Tuesday, January 6, 2026
ज्ञान जी महाराज अयोध्या वाले
Monday, January 5, 2026
दीपाथून स्तंभ पर दीप प्रज्वलन का मामला: पृष्ठभूमि वस्तुस्थिति और प्रभाव✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
उठ कर ले भजन भगवान का
Sunday, January 4, 2026
अयोध्या के राजा युवनाश्व की विचित्र कहानी (रामजी के पूर्वज कड़ी 27) ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
केरल के अनंत-पद्मनाभ स्वामी मन्दिर का स्थापत्य और महाकुंभाभिषेक का विशेष उत्सव #आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
दक्षिण भारत का एक विशेष आयोजन
तिरुवनंतपुरम का संधि विच्छेद है: तिरु +अनंत +पुरम्। "तिरु" एक दक्षिण भारतीय आदर सूचक आद्याक्षर और संस्कृत के "श्री" का रूप है । "अनंत" भगवान अनंत (शेषनाग)के लिए हैं तथा संस्कृत शब्द "पुरम" का अर्थ घर या वास स्थान होता है। तिरुवनंतपुरम का शाब्दिक अर्थ होता है "भगवान अनंत का वास स्थान"। भगवान अनंत, हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शेषनाग हैं जिनपर भगवान विष्णु विराजते हैं। श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु शेषनाग जी पर आराम की मुद्रा में बैठे हुए हैं, जो इस नगर की पहचान बन गया है। ब्रिटिश शासन के पर्यन्त इसे ट्रिवानड्रम के नाम से भी जाना जाता था। 1991 में राज्य सरकार ने इसका नाम बदलकर तिरुवनंतपुरम कर दिया। यद्यपि अब भी ट्रिवानड्रम नाम बहुत प्रयुक्त होता है।
केरल की राजधानी:देवताओं की नगरी
केरल की इस राजधानी तिरुवनंतपुरम को त्रिवेंद्रम के नाम से भी पुकारा जाता है। देवताओं की नगरी के नाम से मशहूर इस शहर को महात्मा गाँधी ने नित हरा नगर की संज्ञा दी थी। इस नगर का नाम शेषनाग अनंत के नाम पर पड़ा जिनके ऊपर पद्मनाभस्वामी (भगवान विष्णु) विश्राम करते हैं।
इस प्राचीन नगर का इतिहास 1000 ईसा पूर्व से शुरू होता है। त्रावण कोर के संस्थापक अनीयम तिरुनाल मार्तंड वर्मा ने तिरुवनंतपुरम को अपनी राजधानी बनाया जो उनकी मृत्यु के बाद भी बनी रही। स्वतंत्रता के बाद यह त्रावणकोर- कोचीन की राजधानी बनी। 1956 में केरल राज्य के बनने के बाद से यह केरल की राजधानी है। पश्चिमी घाट पर स्थित यह नगर प्राचीन काल से ही एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र रहा है।
तिरुवनंतपुरम की सबसे बड़ी पहचान श्री पद्मनाभ स्वामी का मंदिर लगभग 2000 साल पुराना है। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने के बाद से यह नगर एक प्रमुख पर्यटक और व्यवसायिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ है। इसकी समृद्धसांस्कृतिक धरोहर और शोभायमान तटों से आकर्षित होकर प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक यहाँ खीचें चले आते हैं।
श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर:-
पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल राज्य के तिरुअनन्तपुरम में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल यह ऐतिहासिक मंदिर तिरुअनंतपुरम के अनेक पर्यटन स्थलों में से एक है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर विष्णु-भक्तों की महत्वपूर्ण आराधना - स्थली है।
एकादशी को विशेष आयोजन :-
अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी को पद्मनाभ एकादशी भी कहा जाता है। इस एकादशी व्रत का महत्व खुद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। पद्म पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने का भी विधान है। तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर में इस एकादशी पर विशेष पूजा की जाती है।
