पाये :-
श्री रूपकला जी (अयोध्या के सिद्ध संत) के साथ खाकी बाबा की मित्रता थी । जब कभी अयोध्या आते तो उनसे मिलते और श्री रामकथा सुनकर उसका आनंद लेते । एक दिन रात्रि मे वही विश्राम किया । रात्रि मे श्री रूपकला जी को विरह हुआ तो उनके मुख से आर्त वाणी से निकलने लगा - हे प्रियतम ! हे प्राणनाथ ! हे किशोरी जू । इस तरह कहकर रोने लगे । 
        खाकी बाबा ने उनको डांटा और कहा कि यह क्या प्रियतम और प्यारे प्यारे कहकर रोते रहते हो ? रूपकला जी ने खाकी बाबा से कहा - खाकी बाबा ! श्री अवध आये हो तो आपको एक बार श्री श्री लक्ष्मण शरण जी का दर्शन करना चाहिए । श्री रूपकला जी के कहने पर खाकी बाबा उन रसिक संत श्री श्री लक्ष्मण शरण जी का दर्शन करने गए । जब खाकी बाबा दर्शन करने गए तब बाबा जी चारपाई पर लेटे थे । श्री लक्ष्मण शरण जी ने खाकी बाबा से कहा की थोड़ा समय रुके रहो । जब सब लोग चले गए तब खाकी बाबा को अपने पास बुलाया । खाकी बाबा ने जैसे ही पास जाकर अपने गुरु के चरणों का स्पर्श किया तो देखा की उनके शरीर का अंग प्रत्यंग बदल गया । उनका शरीर एक अतिसुंदर तरुणी के शरीर मे बदल गया । सामने जो रसिक संत लेटे है उनको भी एक सुंदर युवती के रूप मे देखा । कुछ क्षणों मे वह दृश्य चला गया । खाकी बाबा वहां से भागे ।रूपकला जी के पास आकर बोले -  उसके चरण छूते ही मै एक युवती बन गया और वह बाबा खुद भी एक युवती बन गया । 
       रूपकला जी ने कहा - आप पर श्री किशोरी जी की कृपा हो गयी । आपको संत ने श्री किशोरी जी की सहचरियों मे सम्मिलित कर लिया । आप अपने स्वरूप को पहचानो, आज से आप तो प्रिया अली हो गए।  गुरुदेव द्वारा प्रदत्त नाम सीताराम दास, दुनिया के लिए खाकी बाबा और अंतरंग उपासना मे प्रिया अली हो गया । उसके बाद धीरे धीरे रसिक संतो एक संग व सेवा करते करते उनको माधुर्य उपासना की प्राप्ति हुई । 
अयोध्या के लक्ष्मण किले में राम रसिकों की मौजूदगी:-
आचार्य पीठ लक्ष्मण किला रसिक उपासना का सबसे प्राचीन पीठ है. आचार्य जीवाराम के शिष्य स्वामी युगलानन्य शरण की तपोस्थली पर इस मंदिर को साल 1865 में रीवा स्टेट के दीवान दीनबंधु के विशेष आग्रह के बाद बनवाया गया था. यहां वह सिर्फ सीता के पति हैं, सखियों के जीजा हैं और जगत के स्वामी हैं. उनकी उपासना में श्रृंगार का भाव प्रमुख हैं. राम रसिक सिर्फ राम की भक्ति नहीं करते हैं, बल्कि राम से भक्ति में रचा-बसा प्रेम करते हैं. रसिक उपासना के संत यहां भगवान राम की उपासना दूल्हे के रूप करते हैं. मंदिर में विवाह के पदों का गायन होता है.
अयोध्या मां सीता की भी नगरी:-
रामनगरी वस्तुत: श्रीराम के साथ मां सीता की भी नगरी है. श्रीराम और मां सीता में अभिन्नता प्रतिपादित है. यह शास्त्रीय तथ्य रामनगरी में पूरी प्रामाणिकता और पूर्णता के साथ प्रवाहमान है. रामजन्मभूमि पर विराजे रामलला को छोड़कर बाकी के सभी मंदिरों में श्रीराम के साथ मां जानकी का भी विग्रह अनिवार्य रूप से स्थापित है. वैष्णव परंपरा की दो मुख्यधारा रामानुज एवं रामानंद संप्रदाय में सीता आद्या-परात्परा एवं अखिल ब्रह्मांड नायक सृष्टि नियंता श्रीराम की सहचरी के रूप में समान रूप से स्वीकृत-शिरोधार्य हैं.गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि सीता उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री शक्ति है. वैष्णव मतावलंबी संतों की यह आम धारणा है कि श्रीराम करुणा के साथ न्याय और कर्म के आधार पर फल देने वाले हैं, जबकि मां जानकी अतीव करुणामयी हैं और वे पीड़ित मानवता पर अहेतुक कृपा करती हैं. रामानंद संप्रदाय की उपधारा रसिक उपासना परंपरा में तो मां सीता श्रीराम की चिर सहचरी के साथ जीव मात्र की आदि गुरु और मार्गदर्शिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं.मान्यता है कि भक्तों की पुकार वही श्री राम तक पहुंचाती हैं और श्रीराम की कृपा भी उनके ही माध्यम से भक्तों पर बरसती है.
अयोध्या का रंग महल में माता सीता की सखी भाव:-
अयोध्या के मंदिरों में से एक पवित्र मंदिर रंगमहल भी है। यह सैकड़ों वर्ष पुरानी मंदिर है जहां की उपासना बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान श्रीराम की जन्म स्थली से सटे रंगमहल की पौराणिकता अत्यंत अद्भुत है श्री राम जन्मभूमि में जहां श्री राम की उपासना होती है वही राम जन्मभूमि के बगल स्थित रंगमहल में माता सीता की उपासना होती है, इस मंदिर के संत अपने आपको सीता जी की सखी मानते हैं.
बड़ा स्थान जानकीघाट :- 
बड़ा स्थान जानकीघाट मन्दिर रसिक उपासना का केन्द्र
रसिक उपासना की मूलपीठ श्री स्वामी करुणा सिंधु मेमोरियल चैरिटेबल सेवा संस्थान द्वारा संचालित श्री जानकीघाट बड़ा स्थान है. परमार्थ सेवा की यह सिद्ध स्थली है. यह अयोध्या की अति प्राचीनतम मन्दिर है. जहा पर हर वर्ष विविध धार्मिक आयोजनों के साथ ही जन मानस व राम भक्तो की सेवा सतत चलती ही रहती है.
अष्ट रामसखा तथा अष्ट जानकी सखी: कनक भवन :-
कनक भवन के अष्ट सखी कुुन्ज में शय्या पर भगवान शयन करते हैं। इस कुन्ज के चारों ओर आठ सखियों के कुंज हैं। श्री चारुशीला जी, श्री क्षेमा जी, श्री हेमा जी, श्री वरारोहा जी, श्री लक्ष्मणा जी, श्री सुलोचना जी, श्री पद्मगंधा जी, श्री सुभगा जी । इन आठ सखियों के प्राचीन चित्र बने हुए हैं। इनके अतिरिक्त सीताजी की आठ सखियाँ और हैं जो श्री सीताजी की अष्टसखी कही जाती हैं उनमें श्री चन्द्र कला जी, श्री प्रसाद जी, श्री विमला जी, मदनकला जी, श्री विश्वमोहिनी, श्री उर्मिला जी , श्री चम्पाकला जी, श्री रूपकला जी हैं। इन श्री सीताजी की सखियों को अत्यन्त अन्तरंग कहा जाता है। ये श्री किशोरी जी की अंगजा हैं। ये प्रिया प्रियतम की सख्यता में लवलीन रहती हैं। 
रंगमहल अयोध्या ;-
अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया। विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे। और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली खेली थी। तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ। सखी सम्प्रदाय का मंदिर होने से इस स्थान का महत्व अत्यंत वृहद और दर्शनीय हो जाता है । यहाँ नित्य भगवान राम को शयन करते समय पुजारी सखी का रूप धारण करती हैं, भगवान को सुलाने के लिए ये सखियाँ लोरी सुनाती हैं, और उनके साथ रास करती हैं।
हनुमत् निवास मंदिर:-
अयोध्या में रसिक उपासना परम्परा से जुड़े हनुमत् उपासना के प्रमुख केन्द्र हनुमत् निवास मंदिर है। सौ वर्षों से भी अधिक पुराने इस धर्म स्थान की हनुमत् उपासना के क्षेत्र में विशिष्ट परम्परा रही है। कहा जाता है की गोमती शरण जी महाराज को हनुमानजी का साक्षात्कार हुआ था। चित्रकूट में कठिन साधना के पश्चात ईश्वरीय प्रेरणा से रसिक परम्परा की केन्द्रीय पीठ लक्ष्मण किला के इस स्थान पर स्थित गौशाला को ही उन्होंने अपनी साधना स्थली बना लिया था। 
पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
अयोध्या में श्रावण कुंज, नृत्य राघव कुंज , सियाराम केलि कुंज ,चार शिला कुंज , राम सखा जू महाराज और राम सखा बगिया आदि पाच प्रमुख मंदिर इस सम्प्रदाय के हैं।प्रतीत होता है कि अयोध्या मैहर चित्रकूट पुष्कर उडुपि तथा सतना आदि के सभी मंदिर एक ही परमेश्वर व नियंत्रण के अधीन दीर्घ समय तक रहे। बाद में सुविध तथा दुर्गमता के कारण सभी स्वतंत्र नियंत्रण मे चले गये।
नृत्य राघव कुंज :-
नृत्य राघव कुंज मणिराम छावनी के निकट बासुदेव घाट अयोध्या एक प्राचीन मंदिर है।राम सखा की दूसरी गद्दी बनी। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। यही प्रथम गुरु का प्रथम निवास था। इसका निर्माण मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। आजादी के बाद तक वहां से मंदिर की व्यवस्था के लिए खर्चा आता था। अब पुराना मंदिर जीर्ण हो गया है और न मंदिर पुष्कर के महंत के अधीन चला गया है।
श्रावण कुंज अयोध्या :-
 श्रावण कुंज अयोध्या के नया घाट पर स्थित है। मान्यता के अनुसार गोस्वामी तुलसी दास जी ने यही रामचरित मानस के बालकंड की रचना की थी। यह प्रति महंत छवि किशोर शरण के संरक्षण में थी। इस पर 1661 वैशाख सुदी 6 बुधवार छपा है। तुलसीदास जी मानस के रचना अयोध्या में ही शुरू किए थे। वे बहुत दिनों तक अयोध्या में रहे। (हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : डा.राम कुमार वर्मा पृ. 416)। वर्तमान में इस पीठ की देख रेख साध्वी राजेश्वरी देवी द्वारा हो रही है ।इसके अधीन एक मातृ आश्रम भी चल रहा है।
राम सखा बगिया :-
राम सखा बगिया रानी बाग में एक विस्तृत भूभाग में स्थित है। इसका निर्माण भी मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। आजादी के बाद तक वहां से मंदिर की व्यवस्था के लिए खर्चा आता था।
 श्री अवध किशोर शरण मिश्र राम सखा बगिया अयोध्या 
राम सखा मंदिर रानी बाग अयोध्या के वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर मिश्र ने मंदिर की परम्परा के बारे में बताया कि अयोध्या के कुल पाच मंदिर एक ही महन्थ जी के संरक्षण में पूजा अर्चनाकरते आ रहें थे। प्रथम गुरु श्रीमद् राम सखेन्द्र जू महराज थे। द्वितीय का नाम सुशील निधि जी महराज रहे है। तृतीय महराज श्री शील निधि जू महराज थे। चतुर्थ श्री अवध शरण जू महराज तथा पंचम श्री रामभुवन शरण जू महराज रहे। षष्टम श्री कामता शरण जू महराज तथा सप्तम श्री रामेश्वर शरण जू महराज रहे।अष्टम महराज के रुप में वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर शरण जी है।इस परम्परा में मुस्लिम धर्म से सनातन धर्म में आये दो सन्तों ने कुछ समय तक इस परम्परा के प्रधान की भूमिका निभाई थी। इनके नाम श्री शीलनिधि महराज तथा श्री सुशील निधि महराज रहा। राम सखेन्दु जू महराज से लेकर कामता शरण महराज तक की परम्परा अखिल भारतीय स्तर पर प्रायः मिलती जुलती है । 
जानकी सखी मन्दिर:-
यह मंदिर पंजाबी आश्रम बक्सरिया टोला तुलसी नगर अयोध्या में मत गजेंद्र चौराहे से तुलसी बालिका विद्यालय होते हुए गोला घाट जाने वाले रोड पर स्थित है। तुलसी उद्यान से बगल के रास्ते से भी इस मंदिर में पहुंचा जा सकता है।
सियावर केलि कुंज :-
सियावर केलि कुंज नागेश्वरनाथ मंदिर के पीछे तथा अम्मा जी मंदिर के बगल तथा तुलसी बालिका इन्टर कालेज के पास स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। 
राम सखी मंदिर :-
राम सखी मंदिर निकट लक्ष्मण किला चौराहा गोलाघाट 
राम सखी मंदिर गोला घाट महंथ सिया राम शरण जी हैं।
चारू शिला मंदिर,जानकीघाट :-
चार शिला कुंज जानकी घाट अयोध्या में स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। चारूशिला मंदिर के जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी वल्लभाचार्य जी हैं। चारूशीला राम जी की सखी थी।
प्रथम चारुशीला सुभग, गान कला सुप्रबीन।
युगल केलि रचना रसिक, रास रहिस रस लीन।। 1।।
अर्थात-श्री चारुशीलजी, युगल सरकार की क्रीड़ा के लिये प्रबन्ध करती हैं। आप गान-कला की आचार्य हैं। अखिल ब्रह्माण्ड के देवी-देवता, जो गानविद्या-प्रिय हैं, गन्धर्व आदि उन सबकी अधिष्ठात्री देवी आप हैं। सृष्टि के वाणी आदि कार्य सब आपके आधीन हैं। आप युगल सरकार के ‘
विधान-रचना’ विभाग की प्रधानमंत्री हैं।
नौ खण्डीय रामसखा आश्रम पुष्कर :-
राजस्थान के पुष्कर में राम सखा आश्रम में आज भी इस सम्प्रदाय के लोग पूजा आराधना करते है । पुष्करके प्राचीन रामसखा आश्रम एवं नवखंडी हनुमान मंदिर के महंत तथा पुष्कर षड़दर्शन साधू समाज के अध्यक्ष रामस्वरूप शरण महाराज ,महंत सियाशरण महराज, सचिदानंद महाराज,रामस्वरूप शरण महाराज आदि परम तत्व मे विलीन हो चुके हैं। वर्तमान महंत नंदराम शरण महाराज सत्ता सीन है। यह मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
पीताम्बर गाल किशनगढ़:-
यह धार्मिक स्थल भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस जगह का नाम एक पीताम्बर नामक सिद्ध तपस्वी के द्वारा यहां तप करने और उनकी तपोस्थली रही इस जगह का नाम उनके नाम पर ही पीताम्बर पड़ा। पिताम्बर गाल सिलोरा के संचालक श्री 108 रामस्वरूप शरण जी महाराज के कृपापात्र शिष्य नौ खण्डीय रामसखा आश्रम पुष्कर के महंथ श्री नंदकिशोर शरण जी महाराज है, 
चित्रकूट में रामसखा आश्रम :-
रामसखा आश्रम जानकी कुण्ड चित्रकूट के , महंत मतंग ऋषि। हैं।.(रामसखा जानकी मंदिर) चित्रकूट के महंथ सचिदानंद जी हैं। ये मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
शहडोल एम पी में रामसखा आश्रम:-
राम सखा आश्रम कल्याणपुर पाली शहडोल एम पी में है।
यह मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
 

