Tuesday, August 31, 2021

नोवा हॉस्पिटल बस्ती में कूल्हा प्रत्यारोपड में चमत्कारिक सुधार

बस्ती। 60 वर्षीय अमानीगंज थाना सोनहा निवासी प्रह्लाद की कूल्हे की हड्डी  चोट लगने से दो माह पूर्व टूट गई थी। । वह चलने फिरने में असमर्थ हो गए थे। पैसे के अभाव में वह बिस्तर पकड़ लिए थे। इधर उधर भटकने के बाद उनके परिजनों द्वारा उन्हें नोवा हॉस्पिटल की जानकारी मिली तो परिजन डाक्टर सौरभ द्विवेदी से अपनी समस्या बताई । डा साहब ने मरीज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अत्यन्त रियायती दर पर अपने हास्पिटल में भर्ती करके 10 दिन पूर्व मरीज के कूल्हे का प्रत्यारोपण किया गया । डा.सौरभ द्विवेदी ने अपने दक्ष हाथों से जटिल सर्जरी करके मरीज का जीवन नर्क होने से बचाया और एक मरीज को जीवनदान दिया है।
डॉ0 सौरभ द्विवेदी बस्ती जनपद के युवा ऑर्थो सर्जन है जो कई जटिल सर्जरी करके कीर्तिमान बना रहे है और मरीजो को स्वास्थ्य लाभ दिला रहे है , जिससे गरीब मरीजो को सर्जरी हेतु महानगरों का चक्कर नही लगाना पड़ रहा।  डॉ0 सौरभ द्विवेदी बताया कि हिप रिप्लेसमेंट के ऑपरेशन के पश्चात मरीज में अमूमन 40से 45  या दिन इससे भी ज्यादा समय में सुधार आने की संभावना होती है। परंतु डा सौरभ द्विवेदी की तकनीक और दक्ष हाथों से इस केस में इस तरह का चमत्कारी सुधार 10 दिन में ही देखने को मिला और मरीज चलने फिरने लायक हो गया  है।डा सौरभ ने बताया कि नोवा हॉस्पिटल में इस तरह की जटिल सर्जरी हमेशा चलता रहता है। इस प्रकार की सर्जरी बस्ती में नहीं हो पाती है और मरीज को सर्जरी लखनऊ और बनारस कराना पड़ता है। इस प्रकार के केस के सुधार में महीनो लग जाते हैं। परंतु नोवा हैसपिटल के आपरेशन  में जल्द से जल्द सुधार और मूवमेंट देखा गया है। नोवा हैस्पिटल में प्रायः दुर्लभ से दुर्लभ केस का उच्च कोटि की सर्जरी बहुत ही रियायत दर से किया जाता रहा है।


डाक्टर सौरभ द्विवेदी से 7017673172  नंबर पर कॉल करके हड्डीरोग से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

Saturday, August 28, 2021

तुम खुश रहो फूलो फलों ये है दुवा मेरी।

अच्छी खासी घर गृहस्थी  नजर लग गई।
जिन पे किया एतबार उनसे दूरी बन गई।।
कुछ कर्म अच्छे थे जो कट गया सफर।
आगे  क्या होगा कुछ मालूम ना जानेगर।।

तुम खुश रहो फूलो फलों ये है  दुवा मेरी।
खुशियों को तेरी देख जिंदगी कटेगी मेरी।
कुछ लिया पूर्वजों से कुछ दे दिया जगत।
सबकी ज़िम्मेदारी क्या दोगे तुम अब सत।।

आगे बढ़ो आगे बढ़ो ये दुनिया है देखती।
 सुकर्म की ही पूजा हर एक वक्त देखती।
अपनी जड़ों से जो जुड़ा रहेगा हरा भरा।
वर्ना आंधी वर्षा में जायेगा सब भर भरा।।

