Wednesday, February 14, 2024
सरस्वती जयंती -- आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी
Wednesday, January 3, 2024
तुलसीदास के “दोहाशतक” में श्रीराम जन्मभूमि विध्वंस का सटीक वर्णन ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
Wednesday, September 13, 2023
तारामंडल का सबसे रोशन तारा ध्रुव तारा. डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
दृढ़ अडिग अटल सर्वोच्च स्थित ध्रुव तारा:-
ध्रुव तारा तारामंडल का सबसे रोशन तारा है. पौराणिक कहानी में एक एक छोटा सा साधारण बालक अपने लगन तप और साधना के बाल पर ध्रुव तारा बनता है. हिंदू धर्म में सूर्य, चंद्रमा, आकाश, तारे, नदी, पर्वत आदि सभी से पौराणिक और आध्यात्मिक कहानियां जुड़ी हुई है. ध्रुव तारा का वर्णन भी पौराणिक कथाओं मे मिलता है. जिसमें बताया गया है कि कैसे साधारण सा बालक एक महान दृढ़ और अडिग ध्रुव तारा बन जाता है.
सब से चमकदार तारा :-
आसमान पर एक सब से चमकदार तारा ध्रुव तारा होता है, उसे ध्रुव तारा कहते हैं | राजा बनने का अधिकार छीने जाने से एक विचलित बच्चे ने, लड़ाई या युद्ध का रास्ता अपनाने की जगह, एक ऊंचा मुकाम हासिल करने के लिए घोर तपस्या की | उस के त्याग और बलिदान के नतीजे में उसे आसमान पर सब से ऊंचा स्थान मिला ।कहते हैं, यह स्थान सूर्य या चंद्रमा से भी ऊपर है।ध्रुव तारे का व्यास सूर्य से 30 गुना अधिक होता है।इसका भार भी यह सूर्य से 7.50 गुना अधिक है. इसकी चमक सूर्य से 22 सौ गुना अधिक होती है. ध्रुव तारा पृथ्वी से लगभग 390 प्रकाशपर्व की दूरी पर है.उत्तरी पोल यानी ध्रुव से यह एक जगह स्थिर प्रतीत होता है.
नारद जैसे गुरु:-
ध्रुव अपने घर से तपस्या के लिए जा रहे थे रास्ते में उन्हें देवर्षि नारद मिले उन्होंने ध्रुव को"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"का जाप कर के भगवान विष्णु की तपस्या करने को कहा था।
घोर तपस्या:-
बताया जाता है कि ध्रुव जी महाराज नारद मुनि के कहने पर यहां आए थे, यहां आकर उन्होंने यहां 5 वर्ष की अवस्था में तपस्या की थी. ध्रुव ने नारद जी की बात मानकर एक पैर पर खड़े होकर छह माह तक कठोर तप किया। बालक की तपस्या देख भगवान विष्णु ने दर्शन देकर उसे उच्चतम पद प्राप्त करने का वरदान दिया। इसी के बाद बालक ध्रुव की याद में सर्वाधिक चमकने वाले तारे को नाम ध्रुवतारा दिया गया। ध्रुव के साथ सात ऋषि मुनियों को भी मिला आकाश में स्थान मिला।
निष्काम भक्ति के प्रतीक है ध्रुव और प्रह्लाद:-
ध्रुव ने कहा था - ‘मुझे मेरे पिता की गोद में बैठने नहीं दिया जाता है. मेरी मां कहती है आप इस सृष्टि के पिता हैं. मैं आपकी गोद में बैठना चाहता हूं.’ भगवान नारायण बोले- ‘आकाश ही मेरी गोद है मैं तुम्हे हमेशा के लिए अपनी गोद में स्थान देता हूं.’ इसके बाद भगवान नारायण ने ध्रुव को अपनी गोद में बिठाया और मरणोपरांत ध्रुव तारा बनने का वरदान दिया.भगवान ने ध्रुव को ध्रुव लोक का स्वामी बनाया, उन्हें ध्रुव तारे के रूप में आकाश में स्थान दिया। ध्रुव ने कठोर भक्ति की थी , उनकी भक्ति को देख भगवान नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने ध्रुव को वरदान दिया कि प्रलय भी उसका कुछ न बिगाड़ सकेगा। इसी के साथ भगवान नारायण ने उन सात ऋषिमुनियों को भी ध्रुव की रक्षा के लिए आसमान में उसके आसपास स्थान दिया, जिन्होंने ध्रुव के साथ तपस्या की. ध्रुव के दृढ़ मनोबल के कारण ही आसमान में ध्रुव तारा स्थिर है और कभी भी अपनी जगह से नहीं हिलता.