किलानुमा संरचना:-
इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। तिरुवनंतपुरम के बीच में बना विशाल किले की तरह दिखने वाला पद्मनाभ स्वामी मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। महाभारत के मुताबिक श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा-अर्चना की थी। मान्यता है कि मंदिर की स्थापना 5000 साल पहले कलयुग के प्रथम दिन हुई थी, लेकिन 1733 में त्रावनकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। यहां भगवान विष्णु का श्रृंगार शुद्ध सोने के आभूषणों से किया जाता है।
एकादशी पर विशेष पूजा का विधान :-
एकादशी पर विशेष पूजा भगवान विष्णु का मंदिर होने से यहां एकादशी पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस तिथि को यहां पर्व के रुप में मनाया जाता है। इस दिन सोने के गहनों से भगवान का विशेष श्रृंगार भी किया जाता है। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी और कार्तिक महीने में आने वाली देव प्रबोधिनी एकादशी पर यहां भगवान पद्मनाभ के विशेष दर्शन करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं।
दीपक के उजाले में होते हैं दर्शन :-
मुख्य कक्ष जहां विष्णु भगवान की लेटी हुई मुद्रा में प्रतिमा है, वहां कई दीपक जलते हैं। इन्हीं दीपकों के उजाले से भगवान के दर्शन होते हैं। दूर- दराज से आए श्रद्धालु अत्यल्प समय और कम रोशनी में मनोवांछित दर्शन नहीं कर पाते हैं। स्वामी पद्मनाभ की मूर्ति में भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर जगत पिता ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित है। भगवान पद्मनाभ की मूर्ति के आसपास दोनों रानियों श्रीदेवी और भूदेवी की मूर्तियां हैं। भगवान पद्मनाभ की लेटी हुई मूर्ति पर शेषनाग के मुंह इस तरह खुले हुए हैं, जैसे शेषनाग भगवान विष्णु के हाथ में लगे कमल को सूंघ रहे हों। यहां मूर्ति का दर्शन अलग-अलग दरवाजों से किया जा सकता है। इसके लिए बहुत लम्बी लाइन लगती है। सात मंजिला सोने से जड़ा गोपुरम मंदिर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही यहां श्रद्धालुओं के लिए नियम भी हैं। पुरुष केवल धोती पहनकर ही मंदिर में जा सकते हैं और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना जरूरी है। अन्य किसी भी लिबास में प्रवेश यहां वर्जित है। मंदिर में एक सोने का खंभा बना हुआ है। मंदिर का स्वर्ण जड़ित गोपुरम सात मंजिल का है। जिसकी ऊंचाई करीब 35 मीटर है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में अद्भुत कारीगरी की गई है।
भगवान विष्णु की शयनमुद्रा मुख्य है:-
श्री पद्मनाभ मंदिर की एक विशेषता है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा, बैठी हुई और खड़ी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। गर्भगृह में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा में मूर्ति का शृंगार फूलों से किया जाता है। भगवान विष्णु की खड़ी मूर्ति को उत्सवों के अवसर पर मंदिर से बाहर ले जाते हैं। वर्ष में दो बार धार्मिक समारोह होता है। इस समारोह में ‘आउत’ (पवित्र स्नान) किया जाता है। इस समारोह में भगवान विष्णु , नरसिंह और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियों को नगर के बाहर समुद्र किनारे पर ले जाकर स्नान कराया जाता है।
द्रविड़ियन वास्तुशिल्प का अद्भुत स्वरूप:-
