कुल परम्परा
इक्ष्वाकु वंश में जन्में युवनाश्व के पिता का नाम कुलवाश्व (या कुवलयाश्व/धुन्धुमार) था, जो अयोध्या के सूर्यवंशी राजा थे ।
युवनाश्व का जन्म राजा कुलवाश्व की पत्नी सुपर्णा के गर्भ से हुआ था। इनका विवाह राजा महापद्म की कन्या गौरी से हुआ था। जिन्हें पुरुष होते हुए भी गर्भ धारण करना पड़ा था। यहाँ से ही सतयुग आरम्भ होता हैं। इक्ष्वाकु वंश की वंश श्रृंखला इस प्रकार रहा -
1- ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि
2- मरीचि के पुत्र कश्यप
3- कश्यप के पुत्र विवस्वान या सूर्य
4- विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु – जिनसे सूर्यवंश का आरम्भ हुआ।
5- वैवस्वत के पुत्र नभग
6- नाभाग
7- अम्बरीष
8- विरुप
9- पृषदश्व
10- रथीतर
11- इक्ष्वाकु –
इक्ष्वाकु वंश सूर्यवंश राजवंश प्राचीन भारत के शासकों का एक वंश है।
12- कुक्षि
13- विकुक्षि
14- पुरन्जय
15- अनरण्य प्रथम
16- पृथु
17- विश्वरन्धि
18- चंद्र
19- युवनाश्व- यही सतयुग समाप्त हो जाता है और इनके विचित्र ढंग से जन्मे संतान मान्धाता से त्रेता युग शुरू हो जाता है।
राजा युवनाश्व की विचित्र कहानी
आज के आधुनिक युग में हम नए नए अविष्कार कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों से ये बात सिद्ध हो चुकी है कि ऐसी अधिकतर चीजें जो आज हम बना रहे हैं, उसका वर्णन हमारे धर्म ग्रंथों में पहले ही दे दिया गया था। ये इस बात को सिद्ध करता है कि सनातन हिन्दू धर्म ना केवल अति-प्राचीन है अपितु बहुत वैज्ञानिक भी। आज हम जो सेरोगेसी की बात करते हैं वो सदियों पहले पुराण और महाभारत में वर्णित था। उसी प्रकर आज के वैज्ञानिक इस बात पर भी शोध कर रहे हैं कि क्या पुरुष कृत्रिम रूप से गर्भ धारण कर सकते हैं? आज की ये कथा इसी बात का उत्तर है।
हम सबने श्रीराम के वंश के बारे में पढ़ा है। ब्रह्मा जी से 19वीं पीढ़ी में एक राजा हुए महाराज युवनाश्व। महाराज युवनाश्व अपने आप में अनोखे हैं क्यूंकि उन्होंने पुरुष होते हुए भी गर्भ धारण किया था। इस कथा का वर्णन हमें नारद पुराण में मिलता है।
विवाह के बहुत वर्षों के बाद भी दोनों निःसंतान रहे। संतान प्राप्ति के लिए महाराज युवनाश्व ने वन जाकर तप करने का निश्चय किया। उन्होंने राज-पाठ मंत्रियों के हाथ सौंपा और वन जाकर तपस्या करने लगे। उसी दौरान उनकी भेंट महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन ऋषि से हुई। जब महर्षि च्यवन ने महाराज युवनाश्व की समस्या सुनी तो उन्होंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि यज्ञ के प्रभाव से उन्हें संतान प्राप्त हो सकती है। तब महाराज युवनाश्व ने उनसे ही उस यज्ञ को संपन्न करने का अनुरोध किया। महर्षि की स्वीकृति के बाद महाराज युवनाश्व ने अपने मंत्रियों और सेना को वहाँ बुलाया और च्यवन ऋषि के निर्देशानुसार एक महान "काम पुत्रेष्टि यज्ञ" का आयोजन किया।
गर्भ धारण की रोचक कथा
राजा युवनाश्व के विवाह के वर्षों बाद भी उन्हें संतान नहीं हुई। इस दुःख को उन्होंने महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि च्यवन को बताया। महर्षि च्यवन ने पुत्र कामेष्टी यज्ञ कराने की योजना बनाई। यज्ञ एक वर्ष तक अविलम्ब चलता रहा और यज्ञ समाप्ति पर महर्षि च्यवन ने एक मटके में अभिमंत्रित जल रख दिया जिसे पीकर महारानी गौरी गर्भ धारण कर सके। यज्ञ समाप्त होने के बाद सभी लोग थकान से पीड़ित होकर गहरी निद्रा में सो गए।
