Friday, July 26, 2024
डॉ.सौरभ द्विवेदी , आर्थोपेडिक सर्जन की बस्ती मंडल में चिकित्सा सेवा
Saturday, July 20, 2024
पतित पावनी सरयू की महिमा आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी
भारतीय सनातन परम्परा में सप्त नगरियों का यह श्लोक विश्व विश्रुत है। इस श्लोक से इन नगरों का महत्व और स्पष्ट हो जाता है।
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिकाः॥
ये सात शहर अलग-अलग देवी-देवताओं से संबंधित हैं। अयोध्या श्रीराम से संबंधित है। मथुरा और द्वारिका का संबंध श्रीकृष्ण से है। वाराणसी और उज्जैन शिवजी के तीर्थ हैं। हरिद्वार विष्णुजी और कांचीपुरम माता पार्वती से संबंधित है। रामायण में बताया गया है कि अयोध्या राजा मनु द्वारा बसाई गई थी। यह नगर सरयू नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम, जैन धर्म से जुड़ी निशानियां दिखाई देती हैं। अयोध्या की महत्ता के बारे में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जन साधारण में निम्न कहावतें प्रचलित हैं-
गंगा बड़ी गोदावरी तीरथ बड़ो प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी
जहँ राम लियो अवतार।
अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा के 84 कोस की परिधि को सरयू मुख्य नदी रूप में अभिसिंचित करती ही है। साथ ही सरयू की अनेक सहायक नदियां जैसे वाशिष्ठी(,गोमती), घर्घर घाघरा महानद , सरयू, कुटिला मनोरमा,तमसा छोटी सरजू,वेदश्रुति बिसुही नदी,तिलोदकी गंगा’ तिलैया, कल्याणी, राम रेखा शारदा, सेती, बबई, अचिरावती /राप्ती,इरावती,छोटी गंडक और झरही आदि डेढ़ दर्जन अस्तित्व वाली और कुछ लुप्तप्राय नदियां भी इस भूभाग में अपनी खुशबू और शीतलता से आह्लादित और पाप शमन का काम करती रहती है।
पतित पावनी सरयू नदी :-
सरयू नदी का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है और रामायण के अनुसार सरयू नदी अयोध्या शहर के पास बहती है । भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। यह माना जाता है कि यह पवित्र नदी शहर की अशुद्धियों और पापों को धोती है। पुराणों में वर्णित है कि सरयू नदी से भगवान विष्णु के उत्सव प्रकट होते हैं। आनंद रामायण में उल्लेख है कि प्राचीन काल में शंखासुर दैत्य / मधु कैटभ ने वेद को चुराकर समुद्र में डाल दिया था । तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में धारण कर दैत्य का वध किया था और ब्रह्मा को वेदों में अपना वास्तविक स्वरूप धारण कराया था। उस समय हर्ष के कारण भगवान विष्णु की आंखों से प्रेमाश्रु टपक पड़े थे। ब्रह्मा ने उस प्रेमाश्रु को मानसरोवर में डाल कर उसे सुरक्षित कर लिया। इस जल को महापराक्रमी वैवस्वत महाराज ने मानसरोवर से बाहर तक बाण के प्रभाव से प्रकट किया। यह भी उल्लेख मिलता है कि ऋषि वशिष्ठ की तपस्या से सरयू का प्रादुर्भाव हुआ है। जिस प्रकार गंगा नदी को भगीरथ धरती पर लाए थे। उसी प्रकार सरयू नदी को भी धरती पर लाया गया था।राजा मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए जिन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ से अयोध्या में सरोवर निर्माण की बात कही। जिसके बाद वशिष्ठ ऋषि ने अपने पिता ब्रम्हा से सरयू के अवतरण की प्रार्थना किया था ।ब्रम्हा जी ने अपने कमंडल से ही सरयू का अवतरण कराया। इस प्रकार भगवान विष्णु की मानस पुत्री सरयू नदी को धरती पर लाने का श्रेय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को ही जाता है । सरयू नदी का नाम सुनते ही मन राम की नगरी में अनायास ही पहुंच जाता है।
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि,
उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।
नेपाल से डोरीगंज (बलिया) तक कुल सरयू की लंबाई- 1080 किमी है। इनमे यह नेपाल में 507 किमी व भारत में 573 किमी तक विस्तारित है। इसकी लंबाई बस्ती में 80 किमी, गोरखपुर में 77 किमी है।
