Wednesday, March 11, 2026

उपाध्याय इस्टेट” के प्राचीन संस्थापक वर्ग✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

उपाध्याय इस्टेट के संपूर्ण विकास क्रम को तीन काल खण्डों में बांटा जा सकता है- 

1.प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड 

2.प्राचीन विकासशील कालखण्ड 

3. वर्तमान विस्तारवादी काल खण्ड 

अति प्राचीन संस्थापक वर्ग के काल खण्ड में पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय’, पण्डित सीताराम उपाध्याय,लक्ष्मनदत्त,हरिप्रसाद, धर्मराज, महराजराम,परमेश्वरनाथ और ईश्वरनाथ उपाध्याय के अप्रतिम योगदान पर प्रकाश डाला गया है। इसी प्रकार अगले प्राचीन विकासशील कालखण्ड और वर्तमान विस्तार वादी कालखण्ड में इसके बिकास और विस्तार का चर्चा किया जाएगा।

प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड- 

विकास का यह पर प्रारंभिक चरण होने के कारण इसके सटीक समय बिंदु दृश्यमान नहीं होते हैं, अपितु यह बदलती या कही- सुनी कहानी के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को चलती हुई देखी जा सकती है। यद्यपि इस समय के संस्थापको ने किसी प्रत्याशा में कुल के संस्थापन का काम नहीं किया था, फिर भी इतिहास बोध के कारण इसे महत्वपूर्ण दर्जा दिया जा सकता है।

पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय’ “उपाध्याय इस्टेट” के वंशपुरुष थे - 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित था। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। चौदहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल अवध के बस्ती क्षेत्र में के घाघरा  नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बस कर यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया। उनके साथ कुछ ब्राह्मण परिवार भी इस भूभाग पर आए थे। वे अपना निवास स्थान यहां बनाकर राजा साहब के छत्रछाया में रहने लगे थे। ये राजवंश के पुरोहित और सलाहकार के रूप में भारद्वाज गोत्रिय उपाध्याय वंशीय विद्वान ब्राह्मण थे। इस वंश के पंडित सीताराम जी कुल के ग्यारहवें वंशावतंश के रूप में अत्यधिक प्रतिष्ठित हुए थे। उनके पिता जी का नाम पंडित गंगाराम उपाध्याय था।

    उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के राजा नगर और उनके दरबारी गण नगर राजमहल के पास स्थित खड़ैवा खुर्द निवासी, उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और ज्योतिष शास्त्र के आचार्य पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय' से प्रतिदिन संस्कृत पुराण, अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्होंने अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द नामक एक छोटे गांव में मकान भी बनवा लिए थे। इस मकान के पास यहां एक बड़ा कुंवा आज भी मौजूद है। आज से लगभग 15 साल पहले यहां श्री रामबरन चौबे रहते थे जो उपाध्याय वंश के श्री नागेश्वर उपाध्याय के दत्तक पुत्र थे।

पण्डित सीताराम “उपाध्याय इस्टेट” के संस्थापक- 

गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र रहे थे। जब 1765 में उतरौला के राजा सुलेमान खां ने 5,000 सैनिकों को लेकर नगर राज्य पर आक्रमण किया तो नगर राजा की तरफ से पंडित सीताराम उपाध्याय जी ने सुलेमान खां को समझा - बुझाकर लड़ाई होने से बचा लिया था। इससे खुश होकर उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी के तट तक फैला हुआ था और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीतारामजी को दान कर दिया था । 

     15 वर्ष की अथक प्रयास से इस भूमि को साफ सुथरा करके कृषि योग्य बनाकर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने “सीताराम पुर” नामक एक नया गांव बसा लिया था। ये नगर राज्य दरबार के चर्चित विद्वान और सलाहकार थे। ये 1795 ई. तक जीवित रहे । इस गांव को 1950 ई. तक खड़ैवा खुर्द के निवासी 'पुरवा' कह कर बुलाते थे। राजस्व रिकॉर्ड में अलग नाम पाकर भी यह गांव खड़ैवा गांव का एक मजरा या पुरवा तक ही सीमित था।

असाधारण प्रतिभा सम्पन्न लक्ष्मनदत्त- 

पंडित सीता राम जी के तीन पुत्र - लक्ष्मन दत्त मनोजदत्त और इंद्रदत्त थे। लक्ष्मनदत्त (1820-1890ई.)अजानुबाहु थे। अजानु बाहु  एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "जिसकी भुजाएं घुटनों तक लंबी हों"। यह शब्द आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जो शारीरिक रूप से मजबूत, शक्तिशाली और वीर होता है। भारतीय संस्कृति में, अजानुबाहु को अक्सर देवताओं, राक्षसों, योद्धाओं और राजाओं से जोड़ा जाता है। यह माना जाता था कि इन व्यक्तियों में असाधारण शक्ति और शारीरिक क्षमता होती थी, जो उनकी लंबी भुजाओं द्वारा दर्शायी जाती थी। भगवान राम को लम्बी भुजाओं के कारण इस नाम से पुकारा जाता था। महाभारत में भीम और वर्तमान समय में महात्मा गांधी को अजानुबाहु के रूप में वर्णित किया गया है। 

