Friday, January 16, 2026

शाकद्वीप : सूर्य की उपासना और वैदिक संस्कृति का पुरातन केंद्र रहा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

मूल स्थान के बारे में मतभिन्नता:ये

शास्त्रों में “द्वीप” शब्द का अर्थ केवल जल-से-घिरा भूखंड नहीं होता, बल्कि “संस्कृति–क्षेत्र” या “आध्यात्मिक भूभाग” भी होता है। शाक द्वीप का उल्लेख विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण और ब्रहमाण्ड पुराण में मिलता है। शाक द्वीप मुख्य रूप से भारतीय शास्त्रों के अनुसार जंबूद्वीप (भारत) के पश्चिम में स्थित एक पौराणिक द्वीप है, जिसे आज के मध्य एशिया, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान के क्षेत्रों से जोड़ा जाता है। जो प्राचीन ग्रंथों के वर्णनों पर आधारित है। कुछ विद्वान इसे वर्तमान अफ्रीका से भी जोड़ते हैं, खासकर 'शाक' (वनस्पति) की बहुलता के कारण, जहाँ अफ्रीका को सबसे अधिकवनस्पतियों वाला महाद्वीप बताया गया है, लेकिन यह ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से एक अनुमान है, न कि निश्चित स्थान।

     शाक द्वीप भारत के दक्षिण पूर्व में कहा जाता है जहां शाक जाति के वृक्ष थे। इस देश को आस्ट्रेलिया कहते हैं जहां 300 प्रकार के युकलिप्टस प्रजाति के वृक्ष हैं। वायु पुराण, अध्याय 36 में इसे अग्नि द्वीप कहा गया है। इस द्वीप के स्वामी बहुत वीर हुआ करते थे। जम्बूद्वीप के राजा प्रियव्रत थे। इनके सात पुत्र थे - जलद, कुमार, सुकुमार, मरीचक, कुसुमोद, मौदाकि और महाद्रुम थे,जो  संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम भी हैं। मठ्ठे का सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाक द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष (देश) हैं।

पुराणों में सप्तद्वीप :- 

भारतीय पुराणों में सप्तद्वीपों का वर्णन प्राप्त होता है। जिनके अलग अलग वर्ण, उपद्वीप, पर्वत, सागर, इष्टदेव, नदियाँ तथा शासक रहे हैं। सनातन धर्म के अनुसार सम्पूर्ण भूलोक को इन्ही सात द्वीपों में बांटा गया है। जम्बू द्वीप का आशय आज के यूरेशिया (यूरोप+ एशिया) के लिए प्रयुक्त किया गया है। जिसके आसपास 6 अन्य द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। भूलोक के मध्य में जम्बू द्वीप है। इसका विस्तार एक लाख योजन का बतलाया गया है। 

       जम्बू द्वीप की आकृति सूर्यमंडल के सामान है। वह उतने ही बड़े खारे पानी के समुद्र से घिरा है। जम्बू द्वीप और क्षार समुद्र के बाद शाक द्वीप है, जिसका विस्तार जम्बू द्वीप से दोगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाण वाले क्षीर (दूध या दही) वाले समुद्र से घिरा हुआ है। शाकद्वीप एक पौराणिक भूमि है जिसका वास्तविक स्थान आधुनिक मानचित्रों में पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो मध्य एशिया और उससे सटे पश्चिमी क्षेत्रों से संबंधित है। 

