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Thursday, November 14, 2024

भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी – बिंदुक्षिणी ( द्विवेदी ब्राह्मण इतिहास श्रृंखला संख्या 10 )//आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

हर कुल और गोत्र के भी संरक्षक देवता या कुलदेवी होती हें । इनका ज्ञान कुल के वयोवृद्ध अग्रजों (माता-पिता आदि ) के द्वारा अगली पीड़ी को दिया जाता है । एक कुलीन ब्राह्मण को अपने तीनों प्रकार के देवताओं का बोध तो अवश्य ही होना चाहिए -
(1) इष्ट देवता अथवा इष्ट देवी ।
(2) कुल देवता अथवा कुल देवी ।
(2) ग्राम देवता अथवा ग्राम देवी ।
ब्रह्मा जी के बनाए हुए सप्त ऋषियों में पहले 7 फिर
24 प्रमुख और बाद में 56 गोत्रों में यज्ञ पूजा की जाती रही।ये ऋषि अपने अपने वंशजों की मंगल कामना करते थे। दैत्य आकर इस कार्य में विघ्न उपस्थित करने लगे थे। ब्राह्मणों के प्रार्थना पर इस विघ्नों को दूर करने के लिए त्रिदेवों ने हर गोत्र वा वंश में एक एक योगनियाँ यज्ञ की रक्षा के लिए उत्पन्न किया।आगे चल कर यही योगनियां कुल देवी के रूप में पूजी जाने लगीं।
 कुलदेवी या देवता कुल या वंश के रक्षक देवी-देवता होते हैं। ये घर-परिवार या वंश-परंपरा के प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते हैं। इनकी गणना हमारे घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी होती है। अत: प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना जरूरी होता है। इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि ये रुष्ट हो जाएं तो हनुमानजी के अलावा अन्य कोई देवी या देवता इनके दुष्प्रभाव या हानि को कम नहीं कर सकता या रोक नहीं लगा सकता। इसे यूं समझें कि यदि घर का मुखिया पिताजी या माताजी आपसे नाराज हों, तो पड़ोस के या बाहर का कोई भी आपके भले के लिए आपके घर में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि वे 'बाहरी' होते हैं। 
           ऐसा भी देखने में आया है कि कुल देवी-देवता की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई खास परिवर्तन नहीं होता, लेकिन जब देवताओं का सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में घटनाओं और दुर्घटनाओं का दौर शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, गृहकलह, उपद्रव व अशांति आदि शुरू हो जाती हैं। आगे वंश नहीं चल पाता है। पिताद्रोही होकर व्यक्ति अपने वंश को नष्ट कर लेता है!

                      मां बिन्दुक्षणी
भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी :–
स्कन्द पुराण के अनुसार बिन्दुक्षणी/श्रीमाता के नाम से जानी जाती है।वह गुजरात के पाटण शहर में है। यह मां दुर्गा /मां शारदा का स्वरूप होती हैं। कुछ अन्य संबद्ध वंशों में महादेवी ,कालिका देवी ,योगेश्वरी और दुर्गेश्वरी देवी को भी कुल देवी के रूप में मान्यता मिली है। कुछ लोग महामाया /वाराही देवी को कुल देवी के रूप में पूजते हैं। श्री माताजी राज राजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी के रूप में भी जानी जाती हैं  
माँ बिन्दुक्षणी सभी की कुलदेवी हैं इससे संबंधित लोग भारद्वाज गोत्र (पंक्ति) श्रीमाली ब्राह्मणों की आयु) मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात में पाए जाते हैं। प्रमुख माँ बिंदुक्षिणी का मंदिर सावीधार गांव में स्थित है, जो 12 किलोमीटर दूर है जालोर जिले (राजस्थान) में भीनमाल से आरएस दूर और अन्य मंदिर मुख्य रूप से हैं जोधपुर (राजस्थान), पाटन (गुजरात), सिरोही (राजस्थान) और भारत के अन्य स्थानमैं एक। माँ बिन्दुक्षिनी को माँ बन्धुक्षनी, माँ बन्धुक्षिनी, माँ बा भी कहा जाता है विभिन्न क्षेत्रों में भाषा और बोली के अंतर के कारण एनधुरक्षिणी जहां उनके बेटे-बेटियां रहते हैं.माँ बिन्दुक्षिणी हैं देवी दुर्गा का एक अवतार । माँ बिन्दुक्षइनि का वाहन सिंह है जो शुभता, विजय, असीम ऊर्जा आदि का प्रतीक है ताकत। उनका पसंदीदा रंग लाल है और उन्हें लाल चुनरी पहनना पसंद है साड़ी के साथ लाल चूड़ियां और लाल बिंदी. उसके हाथ हमेशा रंगे रहते हैं। कुमकुम.माँ बिन्दुक्षिणी के स्मरण का बीज मंत्र है--
