Friday, July 31, 2026

संसद परिसर में बहुसंख्यक समाज का अपमान कब तक होगा ? :‘सनातन धर्म' ही निशाने पर क्यों होता है ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी



सनातन परंपरा आस्था का उपहास :-

आलौकिक, पारलौकिक मान्यताओं से मन को खुशी प्रदान करने वाला, जन्म- मरण के बंधन से मुक्त करने वाला, सत्य- अहिंसा के मार्ग पर चलाने वाला, भक्ति के सागर में डूबकर पार लगाने वाला धर्म ही तो सनातन धर्म है। इसके मूल में दया, सहिष्णुता, अहिंसा, तपस्या आदि है।

 यह अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से जीवन की ओर ले जाता है। इतनी खूबियों के बावजूद कुछ मानसिक रोग से ग्रसित सांसद साधु का वेश धारण कर नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सनातन परंपरा और हिंदू आस्था का देश के सबसे प्रबुद्ध वर्ग द्वारा उपहास किया गया है जो किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर पूरे साधु-संत समाज, पुजारियों और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को कटघरे में खड़ा करना अनुचित और निंदनीय है। भारत की संत परंपरा ने सदियों से समाज को आध्यात्मिक मार्गदर्शन, सेवा और संस्कृति का संदेश दिया है। यदि संसद परिसर में राजनीतिक विरोध के नाम पर भगवा, साधु-संतों या धार्मिक प्रतीकों का उपहास किया जाता है, तो यह करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला कदम है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन किसी भी धर्म या उसकी आस्था का अपमान ना तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और ना ही यह भारतीय संविधान के प्राविधानों के अनुकूल ही है। संसद परिसर में हुए इस कुकृत्य पर अधिकारिता होते हुए सत्ता दल , विपक्ष, लोकसभा/ राज्यसभा अध्यक्ष का मौन रहना पूर्णतः अलोकतांत्रिक है। स्वतः संज्ञान लेने वाला सर्वोच्च और उच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया ना मिलना भी चिंतनीय है। देश की बहुसंख्यक आम जनता ऐसे कुआचरण को किंकर्तव्य विमूढ़ता से देख रही है और उचित समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से अपना निर्णय भी देगी। 


सनातन धर्म के अपमान के कुछ प्रमुख कारण:-

सनातन धर्म को निशाना बनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से राजनीतिक लाभ, चुनावी फायदा, वैचारिक मतभेद , सनातनी सहिष्णुता और अपनी कमियों को नजरंदाज करके सनातन को नीचा दिखाने की कुत्सित मानसिकता आदि भारतीय समाज की विसंगतियां हैं।

राजनीतिक लाभ के लिए :-

राजनीतिक लाभ के लिए प्रायः सनातन धर्म को निशाना बनाया जाता है। इसका मुख्य कारण विभिन्न विचारधाराओं का विशाल जनसमूह का होना, उन्हें ध्रुवीकरण करना , उनसे वैचारिक विरोध कर उनके वोट बैंक को अपने की ओर खींचना है। बहुसंख्यक समाज की आस्था से जुड़े इस विषय पर बयानबाजी कर दल अपने वैचारिक आधार को मजबूत करने और चुनावी लाभ पाने का प्रयास करते हैं। बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को साधने या उनके विरोध में बोलकर एक खास वर्ग के वोटों को एकजुट किया जाता है।

चुनावी फायदा :-

चुनावी फायदे के लिए धार्मिक भावनाओं और पहचान को उभार कर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती है। बहु संख्यकों की एकता में दरार डालकर अपने कुत्सित संगठन में एकता लाकर या उन्हें चकमा देकर वोट खींचना भी इसका एक कारण हो सकता है।

उचित ज्ञान का अभाव :-

इन हिंदू-विरोधी लोगों को सनातन धर्म का उचित ज्ञान नहीं है और वे अपने नेताओं द्वारा प्रचारित दर्शन की गलत व्याख्या के आधार पर अंध घृणा से ग्रसित हैं। ज्ञान और दार्शनिक सिद्धांतों का वह विशाल भंडार जो सहस्राब्दियों से विकसित होकर सनातन धर्म के रूप में जाना जाता है, जिसे एनी बेसेंट जैसी एक विदेशी ने "इतना परिपूर्ण, इतना वैज्ञानिक, इतना दार्शनिक, इतना आध्यात्मिक" बताया है, उसे ये हिंदू-विरोधी लोग़ तरह तरह से अपने पाले में डालने की कोशिश करते नजर आते हैं।

वैचारिक मतभेद :-

सनातन धर्म वैचारिक मतभेद के लिए इसलिए निशाने पर आता है क्योंकि इसकी प्राचीनता, व्यापक सामाजिक व्यवस्था, और स्पष्ट जीवन दर्शन इसे आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक बहसों का मुख्य केंद्र बनाते हैं। दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु, ने अनेक महान संत और विद्वान उत्पन्न किए हैं, जिनका सनातन धर्म में गौरवपूर्ण स्थान है। वैदिक काल के ऋषि अगस्त्य से लेकर मध्यकालीन रामानुजाचार्य और अव्वैयार तथा हाल के समय के रमण महर्षि तक, सनातन परंपरा के संत द्रविड़ भूमि से निकले हैं और पूरे देश में पूजनीय हैं।

