Tuesday, March 3, 2026

नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की शहादत और उनके उत्तरावर्ती वंशजों का पुनर्स्थापना ::✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां :- 

बस्ती जिला मुख्यालय से आठ किमी दूर बस्ती-कलवारी रोड (एनएच 233) से जुड़ा बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित, एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। बौद्धों के समय से यह एक नगरीय क्षेत्र घोषित रहा । बाद में भरों की सत्ता के समय इसे चंद्रनगर के रूप में जाना जाता रहा। तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक अर्गल राज्य (जिला फतेहपुर) त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त अवध के बस्ती जिले के इस भूभाग पर यहां आकर सुरक्षा की दृष्टि से बस गए थे। यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच मनोरमा नदी के दोनों तटों पर एक लघु राज्य की स्थापना किये । प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग पर ) बादमें नगर खास/नगर बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी। अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था । बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हराकर उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना  नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह नगर के राजा बने। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने। राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी गनेशपुर पिपरा, पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं। 


(उपाध्याय स्टेट नगर बाजार के यशस्वी विद्वान डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' राष्ट्रपति महोदय महामहिम डा अब्दुल कलाम से शिक्षक पुरस्कार ग्रहण करते हुए) 

एक नया उपाध्याय स्टेट अस्तित्व में आया 

राजा नगर और उनके दरबारीगण नगर राजमहल के पास स्थित उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और शास्त्र और ज्योतिष के आचार्य पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय' से प्रतिदिन संस्कृत पुराण और अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्हें अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द में मकान बनवा दिए थे। गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र थे। जब 1765 में उतरौला के राजा सुलेमान खां ने 5000 सैनिकों को लेकर नगर राज्य पर आक्रमण कर दिया तो नगर राजा की तरफ से पंडित सीताराम उपाध्याय जी ने सुलेमान खां को समझा - बुझाकर लड़ाई होने से बचा लिया था। इससे खुश होकर उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी तक फैला और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीताराम जी को दान कर दिया था । इस पर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने सीतारामपुर नामक एक नया गांव बसा लिया था। (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4)

वीर स्वाभिमानी देशभक्त शासक उदय प्रताप नारायण का समय :- 

व्रिटिस काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ। राजा उदय प्रताप नारायण सिंह बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। उनका जन्म सन् 1812 ई. में हुआ था और वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय पड़ोस गांव सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 90 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। जिनके उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था। लक्ष्मण दत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय स्टेट” की जमींदारी संभालते थे। (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10) 

    अंग्रेज़ों के शासनकाल में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह अंग्रेज़ी सत्ता को कभी भी स्वीकार नहीं किया और 1857 की स्वतन्त्रता आन्दोलन की क्रांति में राष्ट्र के प्रति वफादारी निभाते हुए सक्रिय भूमिका निभाई थी। 

अनेक बार अंग्रेजों को मात दिया

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध साहस पूर्वक युद्ध किया। सीमित संसाधनों और स्वदेशी हथियारों के बल पर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। रणनीति और युद्धकौशल से उन्होंने कई बार अंग्रेज़ों को रोकने में सफलता पाई थी, किंतु भारी हथियारों, तोप और गोला बारूद से लैस अंग्रेज़ी सेना के आगे वे टिक ना सके और अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा था।

घाघरा तट पर 6 सैनिकों को मारे 

गोरखपुर गजेटियर के मुताबिक 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर ने 1857 में अग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का आह्वान किया था। नगर के राजा उदय प्रताप सिंह अपनी रियासत को अंग्रेजों से अपना राज्य स्वतंत्र घोषित कर इस जंग में कूद पड़े थे। उन्होंने अपने बहनोई अमोढ़ा नरेश “राजा जालिम सिंह” से सलाह-मशविरा किया। उनकी सहमति मिलने पर उन्होंने अंग्रेज सैनिकों के जलमार्ग को बाधित करने का निर्णय लिया, जो सरयू नदी से होकर जाता था। उन्होंने अपने राज्य से होकर गुजर रही सरयू नदी के तट पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया था। अंग्रेजों की सेना को घाघरा नदी के तट पर  रोक दिया। जब सेना फैजाबाद की तरफ से गोरखपुर की तरफ बढ़ रही अंग्रेज सैनिकों की नाव पर धावा बोल दिया और 6 सैनिकअधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था।

