Thursday, December 25, 2025

भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भोजपुरी का व्यापक विस्तार 
भारत भाषाई विविधताओं का देश है जहां सैकड़ों भाषाएं तथा उनके अन्तर्गत हजारों बोलियां व उपबोलियां प्रचलित हैं। हिन्दी की ऐसी ही एक बोली भोजपुरी है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश,बिहार तथा फिजी सूरीनाम मॉरीशस आदि देश के बड़े भाग में बोली जाती है। भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं। अपने व्यापक प्रभाव के कारण अनेक साहित्यकार तथा राजनेता इसे अलग भाषा मानने का आग्रह भी करते हैं। सरकार इसके विकास के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रही है।

जीवन - परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। उनका पालन-पोषण उनके ननिहाल बनारस के जरी परसीपुर गांव में हुआ था। उन्होंने उस युग में पढ़ाई लिखाई के लिए क्रांतिकारी सन्यासी बाबा गोविन्ददास के द्वारा स्थापित विद्यालय में कक्षा 5 तक की शिक्षा ग्रहण की थी। इस विद्यालय का प्रभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। वन्दे मातरम का पाठ और मामा सत्य नारायण दुबे के क्रांतिकारी स्वभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। गांव में अपने माता-पिता तथा अन्य लोगों से भोजपुरी लोकगीत व लोककथाएं सुनकर उनके मन में भी साहित्य के बीज अंकुरित हो गये थे । कुछ समय बाद उन्होंने कविता लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया ।

भोजपुरी काव्य का चयन
भोजपुरी काव्य मुख्यतः श्रृंगार प्रधान होते है। इस चक्कर में कभी-कभी तो यह अश्लीलता की सीमाओं को भी पार कर जाता है। होली के अवसर पर बजने वाले गीत इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इसके कारण भोजपुरी लोककाव्य को कई बार हीन दृष्टि से भी देखा जाता है। चंद्रशेखर मिश्र इससे व्यथित हुए थे। उन्होंने दूसरों से कहने की बजाय स्वयं ही इस धारा को बदलने का निश्चय किया।

स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित
1942 के आंदोलन में गोविंद प्रसाद जी और मामा सत्य नरायण दुबे जी के गिरफ्तारी के बाद मिश्र जी अपने साथियों के संग परसीपुर स्टेशन को आग लगा दिया था। उस जगह से वे इलाहाबाद फरार हो गए थे, जहाँ उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा था।  

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

            साहित्यिक कृतियां :- 

'दउरी हंकवा’
आजाद भारत में मिश्र जी के लेखनी से वीररस को नई ऊंचाई दी। पं. चंद्रशेखर मिसीर जी की पहिला रचना 'दउरी हंकवा' थी। इसमें गांव के दलित समाज पर सामंती वर्ग की ओर से होने वाला अत्याचार को दर्शाया गया है । समाचार 'आज' में यह रचना विशेष नोट के साथ प्रकाशित हुआ था।बाद में आज, उत्तरप्रदेश, सन्मार्ग में इनकी रचनायें प्रकाशित होने लगी। 

नागरी प्रचारिणी सभा’ में संपादक
कुछ समय के बाद बनारस के ' नागरी प्रचारिणी सभा' में इन्हें 'संपादक के रूप में नियुक्त हो गए थे। जहां वे लंबे समय तक जुड़े रहे। वे आकाशवाणी से भी बहुत लम्बे समय तक जुड़े रहे।

अन्य रचनाएं
इसके बाद अनेक ग्रंथों की रचना मिश्र जी ने की है - लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जन मानस तक पहुंचाया।


पृष्ठभूमि सहित प्रमुख रचनाएं 
राष्ट्र जागरण के लिए “कुंवर सिंह” उनके लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचाकर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। 'कुँअर सिंह' की भूमिका सम्पूर्णानंद जी लिखी इस प्रकार लिखी है - 
झूमत बा इतिहास जहां 
तहँ कईसे भूगोल रही ख़तरे में। 
X।    X।      X।    X।      X। 
छुरी कटारी बिकय सगरों, 
चूड़हारिन गांव में आवत नाहीं। 