" ॐ ह्रीं श्रीं बिंदउष्णाय नमो नमः "
 जिसका जाप नियमित रूप से प्रातः काल (ब्राह्म) में करना चाहिए।मा मुहूर्त) और शाम (सूर्य अस्त के बाद) प्रत्येक में कम से कम 51 बार। 
भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी बिंदुक्षणी माता के दो प्रमुख मंदिर मिलते हैं। एक पाटन गुजरात में है और दूसरा पाली राजस्थान में स्थित है। इन दोनों स्थानों के बीच की दूरी लगभग 300 किमी की है। मंदिर का नाम “बिंदुक्षणी” के पीछे भी एक रोचक कहानी भी है। कहा जाता है कि सतयुग में, माता सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे थे। इनमें से माता का एक अंग (बिंदु संभवतः मस्तक के मध्य लगाया जाने वाला सुहाग का चिन्ह बिंदी ) इसी स्थान पर गिरा था। इसी कारण, इस स्थान को “बिंदू” और यहां विराजमान देवी को “बिंदुक्षणी माता” के नाम से जाना जाता है।
     भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी बिन्दुक्षणी मां हैं और उनका मंदिर गुजरात के पाटण शहर में पंचमुखा हनुमान गली(या शेरी) में भी है।लोग इस मंदिर में आकर अपने कुल देवी को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।

राजस्थान पाली की श्रीबिंदुक्षणी माता मंदिर,  
राजस्थान के पाली की श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर, माता दुर्गा के एक शक्तिपीठ के रूप में विख्यात, यह मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। पश्चिमी राजस्थान के आध्यात्मिक धामों की यात्रा का यह पहला पड़ाव है।
     राजस्थान की धरती वीरता की गाथाओं और ऐतिहासिक स्थलों के लिए जितनी प्रसिद्ध है, उतनी ही सुंदर मंदिरों और आध्यात्मिक महत्व के स्थलों के लिए भी जानी जाती है। राजस्थान के पाली जिले में स्थित प्रसिद्ध भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर है। यह मंदिर माता दुर्गा के एक शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है और हजारों वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर, राजस्थान के पश्चिमी भाग में स्थित पाली जिले का एक रत्न है। यह मंदिर पाली शहर से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पाली शहर से निकलने के बाद सुमेरपुर रोड की ओर जाना पड़ता है। कुछ ही दूर चलने पर रास्ता मंदिर की ओर मुड़ जाता है। मंदिर एक ऊंचे स्थान पर स्थित है, जो चारों ओर से मनमोहक पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यह स्थान न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य से भी भरपूर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क है और व्यक्तिगत वाहन या टैक्सी आसानी से ली जा सकती है।
बिंदुक्षणी माता मंदिर का इतिहास 
श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर का इतिहास, रहस्य और श्रद्धा का संगम है। यद्यपि मंदिर के निर्माण का कोई ठोस लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है, फिर भी सदियों से चली आ रही किंवदंतियां और पुराणों में वर्णित कथाएं इसके इतिहास की झलक दिखाती हैं। 
बिंदुक्षणी माता मंदिर का निर्माण 
