भूगोल के निर्माताओं ने सात वर्ष, सात पर्वत, सात समुद्र और सात द्वीपों की कल्पना करते हुए पृथ्वी के भूगोल का नया मानचित्र फैलाया। आज के युग में पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बंटा गया है। ये विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। विश्व का जो नक्शा आज हमारे पास है वह महर्षि वेदव्यास की ही देन है। वेदव्यास सप्तद्वीप पर पृथ्वी की एक पौराणिक और व्यवस्थित संरचना का वर्णन करते हैं, जो भारतीय दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान में गहराई से निहित है।पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बाँटने का कारण ये है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी पृथ्वी को 7 द्वीपों में ही बांटा गया है। रामायण में वर्णन है कि रावण ने इन सातों द्वीपों को जीत लिया था इसीलिए उसे"सप्तद्वीपाधिपति" कहा जाता था। इन सभी द्वीपों में अलग-अलग देश, पर्वत, नदियां और लोग निवास किया करते थे और ये सातों द्वीप सात पौराणिक समुद्रों से घिरे थे।
अगर हम केवल 50 वर्ष पीछे जाएं तो देखेंगे कि वैज्ञानिकों ने पहले 7 महासागरों की ही परिकल्पना की थी जिसे हाल के वर्षों में 5 तक सीमित कर दिया गया है।
सप्तद्वीप की रूपरेखा
सबके बीच में स्वर्णमय मेरु पर्वत है। मेरु को आजकल पामीर का बड़ा पठार कहा जाता है, जिसे प्राचीन परिभाषा में परम मेरु और महामेरु कहते थे। यहां भी मेरु को पृथ्वी का मध्य भाग माना गया। मेरु जिस भूभाग में था, उसकी संज्ञा इलावृत वर्ष या ऐरावत वर्ष कहते हैं।
मेरु के उत्तर में तीन वर्ष और तीन पर्वत एवं दक्षिण में भी तीन वर्ष और तीन पर्वत माने गये हैं । इस परिमंडल में कुल सात वर्ष और सात पर्वत हैं। इन सबको मिलाकर जम्बूद्वीप कहा गया। इस नाम की व्याख्या में यह कल्पना की गई की बीचों बीच में कोई जम्बू नाम का महावृक्ष है, जिस कारण द्वीप का नाम जम्बू द्वीप प्रसिद्ध हुआ। उसके फलों का रस जिस नदी में मिलता है, वह जम्बू नदी हुई और वहां की खानों से अर्थात मध्य एशिया में जो स्वर्ण उत्पन्न होता था, वह जाम्बूनद स्वर्ण कहलाया गया है।
मेरु के दक्षिण में सबसे पहले पूर्व से पश्चिम दिशा में निषध पर्वत फैला हुआ है। उसके बाद हरिवर्ष है, फिर हेमकूट पर्वत है, जिससे सटा हुआ प्रदेश किंपुरुषवर्ष है। किंपुरुष के दक्षिण में हिमवान पर्वत है, जिससे मिला हुआ भारतवर्ष है।
अब मेरु के उत्तर की ओर क्रमश: चलें तो पहले नील पर्वत और रमणक वर्ष मिलेगा। रमणक वर्ष को रम्यक वर्ष भी कहा गया है। उसके उत्तर में दूसरे स्थान पर श्वेत पर्वत है, जिसके वर्ष का नाम हिरण्यमय वर्ष है। हिरण्यमय को हैरण्यवत भी कहा है और वहां की नदी हैरण्यवती कही गई है। उसके और उत्तर तीसरे स्थान पर श्रृंगवान पर्वत पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ है, जिसके वर्ष का नाम उत्तरकुरु है। उत्तरकुरु के बाद समुद्र है। वहां समुद्रान्त प्रदेश में शांडिली देवी का निवास है, जिसे सदा प्रकाशित रहने के कारण स्वयंप्रभा भी कहा जाता था।
आज हम जिस आर्यावर्त में बैठे हैं वह जम्बूद्वीप के अंतर्गत आता था। विद्वान आज के एशिया महाद्वीप को ही प्राचीन जम्बूद्वीप मानते हैं। उसी प्रकार अन्य 7 द्वीप भी थे जिनमे अलग-अलग देश थे ,जहाँ विभिन्न राजा शासन करते थे। आज भी बिलकुल वही स्थिति है। हरेक महाद्वीप में कई देश हैं और वहाँ उनकी सरकार का शासन है। पौराणिक मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र माना जाता था। आइये अब उन सात पौराणिक द्वीपों के विषय में जानते हैं। ये सात द्वीप थे-
जंबू प्लक्षाह्वयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज
कुश: क्रौंच्स्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।।
इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।
सनातन कथा की थीम
सनातन कथा के अनुसार स्वयम्भुव मनु के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। प्रियव्रत बड़े पुत्र थे। प्रियव्रत का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मति से हुआ। इनसे दस पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ था प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्रों का जन्म हुआ था।