यह मंदिर भारत के सबसे प्रमुख वैष्णव मंदिरों में से एक है तथा तिरुवनंतपुरम का ऐतिहासिक स्थल है। पूर्वी दुर्ग के अंदर स्थित इस मंदिर का परिसर बहुत विशाल है जिसकी अनुभूति इसका सात मंजिला गोपुरम देखकर हो जाता है। केरल और द्रविड़ियन वास्तुशिल्प में निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। पद्मा तीर्थम, पवित्र कुंड, कुलशेखर मंडप और नवरात्रि मंडप इस मंदिर को और भी आकर्षक बनाते हैं। 260 वर्ष पुराने इस मंदिर में केवल हिंदु ही प्रवेश कर सकते हैं। इस मंदिर का नियंत्रण त्रावणकोर राजसी परिवार द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में दो वार्षिकोत्सव मनाए जाते हैं- एक पंकुनी के महीने (15 मार्च - 14 अप्रैल) में और दूसरा ऐप्पसी के महीने (अक्टूबर-नवंबर) में। इन समारोहों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।
पौराणिक कथा :-
पद्मनाभ स्वामी मंदिर के साथ एक पौराणिक कथा जुडी है। मान्यता है कि सबसे पहले इस स्थान से विष्णु भगवान की प्रतिमा प्राप्त हुई थी जिसके बाद उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है।
द्रविड़ स्थापत्य कला :-
मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है जिसे देखने के लिए हजारों भक्त दूर दूर से यहाँ आते हैं। इस प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मान्यता है कि तिरुअनंतपुरम नाम भगवान के 'अनंत' नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है। यहाँ पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभ' कहा जाता है और इस रूप में विराजित भगवान यहाँ पर पद्मनाभ स्वामी के नाम से विख्यात हैं। तिरुअनंतपुरम का पद्मनाभ स्वामी मंदिर मृत कड़ियाँ केरल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। केरल संस्कृति एवं साहित्य का अनूठा संगम है। इसके एक तरफ तो खूबसूरत समुद्र तट है और दूसरी ओर पश्चिमी घाट में पहाडि़यों का अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य, इन सभी अमूल्य प्राकृतिक निधियों के मध्य स्थित- है पद्मनाभ स्वामी मंदिर। इसका स्थापत्य देखते ही बनता है मंदिर के निर्माण में महीन कारीगरी का भी कमाल देखने योग्य है।
महत्व:-
मंदिर का महत्व यहाँ के पवित्र परिवेश से और बढ जाता है। मंदिर में धूप-दीप का प्रयोग एवं शंखनाद होता रहता है। मंदिर का वातावरण मनमोहक एवं सुगंधित रहता है।
स्वर्णस्तंभ :-
मंदिर में एक स्वर्णस्तंभ भी बना हुआ है जो मंदिर के सौदर्य में इजाफा करता है। मंदिर के गलियारे में अनेक स्तंभ बनाए गए हैं जिन पर सुंदर नक़्क़ाशी की गई है जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देती है।मंदिर में हर वर्ष ही दो महत्वपूर्ण उत्सवों का आयोजन किया जाता है जिनमें से एक मार्च एवं अप्रैल माह में और दूसरा अक्टूबर एवं नवंबर के महीने में मनाया जाता है। मंदिर के वार्षिकोत्सवों में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेने के लिए आते हैं तथा प्रभु पद्मनाभ स्वामी से सुख-शांति की कामना करते हैं।
पद्मनाभ स्वामी मंदिर का मुख्य द्वार:-
पद्मनाभस्वामी मन्दिर तक पहुँचाने वाले मार्ग का दृश्य पद्मनाभ स्वामी मंदिर का निर्माण राजा मार्तण्ड द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर के पुनर्निर्माण में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है। सर्वप्रथम इसकी भव्यता को आधार बनाया गया मंदिर को विशाल रूप में निर्मित किया गया जिसमें उसका शिल्प सौंदर्य सभी को प्रभावित करता है। मंदिर के निर्माण में द्रविड़ एवं केरल शैली का मिला जुला प्रयोग देखा जा सकता है।मंदिर का गोपुरम द्रविड़ शैली में बना हुआ है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का अदभुत उदाहरण है। मंदिर का परिसर बहुत विशाल है जो कि सात मंजिला ऊंचा है गोपुरम को कलाकृतियों से सुसज्जित किया गया है। मंदिर के पास ही सरोवर भी है जो 'पद्म तीर्थ कुलम' के नाम से जाना जाता है।
