मायके के परिवार का धर्म से रहा अटूट नाता :-
रानी सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म फैजाबाद जिले के हंसवर स्टेट में हुआ था। उनके पिता ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह बड़े ही शान शौकत के व्यक्ति थे। इनकी विदुषी माता जानकी कुँअरि के जीवन का स्पष्ट प्रभाव इनके ऊपर पड़ा है। अयोध्या से 70-80 मील दूर स्थित हंसवर का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है। इस रियासत के शासक रणविजय सिंह और उनकी पत्नी जयकुमारी ने उस समय के अन्य हिंदू शासकों के साथ मिलकर राम जन्मभूमि पर मीर बाकी द्वारा बाबरी मस्जिद के निर्माण का कड़ा विरोध किया था। बाबरी मस्जिद का हिस्सा बनने के बाद भी जन्मभूमि परिसर 15 दिनों तक रणविजय सिंह के नियंत्रण में रहा, जिसके बाद मुगल सेना के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई थी।
ससुराल पक्ष रहा स्वतन्त्रता आन्दोलन का अप्रतिम बलिदानी:-
1857 की क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के कुल बधू के रूप में रानी सौभाग्य सुन्दरी देवी जानी जाती है। राजा उदय प्रताप नारायण जी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अति साहस पूर्वक युद्ध किया था। सीमित संसाधनों और स्वदेशी हथियारों के बावजूद उन्होंने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। रणनीति और युद्धकौशल से उन्होंने कई बार अंग्रेज़ों को रोकने में सफलता पाई, किंतु भारी हथियारों से लैस अंग्रेज़ी सेना के आगे अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा। अंग्रेज़ों द्वारा छलपूर्वक गिरफ़्तार किए जाने के बाद उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। परंतु उन्होंने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया और अपना आत्मबलिदान देकर अपने प्राण त्याग दिए। उनका यह बलिदान देशभक्ति, वीरता और स्वाभिमान का अनुपम उदाहरण है।
सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म : -
सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म आषाढ शुक्ल दशमी सं०1958 वि. /1901 ई. वर्तमान अंबेडकर नगर जिले के हंसवर स्टेट में हुआ था। इनका उपनाम सुन्दर अली है। इनके पिता ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह बड़े ही शान शौकत के व्यक्ति थे। इनकी विदुषी माता जानकी कुँअरि के जीवन का स्पष्ट प्रभाव इनके ऊपर पड़ा। उर्दू, फारसी, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा-दीक्षा इन्हें हंसवर स्टेट में मिली। सन 1917 ई में 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह बस्ती जनपद के पोखरनी स्टेट के प्रसिद्ध गौतम राज घराने के लाल भूपेन्द्र नारायण सिंह के साथ हुआ था। ये गौतम वंश के बड़े ही प्रशंसित राजा थे। पोखरनी स्टेट में पहुंचते ही सुन्दरी जी का मन संगीत और साहित्य में बहुत रमा। सुन्दरी जी ने श्रृंगार और भक्ति को माध्यम बना कर के वाद्ययंत्रों पर गाये जाने वाले लोकगीतों की लयात्मक छन्दों और पदों की स्वयं रचना करने लगी थीं।
अध्यात्म - भक्ति और साहित्य के प्रति लगाव :-