    इसके अलावा अजानबाहू का एक और अर्थ होता है - अजं का अर्थ होता है हाथी, बाहु यानी हाथ। हाथी जैसे ताकत वाले को भी कहा जा सकता है। उदाहरण के तोर पर जैसे छत्रपति शिवाजी,अर्जुन, जैसे लोकों के लिये भी इसका प्रयोग हुआ है। संक्षेप में कहना हो तो ज्ञान, कर्म और भक्ति यह तीन गुण जिसमें हो तो उसे अजानबाहु कह सकते हैं।

लक्ष्मनदत्त की अलग थी कद-काठी- 1857 की स्वाधीनता के दौरान लक्ष्मन दत्त की आयु कोई 35 वर्ष की थी। वे सबसे अलग दिखते थे। उनकी भर्ती गोरखपुर में हुई थी। 200 लोगों में वे अपनी अलग पहचान बनाए रखे थे। इनकी ऊंचाई और स्वास्थ्य का कोई जवाब नहीं था । इनकी ऊंचाई 7 फिट सीना सवा गज और वजन लगभग दो मन था। ये लगभग 10 सेर दूध, एक सेर घी और एक सेर छुहारा, सवा सेर घी की पूड़ी खाते थे। एक पाव चना,एक पाव किसमिस रोज सबेरे खाते थे। भर्ती में आए  किसी भी जवान से लड़ने के लिए तैयार थे। वे रस्साकसी में दस जवान को अकेले पिछाड़ देते थे। वे एक बीर सैनिक थे। वह भारतीय सैनिकों में सदैव चर्चित रहे।

– (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4, 5)

ब्रिटिश सेना में सूबेदार रहे लक्ष्मनदत्त- 

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह (1812- 1857) बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 1890 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। ये पूर्व वर्णित गंगाराम के पौत्र और सीताराम उपाध्याय के पुत्र थे। जिनको उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था। 

हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” के प्रथम जमींदार- 

लक्ष्मणदत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” की जमींदारी संभालते थे। इनका समय 1840 से 1910 के मध्य था। आज्ञाराम जी अपने चाचा लछिमन दत्त के सहयोग से ब्रिटिश हुकूमत में थानेदार के पद पर लगभग 40 वर्षों तक कार्य किये। लखनऊ इनका क्षेत्र था। ये एक तेज तर्रार दरोगा थे इन्हें हाकिम हुक्काम से लेकर उस समय के ताल्लुकेदार लोग खूब जानते व सम्मान देते थे। ये अरबी और फारसी के जानकार थे। अपने पिता के अत्यधिक प्यार को पाकर ये घर की जमीनदारी तक सीमित रह गये। इन्हें डाक्टर मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने सन् 1946 के आस-पास देखा था। -(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत पृष्ठ 55)

    आज्ञाराम से धर्मराज, साहबराम से महराजराम तथा हरिप्रसाद से गजराजराम, दौलतराम और छागुरराम पुत्र उत्पन्न हुए। इन सभी  की उत्पत्ति 1875 ई. से 1900 ई. के मध्य हुई थी। लछमन दत्त के कोई सन्तान नहीं थी। इनके भाई मनोगदत्त और इन्द्रदत्त के सन्तानें थीं। यहीं से उपाध्याय वंश का हिस्सा दो फलकों में आधा-आधा हो गया। इन्द्रदत्त के पौत्र महाराजराम का पूरी सम्पत्ति में 1/2 भाग और मनोगदत्त के पौत्र और आज्ञाराम के पुत्र धर्मराज तथा हरिप्रसाद के पुत्र गजराज राम, दौलतराम, छांगुरराम 1/4, के हिस्सेदार हुए। 

     दोनों थानाध्यक्षों का कार्यकाल 1890 में रहा, उस समय इनका परिवार चरम विकास पर था। उसी समय इस वंश में अलग होने का भेद उत्पन्न हो गया और महराजराम, धर्मराजराम और गजराज राम आदि का परिवार तीन खण्डों में विभक्त हो गया। इस उपाध्याय वंश का चरमोत्कर्ष काल 1885 में यह क्षेत्र चर्चित था। दोनों दरोगा अक्सर अपने घोड़ों से गाँव पर एक साथ आते थे। हरि प्रसाद जी इस उपाध्याय इस्टेट के पारिवारिक मुखिया थे। -- (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10) 