अनेक संप्रदाय और तीर्थ धामों में प्रस्फुटित हुआ राम सखा संप्रदाय✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

                         मधवाचार्य जी
माध्व वैष्णव( ब्रह्म) सम्प्रदाय द्वारा अनुप्राणित:-
राम सखा संप्रदाय, मूलतः ' माध्व वैष्णव( ब्रह्म) सम्प्रदाय' की एक शाखा है, जो एक संगठित समूह में नहीं बल्कि बिखरे स्वरूप में मिलता है। इसके अलावा रामानंद संप्रदाय से भी इसका लिंक मिलता है। संत राम सखे राम सखा संप्रदाय के संस्थापक रहे हैं । माधव सम्प्रदाय के संस्थापक मध्वाचार्य जी थे। जिसे भगवान नारायण की आज्ञा से वायु देव ने भक्ति सिद्धांत की रक्षा के लिए मंगलूर के वेलालि गांव में माघ शुक्ल सप्तमी संवत 1295 विक्रमी को अवतरित कराया था। माधवाचार्य ने अपने शिष्य पद्मनाभ तीर्थ (प्राप्त सिद्धि 1317-- 1324) के साथ तुलुनाडु क्षेत्र के बाहर तत्त्व वाद(द्वैत) का प्रसार करने के एक मठ की स्थापना की। वे द्वैत दार्शनिक और विद्वान थे । उनके शिष्य नरहरि तीर्थ , माधव तीर्थ और अक्षरोभ तीर्थ इस मठ के उत्तराधिकारी बने। 
           जयतीर्थ जी
    अक्षोभ तीर्थ के शिष्य श्री जयतीर्थ ( सी. 1345 - सी. 1388 ) एक हिंदूवादी, द्वंद्वात्मकतावादी, नीतिशास्त्री और माधवाचार्य पीठ के छठे पुजारी थे। माधवाचार्य के कार्यों की उनकी ध्वनि व्याख्या के कारण उन्हें द्वैत विचारधारा के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संतों में से एक माना जाता है । द्वैत ग्रंथों पर विस्तार करने के उनके अग्रणी प्रयासों को 14 वीं शताब्दी के दार्शनिक जयतीर्थ ने आगे बढ़ाया ।
उत्तरादि मठ की प्रबलता :-
माधवाचार्य द्वारा स्थापित अष्ट मठों में मुख्य मठ उत्तरादि मठ का प्रमुख तुलुनाडु क्षेत्र के बाहर द्वैत वेदांत ( तत्ववदा ) को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए पद्मनाभ तीर्थ नाम पड़ा है। उत्तरादि मठ तीन प्रमुख द्वैत मठों या मठात्रय में से एक है, जो जयतीर्थ के माध्यम से पद्मनाभ तीर्थ के वंश में माधवाचार्य के वंशज हैं । जयतीर्थ और विद्याधिराज तीर्थ के बाद, उत्तरादि मठ कवींद्र तीर्थ (विद्याधिराज तीर्थ के एक शिष्य) और बाद में विद्यानिधि तीर्थ (रामचंद्र तीर्थ के एक शिष्य) के वंश में जारी रहा। उत्तरादि मठ में पूजे जाने वाले मूल राम और मूल सीता की मूर्तियों का एक लंबा इतिहास है और वे अपनी महान दिव्यता के लिए पूजनीय हैं। उत्तरादि मठ प्रमुख हिंदू मठवासी संस्थानों में से एक है। इस मठ को पहले "पद्मनाभ तीर्थ मठ" के नाम से भी जाना जाता था। उत्तरादि मठ मुख्य मठ था जो पद्मनाभ तीर्थ , नरहरि तीर्थ , माधव तीर्थ , अक्षोब्य तीर्थ , जयतीर्थ , विद्याधिराज तीर्थ और कविंद्र तीर्थ के माध्यम से माधवाचार्य से उतरा था, इसलिए इस मठ को "आदि मठ" के रूप में भी जाना जाता है। इसे "मूल मठ" या "मूल संस्थान" या "श्री माधवाचार्य का मूल महासंस्थान" भी कहा जाता है। राम सखा के गुरु वशिष्ठ तीर्थ इसी परम्परा का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।
         राम सखा जी महराज
राम सखा की आध्यात्मिक यात्रा:-
राम सखा संप्रदाय के संस्थापक का जयपुर में जन्म उडुपी में दीक्षा अयोध्या और मैहर में तप साधना से विकसित और प्रस्फुटित हुआ है। श्रीमद् रामसखेंद्र जी महाराज ( निध्याचार्य जी महराज) का जन्म विक्रम संवत के 18वी सम्बत के आखिरी चरण या 18वीं ईसवी शताब्दी के प्रथम भाग में चैत्र शुक्ल में राम नवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में उनका संस्कार असाधारण अलौकिक और दिव्य था।