शाइनिंग पोल स्टार:-
अंग्रेजी में इसे ‘पोल स्टार’ कहा जाता है. आसमान में उत्तर की ओर दो सबसे चमकता हुआ तारा दिखता है, उसे ध्रुव तारा कहा जाता है.ध्रुव तारा खगोलीय गोले के उत्तरी ध्रुव के निकट स्थित है. इसलिए दुनिया के अधिकतर जगहों से ध्रुव तारा पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के ऊपर स्थित दिखाई देता है.
विशाल आकार:-
पृथ्वी से आपको ध्रुव एक छोटा सा तारा प्रतीत होता होगा, लेकिन यह सूर्य से भी बड़ा है.ध्रुव तारे का व्यास सूर्य से 30 गुना अधिक होता है।इसका भार भी यह सूर्य से 7.50 गुना अधिक है. इसकी चमक सूर्य से 22 सौ गुना अधिक होती है. ध्रुव तारा पृथ्वी से लगभग 390 प्रकाशपर्व की दूरी पर है।
भागवत स्तुति:-
ध्रुव कृत भागवत स्तुति का प्रथम श्लोक इस प्रकार है -
योऽन्त: प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधर: स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ।। 1।।
ध्रुव महाराज ने कहा : हे भगवन्, आप सर्वशक्तिमान हैं। मेरे अन्त:करण में प्रविष्ट होकर आपने मेरी सभी सोई हुई इन्द्रियों को—हाथों, पाँवों, स्पर्शेन्द्रिय, प्राण तथा मेरी वाणी को— जाग्रत कर दिया है। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
Spirituality: एक साधारण बालक से ध्रुव तारा बनने की कथा, आपको भावुक कर देगी, लेकिन ये सीख भी देगी
Spirituality, Dhruv Tara Story: ध्रुव तारा तारामंडल का सबसे रोशन तारा है. लेकिन क्या आप ध्रुव तारा से जुड़ी पौराणिक कहानी के बारे में जानते हैं, जिसमें एक एक छोटा सा साधारण बालक ध्रुव तारा बनता है.


ध्रुव तारा और विज्ञान
Spirituality, Dhruv Tara, Mythological story and Scientific Facts: हिंदू धर्म में सूर्य, चंद्रमा, आकाश, तारे, नदी, पर्वत आदि सभी से पौराणिक और आध्यात्मिक कहानियां जुड़ी हुई है. ध्रुव तारा का वर्णन भी पौराणिक कथाओं मे मिलता है. जिसमें बताया गया है कि कैसे साधारण सा बालक ध्रुव तारा बन जाता है.
ध्रुव तारा की पौराणिक कथा
विष्णु पुराण के अनुसार, प्राचीन समय में उतान्पाद नाम का एक राजा था, जिसकी दो पत्नियां थी. एक का नाम सुनीति और दूसरी का नाम सुरुचि था. बालक ध्रुव सुनीति का संतान था और सुरुचि के पुत्र नाम उत्तम था. सुरुचि चाहती थी कि उसका पुत्र उत्तम ही उत्तराधिकारी बने. इस कारण सुरुचि ध्रुव और सुनीति दोनों से ईर्ष्या करती थी. सुनीति, सुरुचि से बड़ी थी और उसका बेटा ध्रुव भी उत्तम से बड़ा था.ऐसे में उत्तराधिकारी बनने का अधिकार भी ध्रुव को था. लेकिन सुरुचि अपने बेटे उत्तम को उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी, जोकि संभव नहीं था.
एक दिन जब ध्रुव अपने पिता की गोद में जाकर बैठा तो सुरुचि ने यह कहकर उसे गोद से उतार दिया कि तुम इसके लायक नहीं हो! इससे ध्रुव को अत्यंत दुखा हुआ. ध्रुव ने यह बात अपनी मां सुनीति को बताई और कहा- हे माते! मुझे पिता की गोद में बैठने क्यों नहीं दिया गया? तब सुनीति ने कहा, बेटा अगर गोद में ही बैठना है तो नारायण की गोद में बैठो. वे सबके पिता हैं.
