Thursday, January 8, 2026

सप्तद्वीप का भौगोलिक और शास्त्रीय पुरातन आधार ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में सप्त द्वीप या सात महाद्वीपों की अवधारणा नई नहीं है। पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में विश्व के सात महाद्वीपों का स्पष्ट उल्लेख है। सप्तद्वीप उन सात पौराणिक द्वीपों को कहा जाता है, जिनमें पृथ्वी बँटी हुई है। जो चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं।

      भूगोल के निर्माताओं ने सात वर्ष, सात पर्वत, सात समुद्र और सात द्वीपों की कल्पना करते हुए पृथ्वी के भूगोल का नया मानचित्र फैलाया। आज के युग में पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बंटा गया है। ये विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। विश्व का जो नक्शा आज हमारे पास है वह महर्षि वेदव्यास की ही देन है। वेदव्यास सप्तद्वीप पर पृथ्वी की एक पौराणिक और व्यवस्थित संरचना का वर्णन करते हैं, जो भारतीय दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान में गहराई से निहित है।पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बाँटने का कारण ये है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी पृथ्वी को 7 द्वीपों में ही बांटा गया है। रामायण में वर्णन है कि रावण ने इन सातों द्वीपों को जीत लिया था इसीलिए उसे"सप्तद्वीपाधिपति" कहा जाता था। इन सभी द्वीपों में अलग-अलग देश, पर्वत, नदियां और लोग निवास किया करते थे और ये सातों द्वीप सात पौराणिक समुद्रों से घिरे थे। 

      अगर हम केवल 50 वर्ष पीछे जाएं तो देखेंगे कि वैज्ञानिकों ने पहले 7 महासागरों की ही परिकल्पना की थी जिसे हाल के वर्षों में 5 तक सीमित कर दिया गया है। 

सप्तद्वीप की रूपरेखा 

सबके बीच में स्वर्णमय मेरु पर्वत है। मेरु को आजकल पामीर का बड़ा पठार कहा जाता है, जिसे प्राचीन परिभाषा में परम मेरु और महामेरु कहते थे। यहां भी मेरु को पृथ्वी का मध्य भाग माना गया। मेरु जिस भूभाग में था, उसकी संज्ञा इलावृत वर्ष या ऐरावत वर्ष कहते हैं।

     मेरु के उत्तर में तीन वर्ष और तीन पर्वत एवं दक्षिण में भी तीन वर्ष और तीन पर्वत माने गये हैं । इस परिमंडल में कुल सात वर्ष और सात पर्वत हैं। इन सबको मिलाकर जम्बूद्वीप कहा गया। इस नाम की व्याख्या में यह कल्पना की गई की बीचों बीच में कोई जम्बू नाम का महावृक्ष है, जिस कारण द्वीप का नाम जम्बू द्वीप प्रसिद्ध हुआ। उसके फलों का रस जिस नदी में मिलता है, वह जम्बू नदी हुई और वहां की खानों से अर्थात मध्य एशिया में जो स्वर्ण उत्पन्न होता था, वह जाम्बूनद स्वर्ण कहलाया गया है।

     मेरु के दक्षिण में सबसे पहले पूर्व से पश्चिम दिशा में निषध पर्वत फैला हुआ है। उसके बाद हरिवर्ष है, फिर हेमकूट पर्वत है, जिससे सटा हुआ प्रदेश किंपुरुषवर्ष है। किंपुरुष के दक्षिण में हिमवान पर्वत है, जिससे मिला हुआ भारतवर्ष है। 

    अब मेरु के उत्तर की ओर क्रमश: चलें तो पहले नील पर्वत और रमणक वर्ष मिलेगा। रमणक वर्ष को रम्यक वर्ष भी कहा गया है। उसके उत्तर में दूसरे स्थान पर श्वेत पर्वत है, जिसके वर्ष का नाम हिरण्यमय वर्ष है। हिरण्यमय को हैरण्यवत भी कहा है और वहां की नदी हैरण्यवती कही गई है। उसके और उत्तर तीसरे स्थान पर श्रृंगवान पर्वत पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ है, जिसके वर्ष का नाम उत्तरकुरु है। उत्तरकुरु के बाद समुद्र है। वहां समुद्रान्त प्रदेश में शांडिली देवी का निवास है, जिसे सदा प्रकाशित रहने के कारण स्वयंप्रभा भी कहा जाता था।

     आज हम जिस आर्यावर्त में बैठे हैं वह जम्बूद्वीप के अंतर्गत आता था। विद्वान आज के एशिया महाद्वीप को ही प्राचीन जम्बूद्वीप मानते हैं। उसी प्रकार अन्य 7 द्वीप भी थे जिनमे अलग-अलग देश थे ,जहाँ विभिन्न राजा शासन करते थे। आज भी बिलकुल वही स्थिति है। हरेक महाद्वीप में कई देश हैं और वहाँ उनकी सरकार का शासन है। पौराणिक मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र माना जाता था। आइये अब उन सात पौराणिक द्वीपों के विषय में जानते हैं। ये सात द्वीप थे- 

जंबू प्लक्षाह्वयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज

कुश: क्रौंच्स्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।।

     इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।

सनातन कथा की थीम

सनातन कथा के अनुसार स्वयम्भुव मनु के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। प्रियव्रत बड़े पुत्र थे। प्रियव्रत का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मति से हुआ। इनसे दस पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ था प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्रों का जन्म हुआ था।

      कहते हैं कि जब प्रियव्रत को पता चला कि सूर्य पृथ्वी के सिर्फ आधे भाग को ही प्रकाशित करता है, तो उन्होंने बाकी भूभाग को भी प्रकाशमान करने की मनोवृति लिए ज्योर्तिमय रथ पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा की।

    इस तरह रथ के पहियों से जो लीक बना वे सात समुद्र बने तथा उससे संलग्न भूभाग सप्तद्वीप कहलाये। सातो द्वीप जिनका नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर था, क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे थे ।

1.जम्बू द्वीप: ये चारो ओर से लवण (खारे पानी) के सागर से घिरा है। आज का एशिया महाद्वीप इसे कहा जा सकता है।

2. प्लक्ष द्वीप: ये चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) के सागर से घिरा है।आज के दक्षिण अमेरिका का भूभाग इसे कहा जा सकता है।

3. शाल्मल द्वीप: ये चारो ओर से मदिरा (शराब) के सागर से घिरा है। वर्तमान का ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप इसका प्रतिनिधित्व करता है।

4. कुश द्वीप: ये चारो ओर से घृत (घी) के सागर से घिरा है। यह प्रशांत महासागर के आस पास फैला हुआ भूखंड है जिसे हम ओशिआनिया के नाम से जानते हैं। 

5. क्रौंच द्वीप: ये चारो ओर से दधि (दही) के सागर से घिरा है।  आज का अफ्रीका महाद्वीप इसे माना जा सकता है।

6. शाक द्वीप: ये चारो ओर से दुग्ध (दूध) के सागर से घिरा है। इसे आज का यूरोप महाद्वीप कहते हैं । 

7.पुष्कर द्वीप: ये चारो ओर से मीठे जल के सागर से घिरा है। यह आज के उत्तरी अमेरिका का भूभाग।

     पृथ्वी की इस संरचना का वर्णन महर्षि पराशर ने मैत्रेय ऋषि से किया था। इन सातों द्वीपों का सम्मलित फैलाव 50,00,00,000 (पचास करोड़) योजन माना गया है। 

महर्षि व्यास की दूरदृष्टि की अवधारणा

श्रीमद्भागवत पुराण विश्व के भूगोल पर एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह हमारे ग्रह, वसुमती, जो सात महाद्वीपों या "सप्त द्वीप" से बना है, का वर्णन करता है। यह प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की एक आकर्षक झलक प्रदान करता है।          

        श्रीमद्भागवत महा पुराण- स्कन्ध: 5 अध्याय: 20 के अनुसार कथा इस प्रकार है श्री शुकदेवजी ने पहले ही परीक्षित को मनु पुत्र प्रियव्रत के द्वारा भूलोक को सात द्वीपों में बाँटने की अद्भुत कथा सुनाई थी। एक बार इन्होंने जब यह देखा कि भगवान सूर्य सुमेरु की परिक्रमा करते हुए लोका लोक पर्यन्त पृथ्वी के जितने भागको आलोकित करते हैं, उसमेंसे आधा ही प्रकाशमें रहता है और आधेमें अन्धकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि ‘मैं रात को भी दिन बना दूंगा;’ सूर्य के समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथपर चढ़कर द्वितीय सूर्य की ही भाँति उनके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर डालीं।भगवान् की उपासना से इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था । उस समय इनके रथ के पहियों से जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ।