च्यवन ऋषि द्वारा एक मटके में जल को अभिमंत्रित कर उसे हवन कुण्ड के पास रख दिया था। कुछ समय बाद रात्रि हो गई। रात्रि होने के बाद सभी विश्राम करने लगे। इसके बाद राजा युवनाश्व को बहुत जोरदार प्यास लगी। उन्होंने जल के लिए बहुत पुकारा लेकिन सभी के गहरी निद्रा में होने के कारण कोई उन्हें नहीं सुन सका। बहुत ढूंढने के बाद भी उन्हें जल नहीं मिला किन्तु तभी यञभूमि के पास उन्हें एक मटके में रखा जल दिखा। वे नहीं जानते थे कि वो जल अभिमंत्रित है जिसे उनकी पत्नी को पीना है और इसी अज्ञानता में उन्होंने उस अभिमंत्रित जल को पीकर सो गए।
सुबह होने के पश्चात् महर्षि च्यवन ने जब मटके को खाली देखा तो उन्होंने सबसे पूछा। युवनाश्व की निद्रा खुलने के बाद उन्होंने बताया कि वो जल तो उन्होंने पी लिया है। जब महर्षि च्यवन ने ये देखा तो उन्होंने कहा कि अब उनके ही गर्भ से संतान की उत्पत्ति होगी।
महाराज युवनाश्व ने उनसे बड़ी प्रार्थना की कि वे उसका कोई उपाय बताएं किन्तु वे भी विवश थे क्यूंकि वो जल यज्ञ संपन्न कर अभिमंत्रित किया गया था और उसके फल को अब रोका नहीं जा सकता था।
जल पीते ही उनके शरीर में कुछ कुछ बदलाव आरम्भ हुआ और वे अस्वस्थ हो गए थे । वे गर्भवती हो गए और प्रसव पीड़ा में चिल्लाने लगे। युवनाश्व अपने आप में विशेष हैं। इन्होंने पुरुष होते हुए गर्भ धारण किया था।
जब संतान के जन्म लेने का सही समय आया तो राजा बहुत घबरा गए। महर्षि च्यवन के लिए भी ये असाधारण स्थिति थी। तब उन्होंने देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का आह्वान किया। तब अश्विनी कुमारों ने महाराज युवनाश्व के कोख को चीर कर एक बालक को बाहर निकाला। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि किसी पुरुष ने संतान उत्पन्न किया हो इसीलिए इस अद्भुत घटना के साक्षी बनने हेतु देवराज इंद्र सहित सभी देवता वहॉं उपस्थित हो गए थे।
उस बालक के जन्म के साथ एक समस्या ये उत्पन्न हुई कि अब उसे दुग्धपान कौन करवाएगा? तब देवराज इंद्र स्वयं वहाँ आये और उन्होंने उस बालक के मुँह में अपनी तर्जनी अंगुली डाली जिससे दिव्य दूध निकल रहा था। उस दिव्य दुग्ध से तृप्त होकर वो बालक 13 अंगुल बढ़ गया और संतुष्ट होकर सो गया।
तब इंद्र ने कहा - "मम धाता", अर्थात मैं ही इसकी माँ हूँ। इसी कारण उस बालक का नाम "मान्धाता" पड़ा। देवराज इंद्र ने उसे ये वरदान दिया कि वो चक्रवर्ती राजा बनेगा जिसका यश दिग-दिगन्तर तक फैलेगा।
देवराज इंद्र का वरदान फलीभूत हुआ और मान्धाता संसार के सबसे महान सम्राटों में एक बने। कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवनकाल में प्रत्येक दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक राज किया। उन्होंने 100 अश्वमेघ एवं 100 राजसुय यज्ञ किये और 10 योजन लम्बे और एक योजन ऊँचा स्वर्ण मत्स्य का ढेर बना कर ब्राह्मणों को दान किया था। इन्ही मान्धाता से 44 पीढ़ी के बाद इक्ष्वाकु कुल में श्रीराम ने जन्म लिया।
युवनाश्व की मृत्यु अयोध्या में हुई थी और उनकी मृत्यु के बाद मान्धाता को गद्दी पर बैठाया गया जो बहुत ही प्रसिद्ध राजा हुए थे।
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