Saturday, August 21, 2021

नोवा हॉस्पिटल बस्ती में स्पाइन की सफल सर्जरी


बस्ती। 60 वर्षीय कलवारी निवासी खुदी राम की रीढ़ की हड्डी  छत के गिरने से टूट गई थी। उनके पैर में लकवा मार गया था। वह चलने फिरने में असमर्थ हो गए थे। इधर उधर भटकने के बाद उनके परिजनों द्वारा उन्हें नोवा हॉस्पिटल की जानकारी मिली तो परिजन डाक्टर सौरभ द्विवेदी से अपनी समस्या बताई । उन्हें 19 अगस्त को अपने हैस्पिटल में भर्ती करके 20 अगस्त को खुदी राम का रीढ़ की हड्डी (स्पाइन ) का सफल आपरेशन किया गया ।

डॉ0 सौरभ द्विवेदी ने जटिल सर्जरी करके मरीज का जीवन नर्क होने से बचाया। डॉ0 सौरभ द्विवेदी ने एक जटिल सर्जरी करके एक मरीज को जीवनदान दिया है। बताते चले कि डॉ0 सौरभ द्विवेदी बस्ती जनपद के युवा ऑर्थो सर्जन है जो कई जटिल सर्जरी करके कीर्तिमान बना रहे है और मरीजो को स्वास्थ्य लाभ दिला रहे है जिससे गरीब मरीजो को सर्जरी हेतु महानगरों का चक्कर नही लगाना पड़ रहा।  शुक्रवार को देर रात तक लगभग 3 घण्टे चले ऑपरेशन में डॉ0 सौरभ द्विवेदी, डॉ0 सोहन शर्मा की टीम शामिल रही। बताया कि ऑपरेशन के पश्चात मरीज के लकवे में काफी सुधार शुरू हो गया। डॉ. सौरभ द्विवेदी ने बताया कि स्पाइन सर्जरी में अमूमन सुधार आने में काफी समय लगता है, और ऐसी सर्जरी पहले भी हुईं है परंतु इस केस में इस तरह का चमत्कारी सुधार पहली बार देखने को मिला है। बताया कि नोवा हॉस्पिटल में इस तरह की जटिल सर्जरी हमेशा चलता रहता है। इस प्रकार की सर्जरी बस्ती में नहीं हो पाती है और मरीज को सर्जरी लखनऊ और बनारस कराना पड़ता है। एसे केस के सुधार में एक हफ़्ते से महीने लग जाते हैं। परंतु नोवा हैसपिटल के आपरेशन से एक दिन में ही लकवे में सुधार और मूवमेंट देखा गया है।नोवा हैस्पिटल में प्रायः दुर्लभ से दुर्लभ केस का उच्च कोटि की सर्जरी बहुत ही रियायत दर से किया जाता रहा है

डाक्टर सौरभ द्विवेदी से 7017673172  नंबर पर कॉल करके हड्डीरोग से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

Friday, July 30, 2021

बदल गई सब

                         
सब परिभाषाएं बदल गई अब सब मर्यादाएं बदल गई।
नहीं रहा मां बाप की इज्ज़त बेटा बेटी हुए अपने मन के।
सास ससुर बने नौकर चाकर आई बहू सब बदल देई।।
सुबह का उठना खत्म हो गया देर से सोना अब चालू है।
साथ साथ बैठ चौके का खाना कहीं कहीं अब लागू है।।
नए नवेले पानी मांगते खाना भी ना खुद बना सके।
कपड़ा लत्ता ना ढंग से पहने फैशन में सब माहिर हैं।।
नया जमाना आ गया भईया पुरानो का अब ठौर नहीं ।
सब परिभाषाएं बदल गई अब सब मर्यादाएं बदल गई।।

Thursday, July 29, 2021

मां बाप का बेटी की गृहस्थी में हस्तक्षेप अनुचित डा. राधे श्याम द्विवेदी

माँ-बेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा रिश्ता होता है और हर माँ की चाह होती है कि उसकी बेटी ससुराल में खुश रहे। इसीलिए मां बेटी को प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार देती है पर समय के साथ-साथ माताओं की इस सीख में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। पुराने समय में संयुक्त परिवार में अच्छे संस्कार नाना नानी दादा दादी मौसी बुवा छोटी बड़ी बहनें अपने व्यवहार से बहुत कुछ सिखा देती थीं।पर अब एकल परिवार में अपने पराए का बोध बहुत कुछ माहौल खराब कर देती है। आज अधिकतर घरों के टूटने की वजह लड़की के अभिभावकों का उसकी गृहस्थी में हस्तक्षेप और उनके द्वारा दी जाने वाली गलत शिक्षा है। ऐसे अनेक उदाहरण हम आप अपने आस-पास पा जाएंगे।