राम सखे जी (अवध वासी) 
दोहाः- 
तन मन प्रेम से भाव मम, हरि हमरे हैं मीत।
एक दिवस हरि मिलि गये उर लगाय कह्यौ मीत।१। 
अन्त समय हरि धाम को गयों हर्षि चढि यान। 
राम सखे कहैं बचन मम, सत्य लीजिये मान।२। 
(सन्दर्भ:श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' लेखक: परमहंस राम मंगल दास (भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ग्रन्थ - 1,भाग - २, दिसम्बर २००१ )

      साधु संतों और भगवान के भक्तों के प्रति उनके मन में बड़ा आदर भाव था। राम के स्मरण मात्र से ही वे आत्म मुग्ध हो जाया करते थे। वे भगवान के जन्म जात सखा थे।

रामानंदी सम्प्रदाय गलिता से भी लगाव:-
गलताजी जयपुर से 10 कि.मीअरावली पहाड़ियोंमें एक पहाड़ी दर्रे के अंदर निर्मित है । 15वीं शताब्दी की शुरुआत से गलताजी वैष्णव रामानुज संप्रदाय से संबंधित हिंदू तपस्वियों के लिए एक शरणस्थल रहा है। यहां पर गालव नाम के एक संत यहां रहते थे, ध्यान करते थे और तपस्या करते थे। राजानुज/ रामवत/रामनदी सम्प्रदाय में राम और सीता के स्वरूप का पूजा किया जाता है। कहा जाता है कि यह लंबे समय से योगियों के व्यवसाय में है; पयोहारी कृष्णदास, एक रामानुजी संत, यानी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी 15वीं शताब्दी की शुरुआत में गलता आए और अपनी योगिक शक्तियों से अन्य योगियों को वहां से खदेड़ दिया। गलता उत्तरी भारत का पहला वैष्णव रामानुज पीठ था और रामानुज संप्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण घटना में से एक बन गया। कृष्णदास जी पयाहारी ने गलता (जयपुर) में रामानंदी सम्प्रदाय की प्रमुख मंच की स्थापना की थी। गलताजी को रामानुज संप्रदाय में उत्तर तोताद्रि भी कहते हैं। रामानुज सम्प्रदाय की एक प्रमुख गद्दी जयपुर में गलता के पास स्थित रही है। गलताजी (जयपुर) के साथ अयोध्यामें भी एक मठ है।
           यद्धपि जयपुर गलिता उडुपी चित्रकूट और मैहर आदि तीर्थों में घूमते फिरते हुए राम सखा जी का राम सखा नामक ये नया संप्रदाय 18वी संवत से प्रकाश में आया परन्तु सखी सम्प्रदाय का प्रभाव तो सनातन काल से ही राम सखा ,राम सखी ,सीता सखा सीता सखी ,कृष्ण सखा ,कृष्ण सखी , राधा सखा और राधा सखी के विविध रुपों में पुराणों व भक्ति साहित्य में पाया जाता रहा है।
अलग अलग उपाधियों को अंगीकार करना:-
जिस प्रकार राम सखा के गुरु वशिष्ठ तीर्थ उपाधि को विभूषित कर रहे थे। जिसका अर्थ यह होता है कि उसे सभी शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान हो गया है। ठीक उसी तरह राम सखा जी के शिष्य गुरु की तरह निध्याचार्य उप नाम प्रयुक्त करने लगे थे। तात्पर्य अनेक शास्त्रीय निधियां ये अपने में समाहित किए हुए हैं। शील निधि सुशील निधि और विचित्र निधि उनके परम शिष्य हुए थे। श्री निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि मैहर के बड़ा अखाड़े के रूप में बहुत लोकप्रिय है। अयोध्या में चौथे गुरु अवध शरण ने अपने उपनाम में परिवर्तन कर लिया। निधि उपाधि की पूर्णता को त्यागते हुए दास्य वा भक्ति भाव की प्रधानता वाली उपाधि " शरण "अपनाई जाती है। उचेहरा सहडौल और पुष्कर के आचार्यों ने न जाने कब से अपने उप नाम। "शरण" प्रयोग करने लगे हैं।
       राम सखा महाराज जी जयपुर से निकलने के बाद विराट वैष्णव बन गए थे। उन्होंने सत्य का मार्ग खोजना शुरू कर दिया। राम सखेंद्र श्री राम जी के पिछ्ले जन्म से ही परम भक्त थे। वे युवास्था में तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े थे। वे कर्नाटक के तीर्थ क्षेत्र उडुपी पहुंचे। महाराज जी ने माध्य संप्रदाय के आचार्य श्री वशिष्ठ तीर्थ से गुरु दीक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने लिखा है -
"मध्य माध्य निज द्वैत मन
मिलन द्वार हनुमान।
राम सखे विद सम्पदा
उडुपी गुरु स्थान।।"
       वे दक्षिण के उडीपि (कर्नाटक) में बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा किये थे। वह अपने गुरु जी के साथ रहे और भगवान और उनके स्नेह को प्राप्त करने का कौशल सीख लिया था। 
जयपुर में बीता बचपन :- जयपुर में जन्में राम सखा जी जयपुर के रामलीला अभ्यास में लक्ष्मण जी के रूप में भाग लेते थे। वे श्रीराम से इतना लगाव कर लिए कि वह वास्तव में उनका छोटा भाई होने का विश्वास करने लगे थे। एक दिन राम लीला प्रशिक्षण के दौरान महाराज जी को भगवान राम का किरदार निभाना पड़ा था। जिसके परिणाम स्वरूप महाराज जी को भोजन नहीं मिल पाया था। महाराज जी ने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया और रात तक इतना परेशान थे कि वे पास के जंगल में चले गए और एक पेड़ के नीचे बैठ रोते रहे। रामलीला मंडली में युवा बच्चा गायब हो जाने के कारण हर कोई चिंतित था।
श्रीरामजी ने खुद खाना खिलाया :-
आधी रात तक जब महाराज जी पेड़ के नीचे रो रहे थे तब राम जी स्वयं स्वादिष्ट भोजन से भरे हाथों में सुनहरे बर्तन लेकर प्रकट हुए। प्रभु की मधुर वाणी सुनकर महाराज जी अभिभूत हो गए। दोनों ने एक-दूसरे को बड़े प्यार से गले लगाया। महाराज जी ने अपनी भूख को शांत किया और दोनों काफी देर तक बातें करते रहे। जिसके बाद भगवान राम अपने साथ लाए सभी सोने के बर्तनों को छोड़कर गायब हो गए।
मन्दिर के सोने के बर्तन गायब मिले :-
इधर जयपुर में जब राम मंदिर के पुजारियों ने मंदिर का दरवाजा खोला, तो वे सभी सोने के बर्तनों को गायब देखकर हैरान रह गए। बर्तन गायब होने की सूचना जयपुर नरेश तक पहुंची । राजा ने तुरंत लापता संपत्ति और चोर की गहन खोज का आदेश दिया। कुछ लोग जंगल में पहुंचे और देखा कि एक युवा लड़का अपने चारों ओर सोने के बर्तन के साथ पड़ा है। लोगों ने उनसे बर्तनों के बारे में पूछा तो महाराज जी ने उन्हें बताया कि राम जी ने उन्हें भोजन कराया, लेकिन बर्तनों को वापस नहीं ले गए। उन्हें लगा कि भगवान राम ने उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में स्वीकार कर लिया है। इस समय तक महाराज जी जयपुर में ही थे। उनकी जन्मस्थली होने के कारण वे जयपुर छोड़कर पहले उडुपी और बाद में गुरु जी से दीक्षा लेकर अयोध्या आएं थे।
रामसखा जी का अयोध्या में आगमन:-
अयोध्या आकर राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे। उन्होंने भगवान राम के दर्शन का बहुत दिनों तक इंतजार किया।भगवान का विरह उन्हें असह्य होता जा रहा था। जब उनकी व्यथा बढ़ी तो वे प्रभु को उपालंभ भी देना शुरू कर दिए। संप्रदाय भास्कर में उल्लिखित है -
“अरे शिकारी निर्दयी, करिया नृपति किशोर ।
क्यों तरसावत दरश को, राम सखे चित्त चोर ।।"
      उनकी व्यथा देख एक बार प्रभु ने उन्हें अल्प समय के लिए दर्शन दिया। वे उनसे अंक में लिपट कर खूब रोए और खूब आनंद लिए। बाद में प्रभु जी अंतर्ध्यान हो गए। कुछ दिनों बाद फिर उन्हें दर्शन करने की तलब लगी। अब वे और बेचैन रहने लगे।जब उनकी बेचैनी असहय हो गई । उन्हें बेचैन मनो व्यथा जानकर इस बार रामजी माता सीता जी के साथ उन्हें युगल किशोर के दर्शन हुए। उनका सारा दुख दूर हो गया । सन्त राम सखा आजीवन राम की सरस भक्ति का प्रसार किए। भगवान की सरस झांकी का चिन्तन करते हुए उन्होंने साकेत धाम में प्रवेश किया था।