पद्मनाभस्वामी मंदिर का महाकुंभाभिषेक :-
पद्मनाभस्वामी मंदिर में 270 साल बाद एक दुर्लभ महाकुंभाभिषेक होने जा रहा है। ये आठ जून को होगा। बताया जा रहा है कि इस मंदिर मंदिर में लंबे समय से लंबित जीर्णोद्धार कार्य हाल के दिनों में पूरा हुआ है।इसके पूरा होने के बाद मंदिर में भव्य तरीके से महाकुंभभिषेक (भव्य अभिषेक) होगा। इस अनुष्ठान का उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा को सुदृढ़ करना और मंदिर की पवित्रता को फिर से जागृत करना है।
महाकुंभअभिषेक, कैसे होता है :-
कुंभअभिषेक वास्तव में मंदिरों में होने वाले एक पारंपरिक हिन्दू अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा को मजबूत करना और मंदिर की पवित्रता को जागृत करना होता है। मान्यता है कि इस अनुष्ठान के जरिए मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की समन्वित और एकजुट किया जाता है। यह मंदिरों में होने वाली प्रतिष्ठा का ही अहम हिस्सा होता है। किसी नए मंदिर का निर्माण पूरा होने बाद या फिर किसी मंदिर का जीर्णोद्धार होने के बाद यह अभिषेक किया जाता है। यह भी कह सकते हैं कि मंदिर निर्माण या जीर्णोद्धार के बाद देवी-देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा और मंदिर के शुद्धीकरण के लिए इसका आयोजन किया जाता है.कुंभअभिषेक में कुंभ का आशय है सिर, जो मंदिर के शिखर की ओर इंगित करता है और अभिषेकम का मतलब है स्नान अनुष्ठान। कुंभअभिषेक के लिए पवित्र नदियों का जल घड़ों में लाया जाता है. इससे मंदिर के शिखर को अनुष्ठान पूर्वक स्नान कराया जाता है, जिसमें घड़ों का बलिदान होता है।
270 साल बाद होगा खास अनुष्ठान:-
बता दें कि 270 साल बाद ये खास प्रकार का महाअनुष्ठान होने जा रहा है। मंदिर प्रबंधक बी श्रीकुमार ने इस संबंध में बताया कि सदियों पुराने मंदिर में 270 वर्षों से अधिक के अंतराल के बाद इस तरह का व्यापक जीर्णोद्धार और उससे जुड़ी रस्में हो रही हैं और अगले कई दशकों में ऐसा फिर से होने की संभावना नहीं है। परिसर में 8 जून को 'महाकुंभ अभिषेक' अनुष्ठान होगा। इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न अनुष्ठान किए जाएंगे, जिसमें नवनिर्मित 'तजिकाकुडम' (गर्भगृह के ऊपर तीन और ओट्टक्कल मंडपम के ऊपर एक) का अभिषेक, विश्वसेन की मूर्ति की पुनः स्थापना और तिरुवंबाडी श्री कृष्ण मंदिर (मुख्य मंदिर परिसर में स्थित) में 'अष्टबंध कलसम' शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मंदिर के जीर्णोद्धार का काम संपन्न :-
2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ पैनल के निर्देशानुसार जीर्णोद्धार का काम किया गया है। हालांकि काम जल्द ही शुरू हो गया था, लेकिन कोविड की स्थिति के कारण यह आगे नहीं बढ़ सका। मंदिर में सदियों बाद व्यापक जीर्णोद्धार और संबंधित अनुष्ठान किए जा रहे हैं। दुनिया भर में भगवान पद्मनाभ के भक्तों के लिए इतने सालों बाद इन अनुष्ठानों को देखना एक दुर्लभ अवसर है। बता दें कि 8 जून को "महाकुंभभिषेकम" से पहले आने वाले दिनों में मंदिर में आचार्य वरणम, प्रसाद शुद्धि, धारा, कलसम और अन्य सहित विभिन्न अनुष्ठान किए जाएंगे।
मंदिर का विजुवल लिंक -