बचा सैनिक छिपकर अपने मुखिया को सूचना दिया

इन्हीं में से किसी तरह एक अंग्रेज सैनिक    बच गया था। वह अपनी जान बचाकर पैदल गोरखपुर पहुंचा और अपने मुखिया को पूरी घटना की जानकारी दी। उसके बाद गोरखपुर से अंग्रेजी सेना नगर राज्य पर हमला करने के लिए कूच कर दी थी।

घुसेरिया मैदान में हुई थी लड़ाई

29 अप्रैल 1857 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर बाजार स्थित राजा के किला के पास पहुंच गई । सेना ने राजा नगर के किले से एक किमी दूर घुसुरिया गांव के पास अपनो बेड़ा लगा लिया था। सितम्बर 1857 में हुई लड़ाई के दौरान अंग्रेजों ने गोला- बारूद के साथ तोपों का भरपूर प्रयोग किया था। बाद में अतिरिक्त सेना भी बुलाई गई थी । अंग्रेज सैनिकों के तोप का मुकाबला नगर के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की फौज ने सामान्य हथियारों से भरपूर  किया था। 

अंग्रेजों ने  किला ध्वस्त किया

गुरिल्ला वार में माहिर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने जब 1857 में अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की तो गोरी सेना ने उनके किले की घेराबंदी कर दी थी। राजा उदय प्रताप के किला में छिपे होने की आशंका में उस पर तोप से हमला कर दिया गया। हालांकि राजा उदय प्रताप किला की सुरंग के रास्ते बाहर निकल गए, लेकिन अंग्रेज नहीं मानें और तोप से किले को ढहा दिए। व्रिटिस सरकार ने इस मिट्टी के किले को नष्ट करवाकर समतल करवा दिया था। 

    अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर राज्य के अन्य गौतम जमीदारों के किले और महलों को अपना निशाना बना नष्ट किया था। अंग्रेजों की तोप और उनकी बर्बरता के आगे किसी अन्य की एक न चली और नगर बाजार का ऐतिहासिक किला ध्वस्त हो गया। अब भी किले के अवशेष अंग्रेजों के बर्बरता की दास्तां बयां कर रहे हैं।

रियासतों का अधिग्रहण और बिक्री

ब्रिटिश शासन के दौरान विद्रोह में भागीदारी करने और नगर राज्य के लगातार विद्रोह में भाग लेने के कारण, इसे रुधौली के बाबूओं, बांसी के राजा, बस्ती के राजा (कल्हंस राजपूत) और अन्य क्षेत्रीय प्रमुखों (जैसे बांसी और बस्ती के राजाओं) के साथ संघर्ष के बाद नगर राज्य को और कई अन्य प्रमुखों जैसे अन्य मालिकों को बेच दिया गया था।

नगर सहित छह किले ध्वस्त हुए थे 

नगर बाजार से पश्चिम कप्तानगंज मार्ग पर एक खंडहरनुमा संरचना में शहीद स्थल, दुर्गादेवी मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। प्रवेश द्वार के पास दीवाल में हिंदी भाषा के देवनागरी लिपि में एक शिलालेख संगमरमर के पत्थर पर खुदा है। अभिलेख में यह उल्लेख आया है कि अंग्रेजों ने केवल नगर का ही किला जमींदोज नहीं किया था, बल्कि नगर के आसपास के गौतमों के गौतम राजपूत के पांच अन्य के लिए भी नष्ट किए थे । ये नाम है मझगवां, भेलवल, पिपरा गौतम, बैरागल और गणेशपुर।

       अभिलेख की शब्दावली - 

 १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी    'राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर'   