प्रभु की झांकी का वर्णन : -
प्रभु श्री राम सीता की झांकी राम सखे जी के हृदय में एसे बैठ गया और उनके मुख से ये भाव निकले -
"बगिया शिर लाल हरी कलगी
उर चंदन केसर खौर दिये।
मन मोहन राम कुमार सखी
अनुभारी नहीं जग जन्म लिए।
पग नुपुर पीत कसी कछनी
बन मालती के बन मॉल हिये।
बिहरे सरयू तट कुंजन में
तनु राम सखे चित चोर लिए।।"
          थोड़ी देर दर्शन के बाद प्रभु अंतर्ध्यान हो गए तो राम सखे अब फिर रोना धोना शुरू कर दिया।
काछवाह राजा द्वारा अयोध्या में मन्दिर का निर्माण :-
उनका निवास नृत्य राघव कुंज बना। अयोध्या में इसी नाम से एक मंदिर का निर्माण हुआ था। जो राम सखा की दूसरी गद्दी बनी। इसका निर्माण मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। दुर्जन सिंह कछवाहा भारत में राजपूत जाति की उपजाति है। उनके कुछ परिवारों ने कई राज्यों और रियासतों पर शासन किया है जैसे अलवर, अंबर (जिसे बाद में जयपुर कहा जाने लगा) और मैहर आदि । कुंवर दुर्जन सिंह राजा मान सिंह के चौथे पुत्र थे। इनकी माता का नाम सहोद्रा गौड़ था. यह अत्यंत ही साहसी और पराक्रमी योद्धा थे. कुंवर दुर्जन सिंह के वंशजों को दुर्जन सिंहोत राजावत के नाम से जाना जाता है।
चित्रकूट में आगमन:-
अयोध्या के बड़े बड़े सन्त और महात्मा उनका दर्शन पाने के लिए लालायित रहते थे। इससे उनके यहां बहुत भीड़ भाड़ रहने लगी। अवध में इस भीड़ भाड़ से बचने और भगवान राम का मनोवांछित दर्शन ना पाने व्यथा के कारण तथा अयोध्या में बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। निरंतर प्रभु के चिन्तन ध्यान और भक्ति के कारण चित्रकूट में अनेक सिद्धियां उनके चरणों की दासी हो गई।
    प्रभु का मिलन और वियोग तथा दर्शन बातचीत का लुका छिपी जारी रहा। एक बार ज्यादा दिनों तक दर्शन ना होने पर उनके मस्तिष्क में ये भाव आया । रूप सामर्थ्य चन्द्र में लिखा है -
"ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
ले चल कुटिल बदल जुल्फान छवि राज माधुरी वेशे।
केसर तिलक कंज मुख श्रम जल ललित लसत द्वई रेफे।
दशरथलाल लाल रघुवर बिनु बहुत जियब केही लेखे।
ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
डूब डूब उर श्याम सुरती कर प्राण रहे अवशेषे।
राम सखे विरहिन दोउ अखियां चाहत मिलन विशेषे।।"
    सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"
            भक्त भगवान का अब लुका छिपी का खेल होने लगा। अब प्रायः दर्शन होने लगे। वे इसका वर्णन सुनाते जाते और भक्त आनंदित होते रहते थे-
"आज की हाल सुनो सजनी मडये प्रकटी एक कौतुक भारी।
जेवत नारी बारात सभौ रघुनाथ लखे मिथिलेश उचारी।
श्री रघुवीर को देख स्वरूप भई मत विभ्रम गावनहारी।
भूली गयो अवधेश को नाम देने लगी मिथिलेश को गारी।।"
         अब तक की साधना और भक्ति से राम सखे की कुंडलिनी जागृति हो गई थी। उनकी सुरति खुलने लगी थी।योग में जब चाहा दर्शन होने लगा था । अब ध्यान लगाना नही पड़ता अपितु मानस पटल पर प्रभु की छवि खुद ब खुद आ जाती थी। उनके भंडारे में सामान्य सा भोजन बनता तो खत्म नहीं होता। राम सखे जी ध्यान में रसोई की जो कल्पना करते वह प्रभु प्रकट कर देते थे। एक दिन खुद महराज जी ने प्रभु के लिए ध्यान में रसोई बनाई। प्रभु उसे पूरा किए। नाना प्रकार के स्वाद और व्यंजन बन जाया करते थे।राम रसिकावली में राजा रघुराज सिंह ने लिखा है
"करई ध्यान में विपुल भावना,
जैसी छवि की होय कामना।
ध्यान में एक दिन रस रांचे,
राम भोग बनबै चित सांचे।
जो व्यंजन मन राम बनाए ,
सो तेहि प्रगट होई आए।।"
श्री रामजी का धनुष बाण के साथ दर्शन :-
महाराज जी को उन सभी भौतिक चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जो वे करना चाहते थे, वे अपने भगवान के बारे में अधिक जानते हैं और दुनिया में और कुछ भी उनके लिए मायने नहीं रखता था। जब वह ध्यान और प्रार्थना में व्यस्त रहते थे कुछ और महात्मा उससे प्रभावित हुए उनके वास्तविकता का परीक्षण करना चाहे। वह उनसे बोले यदि भगवान राम अपने धनुष वाण के साथ प्रकट हो तो मानेगे कि महात्मा जी उनके सच्चे सेवक है। महात्माओं के सुनने के बाद महराज जी चुप हो गये और इसका उत्तर नहीं दिये। किन्तु रामजी ने इसे नहीं छोड़ा । इसके कुछ देर के बाद रामजी धनुष बाण धारण किए हुए प्रकट हुए और सिद्व किये महराज जी उनके सच्चे भक्त है। महराज जी के सामने धनुष वाण के साथ लेकर देखने व मुस्कराने को महात्मा जन प्रभु जी का महराज जी पर आर्शीबाद मानने लगे।
कुएं में गिरे भगवान के विग्रह को खुद बाहर आना पड़ा :-
यहां राम सखा मंदिर और जानकी मंदिर आज भी इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। उनके भजनों का प्रभाव जल्द ही पन्ना के तत्कालीन महाराज (राजा) के ध्यान में आया। राजा महाराज जी के दर्शन करने आए और महाराज जी की भक्ति से बहुत प्रभावित हुए। यह भी कहा जाता है कि चित्रकूट में एक बार जब महाराज जी अपनी सुबह की दिनचर्या समाप्त करने के बाद अपने शालिग्राम भगवान की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तभी अचानक से मूर्ति नीचे की ओर लुढ़क गई और पास के कुएं में गिर गई। इस कारण महाराज जी बहुत आहत व शोकाकुल हुए। रोते हुए उसने दुःख में एक दोहा का जाप किया। जैसे ही उन्होंने दोहा समाप्त किया, कुएं में पानी का स्तर नाटकीय रूप से बढ़ गया और मूर्ति ने उन्हें पानी पर नृत्य करते हुए देखा, महाराज जी अभिभूत हो गए और उन्होंने भगवान को दोनों हाथों से गले लगाया। इसके बाद महाराज जी खुशी-खुशी अपनी पूजा करने चले गए।
उचेहरा में अस्थाई प्रवास :-
कुछ महात्मा यह भी बताते हैं कि महाराज जी के एक शिष्य उनके साथ रहे, वे लोगों से भिक्षा माँगते थे और ठाकुर जी के लिए भोग भी तैयार करते थे। ठाकुर जी के भोग के बाद, कई महात्माओं के पास प्रसाद था और वे संतुष्ट होकर लौटे। चित्रकूट में रहने के बाद महाराज जी उचेहरा (अब सतना जिला) में गए।लेकिन उन्हें वहाँ बहुत अच्छा नहीं लगा और संवत 1831विक्रमी (अर्थात 1774 ई.)में मैहर चले गए।
मैहर में तपोसाधना :-
उन्होंने मेहर राज्य के नीलमती गंगा के तट पर पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया और मानसिक ध्यान पूजा और भगवद भजन में लग गए। बड़ा अखाड़ा एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। कम उम्र में रामलीला में शामिल होने के कारण, महाराज जी संगीत के साथ-साथ लेखन कौशल में भी पारंगत थे। उनका लेखन कौशल उनके कई पवित्र लेखन जैसे दोहावली, कवितावली से स्पष्ट होता है। उन्होंने कई पवित्र लेखन जैसे अष्टयाम, स्वाधिष्ठान- प्रतिपादक और नृत्य राघव मिलन भी लिखे जो वास्तव में अभूतपूर्व हैं