ध्रुव ने कहा- मां वो कहां मिलेंगे. मां सुनीति ने उत्तर की ओर दूर पहाड़ी की तरफ इशारा किया. यह सुनकर ध्रुव उत्तर की ओर अकेले ही निकल पड़ा. वहां उसे नारदमुनि मिले. उन्होंने ध्रुव को आगे जाने से रोका, लेकिन वो नहीं माने. ध्रुव ने नारदमुनि से भगवान नारायण से मिलने का रास्ता पूछा.
नारदमुनि बोले- तुम धैर्य रखो बालक, नारायण तुम्हें अवश्य मिलेंगे. इसके बाद नारदमुनि ने ध्रुव को ध्यान करने का तरीका बताया. ध्रुव उसी समय वहां भगवान नारायण के ध्यान के लिए बैठ गया. ध्रुव के दृढ़ मनोबल से आसपास के विस्तार में ऊर्जा बढ़ने लगी. ऊर्जा के बढ़ने का आभास आसपास के ऋषिमुनियों को भी हो गया. ऋषिमुनियों को लगा कि कोई महान व्यक्ति ध्यान में लीन है. लेकिन जब सभी वहां पहुंचे तो ध्रुव को देखकर हैरान रह गए.
ध्रुव के साथ सात ऋषिमुनियों ने भी किया ध्यान
नारदमुनि ने ध्रुव को ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र के जाप की विधि बताई थी. ध्रुव ने पूरे छह माह तक कठिन तपस्या की. बालक ध्रुव के साथ सात ऋषिमुनि भी भगवान नारायण का ध्यान करते रहे. अंत में भगवान नारायण ने ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन दिए. भगवान ने कहा- ‘है बालक! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, क्या चाहिए तुम्हे?’
ध्रुव के साथ सात ऋषिमुनियों को भी मिला आकाश में स्थान
ध्रुव ने कहा- ‘मुझे मेरे पिता की गोद में बैठने नहीं दिया जाता है. मेरी मां कहती है आप इस सृष्टि के पिता हैं. मैं आपकी गोद में बैठना चाहता हूं.’ भगवान नारायण बोले- ‘आकाश ही मेरी गोद है मैं तुम्हे हमेशा के लिए अपनी गोद में स्थान देता हूं.’ इसके बाद भगवान नारायण ने ध्रुव को अपनी गोद में बिठाया और मरणोपरांत ध्रुव तारा बनने का वरदान दिया.
इसी के साथ भगवान नारायण ने उन सात ऋषिमुनियों को भी ध्रुव की रक्षा के लिए आसमान में उसके आसपास स्थान दिया, जिन्होंने ध्रुव के साथ तपस्या की. ध्रुव के दृढ़ मनोबल के कारण ही आसमान में ध्रुव तारा (dhruv tara) स्थिर है और कभी भी अपनी जगह से नहीं हिलता.
यह तो थी साधारण से बालक ध्रुव के ध्रुव तारा बनने की आध्यात्मिक व पौराणिक कहानी. लेकिन ध्रुव तारा को लेकर विज्ञान क्या कहता है, आइये जानते हैं.
ध्रुव तारा और विज्ञान:-
- ध्रुव तारा, जिसका बायर नाम ‘अल्फ़ा उर्साए माइनोरिस’ है. यह तारा मंडल का 45 वां सबसे रोशन तारा है.
- अंग्रेजी में इसे ‘पोल स्टार’ कहा जाता है. आसमान में उत्तर की ओर दो सबसे चमकता हुआ तारा दिखता है, उसे ध्रुव तारा कहा जाता है.
- ध्रुव तारा पृथ्वी से लगभग 390 प्रकाशपर्व की दूरी पर है. उत्तरी पोल यानी ध्रुव से यह एक जगह स्थिर प्रतीत होता है.
- ध्रुव तारा खगोलीय गोले के उत्तरी ध्रुव के निकट स्थित है. इसलिए दुनिया के अधिकतर जगहों से ध्रुव तारा पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के ऊपर स्थित दिखाई देता है.
- पृथ्वी से आपको ध्रुव एक छोटा सा तारा प्रतीत होता होगा, लेकिन यह सूर्य से भी बड़ा है.
- वैज्ञानिक के अनुसार ध्रुव तारे का व्यास सूर्य से 30 गुना अधिक है और भार में भी यह सूर्य से 7.50 गुना अधिक है. वहीं इसकी चमक सूर्य से 22 सौ गुना अधिक है.