                  स्मारक

“नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह ने १८५७ स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सेना एवं स्थानीय देश भक्तों के साथ अंग्रेजों की सेना से कई स्थानों पर घमासान युद्ध किया। युद्ध के दौरान कतिपय स्थानीय स्वार्थी गदारों ने अंग्रेजों को राजा की सेना के भेद को बता कर राजा को बन्दी बनवा दिया । राजा के बन्दी हो जाने पर नगर, मजगबा, भोलवल, पिपरा गौतम बैरागल तया गनेशपुर किलों को अंग्रेजों ने तोपों से ध्वस्त कर डाले और नगर राज्य बांसी के राजा को बतौर बक्शीस दे दिया। राजा साहब को गोरखपुर जेल में बन्दी बनाकर रखा गया। अंग्रेजों ने उन्हें अपमानित करके फांसी देने की योजना बनाई । इस अपमान जनक फांसी के बदले राजा साहब ने अपनी ही कटार से अपनी मृत्यु श्रेयस्कर समझकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।”

पत्नी को सुरक्षित निकाल लिया था 

अंग्रेजी सेना से घिरता देख राजा उदय प्रताप सिंह अपनी गर्भवती पत्नी के साथ भूमिगत हो गए। रानी को एक शुभचिंतक के यहां अठदमा में शरण दिला दिया। नगर के राजा की छावनी मजगवा निकट पोखरा बाजार में थी। नगर बाजार से मजगवां तक सुरंग थी, जिसके सहारे राजा सुरक्षित निकल गए। 

बहराइच में छिपे ,छलपूर्वक गिरफ्तारी 

अंग्रेजों के आगे आत्मसमपर्ण करने की बजाए उदय प्रताप सिंह ने बहराइच के जंगलों में शरण लिया। काफी प्रयास के बाद भी अंग्रेज अधिकारी उन्हें पकड़ नहीं पाए। उसके बाद फूट डालो राज करो की नीति अपनाते हुए अंग्रेज अधिकारियों ने राजा नगर के विश्वास पात्रों को फोड़ लिया। लोग बताते हैं कि यहां से भाग कर राजा उदय प्रताप गोंडा के टिकरी जंगल में पहुंच गए थे। अंग्रेजों के दलाल उन्हें भ्रमित कर फिर से नगर बाजार लाए और कैद करवा दिया। उनकी निशानदेही पर अंग्रेजों ने धोखे से गोंडा के टीकरी जंगल/ सिकरी नामक स्थान पर गिरफ्तार कर लिया। उनकी सारी जागीर सरकार ने जप्त कर ली गयी थी। 

अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई 

स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होने अपनी पदवी और जागीर दोनों खो दी थी। नगर के राजा एवं उनके आदमियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध अपने वंश परिवार तथा सारी सम्पत्ति को दांव पर लगा दिया। वे पराजित हुए उन्हें कैद कर गोरखपुर के पुलिस लाइन स्थित जेल में डाल दिया गया। उन पर केस चला और अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुना दी गई। अंग्रेज उन्हें सार्वजनिक स्थान पर फांसी देकर विद्रोहियों को कड़ा संदेश देना चाहते थे। लेकिन राजा को अंग्रेजों के हाथों मौत गवारा नहीं था। 

हत्या या आत्म बलिदान

उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। परंतु उन्होंने आत्म सम्मान से समझौता नहीं किया। वहां उन पर अत्याचार कर करके उन्हें तोड़ने का प्रयास किया गया। जब अंग्रेज कामयाब नहीं हुए तो जेल में उनकी हत्या कर दी गयी और बाहर यह खबर फैलाई गई कि फांसी के एक दिन 18 दिसंबर 1858 को पहले बैरक के बाहर तैनात संतरी से पानी मांगा। इसी बहाने उसकी राइफल को छीनकर उसमें लगी कटार को अपने गले में भोंक कर आत्म बलिदान देकर अपने प्राण त्याग दिए।उनका यह बलिदान देशभक्ति, वीरता और स्वाभिमान का अनुपम उदाहरण है।



पोखरनी में फिर से अस्तित्व में आया ये रियासत : 

पोखरनी का शब्दार्थ :- 

पुष्करिणी ( पोखरनी ) का हिंदी अर्थ

हथिनी या छोटा जलाशय होता है । इसके अलावा वास्तुशास्त्र शब्दावली में पुष्करणी पुष्करणि या पोखरनी मंदिर परिसर में निर्मित "तालाब" या "कुंड" को संदर्भित करता है। यह आमतौर पर सीढ़ीदार कुएँ या तालाब को दर्शाता है।साथ ही पुष्करणि शब्द का अनुवाद "कमल का तालाब" भी हो सकता है। इसे कल्याणी नाम से भी जाना जा सकता है ।

