Monday, December 22, 2025

भारत का प्रसिद्ध और विशिष्ट त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग✍️ आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी



सामान्य का परिचय

भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के नासिक जिले में त्र्यंबक नामक छोटे से गांव में बसा है। यह मंदिर न केवल भगवान शिव के भक्तों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों, इतिहास के शौकीनों और यात्रियों के लिए भी एक अनुपम गंतव्य है। त्र्यंबकेश्वर की खासियत इसका स्वयंभू (स्वयं प्रकट) शिवलिंग है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश - त्रिदेवों का प्रतीक एक साथ देखा जा सकता है। यह दर्शन खास खास अवसर और दिनों में ही सुलभ होता है। नियमित दर्शन इन प्रतीकों को आकर्षक मुकुट से ढक दिया जाता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर ब्रह्मगिरी पर्वत की तलहटी में, गोदावरी नदी (जिसे गौतमी नदी भी कहा जाता है) के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे त्रिदेवों का अनूठा संगम माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव का प्रतीक हैं।इसकी खासियत है कि यहाँ त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के रूप में एक ही शिवलिंग है, जो तीन मुखों वाला है और इसमें से जल निकलता रहता है। यही विशेषता इसको अन्य ज्योतिर्लिंगों से अलग बनाती है।

     मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है, अर्थात् इसे किसी ने स्थापित नहीं किया, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ। इस कारण यहाँ के दर्शन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। मंदिर परिसर में कुशावर्त तीर्थ भी है, जहां गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है।


इतिहास

त्र्यंबकेश्वर मंदिर का इतिहास समृद्ध और प्राचीन है। वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 18वीं शताब्दी में मराठा शासक तृतीय बाजीराव पेशवा, जिन्हें नाना साहब पेशवा के नाम से भी जाना जाता है, ने करवाया था। निर्माण कार्य 1755 में शुरू हुआ और लगभग 31 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद 1786 में पूर्ण हुआ। उस समय इस भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 16 लाख रुपये की लागत आई थी, जो उस युग में एक विशाल राशि थी।

त्र्यंबकेश्वर के दर्शन का महत्व

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से भक्तों को मोक्ष, शांति, और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यहाँ त्रिदेवों के दर्शन एक साथ होने के कारण इसे विशेष माना जाता है। कुशावर्त तीर्थ में स्नान करने से पापों का नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है। खासकर श्रावण मास और महा शिवरात्रि के दौरान यहाँ लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस समय मंदिर परिसर भक्ति और उत्साह से भरा रहता है। यहाँ की विशेष पूजा, जैसे लघुरुद्र, महारुद्र, और नारायण नागबलि, भी बहुत प्रसिद्ध हैं। यदि आप यहाँ पूजा करवाने की योजना बना रहे हैं, तो पहले से पंडित से संपर्क करना बेहतर होगा।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कथा भक्ति और तपस्या की एक प्रेरक कहानी है। प्राचीन काल में ब्रह्मगिरी पर्वत एक तपोभूमि थी, जहां ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ रहते थे। इस पर्वत पर कई अन्य ऋषि भी तपस्या करते थे, लेकिन कुछ ऋषियों में गौतम ऋषि के प्रति ईर्ष्या थी।

    एक बार इन ऋषियों ने गौतम पर गौ हत्या का झूठा आरोप लगाया और प्रायश्चित के रूप में गंगा को वहां लाने का आदेश दिया। गौतम ऋषि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। गौतम ने गंगा को वहां लाने का वरदान मांगा। गंगा ने कहा कि वह तभी वहां रहेंगी, जब शिवजी स्वयं उस स्थान पर निवास करेंगे।

     भगवान शिव त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां विराजमान हो गए। गंगा भी गौतमी नदी के रूप में वहां बहने लगीं, जिसे आज गोदावरी नदी के नाम से जाना जाता है। इस कथा के कारण त्र्यंबकेश्वर का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ शिव और गंगा दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

      जहाँ से पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम होता है, जहाँ भगवान शिव अपने 'त्रिनेत्र' रूप में विराजमान हैं, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक ही लिंग में समाहित हैं -वही है त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, जो 12 शिव ज्योतिर्लिंगों में अष्टम स्थान पर प्रतिष्ठित है। यह ज्योतिर्लिंग केवल एक तीर्थस्थल नहीं, अपितु जीवन, ज्ञान और मोक्ष का परम साधन है।

