Friday, July 26, 2024

डॉ.सौरभ द्विवेदी , आर्थोपेडिक सर्जन की बस्ती मंडल में चिकित्सा सेवा


महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय कैली अस्पताल में कोरोना मरीज का संक्रमित पैर काटकर किया था बस्ती में सेवा की शुरुवात 

बस्ती। डा. सौरभ द्विवेदी के महर्षि वशिष्ठ स्वशाषी चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती में ज्वाइनिंग के समय कोविड 19 अपने चरम उत्कर्ष पर था। इस समय कोविड 19 अपने द्वितीय फेज में बहुत जोरों से लोगों को अपने आगोश में सुला रहा था। आक्सीजन की आपूर्ति बाधित हुई थी। चिकित्सा स्टाफ और डाक्टर भी कोरोना मरीज को छूने से डरते थे। बस्ती मंडल जिला और महर्षि वशिष्ठ स्वशाषी चिकित्सा महाविद्यालय केली चिकित्सालय में चिकित्सा की बड़ी दयनीय स्थिति थी। जिन्हें साधन सुलभ हो जाता था,वह अपनी जान बचाने में कामयाब हो जाते रहे हैं। अनेक बदनसीब ईश्वर को प्यार हो जाते रहे हैं। डॉ.सौरभ द्विवेदी ने कोरोना काल में आगरा स्थित एस एन कालेज से एमएस की डिग्री हड्डी रोग से पूरी की थी। कोरॉना के समय चिकित्सकों की आवश्यकता बढ़ गई थी।किसी को कार्य मुक्त नही किया जा रहा था। इसलिए उन्हें समय पूरा होने के बावजूद सीनियर रेजिडेंट पद पर रोक रखा गया था। 
      इसी बीच कोरोना के एक मरीज को गोरखपुर और केजीएमसी लखनऊ रेफर होने के बावजूद मरीज विना उपचार के अपने आधार जिले बस्ती में वापस कर दिया गया था। तत्कालीन जिला अधिकारी महोदया श्रीमती सौम्या अग्रवाल निरंतर निगरानी करती रहती थी और महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महा विद्यालय को निर्देश देती रहती थीं। बस्ती जिले में दर्जनों अस्थि रोग के सर्जन होने के बावजूद एक कोरोना संक्रमित मरीज जिसका एक पैर निरंतर सड़ने की स्थिति में आगे खराब होता जा रहा था। उसका पैर काटने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। 
       महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती के तत्कालीन चिकित्सा अधीक्षक डा. जी एम शुक्ला, तत्कालीन प्राचार्य डा. नवनीत कुमार, अस्थि रोग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डा .रहमत अली कोरोना संक्रमित मरीज का सड़ रहे पैर ना कटवा पाने के निरंतर दबाव में थे कि मरीज को कैसे बचाया जाए? बस्ती जिले में दर्जनों अस्थि रोग के सर्जन मरीज को हाथ लगाने से डरते थे। सभी आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से रिलीव होकर आने वाले युवा सर्जन डॉ सौरभ द्विवेदी का इंतजार कर रहे थे। अपनी नई पोस्टिंग वाले वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दिए गए टारगेट को पूरा करने सीधे महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती के कैली चिकित्सालय कैम्पस पहुंच गए। वहां जाकर संक्रमित मरीज का संक्रमित पैर को काट अलग कर अधिकारियों और मरीज को राहत की सांस दिया। 

पैर को काटने के बाद ही किया था चिकित्सा महाविद्यालय में ज्वाइनिंग:-

        संक्रमित मरीज का संक्रमित पैर को काटने के बाद ही डा. सौरभ द्विवेदी ने 10 अप्रैल 2021 को बस्ती के महर्षि वशिष्ठ स्वशाषी चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती रामपुर स्थित एकेडमिक कैंपस में सीनियर रेजिडेंट के पद अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट देकर वशिष्ठ नगरी बस्ती की पावन भूमि पर अपनी सेवाएं शुरू किया था ।
     डॉ.सौरभ द्विवेदी आर्थोपेडिक सर्जन ने तब से अब तक लगभग पौने तीन साल में बस्ती मंडल की हजारों अस्थि रोगियों को ओपीडी चिकित्सा और आपरेशन द्वारा सेवा की थी। महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती का कालेज प्रशासन ना जाने किस अज्ञात कारण से डॉ.सौरभ द्विवेदी आर्थोपेडिक सर्जन की सेवा दिसम्बर 2023 में द्वारा बन्द कर दिया । बस्ती मण्डल की जनता एक सर्व सुलभ संस्थान के सार्वजनिक पटल से अपने एक कुशल चिकित्सक की सेवा से वंचित हो गई थी । यद्यपि एक बार परख चुके लोग उक्त डाक्टर के निजी हॉस्पिटल से सेवा लेने में हिचक नहीं रहे हैं। ईश्वर ने अनुकंपा मिली और मंडल और जनपद बस्ती के सम्मानित जनता जनार्दन की दुवा यदि लगी तो आने वाले दिनों में डा सौरभ द्विवेदी को पुनः महर्षि वशिष्ठ स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय कैली अस्पताल बस्ती में आम जनता की सेवा का अवसर मिल सकता है।


Saturday, July 20, 2024

पतित पावनी सरयू की महिमा आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी


भारतीय सनातन परम्परा में सप्त नगरियों का यह श्लोक विश्व विश्रुत है। इस श्लोक से इन नगरों का महत्व और स्पष्ट हो जाता है।

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिकाः॥

ये सात शहर अलग-अलग देवी-देवताओं से संबंधित हैं। अयोध्या श्रीराम से संबंधित है। मथुरा और द्वारिका का संबंध श्रीकृष्ण से है। वाराणसी और उज्जैन शिवजी के तीर्थ हैं। हरिद्वार विष्णुजी और कांचीपुरम माता पार्वती से संबंधित है। रामायण में बताया गया है कि अयोध्या राजा मनु द्वारा बसाई गई थी। यह नगर सरयू नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम, जैन धर्म से जुड़ी निशानियां दिखाई देती हैं। अयोध्या की महत्ता के बारे में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जन साधारण में निम्न कहावतें प्रचलित हैं-

गंगा बड़ी गोदावरी तीरथ बड़ो प्रयाग,

सबसे बड़ी अयोध्या नगरी 

जहँ राम लियो अवतार।

   अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा के 84 कोस की परिधि को सरयू मुख्य नदी रूप में अभिसिंचित करती ही है। साथ ही सरयू की अनेक सहायक नदियां जैसे वाशिष्ठी(,गोमती), घर्घर घाघरा महानद , सरयू, कुटिला मनोरमा,तमसा छोटी सरजू,वेदश्रुति बिसुही नदी,तिलोदकी गंगा’ तिलैया, कल्याणी, राम रेखा शारदा, सेती, बबई, अचिरावती /राप्ती,इरावती,छोटी गंडक और झरही आदि डेढ़ दर्जन अस्तित्व वाली और कुछ लुप्तप्राय नदियां भी इस भूभाग में अपनी खुशबू और शीतलता से आह्लादित और पाप शमन का काम करती रहती है।


पतित पावनी सरयू नदी :-

सरयू नदी का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है और रामायण के अनुसार सरयू नदी अयोध्या शहर के पास बहती है । भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। यह माना जाता है कि यह पवित्र नदी शहर की अशुद्धियों और पापों को धोती है। पुराणों में वर्णित है कि सरयू नदी से भगवान विष्णु के उत्सव प्रकट होते हैं। आनंद रामायण में उल्लेख है कि प्राचीन काल में शंखासुर दैत्य / मधु कैटभ ने वेद को चुराकर समुद्र में डाल दिया था । तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में धारण कर दैत्य का वध किया था और ब्रह्मा को वेदों में अपना वास्तविक स्वरूप धारण कराया था। उस समय हर्ष के कारण भगवान विष्णु की आंखों से प्रेमाश्रु टपक पड़े थे। ब्रह्मा ने उस प्रेमाश्रु को मानसरोवर में डाल कर उसे सुरक्षित कर लिया। इस जल को महापराक्रमी वैवस्वत महाराज ने मानसरोवर से बाहर तक बाण के प्रभाव से प्रकट किया। यह भी उल्लेख मिलता है कि ऋषि वशिष्ठ की तपस्या से सरयू का प्रादुर्भाव हुआ है। जिस प्रकार गंगा नदी को भगीरथ धरती पर लाए थे। उसी प्रकार सरयू नदी को भी धरती पर लाया गया था।राजा मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए जिन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ से अयोध्या में सरोवर निर्माण की बात कही। जिसके बाद वशिष्ठ ऋषि ने अपने पिता ब्रम्हा से सरयू के अवतरण की प्रार्थना किया था ।ब्रम्हा जी ने अपने कमंडल से ही सरयू का अवतरण कराया। इस प्रकार भगवान विष्णु की मानस पुत्री सरयू नदी को धरती पर लाने का श्रेय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को ही जाता है । सरयू नदी का नाम सुनते ही मन राम की नगरी में अनायास ही पहुंच जाता है।

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि,

उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।

नेपाल से डोरीगंज (बलिया) तक कुल सरयू की लंबाई- 1080 किमी है। इनमे यह नेपाल में 507 किमी व भारत में 573 किमी तक विस्तारित है। इसकी लंबाई बस्ती में 80 किमी, गोरखपुर में 77 किमी है।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो सरयू नदी वास्तव में शारदा नदी की ही एक सहायक नदी है। यह नदी उत्तराखंड में शारदा नदी से अलग होकर उत्तर प्रदेश की भूमि के माध्यम से अपना प्रवाह जारी रखती है। यह गंगा नदी की सात सहायक नदियों में से एक है और इतनी पवित्र मानी जाती है कि यह मानव जाति की पापों को धो देती है। कवि राम धारी सिंह दिनकर ने कहा है –

वह मृतकों को मात्र पार उतारती,

यह जीवितों को यहीं से तारती।


शिव और पार्वती मां भी इसे लाने का प्रयास किए :-

स्कंद पुराण में वर्णित कथा अनुसार एक समय मार्कंडेय नाम के ऋषि नील पर्वत पर तपस्या कर रहे थे और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ देवलोक से विष्णु की मानस पुत्री सरयू को लेकर आ रहे थे। लेकिन तपस्या में लीन मार्कंडेय ऋषि के कारण सरयू नदी को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल रहा था। इस पर ब्रह्माजी और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने शिवजी को अपनी व्यथा सुनाई और संकट को दूर करने का निवेदन किया। इस पर आदिदेव महादेव ने तब बाघ का रूप धारण किया और माता पार्वती ने गाय का रूप धारण किया। मां पार्वती गाय के रूप में पास ही घास चरने लगीं। तभी वहां बाघ के रूप में पहुंचे महादेव ने गर्जना की, भयंकर दहाड़ सुनकर गाय डर के कारण जोर-जोर से रंभाने लगी। इससे मार्कंडेय ऋषि की समाधि भंग हो गई। जैसे ही मार्कंडेय ऋषि गाय को बचाने को दौड़े तो सरयू नदी आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया। भगवान शिव ने जिस स्थान पर शेर का रूप धारण किया था। बाद में उस स्थान का नाम व्याघ्रेश्वर तथा बागेश्वर पड़ा और यहां भगवान शिव के बागनाथ मंदिर की स्थापना की गई।