 यह महाकव्य 1966 में प्रकाशित हुआ है। 1958 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। उस समय बाबू रघुबंश नारायण सिंह जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली भोजपुरी मासिक पत्रिका में बाबू कुंअर सिंह पर एक बड़ा लेख 'बिहार केशरी बाबू कुंअर सिंह' पर आया । इस लेख का असर पं चंद्रशेखर मिश्र जी पर इतना पड़ा कि इस महाकाव्य का सृजन हुआ। इससे उनकी लोक प्रियता में चार चांद लग गये। कवि सम्मेलनों में लोग आग्रह पूर्वक इसके अंश सुनते थे। इसे सुनकर लोगों का देश प्रेम हिलोरें लेने लगता था। युवक तो इसके दीवाने ही हो गये। इस ग्रन्थ के कुछ पंक्तियां इस प्रकार है - 

नेवता बलि बेदी क छोड़िके, 
औरन कs कबहूँ यह आवत नाहीं ।
मारू, जुझारू बजई बजना, 
केहु दोसर राग बजावत नाहीं 

छोड़ि के बीर भरी कविता, 
रस दूसर में केहू गावत नाहीं । 
छूरी-कटारी बिकइ सगरउँ , 
चुरिहारिन गाउँ में आवत नाहीं ॥ 

पूतन से बुढवा कहले, 
रन कइसे चली रहली न जवानी ।
पेड़ किनारे क जानs हमईँ, 
बस चार दिना क बची जिनगानी ॥

वेद के मंत्र से पिंड ना लेबइ, 
बोलs तबउ जय देस क बानी ।
पानी बचाई के ना रखबs , 
तब ना हम लेबइ सराध में पानी ॥ 

छाँटली बाँह गिरि छप से, 
किछु दूरी बनी तब लाल निसानी ।
भोजपुरी भुइयाँ हुलसी, 
कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी ॥

भागीरथी से कहै धरती , 
जब लेइ लहरा नदिया इतरानी । 
बोलs ई नीर तोहार हु या, 
हमरे बेटवा के कटार के पानी ॥ 


द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में 

कुंवर सिंह की सफलता के बाद उन्होंने अनेक भोजपुरी और हिन्दी पुस्तकों की रचना की। जहाँ 'कुँअर सिंह' महाकाव्य वीर रस प्रधान महाकाव्य रहा उसी युग में 'द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है - 

तू दुर्गा बनके अइलू 
तोहरे बल वीर चलावत भाला ।
माई सरस्वती तू बनलु 
तोहरी किरिपा कविता बनी जाला ।
आठ भुजा नभचुंबी धुजा 
नहीं मैहर में सीढ़िया चढी जाला 
राउर उंचि अदालत बा, 
बदरा जहां से रचिकै रहि जाला।।

मोछि मुरेरत आंखि घुरेरत
पापी के केहू निरेखत नाहीं ।
ताकत बा हमही के सबै,
ओकरे ओरिया केहू ताकत नाहीं ।
सासु जेठानी खड़ी देवरानी,
दुसासन के केहू छेकत नाहीं । 
हे बिरना हमरे उपरा फटहिउ
धोतिया केहू फेकत नाहीं ।।

जीयत बा जबले भयवा,
एहसान ना आन के माथे चढइबै। 
गाढे में भारी भरोस हमार
ओन्है तजि के के भला गोहरइबै।
पांच पति पर ऐसी गती
एहि देस में साझहिं आग लगइबै ।
सासुर में सब कायर बा
अब नइहर से बिरना बोलवइबै ।। 

टारत भीड़ बढी द्रौपदी
जस हंसिनि पौरंत फाटत काई ।
ठाढि छछात लगै दुरगा,
केसिया कन्हिया रहलें छितराई । 
बोललिं धाइ धधाइ के बोललिं
एड़ी ऊँचाई के हाथ उठाईं ।
बाटै खड़ा बिरना अब देखब
बाघ बियानी बा केकरि माई ॥ 