द्रविड़ या क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रवादी हिंदुत्व की वैचारिक भिन्नताओं के बीच श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लगी हुई है।

तमिलनाडु में डीएमके नेताओं द्वारा सनातन धर्म और हिंदू धर्म की तुलना प्लेग, मलेरिया और डेंगू से करना और इसे "मिटाने" पर जोर देना सनातनी हिंदू विरोधी भावना का घिनौना चेहरा उजागर करता है।

सहिष्णुता :-

खुलापन और सहिष्णुता के कारणसनातन धर्म में विरोध या बहस की आज़ादी है, इसलिए लोग इस पर आसानी से  बिना किसी कड़े प्रतिरोध के डर के टिप्पणी करते रहते हैं। जाति व्यवस्था और असमानता जैसी पुरानी कुप्रथाओं को आधार बनाकर पूरे धर्म की मूल विचार धारा पर सवाल उठाया जाता है।

विरोधाभासी दृष्टिकोण:-

अन्य मजहबों की तुलना में सनातन धर्म की परंपराओं और मान्यताओं को अधिक आसानी से आलोचना का केंद्र बना दिया जाता है । मुस्लिम सिक्ख आदि धर्मों पर बोलने से ‘शर तन से जुदा’ के फतवे जारी होने लगते हैं। फिर सबसे निरीह हालात तो सनातन की ही है।

अपनी कमियों को नजरंदाज करना :-

सांस्कृतिक और वैचारिक विभिन्नता होते हुए भी पाश्चत्य सोच से अंतर देखा जाता है। पश्चिमी देशों की एकात्मक धार्मिक सोच की तुलना में सनातन धर्म की विविधता और बहुदेववाद को आलोचक समझ भी नहीं पाते हैं। कभी कभी अज्ञानता में भी टीका टिप्पणी कर बैठते हैं।

बौद्धिक व वैचारिक संघर्ष : -

आधुनिकता और पंथनिरपेक्षता (सेकुलर ) के नाम पर पारंपरिक मूल्यों और आस्था के प्रतीकों को चुनौती दे दिया जाता है।ज्ञान को सामाजिक संगठन का आधार मानकर सनातन परंपरा में प्राचीन काल में जन्म आधारित विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया गया, न ही किसी प्रकार की पदानुक्रमिक व्यवस्था को संहिताबद्ध किया गया। माधवचार्य द्वारा रचित शंकर दिग्विजय में ज्ञान को सामाजिक संगठन का आधार बताया गया है और कहा गया है कि “जन्म से तो सभी शूद्र ही हैं। कर्मों से मनुष्य द्विज यानी फिर से जन्म लेने वाला बनता है। वेदों का अध्ययन करने से व्यक्ति विप्र बनता है और ईश्वर के ज्ञान से ब्राह्मण बनता है।”

जाति व्यवस्था का विकृत रूप :-

जन्म आधारित जातिवाद की बुराई वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप है। केवल अंबेडकर ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के महान व्यक्तित्व सावरकर ने भी इसका पुरजोर खंडन किया था। 1920 में अंडमान जेल से उन्होंने लिखा, “जिस प्रकार मैंने हिंदुस्तान पर विदेशी शासन के विरुद्ध विद्रोह करना उचित समझा, उसी प्रकार मैंने हिंदुस्तान में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के विरुद्ध भी विद्रोह करना उचित समझा।” आरएसएस के एक सुधारवादी प्रमुख बालासाहेब देवरस ने स्पष्ट रूप से कहा कि मनुस्मृति की कई बातें अप्रचलित हो चुकी हैं। उन्होंने कहा, “आधुनिक समय में इसके हर शब्द को मान्य मानना अब बुद्धिमानी नहीं है।” स्वयं को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी ने जाति को “राक्षस” कहा। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा, “वर्ण व्यवस्था की इसी विकृति ने हिंदू धर्म और भारत को पतित किया है।”

सही मतलब ना समझ गलत अर्थ निकालना :-

सनातन धर्म के तीन अर्थ हो सकते हैं: एक, शाश्वत चीजों में आस्था; दो, आत्मा और पुनर्जन्म में आस्था; तीन, जाति व्यवस्था में आस्था; चार, पवित्रता के सिद्धांत में आस्था।राजनेता अपने एजेंडे के अनुसार इसका अर्थ चुन-चुनकर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, यदि आपके मतदाता वर्ग को ब्राह्मण और जाति व्यवस्था पसंद नहीं है, तो आप कह सकते हैं कि सनातन धर्म जाति आधारित उन विशेषाधिकारों को संदर्भित करता है जिन्हें शाश्वत माना जाता है। भगवद् गीता में कृष्ण ने वर्ण व्यवस्था का उल्लेख किया है जो लोगों के गुणों कर्मों पर आधारित है और इसे शाश्वत बताया है।