महाराज भूपेन्द्र बहादुर सिंह के निधन के बाद रानी साहिबा के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होनें अपने आध्यात्मिक गुरू कुदरहा बस्ती निवासी महन्थ राम सुन्दर दास की प्रेरणा से अयोध्या में कनक भवन के पास “सुन्दर भवन” का निर्माण करवाया और अपना अधिकाधिक समय कनक बिहारी भगवान श्रीराम की सेवा में लगाना शुरू किया। इन्होनें सैकड़ों पद, कवित्त, सवैया के साथ-साथ उर्दू गजल लिखा । इनके गीतों में भावुकता के साथ तत्लीनता है , आत्म सुख की भाव विभोरता है और आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की आकुलता है।
प्रकाशित साहित्य
1.प्रेम प्रकाश :-
15 अगस्त 1978 प्रेम प्रकाश के का प्रकाशन हुआ था। भाव भरे इन छन्दों में कवयित्री सुन्दरी जी का व्यक्तित्व उमड़ पड़ा है। उनका भावुक मन आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि पर आत्मसुख के पुकार के लिए आकुल हो उठा । प्रेम प्रकाश के छन्दों में पद अधिक है।
बंदउँ गुरू पद मंगलकारी।
कोमल कमल चरण रज सेवत
दूरि भक्ति भ्रमहारी।
चाहत नित दृग दोष दुसह
दुख तेज पुंज सुखकारी।
पाप प्रमाद प्रपंच मिटावत
हरत हृदय अंधियारी।
अंगारति सजिकै इस सजधज
पर बार-बार बलिहारी।।
विनती सुनिये नाथ हमारी आदि पदों के साथ-साथ होली, झूलन आदि के सुन्दर प्रयोग हुए है। इस पुस्तक के बीच-बीच में उर्दू की शायरी भी प्रस्तुत की गई है। सुन्दरी जी का यह प्रेम प्रकाश उनकी भावुकता भरी भावात्मक कृति है। सर्वत्र गेयता से भरे पदों और कविताओं में भक्ति की प्यास छिपी हुई है।
2.सुन्दरी पद-संग्रह:-
सुन्दरी पद संग्रह लगभग 60 पृष्ठ की एक पाण्डुलिपि देखने को मिली। इस पाण्डु लिपि में कुछ कवित्त कुछ घनाक्षरी और कुछ सवैया है। एक छन्द की आकुलता दर्शनीय है -
किंकिरी हूं पद रज प्रियतम के पायन की, विरह व्यथा सी तपी प्रेम की पियासी हूं। रातों दिन विकल मैं बिताती वयस, अली रम्य रूप रस बिन्दु की उपासी हूं।
नाहक लग्यो है दोष नेह में दिवानी हुई, उस दिलदार की नयन वाण गांसी हूं। सकल प्रपंच छोड़ी सिया की सहेली बनी, रूप रामचन्द्र की सनेहमयी दासी हूं।।
एक सवैया छन्द दर्शनीय है :-
पलकों में बिराजती जो छवि है,
वह मोहिनी रूप निहारा करूं।
मतवाली मराल सी चालन पै,
तन औ मन जीवन वारा करूं।
सुन्दरी एक है भूलिये ना,
मन से नित ध्यान तुम्हारा धरूं।
लगते क्यों कठोर बता दो प्रिये,
क्या कहूं किस भांति पुकारा करूं।।
पुनः एक पद और देखिए -
कभी डूबी निरासा के सागर में,
कभी आशा सरों में तिरा करते।
अरमान भरे हुए जो उर में,
बनके वह आंसू गिरा करते।
तस्वीर हृदय में सदा रहती,
अभिलाषा के मेघ गिरा करते।
मुख फेरने से अब होता है क्या,
जब वे नजरों में फिरा करते।।
सुन्दरी जी के छन्दों में भक्ति भाव की तत्लीनता है एवम् प्रियतम के मिलन की व्यापक उत्कृष्ठता है। पाण्डुलिपि के इस पुस्तक में गजलों के साथ उर्दू थे शेष दोहे, संगीत के ताल बिहाग, ताल खेमटा, ताल मलार, ताल बधाई, ताल चावरा होरी आदि के अनूठे चित्र प्रस्तुत किये गये हैं। इस पाण्डुलिपि में सवैया, बोहा और मनहरण के दर्जनों अनूठे छन्द सुन्दरी जी के संग्रहीत किये गये हैं। बयहं आदि के पद बड़े मनोहारी हैं यथा -