सप्त विभाजन

हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान में, विश्व को सात संकेंद्रित द्वीप- महाद्वीपों में विभाजित बताया गया है। इनका उल्लेख पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है। हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार, ये सप्तद्वीप मिलकर विश्व (भू-मंडल) बनाते हैं। इन द्वीपों के नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर हैं। प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्ववर्ती द्वीप की तुलना में आकार में दोगुना बड़ा होता है। ये सभी समुद्रों से घिरे हुए हैं। सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठा और मीठे जल से परिपूर्ण हैं। ये समुद्र सातों द्वीपों की खाइयों के समान हैं और अपने भीतर स्थित द्वीप के बराबर विस्तार वाले हैं। प्रत्येक समुद्र एक-एक करके क्रमशः सातों द्वीपों को बाहर से घेरता है। इसके पश्चात महाराज प्रियव्रत भूलोक के सातों द्वीप अपने पुत्रों में विभाजित कर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं।

सप्तद्वीप की अवधारणा भागवत में 

श्रीमद्भागवतम् के अनुसार- श्रीशुकदेवजी परीक्षित से आगे भूमंडल के सातों द्वीपों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

1. जम्बू द्वीपः जम्बू वृक्षों की भूमि

जम्बूद्वीप, जिसका शाब्दिक अर्थ "जम्बू वृक्षों की भूमि" है, एशिया महाद्वीप माना जाता है। ग्रंथों में इसका वर्णन कमल के फूल के आकार का है जिसके केंद्र में सुमेरु पर्वत (संभवतः हिमालय का प्रतीक) स्थित है।जम्बूद्वीप वह स्थान है, जिसमें हम निवास करते हैं। यह भूमंडल रूप कमल के सात द्वीपों में सबसे भीतरी कोश स्थानीय द्वीप है, जो एक लाख योजन के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका आकार कमलपत्र के समान गोलाकार है। इसमें कुल नौ खंड (वर्ष) हैं, जिनका क्षेत्रफल समान रूप से नौ-नौ हजार योजन है। इन खंडों को आठ पर्वत अलग- अलग भागों में विभाजित करते हैं। इन नौ वर्षों में से इलावृत वर्ष सबसे प्रमुख और पवित्र है, क्योंकि इसके मध्य में दिव्य मेरु पर्वत स्थित है। मेरु पर्वत से प्रवाहित अनेक पवित्र नदियाँ पूरे जम्बूद्वीप को जीवनदायिनी जलधारा से सिंचित करती हैं।

      इन वर्षों में भारतवर्ष को छोड़कर शेष सभी वर्षों को भूलोक के स्वर्ग के रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ के निवासी त्रेतायुग समान दिव्य जीवन जीते हैं, जहाँ सौंदर्य, शक्ति और आनंद का अनवरत प्रवाह है। पर्वतों की सुरम्य घाटियाँ, आश्रम, वन-उपवन, और पुष्पों से लदे वृक्ष देवताओं के विहार के लिए सुसज्जित हैं। जलाशयों में खिले कमल और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को दिव्यता से भर देती है। इन वर्षों में भगवान नारायण अपनी विभिन्न मूर्तियों से निवास करते हुए वहाँ के निवासियों पर कृपा बरसाते हैं। जम्बूद्वीप के ये नौ वर्ष हैं— इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, हरिवर्ष, केतुमालवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, उत्तर कुरुवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष हैं। 

2. प्लाक्ष द्रीपः प्लक्ष वृक्ष की भूमि

यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।जिस प्रकार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप से घिरा हुआ है, वैसे ही जम्बूद्वीप भी अपने समान आकार और विस्तार वाले खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे खाई के चारों ओर बगीचा होता है, वैसे ही यह क्षार समुद्र अपने से दोगुने बड़े प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है। जम्बूद्वीप में जितना विशाल जामुन का वृक्ष है, उतना ही बड़ा और स्वर्ण के समान चमकने वाला प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष यहाँ स्थित है, इसी कारण इसका नाम प्लक्षद्वीप पड़ा।  यहां के स्वामी मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे - शान्तहय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक और ध्रुव।यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर  शान्तहयवर्ष, इत्यादि नाम रखे गये थे।

      इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। इस द्वीप में सात जिह्वाओं वाले अग्निदेव निवास करते हैं। इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र इध्मजिह्व थे, जिन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं आध्यात्मिक साधना में लीन हो गए।

      इन सात वर्षों (भागों) के नाम शिव, यवस, सुभद्र, शांत, क्षेम, अमृत और अभय हैं। प्रत्येक वर्ष में सात प्रसिद्ध पर्वत और सात नदियाँ प्रवाहित होती हैं। सात पर्वत हैं – मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल। सात नदियाँ हैं – अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा।

     यहाँ चार वर्ण होते हैं – हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग। इन नदियों के जल में स्नान करने से लोगों के रजोगुण और तमोगुण धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। यहाँ के लोगों की आयु एक हजार वर्ष होती है और इनके शरीर देवताओं की तरह थकान व पसीना रहित होते हैं। इनकी संतानोत्पत्ति भी देवताओं की भाँति होती है। ये सभी सूर्य भगवान की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। प्लक्षद्वीप और अन्य पाँच द्वीपों में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों को समान आयु, इंद्रिय बल, मनोबल, शारीरिक शक्ति, बुद्धि और पराक्रम प्राप्त होता है।

3 .शाल्मली द्वीप: शाल्मली वृक्षों की भूमि

शाल्मली द्वीप उस महाद्वीप को संदर्भित करता है जिसे जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित माना जाता है, जिसे अक्सर अफ्रीका भी कहा जाता है। शास्त्रों में इसे एक विशाल शाल्मली वृक्ष (रेशमी-कपास वृक्ष) के आकार का बताया गया है। प्लक्षद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से घिरा हुआ है। इसके आगे इससे दोगुने आकार का शाल्मली द्वीप स्थित है, जो अपने ही समान विस्तार वाले मदिरा (शराब) के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे प्लक्षद्वीप में विशाल पाकर का वृक्ष है, वैसे ही शाल्मली द्वीप में उतना ही बड़ा शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है। कहा जाता है कि यही वृक्ष अपने वेदमय पंखों से भगवान की स्तुति करने वाले पक्षिराज गरुड का निवास स्थान है, और इसी कारण इस द्वीप का नाम शाल्मली द्वीप पड़ा।

    इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र यज्ञबाहु थे। उन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया। इन भागों के नाम हैं – सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात। यहाँ भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – स्वरस, शतशृंग, वामदेव, कुन्द, मुकुन्द, पुष्पवर्ष और सहस्र श्रुति। सात नदियाँ हैं – अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका। इस द्वीप में श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और इषन्धर नाम के चार वर्ण निवास करते हैं। ये सभी वेदमंत्रों के द्वारा चन्द्रदेव की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति में स्तोत्र गाते हैं।

4. कुशद्वीप : कुश घास की भूमि

कुशद्वीप, जिसका अर्थ है "कुश घास की भूमि", जम्बूद्वीप के पश्चिम में स्थित माना जाता है, जो संभवतः यूरोप के अनुरूप है। ग्रंथों में इसे त्रिभुजाकार और इस पवित्र घास से आच्छादित बताया गया है। मदिरा (शराब) के समुद्र से आगे, उससे दोगुने आकार का कुशद्वीप स्थित है। यह भी पहले बताए गए द्वीपों की तरह अपने ही समान विस्तार वाले घृत (घी) के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में भगवान द्वारा रचा गया एक कुश घास का झाड़ है, और इसी के कारण इसका नाम कुशद्वीप पड़ा। इसकी कोमल शिखाएँ इतनी तेजस्वी हैं कि दूसरे अग्निदेव की तरह अपनी आभा से सभी दिशाओं को प्रकाशित करती रहती हैं।

       इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों – वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव को सौंप दिया और स्वयं तपस्या में लीन हो गए। इस द्वीप की सीमाओं को निर्धारित करने वाले सात पर्वत और सात नदियाँ हैं। सात पर्वत हैं – चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविण। सात नदियाँ हैं – रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता और मन्त्रमाला। इन नदियों के जल में स्नान करके कुशद्वीप के निवासी – कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक नाम के चार वर्ण, अग्निस्वरूप भगवान हरि की यज्ञ और अन्य धार्मिक कर्मकौशल के द्वारा उपासना करते हैं।

5.क्रौंचद्वीप

क्रौंच (सारस) पक्षी की भूमि क्रौंचद्वीप, या "क्रौंच पक्षी की भूमि", जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित माना जाता है, जो संभवतः उत्तरी अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है। शास्त्रों में इसे सारस के आकार का और सुखद जलवायु वाला बताया गया है। घी के समुद्र से आगे, उससे दो गुने विस्तार वाला क्रौंचद्वीप स्थित है। जिस प्रकार कुशद्वीप घी के समुद्र से घिरा हुआ था, वैसे ही क्रौंचद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दूध के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में क्रौंच नाम का एक विशाल पर्वत स्थित है, और इसी के कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ा। प्राचीन काल में श्री स्वामी कार्तिकेयजी के शस्त्र प्रहार से इस पर्वत का मध्य भाग तथा इसकी लताएँ, वन-उपवन क्षत-विक्षत हो गए थे। लेकिन बाद में, क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) से सिंचित होकर और वरुणदेव की सुरक्षा से यह पुनः निर्भय हो गया।

     इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र घृतपृष्ठ थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों— आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति— को सौंप दिया और स्वयं सन्यास धारण कर लिया। इन सात क्षेत्रों में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र। सात नदियाँ हैं – अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, पवित्रवती और शुक्ला। इन नदियों के शुद्ध और पवित्र जल का सेवन करने वाले इस द्वीप के निवासी ऋषभ, द्रविण और देवक नाम के तीन वर्णों में विभाजित हैं। वे जल-देवता की उपासना करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं।

6. शाकद्वीप शक द्वीपः शकों की भूमि

शाकद्वीप का तात्पर्य जम्बूद्वीप के पूर्व में स्थित महाद्वीप से है, जो संभवतः दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया से संबंधित है। ग्रंथों में इसका वर्णन शकों द्वारा निवासित बताया गया है, जिनका उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) के आगे, उससे भी दुगुने परिमाण वाला शाकद्वीप स्थित है। यह द्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दही के समुद्र से घिरा हुआ है। इसमें शाक (सागौन) नामक एक विशाल वृक्ष है, जिसकी अत्यंत मनोहर सुगंध से संपूर्ण द्वीप महकता रहता है। यही वृक्ष इस द्वीप के नामकरण का कारण बना। इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र महाराज मेधातिथि थे। उन्होंने इसे सात वर्षों में विभक्त कर उन्हीं के समान नाम वाले अपने सात पुत्रों— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधार— को सौंप दिया। फिर वे स्वयं भगवान अनन्त (शेषनाग) में दत्तचित्त होकर तपोवन चले गए।

    इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।

7. पुष्करद्वीप

इस प्रकार पुष्करद्वीप सातों द्वीपों में सबसे बड़ा है, जो दही के समुद्र से भी आगे, चारों ओर मीठे जल के समुद्र से घिरा हुआ है। यहाँ एक विशाल स्वर्णमय कमल (पुष्कर) स्थित है, जिसकी लाखों चमकदार पंखुड़ियाँ अग्नि की लौ जैसी देदीप्यमान हैं। इसी कारण इसे ब्रह्माजी का आसन माना जाता है।

    इस द्वीप के मध्य में मानसोत्तर नामक एक विशाल पर्वत है, जो इसके पूर्वी और पश्चिमी भागों को विभाजित करता है। यह पर्वत दस हजार योजन ऊँचा और उतना ही लंबा है। इसकी चारों दिशाओं में इन्द्र आदि लोक पालों की चार पुरियाँ स्थित हैं। इसी पर्वत के ऊपर मेरु पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करने वाला सूर्य का रथ उत्तरायण और दक्षिणायन के क्रम में निरंतर गति करता है, जिससे देवताओं के दिन और रात बनते हैं।  प्रियव्रत के पुत्र वीतिहोत्र इस द्वीप के राजा थे। उन्होंने अपने दो पुत्रों— रमणक और धातकि— को द्वीप के दो भागों का अधिपति बना दिया और स्वयं भगवान की भक्ति में लीन हो गए। यहाँ के निवासी ब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक की प्राप्ति कर सकते हैं। मेरु पर्वत से लेकर मानसोत्तर पर्वत तक जितना अंतर है, उतनी ही भूमि शुद्ध जल के समुद्र के उस पार स्थित है। वहां सुवर्णमयी भूमि है, जो दर्पण जैसी स्वच्छ है। इस भूमि में गिरा हुआ कोई भी पदार्थ फिर से नहीं मिलता, इसलिए वहां देवताओं के अलावा और कोई प्राणी नहीं रहता।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Tuesday, January 6, 2026

ज्ञान जी महाराज अयोध्या वाले

ज्ञान के भंडार, बाहरी आडंबरों से कोसो दूर रहने वाले, सरल व्यक्तित्व वाले, राम चरित मानस कथा के मर्मज्ञ, सन्त हृदय, मूलतः बस्ती जिले के गौतम राजपूत वंश के पुरोहित वाले ग्राम सीतारामपुर में 31 दिसंबर 1964 को पैदा होने वाले, राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान से सम्मानित जनता इंटर कालेज नगर बाजार बस्ती के यशस्वी प्राचार्य के द्वितीय पुत्ररत्न और वर्तमान में राम की नगरी अयोध्या धाम के वासुदेव घाट के केदार आश्रम  के निवासी,सरयू तट की पावनता को अंतःउर से आत्मसात करने वाले, अपनी ज्ञान गंगा को सरयू तट पर उड़ेलने वाले, पंडित श्री ज्ञान प्रकाश उपाध्याय शास्त्री जी  महराज को उनके ज्ञान भक्ति और शीलता के लिए असीम शुभकामनाएं और बधाई।
राम भक्ति में सराबोर ज्ञान जी महाराज ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री होते हुए उसे तिलांजलि देकर अध्यात्म को अपना अभीष्ट लक्ष्य चुन लिया है। फलत:
राम चरित मानस को पूरा का पूरा कंठस्थ कर राम कथा सागर की  खुशबू से सरयू तट और अवध धाम को सुवासित कर रहे हैं। उनकी मन मोहक और हृदय को आह्लादित करने वाली भाव भंगिमा अहरनिश विस्तारित हो रही है। 

राम कथा कराने के लिए बहुत ही कम खर्चे में ज्ञान जी महाराज अयोध्या वाले से मोबाइल नंबर 9628135656 पर संपर्क कर सकते है।
यूट्यूब पर भी उनके प्रवचन आप कभी भी सुन सकते हैं- 
https://youtube.com/@gyanjimaharajayodhya-e3s?si=dopHYzTP16pnEn5J

Monday, January 5, 2026

दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलन का मामला: पृष्ठभूमि वस्तुस्थिति और प्रभाव✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


तमिनलाडु के एक मन्दिर द्वारा एक स्तम्भ पर कार्तिक मास में वर्ष में एक बार एक दीपक प्रज्ज्वलित किया जाता रहा । यह मन्दिर एक पहाड़ी के बगल में स्थित है। पहाड़ी पर एक दरगाह भी बाद का बना हुआ स्थित है। मन्दिर दरगाह से काफी पुराना है। दरगाह वालों ने वर्ष में एक बार जलाए जाने वाले दीपक को अपने धर्म के खिलाफ बता दिया था। जिस स्तम्भ पर दीपक जलाया जाता है, वह दरगाह से करीब 164 फीट दूर स्थित है। हाईकोर्ट में मुकदमा चला। निर्णय मन्दिर के पक्ष में आया।

दरगाह वालों को खुश करने की मंशा
तमिलनाडु में इस समय दरगाह वालों को खुश करने वालों की सरकार है इसलिए हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद वह दीपक नहीं जलाने दिया गया। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, मगर यह विवाद यही नहीं रुका। डीएमके सरकार चाहती है कि उस जज की नौकरी छीन ली जाए जिसने यह आदेश पारित किया है।

जज को पद से हटाने के लिए महाभियोग
डीएमके ने हाईकोर्ट के उस जज को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला किया जिस पर 100 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर हैं। जिन लोगों ने हस्ताक्षर किया है उनमें कांग्रेस और सपा के भी सांसद शामिल हैं। इतना ही नहीं, याचिका देते समय अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी कनिमोझी के संग अगली कतार में दिख रहे थे।

एंटी हिन्दू पॉलिटिक्स 
डीएमके आज भी ब्रिटिश कालीन एंटी- हिन्दू पॉलिटिक्स करती है। इसलिए उसका स्टैण्ड समझ में आता है मगर अखिलेश जी और प्रियंका जी भी क्या यह मान चुके हैं कि जजों को मन्दिर के पक्ष में फैसला देने पर संसद में इमपीच किया जाएगा। तमिलनाडु में उठे इस विवाद को अभी से कुछ पर्यवेक्षक राज्य का अयोध्या मोमेंट बताने लगे हैं। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मंत्री ने जब बाबरी बनाने की घोषणा तब उन्होंने उन्हें पार्टी से निष्कासित करके अपना दामन बचाना चाहा मगर हुमायूँ कबीर के लक्षण देखकर लगता नहीं है कि यह मामला दबने वाला है।

मन्दिरवादी पार्टी को लाभ होगा
अगर ये मामले बढ़े तो इनका सीधा लाभ मन्दिरवादी पार्टी को मिलना तय है। भारत का स्वघोषित लिबरल और प्रोग्रेसिव तबका आज भी ब्रिटिश कालीन एंटी-हिन्दू नरेटिव को आईक्यू मानकर चलता है। यह तबका इस समय चुप्पी साधे हुए है। पश्चिम बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में सत्ता से एक कदम दूर है। तमिलनाडु में बीते लोक सभा चुनाव में भाजपा वोट शेयर के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है।

प्रज्वलित ना कर पाने का आगामी चुनावों पर असर

इन नए संवेदनशील मुद्दों का सम्बन्धित राज्यों की राजनीति पर क्या असर होगा, ये वक्त बताएगा मगर अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी को तैयार रहना चाहिए कि यूपी चुनाव में ये तस्वीर में हर घर घर पहुँचने से कोई रोक नहीं पाएगा। इसका खमियाजा इन दोनों मुख्य विपक्षी दलों को भुगतना ही पड़ेगा।