कहते हैं कि जब प्रियव्रत को पता चला कि सूर्य पृथ्वी के सिर्फ आधे भाग को ही प्रकाशित करता है, तो उन्होंने बाकी भूभाग को भी प्रकाशमान करने की मनोवृति लिए ज्योर्तिमय रथ पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा की।
इस तरह रथ के पहियों से जो लीक बना वे सात समुद्र बने तथा उससे संलग्न भूभाग सप्तद्वीप कहलाये। सातो द्वीप जिनका नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर था, क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे थे ।
1.जम्बू द्वीप: ये चारो ओर से लवण (खारे पानी) के सागर से घिरा है। आज का एशिया महाद्वीप इसे कहा जा सकता है।
2. प्लक्ष द्वीप: ये चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) के सागर से घिरा है।आज के दक्षिण अमेरिका का भूभाग इसे कहा जा सकता है।
3. शाल्मल द्वीप: ये चारो ओर से मदिरा (शराब) के सागर से घिरा है। वर्तमान का ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप इसका प्रतिनिधित्व करता है।
4. कुश द्वीप: ये चारो ओर से घृत (घी) के सागर से घिरा है। यह प्रशांत महासागर के आस पास फैला हुआ भूखंड है जिसे हम ओशिआनिया के नाम से जानते हैं।
5. क्रौंच द्वीप: ये चारो ओर से दधि (दही) के सागर से घिरा है। आज का अफ्रीका महाद्वीप इसे माना जा सकता है।
6. शाक द्वीप: ये चारो ओर से दुग्ध (दूध) के सागर से घिरा है। इसे आज का यूरोप महाद्वीप कहते हैं ।
7.पुष्कर द्वीप: ये चारो ओर से मीठे जल के सागर से घिरा है। यह आज के उत्तरी अमेरिका का भूभाग।
पृथ्वी की इस संरचना का वर्णन महर्षि पराशर ने मैत्रेय ऋषि से किया था। इन सातों द्वीपों का सम्मलित फैलाव 50,00,00,000 (पचास करोड़) योजन माना गया है।
महर्षि व्यास की दूरदृष्टि की अवधारणा
श्रीमद्भागवत पुराण विश्व के भूगोल पर एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह हमारे ग्रह, वसुमती, जो सात महाद्वीपों या "सप्त द्वीप" से बना है, का वर्णन करता है। यह प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की एक आकर्षक झलक प्रदान करता है।
श्रीमद्भागवत महा पुराण- स्कन्ध: 5 अध्याय: 20 के अनुसार कथा इस प्रकार है श्री शुकदेवजी ने पहले ही परीक्षित को मनु पुत्र प्रियव्रत के द्वारा भूलोक को सात द्वीपों में बाँटने की अद्भुत कथा सुनाई थी। एक बार इन्होंने जब यह देखा कि भगवान सूर्य सुमेरु की परिक्रमा करते हुए लोका लोक पर्यन्त पृथ्वी के जितने भागको आलोकित करते हैं, उसमेंसे आधा ही प्रकाशमें रहता है और आधेमें अन्धकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि ‘मैं रात को भी दिन बना दूंगा;’ सूर्य के समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथपर चढ़कर द्वितीय सूर्य की ही भाँति उनके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर डालीं।भगवान् की उपासना से इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था । उस समय इनके रथ के पहियों से जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ।
सप्त विभाजन
हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान में, विश्व को सात संकेंद्रित द्वीप- महाद्वीपों में विभाजित बताया गया है। इनका उल्लेख पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है। हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार, ये सप्तद्वीप मिलकर विश्व (भू-मंडल) बनाते हैं। इन द्वीपों के नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर हैं। प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्ववर्ती द्वीप की तुलना में आकार में दोगुना बड़ा होता है। ये सभी समुद्रों से घिरे हुए हैं। सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठा और मीठे जल से परिपूर्ण हैं। ये समुद्र सातों द्वीपों की खाइयों के समान हैं और अपने भीतर स्थित द्वीप के बराबर विस्तार वाले हैं। प्रत्येक समुद्र एक-एक करके क्रमशः सातों द्वीपों को बाहर से घेरता है। इसके पश्चात महाराज प्रियव्रत भूलोक के सातों द्वीप अपने पुत्रों में विभाजित कर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं।