कृपया ये लिंक खोलें और अवलोकन करें।
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आचार्य डा राधे श्याम द्विवेदीलेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। (मोबाइल नंबर +91 8630778321;वॉर्ड्सऐप नम्बर+ 919412300183)
Friday, January 2, 2026
नीलकंठ वर्णी स्वामिनारायण की अयोध्या से बांसी होते हुए मुक्ति तीर्थ की यात्रा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
स्वामिनारायण का सामान्य परिचय :-
श्री घनश्याम पांडे उपाख्य स्वामिनारायण जी 2 अप्रैल 1781 -1 जून 1830 ई.तक इस धरा पर विराजमान रहे।वे हिंदू धर्म केस्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक और इष्ट देवता रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के छपिया में हुआ था। उनके माता पिता का नाम धर्मदेव और भक्ती माता था। बाल्य काल में विद्या ग्रहण करके उन्होंने गृह त्याग किया था। सन 1792 ई.में, उन्होंने नीलकंठ वर्णी नाम को अपनाते हुए, 11 वर्ष की आयु में भारत भर में सात साल की तीर्थ यात्रा और तपस्चर्या की थी। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने कल्याणकारी गतिविधियां की और इस यात्रा के 9 वर्ष और 11 महीने के बाद, वह सन 1799 ई. के आसपास गुजरात राज्य में बस गए थे । सन 1800 ई.में, उन्हें अपने गुरु स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय में शामिल किया गया और उन्हें सहजानंद स्वामी का नाम दिया गया। सन 1802 ई . में अपने गुरु के द्वारा, उनकी मृत्यु से पहले, उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया गया था । सहजानंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और स्वामीनारायण मंत्र को पढ़ाया। तब से, वह स्वामीनारायण के रूप में जाने जाते हैं ।
उन्होंने 3000 से अधिक संतों को दीक्षा दी और लाखो अनुयायी बनाये। उनके जीवन काल में ही लाखों लोग भगवान स्वामी नारायण को परमात्मा मान कर उनकी भक्ति करने लगे थे।
नीलकंठ वर्णी रूप में तपस्या:-
अपनी माता और पिता के मृत्यु के बाद ग्यारह वर्षीय बालक घन श्याम पांडे घर छोड़कर जंगल में तपस्या करने चले गए। उनके तेजस्वी रुप और तपस्या शिवजी जैसी होने के कारण लोग स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी नाम से जानने लगें। नीलकंठ वर्णी ने सात वर्षों तक देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा की थी। उन्होंने हिमालय में कठिन तपस्या और भारत के समस्त तीर्थो की यात्रा की थी। बाद में उन्होंने गुजरात के रामानंद स्वामी से दीक्षा धारण कर उन्हे अपना गुरु बनाया। रामानंद स्वामी के देहांत के बाद उन्होंने स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना और प्रचार किया था।
"भगवान श्री स्वामीनारायण: एक दिव्य जीवन गाथा"लेखक : साधु अक्षर जीवन दास , प्रकाशक: स्वामीनारायण अक्षर पीठ अहमदाबाद, अगस्त 2022 पृष्ठ 46- 47 के विवरण के अनुसार -" भगवान श्री स्वामी नारायण संवत 1849 तदनुसार सन 1793 ई.में पंजाब के राजा रणजीतसिंह से दो बार भेंट किए थे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह तीर्थयात्रा करते हुए बदरीनाथ आए थे तब इस छोटे ब्रह्मचारी के प्रथम बार दर्शन किये थे। उनकी भीतर की मुमुक्षुता जाग गई थी। उम्र तेरह वर्ष की होने से उनका स्वामी जी से अधिक लगाव हो गया था। दंडवत्-प्रणाम करके वे ब्रह्मचारी के चरणों में बैठ गए थे। उनके हृदय में शान्ति छा गई थी । वे बोले,'मुझको शरण में लीजिए, इच्छा होती है कि सदैव आपके साथ रहूँ।'