त्र्यंबकेश्वर का स्थान और प्राकृतिक परिवेश

त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्र राज्य के नासिक जनपद में स्थित है। यह पर्वतमालाओं से घिरा क्षेत्र ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में बसा है और यही से गोदावरी नदी का उद्गम भी माना जाता है।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गौतमी ऋषि और उनकी धर्मपत्नी अहिल्या की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा माता ने ब्रह्मगिरि पर अवतरित होने का वर दिया, ताकि यहाँ के जीवों को जीवनदायिनी जल प्राप्त हो सके।

     इसी समय राक्षसों से त्रस्त जनों की रक्षा हेतु, भगवान शिव ने त्र्यंबक पर्वत पर त्रिनेत्र रूप में प्रकट होकर राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया और वहीं स्वयंभू ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए। इस लिंग में त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियाँ समाहित हैं, जो इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से विशेष बनाती हैं।

गोदावरी नदी का उद्गम और उसका आध्यात्मिक महत्व

गोदावरी नदी, जिसे ‘दक्षिण गंगा’ कहा जाता है, का आरंभ त्र्यंबकेश्वर से माना जाता है। यह नदी केवल भौगोलिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक शुद्धि का स्रोत भी है।

     कहा जाता है कि गौतम ऋषि की यज्ञशक्ति से गंगा का आह्वान किया गया, और गंगा ने ‘गोदावरी’ नाम से त्र्यंबकेश्वर में प्रकट होकर इस भूमि को पावन किया।

वास्तुकला और विशेषताएँ

यह मंदिर नागर स्थापत्य शैली में काले पत्थरों से निर्मित है।इसका निर्माण कार्य पेशवा बालाजी बाजीराव द्वारा 18वीं सदी में करवाया गया।मंदिर का गर्भगृह अत्यंत गहरा और रहस्यमय है, जिसमें स्वयंभू लिंग स्थित है।विशेष बात यह है कि यहाँ का लिंग तीन छोटे-छोटे लिंगों मेंविभाजित है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं।इन तीनों को चांदी के मुकुट से ढंका जाता है, जो केवल सोमवार और महाशिवरात्रि पर विशेष दर्शन के लिए खोला जाता है।

त्र्यंबकेश्वर - पवित्र संस्कारों की भूमि

यह स्थान केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि वेद मंत्रों से युक्त जीवन संस्कारों के लिए प्रसिद्ध है:यहाँ नारायण नागबली, कालसर्प दोष निवारण, त्रिपिंडी श्राद्ध, और पिंडदान जैसे कर्मकांड होते हैं। इस भूमि को पित्रों के मोक्ष की भूमि कहा गया है। भारतभर से लोग यहाँ पूर्वजों की शांति हेतु विशेष कर्मकांड करवाने आते हैं।

आगामी कुंभ मेला की तैयारी :- हर 12 वर्षों में नासिक में कुंभ मेला लगता है और त्र्यंबकेश्वर का स्थान प्रमुख तीर्थों में होता है।त्र्यंबकेश्वर-जहाँ शिव त्रिनेत्रधारी रूप में स्वयं विराजमान हैं यहाँ की हवा में वेदों की ध्वनि, जल में गंगा की शुद्धता, और भूमि में शिव का स्पर्श विद्यमान है। यह स्थल श्रद्धा, आस्था और मोक्ष का पूर्ण संगम है।

रासायनिक संरक्षण का कार्य जारी 

महाराष्ट्र में अगले साल आयोजित होने वाले कुंभ मेले से पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मॉनसून के बाद नासिक जिले में स्थित प्रसिद्ध त्र्यंबकेश्वर मंदिर का रासायनिक संरक्षण का कार्य प्रारंभ करेगा. एक अधिकारी ने यह जानकारी दी. भगवान शिव को समर्पित त्र्यंबकेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. यह नासिक शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।हर 12 साल में एक बार लगने वाला सिंहस्थ कुंभ मेला 31 अक्टूबर 2026 को त्र्यंबकेश्वर और नासिक के रामकुंड में ध्वजारोहण के साथ शुरू होगा.अगले वर्ष कुंभ मेले के दौरान देश भर से श्रद्धालु त्र्यंबकेश्वर मंदिर आएंगे. एएसआई को इस प्राचीन मंदिर के रासायनिक संरक्षण के लिए मंजूरी मिल गई है। एएसआई सबसे पहले मंदिर की सफाई का कार्य शुरू किया है , जिसके बाद रासायनिक संरक्षण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इस दौरान मंदिर की संरचना में मौजूद छोटी-मोटी दरारों की भी मरम्मत की जाएगी।  

        आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
                                                          लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक ने स्वयं इस स्मारक का अवलोकन किया है। वॉट्सप नं.+919412300183)

                                                                                                                                                







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