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो सरयू नदी वास्तव में शारदा नदी की ही एक सहायक नदी है। यह नदी उत्तराखंड में शारदा नदी से अलग होकर उत्तर प्रदेश की भूमि के माध्यम से अपना प्रवाह जारी रखती है। यह गंगा नदी की सात सहायक नदियों में से एक है और इतनी पवित्र मानी जाती है कि यह मानव जाति की पापों को धो देती है। कवि राम धारी सिंह दिनकर ने कहा है –
वह मृतकों को मात्र पार उतारती,
यह जीवितों को यहीं से तारती।
शिव और पार्वती मां भी इसे लाने का प्रयास किए :-
स्कंद पुराण में वर्णित कथा अनुसार एक समय मार्कंडेय नाम के ऋषि नील पर्वत पर तपस्या कर रहे थे और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ देवलोक से विष्णु की मानस पुत्री सरयू को लेकर आ रहे थे। लेकिन तपस्या में लीन मार्कंडेय ऋषि के कारण सरयू नदी को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल रहा था। इस पर ब्रह्माजी और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने शिवजी को अपनी व्यथा सुनाई और संकट को दूर करने का निवेदन किया। इस पर आदिदेव महादेव ने तब बाघ का रूप धारण किया और माता पार्वती ने गाय का रूप धारण किया। मां पार्वती गाय के रूप में पास ही घास चरने लगीं। तभी वहां बाघ के रूप में पहुंचे महादेव ने गर्जना की, भयंकर दहाड़ सुनकर गाय डर के कारण जोर-जोर से रंभाने लगी। इससे मार्कंडेय ऋषि की समाधि भंग हो गई। जैसे ही मार्कंडेय ऋषि गाय को बचाने को दौड़े तो सरयू नदी आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया। भगवान शिव ने जिस स्थान पर शेर का रूप धारण किया था। बाद में उस स्थान का नाम व्याघ्रेश्वर तथा बागेश्वर पड़ा और यहां भगवान शिव के बागनाथ मंदिर की स्थापना की गई।
अयोध्या में स्थित सरयू जी में स्नान करने से कलिकाल के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अब क्यूं अयोध्या में ही सरयू स्नान से पाप नष्ट हो जाते हैं इसका उत्तर है । अयोध्या अपने आप में पूर्ण ब्रम्ह है और सगुण रूप श्री सरयू जी हैं । यह मृत्यु लोक में नही है अयोध्या भगवान् विष्णु के चक्र पे बसी है ।
अयोध्या च पूर्ण ब्रम्ह सरयू सगुणन पुमान तन्नि बासी जगन्नाथम सत्यं सत्यं बदम्यहम।
अयोध्या में रहने वाले भगवान् विष्णु के तुल्य हैं । चुकी अयोध्या ब्रम्ह स्वरुप होने के कारण इनको ब्रम्ह स्वरूपिणी कहा गया । सरयू का तात्पर्य स से सीता रा से राम जू इसलिए सीता राम जू द्रव रूप में होके भक्त के भावों से इस जल को सीता राम जू का सगुण रूप माना गया है । जैसा की कहा गया है –
सरयू सगुणन पुमान
इसलिए धर्मावलम्बी सरयू जल से कुल्ला नही करते. सरयू जल से कुल्ला करने वालों की गति नही होती । भगवान् श्री राम जी का श्री मुख बचन है ।
जन्मभूमि मम पूरी सुहावनि,
उत्तर दिशि सरयू बह पावनि।
यह शब्द भी स्पस्ट करता है की सरयू माता का महात्म्य अयोध्या में सही स्थित सरयू से सम्बन्ध रखता है । आगे भगवान् राम फिर कहते हैं कि यहाँ स्नान करने वाले मेरा सायुज्य पाते हैं।
जा मज्जन ते विनाहि प्रयाशा
मम समीप नर पावहि वासा।
श्री अयोध्या में स्थित सरयू मैया में स्नान करने से भगवान् श्री राम के समीप रहने का अधिकारी हो जाता है । इसीलिए श्री गोस्वामी तुलसी दास जी श्री अयोध्या और सरयू मैया का अलग अलग बर्णन नही किये । एक ही चौपाई में अयोध्या और सरयू के महात्म्य का वर्णन किया जैसा की मानस में मिलता है ।
बंदउ अवध पूरी अति पावनि,
सरयू सरिकलि कलुष नसावहि।
तात्पर्य कि अयोध्या में ही स्थित सरयू कलिकाल के पाप को नष्ट करने वाली हैं । इनके महात्म्य के विषय में अन्यान्य ग्रंथों में जो मिलता है उस महात्म्य को बताने की प्रयास कर रहा हूँ ।
मन्वन्तर सहस्त्रेस्तु काशी वासेशु जद फलं
तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते।