उन्होंने अनेक भाव पूर्ण और सरस दोहे भी लिखे हैं।उन्होंने द्वैत-भूषण नामक एक संस्कृत लेखन को लिखा था। अब महराज जी नित्य प्रति प्रभु का दर्शन पाने लगे थे।इस स्वरूप का वर्णन अपने पदों के माध्यम से करने लगे थे। उनके भक्त उसे याद करके घूमते फिरते और लोगों को सुनाया करते थे।
                         नवाब आसफ़ुद्दौला
अनेक सिद्धियों के ज्ञाता:-
नवाब आसफ़ुद्दौला अवध का एक रंगीन मिज़ाज और दरियादिल नवाब था । उसके बारे में कहा जाता है जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला। लखनऊ का नवाब आसफदौला राम सखा महराज का भक्त हो गया था सुना जाता है कि एक बार एक गायक ने लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समक्ष को निम्न पंक्तियाँ गाईं-
“प्यारे तेरी छबीं वर ।
विश्रामी वंदन कुमार दशरथ के मार जुल्फें कारियों ।।
तीखी सजल लाल अज्जन युत लागत खोलन प्यारियाँ ।।
राम सखे दृग ओटन हमको दो ना पल भर न्यारियाँ।।"
       उपरोक्त पंक्तियों को सुनने के बाद नवाब आसफुद्दौला बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने गायक से लेखक के बारे में पूछा। उन्होंने उसे महाराज जी के बारे में बताया और यह भी बताया कि वह मैहर में रहते हैं। उन्होंने नवाब को यह भी बताया कि महाराज जी द्वारा लिखी गई कई अन्य उत्कृष्ट पंक्तियाँ हैं और कई गायक संगीत के कौशल को जानने के लिए उनकी पंक्तियों को गाते हैं। नवाब उस गायक की सूचना से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने महाराज के लिए अपने संदेश के साथ अपने नाजिर सन्देश वाहक भेजा, जिसमें उनसे लखनऊ आने और अपना भजन सुनाने का अनुरोध किया था। बदले में उन्हें प्रति वर्ष लगभग 3 लाख की राशि के साथ भेंट करने की बात कही थी। महाराज जी ने नरमी से यह कहते हुए धीरे से मना कर दिया कि उनके पास भगवान राम के साथ कुछ कमी नहीं है। जिस नाजिर सन्देश वाहक को सुनिश्चित करने के लिए उसने धन की एक झलक दिखाई, उसके लिए भगवान ने आश्चर्य चकित कर दिया था। वह नवाब के पास लौट आया और उसने वह सब कह सुनाया जो उसने वहां देखा था।
मेंहर में अंतिम सांस :-
महाराज जी विक्रमीय उन्नीसवीं संवत के प्रथम चरण यानी 1842 विक्रमी (अर्थात 1785 ई.) में मैहर में अपना शरीर त्याग कर अमरता प्राप्त की। उनकी समाधि मैहर में ही है। उसे बड़ा अखाड़ा कहा जाता है। यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। राम सखेन्दु जी महराज के नाम से उनकी ख्याति आज भी विद्यमान है। मैहर के पूर्व राजा की पत्नी ने भी दीक्षा प्राप्त की और साधु, महात्माओं के लिए जगह-जगह पर सहायता प्रदान की। राजस्थान के पुष्कर में राम सखा आश्रम में आज भी इस सम्प्रदाय के लोग पूजा आराधना करते है । अयोध्या, चित्रकूट, पुष्कर और मैहर सबसे प्रमुख स्थान हैं। रीवा, नागोद आदि क्षेत्रों में महाराज जी के शिष्यों की भारी संख्या है।
                       डा. राधे श्याम द्विवेदी 
(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)


Saturday, November 25, 2023

ऋषिकेश का त्रिवेणी घाट आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी

उत्तराखंड की तीर्थ और योगनगरी ऋषिकेश सतयुग से ही ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है. यहां स्थित प्राचीन श्री भरत मंदिर में रैभ्य ऋषि और सोम ऋषि ने भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए तपस्या की थी. भगवान नारायण ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए थे।
ऋषिकेश को “ स्वर्ग की जगह” के नाम से भी जाना जाता है।चंद्रभागा और गंगा के संगम पर हरिद्वार से 24 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित एक आध्यात्मिक शहर है। हृषिकेश मूल शब्द "हृषि" और "ईश" मिलकर "हृषि+ईश, हृषिकेश" बनाते हैं; "हृषिक" का अर्थ है "इंद्रियाँ" और "ईश" का अर्थ है "स्वामी" या "भगवान"। इसलिए इस शब्द का अर्थ है जिसने महारत हासिल कर ली है रैभ्य ऋषि ने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की और भगवान विष्णु को प्राप्त किया। इसलिए इस स्थान को हृषिकेश के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है कि “ऋषिकेश” के नाम स भगवान रैभ्य ऋषि द्वारा कठिन तपस्या से प्रकट हुए थे और अब से इस जगह का नाम व्युत्पन्न हुआ है।किंवदंती के अनुसार, रावण ने रावण की हत्या के लिए तपस्या करने के लिए ऋषि वशिष्ठ की सलाह पर आया। लंका के राजा यहां कई प्राचीन मंदिर और आश्रम हैं जो तीर्थयात्रियों को आध्यात्मिक सांत्वना देते हैं।
त्रिवेणी घाट
गढ़वाल, उत्तरांचल में हिमालय पर्वतों के तल में बसे ऋषिकेश में त्रिवेणी घाट प्रमुख पर्यटन स्थलों में से है।
ऋषिकेश में त्रिवेणी घाट प्रमुख स्नानागार घाट है जहाँ प्रात:काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं।कहा जाता है कि त्रिवेणी घाट पर हिन्दू धर्म की तीन प्रमुख नदियों गंगा,चंद्रभागा और अदृश्य सरस्वती
के संगम पर बसा हुआ है।
    त्रिवेणी घाट से ही गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है।
त्रिवेणी घाट के एक छोर पर शिवजी की जटा से निकलती गंगा की मनोहर प्रतिमा है तो दूसरी ओर अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण की मनोहारी विशाल मूर्ति और एक विशाल गंगा माता का मन्दिर हैं।घाट पर चलते हुए जब दूसरी ओर की सीढ़ियाँ उतरते हैं तब यहाँ से गंगा के सुंदर रूप के दर्शन होते हैं।
        शाम को त्रिवेणी घाट पर भव्य आरती होती है और गंगा में दीप छोड़े जाते हैं, उस समय घाट पर काफ़ी भीड़ होती है।ऋषिकेश का त्रिवेणी घाट अपने आप में विशेष महत्त्व रखता है. हिमालय से गंगा और सरस्वती के आने के बाद यह देश का पहला ऐसा स्थान है, जहां पर त्रिवेणी संगम है. यहां इस स्थान पर देश-विदेश से श्रद्धालु स्नान करने और दान, पुण्य, कर्मकांड करने आते हैं. इस स्थान की पौराणिक मान्यता है कि यहां स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है. इस स्थान पर पितरों का पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही श्राद्ध तर्पण करने से उन्हें स्वर्ग में स्थान प्राप्त होता है. इस स्थान पर तीनों प्रमुख पवित्र नदियों का अद्भुत संगम होता है.
                       बाल्मीकि भगवान
       रामायण और महाभारत के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इस पवित्र स्थान का दौरा किया था। इस तीर्थ घाट पर भक्तगण अपने पितरों की शांति के लिए पिंड श्राद्ध की पूजा का पाठ भी कराते हैं। पास में ही है गंगा माता का मंदिर भी स्थित है। बाल्मीकि भगवान का एक आधुनिक मंदिर भी यहां स्थित है।

Monday, July 10, 2023

भानु सप्तमी को सूर्य पूजा की सनातन परम्परा आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

        सनातन मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में भगवान सूर्य की प्रथम किरण माघ मास की सप्तमी को पृथ्वी पर आई थी। इसलिए इसे सूर्यदेव का जन्म दिवस भी मानते हैं। इस व्रत को लेकर ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस सप्तमी तिथि को सूर्यदेव की पूजा करता है और सूर्यदेव का व्रत रखता है वह पाप मुक्त होकर उत्तम लोक में स्थान पाता है।
साल के हरेक सप्तमी तिथि को शुभ प्रदायक माना गया है। इस तिथि में जातक को सूर्य का शुभ प्रभाव प्राप्त होता है।सूर्य ग्रह की शुभता को प्राप्त करने के लिए ये तिथि बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।इस तिथि में सूर्य देव का पूजन और उनके निमित्त व्रत का पालन करने से जातक को जीवन में सफलता और सम्मान की प्राप्ति होती है।
        सनातन धर्म में पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को भानु सप्तमी का व्रत रखा जाता है. इसे रथ सप्तमी को सूर्य सप्तमी, अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, भानु सप्तमी और आरोग्य सप्तमी भी कहते हैं। सूर्य देव की उपासना करने से कुंडली में सूर्य मजबूत होता है। कुंडली में सूर्य मजबूत होने से करियर और कारोबार में मन मुताबिक सफलता मिलती है। साथ ही आय, आयु, सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। ज्योतिष भी मनचाही नौकरी पाने के लिए सूर्य उपासना की सलाह देते हैं। अतः साधक श्रद्धा भाव से सूर्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं। धर्म शास्त्रों में निहित है कि रथ सप्तमी के दिन सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है। भानु सप्तमी के व्रत का धार्मिक और पौराणिक महत्व बताया गया है. भानु सप्तमी का दिन सूर्य देव की पूजा-अर्चना और उपासना के लिए खास होता है. भानु सप्तमी को रथ सप्तमी के नाम से भी जाना जाात है. यह व्रत करने से जातक को कई रोग दोष से मुक्ति मिलती है।
भानु सप्तमी का महत्व :-
भानु सप्तमी का दिन सूर्य देव की उपासना करने के लिए उचित होता है. कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत करने के लिए भानु सप्तमी का व्रत किया जाता है. कुंडली में सूर्य के मजबूत होने से व्यक्ति को करियर और कारोबार में सफलता मिलती है और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है. यह व्रत करने से मनचाही नौकरी की भी इच्छा पूरी होती है।
भानु सप्तमी पूजा विधि :-
 ब्रह्म बेला में उठें और सूर्य देव को प्रणाम कर दिन की शुरुआत करें। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठने के बाद स्नान कर साफ कपड़े पहनें.अब घर की साफ-सफाई करें और नित्य कर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें। अगर सुविधा है, तो पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान करें।ऐसा संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें।
 सुबह सूर्योदय के समय सूर्य देवता को प्रणाम करें और व्रत का संकल्प लें। बहते जल में काले तिल प्रवाहित करना शुभ माना जाता है.भानु सप्तमी पर जल में चावल, काले तिल, रोली और दूर्वा डालकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए।सूर्य को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का करें जाप करें --

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते
अनुकम्पय मां देवी गृहाणा‌र्घ्यं दिवाकर
ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


नोट:-
( 30 जुलाई 1956 सोमवार तदनुसार सावन कृष्णा सतमी संवत 2013 विक्रमी मेरी वास्तविक जन्म तिथि रही है। पर सरकारी अभिलेख में यह 27 जून 1957 दर्ज है। इस कारण इस सतामी को 67 वर्ष की आयु पूर्ण करने और शेष समय में ईश्वर आराधना के संकल्प साथ प्रभु के चरणो में लगाने की कामना करता हूं।)