शाक द्वीप को क्षीरसागर माना गया:- 

इस द्वीप के मध्य में एक अतिविशाल शाक (सागौन)का वृक्ष है और उसी वृक्ष के कारण इस द्वीप का नाम शाक द्वीप पड़ा है। महाभारत में संजय ने धृतराष्ट्र को जम्बू द्वीप का विस्तार 18600 योजन बताया है। शाक द्वीप का विस्तार जम्बू द्वीप से दुगना अर्थात 37200 योजन बताया है। यह महान द्वीप चारो ओर से दुग्ध सागर से घिरा हुआ है। इसी सागर को पुराणों में प्रसिद्ध "क्षीरसागर" माना गया है जहाँ नारायण शेषनाग पर शयन करते हैं। इस द्वीप के स्वामी वीरवर "भव्य" हैं जिन्होंने इस द्वीप को अपने सात यशस्वी पुत्रों में बाँट दिया है। उन्हीं के नाम पर ये सात वर्ष (खंड) जाने जाते हैं: जलद, कुमार, सुकुमार, मरीचक , कुसुमोद,मौदाकि और महाद्रुम। इस द्वीप पर सात मुख्य पर्वत हैं: मेरु, मलय, जलधार, रैवतक ,श्याम, दुर्गशैल और केसरी। इस द्वीप में सात पवित्र नदियां बहती हैं। ऐसी मान्यता है कि इन नदियों का जल अमृत के समान है, जिसे पीने से लोग रोग, व्याधि एवं मृत्यु से बचे रहते हैं। ये नदियां - सुमुमरी , कुमारी, नलिनी , धेनुका , इक्षु , वेणुका और गभस्ती हैं। इस द्वीप में चार वर्ण हैं: ब्राह्मण- भृग, क्षत्रिय- मगध, वैश्य- मानस और शूद्र- मंदग। इस द्वीप में चार जनपद हैं- मङ्ग- यहाँ भृग अर्थात ब्राह्मण निवास करते हैं। मशक- यहाँ मगध अर्थात क्षत्रिय निवास करते हैं। मानस- इस जनपद में मानस अर्थात वैश्य निवास करते हैं और अंतिम मंदक- यहाँ मंदग अर्थात शूद्र निवास करते हैं। इस द्वीप में मृत्यु का कोई भय नहीं होता। यहाँ कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता तथा यहाँ के निवासी तेजस्वी एवं क्षमाशील हैं। यहाँ विशेष रूप से भगवान सूर्य नारायण का पूजन किया जाता है। 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण:- 

भागवत पुराण (5.23.9–10) के अनुसार -शाकद्वीप में सूर्यदेव की पूजा विशेष रूप से की जाती है।वहाँ के ब्राह्मण “माघ, मारिच, भृगु, अंगिरस, कश्यप” वंश से हैं। ये ‘मघा उपासक’ कहे गए हैं।

अर्थात — शाकद्वीप में रहने वाले ब्राह्मण सूर्योपासक थे, जिन्हें “माघ ब्राह्मण” या “माघ सूर्योपासक ब्राह्मण” भी कहा गया।पुराणों में यहाँ के ब्राह्मणों का बड़ा महत्त्व बताया गया है। इन्हे ब्राह्मणों में सर्वोत्तम माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन ब्राह्मणों का जन्म सूर्य के अंश से हुआ है। मनुस्मृति में लिखा है कि श्राद्ध कर्म सूर्यास्त के पश्चात नहीं किया जाता किन्तु अगर शाक द्वीप के ब्राह्मण की उपस्थिति हो तो उसे सूर्य के सदृश मान कर ये कर्म किया जा सकता है। महाभारत में ऐसा वर्णित है कि जब श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ट रोग हो गया तब श्रीकृष्ण ने शाक द्वीप से 18 शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को जम्बूद्वीप में आमंत्रित किया। उन ब्राह्मणों ने साम्ब का कुष्ट रोग ठीक कर दिया और बाद में वे मगध (वर्तमान का बिहार) में आकर बस गए। कहा जाता है कि वराहमिहिर, आचार्य कौंडिन्यायान, आर्यभट्ट, बाणभट्ट एवं चाणक्य भी शाकद्वीपीय ब्राह्मण ही थे। भारत के अन्य ब्राह्मण शाक- द्वीपीय ब्राह्मणों को महत्त्व नहीं देते एवं इन्हे हेय दृष्टि से देखते हैं।

पौराणिक उल्लेख:- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का उल्लेख भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण और महाभारत के भूगोल वर्णनों में स्पष्ट रूप से मिलता है। इसका प्राचीन संदर्भ भविष्य पुराण का भी अति विश्वसनीय प्रमाण है। भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35, श्लोक 20-23) में वर्णन इस प्रकार व्यक्त किया गया है - 