- वैज्ञानिकों का मानना है कि 26 हजार साल में एक बार ध्रुव तारे का स्थान परिवर्ति होता है.
Monday, September 11, 2023
संस्कार भारती की स्थापना और ध्येय गीत प्रस्तोता डा.राधे श्याम द्विवेदी
संस्कार भारती बस्ती द्वारा बाल गोकुलम का आयोजन डा.राधे श्याम द्विवेदी
Wednesday, September 6, 2023
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत डॉ० राधेश्याम द्विवेदी
Friday, September 1, 2023
धार्मिक कार्य का प्रारंभ आचमन से (सनातन संस्कार1) आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
Monday, July 3, 2023
।।श्री सद गुरुवे नमः ।।
Thursday, January 12, 2023
क्या वाकई अयोध्या का स्वर्गद्वार स्वर्ग का प्रवेश द्वार है ?विवेचना डा. राधे श्याम द्विवेदी
भगवान विष्णु के चक्र पर अयोध्या बसी हुई है । आठवें मानवेंद्र मनु का जन्म इसी अयोध्या में ही हुआ था। यह अत्यन्त प्राचीन नगरी है जिसका वर्णन वेद, पुराण आदि में बखूबी मिलता है। अयोध्या के वर्तमान मंदिर 200 से 500 साल पुराने हैं, पर यहां के धर्मस्थल लाखों लाख साल पुराने हैं। अयोध्या का आकार धनुषाकार है। इसके नव द्वारों का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है।
अर्पण और समर्पण की अयोध्या
अयोध्या शब्द सुनते ही स्वत: अर्थ बोध होने लगता है-- जहां कोई युद्ध ना हुआ हो। जहां के लोग युद्ध प्रिय न हों, जहां के लोग प्रेम प्रिय हों। जहां प्रेम का साम्राज्य हो। जो श्रीराम प्रेम से पगी हों, वो अयोध्या है। इसका एक नाम अपराजिता भी है। जिसे कोई पराजित न कर सके। जिसे कोई जीत न सके या जहां आकर जीतने की इच्छा खत्म हो जाए। जहां सिर्फ अर्पण हो समर्पण हो, वह अयोध्या है।
परिमाप:-
अयोध्या शहर का क्षेत्रफल 12 योजन (84 किमी) और तीन योजन (31 किमी) चौड़ा है. इसके उत्तरी और दक्षिणी छोर पर सरयू आैर तमसा नदी अवस्थित हैं. इन दोनों नदियों के बीच की औसत दूरी लगभग 20 किलोमीटर है. माना जाता है कि यह शहर मछली के आकार का है, जिसका अगला सिरा सरयू नदी के घाट पर स्थित है, जिसे गुप्तार घाट कहते हैं और इसका पिछला सिरा पूर्व में विल्व हरि घाट स्थित है. इस शहर को तीन ओर से सरयू नदी ने घेर रखा है।
स्वर्गद्वार विशिष्ट महत्व वाला क्षेत्र:-
सरयू तट के सहस्त्रधारा तीर्थ से लेकर पूर्व दिशा में 636 धनुष या 1272 गज या 1.16 किमी.तक पुराण के ज्ञाताओं ने स्वर्गद्वार का विस्तार बतलाया है। अयोध्या में स्वर्गद्वार के नाम से एक विशिष्ट महत्व वाला मोहल्ला है, जिसकी मान्यता विष्णु पुराण और वाल्मीकि रामायण में मिलता है. इस स्वर्गद्वार की स्थापना विश्वामित्र ने की थी. विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु की सेवा से खुश होकर वरदान मांगने को कहा, जिस पर राजा त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग प्राप्ति का वरदान मांगा. महर्षि विश्वामित्र ने इसके लिए विशेष यज्ञ कराया था, जिस स्थान में यज्ञ हुआ, उसी स्थान को स्वर्गद्वार के नाम से जाना जाता है. यह क्षेत्र प्राचीन भी है और पुण्य क्षेत्र वाला भी है।