1400 वर्षों से चल रही परम्परा

थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर के शिखर पर दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलित करने की परंपरा करीब 1400 वर्षों से चल रही है।
कुछ दिन पहले तमिलनाडु में कार्तिगई दीपम उत्सव था जिसमें हिंदुओं को थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर के शिखर पर दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलित करना 
था । कोर्ट ने आदेश दे दिया था और सीआईएसएफ की टीम को भक्तों की सुरक्षा के लिए लगाया था। बावजूद डीएमके की पुलिस ने इसे जबरन रुकवा दिया और पहाड़ी के नीचे मंदिर के परिसर में ही दीप जलाने को मजबूर कर दिया।

      हिंदुओं ने विरोध किया तो उनपर शक्ति प्रदर्शन करके दबा दिया गया। जिस पर कोर्ट ने भी अवमानना लगाने को लेकर सुनवाई चल रही है। ये वहीं मंदिर है जिसकी पहाड़ी परमुस्लिम पीर की दुहाई देकर पूरे पहाड़ी पर दावा कर रहे थे और बकरीद के टाइम भी विवाद हुआ था।
जिस पर कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पहाड़ी को हिंदू स्थल के रूप में माना क्योंकि हिंदू करीब 1400 वर्षों से वहां आराधना कर रहे है।

भगवान मुरुगन का छठा पवित्र स्थान

इसे भगवान मुरुगन का छठा पवित्र स्थान माना जाता है जो कि शैव धर्म के लोगो के लिए हजारों वर्षों से तपस्या और ध्यान का केंद्र रहा है। भगवान मुरुगन (Murugan), जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद, सुब्रह्मण्य और कुमार भी कहते हैं, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं, और दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु के रक्षक देवता हैं, जो युद्ध, बुद्धि और शक्ति के प्रतीक हैं और मोर पर सवार होकर भाला (वेल) धारण करते हैं, जिन्हें तमिल लोग 'तमीज़ कादुवुल' (तमिलों के देवता) कहते हैं। 
        मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीराम ने कहा है कि तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित दरगाह के पास एक पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगई दीपम (दीपक) को जलाने को लेकर जिले के अधिकारियों द्वारा जताई जा रही सार्वजनिक अव्यवस्था उत्पन्न होने की आशंका ‘निराधार’ है और इसका उद्देश्य तमिल संस्कृति को बाधित करना है। श्रीराम ने कहा कि जब राज्य अपने अधिकारों को लागू करने के लिए ‘अनिच्छुक’ है, तो जनता उन्हें लागू करवाने की मांग कर सकती है।
     उन्होंने कार्तिगई दीपम उत्सव पर ‘दीपाथून’ (पत्थर का स्तंभ) पर दीपक जलाने की अनुमति देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध अपील का विरोध कर रहे श्रद्धालुओं की ओर से अपनी दलील पेश की।
     न्यायमूर्ति जी जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के के रामकृष्णन की खंडपीठ ने, न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन के एक दिसंबर के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों के एक समूह पर 17 दिसंबर 2025 को चौथे दिन सुनवाई करते हुए, यह जानना चाहा कि क्या श्रद्धालु बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अधिवक्ता ने इनकार कर दिया।
     इस मामले में अपीलकर्ता राज्य, दरगाह, वक्फ बोर्ड, मदुरै जिला और मंदिर के अधिकारियों ने 16 दिसंबर को अपनी दलीलें पूरी कीं, जो लगातार तीन दिनों तक चली थी। श्रीराम ने दलील दी कि श्रद्धालुओं के पूजा-पाठ के अधिकार का स्वरूप वक्फ बोर्ड और एएसआई के अधिनियम के बीच विवाद और अंत:क्रिया का विषय बन गया है।
      श्रीराम ने कहा, ‘‘सार्वजनिक व्यवस्था की दलील जिला प्रशासन की ओर से दी जा रही है, जिसने एकल न्यायाधीश (न्यायमूर्ति स्वामीनाथन) के समक्ष अपनी शिकायतें नहीं रखी हैं। सार्वजनिक व्यवस्था की दलील देना कोई बहाना या बचाव नहीं है, न ही जांच से बचने का कोई जरिया है।’’
    जब उन्होंने कहा कि अधिकारी कह रहे हैं कि धार्मिक अधिकार को सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन रखा जाना चाहिए, तो न्यायमूर्ति जयचंद्रन ने कहा, ‘‘दीपक न जलाने के लिए कहकर वे कैसे हस्तक्षेप कर रहे हैं? सार्वजनिक व्यवस्था का तर्क भी अतिरंजित है, और आपका तर्क भी।’’
      श्रीराम ने जोर देकर कहा कि दीपक जलाना एक हिंदू धार्मिक प्रथा है, लेकिन अधिकारियों ने यह कहकर इसका खंडन करने की कोशिश की कि किसी विशेष स्थान पर पूजा करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत अधिकार नहीं है।
     श्रीराम ने कहा, ‘‘मेरे मामले में, अधिकारियों की सोच संकीर्ण है और उनका झुकाव दूसरी तरफ है। मैं उस समुदाय का नाम नहीं लेना चाहता। दीपक जलाना और पूजा करना तमिल संस्कृति का हिस्सा है। इसे केवल सार्वजनिक अव्यवस्था की निराधार चिंताओं के आधार पर बाधित करने की कोशिश की जा रही है।’’












उठ कर ले भजन भगवान का

उठ कर ले भजन भगवान का, 
तेरे जीवन का तो यही सार है
बिना बंदगी भजन भगवान के, तेरा जीवन यूं ही बेकार है
उठ कर ले भजन भगवान का…

जन्म मिला तुझे अनमोल हीरा, माटी में क्यों खो दिया,
जिस मार्ग से जाना तुझे था, उसी में काँटों को बो दिया ।
यह न जाना कि झूठा संसार है, और झूठी यह मौज बहार है,
यह दुनियां तो मेला चंद रोज़ का, आखिर तो यहां अंधकार है ॥
उठ कर ले भजन भगवान का…

इस दुनियां की मोह ममता में, तूने प्रभु को भुला दिया,
विषय विकारों बद कर्मों में, जीवन सारा लुटा दिया ।
जिस नईया में तूँ सवार है, व्ही नईया तेरी मंझधार है,
बिना भजन धर्म पतवार के, कभी होगा न बेडा पार है ॥
उठ कर ले भजन भगवान का…

भूखा मरे कोई प्यासा मरे पर, तुझको किसी की फ़िक्र नहीं,
सत्य अहिंसा दया धर्म का, तेरी ज़ुबान पर ज़िक्र नहीं ।
सारी बीती उम्र यूं ही झूठ में, बेईमानी से किया व्यपार है,
जरा मन में तूँ अपने सोच ले, तूने कौन सा किया उपकार है ॥
उठ कर ले भजन भगवान का…

पाप करो चाहे करो भलाई, ऐसा कभी नहीं हो सकता,
औरों को दुःख देगा तो खुद भी, सुख से कभी नहीं सो सकता ।
जैसा बोएगा वैसा काट ले, यही कर्मो का खुला बज़ार है,
जिन्न कर्मों के जीते जीत है,उन कर्मों के हारे हार है ॥
उठ कर ले भजन भगवान का…

दुनियां में रहकर जीते जो मन को, वो प्राणी सभसे बलवान है,
छोड़ दे तूँ बदीओं को नाहक, इसमें तेरा कलियाण है ।
भव सागर से भी तर जाएगा, गर तेरा पर्भू से सच्चा प्यार है,
जो भक्ति की आँखों से देखता, उसे प्रीतम का होवे दीदार है ॥
उठ कर ले भजन भगवान का…

कृपया इस लिंक का आनन्द लें - 

https://www.instagram.com/reel/DF_piKzSlRN/?igsh=MXJmNmNkZWtmM2pjOA==

Sunday, January 4, 2026

अयोध्या के राजा युवनाश्व की विचित्र कहानी (रामजी के पूर्वज कड़ी 27) ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