बेटी के लिए चिंता करना तो हर मां का फर्ज है। बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसके सुख-दुख में उसका साथ देना हर माता-पिता का कर्तव्य होता है। 

यदि बेटी अपनी गृहस्थी में खुश है, उसे अपने पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं तो मां का फर्ज यही है कि वह बेटी और उसके ससुराल वालों के रिश्ते को मजबूत बनाएं। उसे अच्छी सीख दें। उस रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएं। उसके गृहस्थी में बिल्कुल ना हस्तक्षेप करे। कम से कम बातें करे।और कुछ अनबन होने पर खुद संभलने का अवसर प्रदान करें। बेटी और ससुराल वालों के मध्य रिश्ते को सुधारने के लिए कुछ बातों का ध्यान देने वाली बातें निम्न हैं:_

१- विवाह के पश्चात् बेटी की आवश्यकता से अधिक देखभाल न करें। उसकी सहायता करें पर उन्हीं परिस्थितियों में, जब उसे अपने परिवार से सहायता न मिल रही हो। डिलीवरी के दौरान अधिकतर मांएं सोचती हैं कि उनकी बेटी की देखभाल ससुराल में सही तरह से नहीं हो पाएगी, इसलिए वे बेटी को मायके में डिलीवरी करवाने के लिए उकसाती हैं और बेटी अपने ससुराल वालों को छोड़ मायके पहुंच जाती है। उसे लगता है कि जो देखभाल उसकी मां करेगी, वह सास कहां कर पाएगी। ऐसा कतई न करें। जैसा ससुराल वाले चाहें, बेटी को वैसे ही करने को कहें। इससे आपकी बेटी और ससुराल वालों के मध्य प्यार व देखभाल की भावना बढ़ेगी, रिश्ते मजबूत होंगे।

२- विवाह के बाद बेटी को ससुराल में अपनी जगह बनाने में कुछ समय लगता है। उसे वह समय दीजिए। उसे बार-बार मायके आने पर जोर न दें। विवाह के पश्चात् उसका असली घर ससुराल है और बार-बार मायके आने से वह अपने घर, परिवार को नजर अदांज करती है। इससे उसके ससुराल वालों को परेशानी हो सकती है।

३- तोहफे हर किसी को अच्छे लगते हैं पर बहुत अधिक तोहफे देकर आप अपनी बेटी की आदतों को बिगाड़ सकती हैं। अगर ससुराल वाले आपकी बेटी के शौकों को पूरा नहीं कर सकते तो आप आर्थिक सहायता देने का कष्ट बिलकुल न करें। इससे आप उसकी ससुराल वालों को नीचा दिखा रही हैं।उसे अपने संसाधन मे जीने की आदत पड़ने दें।

४- बेटी के गृहस्थ जीवन में आप हस्तक्षेप न करें। अगर आप उसकी ससुराल वालों और अपने दामाद को कुछ कहना भी चाहते हैं तो आपका ढंग ऐसा हो कि उन्हें बुरा न लगे। इससे आपके और उनके संबंधों में खटास पड़ सकती है।

५- बेटी से मिलने उसके घर जाएं तो बेटी के कमरे में ही, उससे ही बात करने की बजाय उसके ससुराल वालों से ऐसा व्यवहार करें कि उन्हें ऐसा लगे कि आप सिर्फ अपनी बेटी से नहीं, उनसे भी मिलने आई हैं।