Monday, February 6, 2023

मैहर राम जानकी मंदिर बड़ा अखाड़ा के विविध मन्दिर डॉ.राधे श्याम द्विवेदी

मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर है जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्ति पीठों में से एक है।मैहर धाम में मंदिर के अलाबा आल्हा उदल अखाडा भी दार्शनिक स्थान है जिनमे से है,जो माँ शारदा देवी के अनन्य भक्त थे इसी बजह से मैहर आने बाले श्रद्धालु यहाँ जरूर जाते है। मैहर धाम से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह झरना काफी ज्यादा खूबसूरत है यदि आप इस झरने को घूमने जाते है । एक और प्रमुख पर्यटन स्थल इक्षा पूर्ति मंदिर मैहर माता दुर्गा को समर्पित इस टेम्पल की नक्काशीदार बनावट और चारो तरफ प्राकृतिक हरियाली के सुंदरता का यह एक नमूना है ।इनके अलाबा मैहर देवी धाम में और भी पर्यटक स्थल है गोल मैथ मंदिर मैहर,नीलकंठ मंदिर और बड़ी खेरमाई मंदिर आदि।रामसखा का बड़ा अखाड़ा :-
आज हम राम सखा संप्रदाय के बड़ा अखाडा जहा विशालकाय मंदिर के शिखर पर विराजमान शिव और मन्दिर के गर्भ गृह में 108 शिवलिंग विराजित किये हुए मंदिर का विस्तार से दर्शन कराएंगे। सखी या सखा भाव वाला सम्प्रदाय' 'निम्बार्क मत' की एक शाखा होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण या राम की उपासना सखी- सखा भाव से की जाती है। इसमें माधुर्य और प्रेम भक्ति का समावेश होता है । वृन्दावन, अयोध्या और अन्यान्य स्थानों पर प्रेमलक्षणा और राधासीता भाव का इतना व्यापक प्रभाव पहुँचा कि राम और सीता को राधा-कृष्ण की छाया में ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया गया और उसी शैली में काव्य-रचना होने लगा। श्रीमद् सखेंद्र जी निध्याचार्य:-
राम जी के अभिन्न सहचर सखाओं ने भी राम सखा संप्रदाय की स्थापना करके अपने प्रभु से जुड़ने और उनकी भक्ति को और गहरी बनाने का उपक्रम किया है।  स्वामी रामानन्द जी, गोस्वामी तुलसी दास जी, कवि नाभादास जी और कवि अग्रदास जी इस कड़ी को आगे बढ़ाए हैं। माधुर्य उपासना में सखी भाव प्रिया - प्रियतम के प्रेम मिलन के भाव से पूजा और आराधना की जाती है।

पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
राम सखा संप्रदाय के प्रणेता श्रीमद् सखेंद्र जी निध्याचार्य जी महराज का जन्म अठारहवीं विक्रम संवत के आखिरी चरण चैत्र शुक्ल रामनवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। राम सखेंद्र जी महाराज राम लीला में भाग ले - ले कर अपने को राम के छोटे भाई के रूप में मानने लगे थे । महाराज जी ने  जन्मस्थली होने के कारण जयपुर छोड़ कर अयोध्या पुरी चले आए और   राम सखा सम्प्रदाय की स्थापना की थी।  राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे।
अयोध्या में प्रभु के मिलन न होने से बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"

मैंहर अखाड़े में तपोसाधना :-

श्री राम सखा जू महाराज, जो हिंदू धर्म के माधव संप्रदाय के प्रतिपादक और अनुयायी थे, लगभग दो सौ साल पहले जयपुर से मैहर आए और  जहां एक मठ की स्थापना की, जिसे "श्री राम सखेंद्र जू का अखाड़ा" कहा जाता है।
नीलमती गंगा के तट पर उन्होंने एक पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया था । महाराज जी की तपोभूमि बड़ा अखाड़े के रूप में मैहर में बहुत लोकप्रिय है जिसमें  मंदिर और आश्रम दोनो  है। कई व्यक्तियों ने अखाड़े को संपत्तियां दीं थी  मैहर के तत्कालीन शासक ने भी अखाड़े के रखरखाव और देवता की पूजा के लिए एक गांव दिया था। इस अखाड़े के महंत राम रंगीले की मृत्यु के बाद, प्रमोधन बिहारी सरन महंत बनाए गए। श्री सरन के महंत बनने के तुरंत बाद, विंध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें अखाड़े और उससे जुड़ी संपत्तियों के उचित प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट कमेटी बनाने की सलाह दी। परिणाम स्वरूप "बडा अखाड़ा" ट्रस्ट का गठन कर सोसायटी के रूप में इसे पंजीकृत किया गया था। सितंबर 1955 में मैहर के तहसीलदार ने अखाड़े के प्रबंधन में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था और अंततः 30 अक्टूबर 1956 को विंध्य प्रदेश सरकार ने अखाड़े के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक समिति का गठन किया था। श्री शरण जी महराज को प्रबंधन सौंपने के लिए कहा था जो 1860 के अधिनियम के तहत पंजीकृत सोसायटी के ज्ञापन के अनुसार गठित समिति के अध्यक्ष थे। यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। यह तपोभूमि (मैहर देवी रोड पर) बहुत ही सिद्ध पीठ है। 

इस समय श्री श्री1008 श्री सीता शरण जी महाराज इस पीठ के स्वामी हैं। महाराज जी के शिष्य श्री रामनाथ शरण जी मोहित महाराज के मार्गदर्शन में इस आश्रम में विविध आयोजन आयोजित होते रहते हैं।


खूबसूरत प्रवेश द्वार:-
आश्रम का जो प्रवेश द्वार है। वह बहुत ही खूबसूरत है। आश्रम के प्रवेश द्वार में एक तरफ हनुमान जी की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है और दूसरी तरफ शंकर जी की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है, जो बहुत ही खूबसूरत है।  श्रीसिद्ध विनायक मंदिर:-
इस 6 फीट का मंदिर पर महज 4 फीट का द्वार है। मैहर के राम जानकी बड़ा अखाड़ा के इसी श्रीसिद्ध मंदिर में 175 वर्ष से वाममुखी विनायक विराजे हैं। अखाड़ा के महंत सीता वल्लभ शरण बताते हैं, पुरातात्विक परीक्षण में  यह पाषाण प्रतिमा छठवीं शताब्दी की बताई गई है। जन विश्वास में स्वयं सिद्ध वाममुखी विनायक की प्रतिमा की स्थापना का श्रेय आचार्य संत श्रीराम सुखेन्द्र निध्याचार्य जी को है। महंतश्री ने बताया कि वर्षों पूर्व यह प्रतिमा गौसेवा के निमित्त निर्माणाधीन एक तालाब की खुदाई के दौरान मिली थी।
जैसे-जैसे आकार बढ़ा,वैसे-वैसे बढ़ी आस्था  :-
मैहर बड़ा अखाड़ा के महंत सीता वल्लभ शरण ने जनश्रुतियों के हवाले से बताया कि  175 वर्ष पहले जब खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी तब इसकी ऊंचाई महज एक फीट थी। एक फीट की मूर्ति की स्थापना के 4 फीट के द्वार का मंदिर बनाया गया,लेकिन धीरे-धीरे जब वाममुखी श्रीसिद्ध विनायक की प्रतिमा बढऩे लगी  वैसे-वैसे जनआस्था बढ़ी और कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। जब प्रतिमा की ऊंचाई 5 फुट सात इंच की हो गई तो स्वप्न में मिली प्रेरणा के कारण आचार्य संत श्रीराम सुखेन्द्र निध्याचार्य जी ने एक दिन अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से प्रतिमा के दाहिने पैर के अंगूठे से दबा दिया। मूर्ति का विस्तार रुक गया। कालांतर में मंदिर की ऊंचाई तो बढ़ाकर 6 फीट कर दी गई लेकिन मंदिर के 4 फीट के द्वार से छेडख़ानी नहीं की गई।
वाममुखी का धार्मिक महत्व  :-
धर्मशास्त्रों के अनुसार जिस श्रीगणेश की प्रतिमा की सूंड का अग्रभाव बाईं ओर मुड़ा होता वह मूर्ति वाममुखी कहलाती है।  वाम यानी उत्तर दिशा।  बाईं तरफ चंद्र नाड़ी होती है जो शीतलता प्रदान करती है। उत्तर दिशा अध्यात्म की कारक एवं आनंददायक मानी जाती है। वाममुखी गणपति के पूजन की विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं होती। वाममुखी विनायक का पूजन गृहस्थ जीवन के लिए शुभ माना गया है। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं। थोड़े में संतुष्ट होते हैं और त्रुटियों को क्षमा करते हैं। मैहर का स्टेट का राजघराना वाममुखी श्रीसिद्ध विनायक का पीढ़ी दर पीढ़ी अनुयायी है।
राम-जानकी मंदिर:-
यह मंदिर  शारदा देवी मार्ग पर स्थित प्राचीन दर्शनीय भगवान राम जानकी का मंदिर है जो बड़ा अखाड़ा के नाम से जाना जाता है । यहां अष्टधातु से बनी भगवान राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां है,  जिसकी पूजा संप्रदाय के अनुयायी करते थे। जनश्रुति के अनुसार मैहर के जंगल में एक प्राचीन शिव मंदिर था। यहाँ श्री राम ने पूजा की थी। यह प्राचीन मंदिर मैहर देवी मन्दिर के निकट ही है,  जिसकी श्रीराम सखेन्द्र दास जी द्वारा  स्थापना की गई है।
(टिप्पणी: वाल्मीकि रामायण और श्री रामचरित मानस के अनुसार सिद्वा पर्वत से सुतीक्षण आश्रम तक कोई संदर्भ नहीं मिलता। प्राप्त स्थल जन श्रुतियों और परिस्थितियों जन्य दृष्टिकोण के आधार पर ही मिलते हैं।)
सर्वदेव रामेश्वरम मंदिर :-
जनश्रुति के अनुसार मैहर के जंगल में एक प्राचीन शिव मंदिर थायहाँ श्री राम ने पूजा की थी। यहां पर शिव भगवान जी की बहुत बड़ा शिवलिंग मंदिर के छत पर बना हुआ है, जो बहुत ही सुंदर  है। इस मंदिर को श्री सर्वदेव रामेश्वरम मंदिर कहा जाता है।
शिवलिंग उद्यान कूप और अन्य मंदिर :-
अखाड़े में राम सीता मंदिर के अलावा अन्य कई मंदिर भी बने हुए हैं। इसमें 108 शिवलिंग विराजमान है। उनके दर्शन भी  यहां पर आकर किया जा सकता है। यहां पर  एक प्राचीन कुआं भी देखने के लिए मिल जाएगा। कहा जाता है, कि यह प्राचीन कुआं है और इस कुआ में का निर्माण यहां के राजा ने करवाया था। इस आश्रम के अंदर सुन्दर बगीचा भी है। इस आश्रम में गौशाला भी है ।यहां गुरुकुल परम्परा में स्थापित संस्कृत विद्यालय संचालित है। यहां पर बहुत सारे ब्राह्मण विद्यार्थी रहते हैं, जिन्हें यहां पर शिक्षा दीक्षा दी जाती है। यहां पर राम जी का मंदिर, गणेश जी का मंदिर और हनुमान जी का मंदिर भी है। ये सभी दिव्य स्थान दर्शनीय और मन वांछित फल देने वाले हैं।