लक्ष्मनदत्त ने पोखरनी का राजमहल तैयार करवाया था - 

राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की थी। उपाध्याय इस्टेट के रिटायर्ड सूबेदार लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा बने हुए थे। 1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राजकोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजनकर उन्हें राजा के पद पर अभिषेक कराया।

लाल रूपेंद्र नारायण सिंह के समय में उपाध्याय इस्टेट ने राजा पद वापस दिलवाया - 

1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया था। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।  जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए उपाध्याय इस्टेट के उनके उपरोहित ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हुए थे। कचूरे इस्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबरसलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए थे। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्णमुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए। -(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)

      इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर लिया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया। - (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)

धर्मराज व महराजराम को उपाध्याय इस्टेट का साफा पहनाया गया था - महाराज राम 1870 में पैदा हुए थे।उनकी शादी माधवपुर में हुई थी जिनसे  परमेश्वर नाथ 18 94 में पैदा हुए थे। ईश्वर नाथ 1896में, केदारनाथ 1898 में, तामेश्वर नाथ 1900 में पहली पत्नी से पैदा हुए थे। पहली पत्नी का निधन होने के बाद 1903 में दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा में हुआ जिनसे 1908 में चंद्रिका प्रसाद का जन्म हुआ।महाराज राम लगभग 1948 ई तक जीवित रहे।

       गोरखपुर और अवध क्षेत्र में अंग्रेजों ने 1801 में देशी राजाओं से सत्ता छीनी थी। इस समय बांसी में राजा सर्वजीत सिंह 1777-1808 ई.तक शासन किए थे। इसके बाद उनकी रानी रणजीत कुँवरि 1808-1813 ई. तक रियासत के शासन प्रशासन का संचालन किया था। संतान न होने के कारण राजा श्रीप्रकाश सिंह 1813-1840 ई. में दत्तक पुत्र के रूप में उनवल से यहां लाए गए थे। इसके बाद राजा महिपति सिंह तृतीय 1840-1863 ई. तक अंग्रेजों की कृपा से सत्ता का संचालन किया था। इसके बाद बांसी के राजा महेन्द्र सिंह को 1863 में उत्तराधिकार मिला था। उन्हें आगरा के दरबार में चैम्पियन आफ द स्टार आफ इण्डिया की उपाधि प्रदान की गई थी। उनकी मृत्यु 1668 में हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र राजा रामसिंह द्वितीय को 1863- 1913 को उत्ताधिकार मिला था। 1886 में दुराचरण के कारण महेंद्र सिंह को मिली उपाधि वापस ले ली गयी थी। परन्तु दस वर्ष बाद पुनः उपाधि लौटा दी गयी थी। राजा सार्वजनिक जीवन से अलग हट गये थे। उनकी सम्पत्ति उनके पुत्र लाल रत्नसेन सिंह द्वितीय 1913-18 को उत्तराधिकार में मिला था। यह राज्य इस समय अपनी उन्नति की अवस्था में था। इसने बस्ती और मगहर और गोरखपुर के बड़ी संख्या के गांवों को अपने अधीन कर लिया था। राजा की ननकार की भूमि राजस्व मुक्ति थी और यह लगभग 86 गांवों में थी। इनमें 25 गांवों में स्वयं राजा के कब्जे थे। शेष उनके करिन्दों व सहायकों के कब्जे थे। उन्हें इस सम्पत्ति के उप भू स्वामियों से कर प्राप्त होता था।

    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह द्वितीय 1913-1918 थे। जिनके कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे। वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमस आने वाले थे जो क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा करने वाले थे। उन लोगों का चन्दो ताल के आसपास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय इस्टेट सीतारामपुर के दोनों दरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर इस्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय इस्टेट के धर्मराज और महराजराम को इस्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय इस्टेट की मान्यता दी गई थी। -(डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)

