Monday, January 19, 2026

मगध के शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था
भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर
राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था।
      बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया। 
राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का भी इलाज :- 
उन ब्राह्मणों को द्वारका में ज्यादा समय व्यतीत करना अच्छा न लगा और गरुड़ पर सवार हो कर शाकद्वीप की ओर जा रहे थे। जब वे मगध-देश के ऊपर पहुंचे तो वहाँ रोना-पीटना सुनाई पड़ा। ब्राह्मण लोग बड़े व्यग्र थे। उनके पूछने पर गरुड़ ने कहा कि मगध-देश के राजा धृष्टकेतु को कोढ़ हो गया है इसी कारण उसने मरने की ठान ली है और चिता के लिये लकड़ियों का ढेर लगा है। राजा बड़ा धर्मात्मा है और उसके राज में सब सुखी हैं। इसी से उसकी सब प्रजा उसके लिये रो रही है। ब्राह्मणों को दया आई और उन्होंने गरुड़ से कहा कि 'क्या इस देश में ऐसा तपस्वी नहीं है जो राजा को इस रोग से मुक्त करे? गरुड़ ने उत्तर दिया यहाँ ऐसा कोई होता तो शाम्ब आप लोगों को क्यों बुलाते। ब्राह्मणों ने गरुड़ से कहा कि पृथ्वी पर उतरो। राजा उनके दर्शनों से कृतकृत्य हो गया। मिहरांशु ने उसे अपना चरणोदक पिलाया और राजा का कोढ़ अच्छा हो गया। 
राजा धृष्टकेतु ने मगध में शाक द्वीपियों को बसाया
जब ब्राह्मणों ने राजा धृतकेतु को निरोग करने के बाद गरुड़ से कहा कि हमें शाकद्वीप पहुँचा दो। तब गरुड़ ने कहा कि आप से प्रतिज्ञा करा चुका हूँ अब आप यहीं रहिये। कृतज्ञ राजा ने ब्राह्मणों को अपने देश में आदर से रक्खा और गङ्गा-तट पर कई गाँव दिये। ब्राह्मणों से चार अर्थात् श्रुतिकीर्ति, श्रुतायु, सुधर्म्मा, और सुमति ने सन्यास ले लिया और तपस्या करने को बदरिकाश्रम चले गये। शेष 14 मगध में रहे और वसु ने अपनी बेटियाँ उनको विवाह दी। उन्हीं की सन्तान आज-कल मगध देश में बसी है। मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय चिकित्सको के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया। 
त्रेता युग में राजा प्रतर्दन द्वारा शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार :- 
काशी के राजा प्रतर्दन त्रेतायुग में हुए थे। वे काशी के प्रसिद्ध राजा दिवोदास के पुत्र थे। इनके अन्य नाम 'द्युमान', 'शत्रुजित', 'वत्स', 'ऋतध्वज' और 'कुवलयाश्व' भी मिलते हैं।
उनके पिता दिवोदास ने काशी में शासन किया था और वे त्रेतायुग के अंतिम चरण या द्वापर युग के शुरुआती दौर से पूर्व का समय मानते हैं, क्योंकि वे राम के पूर्वज के समकालीन संदर्भों में एक शक्तिशाली क्षत्रिय शासक के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यंत तपस्वी और दूरदर्शी थे। उनके कठिन तप को देखकर सूर्य भगवान् स्वयं प्रसन्न हुए और उन्होंने सात ब्राह्मणों को आशीर्वाद दिया। उन ब्राह्मणों की संतानों ने पृथ्वी पर धर्म और न्याय का प्रचार किया।"
      समय के साथ शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार हुआ। मिहरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति और अन्य ब्राह्मणों की संतानों ने विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएँ बनाई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में धर्म और ज्ञान का प्रचार किया।
गोत्र और शाखाएं 
मिहरांशु, भारद्वाज, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग की सन्तान बढ़ी और प्रसिद्ध हुई। इसी कारण शाकद्वीपियों के छः घर बन गये और प्रत्येक घर के मूल-पुरुष का नाम गोत्र कहलाया। आज-कल शाकद्वीपियों के 72 घर गिने जाते हैं, अर्थात् उर के 24 आदित्य के 12, मण्डल के 12 और अर्क 7 घर या पुर अस्तित्व में आए। शेष इन्हीं की शाखायें हैं।
मिहरांशु की प्रतिष्ठित शाखा रही:- 
मिहरांशु की सन्तान ने बड़े - बड़े काम किये थे इसलिये उनकी शाखा अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। जो शाखा जिस गाँव में बसी उसी गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुई। 
मगध चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :- 
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं। शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था।
चेदि के राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का इलाज
चेदि राज्य का राजा और शिशुपाल का सबसे बड़ा पुत्र धृष्टकेतु है। धृष्ट का अर्थ है "साहसी," "प्रवंचित," या "साहसी" और केतु का अर्थ - "झंडा," "पट्टिका," या "प्रतीक" होता है । धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र हैं , जो अपनी मातृ पक्ष से यदु के वंशज दशार्ह वंश से संबंधित हैं। धृष्टकेतु यह नाम धृष्टद्युम्न के पुत्र सहित कई अन्य व्यक्तियों के साथ साझा करते हैं । वह एक महान धनुर्धर और महारथ थे । धृष्टकेतु को युधिष्ठिर की सेना के सात सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था। युद्ध के दौरान, धृष्टकेतु ने कई दुर्जेय योद्धाओं से युद्ध किया था। वह पांडवों का वफादारसहयोगी है और कुरुक्षेत्र युद्ध में एक प्रमुख भूमिका निभाता है , जहाँ उसने उनकी सेना के सात सेनापतियों में से एक के रूप में कार्य किया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किया और वृहदवाहन का वध किया। उस सहित उसके तीनों भाइयों - पुरूजीत, धृष्टकेतु और वृहद्क्षत्र का वध चौदहवें दिन के युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथों हुआ था। धृष्टकेतु ने अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग में 'विश्वदेव' का दर्जा प्राप्त किया था। 