चारो युग जब 71 बार बीत जाता है तब एक मन्वंतर होता है इस प्रकार एक हजार मन्वंतर काशी में वास कीजिये गंगा में स्नान करके विश्वनाथ में जल चढाते हुए 1000 मन्वंतर में जो फल आपको प्राप्त होगा वह अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है ।
मथुरायाम कल्प मेकं बसते मानवो यदि
तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते।
मथुरा में 1 कल्प यानी 4 अरब बत्तीस करोड़ मनुष्य के दिन से जब बीत जाता है तब एक कल्प होता है । 1 कल्प मथुरा में वास करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है । भगवान राम ने लक्ष्मण को सरयू नदी के महत्व से अवगत कराया था।सरयू नदी में स्नान के महत्व का वर्णन तुलसीदास कृत रामचरित मानस में है। भगवान राम ने लक्ष्मण को सरयू नदी की पावनता के बारे में बताते हुए कहा था कि सरयू नदी इतनी पावन है कि सभी तीर्थ दर्शन और स्नान के लिए आते है। सरयू नदी में स्नान करने मात्र से सभी तीर्थों में दर्शन करने का पुण्य मिल जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सरयू नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करता है उसे सभी तीर्थों के दर्शन करने का फल मिल जाता है। यह है अयोध्या में सरयू मैया का महात्म्य तुलसी दास जी ने भी लिखा है-
कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार।
एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास।।
तुलसीदास जी को उपरोक्त प्रमाण कम लगा इसलिए इन्होने अपने ग्रन्थ में सरयू महात्म्य को और भी विस्तृत रूप से बर्णन किया है ।कालिदास के काव्य रघुवंश में राम सरयू नदी को जननी के समान ही मानते थे।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )
Saturday, July 13, 2024
कपिल भगवान और गंगा सागर आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
Thursday, July 11, 2024
बावला तपस्वी राजकुमार असमनजस (राम के पूर्वज 25)आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
Friday, July 5, 2024
क्या सचमुच अयोध्या शापित है? आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
सब प्रभु श्री राम की लीला :-
जो घटित हुआ, हो रहा और जो होगा वह सब प्रभु श्री राम की लीला है। अयोध्या का गौरव सदियों से बार बार बिखरता रहा। अब जैसे- जैसे अयोध्या अपने आप को संयोजित कर रही है, समेट और सहेज रही है तो क्रिया प्रतिक्रिया और दावेदारी भी बढ़ती जा रही है। अयोध्या कितनी बार बसी और कितनी बार उजाड़ हुई, इसका हिसाब करना सहज नहीं है।
सच पूछिये तो भगवान श्रीरामचन्द्र की लीला- संवरण के बाद ही अयोध्या पर विपत्ति आई। कोशलराज के दो भाग हुये। श्रीरामचन्द्र के ज्येष्ठ कुमार महाराज कुश ने अपने नाम से नई राजधानी " कुशावती” बनाई और छोटे पुत्र लव ने "शरावती"/ श्रावस्ती” की शोभा बढ़ाई। राजा के बिना राजधानी कैसी? अयोध्या थोड़े ही दिनों पीछे आप से आप श्रीहीन हो गई।
अयोध्या के दुर्दशा के समाचार सुन महाराज कुश फिर अयोध्या में आये और कुशावती ब्राह्मणों को दानकर पूर्वजों की प्यारी राजधानी और उनकी जन्म-भूमि अयोध्या में रहने लगे। शाक्यसिंह बुद्धदेव के जन्म से फिर अयोध्या का पता चलता है और कुछ कुछ वृत्तान्त भी मिलता है। बुद्धदेव कपिलवस्तु में उत्पन्न हुये, श्रावस्ती में रहे और कुशीनगर वा कुशीनर में निर्वाण को प्राप्त हुए। यह सब स्थान कोशल देश में विद्यमान थे।
उन दिनों कोशल वा अवध की राजधानी का राज सिंहासन 'श्रावस्ती' में था जिसको भगवान श्रीरामचन्द्रदेव के कनिष्ठ पुत्र लव ने 'शरावती' के नाम से बसाकर अपनी राजधानी बनाया था। अंग्रेजी राज में अयोध्या पाँच छः हजार की आबादी का एक छोटा सा नगर सरयू नदी के बायें तट पर बसा था।
अवधेश कुमार सांसद फैजाबाद
विकास सत्ता रहने पर ही निर्भर :-