        अयोध्या में स्थित सरयू जी में स्नान करने से कलिकाल के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अब क्यूं अयोध्या में ही सरयू स्नान से पाप नष्ट हो जाते हैं इसका उत्तर है । अयोध्या अपने आप में पूर्ण ब्रम्ह है और सगुण रूप श्री सरयू जी हैं । यह मृत्यु लोक में नही है अयोध्या भगवान् विष्णु के चक्र पे बसी है ।

अयोध्या च पूर्ण ब्रम्ह सरयू सगुणन पुमान तन्नि बासी जगन्नाथम सत्यं सत्यं बदम्यहम।

        अयोध्या में रहने वाले भगवान् विष्णु के तुल्य हैं । चुकी अयोध्या ब्रम्ह स्वरुप होने के कारण इनको ब्रम्ह स्वरूपिणी कहा गया । सरयू का तात्पर्य स से सीता रा से राम जू इसलिए सीता राम जू द्रव रूप में होके भक्त के भावों से इस जल को सीता राम जू का सगुण रूप माना गया है । जैसा की कहा गया है – 

सरयू सगुणन पुमान

इसलिए धर्मावलम्बी सरयू जल से कुल्ला नही करते. सरयू जल से कुल्ला करने वालों की गति नही होती । भगवान् श्री राम जी का श्री मुख बचन है ।

जन्मभूमि मम पूरी सुहावनि, 

उत्तर दिशि सरयू बह पावनि।

यह शब्द भी स्पस्ट करता है की सरयू माता का महात्म्य अयोध्या में सही स्थित सरयू से सम्बन्ध रखता है । आगे भगवान् राम फिर कहते हैं कि यहाँ स्नान करने वाले मेरा सायुज्य पाते हैं।

जा मज्जन ते विनाहि प्रयाशा 

मम समीप नर पावहि वासा।

श्री अयोध्या में स्थित सरयू मैया में स्नान करने से भगवान् श्री राम के समीप रहने का अधिकारी हो जाता है । इसीलिए श्री गोस्वामी तुलसी दास जी श्री अयोध्या और सरयू मैया का अलग अलग बर्णन नही किये । एक ही चौपाई में अयोध्या और सरयू के महात्म्य का वर्णन किया जैसा की मानस में मिलता है ।

बंदउ अवध पूरी अति पावनि, 

सरयू सरिकलि कलुष नसावहि।

तात्पर्य कि अयोध्या में ही स्थित सरयू कलिकाल के पाप को नष्ट करने वाली हैं । इनके महात्म्य के विषय में अन्यान्य ग्रंथों में जो मिलता है उस महात्म्य को बताने की प्रयास कर रहा हूँ ।

मन्वन्तर सहस्त्रेस्तु काशी वासेशु जद फलं 

तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते।

चारो युग जब 71 बार बीत जाता है तब एक मन्वंतर होता है इस प्रकार एक हजार मन्वंतर काशी में वास कीजिये गंगा में स्नान करके विश्वनाथ में जल चढाते हुए 1000 मन्वंतर में जो फल आपको प्राप्त होगा वह अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है ।

मथुरायाम कल्प मेकं बसते मानवो यदि 

तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते।

मथुरा में 1 कल्प यानी 4 अरब बत्तीस करोड़ मनुष्य के दिन से जब बीत जाता है तब एक कल्प होता है । 1 कल्प मथुरा में वास करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है । भगवान राम ने लक्ष्मण को सरयू नदी के महत्व से अवगत कराया था।सरयू नदी में स्नान के महत्व का वर्णन तुलसीदास कृत रामचरित मानस में है। भगवान राम ने लक्ष्मण को सरयू नदी की पावनता के बारे में बताते हुए कहा था कि सरयू नदी इतनी पावन है कि सभी तीर्थ दर्शन और स्नान के लिए आते है। सरयू नदी में स्नान करने मात्र से सभी तीर्थों में दर्शन करने का पुण्य मिल जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सरयू नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करता है उसे सभी तीर्थों के दर्शन करने का फल मिल जाता है। यह है अयोध्या में सरयू मैया का महात्म्य तुलसी दास जी ने भी लिखा है- 

कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार। 

एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास।।

तुलसीदास जी को उपरोक्त प्रमाण कम लगा इसलिए इन्होने अपने ग्रन्थ में सरयू महात्म्य को और भी विस्तृत रूप से बर्णन किया है ।कालिदास के काव्य रघुवंश में राम सरयू नदी को जननी के समान ही मानते थे।


          आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )





Saturday, July 13, 2024

कपिल भगवान और गंगा सागर आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

ब्रह्मा पुत्र कर्दम से उत्तपत्ति:- 

कर्दम ऋषि ब्रह्मा जी के पुत्र थे, ब्रह्मा जी ने इनको आदेश दिया सृष्टि का कार्य आगे बढाओ। कर्दम ऋषि जन्मजात विरक्त थे । वे 
भगवान के प्रेमी और पिता के आज्ञाकारी थे। उनका गृहस्थाश्रम में जाने का मन नहीं था पर पिता की आज्ञा को मानना भी आवश्यक था अत: उन्होंने बीच का रास्ता निकाला।

घोर तपस्या से पुत्र की प्राप्ति:- 

कर्दम ऋषि ने विवाह पूर्व सतयुग में सरस्वती नदी के किनारे भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप भगवान विष्णु कपिल मुनि के रूप में कर्दम ऋषि के यहां जन्में। इनकी माता स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहूति थी। कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती तथा शान्ति आदि कपिल मुनि की बहनें थीं।

कपिलवस्तु रहा जन्म स्थान :- 

कपिलवस्तु, जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था और सगर के पुत्र ने सागर के किनारे कपिल को देखा और उनका शाप पाया तथा बाद में वहीं गंगा का सागर के साथ संगम हुआ। इससे मालूम होता है कि कपिल का जन्मस्थान कपिलवस्तु और तपस्या क्षेत्र गंगासागर था। इससे कम-से- कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था। यदि हम कपिल के शिष्य आसुरि का शतपथ ब्राह्मण के आसुरि से अभिन्न मानें तो कह सकते हैं कि कम-से-कम ब्राह्मणकाल में कपिल की स्थिति रही होगी। इस प्रकार 700 वर्ष ई.पू. कपिल का काल माना जा सकता है।

         गंगासागर रहा तपस्या क्षेत्र :- 

1.एक अंतहीन सागर की कालातीत कहानी :2024 के मेले का नजारा

विश्व प्रसिद्ध और पवित्र गंगासागर मेला का आगाज विगत 8 जनवरी,2024 से हुआ है और यह 16 जनवरी, 2024 तक चला। इस बीच, देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन डुबकी की लगाने के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के सागर द्वीप स्थित गंगा सागर पहुंचे। बंगाल सरकार ने इसके लिए सभी तरह की तैयारी की । गंगा सागर पहुंचने से पहले कोलकाता में श्रद्धालु विश्राम करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता गंगा भगवान शिव की जटा से निकलकर पृथ्वी पर पहुंची थीं तब वह भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गई थीं। मां गंगा के पावन जल से राजा सागर के साठ हजार शाप ग्रस्त पुत्रों का उद्धार हुआ था। इस घटना की याद में तीर्थ गंगा सागर का नाम प्रसिद्ध हुआ।

"सब तीर्थ बार बार, गंगासागर एक बार"

ये वह भजन हैं जो हर साल देश भर से गंगासागर के पवित्र तट पर पहुँचने के लिए यात्रा करने वाले हर तीर्थयात्री के दिल में अमर हो गए हैं। गंगासागर मेले की गंभीरता भक्तों की भावना से खूबसूरती से भरी हुई है, जो मानते हैं कि गंगासागर के पवित्र जल में डुबकी लगाने से उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिलेगी। दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन, तीर्थ यात्रियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा के लिए असाधारण प्रयास करता है, ताकि भक्त रहस्यवाद के तट पर अपनी अटूट आस्था का जश्न मना सकें।

 2. आस्था और विश्वास का मिलन:- 

गंगासागर, वह भूमि जहाँ आस्था और विश्वास का मिलन होता है, कोलकाता से लगभग 100 किलोमीटर दूर गंगा डेल्टा के दक्षिणी सिरे पर, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के क्षेत्र में स्थित है। गंगासागर या सागर द्वीप, मुख्य भूमि से कटा हुआ एक भूभाग है, जो चांदी की रेत, साफ आसमान, गहरे नीले समुद्र और प्रतिष्ठित कपिल भगवान के आश्रम के साथ एक अद्वितीय धार्मिक माहौल बनाता है। ये वह तट हैं जहाँ पवित्र गंगा हज़ारों किलोमीटर की यात्रा के बाद समुद्र से मिलती है।

3.एक गतिशील कविता :- 

गंगासागर गतिशील कविता है। गंगासागर की तीर्थयात्रा संसार (जीवन, मृत्यु और अस्तित्व की चक्रीयता) से निर्वाण (मोक्ष/मुक्ति) तक की आकर्षक यात्रा का प्रतिबिंब है। यह एक ऐसी यात्रा जिसने विद्वानों, लेखकों, तर्क वादियों और अध्यात्म वादियों को सदियों से आकर्षित किया है। गंगासागर मेले की भीड़ सांसारिक से आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से मनुष्य की अथक खोज की एक दृश्य अंतर्दृष्टि है।

4. पौराणिक महत्व :- 

गंगासागर की पौराणिक कथा जीवन और मृत्यु के चक्र और मोक्ष के आकर्षण के बीच के मिलन के बारे में है। और इस भक्तिमय नियति का केंद्र प्रतिष्ठित कपिल भगवान का मंदिर है। भागवत पुराण के अनुसार, महर्षि कपिल मुनि (या ऋषि कपिल) का जन्म ऋषि कर्दम और पृथ्वी के शासक स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहुति के घर हुआ था। कर्दम मुनि ने अपने पिता भगवान ब्रह्मा के वचनों का पालन करते हुए समर्पित रूप से कठोर तपस्या की। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर, सर्वोच्च आत्मा भगवान विष्णु अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए। परमानंद में, कर्दम मुनि ने भगवान की महिमा की प्रशंसा की। प्रसन्न होकर, भगवान ने उन्हें देवहुति से विवाह करने के लिए कहा और भविष्यवाणी की कि उनकी नौ बेटियाँ होंगी और समय के साथ, पूरी सृष्टि जीवों से भर जाएगी। और वह एक अवतार के रूप में जन्म लेंगे और दुनिया को सांख्य दर्शन सिखाएँगे। कपिल मुनि ने अपने प्रारंभिक वर्षों में ही वेदों का अथाह ज्ञान प्राप्त कर लिया और सांख्य दर्शन को अमर कर दिया।

5. गंगासागर की कथा:- 

भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के शासक "राजा सगर" या "सगर राजा" ने ऋषि और्व के निर्देशानुसार अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया था। ऐसा माना जाता है कि 100 अश्वमेध यज्ञ करने से पूरी पृथ्वी पर आधिपत्य प्राप्त करने में मदद मिलती है। देवताओं के राजा भगवान इंद्र 100 अश्वमेध यज्ञ को पूरा करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। उन्हें डर था कि वे किसी नश्वर के हाथों अपना प्रभुत्व खो देंगे, और उन्होंने राजा सगर के घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम के पास छिपा दिया था।