कुल परम्परा 
इक्ष्वाकु वंश में जन्में युवनाश्व के पिता का नाम कुलवाश्व (या कुवलयाश्व/धुन्धुमार) था, जो अयोध्या के सूर्यवंशी राजा थे ।
 युवनाश्व का जन्म राजा कुलवाश्व की पत्नी सुपर्णा के गर्भ से हुआ था। इनका विवाह राजा महापद्म की कन्या गौरी से हुआ था। जिन्हें पुरुष होते हुए भी गर्भ धारण करना पड़ा था। यहाँ से ही सतयुग आरम्भ होता हैं। इक्ष्वाकु वंश की वंश श्रृंखला इस प्रकार रहा - 
1- ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि
2- मरीचि के पुत्र कश्यप
3- कश्यप के पुत्र विवस्वान या सूर्य
4- विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु – जिनसे सूर्यवंश का आरम्भ हुआ।
5- वैवस्वत के पुत्र नभग
6- नाभाग
7- अम्बरीष
8- विरुप
9- पृषदश्व
10- रथीतर
11- इक्ष्वाकु –
इक्ष्वाकु वंश सूर्यवंश राजवंश प्राचीन भारत के शासकों का एक वंश है। 
12- कुक्षि
13- विकुक्षि
14- पुरन्जय
15- अनरण्य प्रथम
16- पृथु
17- विश्वरन्धि
18- चंद्र
19- युवनाश्व- यही सतयुग समाप्त हो जाता है और इनके विचित्र ढंग से जन्मे संतान मान्धाता से त्रेता युग शुरू हो जाता है।
राजा युवनाश्व की विचित्र कहानी 
आज के आधुनिक युग में हम नए नए अविष्कार कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों से ये बात सिद्ध हो चुकी है कि ऐसी अधिकतर चीजें जो आज हम बना रहे हैं, उसका वर्णन हमारे धर्म ग्रंथों में पहले ही दे दिया गया था। ये इस बात को सिद्ध करता है कि सनातन हिन्दू धर्म ना केवल अति-प्राचीन है अपितु बहुत वैज्ञानिक भी। आज हम जो सेरोगेसी की बात करते हैं वो सदियों पहले पुराण और महाभारत में वर्णित था। उसी प्रकर आज के वैज्ञानिक इस बात पर भी शोध कर रहे हैं कि क्या पुरुष कृत्रिम रूप से गर्भ धारण कर सकते हैं? आज की ये कथा इसी बात का उत्तर है।
हम सबने श्रीराम के वंश के बारे में पढ़ा है। ब्रह्मा जी से 19वीं पीढ़ी में एक राजा हुए महाराज युवनाश्व। महाराज युवनाश्व अपने आप में अनोखे हैं क्यूंकि उन्होंने पुरुष होते हुए भी गर्भ धारण किया था। इस कथा का वर्णन हमें नारद पुराण में मिलता है। 
      विवाह के बहुत वर्षों के बाद भी दोनों निःसंतान रहे। संतान प्राप्ति के लिए महाराज युवनाश्व ने वन जाकर तप करने का निश्चय किया। उन्होंने राज-पाठ मंत्रियों के हाथ सौंपा और वन जाकर तपस्या करने लगे। उसी दौरान उनकी भेंट महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन ऋषि से हुई। जब महर्षि च्यवन ने महाराज युवनाश्व की समस्या सुनी तो उन्होंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि यज्ञ के प्रभाव से उन्हें संतान प्राप्त हो सकती है। तब महाराज युवनाश्व ने उनसे ही उस यज्ञ को संपन्न करने का अनुरोध किया। महर्षि की स्वीकृति के बाद महाराज युवनाश्व ने अपने मंत्रियों और सेना को वहाँ बुलाया और च्यवन ऋषि के निर्देशानुसार एक महान "काम पुत्रेष्टि यज्ञ" का आयोजन किया।

गर्भ धारण की रोचक कथा
राजा युवनाश्व के विवाह के वर्षों बाद भी उन्हें संतान नहीं हुई। इस दुःख को उन्होंने महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि च्यवन को बताया। महर्षि च्यवन ने पुत्र कामेष्टी यज्ञ कराने की योजना बनाई। यज्ञ एक वर्ष तक अविलम्ब चलता रहा और यज्ञ समाप्ति पर महर्षि च्यवन ने एक मटके में अभिमंत्रित जल रख दिया जिसे पीकर महारानी गौरी गर्भ धारण कर सके। यज्ञ समाप्त होने के बाद सभी लोग थकान से पीड़ित होकर गहरी निद्रा में सो गए। 
     च्यवन ऋषि द्वारा एक मटके में जल को अभिमंत्रित कर उसे हवन कुण्ड के पास रख दिया था। कुछ समय बाद रात्रि हो गई। रात्रि होने के बाद सभी विश्राम करने लगे। इसके बाद राजा युवनाश्व को बहुत जोरदार प्यास लगी। उन्होंने जल के लिए बहुत पुकारा लेकिन सभी के गहरी निद्रा में होने के कारण कोई उन्हें नहीं सुन सका। बहुत ढूंढने के बाद भी उन्हें जल नहीं मिला किन्तु तभी यञभूमि के पास उन्हें एक मटके में रखा जल दिखा। वे नहीं जानते थे कि वो जल अभिमंत्रित है जिसे उनकी पत्नी को पीना है और इसी अज्ञानता में उन्होंने उस अभिमंत्रित जल को पीकर सो गए।
     सुबह होने के पश्चात् महर्षि च्यवन ने जब मटके को खाली देखा तो उन्होंने सबसे पूछा। युवनाश्व की निद्रा खुलने के बाद उन्होंने बताया कि वो जल तो उन्होंने पी लिया है। जब महर्षि च्यवन ने ये देखा तो उन्होंने कहा कि अब उनके ही गर्भ से संतान की उत्पत्ति होगी। 
     महाराज युवनाश्व ने उनसे बड़ी प्रार्थना की कि वे उसका कोई उपाय बताएं किन्तु वे भी विवश थे क्यूंकि वो जल यज्ञ संपन्न कर अभिमंत्रित किया गया था और उसके फल को अब रोका नहीं जा सकता था। 
जल पीते ही उनके शरीर में कुछ कुछ बदलाव आरम्भ हुआ और वे अस्वस्थ हो गए थे । वे गर्भवती हो गए और प्रसव पीड़ा में चिल्लाने लगे। युवनाश्व अपने आप में विशेष हैं। इन्होंने पुरुष होते हुए गर्भ धारण किया था। 
     जब संतान के जन्म लेने का सही समय आया तो राजा बहुत घबरा गए। महर्षि च्यवन के लिए भी ये असाधारण  स्थिति थी। तब उन्होंने देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का आह्वान किया। तब अश्विनी कुमारों ने महाराज युवनाश्व के कोख को चीर कर एक बालक को बाहर निकाला। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि किसी पुरुष ने संतान उत्पन्न किया हो इसीलिए इस अद्भुत घटना के साक्षी बनने हेतु देवराज इंद्र सहित सभी देवता वहॉं उपस्थित हो गए थे।
     उस बालक के जन्म के साथ एक समस्या ये उत्पन्न हुई कि अब उसे दुग्धपान कौन करवाएगा? तब देवराज इंद्र स्वयं वहाँ आये और उन्होंने उस बालक के मुँह में अपनी तर्जनी अंगुली डाली जिससे दिव्य दूध निकल रहा था। उस दिव्य दुग्ध से तृप्त होकर वो बालक 13 अंगुल बढ़ गया और संतुष्ट होकर सो गया। 
     तब इंद्र ने कहा - "मम धाता", अर्थात मैं ही इसकी माँ हूँ। इसी कारण उस बालक का नाम "मान्धाता" पड़ा। देवराज इंद्र ने उसे ये वरदान दिया कि वो चक्रवर्ती राजा बनेगा जिसका यश दिग-दिगन्तर तक फैलेगा। 
       देवराज इंद्र का वरदान फलीभूत हुआ और मान्धाता संसार के सबसे महान सम्राटों में एक बने। कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवनकाल में प्रत्येक दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक राज किया। उन्होंने 100 अश्वमेघ एवं 100 राजसुय यज्ञ किये और 10 योजन लम्बे और एक योजन ऊँचा स्वर्ण मत्स्य का ढेर बना कर ब्राह्मणों को दान किया था। इन्ही मान्धाता से 44 पीढ़ी के बाद इक्ष्वाकु कुल में श्रीराम ने जन्म लिया।
     युवनाश्व की मृत्यु अयोध्या में हुई थी और उनकी मृत्यु के बाद मान्धाता को गद्दी पर बैठाया गया जो बहुत ही प्रसिद्ध राजा हुए थे।

केरल के अनंत-पद्मनाभ स्वामी मन्दिर का स्थापत्य और महाकुंभाभिषेक का विशेष उत्सव #आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

दक्षिण भारत का एक विशेष आयोजन

तिरुवनंतपुरम का संधि विच्छेद है: तिरु +अनंत +पुरम्। "तिरु" एक दक्षिण भारतीय आदर सूचक आद्याक्षर और संस्कृत के "श्री" का रूप है । "अनंत" भगवान अनंत (शेषनाग)के लिए हैं तथा संस्कृत शब्द "पुरम" का अर्थ  घर या वास स्थान होता है। तिरुवनंतपुरम का शाब्दिक अर्थ होता है "भगवान अनंत का वास स्थान"। भगवान अनंत, हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शेषनाग हैं जिनपर भगवान विष्णु विराजते हैं। श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु शेषनाग जी पर आराम की मुद्रा में बैठे हुए हैं, जो इस नगर की पहचान बन गया है। ब्रिटिश शासन के पर्यन्त इसे ट्रिवानड्रम के नाम से भी जाना जाता था। 1991 में राज्य सरकार ने इसका नाम बदलकर तिरुवनंतपुरम कर दिया। यद्यपि अब भी ट्रिवानड्रम नाम बहुत प्रयुक्त होता है।