भारतीय लोकतंत्र में एक अहम बुराई यह है कि जिस निर्वाचन क्षेत्र से सत्ताधारी पार्टी चुनाव जीतती है या उस क्षेत्र के प्रतिनिधि को सत्ता में महत्व पूर्ण ओहदा मिलता है,वहीं विकास का कार्य होता है, वहीं रौनक रहती है। जहां से सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि नहीं चुने जाते हैं, वहां की सड़कें भी वीरान हो जाती हैं। यहां तक उन क्षेत्रों को पर्याप्त रोशनी के लिए बिजली भी नहीं मिलती। सारे चालू प्रोजेक्ट ठप पड़ जाते हैं, नई योजनाएं तो दूर की कौड़ी हो जाती हैं। रामपुर, सैफई, मैनपुरी, इटावा,अमेठी, रायबरेली, वाराणसी, अयोध्या ,मथुरा और गोरखपुर में इस प्रकार का लक्षण और घटना देखी और सुनी जा सकती है।
सांसद का अयोध्या में स्वागतक्या अयोध्या के साथ भी कुछ होने वाला है
जबसे केंद्र में सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को संसदीय चुनावों में आपेक्षित सीटें नहीं मिली है, सोशल मीडिया पर विपक्ष के समर्थन में लोगअयोध्या के शापित होने की बात करने लगे हैं। उन्हें इस बात का डर है कि एक बार फिर अयोध्या पर सीता माता के श्राप की छाया तो नहीं पड़ गई है? फैजाबाद सीट हारने को अयोध्या के हारने की प्रोपगंडा क्यों फैलाया जा रहा है?
सीता माता के श्राप की छाया :-
चुनाव के नतीजों के बाद अयोध्या और माता सीता के श्राप की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पौराणिक कथाओं केअनुसार, जब श्री राम ने लोगों की बातों में आकर माता सीता को एक अदना सा धोबी के कहने पर राजधर्म का परिपालन करते हुए अयोध्या राज्य से निकाल दिया था, तब माता सीता ने अयोध्या को सुखी ना रहने का श्राप दिया था। कहा जाता है कि इस श्राप के कारण ही अयोध्या में आपेक्षित विकास नहीं हो पाता रहा है।
राजा प्रजा में तालमेल का अभाव:-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अयोध्या की जनता का अपने शासकों के साथ तालमेल कम होता है। श्री राम के बाद, उन्होंने किसी भी शासक को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया। राजा सगर के पुत्र असमंजस और असमंजस के पुत्र अंशुमान को भी अयोध्या की जनता ने राज्य से निकलने पर मजबूर कर दिया था।
पौराणिक कथाएं राजनीति के अंग बने :-
अयोध्या का चुनाव परिणाम और इसके पीछे की पौराणिक कथाएं राजनीतिक और सामाजिक बातों का हिस्सा बन गई हैं। अब देखना ये होगा कि आने वाले समय में अयोध्या में विकास की गति कैसी रहती है और क्या जनता का तालमेल अपने नए नेताओं के साथ सही रहता है की नहीं है।
राजा द्वारा भी किंवदंती की पुष्टि :-
एक बार टीवी चैनल से बात करते हुए 'अयोध्या के राज परिवार के प्रतिनिधि ' के रूप में जाने जाने वाले श्री बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा ने कहा था , “ स्थानीय किंवदंती के मुताबिक, जब भगवान राम ने अफवाहों की वजह से माता सीता को अयोध्या से बाहर निकाला था, तो उन्होंने श्राप दिया था। कई अन्य लोगों का भी मानना है कि इस अभिशाप की वजह से ही शहर में कभी भी तीव्र गति से विकास नहीं हुआ।”
एकाएक होटल व्यवसाय में सहसा वृद्धि:-
जिस अयोध्या में कुछ साल पहले तक एक भी बढ़िया होटल नहीं था, वहां अब फाइव स्टार होटल बनाने की परमिशन मांगने वालों की लाइन लग गई है। अयोध्या में फाइव स्टार होटल बनाने की अनुमति मांगने के लिए प्रशासन को 100 से ज्यादा आवेदन मिले हैं। इस परिप्रेक्ष्य में लोधा ग्रुप, ताज होटल ग्रुप तथा अमिताभ बच्चन जैसे अनेक नामी गिरामी लोग और यहां पदस्थ अधिकारी सांसद और विधायक पर भी उंगलियां उठने लगी है।
अयोध्या ने स्वयं आकार लिया था :-
पौराणिक कथाओं की मानें तो अयोध्या को किसी ने बसाया नहीं था। इस शहर ने अपने आप ही आकार ले लिया और साकेत नाम से इसकी पहचान बन गई। भारत में सात धार्मिक शहरों की चर्चा होती है, जिसमें हर शहर की उत्पत्ति की कोई न कोई कहानी है पर अयोध्या शहर कैसे बना इसकी कोई कहानी नहीं है। जैसे काशी के बारे में कहा जाता है कि यह शंकर भगवान के धनुष पर स्थित है। द्वारका के बारे में कहा जाता है कि इसे कृष्ण ने बसाया पर अयोध्या की कोई किवदंती भी नहीं है।