काल की गणना के अनुसार सरयू की सहस्त्रधारा से पूर्व की ओर 200 धनुष और फिर दक्षिण की ओर 200 धनुष की जमीन का माप किया. उसी क्षेत्र में यज्ञ शुरू किया गया. इसी स्थान से त्रिशंकु को स्वर्ग भेजा गया. उसके बाद से आज तक इसे स्वर्गद्वार के नाम से जाना जाता है. यह एक महत्वपूर्ण स्नान घाट भी है और एक विशिष्ट क्षेत्र का परिचायक भी है। सरयू नदी की सनातनी पवित्रता, राम आदि चारो भाइयों का कीडा करना,अनेक प्राचीनतम मंदिरों से युक्त यह सिद्ध स्थल के रूप में साक्षात स्वर्ग से कम तनिक भी नहीं है। जहां सहस्रधारा लक्ष्मण घाट लक्ष्मण जी के स्व धाम का स्थल रहा है वहीं गुप्तार तीर्थ भगवान राम उनके परिवार तथा समस्त अयोध्यावासियों का स्वर्गारोहण स्थल के रूप में जाना जाता है। सरयू नदी के तट पर बने अनेक घाटों में सबसे महत्वपूर्ण घाट स्वर्गद्वार है. स्वर्ग और पृथ्वी के समस्त तीर्थ प्रातः काल यहां अपनी उपस्थिति देते हैं । जिस श्रद्धालु को सभी तीर्थों के स्नान और पूजन का फल प्राप्त करना हो उसे यहां आकर स्नान करना चाहिए। --. (रुद्र्यामालोक्त अयोध्या महात्म्य अध्याय 4 श्लोक 6 व 7)
इस घाट को नागेश्वर और मुक्तिदाता के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि यहां मरनेवाले व्यक्ति सीधे विष्णुलोक जाते हैं.----.(उक्त संदर्भ अध्याय 4 श्लोक 8 )
रामकोट से 700 मीटर उत्तर में स्थित स्वर्गद्वार सात घाटों चंद्रहरि, गुप्तहरि, चक्रहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि से मिलकर बना है।
पतितपवान क्षेत्र:-
इस तीर्थ में स्नान करने से सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है।स्वर्गद्वार में जो तप, जप, हवन, दर्शन, ध्यान ,अध्ययन एवं दान आदि किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर , म्लेच्छ, संकीर्ण पापयोनि, कीड़े मकोड़े, मृग, पक्षी जो भी स्वर्गद्वार में काल से मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे सब गरुड़ध्वज रथ पर आरूढ़ हो सुंदर कल्याण में बैकुंठ धाम में जाते हैं। जो स्वर्गद्वार में ब्राह्मणों को अन्नदान, रत्न दान, भूमि दान, गोदान तथा वस्त्र दान करते हैं, वे सब श्री हरि के धाम को जाते हैं। ( संदर्भ उपरोक्त अध्याय 4 श्लोक 9 से 15 तक )।
देवाधिदेव भगवान विष्णु अपने स्वरूप को चार शरीर में व्यक्त करके रघुवंश शिरोमणि श्री राम होकर अपने तीनों भाइयों के साथ यहां नित्य विहार करते हैं। इसी स्वर्गद्वार में कैलाश निवासी शिव भी वास करते हैं। मेरु तथा मंदराचल के समान पाप की बड़ी भारी राशि भी स्वर्गद्वार में पहुंचते ही नष्ट हो जाती हैं। ऋषि देवता असुर ,जप होम परायण मनुष्य, सन्यासी और मुमुक्षु पुरुष स्वर्गद्वार का सेवन करते हैं। काशी में योग युक्त होकर शरीर त्याग करने वाले पुरुषों को जो गति प्राप्त होती हैं, वही एकादशी को सरयू में स्नान करने मात्र से मिल जाती हैं। वे भगवान विष्णु की भक्ति को पाकर निश्चय ही परमानंद को प्राप्त होते हैं।
स्वर्गद्वार क्षेत्र के प्रमुख मन्दिर:-
सहस्रधारा से नागेश्वरनाथ मंदिर तक की भूमि का टुकड़ा आमतौर पर अयोध्या में स्वर्ग द्वार के रूप में होता है। सरयू नदी के सामने घाट पर इमारतों को देख सकते हैं। वे 18वीं शताब्दी में मुख्य रूप से राजा सफदर जंग के दरबार में हिंदू नवाब नवल राय बनवाए गए थे। घाटों पर बनी इमारतों से देखने में बहुत खूबसूरत हैं। वर्तमान में नदी का तल उत्तर की ओर स्थानांतरित हो गया है। 1960 के दशक के दौरान नए पुल के परिवेश में वर्तमान में नए घाटों का निर्माण किया गया था, जो देखने में एक उत्कृष्ट दृश्य देते हैं।