महराजराम उपाध्याय इस्टेट प्रमुख के साथ आनरेरी मजिस्ट्रेट भी बने - 

महराजराम आनरेरी मजिस्ट्रेट की शक्ति का उपयोग करते थे। महाराज राम के पिता साहबराम दरोगा थे। उनके इकलौते पुत्र महाराज राम उपाध्याय आधे के हिस्सेदार थे। इनके पाँच पुत्र परमेश्वरनाथ, ईश्वरनाथ,केदारनाथ, तमेश्वरनाथ और चन्द्रिका प्रसाद हुए। महराजराम का शुरू का जीवन बड़ा सुखमय था। इनकी दो शादियां हुई थीं। पहली से परमेश्वर नाथ, ईश्वर नाथ, केदार नाथ और तमेश्वर नाथ नामक चार पुत्र और दूसरी पत्नी से चंद्रिका प्रसाद अकेले पुत्र थे। इस प्रकार यह एक बड़े परिवार के मुखिया थे। उनके प्रयास से पांच-पांच बहुएं सहित 44 पारिवारिक सदस्य एक साथ रहते थे। ये लगभग 1948 ई तक जीवित रहे। ये चार पांच दिन के उपरांत पोखरनी इस्टेट जाया करते थे, जहां इनका काफी सम्मान था। वे अपने पांचों पुत्रों के साथ मिलकर उपाध्याय इस्टेट को अच्छी तरह से संभाल लिए थे।

     परमेश्वर नाथ के दो पुत्र रामबरन व राम सुन्दर घर के विशिष्ट जिम्मेदार व्यक्ति थे। ईश्वरनाथ के कोई पुत्र नहीं था उनकी पत्नी का नाम श्रीमती श्यामराजी था जो 1980 में दिवंगत हुई। वे इस परिवार की वफादार गृहणी थी । यद्यपि इनको जायदात का पाँचवाँ भाग मिला हुआ था, किन्तु इन्होंने परिवार के चारों भाई के लोगों को अपना सम्पूर्ण हिस्सा दे दिया था। केदारनाथ के दो पुत्र डॉ. मुनिलाल और वशिष्ट प्रसाद हुये। केदारनाथ के समय में खानदान का ऐसा गौरव बढ़ा कि क्षेत्र के बड़े-बड़े जमीनदार घरानों की समता में कुल का स्थान स्थापित हो गया था।

परमेश्वरनाथ पहले पुलिस फिर कांग्रेस में शामिल- 

1920 से 1950 तक इनके पुत्रों का समय विकासोन्मुख रहा। परमेश्वर नाथ पुलिस की सेवा में थे । बाद में नौकरी छोड़ घर आकर अपने पिता जी के निर्देशन में अपने भाइयों के साथ खेती कराने लगे थे। 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर परमेश्वर नाथ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिए थे । कांग्रेस की मदद करने पर इन्हें खोजने प्रायः पुलिस आया करती थी। ये खुद और अपने पुत्र राम बरन को “सिसवारी रघुबीर सिंह” नामक गांव में आवास बनाकर सीरवारी करते थे। यह गांव बहादुरपुर ब्लाक मुख्यालय से 1 किमी की दूरी पर स्थित है। परमेश्वर नाथ ने इस्टेट का मुकदमा व जमीनदारी की वसूली तहमीन अपने हाथ में लिया था। पूरा परिवार विकास की कड़ी को मजबूत करने में एक दूसरे का सहयोग करने में लगा हुआ था।

   ईश्वरनाथ  चौड़ी छाती, बड़ी मूछ वाले, बलवान और पहलवान थे। इनकी कोई संतान जीवित ना बच सकी थी। केदार नाथ और तमेश्वर नाथ का झुकाव कृषि के तरफ था। इसी समय पोखरनी में भूपेंद्र प्रताप नारायण का समय था। इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद जी थे। ये पहलवान और खूब ताकतवर थे। ये उपाध्याय इस्टेट की शान थे। इस प्रकार महराज राम के पांचों पुत्रों ने उपाध्याय स्टेट की जिम्मेदारी बखूबी निभानी शुरू कर दी थी।

ईश्वरनाथ अल्पायु लेकर आए थे - 

ईश्वरनाथ 42 साल में ही अपना भौतिक शरीर छोड़ साकेत वासी हो गए थे। नगर के राजा रूपेन्द्र नारायण भी सांत्वना देने के लिए पिता महराजराम के पास आए थे। उनकी विधवा पत्नी ने अपना अलग हिस्सा लेने से मना कर दिया था और उसे अपने संयुक्त परिवार में ही बांट दिया था। ईश्वनाथ की मृत्यु से उपाध्याय परिवार काफी दुःखी था। सभी भाई जब भी कोई मामला आता उनको यादकर रोने लगते। विशेषकर केदारनाथ जो भावुक व्यक्ति थे। ऐसा दुखी हुए कि उनकी चेतना भगवत भक्ति की तरफ उन्मुख हो गयी। महराजराम और उनकी पत्नी ऐसे शोक सागर में डूबी कि उनकी मानसिक स्थिरता कमजोर हो गयी। 

नोट:- 

यदि किसी परिवारी जन के पास कोई खास सूचना और कुछ दुर्लभ चित्र या दृश्य हो तो वह इस लिंक पर शेयर करके इन सूचनाओं को और अधिक प्रमाणिक बनाने में सहयोग कर सकता है।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


No comments:

Post a Comment