      भारत में सदियों से, हर गाँव के मंदिर में पुष्करणी नामक एक तालाब होता आया है। " पुष्करणी" शब्द " पुष्करम" से आया है , जिसका अर्थ है "जो उर्वरता प्रदान करता है", और पुष्टि का अर्थ है "स्वास्थ्य"।

    जब प्रत्येक गांव के केंद्र में, आमतौर पर मंदिर के पास, पानी को एकत्रित और संग्रहित किया जाता है, तो पूरे गांव में जल स्तर भरा रहता है और न केवल गांव के दैनिक उपयोग जैसे पीने और नहाने के लिए पानी उपलब्ध कराता है, बल्कि पूरे गांव की उर्वरता भी बढ़ाता है।

    एक भरा हुआ, साफ मंदिर का तालाब देखने में बहुत सुंदर लगता है। ये तालाब सदियों से स्थानीय लोगों द्वारा समाज के हितैषी के रूप में बनाए गए थे।

   दैनिक स्नान और स्थानीय मंदिरअनुष्ठानों के अलावा, इन तालाबों का मुख्य उद्देश्य जल संचयन करना था। इस गांव का चयन और यहां राज कुल को पुनर्स्थापना करना पुराने लोगों ने बहुत सोच समझ कर किया होगा।

पोखरनी की अवस्थिति:- 

पोखरनी,उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लॉक में नगर बाजार के पड़ोस का एक छोटा सा गांव है। यह जिला मुख्यालय बस्ती से दक्षिण की ओर 13 किमी.और बहादुरपुर से 5 किमी.दूर स्थित है। अंग्रेजो ने जब नगर राजकोट में स्थित राजपरिवार को नेस्सनाबूत कर दिया तो बांसी के राजा द्वारा इन्हें गुजारा के लिए पोखरनी आदि कुछ गांव दिए थे, जहां नगर राजा साहब के परिजनों ने नए सिरे से दूसरा राजमहल खड़ा किये। स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांति के बाद के निम्न लिखित वंशजों ने इस वंश परम्परा का उत्तरोत्तर विकसित किया था । यहां पोखरनी में अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह उच्चतर माध्यमिक  विद्यालय इनके परिजनों द्वारा संचालित किया जा रहा है। यह स्कूल अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में संचालित है। साथ ही एक प्राइमरी विद्यालय भी यहां चल रहा है। ये स्थल स्थानीय क्षेत्र में शिक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं । 

    पोखरनी स्थित पौराणिक महाकाली मंदिर परिसर में चल रहे नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा हर तीसरे साल आयोजित होती रहती है। लगभग पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के 80 फीसदी परिवार की जीविका चलाने वाले लोग खाड़ी देशों से लेकर केंद्र और प्रदेश की सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में सहभागिता निभा रहे हैं। यही नहीं, नौ दिन पूरे गांव के श्रद्धालु घर के बाहर ईशान कोण पर या फिर महाकाली मंदिर परिसर में भोजन पका कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। साथ ही हवनोत्सव के दिन सांस्कृतिक व तांत्रिक अनुष्ठान कर असाध्य रोगों से निजात पाते हैं।

        प्रमुख उत्तराधिकारी

1.विश्वनाथ प्रताप सिंह 

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की। उपाध्याय स्टेट के रिटायर्ड सूबेदार ने लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा थे। 1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राज कोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजन कर उन्हें राजा के पद पर राज्याभिषेक किया।

2.लाल रूपेंद्र नारायण सिंह 

1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हो गए थे। कचूरे स्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबर सलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए।(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)

      इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर रुपया 5000/- जमा करवाया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया।    (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)

    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह तृतीय 1913-1918 थे। इन्हीं के कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमसन आने वाले थे और क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा होने वाली थी। उन लोगों का चन्दो ताल के आसपास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय स्टेट सीता राम पुर के दोनों दरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर स्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय स्टेट के धर्मराज और महराजराम को स्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय स्टेट की मान्यता दी गई। (डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)

