Saturday, February 21, 2026

महाराज कुमार बाबू रंगनारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' की काव्य साधना (बस्ती जनपद के छंदकार संख्या 31)::आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

(नोट: रंगपाल जी से संबंधित 3 अन्य कड़ियां इसी शृंखला में पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें कड़ी संख्या 06 दिनांक 16 अप्रैल 2017 को परिचयात्मक रूप में; कड़ी संख्या 08 दिनांक 19 मई 2017को शृंगार रस के रूप में तथा कड़ी संख्या 18 दिनांक 07 मार्च 2020 को फाग गीत के रूप में पढ़ा जा सकता है।)

जीवन परिचय 
दरदीदिल की दरदको दरदी दिलहीजनाय। 
बेदरदी जानै कहां रंगपाल मुस्काय। 
   रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती मण्डल के नव सृजित सन्तकबीरनगर के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी, तदनुसार 20 फरवरी सन1864 ई को हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर वत्स पाल तथा माता का नाम श्रीमती सुशीला देवी था। कवि के बचपन का नाम रंग नारायण पाल जू वर्मा था। उनके पिता श्री विश्वेश्वर बक्श पाल जमींदार थे। पिता के विषय में स्वयं रंगपाल जी ने अपने ग्रंथ “वीर विरुद्ध” की पूर्णता के समय लिखा था। इसमें उनके वंश परम्परा का संक्षिप्त परिचय मिलता है - 
छत्रिय प्रवर सूर्यवंश रामचंद्र कुल 
ठाकुर प्रसाद पाल वीर वर दानिये ।
ईश्वरी प्रसाद पाल तिनके तनय अरु,
तिनके विश्वेश्वर बक्श पाल जानिए।
तिनको है सुत रंगपाल नाम धाम ग्राम, हरिहर पुर सरवार देश मानिए ।
ग्रंथ 'वीर विरुद्ध' बखान्यो विक्रमीयशुभ,
संवत उन्नीस सौ उन्यासी सुखखानिये।।

कवियित्री मां से मिली प्रेरणा
माता सुशीला देवी संस्कृत और हिंदी की विद्वान थीं। कवि पर अपनी माता का प्रभाव गहरा था। वही उनके बचपन की गुरु थीं। उनके पिता जी राजा महसों के राज्य के वंशज थे। वे एक समृद्धशाली तालुक्केदार थे। वे साहित्यिक वातावरण में पले हुए थे । विदुषी मा के सानिध्य और साहित्य का अटूट लगाव का पूरा प्रभाव रंगपाल पर पड़ा, जिसका परिणाम था कि स्कूली शिक्षा से एकदम दूर रहने वाले रंगपाल में संगीत की गहरी समझ आ गई थी। 
   ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान’ के भाग 1 में शोध कर्ता डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 59 से 90 तक 32 पृष्ठों में रंगपाल जी का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने इन्हें द्वितीय चरण के प्रथम कवि के रुप में चयनित किया है। वह एक आश्रयदाता, वर्चस्वी संगीतकार तथा महान कवि के रुप में प्रतिस्थिापित हुए हैं। उनके आश्रय में कवि महीनों उनके सान्निध्य में रहते थे और उन्हें बहुत सामान तथा पैसा के साथ वे विदा करते थे। उनकी शादी 18 वर्ष की उम्र में हुई थी। 
     युवा मन, साहित्यिक परिवेश, बचपन से ही तमाम कवियों व कलाकारों के बीच रहते-रहते उनके फाग में भाषा सौंदर्य श्रृंगार पूरी तरह रच-बस गया था। 

         रंगपाल जी के फाग की देश में ही नहीं विदेशों में भी धूम रहती है। पुरानी परंपरा, मर्यादा, संस्कृति, सब भूलकर हम नई संस्कृति में जा रहे हैं, जो अपने मातृ भूमि के साथ धोखा है। मधुरता, भाव, देशी अवधी ब्रजभाषा, भोजपूरी भाषा मिठास का जो भाव मिलेगा वह किसी और में नहीं मिलेगा।