Sunday, October 9, 2022

देश भर के सनातन मंदिरों में शरद पूर्णिमा के विविध कार्यक्रम डा.राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या।शरद पूर्णिमा के अवसर पर देश भर के सनातन मंदिरों में प्रभु के विग्रह के अनेक रास लीलाएं,पूजन और अर्चना के कार्यक्रम आयोजित हुए।इस अवसर राम नगरी अयोध्या के प्राचीन दन्त धावन कुंड में क्षीरशायी भगवान विष्णु कि अलौकिक झांकी का आयोजन किया गया । हजारो की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु भगवान विष्णु की झांकी का दर्शन कर में भाव विभोर हुए । राम नगरी अयोध्या में शरद पूर्णिमा के मौके पर यह आयोजन 124 वर्षों से होता चला आ रहा है।  ऐतिहासिक दंतधावन कुण्ड में भगवान क्षीरशायी महाराज की सुन्दर एवं अलौकिक झांकी सजाई गई है तथा इस मौके पर खीर प्रसाद का भोग लगाकर श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। यह पूरा आयोजन साकेत भूषण समाज की ओर परम्परागत रूप से सजाई जाती रही है। जिसमे शेषशैया पर देवी महालक्ष्मी के साथ विराजमान विष्णु शंख, गदा एवं चक्र के साथ शेषनाग पर विराज मान है रहते हैं। भगवान विष्णु की कमलनाभि के सृष्टि के रचयिता ब्रम्हदेव एवं नारदमुनि की सुन्दर झांकी सजाया गया था।
ब्रह्म मुहूर्त से ही अयोध्या के विभिन्न घाटों समेत फैजाबाद के गुप्तारघाट पर भक्तों ने डुबकी लगाई व मां सरयू का पूजन-अर्चन किया। इसके बाद विभिन्न मंदिरों रामलला, कनक भवन, हनुमानगढ़ी, नागेश्वरनाथ आदि में भी माथा टेका। हनुमानगढ़ी में दिन भर दर्शन-पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी रही। शाम को आंजनेय सेवा संस्थान की ओर से मां सरयू की भव्य आरती हुई।
अयोध्या के हजारों मंदिरो में प्रभु के विग्रहों को बाहर श्वेत चांदनी में रख दिव्य छटा का रसपान कराया गया। अयोध्या में श्रद्धालुओं में विशेष उल्लास देखा गया।

Monday, May 30, 2022

बड़े मंगल के अवसर पर कुछ दुर्लभ जानकारी ब्रह्मचारी हनुमान जी विवाहित और पुत्रवान भी

पौराणिक शास्त्रों में रामभक्त के रूप में हनुमानजी की एक विशेष पहचान रखते हैं। उनके सभी भक्त यही मानते आए हैं कि वे बाल ब्रह्मचारी हैं। वाल्मीकि, कम्बन आदि किसी भी रामायण और रामचरित मानस में बालाजी के इसी रूप का वर्णन मिलता है। वे एक बाल ब्रह्मचारी के रूप में भी पूजे जाते हैं। सभी यही जानते हैं कि हनुमानजी ने कभी विवाह नहीं किया और जीवनभर एक ब्रह्मचारी भक्त के रूप में भगवान राम की सेवा करते रहे हैं । इसका यह अर्थ नहीं कि हनुमान बाल ब्रह्मचारी नहीं हैं ।पवनपुत्र का विवाह भी हुआ था उनके पुत्र भी रहे फिर भी और वो बाल ब्रह्मचारी भी रहे।
 कुछ शास्त्रों के अनुसार हनुमान जी के अविवाहित होने की बात पूरी तरह से सच नहीं है।भले ही लोग एक ब्रह्मचारी के रूप में उनकी पूजा करते हैं । शास्त्रों के अनुसार उन्होंने एक या दो नहीं बल्कि तीन-तीन शादियां की है। 
1. हनुमान जी की पहली पत्नी सुवर्चला है
पराशर संहिता में हनुमान जी की पहली पत्नी सुवर्चला का उल्लेख मिलता है। सुर्वचला सूर्य की पुत्री हैं। हनुमानजी सूर्य के शिष्य थे और सूर्य को उन्हें नौ विद्याओं का ज्ञान देना था। हनुमान जी ने पाँच विद्या आसानी से सीख ली लेकिन बाकी चार विद्या एक विवाहित ही सीख सकता था। बाकी चार विद्याओं को सीखने के लिए सूर्यदेव ने हनुमान को विवाह के लिए आदेश दिया और उनकी पत्नी के रूप में अपनी पुत्री सुवर्चला का चुनाव किया जो हमेशा तपस्या में लीन रहती थी। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के लिए हनुमान सूर्य पुत्री सुवर्चला के साथ शादी के बंधन में बांध गए। शादी के बाद सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई।इससे हनुमान जी का व्रत भी अखंडित रहा।
 तेलंगाना के खम्मम जिले में बना एक खास मंदिर याद दिलाता है कि रामदूत के उस चरित्र को विवाह के बंधन में बंधना पड़ा था। तेलंगाना के एक मंदिर में हनुमानजी और उनकी एक धर्मपत्नी की मूर्ति भी स्थापित है । इस मंदिर में अपनी पत्नी के साथ विराजमान हैं हनुमान जी। मान्यता है कि हनुमान जी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद घर में चल रहे पति पत्नी के बीच के सारे तनाव खत्म हो जाते हैं। यहां हनुमान जी अपने ब्रह्मचारी रूप में नहीं बल्कि गृहस्थ रूप में अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान हैं।
2.अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान जी से हुआ था
पउम चरित के अनुसार जब रावण और वरूण देव के बीच युद्ध हुआ तो, वरूण देव की तरफ से हनुमान ने रावण से युद्ध किया और रावण के सभी पुत्रों को बंदी बना लिया। युद्ध में हारने के बाद रावण ने अपनी दुहिता अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान से कर दिया।
3. हनुमान जी का विवाह सत्यवती से भी
रावण और वरुण देव के बीच हुए इस युद्ध में हनुमान वरुण देव के प्रतिनिधि के रूप में लड़े और उन्होंने वरुण देव को विजय दिलाई। इस विजय से खुश होकर वरूण देव ने हनुमान जी का विवाह अपनी पुत्री सत्यवती से कर दिया।
एक पुत्र के पिता भी रहे हनुमान जी
पौराणिक कथा के अनुसार जब रावण के आदेश से हनुमान जी की पूँछ में आग लगा दी गयी। तो जलती हुई पूँछ से हनुमान ने सम्पूर्ण लंका नगरी को जला डाला। तीव्र गर्मी से व्याकुल तथा पूँछ की आग को शांत करने हेतु हनुमान समुद्र में कूद पड़े, तभी उनके पसीने की एक बूँद जल में टपकी जिसे एक मछली ने पी लिया, जिससे वह गर्भवती हो गई। इसी मछली से मकरध्वज उत्पन्न हुआ, जो हनुमान के समान ही महान् पराक्रमी और तेजस्वी था। मकरध्वज को उनका पुत्र कहा जाता है। '
एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र 'मकरध्वज' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
फिर भी आजीवन ब्रह्मचारी रहे हनुमान जी
भले ही शास्त्रों में इन विवाहों का जिक्र है लेकिन ये तीनों विवाह कुछ विशेष परिस्थितियों में किए गये थे और हनुमान जी ने कभी भी अपनी पत्नियों के साथ वैवाहिक जीवन का निर्वाह नहीं किया और आजीवन ब्रह्मचारी बने रहे।



