तत्कालीन परिस्थितियां :-
तत्कालीन मुर्शिदाबाद के हाकिम नवाब क़ासिम अलीखाँ (1760- 64) ने मालगुज़ारी की वसूली के नियम अधिक कठोर बना दिए थे और राज्य की आय लगभग दूनी कर दी थी । उसने अपनी फ़ौज को का भी संगठन कियाऔर कलकत्ता के अनुचित हस्तक्षेप से अपने को दूर रखने के लिए राजधानी मुर्शिदाबाद से उठाकर मुंगेर ले गया। अंग्रेज़ी फ़ौज जब उसकी राजधानी मुंगेर के निकट पहुँची तो कासिम अली खां पटना भाग गया। वहाँ उसने समस्त अंग्रेज़ बन्दियों को मार डाला तथा जगत सेठ जैसे उसके जो भी पूर्व विरोधी हाथ पड़े, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। बाद में वह अवध भाग गया और वहाँ उसने नवाब शुजाउद्दौला तथा भगोड़े बादशाह शाहआलम द्वितीय (1760-1806 ) से कम्पनी के विरुद्ध गठबन्धन कर लिया।
कथकौली मैदान पर भयंकर युद्ध :-
बक्सर के कथकौली मैदान में 1764 में हुआ यह युद्ध बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि इस युद्ध ने भारतीय भूगोल को बदल दिया।इस हार के बाद भारतीय राजाओं को भी समझ आ गया था, कि एकता में कितनी शक्ति है। इसके बाद अवध के नवाब शुजा- उद- दौला, बंगाल के नवाब मीर कासिम तथा मुगल सम्राट शाहआलम ने अंग्रेजी हुकूमत को हराने के लिए हाथ मिला लिया था। मुगल तोपें, अवध की अश्व शक्ति और बंगाल सेना मिल गईं। तीनों राज्यों को मिलाकर 40 हजार सैनिक, 140 तोपें, 1600 हाथी और घोड़ों की शक्ति एकजुट हुई थी। दूसरी तरफ लार्ड क्लाइव का सबसे तेज तर्रार सेना नायक मेजर हेक्टर मुनरो इन भारतीय राजाओ को रोकने के लिए 7 हजार 720 सेना और 30 तोपों के साथ तेजी से बढ़ते हुए बिहार में बक्सर जिले के कथकौली मैदान पहुंच गये थे।
इधर तीनों राजाओ की सेना मुगल सेनापति मिर्जा नजीब खां बलूच के नेतृत्व में बक्सर पहुंच गईं और 22 अक्टूबर 1764 के दिन कथकौली के मैदान में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज़ों ने तीनों को हरा दिया। अंग्रेजी हुकूमत का अब कोई विरोध करने वाला नहीं रहा। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बक्सर के कथकौली में मिली हार के बाद हिंदुस्तान ने गुलामी की तरफ कदम बढ़ा दिए थे।
भारतीय नवाब शुजाउद्दौला जान बचाकर रूहेलखण्ड भाग गया। बादशाह शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में आ गया और मीर क़ासिम दर-दर की ख़ाक़ छानता हुआ कई साल तक भारी मुफ़लिसी में 8 मई, 1777 ई. को दिल्ली में मर गया था।
नवाब क़ासिम अली खाँ ने शाहाबाद (आधुनिक बक्सर) के आस पास का क्षेत्र के ज़िले को अपने शासन में कर लिया था। 1760-1764 के दौरान दिल्ली पर मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का प्रतीक रूप में शासन था। 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद मराठों और अफगानों का प्रभाव बढ़ गया था। उधर ईस्ट इंडिया कंपनी भी अपनी शक्ति बढ़ा रही थी।
मझवारी की शाकद्वीपी रियासत भी खत्म हो चुकी थी :-
क़ासिम अलीखाँ के अत्याचार से मझवारी (सिमरी बक्सर) बिहार की ज़िमीदारी नष्ट हो गई थी। मझवारी रियासत बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जमींदारी थी, जिसका इतिहास मुगल काल से शुरू होकर ब्रिटिश काल तक फैला था । यह शाकद्वीपीय भूमिहार ब्राह्मण परिवारों द्वारा शासित थी, जो क्षेत्र में सामंती प्रभुत्व रखते थे। यहां के शासक, मुख्य रूप से भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से थे। उन्होंने अपनी जागीर में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था बनाए रखी थी वे स्थानीय स्तर पर शक्ति के केंद्र बने हुए थे।