इस घाट पर प्रमुख मंदिर राम मंदिर और बड़े-नारायण मंदिर हैं। काल गंगा और ताम्र वराह कनेक्शन तीर्थम हैं।इस घाट के पास सांग वेद स्कूल है, जो एक प्रसिद्ध वेद स्कूल है, जहां भगवान राम के जन्मदिन के दौरान विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं ।यहां अनेक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मठ-मंदिर हैं. वहीं राम की धर्मस्थली के पास लगभग 15, 000 से अधिक घर बने हुए हैं, जिनमें 60 से ज्यादा गलियां हैं. क्षेत्र के बीच एक ऐसी गली है जहां पर गुजरने से पागल भी ठीक हो जाते हैं। क्षेत्र के स्थानीय लोगों की मानें तो आज भी इस गली और स्थान का पता किसी को नहीं चल सका है। इसलिए इस क्षेत्र को रहस्यमयी माना गया है। स्वर्गद्वार क्षेत्र को हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी की जा रही है।दस आध्यात्मिक ऊर्जा स्थलों में यूनेस्को से आई टीम ने नागेश्वरनाथ मंदिर के आसपास के स्थल को चिह्नित किया गया है। घाटों के साथ ही नदी तट पर अनेक मंदिर भी हैं, जिनमें सूर्यमंदिर और नागेश्वरनाथ मंदिर सर्वाधिक महत्व के माने जाते हैं. यहां कालेराम मंदिर, चंद्रहरि महादेव मंदिर, शेषावतार मंदिर, सहस्रधारा घाट, सरयू मंदिर, हनुमत सदन, हनुमत निवास सहित अन्य सिद्धस्थान हैं जो कि पौराणिक एवं रामायणकालीन माने जाते हैं। यहां चतुर्भुज का मंदिर और विधिजी का मंदिर भी है.
अयोध्या नगरी में स्वर्गद्वार वार्ड नंबर 55 है ,श्री महेन्द्र कुमार शुक्ला स्वर्गद्वार वार्ड नंबर 55 के सभासद हैं जिनका संपर्क नंबर 9792393000 है। इस क्षेत्र के विकास और उन्नयन के लिए श्री शुक्ला जी को सुझाव वा परामर्श दिया जा सकता है। इस वार्ड को स्वर्ग समान अयोध्या नगरी का प्रारंभिक बिंदु के रूप में देखा जा सकता है. यह वार्ड अपने आप में बेहद खास है क्योंकि यही से अयोध्या की प्रसिद्द पंचकोसी परिक्रमा का आरंभ और अंत होता है. यहां अयोध्या के विख्यात मंदिर और घाट भी स्थित हैं, जिनका पौराणिक महत्व काफी अधिक है. अयोध्या और फैजाबाद नगर पालिका के विलय से पूर्व यह वार्ड अयोध्या नगर पालिका का ही एक हिस्सा था, जो अब नगर निगम अयोध्या द्वारा संचालित किया जाता है. इस वार्ड के उत्तर में सरयू नदी तक, दक्षिण में तुलसी उद्यान से पाली मन्दिर के सामने से होते हुए राजेन्द्र निवास तक, पूरब में पुराने पुल से मुख्य मार्ग होते हुए तुलसी उद्यान तक एवं पश्चिम में राजेन्द्र निवास से गौही मंन्दिर धर्मशाला होते हुए सरयू नदी तक विस्तृत है. वार्ड के प्रमुख मोहल्लों में स्वर्गद्वार, उर्दुबाज़ार मोहल्ला, लक्ष्मण घाट आंशिक, नया घाट, राम की पैडी आंशिक तथा नागेश्वरनाथ मंदिर, राम की पैडी, नया घाट, तुलसी उद्यान, विश्वकर्मा मंदिर, नरसिंह भवन, ग्वालियर मंदिर, श्री काले राम मंदिर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं. इसके साथ ही वार्ड की शिक्षा सुविधा की बात यदि की जायें तो यहां अवध विद्या मंदिर जूनियर हाई स्कूल, पूर्व माध्यमिक विद्यालय, एसएमबी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सहित अन्य प्राइवेट विद्यालय भी मौजूद हैं, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा व्यवस्था मुहैया कराते हैं.