6. 60,000 सगर पुत्रों का वीभत्स अन्त:- 

क्रोध से भरकर, सगर राजा ने अपने 60,000 पुत्रों (सगर पुत्रों) को खोए हुए घोड़े का पता लगाने के लिए भेजा। सगर पुत्रों ने अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को नष्ट कर दिया और ऋषि के आश्रम पहुँच गए। घोड़े को खोजने पर, सगर पुत्रों ने ऋषि को चोर समझ लिया और ध्यान कर रहे ऋषि को गालियाँ देनी शुरू कर दीं। इसके बाद होने वाले हंगामे ने ऋषि की तपस्या में बाधा डाली। क्रोधित होकर, कपि मुनि ने अपनी आँखें खोलीं और 60,000 सगर पुत्रों को जलाकर राख कर दिया, जिससे उनकी आत्माएँ नरक में चली गईं।

7. अंशुमान ने खोज निकाला :- 

कई वर्षों बाद, सगर राजा के वंशज अंशुमान ने कपिल मुनि के आश्रम में घोड़े को अभी भी खड़ा पाया। उन्होंने ऋषि को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। अंशुमान के प्रयास से संतुष्ट होकर ऋषि ने घोड़े को वापस लाने की अनुमति दी और उन्हें पता चला कि उनके पूर्वजों की आत्माएँ केवल गंगा के पवित्र जल से श्राद्ध करने के बाद ही मुक्त हो सकती हैं। हालाँकि राजा अंगशुमान और उनके बेटे दिलीप श्राद्ध पूरा नहीं कर पाए क्योंकि भयंकर सूखे के कारण अगस्त्य मुनि ने समुद्र का सारा पानी पी लिया था।

8. भागीरथ की घोर तपस्या:- 

एक पीढ़ी बाद, राजा भगीरथ ने निंदित आत्माओं को मुक्त करने का कार्य अपने हाथ में लिया और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुक्त करने के लिए प्रार्थना की। उन्होंने उनसे भगवान विष्णु से प्रार्थना करने के लिए कहा कि वे पवित्र गंगा को धरती पर आने दें। सहमत होने पर, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर गंगा को अनियंत्रित किया गया तो इसका विशाल बल पूरी सृष्टि को मिटा देगा और उन्हें भगवान शिव से प्रार्थना करने के लिए कहा। शिव अपनी जटाओं पर गंगा का पूरा बल धारण करने के लिए सहमत हो गए। शिव की जटाओं की घुमावदार भूलभुलैया में, गंगा ने अपना क्रूर बल खो दिया और धीरे-धीरे पूरे अस्तित्व को सहलाते हुए धरती पर उतरीं। भगीरथ अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने में सक्षम हुए, जिससे आत्माओं को पाताल लोक की आग से मुक्ति मिली।

9.समुद्र से सागर द्वीप तक की दास्तान:- 

समय बीतने के साथ मिथक किंवदंतियों में बदल गए, किंवदंतियों कहानियों में और कहानियाँ विश्वासों में बदल गईं। राजा भगीरथ के नाम पर गंगा को भी भागीरथी नाम दिया गया और सगर राजा के नाम पर समुद्र का नाम "सागर" रखा गया और द्वीप का नाम सागरद्वीप रखा गया।

10. मोक्ष का सोपान :- 

इस पौराणिक कथा में आस्था रखते हुए, दुनिया भर से लाखों तीर्थयात्री मोक्ष की तलाश में मकर संक्रांति के ठंडे घंटों के दौरान गंगासागर मेले में आते हैं। माना जाता है कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से सभी दुख और पाप धुल जाते हैं। इस विश्वास के साथ, लाखों लोग कपिल मुनि आश्रम में "सब तीर्थ बार बार गंगा सागर एकबार" भजन गाते हुए आते हैं।

11.ज्योतिषीय महत्व :- 

गंगासागर मेला मकर संक्रांति के शुभ समय में मनाया जाता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार, संक्रांति सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, मकर संक्रांति तब शुरू होती है जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और एक महीने तक वहां रहते हैं। सूर्य के इस संक्रमण का ज्योतिषीय महत्व बहुत अधिक है क्योंकि मकर शनि का घर है और शनि (सूर्य देव के पुत्र) और सूर्य दोनों एक दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण संबंध रखते हैं। लेकिन मकर संक्रांति के दौरान, सूर्य अपने पुत्र के प्रति अपना गुस्सा भूल जाते हैं और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाते हैं। इसलिए, यह एक शुभ अवधि को चिह्नित करता है और रिश्तों के महत्व को रेखांकित करता है।
         मकर संक्रांति लंबी सर्दी के अंत का प्रतीक है और फसल कटाई के मौसम की शुरुआत करती है। उम्मीद का मौसम, नई शुरुआत का मौसम हिंदू संस्कृति के अनुसार, इसे संक्रमण का पवित्र चरण माना जाता है। अशुभ अवधि ठंडी सर्दी और लंबी रात का अंत होता है और अधिक अनुकूल अवधि की शुरुआत होती है ।
       इस अवधि के दौरान मौसम बेहतर होता है। शीतकालीन संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाला यह त्योहार तब होता है जब दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। यह ज्योतिष प्रथाओं और खगोलीय गतिविधियों के बीच एक अंतर्निहित संबंध को दर्शाता है। वैदिक काल से, ज्ञान की यह प्राचीन प्रणाली भारतीय सभ्यता के लिए मार्गदर्शक प्रकाश रही है, और विस्मयकारी बात यह है कि यह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है!

12. सामाजिक महत्व:- 

गंगासागर सिर्फ़ एक तीर्थस्थल नहीं है; यह भावना, संस्कृति, आस्था और विश्वास का संगम है - जीवन का उत्सव। और धर्म हमेशा से ही इस भूमि की संस्कृति में समाया हुआ है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला गंगासागर कोई अपवाद नहीं है। मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। यह एक ऐसा उत्सव है जो विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों के लिए एक साझा केंद्र बिंदु बन जाता है, जो एक साथ मिलकर एकता का परिचय देते हैं।

13. नकारात्मक से सकारात्मक की ओर:- 

जैसे ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, नकारात्मकता धीरे-धीरे कम हो जाती है, और सकारात्मकता का दौर शुरू होता है। इससे रिश्तों में मजबूती आती है। दिन लंबे होने लगते हैं, रातें छोटी होने लगती हैं, जो सर्दियों के अंत और वसंत की शुरुआत का संकेत है। फसल की कटाई और बुवाई के मौसम की शुरुआत होती है । एक मजबूत कृषि अर्थव्यवस्था होने के कारण, इस त्यौहार को अक्सर सूर्य देव के लिए एक श्रद्धांजलि के रूप में देखा जाता है, जहाँ भक्त अच्छी फसल और आदर्श मौसम के लिए सूर्य देव के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। किसान और उनके परिवार अपने मवेशियों, औजारों और ज़मीन की पूजा करके भी आभार व्यक्त करते हैं।
      इसके अलावा, देश के विभिन्न क्षेत्र स्वादिष्ट व्यंजनों के उत्सव में शामिल होते हैं। तिल और गुड़ जैसी ताज़ी कटी हुई सामग्री से बने विभिन्न मीठे व्यंजन भारतीय रसोई में एक मनमोहक सुगंध के साथ छा जाते हैं। यह उत्सव केवल भोजन तक ही सीमित नहीं है। देश के विभिन्न क्षेत्र पतंग उड़ाने के सत्रों के साथ मौज-मस्ती करते हैं। इस प्रकार, हम देखते हैं कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने में गहराई से समाया हुआ है, इसकी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है जो सभी को एक साथ बांधे रखता है।

14. गंगासागर के अनुष्ठान:- 

मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला गंगासागर मेला प्राचीन अनुष्ठानों का उत्सव है जो भारत के सुशोभित अतीत का हिस्सा रहे हैं। जैसे ही सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, लाखों तीर्थयात्री पवित्र संगम पर डुबकी लगाने के लिए सागर द्वीप के तटों पर आते हैं। ऐसा माना जाता है कि सही स्थिति में डुबकी लगाने से सांसारिक पाप धुल जाते हैं और भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिलती है। शाही स्नान के बाद तीन दिनों तक चलने वाले भव्य अनुष्ठानों की एक श्रृंखला होती है।
        ऐसी ही एक प्रथा है रत्नों (पंच-रत्न) और पवित्र धागे की एक पोटली को नदी की खाड़ी में फेंकना ताकि वह समुद्र में जाकर मिल जाए। यह बलिदान का एक संकेत है।
       मकर संक्रांति के दिन सुबह-सुबह भक्त निर्वाण की तलाश में बर्फीले पानी में डुबकी लगाते हैं। कुछ लोग अपने सिर मुंडवाते हैं, जबकि अन्य अपने दिवंगत माता-पिता के लिए श्राद्ध करते हैं। स्नान की रस्म दोपहर तक जारी रहती है।
        इसके बाद वे कपिल मुनि के मंदिर में पूजा करने और देवता का आशीर्वाद लेने जाते हैं। शाम के समय, समुद्र की अथाह गहराई हज़ारों मिट्टी के दीयों से जगमगा उठती है, जो इस शाश्वत भक्ति को ब्रह्मांडीय ऊंचाइयों तक ले जाती है।
15. बैतरणी पार :- 
गरुड़ पुराण के अध्याय 47 में एक रहस्यमय नदी का नाम "बैतरणी" बताया गया है। यह नदी नश्वर दुनिया की भौतिक संपत्ति का प्रतीक है, जिसे छोड़ना मुश्किल है। ऐसा माना जाता है कि मृतकों की आत्माओं को नदी पार करनी चाहिए, और जो लोग दयालु नहीं रहे हैं या दूसरों की मदद के लिए आगे नहीं आए हैं, वे नदी में गिर जाएंगे और अनंत काल के रसातल में नष्ट हो जाएंगे। असहाय आत्मा गाय की पूंछ से चिपके हुए नदी पार करने में सक्षम होती है ।

16. कपिल मुनि मंदिर में पूजा:- 

एक और कारण है जिसकी वजह से हर साल लाखों तीर्थयात्री गंगासागर आते हैं। वे आस्था के साथ स्नान करते हैं और कपिल मुनि के मंदिर की ओर पूजा करने और देवता का आशीर्वाद लेने जाते हैं। शाम के समय, समुद्र की अथाह गहराई हज़ारों दीयों से जगमगा उठती है, पंडितों के भजन लहरों में हस्तक्षेप करते हैं जो इस कालातीत भक्ति को ब्रह्मांडीय ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।