प्रकाशित रचनायें :- 

उनकी अंगादर्श, रसिकानंद, सज्जनानंद, प्रेम लतिका, शांत रसार्णव, रंग उमंग और गीत सुधानिध आदि रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

अप्रकाशित रचनाएं

अप्रकाशित ग्रंथों में रंग महोदधि, ऋतु रहस्य , नीति चन्द्रिका, मित्तू विरह वारीश, खगनामा, फूलनामा, छत्रपति शिवाजी, वीर विरुद,गो दुदर्शा, दोहावली तथा दर्पण आदि हैं। “छत्रपति शिवाजी” और “वीर विरुद्ध” के सैकड़ो छंद “सुकवि” और “रसराज” आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी में अनेक कवियों , संभा्रन्त जनों तथा पत्र पत्रिकाओं के पते तथा लिंक मिले है। 

    अपने शोध के दौरान स्मृति शेष डॉ. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’जी को बस्ती के कवि श्री भद्रसेन सिंह भ्रान्त/बन्धु से अनेक पाण्डुलिपि व डायरी देखने को मिली थी। जिससे उनका शोध प्रवन्ध बहुत ही प्रमाणिक बन पड़ा है। 

समाधि स्थल

रंगपाल जी की मृत्यु 62 वर्ष की अवस्था में भाद्रपद कृष्ण 13 संवत 1993 विक्रमी /1936 ई. में हुआ था। हरिहरपुर नगर पंचायत के राजघाट पुल के पास महाकवि रंगपाल का अंतिम संस्कार किया गया था। श्री रामभरोस पांडे, श्री भगवान दास गुप्त ने स्थानीय लोगों के सहयोग से समाधि स्थल का निर्माण करवाया था। जिसका लोकार्पण कवि रामधार त्रिपाठी ने 4 मार्च 1978 को किया था। हरिहरपुर नगर पंचायत की पहचान इन्हीं से जानी जाती है।

    पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने कहा कि रंगपालजी की समाधि स्थल जो कष्टहर्णी नदी के स्थल पर है काफी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। मरम्मत कराने के साथ ही संग्रहालय बनाने की जरूरत है। 

    हरिहरपुर में मशहूर कवि जो रंगपाल जी के साथ कविता लिखते हैं - बद्री प्रसाद, आद्या प्रसाद, शिवेन्द्र, शिवबदन चतुर्वेदी, मातादीन त्रिपाठी के स्मृति में मुख्य चौराहे पर पांच मूर्तियां लगाने के लिए जिला अधिकारी से आग्रह किया जा चुका है।

रंगपाल जी अविस्मरणीय हैं

महाकवि रंगपाल लोकगीतों, फागों व विविध साहित्यिक रचनाओं में आज भी अविस्मरणीय हैं। दुनिया भर में अपने फाग गीतों से धूम मचाने वाले महाकवि रंगपाल अमर हैं। फाल्गुन मास लगते ही 

सखि आज अनोखे फाग ..../ 

बीती जाला फाल्गुन ,आए नहीं नंदलाला से

रंगपाल के फाग का रंग बरसने लगता है।  आज रंगपाल की धरती पर ही, फाग विलुप्त हो रहा है। इक्का-दुक्का जगह ही लोग फाग गाते हैं। महाकवि के जन्म स्थली पर संगोष्ठी के साथ फाग व चैता का रंग छाया रहा। 

झूमर फाग

एक झूमर फाग में महाकवि रंगपाल ने श्रीकृष्ण व राधा के उन्मुक्त रंग खेलने का मनोहारी चित्रण कुछ इस तरह किया है -

सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।

बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।

खेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत गोरी।

सखी फागुन बीति जाला, नहीं आये नंदलाला।

प्रेम बढ़ाय फंसाय लियो।

     रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अंतरात्मा में गूंज रहे थे। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। वियोग श्रंगार का उनके एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है - 