सप्तद्वीप की अवधारणा भागवत में
श्रीमद्भागवतम् के अनुसार- श्रीशुकदेवजी परीक्षित से आगे भूमंडल के सातों द्वीपों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
1. जम्बू द्वीपः जम्बू वृक्षों की भूमि
जम्बूद्वीप, जिसका शाब्दिक अर्थ "जम्बू वृक्षों की भूमि" है, एशिया महाद्वीप माना जाता है। ग्रंथों में इसका वर्णन कमल के फूल के आकार का है जिसके केंद्र में सुमेरु पर्वत (संभवतः हिमालय का प्रतीक) स्थित है।जम्बूद्वीप वह स्थान है, जिसमें हम निवास करते हैं। यह भूमंडल रूप कमल के सात द्वीपों में सबसे भीतरी कोश स्थानीय द्वीप है, जो एक लाख योजन के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका आकार कमलपत्र के समान गोलाकार है। इसमें कुल नौ खंड (वर्ष) हैं, जिनका क्षेत्रफल समान रूप से नौ-नौ हजार योजन है। इन खंडों को आठ पर्वत अलग- अलग भागों में विभाजित करते हैं। इन नौ वर्षों में से इलावृत वर्ष सबसे प्रमुख और पवित्र है, क्योंकि इसके मध्य में दिव्य मेरु पर्वत स्थित है। मेरु पर्वत से प्रवाहित अनेक पवित्र नदियाँ पूरे जम्बूद्वीप को जीवनदायिनी जलधारा से सिंचित करती हैं।
इन वर्षों में भारतवर्ष को छोड़कर शेष सभी वर्षों को भूलोक के स्वर्ग के रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ के निवासी त्रेतायुग समान दिव्य जीवन जीते हैं, जहाँ सौंदर्य, शक्ति और आनंद का अनवरत प्रवाह है। पर्वतों की सुरम्य घाटियाँ, आश्रम, वन-उपवन, और पुष्पों से लदे वृक्ष देवताओं के विहार के लिए सुसज्जित हैं। जलाशयों में खिले कमल और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को दिव्यता से भर देती है। इन वर्षों में भगवान नारायण अपनी विभिन्न मूर्तियों से निवास करते हुए वहाँ के निवासियों पर कृपा बरसाते हैं। जम्बूद्वीप के ये नौ वर्ष हैं— इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, हरिवर्ष, केतुमालवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, उत्तर कुरुवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष हैं।
2. प्लाक्ष द्रीपः प्लक्ष वृक्ष की भूमि
यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।जिस प्रकार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप से घिरा हुआ है, वैसे ही जम्बूद्वीप भी अपने समान आकार और विस्तार वाले खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे खाई के चारों ओर बगीचा होता है, वैसे ही यह क्षार समुद्र अपने से दोगुने बड़े प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है। जम्बूद्वीप में जितना विशाल जामुन का वृक्ष है, उतना ही बड़ा और स्वर्ण के समान चमकने वाला प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष यहाँ स्थित है, इसी कारण इसका नाम प्लक्षद्वीप पड़ा। यहां के स्वामी मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे - शान्तहय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक और ध्रुव।यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर शान्तहयवर्ष, इत्यादि नाम रखे गये थे।
इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। इस द्वीप में सात जिह्वाओं वाले अग्निदेव निवास करते हैं। इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र इध्मजिह्व थे, जिन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं आध्यात्मिक साधना में लीन हो गए।
इन सात वर्षों (भागों) के नाम शिव, यवस, सुभद्र, शांत, क्षेम, अमृत और अभय हैं। प्रत्येक वर्ष में सात प्रसिद्ध पर्वत और सात नदियाँ प्रवाहित होती हैं। सात पर्वत हैं – मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल। सात नदियाँ हैं – अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा।