17.पुण्य स्नान:- 

मोक्ष पुनर्जन्म से मुक्ति का एक अंतर्निहित अर्थ है जिसे धरती पर रहते हुए प्राप्त किया जा सकता है। कुछ भारतीय परंपराओं ने दुनिया के भीतर नैतिक कार्यों पर मुक्ति पर जोर दिया है, एक रहस्यमय परिवर्तन जो व्यक्ति को अहंकार और दुख के धुंधले बादल से परे परिस्थितियों की वास्तविकता का सामना करने की अनुमति देता है। मोक्ष की यह मुक्ति मकर संक्रांति की शुभ महातिथि पर गंगासागर में दिव्य स्नान के माध्यम से भक्तों की आत्माओं में जागृत होती है। एक ऐसा नजारा जिसे देखना मुश्किल है। दुनिया भर में लाखों भक्त पवित्र संगम के अमृत में डुबकी लगाने के लिए सांस रोककर इंतजार करते हैं। सांसारिक पापों को नष्ट करने की यह मान्यता सदियों से भारतीयों के दिलों में घर कर गई है। इस प्रकार, गंगासागर आस्था, भक्ति और विश्वास से लिपटी एक जीवंत परंपरा बन गई।
            आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 



लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।) 


 




Thursday, July 11, 2024

बावला तपस्वी राजकुमार असमनजस (राम के पूर्वज 25)आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


राजा सगर संतानहीन थे :- 

राजा सगर की दो पत्नियाँ थीं जिन्होंने अपनी तपस्या से उनके पापों को दूर कर दिया था।उन्हें लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई, इसलिए वे अपनी दोनों पत्नियों के साथ हिमालय के भृगुप्रस्रवण पर्वत पर तपस्या करने लगे। प्रसन्न होकर भृगु मुनि ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को वंश चलाने वाले एक पुत्र की प्राप्ति होगी और दूसरी के साठ हज़ार वीर उत्साही पुत्र होंगे। बड़ी रानी केशनी के एक पुत्र और छोटी सुमति ने साठ हज़ार पुत्रों की कामना की थी। सुमति के पुत्रों के चरित्र के बारे में भविष्यवाणी की गई है कि वे अधर्मी होंगे, जबकि केशिनी का पुत्र धर्मी होगा। राजा और उनकी रानियाँ अयोध्या लौट आईं थीं और समय के साथ केशिनी ने असमंजस नामक एक पुत्र को जन्म दिया। 
      राजा सगर अपने पिता बनने की ख़ुशी में राज्य में भोजन का प्रबंध करवाते हैं। रानी केशनी एक पुत्र को जब जन्म देती हैं। राज वैद्य राजा को बताते हैं की उनका बालक अपंग(बावला) पैदा हुआ है।

राजा रानी को मिला था संतान सुख ना मिलने का शाप :- 

एक बार राजा सगर और रानी केशनी दोनों शिकार पर जाते हैं और दोनों एक मृग को वन में देख कर उस पर बाण चला देते हैं। वह मृग मरते वक्त राजा और रानी दोनों को श्राप देता हैं कि तुम्हें पुत्र स्नेह नही मिलेगा। पुत्र स्नेह से तुम लोग वंचित रहोगे।राजा और रानी को अपंग पुत्र जन्मने पर हिरण द्वारा दिए शाप की याद आ जाती है और वह दुःखी हो जाते हैं। शाप के बाद दोनों पति पत्नी राजमहल वापस आते हैं । रानी केशनी अपने दुःख से रो रही थी की उनका पुत्र असमंजस वहाँ आता है और उनसे रोने का कारण पूछता है तो रानी केशनी बताती है की हम अयोध्या को उत्तराधिकारी देने में असफल हुए हैं। असमंजस रानी केशनी से कहता है कि आपको यह चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। 
      राजा अपनी सभा में महामंत्री को कहता है कि वह अयोध्या को उत्तराधिकारी नहीं दे सकते तो महामंत्री उन्हें कहते हैं कि रानी केशनी उत्तराधिकारी नहीं दे सकती ,आप तो दे सकते हैं। इसलिए आप दूसरा विवाह कर ले। राजा सगर अपनी पत्नी केशनी को कहता है कि मैं दूसरा विवाह नहीं करूँगा। 
      राजा सगर अपने पुत्र असमंजस को बुलाते हैं।उनसे अलगअलग राजकुमारियों के चित्र दिखाते हैं और उनसे कहते हैं की इनमें से आप अपने लिए एक पत्नी को चुन लीजिए। असमंजस उनसे कहते हैं कि मुझे कोई भी पसंद नहीं है और मेरी तो शादी हो चुकी है वह भी भक्ति से। उसकी एक और बहन हैं जिसका नाम है मुक्ति । भक्ति अगर मुझसे प्रसन्न हो गयी तो वह मेरा विवाह मुक्ति से कर देगी। ये दोनों परमेश्वर की पुत्रियाँ हैं। मुक्ति से विवाह के बाद मुझे परमेश्वर के धाम में स्थान मिल जाएगा। राजा सगर अपनी पत्नी से दुःखी होकर कहते हैं की मैं दूसरा विवाह करना नहीं चाहता और राजकुमार असमंजस ने भी विवाह करने से मना कर दिया है। 

राजकुमार का बावला भेष :- 

असमंजस ने एक बावले बालक के रूप में जन्म लिया है लेकिन उसके पास सभी तरह का ज्ञान पहले से ही है। असमंजस एक महान तपस्वी है जिसके कारण उसने बालक को पुनः जीवित कर दिया।
       राजा सगर और रानी केशनी अपने पुत्र को तितली पकड़ते देखते हैं तो वो उन्हें कहते हैं की तुम्हें शिकार करने के लिए वन में जाना चाहिए। राजकुमार असमंजस वन में शिकार करने जाता है। वन में सैनिक एक हिरन असमंजस को हिरन दिखाते हुए उसका शिकार करने को कहते हैं लेकिन असमंजस उस हिरन का शिकार करने से मना कर देता है। अपनी माता और पिता के पूछने पर बताता है कि उस हिरन का शिकार करते वक्त मुझे ऐसे लगा की यदि मैंने उसका शिकार किया तो वह हिरन मुझे श्राप दे देगा। रानी को भी इसी प्रकार का सपना दिखा था। वह सपने में डर कर उठ जाती है तो राजा सगर उसे समझाते हैं। 
      रानी केशनी अपनी पति से कहती है कि हमारा पुत्र हमारे राजा बनाने के लायक़ नहीं है। वह राजनीतिज्ञ नहीं बनना चाहता उसे तो सिर्फ़ सन्यास और भक्ति से मतलब है। राजा सगर असमंजस को राजा बना कर वन में तप करने के लिए जाने की कहते हैं ताकि असमंजस अपने राज्य के कर्तव्य को सम्भालने में इतना व्यस्त हो जाएगा की उसे इन सब कार्यों के लिए समय ही नहीं मिलेगा।     
     राजा सगर अपनी सभा में असमंजस को राजकुमार बनाने की बात पर चर्चा करते हैं तो महामंत्री राजा सगर को कहते हैं कि आपको वन में तप करने तभी जा सकते हैं , जब आप अपने राज सिंहासन को उचित उत्तराधिकारी दे देंगे। महामंत्री राजा और रानी को बताते हैं कि राजकुमार असमंजस राजा बनने के लायक़ नहीं है। राजा सगर अपनी पत्नी के साथ ऋषि औरव के पास आते हैं और उनसे कहते हैं कि राजसभा ने राजकुमार असमंजस को राजा बनाने से मना कर दिया है। 

राजा सगर को असमनजस के शादी की चिंता :- 

राजा सगर अपने पुत्र राजकुमार असमंजस को समझाते हैं कि तुम्हारे बावले भेष के कारण तुमसे कोई भी राजकुमारी विवाह करने को नहीं तैयार नहीं होगी । रानी केशनी भी उससे कहती हैं कि पुत्र तुम इस बावले भेष को त्याग दो तभी तुम्हारा विवाह हो पाएगा। असमंजस उनसे कहते हैं कि मैं इस भेष को नहीं त्याग सकता , क्योंकि इसी भेष के कारण मेरा भगवान से मेल हो पाएगा।

असमंजस का प्रतिभा से विवाह:- 

विराट नगरी का राजा अपनी पुत्री के विवाह के लिए राजा सगर के पुत्र असमंजस के साथ करने के लिए पत्र भेजता है। रानी केशनी और राजा यह प्रस्ताव सुन प्रसन्न हो जाते हैं। असमंजस और प्रतिभा का विवाह कर दिया जाता है। 
      राजकुमारी प्रतिभा राजकुमार असमंजस को बताती हैं आप मेरे पति है और आपने मेरी रक्षा और सम्मान करने का अग्नि के सामने वचन लिया है। राजकुमारी प्रतिभा राजकुमार असमंजस को विवाह बंधन को स्वीकार करने के लिए कहती है। ऋषि वसिष्ठ राजा सगर और रानी सुमति को आशीर्वाद देने के लिए आते हैं। विष्णु जी कपिल मुनि को दर्शन देते हैं और उन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में बताते है और उनसे कहते हैं की अब वह जंगल में तप करने के लिए चले जाए और आपको पृथ्वी वासियों को तप करने के लिए प्रेरित करना होगा। आपके मार्ग दर्शन से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण होगा और तभी कलयुग में पृथ्वी वासियों को उद्धार हो पाएगा। ऋषि वसिष्ठ रानी सुमति और राजा सगर को आशीर्वाद देते हैं और रानी सुमति के गर्भवती होने की बधाई भी देते हैं। प्रतिभा भी गर्भवती हो जाती है तो ऋषि वसिष्ठ जी उन्हें भी आशीर्वाद देते हैं। 
    सुमति की दासी मानसी रानी सुमति को कहती है की तुम्हें राजकुमारी प्रतिभा का गर्भ गिरना होगा तभी आपका पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। दासी सुमति से कहती है कि आप राजकुमारी के गोद भराई में उसे विष पिलाकर गर्भ को नष्ट करने के लिए कहती है। कपिल मुनि जी बहुत से ऋषि मूनियों को ज्ञान देते हैं और उनकी शंकाओं को दूर करते हैं। ऋषि मुनि कपिल मुनि जी से दोबारा सवाल करने आते हैं तो वो उन्हें वहाँ नहीं पाते। प्रतिभा की गोद भराई की रस्म में दासी मानसी प्रतिभा को विष मिलाकर खीर खिला देती है। कपिल मुनि जी ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में पधारते हैं तो ऋषि वसिष्ठ उनका आदर सत्कार करते हैं। 
      राजा सगर दूर खड़े हो कर भगवान कपिल मुनि जी को देखते है। कपिल मुनि जी ऋषि वसिष्ठ को भी ज्ञान प्रदान करते हैं। कपिल मुनि जी के सामने एक मृत व्यक्ति को लाया जाता है जिसे कपिल मुनि जी को अपनी शक्तियों और विद्या से पुनः जीवित कर देते हैं। कपिल मुनि जी ऋषि वसिष्ठ जी को विद्या के बारे मीन बताते हैं। समस्तिपुर के राजा दासी मानसी से पूछता है की अब तक प्रतिभा का गर्भ नष्ट क्यों नहीं हुआ। दासी उन्हें बताती है कि मैंने जो विष राजकुमारी प्रतिभा को दिया है वह धीरे धीरे काम करेगा यदि वह तभी असर करता तो आप पर शक जा सकता था। राजा सगर कपिल मुनि जी को अयोध्या में चलकर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए कहते हैं। कपिल मुनि जी उनकी बात मान लेते हैं। समस्तिपुर का राजा और दासी सूर्यास्त होने का इंतज़ार कर रहे थे कि कब प्रतिभा का गर्भ नष्ट हो। राजकुमारी प्रतिभा के पेट में दर्द शुरू हो जाता है और राज वैद्य आकर उन्हें बताते हैं की राजकुमारी का गर्भपात नहीं हुआ है। उनके पुत्र का जन्म अभी होने वाला है। 