ब्रह्मचारी ने कहा, 'राजन् ! हमारा और आपका रहन-सहन भिन्न है। आप भोगी हो, हम जोगी हैं। हम इस जगत से सदा उदासीन हैं, आप विषय विलासी हो। हम दोनों में भारी अन्तर है। इसलिए साथ निभाना कठिन है, फिर भी भगवान का शासन अपने सिर ढोते हुए प्रजा का पालन कीजिए। हम पुनः नीचे होडा मिलेंगे, अब तो हम यहाँ से गंगोत्री जाएँगे।'
राजा अपने साज-समान के साथ कुछ समय वहाँ रहे थे।
ब्रह्मचारी दुर्गम पथ से गंगोत्री की ओर चल दिए। वहाँ जाकर हिमालय पर बैठकर स्नान किया। फिर हर की पौडी पर जब आए तब रणजीत सिंह से पुनः भेंट हुई। ब्रह्मचारी की ओर वे बहुत आकर्षित हुए थे। राजधर्म एवं मोक्ष की रीति उपदेश पाकर वे कृतार्थ हो गए थे। बार-बार ब्रह्मचारीजी के चरणों में मस्तक रख उन्होंने उनसे अच्छी तरह प्रजा का पालन करने का आशीर्वाद माँगा था।
यहाँ से ब्रह्मचारी को मुक्तिनाथ (नेपाल) की ओर जाना था। वे इस दौरान अयोध्या वापस लौट आए थे। वे सरयू तट पर एकाध घंटा बैठे रहे । गृहत्याग किए आज बराबर एक वर्ष पूर्ण गया था। अयोध्या के नागरिक सब अपनी अपनी गत में मग्न थे। किसी से कुछ भी पूछे बिना ब्रह्मचारी ने मुक्तिनाथ का मार्ग ले लिया।"
हरैया गांव होकर यात्रा :-
वर्तमान बस्ती जिले का हरैया गाँव (जो वर्तमान में तहसील है और राष्ट्रीय राज मार्ग 28 के किनारे बसा है।) होते हुए वे बंसीपुर में आए थे।
इस स्थान का मूल नाम 'हरि-रहिया' था, जो अवधी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ 'भगवान का मार्ग' है, क्योंकि भगवान राम इस रास्ते से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और मिथिला गए थे। बंसीपुर को आधुनिक बांसी कहा जाता है, जहां श्रीनेत राजाओं का उस समय शासन था। उस समय सर्वजीत सिंह वहां के राजा थे। जिनके राज में भगवान स्वामी नारायण का पावन आगमन हुआ था।
तत्कालीन राजनीतिक अशांत परिस्थितियां
श्रीनेत क्षत्रिय - सूर्यवंशी हैं। उनका गोत्र- भारद्वाज, गद्दी - श्रीनगर (टेहरी गढ़वाल) है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, सन्त कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर,गोरखपुर तथा बस्ती जिले में बांसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी ये लोग रह रहे हैं।
बांसी के राजा तेज सिंह सन 1743 ई .में दिवंगत हुए थे उनके तीन पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े रंजीत सिंह (1743- 1748 ई.) थे। इस राजा को अपने भाई दलजीत सिंह से लड़ना पड़ा था जो कानपुर के शिवराज पुर के राजा का शरण लिए हुए था। यहां वह अवध के नबाब शुजाउद्दौला के पक्ष में रहा। उसकी सहायता से यह अपने भाई पर पुनः आक्रमण किया था । यह युद्ध बांसी से 6 मील पूर्व पनघटा घाट पर हुआ था। पनघटा घाट, बांसी, सिद्धार्थनगर, राप्ती नदी के किनारे स्थित एक स्थानीय स्थान है, जो बांसी शहर का हिस्सा है और स्थानीय लोगों के लिए नदी तक पहुँचने का एक बिंदु है। यह क्षेत्र बांसी के विकास और प्रस्तावित नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पास के गाँव और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। योगमाया मंदिर भी यहीं है। इस घाट पर हुई लड़ाई में दोनो भाई रंजीत सिंह और दलजीत सिंह मारे गये थे। परिणाम स्वरुप रणजीत और दलजीत के शिशु लड़के राजा बहादुर सिंह ( सन 1748- 1777 ई.) और सर्वजीत सिंह (सन 1777- 1808 ई.) में संयुक्त रुपसे बांसी के राजा हुए थे । बाद में ये नरकटा में रहने लगे थे। बहादुर सिंह सन 1777 ई. में निःसंतान मर गया था। जगत सिंह ने उनके हिस्से को जप्त करने के लिए आक्रमण किया परन्तु सर्वजीत सिंह ने बुटवल के राजा से सहायता लेकर खुला युद्ध किया और पूरे क्षेत्र का राजा बन बैठा था ।अपने सम्बंधियों और आश्रितों को राजघराने का ( BIRTS) ब्रिटिस हिस्सा देने के बावजूद सम्पत्ति समय के साथ साथ कम होती गयी।