नाहीं ढोवात अन्हार क भार 
बा ताकत बाटे ढोवाइ न देते। 
झंखत बानी अँजोर बदे 
दियरी, दियरी से छुवाई न देते। 
भोर समय पछितैबे अकेलइ 
राह अन्हारे देखाइ न देते 
बाती अकेलि कहाँ ले जरइ? 
तनिका भरि नेह चुवाई न देते।।

देखले कबउँ ना बाटी 
पढ़ले जरूर बाटीं 
सुनी ले कि रिखि मुनि 
झूठ नाहीं बोललें 
बरम्हा, बिसुन औ महेस
तीनिउँ मोहि गइले, 
माई तोर बीन कौन-
कौन सुर खोललें? 

द्रौपदी बेचारी बाटे 
खाली एक सारी बाटै, 
उहो ना बचत बाटै 
बैरि मिलि छोरले, 
अस गाढ़ी समय में 
देखब तोहार हंस 
हाली हाली उड़ेलें 
कि धीरे धीरे डोलेले।।

ना लूटिहई द्रौपदी कतहू 
मतवा भेजबू जौउ धोती एहां से।
रोज तू सुरुज बोवलू खेत मे 
रोजई भेजलू जोती एहीं से।
माई रे तोरे असिसन के बल 
पाउब छंद के मोती एहीं से।
बाटई हमे बिस्वास बड़ा निह्चाई 
निकले रस सोती एहीं से ॥ 

ढोग कविताई क रचाई गैल बाटै 
तब छोड़ी के दूआरी तोर बोल कहाँ जाईरे।
भाव नाही भाषा नाही छंद रस बोध नाही ।
कलम न बाटै नाही बाटै रोसनाई रे।
कौरव सभा मे आज द्रौपदी क लाज बाटै गाढे में परली बाटै मोर कविताई रे।
हियरा लगाई तनी अचंरा ओढाई लेते लडिका रोवत बा उठाई लेते माई रे ॥ 

ओहि दिन पुरहर राष्ट्र धृतराष्ट भैल 
भागि मे बिधाता जाने काउ रचि गईलें।
नाऊ त धरमराज नाहि बा सरम लाज 
हाइ राम लाज क जहाज पचि गईलें।
ठाट बाट हारि गईलें राजपाट हारि गईलें 
आगे अब काउ हारे काउ बची गईलें।
अंत जब द्रौपदी के दाँउ पर धई देले 
अनरथ देखि हहकार मची गईलें॥ 

नाहि ढेर बड़ि बाटै नही ढेर छोटी बाटै 
नाहि ढेर मोटि बाटै नाहि ढेर पतरी।
छोट छोट दांत बाटै मोती जोति माथ बाटै तनी मनि गोरी बाटै ढेर ढेर सवंरी।
बड़ बड़ बाल बाटै गोल गोल गाल बाटै 
गोड लाल लाल बाटै लाल लालअगुँरी।
बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली द्रौपदी जुआरिन के दाँउ पर बा धरी॥ 

द्रौपदी की करुण पुकार-

गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs 
हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।
तू बहिना बहिना कहबs, 
पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।
सावन में तोहें बांधे बदे,
जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।
आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,
भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।

दौड़े चले हैं मोहन पुकार पर- 
आगे से चीर बढ़े नभ में,
ओकरे पीछवाँ, दउरेले मुरारी।
आज कन्हैया भगें एतना,
उनका के ना छू पऊंले ऊरगारी ।
तीन विमान उड़े नभ में,
अगवां के बढ़े, ईहे होड़ लगा री।
आई सभा में, आकाश से कान्हा,
बढ़ावन लागे हैं, छोर से सारी।।