ऋतुपति गयो आय हाय

गुंजन लागे भौंरा।

भयो पपीहा यह बैरी,

नहि नेक चुपाय।

लेन चाहत विरहिनि कै

जिमरा पिय पिय शोर मचाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।

विरहि करेज रेज बैरी मधु 

दिये नेजन लटकाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

अजहुं आवत नहीं दैया, 

मधुबन रहे छाय।

रंगपाल निरमोही बालम, 

दीनी सुधि बिसराय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

    रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है -

यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।

राज प्रजा नर नारि सब 

घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।

होरी होरी है।

बरस बरस को दिन मन भायो, 

हिलि मिलि सब खेलहुयार।

होरी होरी है।

रंगपाल असीस देत यह 

सब मगन रहे फगुहार।

होरी होरी है।

यहि द्वारे मंगलचार 

होरी होरी है।

    रंगपाल जी भक्ति भावना उनके शान्त रसार्णव गंथ में सूर तुलसी तथा मीरा को भी मात देती है -

बोलिये जो नहिं भावत तो 

एक वारहि आंखि मिलाई तो देखो।

जो नहि हो तो सहाय कोऊ 

लखि दीन दशा पछताय तो देखो।

रंग जू पाल पिछानतो नाहिं

कछु कहि धीर धराइ तो देखो।

छोरि विपत्ति तो लेतो नहिं, 

भलाबुन्द दुह आंसू गिराय तो देखो।।


देखत काहि सोहाय भला अरु 

को दृग जोरि कै नय सुख जोवै।

कौन सुनै गुनै पाछिलिहि प्रीतिहि 

यातेन काहूय जाय कै रोवै।

रंग जू पाल पड़े सो सहै औ 

रह्यो सह्यो भ्रम काहू पै खोवै।

वर्षा गीत

वर्षा गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है, जिसमें मनभावन छटा झलकता है-

मुदित मुरैलिन के कूकत कलापी आज,

तैसे ही पपीहा पुंज  पीकहि पुरारै री।

लपटि तरुन लोनी लतिका लवंगन की ,

चहुं दिशि उमगि मिले हैं नदी नारे री।

रंगपाल एरी बरसा की य बहार माहि,

आये नहि हाय प्रान प्रीतम हमारे री।

धूरिये धारे धुरदान, चहु धाय धाय,

गरजि गरजि करैं हियै में दरारे री।।

बसन्त गीत

इसी क्रम में बसन्त ऋतु का एक चित्रण दर्शनीय है -

भूले भूले भौंर चहु ओर भावंरे से भरैं,

रंगपाल चमके चकोर समुदाई है।

कुसुमित तरु जू भावन लगे हैं मन,

गावन त्यों कोकिल को गांवन सुहाई है।

सुखप्रद धीरे धीरे डोलत समार सीरो,

उड़त पराग त्यों सुगंध सरसाई है।

विपिन समाज में दराज नवसाज भ्राज,

आज महाराज ऋतुराज की अवाई है।।

शरद गीत

शरद गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है इसकी छटा भी निराली है -