केरल की राजधानी:देवताओं की नगरी 

केरल की इस राजधानी तिरुवनंतपुरम को त्रिवेंद्रम के नाम से भी पुकारा जाता है। देवताओं की नगरी के नाम से मशहूर इस शहर को महात्मा गाँधी ने नित हरा नगर की संज्ञा दी थी। इस नगर का नाम शेषनाग अनंत के नाम पर पड़ा जिनके ऊपर पद्मनाभस्वामी (भगवान विष्णु) विश्राम करते हैं। 

       इस प्राचीन नगर का इतिहास 1000 ईसा पूर्व से शुरू होता है। त्रावण कोर के संस्थापक अनीयम तिरुनाल मार्तंड वर्मा ने तिरुवनंतपुरम को अपनी राजधानी बनाया जो उनकी मृत्यु के बाद भी बनी रही। स्वतंत्रता के बाद यह त्रावणकोर- कोचीन की राजधानी बनी। 1956 में केरल राज्य के बनने के बाद से यह केरल की राजधानी है। पश्चिमी घाट पर स्थित यह नगर प्राचीन काल से ही एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र रहा है।       

      तिरुवनंतपुरम की सबसे बड़ी पहचान श्री पद्मनाभ स्वामी का मंदिर लगभग 2000 साल पुराना है। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने के बाद से यह नगर एक प्रमुख पर्यटक और व्यवसायिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ है। इसकी समृद्धसांस्कृतिक धरोहर और शोभायमान तटों से आकर्षित होकर प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक यहाँ खीचें चले आते हैं।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर:- 

पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल राज्य के तिरुअनन्तपुरम में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल यह ऐतिहासिक मंदिर तिरुअनंतपुरम के अनेक पर्यटन स्थलों में से एक है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर विष्णु-भक्तों की महत्वपूर्ण आराधना - स्थली है।

एकादशी को विशेष आयोजन :- 

अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी को पद्मनाभ एकादशी भी कहा जाता है। इस एकादशी व्रत का महत्व खुद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। पद्म पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने का भी विधान है। तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर में इस एकादशी पर विशेष पूजा की जाती है। 

किलानुमा संरचना:- 

 इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। तिरुवनंतपुरम के बीच में बना विशाल किले की तरह दिखने वाला पद्मनाभ स्वामी मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। महाभारत के मुताबिक श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा-अर्चना की थी। मान्यता है कि मंदिर की स्थापना 5000 साल पहले कलयुग के प्रथम दिन हुई थी, लेकिन 1733 में त्रावनकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। यहां भगवान विष्णु का श्रृंगार शुद्ध सोने के आभूषणों से किया जाता है।

एकादशी पर विशेष पूजा का विधान :- 

एकादशी पर विशेष पूजा भगवान विष्णु का मंदिर होने से यहां एकादशी पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस तिथि को यहां पर्व के रुप में मनाया जाता है। इस दिन सोने के गहनों से भगवान का विशेष श्रृंगार भी किया जाता है। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी और कार्तिक महीने में आने वाली देव प्रबोधिनी एकादशी पर यहां भगवान पद्मनाभ के विशेष दर्शन करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं।

दीपक के उजाले में होते हैं दर्शन :- 

मुख्य कक्ष जहां विष्णु भगवान की लेटी हुई मुद्रा में प्रतिमा है, वहां कई दीपक जलते हैं। इन्हीं दीपकों के उजाले से भगवान के दर्शन होते हैं। दूर- दराज से आए श्रद्धालु अत्यल्प समय और कम रोशनी में मनोवांछित दर्शन नहीं कर पाते हैं। स्वामी पद्मनाभ की मूर्ति में भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर जगत पिता ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित है। भगवान पद्मनाभ की मूर्ति के आसपास दोनों रानियों श्रीदेवी और भूदेवी की मूर्तियां हैं। भगवान पद्मनाभ की लेटी हुई मूर्ति पर शेषनाग के मुंह इस तरह खुले हुए हैं, जैसे शेषनाग भगवान विष्णु के हाथ में लगे कमल को सूंघ रहे हों। यहां मूर्ति का दर्शन अलग-अलग दरवाजों से किया जा सकता है। इसके लिए बहुत लम्बी लाइन लगती है। सात मंजिला सोने से जड़ा गोपुरम मंदिर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही यहां श्रद्धालुओं के लिए नियम भी हैं। पुरुष केवल धोती पहनकर ही मंदिर में जा सकते हैं और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना जरूरी है। अन्य किसी भी लिबास में प्रवेश यहां वर्जित है। मंदिर में एक सोने का खंभा बना हुआ है। मंदिर का स्वर्ण जड़ित गोपुरम सात मंजिल का है। जिसकी ऊंचाई करीब 35 मीटर है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में अद्भुत कारीगरी की गई है।

भगवान विष्णु की शयनमुद्रा मुख्य है:

श्री पद्मनाभ मंदिर की एक विशेषता है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा, बैठी हुई और खड़ी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। गर्भगृह में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा में मूर्ति का शृंगार फूलों से किया जाता है। भगवान विष्णु की खड़ी मूर्ति को उत्सवों के अवसर पर मंदिर से बाहर ले जाते हैं। वर्ष में दो बार धार्मिक समारोह होता है। इस समारोह में ‘आउत’ (पवित्र स्नान) किया जाता है। इस समारोह में भगवान विष्णु , नरसिंह और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियों को नगर के बाहर समुद्र किनारे पर ले जाकर स्नान कराया जाता है।

द्रवि‍ड़ियन वास्तुशिल्प का अद्भुत स्वरूप:- 

यह मंदिर भारत के सबसे प्रमुख वैष्णव मंदिरों में से एक है तथा तिरुवनंतपुरम का ऐतिहासिक स्थल है। पूर्वी दुर्ग के अंदर स्थित इस मंदिर का परिसर बहुत विशाल है जिसकी अनुभूति इसका सात मंजिला गोपुरम देखकर हो जाता है। केरल और द्रवि‍ड़ियन वास्तुशिल्प में निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है। पद्मा तीर्थम, पवित्र कुंड, कुलशेखर मंडप और नवरात्रि मंडप इस मंदिर को और भी आकर्षक बनाते हैं। 260 वर्ष पुराने इस मंदिर में केवल हिंदु ही प्रवेश कर सकते हैं।  इस मंदिर का नियंत्रण त्रावणकोर राजसी परिवार द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में दो वार्षिकोत्सव मनाए जाते हैं- एक पंकुनी के महीने (15 मार्च - 14 अप्रैल) में और दूसरा ऐप्पसी के महीने (अक्टूबर-नवंबर) में। इन समारोहों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

पौराणिक कथा :- 

पद्मनाभ स्वामी मंदिर के साथ एक पौराणिक कथा जुडी है। मान्यता है कि सबसे पहले इस स्थान से विष्णु भगवान की प्रतिमा प्राप्त हुई थी जिसके बाद उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है।

द्रविड़ स्थापत्य कला :- 

मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है जिसे देखने के लिए हजारों भक्त दूर दूर से यहाँ आते हैं। इस प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मान्यता है कि तिरुअनंतपुरम नाम भगवान के 'अनंत' नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है। यहाँ पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभ' कहा जाता है और इस रूप में विराजित भगवान यहाँ पर पद्मनाभ स्वामी के नाम से विख्यात हैं। तिरुअनंतपुरम का पद्मनाभ स्वामी मंदिर मृत कड़ियाँ केरल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। केरल संस्कृति एवं साहित्य का अनूठा संगम है। इसके एक तरफ तो खूबसूरत समुद्र तट है और दूसरी ओर पश्चिमी घाट में पहाडि़यों का अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य, इन सभी अमूल्य प्राकृतिक निधियों के मध्य स्थित- है पद्मनाभ स्वामी मंदिर। इसका स्थापत्य देखते ही बनता है मंदिर के निर्माण में महीन कारीगरी का भी कमाल देखने योग्य है।

महत्व:- 

मंदिर का महत्व यहाँ के पवित्र परिवेश से और बढ जाता है। मंदिर में धूप-दीप का प्रयोग एवं शंखनाद होता रहता है। मंदिर का वातावरण मनमोहक एवं सुगंधित रहता है।

स्वर्णस्तंभ :- 

मंदिर में एक स्वर्णस्तंभ भी बना हुआ है जो मंदिर के सौदर्य में इजाफा करता है। मंदिर के गलियारे में अनेक स्तंभ बनाए गए हैं जिन पर सुंदर नक़्क़ाशी की गई है जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देती है।मंदिर में हर वर्ष ही दो महत्वपूर्ण उत्सवों का आयोजन किया जाता है जिनमें से एक मार्च एवं अप्रैल माह में और दूसरा अक्टूबर एवं नवंबर के महीने में मनाया जाता है। मंदिर के वार्षिकोत्सवों में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेने के लिए आते हैं तथा प्रभु पद्मनाभ स्वामी से सुख-शांति की कामना करते हैं।