सारी सभा और कौरव अचंभित हैं- 
साड़ी घटे ना त, बोला दुर्योधन,
'खींच दु:शासन, जोर लगा दे।' 
ई सुन, द्रौपदी हंस बोली,
'तुहूँ अब जोर लगा शहजादे।
बाती दयादी के आई गई बा त,
बाती पे बाती, हमें भी कहे दे।
'चीर घटी न दु:शासन से,
अपने अन्हरा बपवा के पठा दे।।' 

कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं- 

आ के कन्हैया कहें बहिना,
'काहें बोलत नईखे, कोहांईल बाड़ी।
'राही में ना पनियो पियनी,
तनी देख हमें, कि घमाईल बाड़ीं।
'वाहन बा अबहीं मोर पाछे,
मो पैदल धावल, आवत बानी।
'अद्वारिकाधीश के तें बहिना,
लुगरी बदे काहें कोहांईल बाड़ी।।

कृष्ण का बहन को आश्वासन..

'खींचे दे साड़ी, मो देखत बानी,
ईहां पर के बलवान बड़ा बा।
कि बहिना के गोहार पे भाई भी,
आ के सभा बीचवा में खड़ा बा।
फारी के तें बन्हली सड़िया, 
अबहीं अंगुरी में निशान पड़ा बा।
आ सूद में ढांकब लाज तोहार,
मूल तोहार, पड़ा के पड़ा बा।।

द्रौपदी की चेतावनी 

खींच दु:शासन, जोर लगाई के
टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।
बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,
मोहन ना हमके बिसरईहें।
देर लगी, ना अबेर लगी,
बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।
भउजी के गोदी में होइहें तबो,
मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।
     
खड़ी बोली में “सीता” खण्ड काव्य
इनकी खड़ी बोली में सीता बेहतरीन खण्डकाव्य है जो देवी सीता के जीवन पर आधारित है। यथा - 

ऐसा ना दण्ड विधान बना
निर्दोष रहे, नृप तो भी सजा दे ।
देवो को सारवी बनायेगा कौन
सुरेश से जाके कोई समझा दे । 
शोभा न देता है राम के राज्य में
सत्य को आ के असत्य दबा दे । 
अग्नि में भी नही साहस था ,
जो सिया तन में एक दाग लगा दे ।।

सूरज के नाम पर वंश के गुमान वाले
समय कहेगा कौन खोटा,कौन है खरा।
सारी राजनीति एक दासी थी पलट गयी
खानदान खूब पहचानती थी मंथरा ।
बाप ने तो पूत को दिया था बनवास पर,
पूत ने तो एक पग और आगे है धरा । 
राम ने कलंक हीन नारी को निकालने की,
रवि-वंश में चलायी है नई परम्परा ।।

राम हो कि रावन हो, बलि चाहे बावन हो
यश-अपयश शेष दुनिया में रहेंगे । 
जब-जब चर्चा चलेगी रघुनाथ जी की,
सीय तेरी ! महिमा में तृण सम बहेंगे । 
आगे आगे राम सदा, पीछे पीछे सीय चली
किन्तु अब सीय आगे, राम पीछे रहेंगे ।
राम-सीता, राम-सीता , कोइ न कहेगा,
लोग सीताराम ! सीताराम ! सीताराम ! कहेंगे ।।

भीषम खण्ड काव्य
कुँअर सिंह, द्रौपदी, सीता जैसे महान काव्यों की रचना के बाद भोजपुरी में तीसरा और हिन्दी भोजपुरी के चौथा बेहतरीन खण्डकाव्य इन्होंने 'भीषम' खण्डकाव्य लिखा है। जो महाभारत के भीष्म के जीवन पर आधारित खण्ड काव्य है । इसमें वीर रस और करुण रस का अदभुत समन्वय है। यथा - 

छतिया उतान कइले भीषम तड़पि बोले,
रण बीच फैसला हमार बा तोहार बा ।
भाग्यमान जसुदा के कौन बा अभाव नाथ,
घीउ-दुध माखन कs लागल पहाड़बा ।