नृप गृह शोभा वरराणि ना जाई।
जग निवास प्रभु प्रगट भये है,
आनंद मंगल छाई।
बंदनवार पताका सोहै,
कंचन कलश धराई।
सिंह पौरि पर नौबत बाजे,
जुवतिन मंगल गाई।
विप्रन दान दियो मन भायो,
भूषन वसन लुटाई।
श्री सुन्दरी निछावरि पाई,
अपनी रूचि मनभाई।।
इसके अतिरिक्त राम और सीता के जोड़ी का चित्रण :-
लखहु सखि सिय दुलहिनि गृह आई। सुषमा शील सकल गुण आगरि
सागर रूप लुनाई।
पटतरिं योग एकनहिं आवत
उमा रमा सकुचाई।
श्री सुन्दरि ई मनोहर जोरी
राखिय नैन बसाई।।
पुनः एक पद और दर्शनीय है। -
कितै गयो श्यामल राजकुमार।
चितवत चकित चहूं दिसि सीता
पलकन है दुखभार।
तन-मन विवस कियो किन मेरो
मन्त्र मोहिनी डार।
सुन्दरी अली कुंअरि बरबांके
मुनि मख के रखवार।।
इसी ही कम में -
बांके दोऊ नैन बिहारी के।
कसकत भौंह कमान बान हिय
मानो जखम कटारी के।
सुन्दरि अली फिरत चंचल चख
छाके मद मतवारी के।।
होरी गीत का एक चित्र देखिये -
अवध किशोर रचिन होरी।
मिथिलापुर की सब गोरी
नव ससुराल नवल नव नेही।
नव नागर नवला गोरी
अवध किशोर रचे होरी।
सिद्धि कुंजरि सरहज संखियन
लै रंग गुलाल भरि ओरी।
कर छल कपट गहे रघुनंदन
गोल कपोलन मल रोरी।
सुन्दरी अली करी मन भाई
पीताम्बर लीन्हेन छोरी।।
भूलना का एक चित्र देखिये -
धीरे-धीरे से झुलाओ डरपति जियरा ।
चहुं ओर घनघोर धुके आये बदरा ।
मैं हूं आली सुकुमारी अभी वयस कीबारी।
मिथिलेश की दुलारी बाटै कोमल हियरा। सुनौ कौशल किशोर तन-मन चितचोर। बहे नैनन की कोर काले काले कजरा।।
पुनः एक विहाग का छन्द देखिए -
जुगल दोऊ झूलत रंग भरे।
वन प्रमोद विच सघन लतान में
होमो दृष्टि परे।
ओ मन हरन अनोखी झांकी
रति पति मान हरे।
जनक लड़ैती वसो दृग मेरे
टारेहु पल ना टरे।।
सुन्दरी जी के अधिकांशतः गीतों में माधुर्य के साथ-साथ आत्मा की आकुलता भरी हुई है। इन पदों और गीतों को रानी साहिबा जी स्वयं गा-गा करके कनक भवन के कनक बिहारी युगल किशोर को सुनाती रहती थीं। हर गीतों में तल्लीनता है। लयात्मक सौन्दर्य है और सरस भाषा का प्रवाह है। भावों की तल्लीनता में जीवन की गहराई और अभिव्यक्ति बड़ी सफाई के साथ प्रस्तुत की गई है। हृदय के भक्ति और भाव भरे इन गीतों में मधुरता ही नहीं अपितु हृदय का संवेदनशील स्वर मुखरित हुआ। सुन्दरी जी तृतीय चरण की एक उत्कृष्ट कवियित्री ही नहीं अपितु इस जनपद की साहित्यिक परम्परा की गौरव थीं। मीरा और महादेवी आदि के समान ही सुन्दरी जी का भी काव्य रस से अनुप्राणित देखा जाता है।
सुन्दरी जी के साहित्य के प्रकाशन से उन्हें सहृदय समाज अवश्य समाहत करेगा। सुन्दरी जी इस जनपद की अनुपम निधि है और उनकी साहित्यिक सेवायें समादर योग्य हैं। सुन्दरी जी की मृत्यु के उपरांत उनकी रियासत उनके दत्तक पुत्र लाल वीरेन्द्र प्रताप सिंह पुत्र माता प्रसाद सिंह मूल गांव पोखरा, हाल मुकाम साकिन पोखरनी को प्राप्त हुई जो उक्त गाॅव के जमीनदार एवं राजा थे।
(संदर्भ: बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान ,भाग 2, रचयिता: डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस',पृष्ठ 7-11)
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
No comments:
Post a Comment