Thursday, January 13, 2022

सीता का जमीन में समाने का स्थान डा. राधेश्याम द्विवेदी

                               फलस्वाड़ी अयोध्या या सीतामढ़ी 
          रामायण में कथा है कि देवी सीता धरती से ही प्रकट हुई थीं और अंत में धरती में समा गईं। जिस स्थान पर देवी सीता भूमि में समाई थीं उस स्थान को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। 
           पहली बात तो यह कि माता सीता का धरती में समा जाने के प्रसंग पर मतभेद और विरोधाभाष है। पद्मपुराण की कथा में सीता धरती में नहीं समाई थीं बल्कि उन्होंने श्रीराम के साथ रहकर सिंहासन का सुख भोगा था और उन्होंने भी राम के साथ में जल समाधि ले ली थी।
           प्रमाणिक तौर ये बताना मुश्किल है कि मां सीता ने नैनीताल के सीताबनी पौड़ी के फलस्वाड़ी गांव ही धरती में समा गई थी या उत्तर प्रदेश के संत रविदास नगर (भदोई ) जिले में गंगा किनारे सीता मढ़ी स्थान पर समाधि ली थी टीवी धारावाहिक 'रामायण' के अनुसार, माता सीता ने अयोध्या में ही समाधि ली थी। ऐसे में ये बताना मुश्किल है कि माता सीता ने कहां भू-समाधि ली थी।
            वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के अनुसार प्रभु श्रीराम के दरबार में लव और कुश राम कथा सुनाते हैं। सीता के त्याग और तपस्या का वृतान्त सुनकर भगवान राम ने अपने विशिष्ट दूत के द्वारा महर्षि वाल्मीकि के पास सन्देश भिजवाया, 'यदि सीता का चरित्र शुद्ध है और वे आपकी अनुमति ले यहां आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित करें और मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें तो मैं उनका स्वागत करूंगा।
यह संदेश सुनकर वाल्मीकि माता सीता को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। काषायवस्त्रधारिणी सीता की दीन-हीन दशा देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों का हृदय दुःख से भर आया और वे शोक से विकल हो आंसू बहाने लगे।
        वाल्मीकि बोले, 'श्रीराम! मैं तुम्हें विश्‍वास दिलाता हूं कि सीता पवित्र और सती है। कुश और लव आपके ही पुत्र हैं। मैं कभी मिथ्याभाषण नहीं करता। यदि मेरा कथन मिथ्या हो तो मेरी सम्पूर्ण तपस्या निष्फल हो जाय। मेरी इस साक्षी के बाद सीता स्वयं शपथपूर्वक आपको अपनी निर्दोषिता का आश्‍वासन देंगीं।
           तत्पश्‍चात् श्रीराम सभी ऋषि-मुनियों, देवताओं और उपस्थित जनसमूह को लक्ष्य करके बोले, "हे मुनि एवं विज्ञजनों! मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के कथन पर पूर्ण विश्‍वास है परन्तु यदि सीता स्वयं सबके समक्ष अपनी शुद्धता का पूर्ण विश्‍वास दें तो मुझे प्रसन्नता होगी।"
            राम का कथन समाप्त होते ही सीता हाथ जोड़कर, नेत्र झुकाए बोलीं, "मैंने अपने जीवन में यदि श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्‍त कभी किसी दूसरे पुरुष का चिन्तन न किया हो तो मेरी पवित्रता के प्रमाणस्वरूप भगवती पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दें।" सीता के इस प्रकार शपथ लेते ही पृथ्वी फटी। उसमें से एक सिंहासन निकला। उसी के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने दोनों भुजाएं बढ़ाकर स्वागतपूर्वक सीता को उठाया और प्रेम से सिंहासन पर बिठा लिया। देखते-देखते सीता सहित सिंहासन पृथ्वी में लुप्त हो गया। सारे दर्शक स्तब्ध से यह अभूतपूर्व दृश्य देखते रह गए।इस सम्पूर्ण घटना से राम को बहुत दुःख हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे दुःखी होकर बोले, "मैं जानता हूं, मां वसुन्धरे! तुम ही सीता की सच्ची माता हो। राजा जनक ने हल जोतते हुए तुमसे ही सीता को पाया था, परन्तु तुम मेरी सीता को मुझे लौटा दो या मुझे भी अपनी गोद में समा लो।" श्रीराम को इस प्रकार विलाप करते देख ब्रह्मादि देवताओं ने उन्हें नाना प्रकार से सान्त्वना देकर सौंपा था।
समाधि स्थल पर संशय:-
हालांकि माता सीता ने समाधि कहां ली थी, इस पर संशय है! माता सीता द्वारा धरती में समा जाने की कथाओं में विभिन्न स्थानों का वर्णन है। ऐसे में माता सीता ने कहां पर समाधि ली थी, ये बताना मुश्किल है। 
नैनीताल का सीताबनी: -
एक मान्यता के अनुसार देवी सीता जहां धरती में समाई थीं वह स्थान आज नैनीताल में जिम कार्बेट नेशल पार्क है जो बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित है। यहां कभी महर्षि बाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। भगवान राम द्वार देवी सीता को अयोध्या से निकाले जाने के बाद लक्ष्मणजी देवी सीता को यहीं छोड़ आए थे। यहीं पर देवी सीता ऋषि के आश्रम में रहीं इसलिए इस स्थान को सीताबनी के नाम से जाना गया। जिस समय भगवान राम ने देवी सीता को वनवास का आदेश दिया था उस समय देवी सीता गर्भवती थीं। ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में ही इन्होंने अपने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया था और इनका पालन-पोषण किया था। इस घटना की याद मेंं सीताबनी में देवी सीता की प्रतिमा के साथ उनके दोनों पुत्रों को भी दिखाया गया है।सीताबनी का जिक्र कई धर्म ग्रंथों में मिलता है। रामायाण, स्कंदपुराण और महाभारत में भी इस तीर्थ के महत्व को दर्शाया गया है। महाभारत के 83वें अध्याय में वर्णित श्लोक संख्या 49 से 60 श्लोक तक सीताबनी का उल्लेख किया गया है। स्कंदपुराण में जिन सीतेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन किया गया है, वह यहीं विराजित हैं। स्कंदपुराण के अनुसार, कौशिकी नदी, जिसे वर्तमान में कोसी नदी कहा जाता है के बाईं ओर शेष गिरि पर्वत है। यह सिद्ध आत्माओं और गंधर्वों का विचरण स्थल है। इसी के पास स्थित है लक्ष्मणपुरा। जहां लक्ष्मणजी देवी सीता को अपने रथ से उताकर वन में छोड़ गए थे। तब उदास सीता ने बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में शरण ली थी।आश्रम के पास ही रामपुरा नामक स्थान है। जहां लव-कुश ने भगवान राम द्वारा छोड़ा गया अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ा था। यहां दो पहाड़ियों के बीच की खाई है,खाई में स्थित कुंज की वह स्थान है जहां से माता सीता धरती में समा गई थीं। देवी सीता की पुकार पर धरती माता ने पहाड़ी को दो भागों में चीर दिया था और देवी सीता को अपनी गोद में स्थान दिया।
उत्तराखंड का फलस्वाड़ी गांव:-
कुछ मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड के फलस्वाड़ी गांव में सीता माता ने भू-समाधि ली थी। माना जाता है कि पौड़ी के सितोलस्यूं में ही सीता ने भू-समाधि ली थी. यहां 11वीं शताब्दी के सीता मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और वाल्मीकि आश्रम मौजूद हैं. 
पुरातत्वविद् डॉक्टर यशवंत सिंह कठोच के अनुसार, माना जाता है कि फलस्वाड़ी गांव में ही सीता माता ने भू-समाधि ली थी. जनश्रुतियों के अनुसार यहां पर सीता माता का मंदिर भी था और बाद में वह भी धरती में समा गया था. इससे जुड़ी कथा के अनुसार, यहां नवंबर महीने मनसार का मेला लगता है।फलस्वाड़ी और कोट गांव, जहां लक्ष्मण मंदिर है, मिलकर इस मेले का आयोजन करते हैं. हर साल बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने आते हैं मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में ‘सीता माता सर्किट’ विकसित करने का ऐलान करते हुए कहा कि इन धार्मिक स्थलों की स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता है परंतु अन्य प्रदेशों के लोगों के इनके बारे कम जानकारी है. इसलिए देश भर के श्रद्धालुओं को यहां के धार्मिक महत्व के बारे बताने के लिए प्रचार प्रसार किया जाएगा उत्तराखंड के फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बनेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के अनुसार, यहां पर माता सीता का भव्य मंदिर बनने पर भगवान राम और सीता में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति फलस्वाड़ी गांव जरूर आना चाहेगा। इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु माता सीता के उस स्थल को भी देखना चाहेंगे, जहां पर माता सीता ने भू-समाधि ली थी। फलस्वाड़ी गांव में माता सीता का भव्य मंदिर बनान के लिए इस क्षेत्र के हार गांव से और हर घर से एक शिला एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपये दान स्वरुप लिए जाएंगे। 
रविदास नगर (भदोई )जिले का सीतामढ़ी मंदिर:-
वह गंगा किनारे एक स्थान पर समाधि ली थी। कहा जाता है कि मां सीता ने तब देखा कि लव और कुश भगवान राम का मुकुट लेकर आए गए तो उनसे रहा नहीं गया और वह दुखी होकर धरती में समा गईं। कुछ लोग बिहार स्थित सीतामढ़ी को उनका समाधि स्‍थल बताते हैं तो कई उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर व संत रविदास नगर में गंगा किनारे उनके रहने और समाध‌ि लेने की बात करते हैं। भदोई जिले का सीता समाहित स्थल सीतामढ़ी मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से ११ किलोमीटर गंगा के किनारे स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर माँ सीता से अपने आप को धरती में समाहित कर लिया था। यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है। स्वामी जितेंद्रानंद जी के असीम प्रयास से और श्री प्रकाश नारायण पुंज की मदद से ये स्थान पर्यटक स्थल के रूप में उभर कर आया है
अयोध्या का राज दरबार:-
 रामायण से जुड़ी अन्य किंवदंतियों के अनुसार लव और कुश के बड़े होने पर जब एक बार भगवान राम ने मां सीता को अपने दरबार में बुलाया और पुन: अपने शुद्धता की शपथ लेने की बात कही। तो मां सीता उनकी इस बात से आहत हो गई और धरती मां से उन्हें अपनी गोद में बैठाने का आग्रह किया। जिसके बाद भरे दरबार में धरती फट गई और मां सीता उनकी गोद में समा गईं। अगर इस किंवदंति को सच माना जाए तो माता सीता ने अयोध्या में समाधि ली थी।