Sunday, December 28, 2025

घुष्मा की भक्ति से बना शिव का यह धाम घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


घृणेश्वर शब्द का अर्थ है घृणा पर करुणा करना होता है और जो इसे नियंत्रित करने वाले स्वामी को घृष्णेश्वर कहते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी परम शिव भक्त घुश्मा नामक महिला और उनकी निस्वार्थ भक्ति से जुड़ी है, जिन्होंने अपनी बहन के पति से विवाह के बाद, ईर्ष्यालु सौतन द्वारा मारे गए अपने बेटे को भगवान शिव की कृपा से पुनर्जीवित करवाया था और शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में वास किया। जिससे यह स्थान घृष्णेश्वर कहलाया, जहाँ हर संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिवजी ने भक्त घुश्मा की प्रार्थना स्वीकार की और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. घुश्मा के नाम से ही यह ज्योतिर्लिंग 'घृष्णेश्वर' (घुश्मा के ईश्वर) कहलाया।
घृष्णेश्वर मंदिर की अवस्थिति 
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र केऔरंगाबाद (संभाजी नगर) जिले के वेरुल गाँव में स्थित शिव का एक हिंदू मंदिर है । यह एक राष्ट्रीय संरक्षित स्थल है, जो एलोरा गुफाओं से डेढ़ किलोमीटर दूर औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर उत्तर- पश्चिम में और मुंबई से 300 किलोमीटर पूर्व-उत्तर- पूर्व में स्थित है । 

           ऐतिहासिक पृष्ठभूमि/ 
            ज्योतिर्लिंग की कथा
घृष्णेश्वर का उल्लेख शिव पुराण स्कंद पुराण , रामायण और महाभारत में मिलता है । यह सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है जो भगवान शंकर को समर्पित है और इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम (बारहवां) ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
     दक्षिण देश में, देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम का एक बहुत ही तेजस्वी तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। सुदेहा संतानोत्पत्ति के लिए बहुत उत्सुक थी। ज्योतिषीय गणनाओं से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति संभव नहीं थी।     
     निःसंतान रहने के भय से सुदेहा 
ने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन घुश्मा से विवाह करने का आग्रह किया। उन्होंने घुश्मा को भगवान शिव की आराधना करने, 101 शिवलिंग बनाने और उन्हें जल में विसर्जित करने की सलाह भी दी। 
      पहले तो सुधर्मा ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन अंत में उन्हें अपनी पत्नी के आग्रह के आगे झुकना पड़ा और अपनी पत्नी की छोटी बहन घुष्मा से विवाह कर उन्हें घर ले आए। घुष्मा अत्यंत विनम्र और गुणी स्त्री थीं। वे शिव की परम भक्त थीं। प्रतिदिन वे एक सौ एक शिवलिंग बनातीं और सच्ची श्रद्धा से उनकी पूजा करतीं।
      कुछ दिनों बाद शिव ने घुश्मा के गर्भ से एक बेहद सुंदर और स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उनके दिन बड़े आराम से बीत रहे थे।
     कुछ समय बाद सुदेहा के मन में एक बुरा विचार आया। उसने सोचा, "इस घर में मेरा कुछ नहीं है। यहाँ सब कुछ किसी और के वश में हो गया है। उसने मेरे पति पर भी अपना अधिकार जमा लिया है। बच्चा भी उसी का है।" यह बुरा विचार धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगा। इसी बीच घुश्मा का बच्चा भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसकी शादी भी हो गई और बहू भी घर आ गई।
      एक दिन, सुदेहा ने रात में सोते समय घुष्मा के बेटे की हत्या कर दी। उसने उसके शव को उठाया और उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुष्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित किया करती थी। सुबह सबको इस बात का पता चला। पूरे घर में अफरा- तफरी मच गई। सुधर्मा और उनकी बहू दोनों सिर पीटते हुए फूट-फूट कर रोने लगे।
   अगले दिन, पुत्र की पत्नी ने पलंग पर खून के धब्बे देखे और पाया कि उसका पति गायब है। घुश्मा अपनी प्रार्थना कर रही थीं, तभी उनकी बहू ने आकर उन्हें अपने पुत्र के बारे में बताया। घुश्मा ने उसकी बातों को अनसुना कर अपनी प्रार्थना जारी रखी। उन्हें विश्वास था कि भगवान शिव उनके पुत्र की रक्षा करेंगे। उसने मंत्रो का उच्चारण शुरू किया और प्रार्थना के बाद वह शिवलिंग को जल में विसर्जित करने के लिए चली। जब वह तालाब से लौटने लगीं, तो उन्होंने अपने प्रिय पुत्र को तालाब के अंदर से निकलते हुए देखा। वह घुष्मा के चरणों में गिर पड़ा।
     उसी समय शिवजी भी पास ही में प्रकट हुए। वे सुदेहा के जघन्य कृत्य से बहुत क्रोधित थे। वे अपने त्रिशूल से उसका गला काटने को उतावले थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर शिव से कहा, 'प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी उस अभागी बहन को क्षमा कर दीजिए। उसने घोर पाप किया है, लेकिन आपकी कृपा से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब हे प्रभु, उसे क्षमा कर दीजिए! घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने एक और बरदान मांगने को कहा। इस पर घुश्मा ने कहा,मेरी एक यही प्रार्थना है, जन कल्याण के लिए आप सदा यहीं निवास करें।'
      शिव ने इन दोनों बातों को स्वीकार कर लिया। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वे वहीं निवास करने लगे। सती शिव भक्त घुश्मा की पूजा के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

