Saturday, March 7, 2020

रंगपालजी के फाग गीत बस्ती के छन्दकार(18) डा. राधेश्याम द्विवेदी


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श्री राधेश्याम श्रीवास्तव श्याम हरिहरपुरी संत कबीर नगर द्वारा संपादित तथा चैहान पब्लिेकसन सैयद मोदी स्मारक गीताप्रेस गोरखपुर से ‘रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है, जिसमें रंग उमंग भाग 1 व भाग 2 तथा रंग तरंगिणी का अनूठा संकलन किया गया है। इसमें विविध उमंगों में फाग के विविध प्रकारों को श्रेणीबद्ध किया गया है। डा. सरस जी ने अपने शोध ग्रंथ बस्ती के छन्दकार में रंग उमंग के दोनों भागों का प्रकाशन की सूचना दी है। यह हनुमानदास गया प्रसाद बुकसेलर नखास चैक  गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है। रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अन्र्तात्मा में गूंज रहे थे। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं।
 मंगलाचरण :- फाग गीतों के संयोग और वियोग दोनो पक्षों को उजागिर किया गया है। दोनों के प्रारम्भ में दो-दो दोहों में मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया है।
आनन्द मंगल रास रस हसित ललित मुख चंद।
रंगपाल हिय ललित नित , ध्यान युगल सुखचन्द।
रंग उमंग तरंग अंग , रस अमंग सारंग।
रंगपाल बाधा हरण, राधा हरि नव रंग।।

रंग उमंग भाग 1 में 32 पृष्ठ है। कुछ छन्द प्रस्तुत है
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ऋतु कन्त बिन हाय, लगो जिय जारने।
बिरहिन बौरी कान आम ये बौरे बौरे।
गुंजत भुंग गात मत्त मधु दौरे मधु दौरे भौरे।
बैरी विषय पपीहा पिय पिय
यह लागी शोर मचाय -बानसो मारने।।1।।
फूले टेसु अनार और कचनार अपारे।
दहके जन चहुं ओर जो निरपूम अंगारे।
बीर समीर सुगंध बगारत,
बिरहांगिनियां थपकाय लगे अब बारने।। 2।।
अमित पराग उड़ात जात लखि चित्त उड़ाई।
करि चहचही चकोर देत् हठि चेत भगाई।
कारी कोइलिया दई मारी,
दिन रतियां कूक सुनाय लगी हिय फारने।।3।।
पीर भीर मैं धीर धरहूं को नहिं आवै।
रहै लोक की लाज चहै जावै मन भावै।
करि योगिनी को भेष भ्रमब अब
सखि रंगपाल वलि जाय पिया कारने।
झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है। –
अति धूमधाम की आज होरी ह्वै रही।
डारहिं केसर रंग झपट भरि भरि पिचकारी
झमकि अबीर की झोरि झेलि देवै किलकारी।
मेलहिं मूठ गुलाल परसपर ,
क्वउ रहत नहीं कुछ बाज होरी ह्वै रही।।1।।
कहहिं कबीर निशंक झूमि झुकि बांह पसोरी।
उछल विछलि मेड़राय विहंसि देवै करतारी।
नाचत गावत भाव बतावत,
बहु भांति बजावहिं बाज होरी रही।।।2।।
विविध स्वांग रचि हंसि हंसाय देवैं होहकारी।
फूले अंग न समहिं नारि गन गावै गारी।
पुलकित आनंद छाक छके सब,
सजिनिज निज साज समाज होरी ह्वै रही।
ढपटि लपटि मुख चूमि लेहि घूुघट पर टारी।।
रोरी मलहिं कपोल भजहिं कुमकुमा प्रहारी।
रंगपाल तजि लाज गई भजि ,
मदन को राज होरी ह्वै रही।।4।। अति0।।
चैताली झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है -
यह कैसी बानि तिहारी अहो प्रीय प्यारी।
बैठी भोहें तानि जानि क्यों होहु अनारी।
आपुते लीजे जानि बिरह दुख कैसो भारी।
लेति बलाय एक तूहि बलि ,
जियरा की जुड़ावन हारी अहो पिय प्यारी।।1।।
केती इत उत करहिं  अनैसी झूठी चोरी।
मुख पर चिकनी बात, देहिं पीछे हंसि तारी ।
आगे आगि लगाये कुटिल पुनि ,
बनि जांहि बुझावन हारी अहो पिय प्यारी।।2।।
रंग उमंग भाग 1 के एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है-
ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा।
भयो पपीहा यह बैरी, नहि नेक चुपाय।
लेन चाहत विरहिनि कैजिमरा पिय पिय शोर मचाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।
विरहि करेज रेज बैरी मधु दिये नेजन लटकाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
अजहुं आवत नहीं दैया, मधुबन रहे छाय।
रंगपाल निरमोही बालम, दीनी सुधि बिसराय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
रंग उमंग भाग 2 :-
प्रथम भाग की तरह रंग उमंग भाग 2 फाग गीतों की बासंती छटा विखेरता है। वे ना केवल रचयिता अपितु अच्छे गायक भी थे। सारे गीत बड़े ही मधुर हैं। कुछ के बोल इस प्रकार हैं-
हाय बालम  बिनु दैया।
पिय बनही से बोलो उनहीं के घूघट खोलो,
कहो कौन की चोरी  फगुनवा में गोरी ,
दोउ खेलत राधा श्याम होरी रंग भरी,
सखि आज बंसुरिया बाला, गजब करि डाला,
कहां बालम रैनि बिताये भोर भये आये।।
आदि गीत मनको बरबस हर लेते हैं।  रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
राज प्रजा नरनारि सब घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।
होरी होरी है।
बरस बरस को दिन मन भायो,
हिलि मिलि सब खेलहुयार।
होरी होरी है।
रंगपाल असीस देत यह सब मगन रहे फगुहार।
होरी होरी है।
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
‘रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक के उमंग भाग 4 एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है। यह गीत रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है-
सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।
बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।
रेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत झोरी।
कुमकुम चोट चलाय परस्पर ,
अति बिहंसहिं युत अनुराग,
बरसहिं सुमन कली ।।1।।
तिहि छल छलिया छैल बरसि रंग करि रस बोरी ।
प्यारी की मुख चूमि मली रोरी बरजोरी ।
तबलौं आतुर छमकि छबीली,
छीनी केसरिया पाग लीनी पकर अली।।2।।
चुनि चूनरि पहिराय दई रोरी अंजन बरजोरी ।
नारि सिंगार बनाया कपोलन मलि देई रोरी ।
तारी दै दै हंसति कहति सब,
बोलहुं किन श्याम सभाग सुनियत रामबली।।3।।
अपनों करि पुनि छोड़ि कहति नन्द किशोरी ,
भूलि न जइयो बीर रंगीली आज की होरी ।
रंगपाल वलि कहहिं देवगन,
धनि धनि युग भाग सुहाग-अली प्रेम पली।।
सखि आज0।।
रंग उमंग भाग 1 व 2 की तरह गीत सुधा निधि में डा. सरसजी ने 200 फाग व होरी गीतों तथा कजली गीतों के प्रकाशन की सूचना दी हैं। यह ग्रंथ प्रथम बार पूना बाद में गोरखपुर से प्रकाशित हुई है। सम्पूर्ण पुस्तक में प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में वर्णन का वियोग और संयोग पक्ष अपने में न्यारा है। एक छन्द प्रस्तुत है-
गरजत मंद मंद घन घेरे,
बरसत झर झर सलिलि दामिनी दम कि रही  चहुं फेरे।
झिल्ली गन दादुर धुनि पूरित पिय पिय पपिहन टेरे।
मत्त मुरैलिन मध्य मोर नचि कूकत धाम मुड़ेरे।
झूलत मुदित प्रिया अरु प्रीतम, दोउ मणि मंदिर मेरे।
अलि मडराहिं सहस सौरभ लहि देति चंबर अलि फेरे।
रंगपाल बारत रति कामहिं उपमा मिलत न हेरे।
डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस :-“रंगपालजी ब्रज भाषा के प्राण थे। श्रंगार रस के सहृदयी कवि और बीर रस के भूषण थे। उन्होने अपने सेवाओं से बस्ती जनपद छन्द परम्परा को गौरव प्रदान किया। उनके छन्दो में शिल्प की चारुता एवंकथ्य की गहराई थी। साहित्यिक छन्दों की पृष्ठभूमि पर लिखे गये फाग उनके गीत संगीत के प्राण हैं। रीतिकालीन परम्परा के समर्थक और पोषक रंगपालजी की रचनाओं में रीतिबद्ध श्रंगार और श्रंगारबद्ध मधुरा भक्ति का प्रयोग उत्तमोत्तम था।......आपकी रचना भारतेन्दु जी के समकक्ष है।..... आपका युगान्तकारी व्यक्तित्व साहित्य के अंग उपांगों को सदैव नयी चेतना देगा एसा विश्वास है।”(स्रोत : डा. मुनिलाल उपाध्याय कृत “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1) उत्तर प्रदेश संस्कृतिक विभाग के माध्यम से उनकी रचनाओं को संग्रहित व संकलित कर परीक्षण कराने का प्रयास हो रहा है। अपने कार्यकाल के दौरान रंगपाल की कृतिया और उनसे जुडे साज सामान को सांस्कृतिक धरोहर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पाल सेवा संस्थान तथा उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग प्रति वर्ष पाल जी के जन्म का उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने कहा कि रंगपाल जी की समाधि स्थल जो कष्ट हर्णी नदी के स्थल पर है काफी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। मरम्मत कराने के साथ ही संग्रहालय बनाने की जरूरत है।


Friday, March 6, 2020

पण्डित गौरी नाथ शर्मा बस्ती के छन्दकार(17) डा. राधेश्याम द्विवेदी नवीन


डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ जी कृत “बस्ती के छन्दकार”दो खण्डों में प्रकाशित हुआ है। इसके प्रकाशित अंशों के आधार पर बस्ती के साहित्याकाश में अनेक नक्षत्र दिखलाई पड़ते हैं। डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’जी लगभग 250 वर्षों का साहित्यिक इतिहास अपने 5 प्रमुख अध्यायों में समेटने का प्रयास किया है। इसमें लगभग एक शतक कवियों का विवरण एकत्रकर प्रस्तुत किया गया है। प्रथम आदिचरण में 14 द्वितीय मध्य चरण में 11 सुकवियों का सपरिचय काव्यात्मक इतिवृत्त प्रस्तुत किया गया है। इसे पीताम्बर लछिराम चरण कहा गया है। केवल आचार्य लछिराम भट्ट का विवरण पूर्व प्रकाशित शोधगंगा नामक एक प्रबन्ध में कुछ शब्दों में व्यक्त मिलता है। एसे में सरस जी ने इन 14 कवियों के बारे में बहुत ही आधार भूत सूचनायें एकत्र कर अपने शोध प्रवंध में तथा उसके अंश स्वरुप दो लघु आकार के पुस्तकों में प्रकाशित कराकर एक प्रकार की अद्भुत मशाल प्रस्तुत किया है। कापियों और डायिरियों के धूल फांकते इन साहित्यकारों के इतिवृत्त को सरस जी ने अमर बनादिया है.
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इसी श्रृंखला में पण्डित गौरी नाथ शर्मा का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है। इनका जन्म बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के हर्रैया विकासखण्ड के नाथपुर पाण्डेय नामक गांव में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी संवत 1918 विक्रमी तदनुसार 1861 ई. में हुआ है। ये त्रिफला विन्दुवारी पाण्डेय थे। उनके पिता का नाम पंडित नयन सुखराम शर्मा था। नाथपुर पाण्डेय गांव भीटी मिश्र ग्राम पंचायत में आता है। इसका पोस्ट आफिस चोरखरी पिन 272155 है। भीटी मिश्र पंचायत के प्रधान अजय कुमार है। यह हर्रैया से 16 किमी. तथा बस्ती किमी की दूरी पर बसा है इस गांव का भौगोलिक क्षेत्रफल 177.9 हेक्टेयर तथा 2011 में जनसंख्या 1660 है। इस गांव में 248 घर हैं। पण्डित गौरी नाथ शर्मा का एकमात्र शिवपुराण नामक महाकाव्य मिलता है। जिसमें उन्होने अपने वंश वृक्ष तथा ग्रंथ प्रणयन का काल आदि भी दर्शाया है। आश्रय ग्रंथों में महा शिव पुराण स्कन्द पुराण नन्दी पुराण दुर्वासा पुराण कालिका पुराण लिंग पुराण तथा ब्रहमाण्ड पुराणादि को आधार बनाया गया है। इसका रचना काल बैशाख कृष्ण त्रयोदसी सं 1947 से प्रारम्भ होकर संवत 1952 में पूर्ण हुआ है। 