अयोध्या राम से पहले भी उत्कृष्ट रही:-
राम के पहले उनके कई पुश्तों ने यहां राज किया है। कालिदास लिखते हैं कि राजा दशरथ के समय तक अवधपुरी समृद्ध, सुंदर और अच्छी तरह से किलेबंद शहर था। समय के साथ अयोध्या के नाम बदलते रहे जैसे कोसलपुरी, साकेत आदि। इतिहास के पन्नों के पलटने पर अयोध्या को अलग-अलग 12 नामों से जाना जाता था. जिनके नाम हैं, अयोध्या, आनंदिनी, सत्यनामा, सत, साकेत, कोशला, विमला, अपराजिता, ब्रह्मपुरी, प्रमोदवन, सांतानिकलोका और दिव्यलोका। शिव संहिता के पांचवे पटल के बीसवें अध्याय में कहा गया है –
अयोध्या नंदिनी सत्यनामा साकेत इत्यापि।
कोशला राजधानी च ब्रह्मपुरपराजिता।
जिस तरह यहां का इतिहास शैव धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, वैष्णव धर्म आदि का केंद्र बनता रहा, उससे यही लगता है कि यह शहर हमेशा आबाद रहा होगा। फिर भी इसे शापित क्यों कहा जाता है, यह समझ में नहीं आता है।
साहित्यकारों की निगाह में अयोध्या :-
हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार मृणाल पांडेय एक ऑर्टिकल में लिखती हैं कि 1858 की सर्दियों में विष्णु भट्ट ने जिस भयभीत शहर को देखा, वह निश्चित रूप से त्रेता युग की चमचमाती पौराणिक अयोध्या नहीं थी।
अमृतलाल नागर ने 1957 में जो अयोध्या देखी, उसके स्मारकों पर घास-फूस उग आए थे और लोग ग़दर के बाद हुए अपमान को साझा करने से कतराते थे, वह फिर भी अलग थी।
वाल्मीकि से लेकर भवभूति और विद्यापति तक के कवियों और लोकगीतों के अनाम रचनाकारों ने राम राज्य की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, जिसने एक निर्दोष महिला सीता को दंडित किया।
राम ने अयोध्या में राज्य नहीं उपासना की थी:-
'जौं अनीति कछु भाषौं भाई,
तौ मोहि बरजहूं भय बिसराई ।'
श्रीराम अयोध्यावासियों से कहते हैं कि अगर मैं भी कुछ अनीति की बात कहूं तो आप सभी भय को त्याग कर मुझे रोक देना । तभी नारद वाल्मीकि से कहते हैं कि -
“रामो राजम उपासित्वा
ब्रह्मलोकं प्रयास्यति।।”
(यानि राम अपने राज्य की उपासना करने के बाद ब्रह्मलोक चले गए ।)
आखिर राम क्यों अपनी अयोध्या का शासन न करके उसकी उपासना करते रहे । क्योंकि राम जानते थे कि अयोध्या और वहां की प्रजा का मिजाज किसी भी शासन को स्वीकार नहीं करता। श्री मिश्र लिखते हैं कि यही कारण रहा कि राम ने पहले अपने वंश के राजाओं का इतिहास देखा और जब वो ये जान गए थे कि अयोध्या किसी की नहीं सुनती तो वो ब्रह्मलोक जाने से पहले अयोध्या किसी को नहीं सौंप गए । न तो अपने पुत्रों लव और कुश को और न ही अपने भाइयों को। उन्होंने प्रकांतर से हनुमान जी को अयोध्या की जिम्मेदारी सौंपी है।
अयोध्या को किसी को नही दिया गया:-
राम ने अयोध्या किसी को नहीं दी. दोनों पुत्रों यानि कुश को कसूर ( पंजाब) और लव को लाहौर में राज्य की स्थापना करने का आदेश दिया। शत्रुघ्न के पुत्रों को मथुरा तो लक्ष्मण के पुत्रों को लखनऊ का क्षेत्र दिया । राम अपने साथ अयोध्या की जनता को ही नहीं उसके सभी प्राणियों यहां तक की पशु पक्षियों को भी अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए और अयोध्या वीरान हो गईं। कहा जाता है कि अयोध्या की देवी ने खुद कुश के पास जा कर अयोध्या को फिर से बसाने की प्रार्थना की , लेकिन अयोध्या फिर वैसी नहीं रह गईं जैसी श्रीराम के वक्त थी।
राम जानते थे कि ये वही अयोध्या की जनता है जिसने उनके पूर्वज राजा सागर के पुत्र असमंजस को राज्य से निकालने के लिए विवश कर दिया था, क्योंकि असमंजस अयोध्या के बच्चों को सरयू में डूबो कर मार डालता था। अंशुमान अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए राजकाज छोड़ ताउम्र तपस्या में ही लीन रहे।
अयोध्या अपने शासकों से कम ही बनती है:-