योग साधना से उच्च स्थान:- 

केशिनी के पुत्र असमंजस पूर्वजन्म में योग साधना से उच्च स्थिति प्राप्त कर ली थी। लेकिन कुछ समय के कुसंग के कारण यह मुक्ति से वंचित रह गए और पुनर्जन्म लेना पड़ा। इन्हें पूर्वजन्म की सारी बातें याद रही। इसलिए मोह माया से दूर रहने के लिए इन्होंने बचपन से ही ऐसा काम शुरु कर दिया था जिससे घर के लोग इनसे परेशान होकर घर से निकाल दें। समय के साथ साथ राजकुमार बड़ा होता जाता है। राजकुमार असमंजस एक दिन अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे। राज कुमार असमंजस उनकी गेंद को पत्थर में बदल देते हैं जो एक बालक को लग जाती है और उसकी मृत्यु हो जाती है। उस मृत बालक के माता पिता अपने पुत्र के शव को लेकर राजा सगर के पास आते हैं और राजा से कहते हैं की आपके पुत्र असमंजस ने हमारे पुत्र की हत्या की है।कई बार इन्होंने खेलते हुए बच्चों को उठाकर नदी में फेंक दिया। 
   राजा अपने पुत्र को बुलाते हैं और उस से बालक की हत्या के बारे में सवाल पूछते हैं तो राजकुमार असमंजस कहता है कि मैंने उसे मारा नहीं है। मैंने उसे मुक्ति दी है। राजकुमार असमंजस अपने मित्र बालक को अपने तपोबल से जीवित कर देते हैं। 

योग बल से जीवित करना :- 

समय के साथ साथ राजकुमार बड़ा होता जाता है। नगर से जाते समय असमंजस ने अपने योग बल से उन सभी बच्चों को जीवित कर दिया जिसे उन्होंने नदी में फेंक दिया था। असमंजस ने एक बावले बालक के रूप में जन्म लिया है लेकिन उसके पास सभी तरह का ज्ञान पहले से ही है। असमंजस एक महान तपस्वी रहा है जिसके कारण उसने सभी मृतक बालक को पुनः जीवित कर दिया। नगरवासी राजकुमार की शिकायत उसके पिता जी से भी किए थे । राजा नाराज होकर अपने पुत्र को पत्नी सहित देश निकाला देता है।असमंजस हाथ में कुदाल लेकर वन और पर्वतों पर घूमने लगा था।

असमंजस दिव्य पुरुष:- 

बाद लोगों को अपनी भूल का एहसास हुआ कि असमंजस दिव्य मनुष्य हैं। राजा सगर ने अपने पुत्र की खूब तलाश करवायी लेकिन असमंजस ने गुप्त स्थान पर जाकर साधना में लीन हो चुके थे इसलिए वह किसी को नहीं मिले और अंत में इन्हें मुक्ति मिल गई।

कपिल मुनि के प्रकोप से पुत्र जिन्दा जले:- 

जब राजा सगर अश्वमेध यज्ञ करते हैं,तो इंद्र बलि का घोड़ा चुरा लेते हैं। सगर अपने 60,000 पुत्रों को घोड़े को लाने के लिए कहते हैं। पुत्र पाताल लोक में जाते हैं और ध्यानमग्न ऋषि कपिल के पास बंधे घोड़े को पाते हैं । ऋषि की तपस्या में खलल डालते हुए पुत्रों ने बहुत शोर मचाया। परिणामस्वरूप, कपिल मुनि ने अपनी ज्वलंत आँखों से उन्हें जलाकर राख कर दिया।

असमंजस में राज्योचित लक्षण का अभाव 

राजा सगर और रानी केशनी अपने पुत्र को तितली पकड़ते देखते हैं तो वो उन्हें कहते हैं की तुम्हें ये बालकों की तरह हरकतें करना शोभा नहीं देता है। तुम्हें बड़े होकर अयोध्या का राज सिंहासन सम्भालना है । इस पर असमंजस अपने माता पिता को तपस्वियों की भाँति उत्तर देता है। राजा सगर उसकी तपस्वी सोच को लेकर चिंता होती है कि क्या भविष्य में असमंजस राजा बन भी पाएगा या नहीं। 

पिता सगर द्वारा देश निकाला:- 

अयोध्या के राजा सगर न्यायप्रिय शासक थे। प्रजा के दुख-सुख में वह हमेशा सहभागी रहते थे। एक दिन वह दरबाार में बैठे थे। दरबान ने आकर उन्हें बताया कि अयोध्या के कुछ प्रमुख लोग उनसे भेंट करना चाहते हैं। महाराजा सगर ने उन्हें दरबार में बुलवा लिया। उन्होंने महाराजा को सिर झुकाकर नमस्कार किया और बैठ गए। महाराजा ने कुशल-क्षेम पूछी तो उनमें से एक रो पड़ा।
    महाराजा को समझते देर न लगी कि ये सब किसी दुख से पीड़ित होकर आए हैं। महाराजा ने कहा, ‘आप निःसंकोच बताइए कि आपको मेरे राज्य में क्या कष्ट है। महाराज, हमें लाचार होकर यहां आना पड़ा है। एक वृद्ध नागरिक ने कहा, ‘महाराज, आप तो प्रजा को पुत्रों की तरह स्नेह और संरक्षण देते हैं। किंतु आपके पुत्र राजकुमार असमंजस ने राज्य में हमारा रहना दूभर कर दिया है। वह शाम को सरयू तट पर पहुंचते हैं और अबोध बालकों को नदी की उफनती धार में फेंक देते हैं।
       जब डूबते बालक रोते हैं तो राजकुमार जोर से अट्टहास कर अपना मनोरंजन करते हैं।’ सुनते ही महाराज का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा। उन्होंने कहा, ‘आप सभी निश्चिंत होकर अपने-अपने घर लौट जाइए।’ महाराजा दरबार से महल में पहुंचे।
        उन्होंने राजकुमार असमंजस को अपने पास बुलवाया। वे बोले, ‘तुम राजकुमार हो या जल्लाद/’ तुम प्रजाजनों के निर्दोष बच्चों को सरयू में फेंक कर मनोरंजन करते हो। मेरे राज्य में ऐसा क्रूर व्यक्ति एक क्षण भी नहीं रह सकता।’ राजकुमार भय से कांपने लगे।
       हाथ जोड़कर बोले, ‘पिताजी, क्षमा करें भविष्य में ऐसा पाप नहीं करूंगा।’ सगर बोले, ‘किंतु अनेक अबोध बच्चे तुम्हारे इस क्रूरतापूर्ण मनोरंजन के शिकार बन चुके हैं। मैं ऐसे क्रूर युवक को अपना पुत्र मानकर संरक्षण नहीं दे सकता।’ राजा ने असमंजस को पत्नी सहित तुरंत अयोध्या से निष्कासित कर दिया। असमंजस हाथ में कुदाल लेकर वन और पर्वतों पर घूमने लगा था।

असमंजस ने त्यागा राज सिंहासन का प्रस्ताव:-  

बाद में परिस्थितिया सामान्य हुई तो पिता
राजा सगर अपने पुत्र असमंजस को राजा बनाने की बात करते हैं तो असमंजस उन्हें मना कर देता है कि उसे राजा नहीं बनना है। उसे ये सब मोह माया नहीं चाहिए उसे भगवान की भक्ति चाहिए। कुछ समय बाद असमंजस राजा सगर से कहता है की वह वन में तप करने के लिए जा रहा है और उसने गृहस्थ जीवन त्याग दिया है। अंशुमान की पत्नी उनसे कहती है कि मैं आपके पुत्र को जन्म देने जा रही हूँ क्या आप उसे देखे बिना ही चले जाएँगे तो असमंजस कहता है कि वह अब सब कुछ त्याग चुका है। अब वह मोह माया से परे हो चुका है और यह कह कर वहाँ से चला जाता है।

असमंजस की संतान को कपिल ने जीवन दिया :- 
राजा सगर कपिल मुनि जी को अयोध्या में चलकर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए कहते हैं। कपिल मुनि जी उनकी बात मान लेते हैं। समस्तिपुर का राजा और दासी सूर्यास्त होने का इंतज़ार कर रहे थे कि कब प्रतिभा का गर्भ नष्ट हो। राजकुमारी प्रतिभा के पेट में दर्द शुरू हो जाता है और राज वैद्य आकर उन्हें बताते हैं की राजकुमारी का गर्भपात नहीं हुआ है। लेकिन उनके पुत्र का जन्म अभी होने वाला है। कपिल मुनि जी राजमहल में आते हैं और राजकुमार असमंजस को आशीर्वाद देते हुए समझाते हैं कि आपको अपने पति के कर्तव्य को पूर्ण करना चाहिए। राजकुमार असमंजस उनकी बात पर कहता है कि आपके होते हमारा कभी भी अमंगल नहीं हो सकता। राजकुमारी एक बालक को जन्म देती है जो मृत होता है। यह समाचार सुन कर राजा सगर राजकुमारी के कक्ष में जाते हैं तो रानी केशनी दुःख में सुध खोए रहती हैं और राजा से कहती है कि हमें युद्ध की तैयारी करनी चाहिए और काल से अपने पोते के प्राण वापस लाने होंगे। राजा सगर केशनी को समझाते हैं । 
     वह कपिल मुनि जी के सामने अपने पौत्र को रख कर उनसे विनती करते हैं कि कृपा करके आप इस बालक को पुनः जीवित कर दें। कपिल मुनि जी अपनी विद्या का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। कपिल मुनि जी अपनी विद्या और शक्तियों से उस बालक को पुनः जीवित कर देते हैं। सभी बालक को जीवित देख प्रसन्न हो जाते हैं और ऋषि वसिष्ठ से कहते हैं कि उसका नामकरण करे। ऋषि वसिष्ठ जी असमंजस के पुत्र का नाम अंशुमन रख देते हैं।
    अंशुमान का अर्थ है सूर्य (सूर्य) और0 यह नाम दो संस्कृत शब्दों, "अंश" और "मनुष्य" से लिया गया है। अंश का अर्थ है भाग या अंश, है जबकि मन का अर्थ है मन या आत्मा। इसलिए, अंशुमान का अर्थ है “ ऐसा व्यक्ति ,जिसके पास दिव्य आत्मा का अंश है या जिसके पास दिव्य मन का अंश है।”
      राजा सगर लम्बी उम्र तक शासक बने रहे । राजा सगर ने असमंजस को उसकी पत्नी समेत राज्य से निर्वासित कर दिया था। असमंजस हाथ में कुदाल लेकर वन और पर्वतों पर घूमने लगा था। 
     राजा सगर गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने का कोई उपाय नहीं खोज सके और अंततः 30 हज़ार वर्षों तक अपने राज्य पर शासन करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होने शासन सत्ता अंशुमान को सौप दी।

           आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )


Friday, July 5, 2024

क्या सचमुच अयोध्या शापित है? आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी



सब प्रभु श्री राम की लीला :- 

जो घटित हुआ, हो रहा और जो होगा वह सब प्रभु श्री राम की लीला है। अयोध्या का गौरव सदियों से बार बार बिखरता रहा। अब जैसे- जैसे अयोध्या अपने आप को संयोजित कर रही है, समेट और सहेज रही है तो क्रिया प्रतिक्रिया और दावेदारी भी बढ़ती जा रही है। अयोध्या कितनी बार बसी और कितनी बार उजाड़ हुई, इसका हिसाब करना सहज नहीं है। 

      सच पूछिये तो भगवान श्रीरामचन्द्र की लीला- संवरण के बाद ही अयोध्या पर विपत्ति आई। कोशलराज के दो भाग हुये। श्रीरामचन्द्र के ज्येष्ठ कुमार महाराज कुश ने अपने नाम से नई राजधानी " कुशावती” बनाई और छोटे पुत्र लव ने "शरावती"/ श्रावस्ती” की शोभा बढ़ाई। राजा के बिना राजधानी कैसी? अयोध्या थोड़े ही दिनों पीछे आप से आप श्रीहीन हो गई।      

        अयोध्या के दुर्दशा के समाचार सुन महाराज कुश फिर अयोध्या में आये और कुशावती ब्राह्मणों को दानकर पूर्वजों की प्यारी राजधानी और उनकी जन्म-भूमि अयोध्या में रहने लगे। शाक्यसिंह बुद्धदेव के जन्म से फिर अयोध्या का पता चलता है और कुछ कुछ वृत्तान्त भी मिलता है। बुद्धदेव कपिलवस्तु में उत्पन्न हुये, श्रावस्ती में रहे और कुशीनगर वा कुशीनर में निर्वाण को प्राप्त हुए। यह सब स्थान कोशल देश में विद्यमान थे।

         उन दिनों कोशल वा अवध की राजधानी का राज सिंहासन 'श्रावस्ती' में था जिसको भगवान श्रीरामचन्द्रदेव के कनिष्ठ पुत्र लव ने 'शरावती' के नाम से बसाकर अपनी राजधानी बनाया था। अंग्रेजी राज में अयोध्या पाँच छः हजार की आबादी का एक छोटा सा नगर सरयू नदी के बायें तट पर बसा था। 

        अवधेश कुमार सांसद फैजाबाद

विकास सत्ता रहने पर ही निर्भर :- 

भारतीय लोकतंत्र में एक अहम बुराई यह है कि जिस निर्वाचन क्षेत्र से सत्ताधारी पार्टी चुनाव जीतती है या उस क्षेत्र के प्रतिनिधि को सत्ता में महत्व पूर्ण ओहदा मिलता है,वहीं विकास का कार्य होता है, वहीं रौनक रहती है। जहां से सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि नहीं चुने जाते हैं, वहां की सड़कें भी वीरान हो जाती हैं। यहां तक उन क्षेत्रों को पर्याप्त रोशनी के लिए बिजली भी नहीं मिलती। सारे चालू प्रोजेक्ट ठप पड़ जाते हैं, नई योजनाएं तो दूर की कौड़ी हो जाती हैं। रामपुर, सैफई, मैनपुरी, इटावा,अमेठी, रायबरेली, वाराणसी, अयोध्या ,मथुरा और गोरखपुर में इस प्रकार का लक्षण और घटना देखी और सुनी जा सकती है।

         सांसद का अयोध्या में स्वागत 

क्या अयोध्या के साथ भी कुछ होने वाला है 

जबसे केंद्र  में सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को संसदीय चुनावों में आपेक्षित सीटें नहीं मिली है, सोशल मीडिया पर विपक्ष के समर्थन में लोगअयोध्या के शापित होने की बात करने लगे हैं। उन्हें इस बात का डर है कि एक बार फिर अयोध्या पर सीता माता के श्राप की छाया तो नहीं पड़ गई है? फैजाबाद सीट हारने को अयोध्या के हारने की प्रोपगंडा क्यों फैलाया जा रहा है?

सीता माता के श्राप की छाया :- 

चुनाव के नतीजों के बाद अयोध्या और माता सीता के श्राप की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पौराणिक कथाओं केअनुसार, जब श्री राम ने लोगों की बातों में आकर माता सीता को एक अदना सा धोबी के कहने पर राजधर्म का परिपालन करते हुए अयोध्या राज्य से निकाल दिया था, तब माता सीता ने अयोध्या को सुखी ना रहने का श्राप दिया था। कहा जाता है कि इस श्राप के कारण ही अयोध्या में आपेक्षित विकास नहीं हो पाता रहा है।  

राजा प्रजा में तालमेल का अभाव:- 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अयोध्या की जनता का अपने शासकों के साथ तालमेल कम होता है। श्री राम के बाद, उन्होंने किसी भी शासक को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया। राजा सगर के पुत्र असमंजस और असमंजस के पुत्र अंशुमान को भी अयोध्या की जनता ने राज्य से निकलने पर मजबूर कर दिया था।

पौराणिक कथाएं राजनीति के अंग बने :- 

अयोध्या का चुनाव परिणाम और इसके पीछे की पौराणिक कथाएं राजनीतिक और सामाजिक बातों का हिस्सा बन गई हैं। अब देखना ये होगा कि आने वाले समय में अयोध्या में विकास की गति कैसी रहती है और क्या जनता का तालमेल अपने नए नेताओं के साथ सही रहता है की नहीं है।

राजा द्वारा भी किंवदंती की पुष्टि :- 

एक बार टीवी चैनल से बात करते हुए 'अयोध्या के राज परिवार के प्रतिनिधि ' के रूप में जाने जाने वाले श्री बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा ने कहा था , “ स्थानीय किंवदंती के मुताबिक, जब भगवान राम ने अफवाहों की वजह से माता सीता को अयोध्या से बाहर निकाला था, तो उन्होंने श्राप दिया था। कई अन्य लोगों का भी मानना है कि इस अभिशाप की वजह से ही शहर में कभी भी तीव्र गति से विकास नहीं हुआ।”

एकाएक होटल व्यवसाय में सहसा वृद्धि:- 

जिस अयोध्या में कुछ साल पहले तक एक भी बढ़िया होटल नहीं था, वहां अब फाइव स्टार होटल बनाने की परमिशन मांगने वालों की लाइन लग गई है। अयोध्या में फाइव स्टार होटल बनाने की अनुमति मांगने के लिए प्रशासन को 100 से ज्यादा आवेदन मिले हैं। इस परिप्रेक्ष्य में लोधा ग्रुप, ताज होटल ग्रुप तथा अमिताभ बच्चन जैसे अनेक नामी गिरामी लोग और यहां पदस्थ अधिकारी सांसद और विधायक पर भी उंगलियां उठने लगी है।

अयोध्या ने स्वयं आकार लिया था :- 

पौराणिक कथाओं की मानें तो अयोध्या को किसी ने बसाया नहीं था। इस शहर ने अपने आप ही आकार ले लिया और साकेत नाम से इसकी पहचान बन गई। भारत में सात धार्मिक शहरों की चर्चा होती है, जिसमें हर शहर की उत्पत्ति की कोई न कोई कहानी है पर अयोध्या शहर कैसे बना इसकी कोई कहानी नहीं है। जैसे काशी के बारे में कहा जाता है कि यह शंकर भगवान के धनुष पर स्थित है। द्वारका के बारे में कहा जाता है कि इसे कृष्ण ने बसाया पर अयोध्या की कोई किवदंती भी नहीं है।

अयोध्या राम से पहले भी उत्कृष्ट रही:- 

राम के पहले उनके कई पुश्तों ने यहां राज किया है। कालिदास लिखते हैं कि राजा दशरथ के समय तक अवधपुरी समृद्ध, सुंदर और अच्छी तरह से किलेबंद शहर था। समय के साथ अयोध्या के नाम बदलते रहे जैसे कोसलपुरी, साकेत आदि। इतिहास के पन्नों के पलटने पर अयोध्या को अलग-अलग 12 नामों से जाना जाता था. जिनके नाम हैं, अयोध्या, आनंदिनी, सत्यनामा, सत, साकेत, कोशला, विमला, अपराजिता, ब्रह्मपुरी, प्रमोदवन, सांतानिकलोका और दिव्यलोका। शिव संहिता के पांचवे पटल के बीसवें अध्याय में कहा गया है – 

अयोध्या नंदिनी सत्यनामा साकेत इत्यापि।

कोशला राजधानी च ब्रह्मपुरपराजिता।

      जिस तरह यहां का इतिहास शैव धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, वैष्णव धर्म आदि का केंद्र बनता रहा, उससे यही लगता है कि यह शहर हमेशा आबाद रहा होगा। फिर भी इसे शापित क्यों कहा जाता है, यह समझ में नहीं आता है।

साहित्यकारों की निगाह में अयोध्या :- 

हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार मृणाल पांडेय एक ऑर्टिकल में लिखती हैं कि 1858 की सर्दियों में विष्णु भट्ट ने जिस भयभीत शहर को देखा, वह निश्चित रूप से त्रेता युग की चमचमाती पौराणिक अयोध्या नहीं थी।

      अमृतलाल नागर ने 1957 में जो अयोध्या देखी, उसके स्मारकों पर घास-फूस उग आए थे और लोग ग़दर के बाद हुए अपमान को साझा करने से कतराते थे, वह फिर भी अलग थी।

     वाल्मीकि से लेकर भवभूति और विद्यापति तक के कवियों और लोकगीतों के अनाम रचनाकारों ने राम राज्य की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, जिसने एक निर्दोष महिला सीता को दंडित किया।

राम ने अयोध्या में राज्य नहीं उपासना की थी:- 

    'जौं अनीति कछु भाषौं भाई, 

     तौ मोहि बरजहूं भय बिसराई ।'

      श्रीराम अयोध्यावासियों से कहते हैं कि अगर मैं भी कुछ अनीति की बात कहूं तो आप सभी भय को त्याग कर मुझे रोक देना । तभी नारद वाल्मीकि से कहते हैं कि -

  “रामो राजम उपासित्वा 

   ब्रह्मलोकं प्रयास्यति।।”

(यानि राम अपने राज्य की उपासना करने के बाद ब्रह्मलोक चले गए ।)

       आखिर राम क्यों अपनी अयोध्या का शासन न करके उसकी उपासना करते रहे । क्योंकि राम जानते थे कि अयोध्या और वहां की प्रजा का मिजाज किसी भी शासन को स्वीकार नहीं करता। श्री मिश्र लिखते हैं कि यही कारण रहा कि राम ने पहले अपने वंश के राजाओं का इतिहास देखा और जब वो ये जान गए थे कि अयोध्या किसी की नहीं सुनती तो वो ब्रह्मलोक जाने से पहले अयोध्या किसी को नहीं सौंप गए । न तो अपने पुत्रों लव और कुश को और न ही अपने भाइयों को। उन्होंने प्रकांतर से हनुमान जी को अयोध्या की जिम्मेदारी सौंपी है।