अमल अवनि आकाश चन्द्र प्रकाश रास हरि।

कुंद मालती कासकंस कुल विमलक सर सरि।

चंहकित हंस चकोर भंवर धुनि खंजन आवन।

पूजन पितृ सुदेव सुखिन मगधावनि धावन।।

अरु उदित अगस्त पयान नृप दीपावलि गृहचित्र तिमि।

घन श्वेत साजहू वरनि के रंगपाल ऋतु सरद इमि।।

वरिज विकास पर मालती सुवास पर ,

माते मधु पालिनी के सरस विलास पर।

भनय रंगपाल निम लाई आस पास पर ,

कुसुमित कास पर हंसन हुलास पर।

फैली अलबेली आज सुषमा सरद वारी,

जलज निवास पर अवनि अकास पर।

तारागण भास पर चांदनी सुहास पर,

चन्द्र छवि रास पर राधा वर रास पर।।

डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस द्वारा मूल्यांकन :- 

“रंगपालजी ब्रज भाषा के प्राण थे। श्रृंगार रस के सहृदयी कवि और वीर रस के भूषण थे। उन्होंने अपने सेवाओं से बस्ती जनपद छन्द परम्परा को गौरव प्रदान किया। उनके छन्दों में शिल्प की चारुता एवं कथ्य की गहराई थी। साहित्यिक छन्दों की पृष्ठभूमि पर लिखे गये फाग उनके गीत संगीत के प्राण हैं। रीतिकालीन परम्परा के समर्थक और पोषक रंगपालजी की रचनाओं में रीतिबद्ध श्रृंगार और श्रृंगार बद्ध मधुरा भक्ति का प्रयोग उत्तमोत्तम था। श्रृंगारेतर रचनाएं राष्ट्रीयता की भाव भूमि पर मुखरित हो सश्वर गूंज उठी है। आपकी रचना पर पद्धति युग अनुरूप साहित्यिक प्रवृत्ति एवं विषय वस्तु की अर्वाचीन और वर्तमान साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकक्ष है। आपकी काव्य कला रसिकता की चारुता साधना की भाव भूमि पर बड़ी ही मनोहारी है प्रकृति के परिपेक्ष में आलंबन और उद्दीपन के चित्र मन को मुग्ध कर लेते हैं। आपके सानिध्य में बस्ती जनपद के छंदकारों को जो सहयोग मिला उसका वर्णन आज के जनपदीय साहित्यिक समृद्धि के परिपेक्ष में जितना भी किया जाए कम है। कुल 15 ग्रंथों में प्रकाशित अप्रकाशित जो भी हो रंगपाल के काव्य कला का रूप अपना अनूठा है। आपके ग्रन्थों पर एक वृहद स्वतंत्र शोध की अपेक्षा है । अप्रकाशित पुस्तक प्रकाशित होकरके हिंदी काव्य धारा का प्राण बने ऐसा मंतव्य है। आपका युगान्तकारी व्यक्तित्व साहित्य के अंग उपांगों को सदैव नयी चेतना देगा एसा विश्वास है।”

संस्कृतिक विभाग से रचनाओं का संग्रहण 

उत्तर प्रदेश संस्कृतिक विभाग के माध्यम से उनकी रचनाओं को संग्रहित- संकलित कर परीक्षण कराने का प्रयास हो रहा है। अपने कार्यकाल के दौरान रंगपाल की कृतिया और उनसे जुडे साज सामान को सांस्कृतिक धरोहर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पाल सेवा संस्थान तथा उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग प्रति वर्ष पाल जी के जन्म का उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। 

रीतिकालीन कवियों के आश्रय दाता

कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रयदाता कवियों में गिने जाते हैं। उनकी फाग रचनाओं में जहां श्रृंगार रस की प्रधानता है तो वहीं देशभक्ति के गीतों में वीर रस का समावेश है। उनके देशभक्ति के गीतों में महान सपूतों और वीरांगनाओं की वीरता का रोमांचक वर्णन है।

कालजयी रचनाएं

कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएं देश भक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। 

'रंगपाल के फाग’ प्रकाशित 

श्री राधेश्याम श्रीवास्तव श्याम हरिहरपुरी संत कबीर नगर द्वारा संपादित तथा चैहान पब्लिकेशन्स सैयद मोदी स्मारक गीताप्रेस गोरखपुर से ‘रंगपाल के फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें रंग उमंग भाग १ व भाग २ तथा रंग तरंगिणी का अनूठा संकलन किया गया है। इसमें विविध उमंगों में फाग के विविध प्रकारों को श्रेणीबद्ध किया गया है। डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने अपने शोध ग्रंथ बस्ती के छन्दकार में रंग उमंग के दोनों भागों का प्रकाशन की सूचना दी है। यह हनुमानदास गया प्रसाद बुकसेलर नखास चैक गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है।