     मगध चेदि नरेश जरासंघ के इस पूर्वज धृष्टकेतु को कुष्ठ हो गया था। जिनके उपचार के लिए शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में लाया तथा कुष्ठ से त्राण पाकर उपहार स्वरूप उन्हें अठारह पुर (ग्राम) दिये तथा प्रत्येक के चार चार पुत्र उत्पन्न हुआ और वे सब पृथक पृथक 72 पुरों (ग्रामों) में निवास करने लगे । 
मगध- चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया गया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उपशाखाएँ हैं- भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक= सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है। 
      पुराणों में उल्लेखित विवरण के पहले छठी पांचवी शताब्दी ई. पू. में शाकद्वीप से भारत आये उपयुक्त सभी साक्ष्यों से सवर्धा समर्थित हैं सूर्योपासक पुरोहितों को मग एवं भोजक इन दोनों श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पुराणों के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मग और भोजक एक थे अन्तर मात्र इतना था कि -
(1) सूर्य का जो ध्यान करे उसे मग कहा जाता है । मग म अक्षर की पूजा करते थे म= मंत्र ग = गुरू मंत्रों के गुरू मग मे सूर्य गायन्तीति मगा:
(2) भोजक- धूप, दीप, माला से पूजन एवं विभिन्न उपहारों से सूर्य को भोग लगाते हैं उन्हे भोजक कहा जाता है ।
धूपमाल्यैर्मतश्चापि उपहारैस्तथैव च ।
भोजयन्ति सहस्रांशुं तेन ते भोजका: स्मृता: 
      यह भी सम्भव है कि भोजक भारतीय परम्परा के पुरोहित रहे हों। दोनों ही सूर्य के सकल एवं निष्कल रूप से उपासक थे । 
शाकद्वीपीय पुर और गोत्र सारिणी 
कालान्तर में भारत के कई प्रान्तों के रजवाड़ों द्वारा पूजा पाठ , रोग निवारण के लिए अपने अपने राज्यों में ले गये, जिनमें 72 पुरों में से 16 पुर के लोग पश्चिम में गये जो वहां गोत्र (खाप) से जाने गये।जिसका विवरण निम् प्रकार से है।
पुर/ उपाधि/ गोत्र/ मूलस्थान- मण्डल
वेद/ उपवेद/ देवता
इस सूची में राजस्थान के अतिरिक्त भारत के शेष राज्यों में शाक द्वीपीय ब्राह्मण को उपरोक्त शीर्षक क्रम से प्रस्तुत किया गया है - 
1. उरवार मिश्र/पाठक भारद्वाज टेकारी/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
2 .मखापवार मिश्र/पाठक भारद्वाज मखपा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
3 .देवकुलियार मिश्र/पाठक भारद्वाज देवकुली/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
4 .पडरीयार मिश्र/पाठक भारद्वाज पड़री/विक्रम(पटना) यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
5 .अदइयार मिश्र/पाठक भारद्वाज कोंच/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
6 .पवइयार मिश्र/पाठक भारद्वाज पवई/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
7 .क्षत्रवार मिश्र/पाठक भारद्वाज बेलागंज/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
8. जम्मुवार मिश्र/पाठक भारद्वाज जमुआर/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
9 .भड़रियार मिश्र /भरद्वाज भड़रिया/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
10. खंटवार मिश्र/पाठक कौन्डिल्य बेलागंज/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
11 .केरियार मिश्र/पाठक कौन्डिल्य कुतेया/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
12. छेरियार मिश्र/पाठक कश्यप मखदुमपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
13 .कुरईचियार मिश्र /कश्यप कुराईच/रोहतास सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
14 .भलुनियार पण्डित/पाण्डेय कश्यप भलुनी/रोहतास सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
15. डुमरियार मिश्र/पाठक भृगु दुर्गावती/रोहतास ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
16. बाड़वार मिश्र/पाठक भृगु परैया/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
17. सरइयार मिश्र/पाठक पाराशर आमस/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
18 .योतियार मिश्र/पाठक पाराशर पवई/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
19. शिकरौरियार मिश्र/पाठक कौशिक सिकरौर/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
20 .मोलियार मिश्र कौशिक मलमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
21. ऐआर मिश्र/पाठक रहदोरी रखार/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
22. रहदौलीयार मिश्र/पाठक रहदोरी रहवार/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
23 .अवधियार पाठक/पाण्डेय कौशल्य अयोध्या/ जगुआर /गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
24. पुतियार मिश्र/पाठक वत्स ओडो/नवादा सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
25. उल्लार्क मिश्र/ भृगु उल्ला/परैया/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
