Saturday, October 10, 2026

कलाधर-पाल-ब्रजेश के समय के लुप्तप्राय बस्ती के साहित्यक पुरोधा (बस्ती जनपद के छंदकार कड़ी 35) मूल लेखक:डा. मुनि लाल उपाध्याय "सरस"प्रस्तुति:आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन"


जिन साहित्यकारों ने “बस्ती” को एक खास पहचान दिलाई, लोगों में साहित्यिक चेतना पैदा की, आज अपने ही गांव - क्षेत्र और जिले में बेगाने होकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। जिन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में बस्ती को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। दुख इस बात का है कि यहीं के लोगों ने उन्हें भुला दिया। न साहित्य प्रेमियों को इन्हें याद करने की फुर्सत है और न ही शासन - प्रशासन को। कभी कभार आचार्य शुक्ल और रंगपाल जी को याद कर लिया जाता है। शेष लोग इतिहास के पन्नों में सिमट चुके हैं। कुछ अपने अपने सीमित साधनों से अपना अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं।

डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार

बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। इस अध्याय ने सर्वश्री भास्कर प्रसाद "भास", राजाराम शर्मा "अंचल", बद्री प्रसाद मिश्र "हरीश, रानी सौभाग्य सुन्दरी "सुन्दरअली", लाल श्रीकण्ठ सिंह "ब्रजदेव ", बाबू श्री बद्रीप्रसाद " पाल", श्रीरामदेव सिंह "कलाधर ", श्री अब्बास अली "वास", पण्डित मातादीन त्रिपाठी "दीन", श्रीगणेशदत्त पाण्डेय "विशिख", श्री सरस्वती प्रसाद शर्मा "वारिज, पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन", प० राम नारायण पाण्डेय "पागल,श्री केदारनाथ मिश्र "दीन”, पंडित रामचरित्र उपाध्याय, ,पंडित व्रज विहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश', श्री रामलाल श्रीवास्तव 'लाल', पण्डित अद्या प्रसाद पाण्डेय 'द्विजेंद्र' , श्री राम कृपाल पाण्डेय ,श्री राम आश्रय सिंह 'रसिकेन्दु' सहित बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। अधोलिखित 18 छन्दकारों की सूची जिनका पर्याप्त साहित्य न मिल कारण संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है।

अध्याय 3 तृतीय चरण के फुटकर छंदकारों के नामोलेख की सूची और संक्षिप्त परिचय -

[संदर्भ:बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान , भाग 2, प्रकाशन वर्ष 2008 , पृष्ठ 233 -34]

1.श्री बुध यदुनाथ जी
श्री बुध यदुनाथ जी का जन्म बाँसी तहसील के जीवा नामक ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आसपास पैदा हुए थे। आपके बारे में 'उपहार' में लिखा है, आप सभी रसों के सिद्ध हस्त कवि थे। भाषा शैली बड़ी परिमार्जित एवं आकर्षक है। इनका काव्य संग्रह एक स्वतंत्र ग्रन्ध है।

2.आचार्य धनराज शास्त्री
ये प्रज्ञा चछु (जन्मांध) थे। इनका जन्म 1955 वि0 के आसपास हुआ था। आशुकविता करते थे। संस्कृत के हजारों श्लोक कंठस्थ थे। ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि थे। आशु कवित्व आप में कूट-कूट कर भरी थी। आपकी कविता सुन्दर होती थी।

3.महात्मा गूंगदास
राप्ती नदी के किनारे जिगिना ग्राम (संभवतः उतरौला बलरामपुर )में 1960 विक्रमी के आसपास आप ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे। ब्रजभाषा के अच्छे कवि होने के साथ उच्चकोटि के सन्त थे।

4.श्री चिन्तामणि त्रिपाठी
जन्म सम्वत् 1966 वि० ग्राम गजाधरपुर में हुआ था। ये घनाक्षरी और सवैया तथा दोहा व कुण्डलियां के अच्छे छन्दकार एवं बिरहा लोकगीत रचयिता के रूप में बहुचर्चित हैं।

5.सीताराम शुक्ल
इनका जन्म ग्राम भादी सम्वत् 1956 के आसपास हुआ था। ये छन्दों के अच्छे रचयिता थे। दोहा, मनहरण, सवैया छन्द फुटकर लिखा था। ये एम एल ए भी रहे।

6.अखण्डानन्द जी
डुमरियागंज तहसील में राप्ती के किनारे उद्भट सन्त उत्कृष्ट छन्दकार के रूप में जाने जाते है। इनका जन्म 1950 वि0 तदनुसार लगभग ईसवी सन 1893 के आसपास बताया जाता है। इन्होनें रामशक्ति से संबंधित फुटकर छन्द लिखा है।