शाकद्वीपो नाम द्वीपो यत्र दिवाकरः स्वयं।

देवपूजनमासीनः सर्वं लोकं प्रकाशयेत्॥

तत्र ब्राह्मण जातीनां बृहस्पतेः सुतेन हि।

प्रतिष्ठापिता वंशाः स्युः यथा ज्योतिष विशारदा:।।

शाब्दिक अर्थ:- 

शाकद्वीप नामक द्वीप है, जहाँ सूर्यदेव स्वयं देवपूजन में संलग्न होकर सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं। वहाँ ब्राह्मण जातियाँ बृहस्पति के पुत्र द्वारा स्थापित की गईं, जो ज्योतिष में निपुण हैं।

      इससे यह स्पष्ट प्रमाण है कि शाक द्वीप शक आक्रमणकारियों का प्रदेश नहीं था। कुछ इतिहासकार इसे शक कुषाण से जोड़ते हैं । वास्तव में यह सूर्योपासक, ब्राह्मण संस्कृति का केंद्र था, जिसकी स्थापना गुरु बृहस्पति के वंशजों ने की थी। वहां बृहस्पति के आदेश के अनुसार ब्राह्मण वंशजों का वास है, जो ज्योतिष और चिकित्सा के द्वारा लोक कल्याण करते रहे हैं।

मेधातिथि शाकद्वीप का प्रथम शासक 

भारत का प्राचीन इतिहास हमें जम्बू द्वीप के बगल में स्थापित शाकद्वीप के बारे में भी कुछ जानकारियां देता है। शाकद्वीप सात द्वीपों (जम्बूद्वीप आदि) में से एक है। यह द्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दूध - दही के समुद्र से घिरा हुआ है। इस शाकद्वीप में शाक (सागौन) नामक वृक्ष बहुतयात में पाए जाते थे , जिनकी मनोहर सुगंध पूरे द्वीप में छाई रहती थी । इन्ही शाक वृक्षओं के नाम से संभवतया इस द्वीप का नाम भी शाकद्वीप रखा गया होगा । यहाँ के लोग बीमारियों से दूर तथा हजारों वर्षों तक जीवित रहने वाले थे।

     राजा प्रियव्रत पौराणिक भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण और महान राजा थे, जो स्वायंभुव मनु के पुत्र थे उनके भाई उत्तानपाद थे (जो ध्रुव के पिता थे) । राजा प्रियव्रत भगवान के परम भक्त थे, जिन्होंने ब्रह्मा की आज्ञा पर पृथ्वी का राज संभाला था। 

        राजा प्रियव्रत एक ऐसे आदर्श राजा थे जिन्होंने सांसारिक भोगों से ऊपर उठकर ईश्वर भक्ति और धर्म स्थापना पर जोर दिया, और उनकी कथाएँ भारतीय पौराणिक कथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। राजा प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि 10 पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत ये 3 पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मन्वंतरों के अधिपति हुए।

     प्रियव्रत के पुत्र मेधातिथि शाकद्वीप के वास्तविक शासक थे, जिन्होंने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया और इस द्वीप को व्यवस्थित कर सूर्योपासना की परंपरा शुरू की। मेधातिथि का समय निश्चित नहीं है, लेकिन विद्वानों के अनुसार उनका काल 9वीं शताब्दी या 10वीं शताब्दी की शुरुआत माना जाता है, क्योंकि वे अपनी टीका 'मनुभाष्य' में कुमारिल (7वीं सदी) और मिताक्षरा (1076 - 1121 ई. ) का उल्लेख करते हैं, जिससे पता चलता है कि वे 7वीं सदी के बाद और 11वीं सदी से पहले हुए थे। मेधातिथि मनुस्मृति के प्राचीनतम भाष्यकार हैं। उन्होने मनुस्मृति पर 'मनुभाष्य' नामक एक विशद टीका लिखी है। अपने ग्रंथ में ये कुमारिल का उल्लेख करते हैं अत: इनका जीवनकाल सातवीं शताब्दी क बाद का होना चाहिए। मनुस्मृति पर लिखी मिताक्षरा (1076 से 1121 ई.) में इनका उल्लेख है। अत: डॉ० गंगानाथ झा के अनुसार इनका काल नवीं शताब्दी ठहरता है। 