यहाँ चार वर्ण होते हैं – हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग। इन नदियों के जल में स्नान करने से लोगों के रजोगुण और तमोगुण धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। यहाँ के लोगों की आयु एक हजार वर्ष होती है और इनके शरीर देवताओं की तरह थकान व पसीना रहित होते हैं। इनकी संतानोत्पत्ति भी देवताओं की भाँति होती है। ये सभी सूर्य भगवान की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। प्लक्षद्वीप और अन्य पाँच द्वीपों में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों को समान आयु, इंद्रिय बल, मनोबल, शारीरिक शक्ति, बुद्धि और पराक्रम प्राप्त होता है।
3 .शाल्मली द्वीप: शाल्मली वृक्षों की भूमि
शाल्मली द्वीप उस महाद्वीप को संदर्भित करता है जिसे जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित माना जाता है, जिसे अक्सर अफ्रीका भी कहा जाता है। शास्त्रों में इसे एक विशाल शाल्मली वृक्ष (रेशमी-कपास वृक्ष) के आकार का बताया गया है। प्लक्षद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से घिरा हुआ है। इसके आगे इससे दोगुने आकार का शाल्मली द्वीप स्थित है, जो अपने ही समान विस्तार वाले मदिरा (शराब) के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे प्लक्षद्वीप में विशाल पाकर का वृक्ष है, वैसे ही शाल्मली द्वीप में उतना ही बड़ा शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है। कहा जाता है कि यही वृक्ष अपने वेदमय पंखों से भगवान की स्तुति करने वाले पक्षिराज गरुड का निवास स्थान है, और इसी कारण इस द्वीप का नाम शाल्मली द्वीप पड़ा।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र यज्ञबाहु थे। उन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया। इन भागों के नाम हैं – सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात। यहाँ भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – स्वरस, शतशृंग, वामदेव, कुन्द, मुकुन्द, पुष्पवर्ष और सहस्र श्रुति। सात नदियाँ हैं – अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका। इस द्वीप में श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और इषन्धर नाम के चार वर्ण निवास करते हैं। ये सभी वेदमंत्रों के द्वारा चन्द्रदेव की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति में स्तोत्र गाते हैं।
4. कुशद्वीप : कुश घास की भूमि
कुशद्वीप, जिसका अर्थ है "कुश घास की भूमि", जम्बूद्वीप के पश्चिम में स्थित माना जाता है, जो संभवतः यूरोप के अनुरूप है। ग्रंथों में इसे त्रिभुजाकार और इस पवित्र घास से आच्छादित बताया गया है। मदिरा (शराब) के समुद्र से आगे, उससे दोगुने आकार का कुशद्वीप स्थित है। यह भी पहले बताए गए द्वीपों की तरह अपने ही समान विस्तार वाले घृत (घी) के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में भगवान द्वारा रचा गया एक कुश घास का झाड़ है, और इसी के कारण इसका नाम कुशद्वीप पड़ा। इसकी कोमल शिखाएँ इतनी तेजस्वी हैं कि दूसरे अग्निदेव की तरह अपनी आभा से सभी दिशाओं को प्रकाशित करती रहती हैं।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों – वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव को सौंप दिया और स्वयं तपस्या में लीन हो गए। इस द्वीप की सीमाओं को निर्धारित करने वाले सात पर्वत और सात नदियाँ हैं। सात पर्वत हैं – चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविण। सात नदियाँ हैं – रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता और मन्त्रमाला। इन नदियों के जल में स्नान करके कुशद्वीप के निवासी – कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक नाम के चार वर्ण, अग्निस्वरूप भगवान हरि की यज्ञ और अन्य धार्मिक कर्मकौशल के द्वारा उपासना करते हैं।
5.क्रौंचद्वीप