 ६-अगर आपका दामाद अपने परिवार वालों पर कोई खर्चा करता है तो अपनी बेटी को दामाद के इस खर्चे में कटौती करने के लिए न उकसाएं। जब आपकी बेटी अपने भाई-बहनों पर खर्च कर सकती है तो आपका दामाद अपने परिवार पर क्यों खर्च नहीं कर सकता।

७- ध्यान रहे, आप अपनी सीखों से अपनी बेटी की गृहस्थी को सुखमय भी बना सकती हैं और उजाड़ भी सकती हैं, इसलिए अपनी बेटी की सोच को बड़ा व सकारात्मक बनाने की कोशिश करें ताकि उसके ससुराल वाले उस पर नाज करें।

८-जो बेटी स्कारतमक सोच रख कर उचित तालमेल बिठा के रहेगी वह घर स्वर्ग सा होकर आदर्श बन जाता है।एक छोटी सी लापरवाही या बचकाना उन्माद बनी बनाई गृहस्थी को बिगाड़ सकती है।

९-यदि आप इस प्रकार कुछ छोटी छोटी बातों से बेटी के घर को स्वर्ग बनाने में कामयाब हो जाएगी और आपकी बेटी अपना घर छोड़ मायके आने का नाम ही नही लेगी।




     



Wednesday, July 28, 2021

दुबौली दूबे में विशाल चिकित्सा शिविर तथा विविध आयोजन

श्री राजेश दूबे स्मृति समारोह दुबौली दूबे जिला बस्ती में विविध प्रकार के आयोजन दिनाँक 27 जुलाई को कोविद 19 के मानकों का पालन करते हुए भव्यता के साथ सम्पन्न हुवा। 
रामचरित मानस का पाठ,हवन,वृक्षारोपण, विशाल भंडारा के साथ ही साथ एक विशाल चिकित्सा शिविर भी आयोजित किया गया। 
कोविड वैक्सीन का टीकाकरण, बीपी, ब्लड प्रेशर,नेत्र परीक्षण, दवा वा चश्मा वितरण किया गया होमियोपैथिक और एलोपैथिक दवाएं बितरित की गई।
सबसे अधिक भीड़ इसी गांव के मूल निवासी तथा महर्षि वशिष्ठ राजकीय मेडिकल कालेज बस्ती के सह प्रोफेसर डॉ सौरभ द्विवेदी, इसी संस्था मेंकार्यरत उनकी  पत्नी डाक्टर तनु मिश्रा तथा हरैया बस्ती सीएचसी पर कार्यरत डाक्टर उमेश कुमार उपाध्याय की लाइन में देखा गया।
ये तीनों नोवा हॉस्पिटल और एपेक्स डायग्नोस्टिक कैली रोड बस्ती का प्रतिनिधित्व भी कर रहे थे। भीनी बरसात की खुशबू में सभी व्यवस्थाएं बहुत ही चुस्त और दुरुस्त थीं। कार्यक्रम में श्रद्धांजलि के अलावा भाग लेने वाले संबंधित जनों को भाजपा के जिला अध्यक्ष श्री महेश शुक्ला द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित भी किया गया।स्थानीय समाचार पत्रों में इसका अपेक्षाकृत कबरेक नही हो पाया है।

Sunday, July 25, 2021

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के पूर्वजों का गांव भेड़ी गांव डा. राधेश्याम द्विवेदी