श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है, लेकिन इसके निर्माण का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, मंदिर एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। माना जाता है कि इसका निर्माण किसी स्थानीय राजा द्वारा करवाया गया था। राजा को सपने में माता दुर्गा के दर्शन हुए थे, और उन्हें इस स्थान पर मंदिर बनाने का निर्देश दिया गया था। राजा के आदेश पर मंदिर का निर्माण करवाया गया और तब से यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन गया है। सदियों से मंदिर का जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा है। भव्य नागर शैली में निर्मित यह मंदिर ऊंचे शिखरों और जटिल नक्काशी के लिए जाना जाता है।
मंदिर की वास्तुकला 
श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर अपनी धार्मिक महत्ता के साथ-साथ उत्तरा भारतीय मंदिर शैली, नागर शैली, का एक बेहतरीन उदाहरण है। यह शैली ऊंचे शिखरों, जटिल नक्काशियों और विशाल हॉलों के लिए जानी जाती है।
मुख्य गर्भगृह
मंदिर का मुख्य गर्भगृह पवित्र संगमरमर से बना हुआ है। गर्भगृह के केंद्र में भव्य मूर्ति विराजमान है, जिन्हें माता बिंदुक्षणी के नाम से जाना जाता है। माता की मूर्ति के चारों ओर मंदिर के पुजारियों द्वारा चढ़ाए गए श्रद्धालुओं के भेंट चमकते हुए देखे जा सकते हैं।
मंडप
गर्भगृह के बाहर एक विशाल मंडप है। इस मंडप को स्तंभों की कतारों ने सुसज्जित किया हुआ है। इन स्तंभों और मंडप की दीवारों पर देवी-देताओं की कहानियों को दर्शाती हुई जटिल नक्काशियां की गई हैं। ये नक्काशियां न केवल कलात्मक दृष्टि से मनमोहक हैं, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों की कहानियों को दर्शाकर श्रद्धालुओं की आस्था को भी बढ़ाती हैं। सदियों से मंदिर का जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा है। ऐसा माना जाता है कि मुगलकाल के दौरान मंदिर को क्षति पहुंचाई गई थी। बाद में, मराठा शासनकाल में इसका जीर्णोद्धार करवाया गया। वर्तमान समय में भी मंदिर का जीर्णोद्धार और रख-रखाव का कार्य निरंतर चलता रहता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रद्धा का केंद्र बना रहे।
मुगल काल और मंदिर का जीर्णोद्धार:
मुगल शासन के दौरान, कई हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया था। माना जाता है कि श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर भी उसी समय क्षतिग्रस्त हुआ था। हालांकि, इस बात के लिए कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं।
मराठा शासन और पुनर्निर्माण:
१८ वीं शताब्दी में, मराठा साम्राज्य के शासनकाल के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। मराठों ने मंदिर की मरम्मत करवाई और इसके आसपास के क्षेत्र का भी विकास किया। इस दौरान, मंदिर की भव्यता और वैभव में वृद्धि हुई।
आधुनिक युग में मंदिर:
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से, श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर का महत्व लगातार बढ़ता गया है। मंदिर के जीर्णोद्धार और रख-रखाव का कार्य निरंतर चलता रहता है। वर्तमान समय में, यह मंदिर न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध है। हजारों श्रद्धालु हर साल मंदिर आकर माता बिंदुक्षणी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं।
प्रमुख दर्शनीय स्थल 
हजारो वर्षों का इतिहास समेटे हुए श्री बिंदुक्षणी माता मंदिर अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ स्थापत्य कला का भी एक अद्भुत उदाहरण है। आइए, दर्शन के लिए जाते समय मंदिर के कुछ प्रमुख दर्शनीय स्थलों पर एक नज़र डालें:
गर्भगृह: मंदिर का मुख्य आकर्षण गर्भगृह है। यह पवित्र स्थल भव्य संगमरमर से बना हुआ है। गर्भगृह के केंद्र में भव्य मूर्ति विराजमान है, जिन्हें माता बिंदुक्षणी के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गर्भगृह में जाते हैं।
मंडप: गर्भगृह के बाहर एक विशाल मंडप है। यह मंडप स्तंभों की कतारों से सुसज्जित है। इन स्तंभों और मंडप की दीवारों पर देवी-देताओं की कहानियों को दर्शाती हुई जटिल नक्काशियां की गई हैं। श्रद्धालु यहां बैठकर पूजा-पाठ कर सकते हैं और मंदिर के शांत वातावरण का आनंद ले सकते हैं।
शिखर: नागर शैली में निर्मित इस मंदिर की विशेषता इसका ऊंचा शिखर है। शिखर की सुंदर नक्काशी दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती है। माना जाता है कि शिखर का निर्माण मंदिर के जीर्णोद्धार कार्यों के दौरान किया गया था।
प्राकृतिक सौंदर्य 
प्राकृतिक सौंदर्य मंदिर पहाड़ियों से घिरे हुए ऊंचे स्थान पर स्थित है। मंदिर दर्शन के साथ-साथ श्रद्धालु आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य का भी आनंद ले सकते हैं। शांत वातावरण और मनोरम दृश्य मन को प्रसन्नता प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष 
बिंदुक्षणी माता मंदिर राजस्थान की धरती पर स्थित एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। भव्य वास्तुकला, समृद्ध इतिहास और माता की दिव्य शक्ति का अनुभव श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। मंदिर दर्शन से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि इतिहास और कला के धरोहर को भी करीब से देखा जा सकता है।
             अन्य कुल देवियां 
महादेवी :-
महादेवी को कई महलों से जाना जाता है। उसे आम तौर पर मूलप्रकृति ('वह जो तत्व है') और महामाया ('वह जो महान माया है') के रूप में जाना जाता है।  देवी भागवत पुराण और ललिता सहस्रनाम में महादेवी के अनेक वर्णनों का वर्णन है। इनमें उनके दिव्य और विध्वंसक लक्षण शामिल हैं। देवी भागवत पुराण में उन्हें 'सभी की माता', 'सभी प्राणियों में जीवन शक्ति' और 'वह जो परम ज्ञान हैं' के रूप में वर्णित किया गया है। ललिता सहस्रनाम में भी उनका वर्णन  विश्वधिका ('वह जो ब्रह्मांड से परे है'), सर्वगा ('वह जो सर्व सहभागी है'),('वह जो राक्षसों को मारती है'),  भैरवी  ('भयानक'), और  सहरिणी  ('वह जो नष्ट कर देती है')।महादेवी के विध्वंसकारी स्मारक का वर्णन आर्यस्तव नामक एक भजन में किया गया है, जिसमें उन्हें कालरात्रि  ('मृत्यु की रात') और  निष्ठा ('वह जो मृत्यु है') कहा गया है। 
मां वाराही:-
माँ वाराही हिन्दू धर्म की सप्तमातृका में से एक है।यह देवी लक्ष्मी का स्वरूप है। जो भगवान विष्णु के वराहावतार की शक्ति रूपा है। इनका शीश जंगली शूकर का है। श्री दुर्गा शप्तशति चण्डी के अनुसार शुम्भ निशुम्भ दो महादैत्यो के साथ जव महाशक्ति भगवती माँ दुर्गा का प्रचण्ड युद्ध हो राहा था तब माँ भगवती परमेश्वरी कि सहायता करने के लिए सभी प्रमुख देवता (भगवान शिव, भगवान विष्णु , भगवान ब्रह्मा , देवराज इंद्र , कुमार कार्तिकेय) अपने कर्मो के आधार शक्ति स्वरूपा देवीऔ को अपने शरीर से प्रकट किया था । उसी समय भगवान विष्णु अपने अंशावतार वाराह के शक्ति माँ वाराही को प्रकट किया था। भगवान विष्णु की शक्ति देवी लक्ष्मी है उनके वराह अवतार की शक्ति देवी लक्ष्मी की अवतार वाराही है।
     आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर 8630778321)

Wednesday, July 12, 2023

द्विवेदी ब्राह्मण के प्रमुख गोत्रज "भारद्वाज" ( द्विवेदी ब्राह्मण इतिहास श्रृंखला संख्या 6 ) आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी



गोत्र का अर्थ : -- 
किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो वंश जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया । गोत्र का अर्थ है कि वह व्यक्ति किस ऋषि के कुल का है। जैसे किसी ने कहा कि मेरा गोत्र भारद्वाज है तो उसके कुल के ऋषि भारद्वाज हुए। अर्थात भारद्वाज के कुल से संबंध रखता है। भारद्वाज उसके कुल के आदि पुरुष है। इसी तरह कोई इंद्र, सूर्य या चंद्रदेव से तो कोई हिरण्याक्ष या हिरण्यकशिपु से संबंध रखता है तो कोई महान राजा बलि की संतान है। हालांकि सभी ऋषि अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, कुशिक आदि ऋषियों की ही संताने हैं।
गण पक्ष और शाखाएं :-
गोत्रों के अनुसार ईकाई को 'गण' नाम दिया गया। एक गण का व्यक्ति दूसरे गण में विवाह कर सकता है। इस प्रकार जब कालांतर में गणों के कुल के लोगों की संख्या बढ़ती गई तो फिर उनमें अलग अलग भेद होते गए। संख्‍या बढ़ने के साथ ही पक्ष और शाखाएं बनाई गई। इस तरह इन उक्त ऋषियों के पश्चात उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से भी अन्य गोत्रों का नामकरण प्रचलित हुए। जैसे अग्नि नाम का एक गोत्र या वंश है। अग्नि के पुत्र अंगिरा हुए जिनके नाम का भी गोत्र या वंश चला। फिर अंगिरा के पुत्र बृहस्पति हुए और बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज हुए जिनके नाम का भी गोत्र या वंश चला। गोत्रों से व्‍यक्ति और वंश की पहचान होती है। वंश से इतिहास की पहचान होती है। 
तीन जन्मों का वरदानधारी :-
राज ऋषि ने अपनी तपस्या से इंद्र देव को प्रसन्न कर उनसे 100 -100 वर्षों के तीन जन्मों का वरदान मांगा था। दरअसल भारद्वाज वेदों का अध्ययन करना चाहते थे पर समय की कमी के कारण अध्ययन पूरा ना हो सका। भारद्वाज ऋषि 3 जन्मों के बाद भी वेदों का पूरी तरह से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके। इसके बाद इन्होंने इंद्रदेव से चौथा जन्म मांगा तो उन्होंने इन्हें एक उपाय बताया और कहा कि तुम “सबित्र अग्नि जयन” यज्ञ करो । इन्होंने ऐसा ही किया और तब जाकर इनकी जिज्ञासा पूर्ण हुई थी।
भारद्वाज ऋषि का जन्म –
भारद्वाज बृहस्पति और ममता के पुत्र थे ।अंगिरा वंशी भरद्वाज के पिता – बृहस्पति और माता ममता थीं। बृहस्पति ऋषि – अंगिरा के पुत्र होने के कारण ये वंश अंगिरा वंश भी कहलाया जा सकता है। कालांतर में यह राजा भरत के दत्तक पुत्र हुए थे इसके बाद कश्यप और अदिति के पुत्रों ने इनका पालन-पोषण किया था। जब भरत का वंश खत्म होने लगा तब उन्हें दत्तक रूप में प्रदान किया शास्त्रों में भी इसका वर्णन है। कहते हैं जब सम्राट भरत का वंश खत्म होने लगा तब उन्होंने संतान पाने के लिए मरुथम नामक यज्ञ किया । इससे मरुद गणों ने प्रसन्न होकर भरत को भारद्वाज नाम का पुत्र दिया था। आगी वंश में इनका जन्म हुआ था इनके पिता बृहस्पतिऔर माता का नाम ममता था लेकिन पैदा होते ही माता-पिता में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि इनका पालन-पोषण कौन करें। दोनों ने एक दूसरे से कहा था तुम इसे संभालो उसी समय से इनका नाम भारद्वाज पड़ा था । इसके बाद इन्होंने अपनी तपस्या के बलबूते पर इस नाम को अमर कर दिया।
भारद्वाज ऋषि का विवाह : –
भारद्वाज ऋषि का विवाह सुशीला से हुआ था और उनका एक पुत्र था गर्ग और एक पुत्री देववर्षिनी थी | 
भारद्वाज एक अग्रगण्य नाम :-
वैज्ञानिक चिंतन और वैज्ञानिक सोच के आधार पर सर्वोच्च स्थान को प्राप्त करने वाले भारत के महान ऋषियों में ऋषि भारद्वाज का नाम आज अग्रगण्य है। उन्होंने अपनी गहरी साधना और अध्यात्म विद्या के बल पर प्राचीन काल में भारत के ऋषि मंडल में अपना सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त किया। लोक कल्याण के लिए ज्ञान प्राप्त करना है उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य रहा था वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्होंने सौ- सौ वर्ष के तीन जन्म लिए थे ।