क्रौंच (सारस) पक्षी की भूमि क्रौंचद्वीप, या "क्रौंच पक्षी की भूमि", जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित माना जाता है, जो संभवतः उत्तरी अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है। शास्त्रों में इसे सारस के आकार का और सुखद जलवायु वाला बताया गया है। घी के समुद्र से आगे, उससे दो गुने विस्तार वाला क्रौंचद्वीप स्थित है। जिस प्रकार कुशद्वीप घी के समुद्र से घिरा हुआ था, वैसे ही क्रौंचद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दूध के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में क्रौंच नाम का एक विशाल पर्वत स्थित है, और इसी के कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ा। प्राचीन काल में श्री स्वामी कार्तिकेयजी के शस्त्र प्रहार से इस पर्वत का मध्य भाग तथा इसकी लताएँ, वन-उपवन क्षत-विक्षत हो गए थे। लेकिन बाद में, क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) से सिंचित होकर और वरुणदेव की सुरक्षा से यह पुनः निर्भय हो गया।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र घृतपृष्ठ थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों— आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति— को सौंप दिया और स्वयं सन्यास धारण कर लिया। इन सात क्षेत्रों में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र। सात नदियाँ हैं – अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, पवित्रवती और शुक्ला। इन नदियों के शुद्ध और पवित्र जल का सेवन करने वाले इस द्वीप के निवासी ऋषभ, द्रविण और देवक नाम के तीन वर्णों में विभाजित हैं। वे जल-देवता की उपासना करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं।
6. शाकद्वीप शक द्वीपः शकों की भूमि
शाकद्वीप का तात्पर्य जम्बूद्वीप के पूर्व में स्थित महाद्वीप से है, जो संभवतः दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया से संबंधित है। ग्रंथों में इसका वर्णन शकों द्वारा निवासित बताया गया है, जिनका उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) के आगे, उससे भी दुगुने परिमाण वाला शाकद्वीप स्थित है। यह द्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दही के समुद्र से घिरा हुआ है। इसमें शाक (सागौन) नामक एक विशाल वृक्ष है, जिसकी अत्यंत मनोहर सुगंध से संपूर्ण द्वीप महकता रहता है। यही वृक्ष इस द्वीप के नामकरण का कारण बना। इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र महाराज मेधातिथि थे। उन्होंने इसे सात वर्षों में विभक्त कर उन्हीं के समान नाम वाले अपने सात पुत्रों— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधार— को सौंप दिया। फिर वे स्वयं भगवान अनन्त (शेषनाग) में दत्तचित्त होकर तपोवन चले गए।
इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।
7. पुष्करद्वीप
इस प्रकार पुष्करद्वीप सातों द्वीपों में सबसे बड़ा है, जो दही के समुद्र से भी आगे, चारों ओर मीठे जल के समुद्र से घिरा हुआ है। यहाँ एक विशाल स्वर्णमय कमल (पुष्कर) स्थित है, जिसकी लाखों चमकदार पंखुड़ियाँ अग्नि की लौ जैसी देदीप्यमान हैं। इसी कारण इसे ब्रह्माजी का आसन माना जाता है।
इस द्वीप के मध्य में मानसोत्तर नामक एक विशाल पर्वत है, जो इसके पूर्वी और पश्चिमी भागों को विभाजित करता है। यह पर्वत दस हजार योजन ऊँचा और उतना ही लंबा है। इसकी चारों दिशाओं में इन्द्र आदि लोक पालों की चार पुरियाँ स्थित हैं। इसी पर्वत के ऊपर मेरु पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करने वाला सूर्य का रथ उत्तरायण और दक्षिणायन के क्रम में निरंतर गति करता है, जिससे देवताओं के दिन और रात बनते हैं। प्रियव्रत के पुत्र वीतिहोत्र इस द्वीप के राजा थे। उन्होंने अपने दो पुत्रों— रमणक और धातकि— को द्वीप के दो भागों का अधिपति बना दिया और स्वयं भगवान की भक्ति में लीन हो गए। यहाँ के निवासी ब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक की प्राप्ति कर सकते हैं। मेरु पर्वत से लेकर मानसोत्तर पर्वत तक जितना अंतर है, उतनी ही भूमि शुद्ध जल के समुद्र के उस पार स्थित है। वहां सुवर्णमयी भूमि है, जो दर्पण जैसी स्वच्छ है। इस भूमि में गिरा हुआ कोई भी पदार्थ फिर से नहीं मिलता, इसलिए वहां देवताओं के अलावा और कोई प्राणी नहीं रहता।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)