ये वही अयोध्या है जो राजा दशरथ के राम को वनवास पर भेजे जाने के फैसले का विरोध करते हुए राम के साथ चल पड़ती है। और ये वही अयोध्या है जो सीता की पवित्रता पर सवाल उठाकर उनकी अग्नि-परीक्षा सुनिश्चित करवाती है। अयोध्या की अपने शासकों से जरा कम ही बनती है। वह उनके अधीन तो रहती है पर हर अच्छे बुरे कार्य पर उसकी निगाहें भी लगी रहती है। भास ने प्रतिमा नाटक में राम की अंतर्दशा इस प्रकार कहा है -
"स्नेहं दयां च सौख्यं च,
यदि वा जानकीमपि,
आराधनाय लोकस्य
मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा।"
(अर्थात् लोकाभिराम भगवान श्रीराम ने कहा कि, न केवल स्नेह, दया, करुणा, मैत्री अपितु जगज्जननी जानकी का भी लोकहित हेतु परित्याग करने में लेशमात्र भी दुःख नहीं होगा।प्रजापालन में तत्पर श्री राम का यह आदर्श राजधर्मावलम्बियों के लिए अनिवार्य रूप से अनुकरणीय व पालनीय हो तो रामराज्य का स्वप्न साकार होने में लेशमात्र भी सन्देह नहीं है।) "
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)
Tuesday, July 2, 2024
एस पी ग्रुप ने खोलाआधुनिक सुविधाओं से युक्त बस्ती मंडल में "एस आर डी हास्पिटल "
क्या हिंदू समाज हिसक है ? आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
राहुल गांधी का संसद में बयान:-
कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कल संसद में बहुत ही असभ्य गैर जिम्मेदाराना और विवादित बयान दिया है। ऐसा बयान करोड़ों हिंदुओं की भावना को आहत करने वाला है। उन्होंने कहा कि, "जो लोग अपने आपको हिंदू कहते हैं, वो चौबीसों घंटे हिंसा, हिंसा, हिंसा; नफरत, नफरत, नफरत; असत्य, असत्य, असत्य करते रहते हैं। "
राहुल के इस बयान पर लोकसभा में भारी हंगामा हो गया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खड़े होकर राहुल के इस विचार पर आपत्ति जताई। हालांकि, जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि "उन्होंने पीएम मोदी, बीजेपी और आरएसएस को नफरती और हिंसक कहा है, ना कि पूरे हिंदू समाज को।"
प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल के बयान पर आपत्ति जताते हुए सिर्फ इतना कहा था, 'ये विषय बहुत गंभीर है। पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना ये गंभीर विषय है।'
इतने पर राहुल गांधी बोलने लगे, 'नरेंद्र मोदी पूरे हिंदू समाज नहीं हैं। आरएसएस पूरा हिंदू समाज नहीं है।'
गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि," हिंसा की भावना को किसी धर्म से जोड़ना ठीक नहीं। संवैधानिक पद पर बैठे राहुल गांधी से गुजारिश है कि माफी मांगें।"
सरकार ने बोला राहुल पर हमला:-
हिंदुत्व की राजनीति की पैरोकार बीजेपी ने हिंदुओं को लेकर राहुल के बयान को हवा देनी शुरू कर दी है.सदन में पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने राहुल के बयान पर आपत्ति जताई तो सदन के बाहर कई मंत्रियों ने मोर्चा संभाल लिया है.रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि राहुल गांधी के इस बयान ने पूरे हिंदू समाज का अपमान किया है.वैष्णव का कहना है कि 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने हिंदुओं को आतंकवादी कहा था. वहीं 2013 में उस समय के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने फिर हिंदुओं को आतंक - वादी बताया था तो राहुल ने खुद 2021 में कहा था कि हिंदुत्ववादियों को देश से बाहर निकाल देना चाहिए.आज राहुल गांधी ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक और असत्यवादी कहा है।
राहुल गांधी को किसका मिला साथ:-
हालांकि कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दल इस मुद्दे पर राहुल गांधी के साथ नजर आ रहे हैं. राहुल के भाषण पर उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा, "हिंदुओं का अपमान नहीं कर सकते. उन्होंने(राहुल गांधी) स्पष्ट बोला है, उन्होंने बीजेपी के बारे में बोला है, बीजेपी के नेताओं के बारे में बोला है.”