लोकगीत अंतरात्मा में गूंजते हैं 

रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अंतरात्मा में गूँजते रहे हैं। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। 

मंगलाचरण :- फाग गीतों के संयोग और वियोग दोनो पक्षों को उजागिर किया गया है। दोनों के प्रारम्भ में दो-दो दोहों में मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया है- 

आनन्द मंगल रास रस हसित ललित मुख चंद।

रंगपाल हिय ललित नित ध्यान युगल सुखचन्द।

रंग उमंग तरंग अंग , रस अमंग सारंग।

रंगपाल बाधा हरण, राधा हरि नव रंग।।

रंग उमंग भाग 1 में 32 पृष्ठ है। कुछ छन्द प्रस्तुत हैं - 

ऋतु कन्त बिन हाय, लगो जिय जारने।

बिरहिन बौरी कान आम ये बौरे बौरे।

गुंजत भुंग गात मत्त मधु दौरे मधु दौरेभौरे।

बैरी विषय पपीहा पिय पिय यह लागी शोर मचाय -बानसो मारने।।1।।

फूले टेसु अनार और कचनार अपारे।

दहके जन चहुं ओर जो निरपूम अंगारे।

बीर समीर सुगंध बगारत,

बिरहांगिनियां थपकाय लगे अब बारने।2।

अमितपराग उड़ातजात लखि चित्त उड़ाई।

करि चहचही चकोर देत् हठि चेत भगाई।

कारी कोइलिया दई मारी,

दिन रतियां कूक सुनाय लगी हियफारने।3

पीर भीर मैं धीर धरहूं को नहिं आवै।

रहै लोक की लाज चहै जावै मन भावै।

करि योगिनी को भेष भ्रमब अब

सखि रंगपाल वलि जाय पिया कारने।4।

झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है। –

अति धूमधाम की आज होरी ह्वै रही।

डारहिं केसर रंग झपट भरि भरि पिचकारी

झमकिअबीर की झोरिझेलिदेवैकिलकारी।

मेलहिं मूठ गुलाल परसपर ,

क्वउ रहत नहीं कुछ बाज होरी ह्वै रही।1

कहहिं कबीर निशंकझूमिझुकिबांहपसोरी।

उछल विछलि मेड़राय विहंसिदेवै करतारी।

नाचत गावत भाव बतावत,

बहु भांति बजावहिं बाज होरी रही।।।2।।

विविध स्वांग रचि हंसि हंसाय देवैंहोहकारी।

फूले अंग न समहिं नारि गन गावै गारी।

पुलकित आनंद छाक छके सब,

सजिनिज निज साज समाज होरी ह्वै रही।

ढपटि लपटि मुख चूमि लेहि घूुघट पर टारी।।

रोरी मलहिं कपोल भजहिं कुमकुमा प्रहारी।

रंगपाल तजि लाज गई भजि ,

मदन को राज होरी ह्वै रही।।4।। 

चैताली झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है 

यह कैसी बानि तिहारी अहो प्रीय प्यारी।

बैठी भोहें तानि जानि क्यों होहु अनारी।

आपुते लीजे जानि बिरह दुख कैसो भारी।

लेति बलाय एक तूहि बलि ,

जियरा की जुड़ावन हारी अहो पिय प्यारी।

केती इत उत करहिं  अनैसी झूठी चोरी।

मुख पर चिकनी बात, देहिं पीछे हंसि तारी 

आगे आगि लगाये कुटिल पुनि ,

बनि जांहि बुझावन हारी अहो पिय प्यारी।

रंग उमंग भाग 1 के एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है-

ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा।

भयो पपीहा यह बैरी, नहि नेक चुपाय।

लेन चाहत विरहिनि कैजिमरा पिय पिय शोर मचाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।