                                      
भेड़ी गांव एक अधिकृत गर्ग गोत्रिय शुक्लाना गांव:-
ब्राह्मणों में तीन-तेरह का प्राचीन प्रचलन तमाम तर्कों से आज तक जूझ रहा है|  महान ऋषियों की संतान ब्राह्मण बंश आदि काल से अपनी परम्परा पर अपनें- अपनें बंश-गोत्र पर आज भी कायम है| पूर्वजों की परम्परा को देखें तो गर्ग, गौतम, श्री मुख शांडिल्य गोत्र को तीन का तथा अन्य को तेरह में बताया जाता है| गर्ग से शुक्ल, गौतम से मिश्र, श्री मुख शांडिल्य से तिवारी या त्रिपाठी बंश प्रकाश में आता है| गर्ग (शुक्ल- वंश)का उद्भव इस प्रकार है। गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है| (१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं| भेड़ी गांव आचार्य राम चंद्र शुक्ल के पूर्वजों का गांव है जो देवरिया जिले में स्थित है। आचार्य शुक्ल का जन्म 1884 ई. में बस्ती जिले के अगौना नामक गाँव में हुआ था। वे वहाँ के मूल निवासी नहीं थे। उतर प्रदेश के देवरिया जिले में रुद्रपुर क्षेत्र के एकौना थान्हा के अंतर्गत भेड़ी गाँव है। यह गाँव शुक्ल लोगों का डीह स्थान है। राम चन्द्र शुक्ल के पूर्वज वहाँ रहते थे। शुक्ल जी के दादा पं.देवी दत्त शुक्ल की अल्पायु में मृत्यु हो गई। राम चन्द्र शुक्ल की दादी आजी पढ़ी लिखी स्वाभिमानी विधवा थीं। विधवा की तरह जीवन व्यतीत कर रही थीं। एक लिबास में रहना, कहीं आना जाना नहीं, एक समय खाना खाना, खाना बनाते समय बिना सिले हुए वस्त्र पहनना। इसी तरह एक दिन धोती लपेटे हुए वे खाना बना रही थीं। घर में एक कंगन की चोरी हुई थी। कुछ स्थितियाँ ऐसी बनी कि कहीं से उन्हें भनक लगी कि उस चोरी का आरोप उन पर लग रहा है। वह ब्राह्मणी चोरी के आरोप से तमतमा उठीं और घर से बाहर निकल आईं और पैदल ही चल दीं। गाँव घर के लोग मनाने गए लेकिन उन्होंने कहा - नहीं, अब नहीं, अब मैं इस गाँव का पानी तक नहीं पीऊँगी। इसलिए दादी अपने अल्पवयस्क पौत्र बालक व पुत्र चंद्रबली शुक्ल के साथ पहले अयोध्या गयी जहां उनकी भेट उनकी सहेली से हुई। बस्ती जिले के नगर पोखरनी राज की राजमाता उनकी सहेली थीं। वह अपने परिवार के साथ उन्हीं के यहाँ गई। उन्हें जब पूरी बातें पता चलीं तो उन्होंने आचार्य शुक्ल की आजी से वहीं रहने का प्रस्ताव दिया। उनकी यह सहेली पोखरनी नगर के राजा विश्वनाथ सिंह की पत्नी थी। उनके साथ वह पोखरनी नगर राज्य बस्ती आ गईं। राजमाता ने उन्हें 80 या  40 बीघा सीरमाफी जमीन दी और अगौना में बसा दिया। पहले तो वह जमीन नहीं लेना चाहती थी। परन्तु बाद में मानकर वहां बस गयी। बस्ती से करीब 25 किमी दूर कलवारी के पास अगौना गांव में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म हुआ था। धीरे-धीरे यह परिवार वहीं बस गया। वहीं पर उन्होंने चंद्रबली शुक्ल की पत्नी को भी बुला लिया। शुक्ल जी के पिताजी पोखरनी के राजकुमार के साथ ही पढ़ने लगे थे। रामचंद्र शुक्ल की माता विभाषी देवी गाना के पुनीत मिश्र घराने की कन्या थीं। इसी गाना के मिश्र घराने के भक्त-शिरोमणि महाकवि तुलसीदास भी थे। इस तरह तुलसीदास आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मातुल वंश से थे। परशुराम मिश्र गोस्वामी जी के प्रपितामह थे।

पंडित शुक्ल जी पितामही की छत्रछाया में ही पूरी तरह से पले बढ़े। शुक्ल जी उन्हें दूधू माँ कहते थे और लोग उन्हें बच्ची साहब कहते थे। पितामही पूरी तरह हिंदू संस्कारों का पालन करती थीं। दादी मां रामचरितमानस, भागवत, महाभारत का पाठ नियमित रूप से करती थीं और इन्हीं की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शुक्ल जी के चिंतन पर उनकी सुनाई कहानियों का बहुत प्रभाव है।