3.भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह 

लाल रूपेन्द्र नारायण के उत्तराधिकारी लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह थे। ये कुश्ती के बड़े शौकीन थे। इन्हें शिक्षा और धर्म संस्कृति में भी रुचि थी। फलत: इनके शुभ चिंतकों ने इन्हें सम्मान देने के लिए राजा भूपेंद्र प्रताप नारायण संस्कृत विद्यालय नारायण पुर तिवारी महराज गंज बस्ती में स्थापित कराया था।

     लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण का विवाह वर्तमान अंबेडकर नगर जिले के 'हंसवर' स्टेट के ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह की बेटी सुश्री सौभाग्य सुंदरी देवी 'सुंदर अली' से हुआ था। पोखरनी स्टेट में पहुंचते ही सुन्दरी जी का मन संगीत और साहित्य में बहुत रमा। सुन्दरी जी ने श्रृंगार और भक्ति को माध्यम बना कर के वाद्ययंत्रों पर गाये जाने वाले लोकगीतों की लयात्मक छन्दों और पदों की स्वयं रचना करने लगी थीं। महाराज भूपेन्द्र बहादुर सिंह के निधन के बाद रानी साहिबा के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होनें अपने आध्यात्मिक गुरू कुदरहा बस्ती निवासी महन्थ राम सुन्दर दास की प्रेरणा से अयोध्या में कनक भवन के पास “सुन्दर भवन” का निर्माण करवाया और अपना अधिकाधिक समय कनक बिहारी भगवान श्रीराम की सेवा में लगाना शुरू किया। इन्होनें सैकड़ों पद, कवित्त, सवैया के साथ-साथ उर्दू गजल लिखा । इनके गीतों में भावुकता के साथ तत्लीनता है , आत्म सुख की भावविभोरता है और आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की आकुलता है।

4.लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह 

लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण के पुत्र वीरेंद्र प्रताप सिंह हैं। शहीद स्थल राजकोट नगर बाजार बस्ती पर एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ने कहा था - आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं , ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

5.लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह

लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह ने इस वंश परम्परा को आगे बढ़ाया।

6.लाल आर्नेश प्रताप सिंह

लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल आर्नेश प्रताप सिंह जी वर्तमान में परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । 

    इस परिवार वालों का कहना है कि हमें अपने पूर्वज पर गर्व की अनुभूति होती है और अभी भी उनसे जुड़ी सामग्री बतौर निशानी व धरोहर के रूप में इनके राजमहल में रखी गई है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके त्याग व बलिदान को याद कर सकें।

राजकोट नगर बाज़ार बस्ती में है स्मारक स्थल 

नगर बाजार से पश्चिम कप्तान गंज मार्ग पर एक खंडहर नुमा संरचना में शहीद स्थल, देवी दुर्गा मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ फूल पत्ती पेड़ पौधे लताओं का झुरमुट भी देखा जा सकता है। यहाँ राजा का ध्वस्त किला स्मारक और एक शहीद स्थल मौजूद है ।

29 अप्रैल 1858 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के नगर किले को ध्वस्त कर दिया गया था। यहाँ नगर बाजार पंचायत द्वारा हर साल 18 दिसंबर को यहाँ मेले का आयोजन किया जाता है, जो स्थानीय स्तर पर देशभक्ति का बड़ा आयोजन बनता है।