विलक्षण प्रतिभा वाले ऋषि:-
भारद्वाज ऐसे ऋषि थे जो मंत्र दृष्टा होने के साथ-साथ आयुर्वेद के भी बड़े आचार्य थे वह बहुत अच्छे शाम गायक भी थे ।इसलिए चार प्रमुख शाम गायकों में इनका नाम है। लोगों के कल्याण के लिए उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की उनका जीवन दर्शन हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है उन्होंने ज्ञान अर्जित किया और उसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। यही कारण है कि वेदों और पुराणों में भी इनकी महिमा गाई गई है । 
राजा भरत के कुल पुरोहित:-
भारद्वाज ऋषि राजा भरत के कुल पुरोहित थे दुष्यंत पुत्र राजा भरत ने अपना राजपाट इन्हीं भारद्वाज को सौंपा तथा खुद जंगल में जाकर रहने लगे।
आध्यात्मिक योगदान:-
महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहिता, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र आदि अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। 'चरक संहिता' की साक्षी है कि उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था। 
ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का भी ज्ञान था। आयुर्वेद के ज्ञान से उन्होंने अपने स्वास्थ्य को चिरस्थाई रखते हुए आयु को भी दीर्घ कर लिया था।ऋषि भारद्वाज ही ऐसे पहले वैज्ञानिक ऋषि हैं जिन्होंने प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में बार-बार यज्ञ - याग कराने की परंपरा ऋषि भारद्वाज द्वारा ही स्थापित की गई थी। इसी से इसका नाम प्रयाग हो गया था।
संसार की भलाई के लिए योगदान :-
ऋषि भारद्वाज के द्वारा ऐसे ही यज्ञ यागादि के कार्यक्रम संसार की भलाई के लिए किए जाते थे। दान आदि लेकर लोग दूर-दूर से चलकर उन यज्ञों में उपस्थित होते थे । उनकी सुगंधी से वायुमंडल शुद्ध होता था। जिससे प्राणी मात्र का कल्याण होता था। ऐसी पवित्र भावना को लेकर हमारे इस महान ऋषि के द्वारा उस समय धार्मिक और पुण्य कार्य करने की सतत प्रेरणा लोगों को दी जाती रही । जिससे लोगों में धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हुई। ऋषि भारद्वाज के बाद जब उन जैसे महात्मा ऋषियों का अभाव हुआ तो कुछ तो उनके अभाव के कारण और कुछ लोगों की अंधश्रद्धा के कारण प्रयाग में जाकर लोग मुंडन संस्कार आदि न जाने कैसे-कैसे कार्य करवाने लगे। कालांतर में लोगों की इस श्रद्धा भावना का लाभ कुछ मक्कार लोगों ने उठाना आरंभ किया।
वृहदविमान-भाष्य :- 
यदि इस चतुर्युगी के त्रेता काल में रामचंद्र जी का जन्म हुआ था तो रामायण काल को बीते हुए लाखों वर्ष हो चुके हैं। यह हम भारतीयों के लिए बहुत ही गर्व और गौरव का विषय है कि उस समय भी हमारे यहां पर विमान हुआ करते थे। 'पुष्पक विमान' इसका उदाहरण है। उस समय ऋषि भारद्वाज जैसे वैज्ञानिक ऋषि विद्यमान थे। जिन्होंने 'वृहदविमान-भाष्य' की रचना कर उसमें विमान बनाने की सारी तकनीकी का उल्लेख किया है। ऋषि भारद्वाज जी के इसी ग्रंथ को पढ़कर मुंबई के रहने वाले बापूजी तलपदे ने आधुनिक विश्व में सबसे पहले विमान जैसी चीज का आविष्कार कर जब उसका प्रदर्शन अंग्रेजों के सामने किया तो अंग्रेजों ने उनसे इस तकनीक को छीनकर राइट ब्रदर्स को दे दिया। इतना ही में बापूजी तलपदे के हाथ भी कटवा दिये, जिससे कि वह आगे कभी इस प्रकार की चेष्टा ना कर सके।