मूल बांसी शाखा के राजा सर्वजीत सिंह बिना किसी असली वारिस के सन 1808 ई. में दिवंगत हो चुके थे।पांच वर्ष तक बांसी का राज्य उनकी विधवा रानी रंजीत कुंवर (सन 1808-1813 ई.) ने संभाला था। इनकी दो बेटियां इला और सुशीला थी। इनकी ही शादी के लिए राजा सर्वजीत सिंह ने बालक नील कण्ठ वर्णी को पसन्द कर लिया था। पुत्ररत्न ना होने के कारण राजा सर्वजीत ने अपने सहयोगी राज्य उनौला के राजा हरिहर सर्फराज सिंह के पुत्र श्रीप्रकाश सिंह (सन 1813-1840 ई.) को दत्तक पुत्र के रुप में ग्रहण कर लिया था।
भगवान स्वामी नारायण का आगमन :- बांसी राज्य की सीमा में भगवान स्वामी नारायण पीपल वृक्ष के नीचे मृगचर्म बिछाकर ध्यानस्थ हुए थे। बंसीपुर (बांसी) का राजा वहाँ आया। ब्रह्मचारी का कमलपत्र समान नयन एवं चंद्र को लज्जित करे ऐसा मुखमंडल देख राजा मंत्रमुग्ध हो गया था। चरणों में माथा टेकते हुए वह बोला, 'मेरे भवन पधारिए, प्रभु !'
ब्रह्मचारी ने उसका भाव पहचानकर 'हाँ' कहा। अपने घोड़े पर उन्हें बैठाकर राजा स्वयं लगाम थामकर पैदल चलने लगा था । यह देखकर प्रजा चकित रह गई थी। राजमहल में कृष्णभक्ति का वातावरण जम गया था। राजा- रानी एवं दो कुँअरियों इला- सुशीला की श्रद्धा को पुष्ट करने ब्रह्मचारी ने यहाँ राजमहल को पावन किया था। दूध में पकाई मिठाई का थाली तैयार करके राजा स्वयं आया था। शालिग्राम भगवान को भोग लगाकर ब्रह्मचारी ने किंचित् प्रसाद भी ग्रहण किया था। बाद में पूरा थाली-प्रसाद सभी को बँटवा दिया था
राजा-रानी के भीतर ब्रह्मचारी की मूरत बैठ गई थी। दोनों के मन में कुत्सित विचार आया कि दोनों बेटियों का ब्याह इसके साथ कर दिया जाए।
'राजन् ! तुम जो सोच रहे हो, सब मैं जानता हूँ। मैं तो भव-भटकन से जीवों को उबारने आया हूँ।' ऐसा कहकर ब्रह्मचारी ने अपना सही रूप दर्शा दिया था।
विवाह प्रस्ताव को ना मानने पर बन्दी बनाए गए थे स्वामिनारायण।
दंपति की जीवदशा थी अतः बेटियों को ब्याहने की इच्छा वैसी की वैसी बनी रही। शाम ढलते ब्रह्मचारी जब जाना चाहा तब उनको राजा ने बंदी बना लिया गया था। रात डेढ़ पहर शेष रहने पर चौकीदारों को गहरी नींद में डालकर ब्रह्मचारी वहाँ से मुक्ति क्षेत्र के लिए प्रस्थान कर गए थे।
सोते पहरेदारों को चकमा देकर प्रभु आगे बढ़ गए थे।
मुक्तिक्षेत्र वह स्थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्णु शालिग्राम पत्थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसी स्थान से होकर उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्बत गए थे।
बालक नील कण्ठ वर्णी घोर जंगल में से जा रहे थे। वर्षाऋतु थी। मेघमाला छाई हुई थी। मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली चमक रही थी। वन, वृक्ष, प्राणी सभी के चेतनसृष्टि में आनन्द छाया हुआ था। सृष्टि सो रही थी तब बारह वर्षीय यह बालक श्याम पर्वत की ओर चला जा रहा था। मुक्तिनाथ मंदिर नेपाल के मुस्तांग जिले में, थोरोंग ला दर्रे की तलहटी में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध तीर्थस्थल है, जिसे 'मोक्ष के देवता' के रूप में जाना जाता है और यह समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ 108 पवित्र झरनों में स्नान करने और कागबेनी में पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)