विरहि करेज रेज बैरी मधु दिये नेजन लटकाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

अजहुं आवत नहीं दैया, मधुबन रहे छाय।

रंगपाल निरमोही बालम, दीनी सुधि बिसराय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

रंग उमंग भाग 2 :-

प्रथम भाग की तरह रंग उमंग भाग 2 फाग गीतों की बासंती छटा विखेरता है। वे ना केवल रचयिता अपितु अच्छे गायक भी थे। सारे गीत बड़े ही मधुर हैं। कुछ के बोल इस प्रकार हैं-

हाय बालम  बिनु दैया।

पिय बनही से बोलो उनहीं के घूघट खोलो,

कहो कौन की चोरी  फगुनवा में गोरी ,

दोउ खेलत राधा श्याम होरी रंग भरी,

सखि आज बंसुरिया बाला, गजब करि डाला,

कहां बालम रैनि बिताये भोर भये आये।।

उनके गीत मनको बरबस हर लेते हैं।  रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-

यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।

राज प्रजा नरनारि सब 

घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।

होरी होरी है।

बरस बरस को दिन मन भायो,

हिलि मिलि सब खेलहुयार।

होरी होरी है।

रंगपाल असीस देत यह 

सब मगन रहे फगुहार।

होरी होरी है।

यहि द्वारे मंगलचार ।

होरी होरी है।

‘रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक के उमंग भाग 4 एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है। यह गीत रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है-

सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।

बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।

रेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत झोरी।

कुमकुम चोट चलाय परस्पर ,

अति बिहंसहिं युत अनुराग,

बरसहिं सुमन कली ।।1।।

तिहि छल छलिया छैल बरसि रंग करि रस बोरी ।

प्यारी की मुख चूमि मली रोरी बरजोरी ।

तबलौं आतुर छमकि छबीली,

छीनी केसरिया पाग लीनी पकर अली। 2।

चुनि चूनरि पहिराय दई रोरी अंजनबरजोरी 

नारि सिंगार बनाया कपोलन मलि देईरोरी।

तारी दै दै हंसति कहति सब,बोलहुं किन श्याम सभाग सुनियत रामबली।4।

अपनों करि पुनि छोड़ि कहति नन्दकिशोरी 

भूलि न जइयो बीर रंगीली आज की होरी 

रंगपाल वलि कहहिं देवगन,धनि धनि युग भाग सुहाग-अली प्रेम पली।।5।।

सखि आज0।।

     रंग उमंग भाग 1 व 2 की तरह गीत सुधा निधि में डा. सरसजी ने 200 फाग व होरी गीतों तथा कजली गीतों के प्रकाशन की सूचना दी हैं। यह ग्रंथ प्रथम बार पूना और बाद में गोरखपुर से प्रकाशित हुई है। सम्पूर्ण पुस्तक में प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में वर्णन का वियोग और संयोग पक्ष अपने में न्यारा है। एक छन्द प्रस्तुत है-

गरजत मंद मंद घन घेरे,

बरसत झर झर सलिलि दामिनी दम कि रही  चहुं फेरे।

झिल्ली गन दादुर धुनि पूरित पिय पिय पपिहन टेरे।

मत्त मुरैलिन मध्य मोर नचि कूकत धाम मुड़ेरे।

झूलत मुदित प्रिया अरु प्रीतम, दोउ मणि मंदिर मेरे।

अलि मडराहिं सहस सौरभ लहि देति चंबर अलि फेरे।

रंगपाल बारत रति कामहिं उपमा मिलत न हेरे।।

     कवि रंगपाल को उनकी उत्कृष्ट रचना के लिये हिंदी साहित्य के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद जी ने उन्हें महाकवि की उपाधि से अलंकृत किया था। यों तो कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएँ देशभक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रय दाता कवियों में गिने जाते हैं। 



लेखक का परिचय
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वर्डसैप्प नम्बर + 91 9412300183)







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