         ऋषि भारद्वाज के विमान की विशेषता यह थी कि वह एक ही साथ जल, थल और नभ तीनों में उड़ान भर सकता था। यदि किसी कारण से जल में चलते हुए उसके पलटने या खराब होने या अन्य किसी प्रकार की कोई आपदा आ जाती थी तो वह ऐसी आपदा के आते ही कंप्यूटर जैसी तकनीक के माध्यम से स्वयं उड़ान भरने की स्थिति में आ जाता था और नभ मार्ग से उल्टा धरती पर आ जाता था। ऋषि भारद्वाज के वैज्ञानिक चिंतन की ऊंचाई तक वर्तमान भौतिक विज्ञान नहीं पहुंच सका है। ऋषि भारद्वाज के इस विमान शास्त्र में यात्री विमानों के साथ-साथ लड़ाकू विमान और स्पेस शटल यान का भी उल्लेख मिलता है। वर्तमान विश्व के वैज्ञानिक अभी जिन चीजों की कल्पना ही कर रहे हैं उन्हें ऋषि भारद्वाज ने अब से लाखों वर्ष पूर्व पूर्ण करके दिखाया था। उदाहरण के रूप में आज का वैज्ञानिक सोच रहा है कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर उड़ान भरने की स्थिति पैदा की जाए, जिससे अनेक ग्रह सीधे पृथ्वी के साथ जुड़ सकें और उनकी खबर पृथ्वीवासियों को मिलती रहे। इस व्यवस्था को हमारे ऋषि भारद्वाज ने उस समय पूर्ण करके दिखाया था। ऋषि भारद्वाज के विमान शास्त्र को पढ़ने से पता चलता है कि उन्हें वायुयान को अदृश्य कर देने की तकनीक काफी ज्ञान था।
बुद्धि बड़ी ही उच्च थी, ह्रदय में पवित्र भाव थे।
कल्याणार्थ मनुष्य मात्र के थे काम करते चाव से।।
थे पूर्वज महान अपने, जिन पर हमको गर्व है।
हर कर्म उनका मनुजता का आज भी तो पर्व है।
विमान शास्त्र की रचना :–
ऋषि भारद्वाज ने विमान शास्त्र की रचना की थी इसका अर्थ होता है- पक्षियों के समान वेग होने के कारण इसे विमान कहते इस ग्रंथ में विमान चालक के लिए कई रहस्यों की जानकारी बताई गई है इन राशियों को जान लेने के बाद ही पायलट विमान चलाने का अधिकारी हो सकता है
श्री राम से मिलन :–
भारद्वाज ऋषि का श्री राम के साथ अनन्य अनुराग था वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गए थे भारद्वाज ने श्री राम का बड़े प्रेम से सत्कार किया था श्रीराम ने इनसे रहने के लिए स्थान भी मांगा था तब इन्होंने अपना आश्रम ही लेने का अनुरोध किया था श्रीराम ने इनका आश्रम लेने के लिए मना कर दिया था श्रीराम द्वारा इस प्रस्ताव को नहीं मानने पर चित्रकूट में उनके लिए व्यवस्था की थी रावण का वध करने के बाद भी श्रीराम इनके पास आए थे श्रीराम ने प्रसन्न होकर इन को वरदान दिया था कि जिस मार्ग से गुजरोगे उस मार्ग से वृक्षों के फल फूल बसंत के मौसम की तरह खिल उठेंगे ऐसा कहते हैं जो द्वापरयुग में श्रीकृष्ण से भी इन की भेंट हुई थी।
ऋग्वेद के मंत्र दृष्टा:-
भरद्वाज ऋषि ऋग्वेद के छठे मंडल के दृष्टा जिन्होंने 765 मंत्र लिखे हैं। वैदिक ऋषियों में भरद्वाज ऋषि का अति उच्च स्थान है। ऋषि भरद्वाज के वंशज भारद्वाज कहलाते है। ऋषि भरद्वाज ने अनेक ग्रंथों की रचना की उनमें से यंत्र सर्वस्व और विमान शास्त्र की आज भी चर्चा होती है।
चरक ऋषि ने भरद्वाज को ‘अपरिमित’ कहा है। भरद्वाज ऋषि चंद्रवंशी काशी राज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के भी पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं ने यज्ञ संपन्न कराया था। वनवास के समय प्रभु श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का संधिकाल था।
ऋषि भरद्वाज के वंशज :-
ऋषि भरद्वाज के प्रमुख पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। उनकी 2 पुत्रियां थी रात्रि और कशिपा। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संतानें थीं। सभी के नाम से अलग-अलग वंश चले। भरद्वाज गोत्र की वंशावली में अधिकतर उत्तर भारत के ब्राह्मण पाये जाते है, किन्तु कुछ स्थानों पर क्षत्रिय भी इस गोत्र में सम्मिलित है ।विन्ध्याचल पर्वत शृंखला के उत्तरीय भूभाग में ऋषि भरद्वाज से जो वंश परंपरा प्रारंभ हुआ वे सभी वंशज भारद्वाज गोत्रीय कहलाए।