अयोध्या को किसी को नही दिया गया:- 

राम ने अयोध्या किसी को नहीं दी. दोनों पुत्रों यानि कुश को कसूर ( पंजाब) और लव को लाहौर में राज्य की स्थापना करने का आदेश दिया। शत्रुघ्न के पुत्रों को मथुरा तो लक्ष्मण के पुत्रों को लखनऊ का क्षेत्र दिया । राम अपने साथ अयोध्या की जनता को ही नहीं उसके सभी प्राणियों यहां तक की पशु पक्षियों को भी अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए और अयोध्या वीरान हो गईं। कहा जाता है कि अयोध्या की देवी ने खुद कुश के पास जा कर अयोध्या को फिर से बसाने की प्रार्थना की , लेकिन अयोध्या फिर वैसी नहीं रह गईं जैसी श्रीराम के वक्त थी।

    राम जानते थे कि ये वही अयोध्या की जनता है जिसने उनके पूर्वज राजा सागर के पुत्र असमंजस को राज्य से निकालने के लिए विवश कर दिया था, क्योंकि असमंजस अयोध्या के बच्चों को सरयू में डूबो कर मार डालता था। अंशुमान अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए राजकाज छोड़ ताउम्र तपस्या में ही लीन रहे।

अयोध्‍या अपने शासकों से कम ही बनती है:- 

ये वही अयोध्‍या है जो राजा दशरथ के राम को वनवास पर भेजे जाने के फैसले का विरोध करते हुए राम के साथ चल पड़ती है। और ये वही अयोध्‍या है जो सीता की पवित्रता पर सवाल उठाकर उनकी अग्नि-परीक्षा सुनिश्चित करवाती है। अयोध्‍या की अपने शासकों से जरा कम ही बनती है। वह उनके अधीन तो रहती है पर हर अच्छे बुरे कार्य पर उसकी निगाहें भी लगी रहती है। भास ने प्रतिमा नाटक में राम की अंतर्दशा इस प्रकार कहा है - 

"स्नेहं दयां च सौख्यं च, 

यदि वा जानकीमपि, 

आराधनाय लोकस्य 

मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा।"

(अर्थात् लोकाभिराम भगवान श्रीराम ने कहा कि, न केवल स्नेह, दया, करुणा, मैत्री अपितु जगज्जननी जानकी का भी लोकहित हेतु परित्याग करने में लेशमात्र भी दुःख नहीं होगा।प्रजापालन में तत्पर श्री राम का यह आदर्श राजधर्मावलम्बियों के लिए अनिवार्य रूप से अनुकरणीय व पालनीय हो तो रामराज्य का स्वप्न साकार होने में लेशमात्र भी सन्देह नहीं है।) "


          आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)


Tuesday, July 2, 2024

एस पी ग्रुप ने खोलाआधुनिक सुविधाओं से युक्त बस्ती मंडल में "एस आर डी हास्पिटल "

             एस पी ग्रुप ने खोला आधुनिक          
      सुविधाओं से युक्त बस्ती में नया                       एस आर डी हास्पिटल 

      ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

एस आर डी हास्पिटल की पारिवारिक पृष्ठभूमि:-

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले केकप्तानगंज विकास क्षेत्र में पटखौली राजा ग्राम पंचायत के अंतर्गत दूबे/ द्विवेदी ब्राह्मणों का संस्कार युक्त दुबौली दूबे एक अति चर्चित गांव है। इसमें श्री राम सनेही दूबे अपने समय के संभ्रांत और प्रभाव शाली व्यक्ति रहे। ना केवल अपने ग्राम पंचायत अपितु हरैया तहसील और बस्ती जिले में उनकी अच्छी ख्याति रही है। इनके इकलौते पुत्र श्री हरी राम दूबे अपने पिता के धरोहर को अत्यन्त बुलंदियों तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं लगाई थी। आगे चल कर इनके चार कुशल और व्यवहार परक पुत्र स्वर्गीय श्री अमृत नाथ दूबे, स्वर्गीय श्री देवनाथ दूबे, स्वर्गीय श्री देव नारायण दूबे और श्री शत्रुघ्न प्रसाद दूबे ने आम जन के सहयोग से श्री राम सनेही इंटर कॉलेज दुबौली दुबे बस्ती की स्थापना 1972 में कराए थे ।
        गांव में दुर्गा माता का मंदिर, कृष्ण जन्माष्टमी, राम लीला का आयोजन तथा आल्हा ,फाग और कुश्ती - दंगल प्रतियोगिताएं नियमित रूप से यहां आयोजित होती रहती रही हैं । जिले स्तर पर पहले इलेक्ट्रिक मशीनरी, पंपिग सेट,आयल इंजन और अन्य तरह के मशीनरी पार्ट्स के विक्री और व्यापार में इस परिवार का पूरे बस्ती मंडल में एकाधिकार रहा है । इस परिवार ने व्यापार मंडल बस्ती की अगुवाई भी अनेक वर्षों तक निभाई थी। गोटवा- कटया , खलीला बाद,हरैया सिद्धार्थ नगर में अभी भी अनेक व्यवसायिक गतिविधियां उत्कृष्टता के साथ संचालित है। 

इस परिवार के प्रतिष्ठानों द्वारा स्वराज, एस्कॉर्ट और जान डीयर ट्रेक्टर की खूब बिक्री हुई है। एस पी ऑटो मोबाइल, एस पी ऑटो व्हील, हीरो मोटर्स, टाटा मोटर्स आदि अनेक संस्थान संचालित कर स्वर्गीय श्री राजेश दूबे,श्री अखिलेश दूबे श्री आशीष दूबे और डा.रोहन दूबे आटो मोबाइल की दुनियां में पूरे बस्ती मण्डल में एकाधिकार बना रखा है। डा.रोहन दूबे इसी वंश परंपरा के सबसे युवा सदस्य हैं जो सरकारी जाब को ना अपनाकर एक लम्बी सेवा के सोपान को अंगीकार किया है। मै इस युवा चिकित्सक के उज्ज्वल भविष्य तथा अधिक से अधिक जन सेवा में सफलता की कामना करता हूं।

चिकित्सा के क्षेत्र में नई पहल :एस आर डी हास्पिटल :- 
सेहत मनुष्य के जीवन की अमूल्य निधि है। स्वस्थ व्यक्ति ही किसी समाज में अपनी उपयोगिता साबित कर सकता है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः” की भावना के साथ चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में एक और बड़ा नाम एस आर डी हॉस्पिटल के रूप में जुड़ा। एस. आर. डी. हास्पिटल हर किसी के स्वस्थ जीवन की कामना के साथ बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराएगा। इसी भावना के साथ आज इस अस्पताल की शुरूआत भी नि: शुल्क चिकित्सा शिविर एवं नि: शुल्क जांच शिविर के साथ हुई। इसी के साथ एसपी ग्रुप ने एसआरडी हास्पिटल बस्ती को समर्पित किया है।

       एस. आर. डी. हॉस्पिटल व निःशुल्क चिकित्सा एवं जांच शिविर का उद्घाटन बस्ती लोकसभा क्षेत्र के दो कार्यकाल पूरा करने वाले पूर्व सांसद और भाजपा के अखिल भारतीय मंत्री श्री हरीश द्विवेदी, देवरिया के वर्तमान विधायक श्री शलभ मणि त्रिपाठीऔर एस.पी ग्रुप केसंस्थापक एवं संरक्षक श्री एस.पी. दूबे ने 30 जून 2024 को संयुक्त रूप से फीता काटकर एवं दीप प्रज्वलित करके किया। कार्यक्रम में पक्ष विपक्ष के तमाम नेता और शुभ चिन्तक उपस्थित रहकर अपने आशीर्वाद से इस नए वृक्ष को अभिसिंचित किया है।

निःशुल्क चिकत्सा और जांच शिविर का आयोजन :- 
इस हॉस्पिटल के शुभारम्भ के अवसर पर आगंतुक माननीय अतिथियों ने आयोजित निःशुल्क चिकित्सा एवं जाँच शिविर के साथ साथ इस नव निर्मितअस्पताल का निरीक्षण भी किया। इस निरीक्षण में भाजपा के जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र, नगरपालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि अंकुर वर्मा ने भी अवलोकन किया।

हरीश द्विवेदी के वचन:- 
इस अवसर पर हरीश द्विवेदी ने कहा कि बस्ती मण्डल में आटोमोबाइल्स जगत के सबसे बड़े समूह एस पी ग्रुप द्वारा व्यापार और शिक्षा के साथ अब चिकित्सा सेवा क्षेत्र में भी एक नई ऊंचाई प्राप्त करेगी। यह हास्पिटल मरीजों को बेहतर व सामान्य शुल्क में सुविधा देने के साथ उनके लिए वरदान भी साबित होगा। - हरीश द्विवेदी

शलभ मणि त्रिपाठी के वचन :- 
विधायक श्री शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा कि चिकित्सक भगवान का रूप होता है और अस्पताल खोलना एक सेवा कार्य है मुझे पूरा विश्वास है कि यह अस्पताल जनपदवासियों व गरीबों के इलाज में यह काफी सहायक होगा।-शलभ मणि त्रिपाठी
निदेशक डॉ रोहन दूबे :- 
अस्पताल के निदेशक डॉ रोहन दूबे ने कहा कि अस्पताल में मरीजों को बेहतर सुविधा दी जाएगी। उन्होंने बताया कि अस्पताल में मेडिकल, स्टोर, ओ टी, पैथालॉजी, आई सी यू, एन आई सी यू , एम्बुलेंस की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञ चिकित्सक:- 
अस्पताल में डॉ के के दूबे, जनरल सर्जन डा. विवेक सिंह , स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. के मिश्रा, जनरल फिजिशियन डा.अश्विनी शुक्ल के द्वारा मरीजों का इलाज किया जाएगा।

एस पी ग्रुप के निदेशक द्वय:- 
एस पी ग्रुप के निदेशक अखिलेश दूबे व आशीष दूबे ने कहा कि बड़े भाई स्व श्री राजेश दूबे जी के स्मृति में शुरू हुए इस अस्पताल का उद्देश्य लोगों को सामान्य शुल्क में अच्छी चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
उपस्थित अतिथि गण:- 
इस अवसर पर डॉ अश्विनी सिंह, डॉ प्रमिला सिंह, कर्नल के सी मिश्र, सरदार प्रीतिपाल सिंह, अजय सिंह गौतम, दयाशंकर मिश्र, उदयभान सिंह, भूपेंद्र चौधरी, कैलाश नाथ दूबे, सुशील मिश्र, सीपी मिश्र, रवि चौधरी, श्याम जी चौधरी, डॉ संजय द्विवेदी, राकेश दूबे जे डी, अमरमणि पांडेय, चंद्रिका सिंह, देवेंद्र श्रीवास्तव, विनोद शुक्ल, गोपेश्वर त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।
       आचार्य डा राधे श्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।) 






    


     
    


 









क्या हिंदू समाज हिसक है ? आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी



राहुल गांधी का संसद में बयान:- 

कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कल संसद में बहुत ही असभ्य गैर जिम्मेदाराना और विवादित बयान दिया है। ऐसा बयान करोड़ों हिंदुओं की भावना को आहत करने वाला है। उन्होंने कहा कि, "जो लोग अपने आपको हिंदू कहते हैं, वो चौबीसों घंटे हिंसा, हिंसा, हिंसा; नफरत, नफरत, नफरत; असत्य, असत्य, असत्य करते रहते हैं। "

      राहुल के इस बयान पर लोकसभा में भारी हंगामा हो गया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खड़े होकर राहुल के इस विचार पर आपत्ति जताई। हालांकि, जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि "उन्होंने पीएम मोदी, बीजेपी और आरएसएस को नफरती और हिंसक कहा है, ना कि पूरे हिंदू समाज को।"     

         प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल के बयान पर आपत्ति जताते हुए सिर्फ इतना कहा था, 'ये विषय बहुत गंभीर है। पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना ये गंभीर विषय है।' 

     इतने पर राहुल गांधी बोलने लगे, 'नरेंद्र मोदी पूरे हिंदू समाज नहीं हैं। आरएसएस पूरा हिंदू समाज नहीं है।' 

       गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि," हिंसा की भावना को किसी धर्म से जोड़ना ठीक नहीं। संवैधानिक पद पर बैठे राहुल गांधी से गुजारिश है कि माफी मांगें।"

सरकार ने बोला राहुल पर हमला:- 

हिंदुत्व की राजनीति की पैरोकार बीजेपी ने हिंदुओं को लेकर राहुल के बयान को हवा देनी शुरू कर दी है.सदन में पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने राहुल के बयान पर आपत्ति जताई तो सदन के बाहर कई मंत्रियों ने मोर्चा संभाल लिया है.रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि राहुल गांधी के इस बयान ने पूरे हिंदू समाज का अपमान किया है.वैष्णव का कहना है कि 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने हिंदुओं को आतंकवादी कहा था. वहीं 2013 में उस समय के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने फिर हिंदुओं को आतंक - वादी बताया था तो राहुल ने खुद 2021 में कहा था कि हिंदुत्ववादियों को देश से बाहर निकाल देना चाहिए.आज राहुल गांधी ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक और असत्यवादी कहा है।

राहुल गांधी को किसका मिला साथ:- 

हालांकि कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दल इस मुद्दे पर राहुल गांधी के साथ नजर आ रहे हैं. राहुल के भाषण पर उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा, "हिंदुओं का अपमान नहीं कर सकते. उन्होंने(राहुल गांधी) स्पष्ट बोला है, उन्होंने बीजेपी के बारे में बोला है, बीजेपी के नेताओं के बारे में बोला है.”

राजनीति चमकाने के लिए प्रोपगंडा :- 

अभी कुछ दिन पहले इमरजेंसी की पूरे देश में भर्त्सना हुई है फिर भी उन्हें अपने कृत्य से कोई सीख नहीं लेना है और संसद में केवल प्रोपगंडा ही फैलाना है। इन्ही की पार्टी के शासन में दिल्ली में दिन दहाड़े हजारों सिख भाइयों का कत्लेआम हुआ। ये इस पर मौन रहते हैं और सही दिशा में चल रहे देश में अपनी तुच्छ राजनीति चमकाने के लिए शिव जी के चित्र दिखाकर अभय की बात कर रहे हैं। नेता विपक्ष को पहले भाषण में सदन के संग पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए।

सहिष्णुता के लिए अनेक संवैधानिक संगठन सक्रिय हैं:- 

भारत के धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक रूप से सहिष्णु संविधान , सरकार सहित समाज के विभिन्न पहलुओं में व्यापक धार्मिक प्रतिनिधित्व, भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसे स्वायत्त निकायों द्वारा निभाई गई सक्रिय भूमिका और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए जा रहे जमीनी स्तर के काम के बावजूद, धार्मिक हिंसा के छिटपुट और कभी-कभी गंभीर कृत्य होते रहते हैं क्योंकि धार्मिक हिंसा के मूल कारण अक्सर भारत के इतिहास, धार्मिक गतिविधियों और राजनीति में गहरे तक समाए रहते हैं। 

अंग्रेजों की चाल:- 

कई इतिहासकारों का तर्क है कि स्वतंत्र भारत में धार्मिक हिंसा भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटेन के नियंत्रण के युग के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा अपनाई गई फूट डालो और राज करो की नीति की विरासत है , जिसमें स्थानीय प्रशासकों ने हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया, एक ऐसी रणनीति जो अंततः भारत के विभाजन में परिणत हुई ।


अटल जी की हिन्दू धर्म पर कविता : - 

इस कविता में हिन्दू धर्म के मर्म को बहुत ही अच्छे ढंग से वक्त किया गया है।देश को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए-- 

"हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय" 

मैं शंकर का वह क्रोधानल 

कर सकता जगती क्षार-क्षार।

डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं 

जिसमें नचता भीषण संहार।

रणचण्डी की अतृप्त प्यास, 

मैं दुर्गा का उन्मत्त हास।

मैं यम की प्रलयंकर पुकार, 

जलते मरघट का धुआंधारय।

फिर अन्तरतम की ज्वाला से, 

जगती में आग लगा दूं मैं।

यदि धधक उठे जल, थल, 

अम्बर, जड़, चेतन तो कैसा विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैं आदि पुरुष, निर्भयता का 

वरदान लिए आया भू पर।

पय पीकर सब मरते आए, 

मैं अमर हुआ लो विष पी कर।

अधरों की प्यास बुझाई है, 

पी कर मैंने वह आग प्रखर।

हो जाती दुनिया भस्मसात्, 

जिसको पल भर में ही छूकर।

भय से व्याकुल फिर दुनिया ने 

प्रारंभ किया मेरा पूजन।

मैं नर, नारायण, नीलकंठ 

बन गया न इस में कुछ संशय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैं अखिल विश्व का गुरु महान्, 

देता विद्या का अमरदान।

मैंने दिखलाया मुक्ति-मार्ग, 

मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।

मेरे वेदों का ज्ञान अमर, 

मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।

मानव के मन का अंधकार, 

क्या कभी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर नभ में घहर-घहर, 

सागर के जल में छहर-छहर।

इस कोने से उस कोने तक, 

कर सकता जगती सौरभमय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैं तेज पुंज, तमलीन जगत

में फैलाया मैंने प्रकाश।

जगती का रच करके विनाश, 

कब चाहा है निज का विकास?

शरणागत की रक्षा की है, 

मैंने अपना जीवन दे कर।

विश्वास नहीं यदि आता तो 

साक्षी है यह इतिहास अमर।

यदि आज देहली के खण्डहर, 

सदियों की निद्रा से जगकर।

गुंजार उठे उंचे स्वर से

'हिन्दू की जय' तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


दुनिया के वीराने पथ पर 

जब-जब नर ने खाई ठोकर।

दो आंसू शेष बचा पाया 

जब-जब मानव सब कुछ खोकर।

मैं आया तभी द्रवित हो कर, 

मैं आया ज्ञानदीप ले कर।

भूला-भटका मानव पथ पर ‍

चल निकला सोते से जग कर।

पथ के आवर्तों से थक कर, 

जो बैठ गया आधे पथ पर।

उस नर को राह दिखाना ही

मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैंने छाती का लहू पिला 

पाले विदेश के क्षुधित लाल।

मुझ को मानव में भेद नहीं, 

मेरा अंतस्थल वर विशाल।

जग के ठुकराए लोगों को, 

लो मेरे घर का खुला द्वार।

अपना सब कुछ लुटा चुका, 

फिर भी अक्षय है धनागार।

मेरा हीरा पाकर ज्योतित 

परकीयों का वह राजमुकुट।

यदि इन चरणों पर झुक जाए 

कल वह किरीट तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैं ‍वीर पुत्र, मेरी जननी के 

जगती में जौहर अपार।

अकबर के पुत्रों से पूछो, 

क्या याद उन्हें मीना बाजार?

क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग में 

जलने वाला आग प्रखर?

जब हाय सहस्रों माताएं, 

तिल-तिल जलकर हो गईं अमर।

वह बुझने वाली आग नहीं, 

रग-रग में उसे समाए हूं।

यदि कभी अचानक फूट पड़े 

विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।

 

होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है 

कर लूं जग को गुलाम?

मैंने तो सदा सिखाया करना 

अपने मन को गुलाम।

गोपाल-राम के नामों पर कब 

मैंने अत्याचार किए?

कब दुनिया को हिन्दू करने 

घर-घर में नरसंहार किए?

कब बतलाए काबुल में जा 

कर कितनी मस्जिद तोड़ीं?

भूभाग नहीं, शत-शत मानव 

के हृदय जीतने का निश्चय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।


मैं एक बिंदु, परिपूर्ण सिन्धु है 

यह मेरा हिन्दू समाज।

मेरा-इसका संबंध अमर, 

मैं व्यक्ति और यह है समाज।

इससे मैंने पाया तन-मन, 

इससे मैंने पाया जीवन।

मेरा तो बस कर्तव्य यही, 

कर दूं सब कुछ इसके अर्पण।

मैं तो समाज की थाती हूं, 

मैं तो समाज का हूं सेवक।

मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि 

का कर सकता बलिदान अभय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, 

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।

 (साभार- मेरी इक्यावन कविताएं)


देश अब गलत रास्ते पर :- 

पूरे देश के हिन्दू इतने सहिष्मु कायर और उदास बन गए है कि ऐसे गैर जिम्मेदाराना भाषण देने वाले के खिलाफ मौन रहकर उस अल्प बुद्धि नेता की बातों का प्रकारांतर से समर्थन दे रहे हैं। 293 संसद सदस्य को चुनने वाली भारत के आधी से ज्यादा की आबादी को अपमानित कर रहे हैं। 

       अभी तक ना तो इनका पुतला जलाया गया ना कालिख फेंका गया और ना ही किसी न्यायालय ने ही स्वतः संज्ञान ही लिया है। यही बात यदि सत्ता पक्ष का कोई सदस्य कहा होता तो अब तक पूरे विश्व में हाय तोबा मच जाती। बीबीसी और अमरीका तक खलबली मच जाती। 

      इतना सशक्त सत्ता समर्थित दर्जनों संगठन ना जाने किस मजबूरी में इस संवैधानिक पद पर बैठे शक्स के विरुद्ध अकर्मण्य बने बैठे हैं। इनके बुद्धजीवी और आईटी सेल वाले पता नहीं किस संकेत की प्रतीक्षा कर रहे है। इनसे इनका संवैधानिक पद छीन कर किसी सुलझे विचार वाले को दिया जाना चाहिए।

      मैं भाजपा का एक अदना सा सदस्य हूं। मै गर्व से कहता हूँ कि मैं हिन्दू हूँ , मुझे किसी गैर हिन्दू से संविधान के दायरे में कोई आपत्ति नही है। किसी भी तरह से मैं हिंसक नहीं हूँ। मै राहुल गांधी के बयान की घोर निन्दा करता हूं। उनको देश से माफी मांगने की मांग करता हूं। साथ ही यह भी मांग करता हूं कि कांग्रेस किसी अन्य सक्षम व्यक्ति को विपक्ष का नेता बनाए और देश के प्रति अपना संवैधानिक भूमिका को निभाए।

            आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)