7.पं० कमलापति त्रिपाठी 'जोकरेश'
इनका जन्म सं० 1963 में हुआ था। दोहा बहुत अच्छा लिखते थें सवैया और मनहरण के छन्दकार होने के साथ-साथ राम चरित मानस के अच्छे ज्ञाता थे।

8.श्री सत्यदेव ब्रम्हाचारी (सत्य)
मेंहदावल के पास जोखा ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आस-पास पैदा हुए थे। उपहार में लिखा है- शैशवकाल से ही आप हिन्दी में कविता लिखते थे। आपने बेलवा के महन्थ जी के बारे में एक महाकाव्य लिखा है। उसमें अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सहज ही दर्शन होता है। रीतिकालीन भाव व्यंजना में आप प्रवीण है।

9.श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र)
बस्ती के पास चननी ग्राम में सं० 1965 वि० में पैदा हुए थे। आपकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के स्वर के साथ ब्रजभाषा का लालित्य देखने को मिलता है।

10.सन्त फागू दास जी
जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे। इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में उपहार आदि में विशेष प्रशंसा की गयी है।

11.पं० रामयज्ञ त्रिपाठी 'कंचन'
ये जुलाई सं० 1978 विक्रमी में कटया ग्राम में पैदा हुए थे तथा एक अच्छे छन्दकार थे।

12.श्री चन्द्रशेखर भारती
आप तामेश्वरनाथ के गोस्वामी परिवार में 1960 वि० के आसपास पैदा हुए थे। अच्छे छन्दकार के रूप में बहुचर्चित हुए।

13.प० राम लखन मिश्र 
सं० 1960 वि० में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा में डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० चमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे।

14.रतिमाथ झाँ
बांसी तहसील के तलपुरवा नामक ग्राम में सम्वत् 1979 में उत्पन्न हुए थे। दोहा
धनाक्षरी सवैया के साथ खड़ी बोली
 के अच्छे कवि के रूप में प्रतिष्ठा पा रहे हैं। 
15.मातादीन लाल 'मुक्तार'
डुमरियागंज में सम्वत् 1965 वि० के आसपास पैदा हुए थे। अच्छे छन्दकार के रूप में प्रतिष्ठा पा चुके हैं।

16.नरेन्द्र देव पाण्डेय 'साहित्य रत्न' 
चैत शुक्ल 10 सं० 1978 ग्राम धपोखरा तहसील खलीलाबाद में पैदा हुए थे। वे ब्रज भाषा और खड़ी बोली के छन्दकार थे। 

17.पं० चन्द्रबली त्रिपाठी
जन्म सं० 1962 विक्रमी में पैदा हुए थे। वे संस्कृत हिन्दी के विद्वान थे। ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली के छंदकार के रूप में बहुचर्चित हैं।

18.वासुदेव लाल मुक्तार
इनका जन्म सम्वत् 1970 विक्रमी के आसपास हरैया में बताया जाता है। ये ब्रज भाषा के मंजे मंजाये कवि थे। इनके मनहरण और सवैया छन्द हाकिम, हक्कामों के बीच बहुचर्चित रहते थे। इनका एक छन्द उपहार में छपा मिला हैं-

छवि है अनोखी और शान है निराली तेरी।
सकल सुजन जिसे प्राण सम पाले हैं।
निपट अद्वैत कोई द्वैत नही तेरा हुआ।
योगी मुनी ज्ञानी सभी ध्यान माला डाले है।
परमानन्द चित्त हो रहा है आज बासुदेव ।
होली में सहेली स्नेह सुरा शुचि ढाले है।
डाल डाल प्रेम रंग पावैगें असीम सुख।
प्रेम में तुम्हारे कृष्णमय मतवाले है।।

     इस चरण तक जो साहित्य लिखा गया है उससे बस्ती जनपद के छंद भण्डार को पर्याप्त समृद्धि मिली है। ब्रजभाषा, खड़ी बोली एवं भोजपुरी पर समान प्रयास डाला गया है। तृतीय चरण चतुर्थ चरण की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि स्वरूप जनपदीय 
छन्द परम्परा के विकास में अपना महत्वपूर्ण गौरव रखता है।

इस चरण के कुल18 कवियों की संक्षिप्त जानकारी लगभग आधे दशक पूर्व संकलित की गई है। इस पर विशद विवेचन परवर्ती साहित्यकार द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

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