पद्मनाभ स्वामी मंदिर का मुख्य द्वार:- 

पद्मनाभस्वामी मन्दिर तक पहुँचाने वाले मार्ग का दृश्य पद्मनाभ स्वामी मंदिर का निर्माण राजा मार्तण्ड द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर के पुनर्निर्माण में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है। सर्वप्रथम इसकी भव्यता को आधार बनाया गया मंदिर को विशाल रूप में निर्मित किया गया जिसमें उसका शिल्प सौंदर्य सभी को प्रभावित करता है। मंदिर के निर्माण में द्रविड़ एवं केरल शैली का मिला जुला प्रयोग देखा जा सकता है।मंदिर का गोपुरम द्रविड़ शैली में बना हुआ है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का अदभुत उदाहरण है। मंदिर का परिसर बहुत विशाल है जो कि सात मंजिला ऊंचा है गोपुरम को कलाकृतियों से सुसज्जित किया गया है। मंदिर के पास ही सरोवर भी है जो 'पद्म तीर्थ कुलम' के नाम से जाना जाता है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर का महाकुंभाभिषेक :- 

पद्मनाभस्वामी मंदिर में 270 साल बाद एक दुर्लभ महाकुंभाभिषेक होने जा रहा है। ये आठ जून को होगा। बताया जा रहा है कि इस मंदिर मंदिर में लंबे समय से लंबित जीर्णोद्धार कार्य हाल के दिनों में पूरा हुआ है।इसके पूरा होने के बाद मंदिर में भव्य तरीके से महाकुंभभिषेक (भव्य अभिषेक) होगा।  इस अनुष्ठान का उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा को सुदृढ़ करना और मंदिर की पवित्रता को फिर से जागृत करना है।

महाकुंभअभिषेक, कैसे होता है :- 

कुंभअभिषेक  वास्तव में मंदिरों में होने वाले एक पारंपरिक हिन्दू अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा को मजबूत करना और मंदिर की पवित्रता को जागृत करना होता है। मान्यता है कि इस अनुष्ठान के जरिए मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की समन्वित और एकजुट किया जाता है। यह मंदिरों में होने वाली प्रतिष्ठा का ही अहम हिस्सा होता है। किसी नए मंदिर का निर्माण पूरा होने बाद या फिर किसी मंदिर का जीर्णोद्धार होने के बाद यह अभिषेक किया जाता है। यह भी कह सकते हैं कि मंदिर निर्माण या जीर्णोद्धार के बाद देवी-देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा और मंदिर के शुद्धीकरण के लिए इसका आयोजन किया जाता है.कुंभअभिषेक में कुंभ का आशय है सिर, जो मंदिर के शिखर की ओर इंगित करता है और अभिषेकम का मतलब है स्नान अनुष्ठान। कुंभअभिषेक के लिए पवित्र नदियों का जल घड़ों में लाया जाता है. इससे मंदिर के शिखर को अनुष्ठान पूर्वक स्नान कराया जाता है, जिसमें घड़ों का बलिदान होता है।

270 साल बाद होगा खास अनुष्ठान:- 

बता दें कि 270 साल बाद ये खास प्रकार का महाअनुष्ठान होने जा रहा है। मंदिर प्रबंधक बी श्रीकुमार ने इस संबंध में बताया कि सदियों पुराने मंदिर में 270 वर्षों से अधिक के अंतराल के बाद इस तरह का व्यापक जीर्णोद्धार और उससे जुड़ी रस्में हो रही हैं और अगले कई दशकों में ऐसा फिर से होने की संभावना नहीं है। परिसर में 8 जून को 'महाकुंभ अभिषेक' अनुष्ठान होगा।  इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न अनुष्ठान किए जाएंगे, जिसमें नवनिर्मित 'तजिकाकुडम' (गर्भगृह के ऊपर तीन और ओट्टक्कल मंडपम के ऊपर एक) का अभिषेक, विश्वसेन की मूर्ति की पुनः स्थापना और तिरुवंबाडी श्री कृष्ण मंदिर (मुख्य मंदिर परिसर में स्थित) में 'अष्टबंध कलसम' शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मंदिर के जीर्णोद्धार का काम संपन्न :- 

2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ पैनल के निर्देशानुसार जीर्णोद्धार का काम किया गया है। हालांकि काम जल्द ही शुरू हो गया था, लेकिन कोविड की स्थिति के कारण यह आगे नहीं बढ़ सका।  मंदिर में सदियों बाद व्यापक जीर्णोद्धार और संबंधित अनुष्ठान किए जा रहे हैं। दुनिया भर में भगवान पद्मनाभ के भक्तों के लिए इतने सालों बाद इन अनुष्ठानों को देखना एक दुर्लभ अवसर है। बता दें कि 8 जून को "महाकुंभभिषेकम" से पहले आने वाले दिनों में मंदिर में आचार्य वरणम, प्रसाद शुद्धि, धारा, कलसम और अन्य सहित विभिन्न अनुष्ठान किए जाएंगे। 

मंदिर का विजुवल लिंक - 

कृपया ये लिंक खोलें और अवलोकन करें।

https://www.facebook.com/share/v/1Bh7E8JhPa/

        आचार्य डा राधे श्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। (मोबाइल नंबर +91 8630778321;वॉर्ड्सऐप नम्बर+ 919412300183)



Friday, January 2, 2026

नीलकंठ वर्णी स्वामिनारायण की अयोध्या से बांसी होते हुए मुक्ति तीर्थ की यात्रा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

स्वामिनारायण का सामान्य परिचय :- 

श्री घनश्याम पांडे उपाख्य स्वामिनारायण जी  2 अप्रैल 1781 -1 जून 1830 ई.तक इस धरा पर विराजमान रहे।वे हिंदू धर्म केस्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक और इष्ट देवता रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के छपिया में हुआ था। उनके माता पिता का नाम धर्मदेव और भक्ती माता था। बाल्य काल में विद्या ग्रहण करके उन्होंने गृह त्याग किया था। सन 1792 ई.में, उन्होंने नीलकंठ वर्णी नाम को अपनाते हुए, 11 वर्ष की आयु में भारत भर में सात साल की तीर्थ यात्रा और तपस्चर्या की थी। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने कल्याणकारी गतिविधियां की और इस यात्रा के 9 वर्ष और 11 महीने के बाद, वह सन 1799 ई. के आसपास गुजरात राज्य में बस गए थे । सन 1800 ई.में, उन्हें अपने गुरु स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय में शामिल किया गया और उन्हें सहजानंद स्वामी का नाम दिया गया। सन 1802 ई . में अपने गुरु के द्वारा, उनकी मृत्यु से पहले, उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया गया था । सहजानंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और स्वामीनारायण मंत्र को पढ़ाया। तब से, वह स्वामीनारायण के रूप में जाने जाते हैं । 

उन्होंने 3000 से अधिक संतों को दीक्षा दी और लाखो अनुयायी बनाये। उनके जीवन काल में ही लाखों लोग भगवान स्वामी नारायण को परमात्मा मान कर उनकी भक्ति करने लगे थे। 

नीलकंठ वर्णी रूप में तपस्या:- 

अपनी माता और पिता के मृत्यु के बाद ग्यारह वर्षीय बालक घन श्याम पांडे घर छोड़कर जंगल में तपस्या करने चले गए। उनके तेजस्वी रुप और तपस्या शिवजी जैसी होने के कारण लोग स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी नाम से जानने लगें। नीलकंठ वर्णी ने सात वर्षों तक देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा की थी। उन्होंने हिमालय में कठिन तपस्या और भारत के समस्त तीर्थो की यात्रा की थी। बाद में उन्होंने गुजरात के रामानंद स्वामी से दीक्षा धारण कर उन्हे अपना गुरु बनाया। रामानंद स्वामी के देहांत के बाद उन्होंने स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना और प्रचार किया था। 

       "भगवान श्री स्वामीनारायण: एक दिव्य जीवन गाथा"लेखक : साधु अक्षर जीवन दास , प्रकाशक: स्वामीनारायण अक्षर पीठ अहमदाबाद, अगस्त 2022 पृष्ठ 46- 47 के विवरण के अनुसार -" भगवान श्री स्वामी नारायण संवत 1849 तदनुसार सन 1793 ई.में पंजाब के राजा रणजीतसिंह से दो बार भेंट किए थे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह तीर्थयात्रा करते हुए बदरीनाथ आए थे तब इस छोटे ब्रह्मचारी के प्रथम बार दर्शन किये थे। उनकी भीतर की मुमुक्षुता जाग गई थी। उम्र तेरह वर्ष की होने से उनका स्वामी जी से अधिक लगाव हो गया था। दंडवत्-प्रणाम करके वे ब्रह्मचारी के चरणों में बैठ गए थे। उनके हृदय में शान्ति छा गई थी । वे बोले,'मुझको शरण में लीजिए, इच्छा होती है कि सदैव आपके साथ रहूँ।' 