वर्तमान समय में यह गांव बक्सर जिले के सिमरी ब्लॉक में आता है। 2011ई. में यहां कुल 643 परिवार रह रहे थे और इनकी जनसंख्या 3,880 थी। यहां वर्तमान समय में विशाल पशु मेला भी लगता है। इस क्षेत्र में औरंगाबाद का देवगांव या तरारी सूर्य मंदिर सूर्य भगवान का प्रसिद्ध मंदिर है जो चौदहवी शताब्दी या उससे पूर्व का बताया जाता है। इस सूर्य मंदिर से शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण परम्परा की पुष्टि होती है।
बिनसैया /बिलासी गाँव का पण्डित दिल्ली दरबार में पहुंचा :-
बिनसैया (बिलासू गाँव) गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील के आस-पास के क्षेत्र हैं। यह गाजीपुर शहर के करीब हैं और तहसील जमनिया के अंतर्गत आता है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में मिला हुआ है । राजा धृष्टकेतु चेदि वंश के एक प्रमुख राजा थे, जो महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाक द्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला आता है। इसी कारण महाराजा साहेब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा है।
मधुसूदन /टिकमन पाठक को मझवारी गाँव के साथ 99 गाँव की भी जमींदारी वापस मिली :-
बिलासी गाँव के कोई बड़े प्रसिद्ध पण्डित दिल्ली दरबार पहुंचा था। तत्कालीन भारत के बादशाह अकबर द्वितीय ने उनको मझवारी गाँव की जिमींदारी वापस सौंप दी थी । (कोई सन्दर्भ औरंगजेब का उल्लेख करता है जो सत्य प्रतीत नहीं होता है)। बादशाह ने यह गाँव अकबर द्वितीय बादशाह के समय तक उनके पास रहा। अकबर के मरने पर मझवारी के पुराने जिमीदारों ने डाका डाल नर संहार कर मझवारी के सारे पाठकों को मार डाला था।
दूलापूर में शरण :-
मझवारी नर संहार में केवल एक ब्राह्मणी गर्भिणी स्त्री भाग कर एक चमार के घर में जा छिपी थी । एक नेक दिल चमार जाति का इंसान उसे दूलापूर के रियासत में ले गया। दोनों महिलाओं का मायका एक ही जगह होने के कारण उसने इस ब्राह्मणी की रक्षा की थी।
दूलापुर गाजीपुर जिले का एक प्रसिद्ध कस्बा और रेलवे स्टेशन है,और यह जखनियां तहसील के अंतर्गत आता है।यह अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है; यह क्षेत्र कभी गाजीपुर रियासत का हिस्सा था, जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है और गंगा नदी के किनारे बसा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जिसे अपनी 'गुलाब जल' और ऐतिहासिक स्थलों (जैसे लॉर्ड कॉर्नवालिस का मकबरा) के लिए भी पहचान मिली है।
मधुसूदन और टिकमन पाठक का ननिहाल में जन्म :-
दूलापूर के जमींदार की स्त्री का मायका उसी गाँव में था जहाँ की वह मझवारी की ब्राह्मणी का मायका था । इस कारण जमींदार की पत्नी संकट की घड़ी में अपने मायके दूलापुर के जमीदारनी के सहयोग से पहुँचा दी गई थी। मायके में ब्राह्मणी के जोड़िया लड़के पैदा हुये। एक का नाम मधुसूदन पाठक और दूसरे का टिकमन पाठक रखा गया था। जब दोनों भाई सयाने हुये तो अपनी पुरानी जमींदारी लेने की उनको चिन्ता हुई और दूलापूर आये। दूलापूर के जमींदार ने उनसे सारा ब्यौरा कहा और रात को उन्हें मझवारी ले जाकर उनका पुराना सारा गाँव दिखाया। यहाँ उनको वह चमार भी मिला जिसके घर में उनकी माता ने शरण ली थी। तब दोनों भाई दिल्ली पहुंचे और बादशाह से अपनी फरयाद की। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी दिये और उनको चौधरी की उपाधि देकर उनके देश को लौटा दिया। दिल्ली सल्तनत' के द्वारा 'चौधरी' ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी" संस्कृत के 'चतुर्धारी' (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती थी।
शाक द्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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