मोरे गंगा माई के त पास खाली पानी बाटै,
पनिया में का बा इहै मछरी सेवार बा ।
तबौ कुरुखेत बीच फैसला ई होइ जाई
दूध धार-दार बा कि पानी पानीदारबा ।

के रण जीतल हारल के,
कहइँ भीषम, केसव तू ही बतावs ।
जौन करइ के ना उ कइलs अब,
मारै बदै मति कष्ट उठावs ।
चूवत लोहू तरातर बा थकि-
जइबs न भूमि कठोर पै धावs ।
मैं रखि देब गला खुद चक्र पै,
मोहन माधव केसव आवs ।।

हिंदूस्तान, किसान और देस के लिए- 
आओ लगाव की बात करें , 
इस देस को तो अलगाव ने मारा ।
नीचे को जाता कभी न कोइ, 
इनका उनका सबका चढा पारा ।
एक मंदिर दूजे को मस्जिद, 
चहिये तीसरे को गुरुद्वारा ।
जो कुछ चाहिए दे दो उन्हे ,
हमे चाहिए हिंदुस्तान प्यारा ।। 

फूल लिखो कहीं पान लिखे, 
कहीं गेहूँ कहीं धान लिखो रे । 
खेत लिखो खलिहान लिखो , 
खलिहान के पास किसान लिखो रे । 
एक निवेदन है तुमसे,
तुम ओ मेरे बेटे जवान लिखो रे । 
देश के देखें जहाँ टुकड़े , 
उन्हे जोड़ के हिन्दूस्तान लिखो रे।।

गांव का बरखा” की कुछ पंक्तियां- 

हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।
सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं।
पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।
बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया।
बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे। हमर।।

बड़ी लजाधुर बिरई अंगुरी छुवले सकुचि उठेली,
ओहू लकोअॅरी कोहड़ा क बतिया, देखतै मुरझेली।
बहल बयरिया उड़ै चुनरिया फलकै लागै गगरिया,
नियरे रहै पनिघरा, लगै रोज नहावन रे। हमर ।।

मकई जब रेसमी केस में मोती लर लटकावै,
तब सुगना रसिया धीर से घुँघट आय हटावै।
फूट जरतुहा बड़ा तिरेसिहा लखैत बिहरै छतिया,
प्रेमी बड़ी मोरिनियाँ लागै मोर नचावन रे। हमर.।।

देखऽ अब का होला” की पंक्तियां 

जवन कब्‍बो ना करे के
तवनो कइलीं
जहँवा गइले पाप परेला
तहँवो गइलीं
जनलस अरोस-परोस
जानि गयल टोला
देखऽ अब का होला !

कहलीं, त कहलन -
ई का कइलऽ?
गंगा के घरे जनमलऽ
गड़ही में नहइलऽ? !
का ऊ ना जनतन जे कमल -
गड़हिए में होला ?
देखऽ अब का होला !

सरग हमैं ना चाहीं
हम त पा गइलीं
केहू जरो
हम त जुड़ा गइलीं
तोहार नाँव लेके
पी गइलीं जहर
रच्‍छा करिहऽ भोला
देखऽ अब का होला !

उँह...!
जवन होए के होई
तवन होई
एह डरन मनई
कब ले रोई।
हमके ?
'हरि प्रेरित लछिमन मन डोला'
देखऽ अब का होला !।।

" झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" 

अवधी के निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है। एसा ही एक मनोहारी युगल गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है - 

झुलनी में गोरी लागा हमार जिया , 
झुलनी का रंग साँचा हमार पिया 
कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया ,  
रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया
सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै , 
दै अगनी का आँचा हमार पिया। 
छिति जल पावक गगन समीरा ,   
तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया। 
रतन से बनी रे झुलनिया ,    
जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया। 
जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,  
गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया। 
टूटी झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,  
फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया। 
सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया , 
केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया। 
एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,
इतना सांई मोहे राचा हमार पिया। 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

पुरस्कार एवं सम्मान - 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

     आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

 

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