किले में कुल देवी माता का एक मंदिर

मान्यता है कि राजा उदय प्रताप के किले में माता का एक मंदिर भी था। अंग्रेजों के हमले में किला ध्वस्त होने के साथ वह भी ध्वस्त हो गया। कुछ साल बाद स्थानीय लोगों को मां दुर्गा का स्वप्न आया कि जहां किला ध्वस्त हुआ वहां वह विराजमान हैं। मंदिर के पुजारी गिरीश महाराज ने बताया कि स्वप्न की बात लोगों के बंगाली बाबा से कही, जिसके बाद उन्होंने अपने शोध से पता लगाया। खोजबीन के बाद ध्वस्त किले में माता की पिंडी मिली। बाद में यहां एक मंदिर का निर्माण हुआ।पुजारी जी ने बताया कि राजकोट की माता गौतम क्षत्रिय वंश की कुलदेवी हैं। इस मंदिर को लेकर लोगों मे बड़ी आस्था है। यहां सच्चे मन से जो भी भक्त अपनी मुराद लेकर आता है, राजकोट की माता उसकी मुराद पूरी करती हैं। नवरात्र और दशहरे के मौके पर यहां बहुत भीड़ होती है, दूर-दूर से भक्त माता का दर्शन करने आते हैं। आजादी के सात दशक बाद भी जंग ए आजादी के साक्षी इस किले के संरक्षण व संवर्धन का कोई खास प्रशासनिक इंतजाम नहीं हो सका है। किले को सुरक्षित करने के लिए सरकार गंभीर नहीं शहीद राजा उदय प्रताप के प्रपौत्र लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं कि आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं l ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

     इसे और आकर्षित बनाया जा सकता है। इसे पर्यटक स्थल विकसित करने की पूर्ण संभावना है। इस पर वांछित देखरेख का अभाव देखा जा रहा है। इसकी देखभाल पहले राजकोट दुर्गा मन्दिर समिति करती थी, उस वक्त तक यहां साफ सफाई व अन्य व्यवस्था दुरूस्त थी लेकिन पूर्व के मण्डलायुक्त विनोद शंकर चैबे ने शहीद स्थल की देखरेख और इसके सुन्दरीकरण की जिम्मेदारी वन विभाग को सौंप दिया था । यहीं से शहीद स्थल की उपेक्षा शुरू हो गयी। धीरे धीरे यह जंगल में तब्दील हो गया। शहीद स्थल पर प्रशासनिक अधिकारी पुष्प चक्र भी अर्पित करने नही जाते हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता पुष्प अर्पित करने न आयें तो नई पीढ़ी को शहीद स्थल के बारे में नई पीढ़ी को पता ही न चले। पूर्व के जिलाधिकारी हरिभजन सिंह ने शहीद स्थल के सुन्दरीकरण और देखरेख की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग को सौपने के प्रस्ताव के साथ शासन को पत्र लिखा था। इसका कोई खास असर नही दिखा। यहां पानी की टंकी, सीमेण्ट की बनीं कुर्सियां, पुल, इंजन, हैण्ड पाइप आदि बेकार पड़े हैं। वर्षों से ये उपयोग में नही है। पहले शहीद स्थल राजकोट दुर्गा मन्दिर के नाम से दर्ज था लेकिन प्रशासनिक हस्तक्षेप से इसे अभिलेखों में वन विभाग के नाम दर्ज करा दिया था। इसका हाई कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। वर्तमान में शहीद स्थल में चारों ओर झाड झंखाड़ है। 18 दिसम्बर 2000 को तत्कालीन उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री धनराज यादव ने यहां राजा उदय प्रताप सिंह की प्रतिमा का लोकार्पण किया था।

नगर में लगता है अमर शहीद मेला

आदर्श नगर पंचायत नगर में अमर शहीद मेला आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन नवगठित नगर पंचायत द्वारा किया जाता है। जहां अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर नमन किया जाता है। मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले अमर बलिदानी को स्मरण कर नगर पंचायत के विद्यार्थियों को मंच प्रदान करना शहीद मेले का मुख्य उद्देश्य है। युवाओं को अमर बलिदानी राजा नगर के जीवन से प्रेरणा लेकर देश और समाज की सेवा का संकल्प दिलाया जाता है। दौड़ ,गायन, नृत्य प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और मेडिकल कैम्प लगाकर मरीजों के उपचार किए जाते हैं।

REFRENCES:

1. Report of tours in the Central Doab and Gorakhpur in 1875-76

2. Gazetteer of Basti

3. Rag Pankaj (1998). 1857, Need of Alternative Sources

4. Agazetteer being volume XXXII of the district Gazetteer of the united Province of Agra and Oudh( बस्ती ए डिस्टिक गजेटियर आफ दी यूनाइटेड प्राविंसेज आफ आगरा एण्उ अवध लेखक एच. आर. नेविल, 1907, पृ. 94.95) 

5. डा. वीरेंद्र श्रीवास्तव की शोध पुस्तक 'स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान'।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)





 









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