26. लोलार्क मिश्र/पाठक भृगु देवकुली/ काशी ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
27 .बालार्क मिश्र/पाठक शाण्डिल्य देवकुली/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
28 .कोणार्क मिश्र/पाठक शांडिल्य मदनपुर/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
29 .पुण्डार्क उपाध्याय पुण्डार्क पुण्डारक/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
30 .चारणार्क मिश्र/पाठक पुण्डार्क पुण्डारक/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
31 .मार्कंडेय मिश्र/पाठक गर्ग देवकुली/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
32. देवडीहा मिश्र /भारद्वाज डीहा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
33. गुन्सइयाँ मिश्र /भरद्वाज गगाही/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
34. महुरसिया मिश्र ,/कश्यप मोहारसदेव/आजमगढ़ सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
35. डूमरौरी मिश्र /कश्यप हसनपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
36. सपहा पाठक /कश्यप सपहा/आजमगढ़ सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
37. गुलसैया मिश्र /कौशिक छपरा/सिवान सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
38 .मल्लौर्क मिश्र /कौशिक मलमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
39. हरहसिया मिश्र /कौशिक हरिहौस/सारण सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
40. देवलसिया पाण्डेय /कौशिक देव/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
41. वरुणार्क मिश्र/पाठक कौन्डिल्य पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
42 .कुण्डार्क मिश्र /कौंडिल्य गोह/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
43 .विलसैया मिश्र/पाठक गर्ग वाजपेई/बिलासू गाजीपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
44 .श्वेतभद्र मिश्र /भारद्वाज श्वेतरामपुर/गाजीपुर यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
45 .पंचकंठी मिश्र /भरद्वाज इमामगंज/पंचमा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
46 .डूडरियार मिश्र /भरद्वाज खुडराही/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
47 .पठकौलियार पाठक /कश्यप पठखौली/गाजीपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
48 .पंचहाय मिश्र /कश्यप पंचाननपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
49 .सियरी मिश्र/ कश्यप सियारी/गोरखपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
50 .कुकरौंधा मिश्र/ कश्यप कुकरौंधा/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
51 .मोरियार मिश्र /कश्यप गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
52. मिहिर/मिहीमगौरियार पाठक /मिहिर फुलवरिया/सारण सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
53 .वेरियार मिश्र /कौन्डिल्य बारा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
54 .मेहोशवार उपाध्याय /कौशिक मेहोंश/मुंगेर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
55 .सौरियार मिश्र /कौशिक सोरंगपुर/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
56 .पुनरखिया मिश्र /सार्ववल्य पुनरख/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
57. देवहाय मिश्र/ अत्रि देव/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
58 .शुंडार्क मिश्र/ भृगु ककरही/औरंगाबाद ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
59 .यत्थय मिश्र/ जमदग्नि कोच/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
60. ठकुर मेराँव मिश्र /अंगिरा पचना ठकुरी/भोजपुर ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
61 .डिहिक भट्ट /भारद्वाज डीहा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
62 .भड़रियार मिश्र /भरद्वाज भड़रिया/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
63 .चंडरोह मिश्र /कश्यप चंदनपुर/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
64 .खजुरहा मिश्र /कश्यप खजुरी/गोह/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
65 .पट्टिश मिश्र /शाण्डिल्य पिसनरी/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
66 .काझ मिश्र /वैतायन खजनिकाम/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
67 .कपिश्य मिश्र /गर्ग कधुमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
68 .परसन मिश्र /पराशर परसन/भोजपुर यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
69 .खंडसूपक मिश्र /कौन्डिल्य खनेता/टेकारी/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
70 .बालिबाघ मिश्र /भृगु बधवा/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
71 .पिपरोहा मिश्र /जमदग्नि पिपराहा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
72 .बड़सापी मिश्र /वशिष्ठ बरसा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
     उक्त पुर सारिणी राजस्थान के इतर बिहार और अन्य राज्यों में प्रचलित हैl


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


No comments:

Post a Comment