    ब्रह्मचारी ने कहा, 'राजन् ! हमारा और आपका रहन-सहन भिन्न है। आप भोगी हो, हम जोगी हैं। हम इस जगत से सदा उदासीन हैं, आप विषय विलासी हो। हम दोनों में भारी अन्तर है। इसलिए साथ निभाना कठिन है, फिर भी भगवान का शासन अपने सिर ढोते हुए प्रजा का पालन कीजिए। हम पुनः नीचे होडा मिलेंगे, अब तो हम यहाँ से गंगोत्री जाएँगे।' 

     राजा अपने साज-समान के साथ कुछ समय वहाँ रहे थे।

     ब्रह्मचारी दुर्गम पथ से गंगोत्री की ओर चल दिए। वहाँ जाकर हिमालय पर बैठकर स्नान किया। फिर हर की पौडी पर जब आए तब रणजीत सिंह से पुनः भेंट हुई। ब्रह्मचारी की ओर वे बहुत आकर्षित हुए थे। राजधर्म एवं मोक्ष की रीति उपदेश पाकर वे कृतार्थ हो गए थे। बार-बार ब्रह्मचारीजी के चरणों में मस्तक रख उन्होंने उनसे अच्छी तरह प्रजा का पालन करने का आशीर्वाद माँगा था।

    यहाँ से ब्रह्मचारी को मुक्तिनाथ (नेपाल) की ओर जाना था। वे इस दौरान अयोध्या वापस लौट आए थे। वे सरयू तट पर एकाध घंटा बैठे रहे । गृहत्याग किए आज बराबर एक वर्ष पूर्ण गया था। अयोध्या के नागरिक सब अपनी अपनी गत में मग्न थे। किसी से कुछ भी पूछे बिना ब्रह्मचारी ने मुक्तिनाथ का मार्ग ले लिया।"

हरैया गांव होकर यात्रा :- 

वर्तमान बस्ती जिले का हरैया गाँव (जो वर्तमान में तहसील है और राष्ट्रीय राज मार्ग 28 के किनारे बसा है।) होते हुए वे बंसीपुर में आए थे।



इस स्थान का मूल नाम 'हरि-रहिया' था, जो अवधी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ 'भगवान का मार्ग' है, क्योंकि भगवान राम इस रास्ते से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और मिथिला गए थे। बंसीपुर को आधुनिक बांसी कहा जाता है, जहां श्रीनेत राजाओं का उस समय शासन था। उस समय सर्वजीत सिंह वहां के राजा थे। जिनके राज में भगवान स्वामी नारायण का पावन आगमन हुआ था।

तत्कालीन राजनीतिक अशांत परिस्थितियां 

श्रीनेत क्षत्रिय - सूर्यवंशी हैं। उनका गोत्र- भारद्वाज, गद्दी - श्रीनगर (टेहरी गढ़वाल) है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, सन्त कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर,गोरखपुर तथा बस्ती जिले में बांसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी ये लोग रह रहे हैं।


     बांसी के राजा तेज सिंह सन 1743 ई .में दिवंगत हुए थे उनके तीन पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े रंजीत सिंह (1743- 1748 ई.) थे। इस राजा को अपने भाई दलजीत सिंह से लड़ना पड़ा था जो कानपुर के शिवराज पुर के राजा का शरण लिए हुए था। यहां वह अवध के नबाब शुजाउद्दौला के पक्ष में रहा। उसकी सहायता से यह अपने भाई पर पुनः आक्रमण किया था । यह युद्ध बांसी से 6 मील पूर्व पनघटा घाट पर हुआ था। पनघटा घाट, बांसी, सिद्धार्थनगर, राप्ती नदी के किनारे स्थित एक स्थानीय स्थान है, जो बांसी शहर का हिस्सा है और स्थानीय लोगों के लिए नदी तक पहुँचने का एक बिंदु है। यह क्षेत्र बांसी के विकास और प्रस्तावित नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पास के गाँव और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। योगमाया मंदिर भी यहीं है। इस घाट पर हुई लड़ाई में दोनो भाई रंजीत सिंह और दलजीत सिंह मारे गये थे। परिणाम स्वरुप रणजीत और दलजीत के शिशु लड़के राजा बहादुर सिंह ( सन 1748- 1777 ई.) और सर्वजीत सिंह (सन 1777- 1808 ई.) में संयुक्त रुपसे बांसी के राजा हुए थे । बाद में ये नरकटा में रहने लगे थे। बहादुर सिंह सन 1777 ई. में निःसंतान मर गया था। जगत सिंह ने उनके हिस्से को जप्त करने के लिए आक्रमण किया परन्तु सर्वजीत सिंह ने बुटवल के राजा से सहायता लेकर खुला युद्ध किया और पूरे क्षेत्र का राजा बन बैठा था ।अपने सम्बंधियों और आश्रितों को राजघराने का ( BIRTS) ब्रिटिस हिस्सा देने के बावजूद सम्पत्ति समय के साथ साथ कम होती गयी।


     मूल बांसी शाखा के राजा सर्वजीत सिंह बिना किसी असली वारिस के सन 1808 ई. में दिवंगत हो चुके थे।पांच वर्ष तक बांसी का राज्य उनकी विधवा रानी रंजीत कुंवर (सन 1808-1813 ई.) ने संभाला था। इनकी दो बेटियां इला और सुशीला थी। इनकी ही शादी के लिए राजा सर्वजीत सिंह ने बालक नील कण्ठ वर्णी को पसन्द कर लिया था। पुत्ररत्न ना होने के कारण राजा सर्वजीत ने अपने सहयोगी राज्य उनौला के राजा हरिहर सर्फराज सिंह के पुत्र श्रीप्रकाश सिंह (सन 1813-1840 ई.) को दत्तक पुत्र के रुप में ग्रहण कर लिया था। 

भगवान स्वामी नारायण का आगमन :- बांसी राज्य की सीमा में भगवान स्वामी नारायण पीपल वृक्ष के नीचे मृगचर्म बिछाकर ध्यानस्थ हुए थे। बंसीपुर (बांसी) का राजा वहाँ आया। ब्रह्मचारी का कमलपत्र समान नयन एवं चंद्र को लज्जित करे ऐसा मुखमंडल देख राजा मंत्रमुग्ध हो गया था। चरणों में माथा टेकते हुए वह बोला, 'मेरे भवन पधारिए, प्रभु !'

     ब्रह्मचारी ने उसका भाव पहचानकर 'हाँ' कहा। अपने घोड़े पर उन्हें बैठाकर राजा स्वयं लगाम थामकर पैदल चलने लगा था । यह देखकर प्रजा चकित रह गई थी। राजमहल में कृष्णभक्ति का वातावरण जम गया था। राजा- रानी एवं दो कुँअरियों इला- सुशीला की श्रद्धा को पुष्ट करने ब्रह्मचारी ने यहाँ राजमहल को पावन किया था। दूध में पकाई मिठाई का थाली तैयार करके राजा स्वयं आया था। शालिग्राम भगवान को भोग लगाकर ब्रह्मचारी ने किंचित् प्रसाद भी ग्रहण किया था। बाद में पूरा थाली-प्रसाद सभी को बँटवा दिया था  

       राजा-रानी के भीतर ब्रह्मचारी की मूरत बैठ गई थी। दोनों के मन में कुत्सित विचार आया कि दोनों बेटियों का ब्याह इसके साथ कर दिया जाए। 

     'राजन् ! तुम जो सोच रहे हो, सब मैं जानता हूँ। मैं तो भव-भटकन से जीवों को उबारने आया हूँ।' ऐसा कहकर ब्रह्मचारी ने अपना सही रूप दर्शा दिया था।

विवाह प्रस्ताव को ना मानने पर बन्दी बनाए गए थे स्वामिनारायण।

     दंपति की जीवदशा थी अतः बेटियों को ब्याहने की इच्छा वैसी की वैसी बनी रही। शाम ढलते ब्रह्मचारी जब जाना चाहा तब उनको राजा ने  बंदी बना लिया गया था। रात डेढ़ पहर शेष रहने पर चौकीदारों को गहरी नींद में डालकर ब्रह्मचारी वहाँ से मुक्ति क्षेत्र के लिए प्रस्थान कर गए थे। 

सोते पहरेदारों को चकमा देकर प्रभु आगे बढ़ गए थे।

    मुक्तिक्षेत्र वह स्‍थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसी स्‍थान से होकर उत्‍तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्‍बत गए थे।

    बालक नील कण्ठ वर्णी घोर जंगल में से जा रहे थे। वर्षाऋतु थी। मेघमाला छाई हुई थी। मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली चमक रही थी। वन, वृक्ष, प्राणी सभी के चेतनसृष्टि में आनन्द छाया हुआ था। सृष्टि सो रही थी तब बारह वर्षीय यह बालक श्याम पर्वत की ओर चला जा रहा था। मुक्तिनाथ मंदिर नेपाल के मुस्तांग जिले में, थोरोंग ला दर्रे की तलहटी में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध तीर्थस्थल है, जिसे 'मोक्ष के देवता' के रूप में जाना जाता है और यह समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ 108 पवित्र झरनों में स्नान करने और कागबेनी में पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)