       मनु स्मृति के प्रथम भाष्यकर मेधातिथि का समय (825 - 900 ई. ) माना जाता है। इन्होंने मनु महाभाष्य नामक टीका लिखी है। मेधा तिथि ने अनुमान लगाया की मनुस्मृति के श्लोकों का संग्रह चौथी पांचवी शताब्दी ईस्वी में किया गया होगा। ( सन्दर्भ : ,"वैदिक व्यवस्था का सार मनुस्मृति: एक संक्षिप्त परिचय"(https://www.jetir.org/papers/JETIR1904U08.pdf)

    शाकद्वीप में भी सात उपद्वीप थे जिनका नाम क्रमश: पुरोजव, मनोजव, पवमान, धुम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और चित्रधार है। ये नाम मेधातिथि के पुत्रों के नाम पर रखा गया था जिन्होंने इन उपद्वीपों पर हजारों वर्षों तक राज किया था । यहाँ ईशान, उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस नामक सप्त मर्यादा पर्वत थे तथा अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्ठि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति नामक सात नदियाँ थी । यहाँ की जातियाँ (वर्ण) ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत तथा अनुव्रत हैं तथा इनके इष्टदेव श्रीहरि थे। 

कूर्म पुराण के अनुसार :- 

कूर्म पुराण के अनुसार सात वर्ष, सात कुल पर्वत और सात नदियों वाला शाक द्वीप क्रौंच से दुगने आकार का तथा दधि सागर से घिरा हुआ है। सात पर्वत इस प्रकार हैं - उदय, रैवत, श्याम, काष्ठगिरि, अम्बिकेय, रम्य तथा केसरी। सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, वेणुका, इक्षुका, धेनुका तथा गमस्ति नाम की ये सात नदियाँ हैं। इन नदियों का जल पीने के कारण यहाँ के लोग रोग-शोक, राग-द्वेष, दु:ख-ताप तथा भय- आतंक से सदैव मुक्त रहते हैं। यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को क्रमश: भृग, मगध, मानस और मंदग नामों से जाना जाता है। ये लोग व्रत, उपवास, होम आदि के द्वारा भुवन भास्कर भगवान सूर्यदेव का पूजन-आराधन करके उनके आशीर्वाद से अपने दोनों लोक को सुखी बनाते हैं।

मेधातिथि द्वारा विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण :- 

शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई। लेकिन उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था।

     मेघातिथी ने सूर्यनारायण की आराधना की। भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर मेघातिथी को साक्षात् दर्शन दिए तथा वरदान मांगने को कहा, तब मेघातिथी ने सूर्य भगवान से वर मांगा कि हे भगवन्, मैंने आपका एक मंदिर बनवाया है मगर इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कराने वाले तथा विधि-विधान से पूजा करने वाले कोई ब्राह्मण शाकद्वीप में नहीं है । अत: हे भगवन् अब आप ही कोई उपाय सुझाएँ।


आठ सूर्य पुत्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा :- 

भगवान सूर्य ने तदपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। ये आठों सूर्यपुत्र सामगान करते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगे कि हे परम पिता हमारे लिये क्या आज्ञा है ? भगवान सूर्य ने कहा शाकद्वीप में मेघातिथी ने मेरा विशाल मंदिर बनवाया है। तुम लोग वहां जाकर मंदिर में मेरी प्राण प्रतिष्ठा करो, मेरी पूजा-अर्चना विधि विधान से कर इनका कृत्य सुधारो तथा धर्म का प्रचार करो।

      इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य/सौर भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।

भारत के सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर :- 

भारत में सूर्य मंदिर देश की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का प्रमाण हैं। हिंदू सूर्य देवता सूर्य को समर्पित ये मंदिर जटिल नक्काशी, भव्य वास्तुकला और ईश्वर से गहरा जुड़ाव दर्शाते हैं। ओडिशा के राजसी कोणार्क सूर्य मंदिर से लेकर जम्मू और कश्मीर के प्राचीन मार्तंड सूर्य मंदिर तक, प्रत्येक मंदिर का अपना अनूठा इतिहास और स्थापत्य शैली है। गुजरात में मोढेरा सूर्य मंदिर, जिसे 1026 ई. में बनाया गया था, अपनी शानदार नक्काशी और विषुव के दौरान मूर्ति पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश के साथ एक और उल्लेखनीय उदाहरण है। 


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



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