सनातन धर्म शाश्वत तत्वों से युक्त :- 

यदि मतदाता ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं और जाति आधारित आरक्षण से पीड़ित हैं, तो आप कह सकते हैं कि सनातन धर्म शाश्वत तत्वों - समय, स्थान, आत्मा और पुनर्जन्म - से संबंधित है। ऐसे में आप जाति और अस्पृश्यता का जिक्र करने से बचते हैं।

प्राचीन, शाश्वत अवधारणा

 "सनातन" एक प्राचीन, शाश्वत अवधारणा है। यह ध्यान रखना आवश्यक है किबौद्ध, जैन और हिंदू पौराणिक कथाओं में, उनका सिद्धांत शाश्वत है, और समय- समय पर ऐतिहासिक बुद्धों, तीर्थंकरों और ऋषियों द्वारा प्रसारित किया गया है। यह आस्था का विषय है, तथ्य का नहीं।

सभी का सम्मान करना आवश्यक :-

हिंदुओं के लिए समाज वर्ण/जाति पर आधारित है। विभिन्न समुदायों के अलग- अलग रीति-रिवाज और प्रथाएं हैं और सभी का सम्मान करना आवश्यक है। प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार, जन्म के समय प्राप्त लिंग और जीवन चक्र के अनुसार अपनी भूमिका निभाने के लिए बाध्य है। उसे परिवार, कुल, पूर्वजों, गुरुओं और समाज के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करना होता है। यह अटल और शाश्वत है। जब तक हम तीन ऋण नहीं चुकाते, तब तक हम मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। यह शाश्वत विश्वास ही सनातन धर्म है। यहाँ जाति चेतना सर्वोपरि है। जाति चेतना के साथ ही पवित्रता, अपवित्रता और अस्पृश्यता के विचार जुड़े हुए हैं।

19वीं शताब्दी की राजनीति : -

19वीं शताब्दी में भारत में न्याय और समानता की अवधारणाओं पर आधारित कई सुधार आंदोलन हुए। महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा था। सभी जातियों के लिए शिक्षा सुलभ कराई जा रही थी। पुरानी व्यवस्था ध्वस्त हो रही थी। इन आंदोलनों का नेतृत्व उन सुधारवादियों ने किया जिनके संगठन समाज के हित में काम करते थे। इनमें आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और सत्यशोधक समाज शामिल थे।

 19वीं शताब्दी का समाज :-

सनातन संघर्ष 21वीं शताब्दी के वाम- दक्षिण संघर्ष के रूप में सामने आया है। आज, सनातन समूह जाति और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खुलकर वकालत नहीं करता है। लेकिन यह ब्राह्मण समुदाय को हिंदू समाज की नींव के रूप में महिमामंडित करता है। वे इस झूठे इतिहास का प्रचार करते हैं कि प्राचीन भारत में सभी लिंग और जातियाँ फली-फूलीं और कोई उत्पीड़न नहीं था। सभी उत्पीड़न मुसलमानों और मिशनरियों के आगमन के साथ शुरू हुए।

सनातन धर्म के लिए खतरा : -

धर्मांतरण का विचार एकेश्वरवादी धर्मों से आया है। इसे ईसाई और इस्लामी मिशनरियों ने लोकप्रिय बनाया। इसने यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में बहुदेववाद को समाप्त कर दिया। भारत ने एकेश्वरवाद के इस आक्रमण को रोका। मध्य एशिया के मुस्लिम सरदारों और बाद में यूरोपीय शासकों द्वारा आठ शताब्दियों के विदेशी शासन के बावजूद, 20 प्रतिशत से भी कम भारतीयों ने इस्लाम और ईसाई धर्म को अपनाया।

सनातन धर्म का उपहास :-

हिंदुओं को लंबे समय से गलत समझा जाता रहा है। दुनिया भर में, हिंदू मूर्तियों और गायों की पूजा करते हैं, इसलिए उनका उपहास किया जाता है। जाति और पुनर्जन्म के सिद्धांतों को लोगों को समझाना कठिन है। जहां वैज्ञानिक धर्मों पर हमले करते हैं, वहीं हिंदू धर्म खुद को अलग-थलग पाता है क्योंकि यह पश्चिम के प्रमुख एकेश्वरवादी धर्मों से बहुत अलग है। हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में रहने वाले राज नेताओं ने हिंदुओं को अपने रीति-रिवाजों और मान्यताओं के साथ सहज महसूस करने में सक्षम बनाया है।


टूटेआईने में सही शक्ल नहीं दिखती:-

सनातन धर्म पर स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो में हुए सन् 1893 की विश्व धर्मसभा में दिया गया यह भाषण कि 'मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी...। फल से ही वृक्ष का परिचय होता है। जब मैं देखता हूं कि जिन लोगों को मूर्ति-पूजक कहा जाता है, उन लोगों में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जिनकी तरह नीतिज्ञान, आध्यात्मिकता और प्रेम मैंने और कहीं नहीं देखा, तब मेरे मन में यह प्रश्न जागता है कि 'पाप से क्या कभी पवित्रता जन्म ले सकती है?’


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)


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