1261 पृष्ठो वाला यह दो खण्डों का महाकावय है। यह प्रथम बार हरि प्रसाद भागीरथ द्वारा बम्बई में 1958 विक्रमी में प्रकाशित हुआ है। अवधी भाषा में लिखित यह काव्य राम चरित मानस की परम्परानुसार दोहा चैपाई शैली में लिखा गया है। इसमें कुल 11 सर्ग है। प्रत्येक सर्ग के प्रारम्भ में संस्कृत भाषा में मंगलाचरण प्रस्तुत है। शिव पुराण के सम्बंध में डा. राम गोपाल शर्मा  ‘दिनेश’ ने लिखा है हिन्दी शिव काव्य परम्परा में गौरी शंकर शर्मा का यह महाकाव्य के क्रम में पहला स्थान पाता है। उससे पूर्व रीतिकाल तक हमें शिव सम्बंधी कोई महाकाव्य नहीं मिलता है। डा. राम गोपाल शर्मा  ‘दिनेश’ शिव पुराण की भाषा के विषय में लिखते हैं - शिव पुराण की भाषा साहित्यिक अवधी है, किन्तु उसमें ब्रज , खड़ी बोली तथा अन्य कई बोलियों के शब्दों का यत्र तत्र मिश्रण मिलता है। डा. सरस जी ने उललेख किया है कि शब्द चयन में सरलता और स्वाभाविकता है। कहीं कही तत्सम शब्दों को छन्द योजना को शुद्ध करने के उद्देश्य से भाव को मनमाने तोड़ मरोड़ भी दिया गया है। उपमा उत्प्रेत्क्षा यमक अनुप्रास  आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है। सोरठा मोटल  तोमर छप्पय हरिगीतिका आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है।
 डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस जी बस्ती के छन्दकार नामक अपने शोध ग्रंथ में शर्मा जी का जीवन परिचय तथा उनके  एकमात्र ग्रंथ ‘’शिवपुराण’’ की समीक्षा की है। साथ ही इसकी राम चरित मानस के प्रसंगों का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया है। अन्य पुराणों की तरह इसे भी वक्ता व श्रोता शैली से विकसित किया गया है। साथ ही शिव तत्वों को यथा समय बीच बीच में पिरोया गया है। सृष्टि की रचना रुद्रावतार अर्धनारीश्वर  मनु शतरुपा नारद मोह कैलास वर्णन कुबेर का वर्णन शिव अभिषेक आदि पर भी सामग्री पिरोयी गयी है। शिव कथायें महात्म्य ब्रत उपवास तथा अन्य कर्मकाण्डों को भी जगह दी गयी है। कहीं कहीं तो राम चरित मानस का इतना निकट का सम्बन्ध देखा गया है कि इसमें विभेद करने में भी कठिनाई होती है। प्रकृति चित्रण मानवीय सौन्दर्य चित्रण युग परिवेश का चित्रण बहुत ही विचित्र व मार्मिक बन पड़ा है। इस काव्य में सर्वत्र भक्ति की प्रधानता और लोक मंगल की तलाश है। लौकिक व अलौकिक पात्रों के चयन में लोकप़क्ष को अधिक प्रधानता दी गयी है। शिव से सम्बंधित सौकड़ों कथायें इस काव्य में व्यक्त की गयी है। भाषा का प्रवाह पूर्ण होने के साथ साथ कथ्य के अनुकूल है। छन्द सुगम है तथा कथा का स्पष्टीकरण श्रोता और वक्ता के माध्यम से होने के कारण लोक मंगल के अधिक सन्निकट है।शिव पुराण के कुछ मार्मिक प्रसंग इस प्रकार हैं। इस प्रकार हैं।
मैं अति प्रेम विकल महतारी।
धीरज कीन्ह कुसमय विचारी ।
पुनि पुनि मिलति परति महि चरना।
परम प्रेम कछु जाइ ना बरना
सब नारिन मिलि भेंट भवानी।
जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।
पार्वती बिदाई इस प्रकार हैं --
अति प्रीति में गिरजा तबै निज मातु चरननि पै परी ।
मुरझाई तन की सुधि नहीं विह्वल भई अति तेहि घरी।
उर लाइ लीन्हीं मातु पुनि पुनि मिलति करुनाकरि महा।
कहि जात नहिं सो प्रेम मोसन धीर भागन मुद दहा।।