राजनीति चमकाने के लिए प्रोपगंडा :-
अभी कुछ दिन पहले इमरजेंसी की पूरे देश में भर्त्सना हुई है फिर भी उन्हें अपने कृत्य से कोई सीख नहीं लेना है और संसद में केवल प्रोपगंडा ही फैलाना है। इन्ही की पार्टी के शासन में दिल्ली में दिन दहाड़े हजारों सिख भाइयों का कत्लेआम हुआ। ये इस पर मौन रहते हैं और सही दिशा में चल रहे देश में अपनी तुच्छ राजनीति चमकाने के लिए शिव जी के चित्र दिखाकर अभय की बात कर रहे हैं। नेता विपक्ष को पहले भाषण में सदन के संग पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए।
सहिष्णुता के लिए अनेक संवैधानिक संगठन सक्रिय हैं:-
भारत के धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक रूप से सहिष्णु संविधान , सरकार सहित समाज के विभिन्न पहलुओं में व्यापक धार्मिक प्रतिनिधित्व, भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसे स्वायत्त निकायों द्वारा निभाई गई सक्रिय भूमिका और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए जा रहे जमीनी स्तर के काम के बावजूद, धार्मिक हिंसा के छिटपुट और कभी-कभी गंभीर कृत्य होते रहते हैं क्योंकि धार्मिक हिंसा के मूल कारण अक्सर भारत के इतिहास, धार्मिक गतिविधियों और राजनीति में गहरे तक समाए रहते हैं।
अंग्रेजों की चाल:-
कई इतिहासकारों का तर्क है कि स्वतंत्र भारत में धार्मिक हिंसा भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटेन के नियंत्रण के युग के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा अपनाई गई फूट डालो और राज करो की नीति की विरासत है , जिसमें स्थानीय प्रशासकों ने हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया, एक ऐसी रणनीति जो अंततः भारत के विभाजन में परिणत हुई ।
अटल जी की हिन्दू धर्म पर कविता : -
इस कविता में हिन्दू धर्म के मर्म को बहुत ही अच्छे ढंग से वक्त किया गया है।देश को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए--
"हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय"
मैं शंकर का वह क्रोधानल
कर सकता जगती क्षार-क्षार।
डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं
जिसमें नचता भीषण संहार।
रणचण्डी की अतृप्त प्यास,
मैं दुर्गा का उन्मत्त हास।
मैं यम की प्रलयंकर पुकार,
जलते मरघट का धुआंधारय।
फिर अन्तरतम की ज्वाला से,
जगती में आग लगा दूं मैं।
यदि धधक उठे जल, थल,
अम्बर, जड़, चेतन तो कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैं आदि पुरुष, निर्भयता का
वरदान लिए आया भू पर।
पय पीकर सब मरते आए,
मैं अमर हुआ लो विष पी कर।
अधरों की प्यास बुझाई है,
पी कर मैंने वह आग प्रखर।
हो जाती दुनिया भस्मसात्,
जिसको पल भर में ही छूकर।
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने
प्रारंभ किया मेरा पूजन।
मैं नर, नारायण, नीलकंठ
बन गया न इस में कुछ संशय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैं अखिल विश्व का गुरु महान्,
देता विद्या का अमरदान।
मैंने दिखलाया मुक्ति-मार्ग,
मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार,
क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,
सागर के जल में छहर-छहर।
इस कोने से उस कोने तक,
कर सकता जगती सौरभमय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैं तेज पुंज, तमलीन जगत
में फैलाया मैंने प्रकाश।
जगती का रच करके विनाश,
कब चाहा है निज का विकास?
शरणागत की रक्षा की है,
मैंने अपना जीवन दे कर।
विश्वास नहीं यदि आता तो
साक्षी है यह इतिहास अमर।
यदि आज देहली के खण्डहर,
सदियों की निद्रा से जगकर।
गुंजार उठे उंचे स्वर से
'हिन्दू की जय' तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
दुनिया के वीराने पथ पर
जब-जब नर ने खाई ठोकर।
दो आंसू शेष बचा पाया
जब-जब मानव सब कुछ खोकर।
मैं आया तभी द्रवित हो कर,
मैं आया ज्ञानदीप ले कर।
भूला-भटका मानव पथ पर
चल निकला सोते से जग कर।
पथ के आवर्तों से थक कर,
जो बैठ गया आधे पथ पर।
उस नर को राह दिखाना ही
मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैंने छाती का लहू पिला
पाले विदेश के क्षुधित लाल।
मुझ को मानव में भेद नहीं,
मेरा अंतस्थल वर विशाल।
जग के ठुकराए लोगों को,
लो मेरे घर का खुला द्वार।
अपना सब कुछ लुटा चुका,
फिर भी अक्षय है धनागार।
मेरा हीरा पाकर ज्योतित
परकीयों का वह राजमुकुट।
यदि इन चरणों पर झुक जाए
कल वह किरीट तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैं वीर पुत्र, मेरी जननी के
जगती में जौहर अपार।
अकबर के पुत्रों से पूछो,
क्या याद उन्हें मीना बाजार?
क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग में
जलने वाला आग प्रखर?
जब हाय सहस्रों माताएं,
तिल-तिल जलकर हो गईं अमर।
वह बुझने वाली आग नहीं,
रग-रग में उसे समाए हूं।
यदि कभी अचानक फूट पड़े
विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है
कर लूं जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया करना
अपने मन को गुलाम।
गोपाल-राम के नामों पर कब
मैंने अत्याचार किए?
कब दुनिया को हिन्दू करने
घर-घर में नरसंहार किए?
कब बतलाए काबुल में जा
कर कितनी मस्जिद तोड़ीं?
भूभाग नहीं, शत-शत मानव
के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
मैं एक बिंदु, परिपूर्ण सिन्धु है
यह मेरा हिन्दू समाज।
मेरा-इसका संबंध अमर,
मैं व्यक्ति और यह है समाज।
इससे मैंने पाया तन-मन,
इससे मैंने पाया जीवन।
मेरा तो बस कर्तव्य यही,
कर दूं सब कुछ इसके अर्पण।
मैं तो समाज की थाती हूं,
मैं तो समाज का हूं सेवक।
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि
का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन,
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!।
(साभार- मेरी इक्यावन कविताएं)
देश अब गलत रास्ते पर :-
पूरे देश के हिन्दू इतने सहिष्मु कायर और उदास बन गए है कि ऐसे गैर जिम्मेदाराना भाषण देने वाले के खिलाफ मौन रहकर उस अल्प बुद्धि नेता की बातों का प्रकारांतर से समर्थन दे रहे हैं। 293 संसद सदस्य को चुनने वाली भारत के आधी से ज्यादा की आबादी को अपमानित कर रहे हैं।
अभी तक ना तो इनका पुतला जलाया गया ना कालिख फेंका गया और ना ही किसी न्यायालय ने ही स्वतः संज्ञान ही लिया है। यही बात यदि सत्ता पक्ष का कोई सदस्य कहा होता तो अब तक पूरे विश्व में हाय तोबा मच जाती। बीबीसी और अमरीका तक खलबली मच जाती।
इतना सशक्त सत्ता समर्थित दर्जनों संगठन ना जाने किस मजबूरी में इस संवैधानिक पद पर बैठे शक्स के विरुद्ध अकर्मण्य बने बैठे हैं। इनके बुद्धजीवी और आईटी सेल वाले पता नहीं किस संकेत की प्रतीक्षा कर रहे है। इनसे इनका संवैधानिक पद छीन कर किसी सुलझे विचार वाले को दिया जाना चाहिए।
मैं भाजपा का एक अदना सा सदस्य हूं। मै गर्व से कहता हूँ कि मैं हिन्दू हूँ , मुझे किसी गैर हिन्दू से संविधान के दायरे में कोई आपत्ति नही है। किसी भी तरह से मैं हिंसक नहीं हूँ। मै राहुल गांधी के बयान की घोर निन्दा करता हूं। उनको देश से माफी मांगने की मांग करता हूं। साथ ही यह भी मांग करता हूं कि कांग्रेस किसी अन्य सक्षम व्यक्ति को विपक्ष का नेता बनाए और देश के प्रति अपना संवैधानिक भूमिका को निभाए।
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदीलेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)