वर्तमान मन्दिर का इतिहास
यह मंदिर कई बार बना और बिगड़ा है; मूल मंदिर 13वीं-14वीं शताब्दी में बना ।
13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत द्वारा मंदिर की संरचना को नष्ट कर दिया गया था । मुगल- मराठा संघर्ष के दौरान मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ और फिर से नष्ट हो गया।इसका शुरुआती पुनर्निर्माण शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने 16वीं सदी में कराया था। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद इंदौर की रानी गौतमा अहिल्या बाई होलकर के संरक्षण में 1729 में इसे इसके वर्तमान स्वरूप में पुनर्निर्मित किया । यह वर्तमान में हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण और सक्रिय तीर्थ स्थल है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। यद्यपि इसके प्राचीन अवशेष शिव पुराण और पद्म पुराण में भी मिलते हैं।

सर्व प्रवेश की अनुमति
घृष्णेश्वर मंदिर में सभी का प्रवेश खुला है।
कोई भी व्यक्ति मंदिर परिसर और उसके भीतरी कक्षों में प्रवेश कर सकता है, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए, स्थानीय हिंदू परंपरा के अनुसार पुरुषों को नंगे बदन जाना आवश्यक है। यह भारत के उन चुनिंदा ज्योतिर्लिंगों में से एक है जहाँ भक्त नंगे हाथों से शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं।

घृष्णेश्वर मंदिर की वास्तुकला
मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली में बनी है और यह औरंगाबाद के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। घृष्णेश्वर मंदिर का पांच मंजिला शिखर पारंपरिक मंदिर वास्तुकला शैली में शानदार ढंग से तराशा और निर्मित किया गया है। मंदिर परिसर में आंतरिक कक्ष और एक गर्भगृह शामिल हैं।यह संरचना लाल रंग के पत्थरों से बनी है। पूरा परिसर 44,400 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैली हुआ है। इन आयामों के साथ भी, घृष्णेश्वर मंदिर सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग मंदिर है। 

विविध नक्काशियां
यह भारत का एकमात्र ज्योतिर्लिंग मंदिर है जहाँ भगवान शंकर का पूरा परिवार एक ही मूर्ति में विराजमान है, जिसमें भगवान शिव, देवी पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय नंदी पर विराजमान हैं, और भगवान शंकर ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया हुआ है। यह नक्काशीदार मूर्ति मंदिर के शिखर पर शीर्ष भाग में सफेद पत्थर में उकेरी गई है, और मंदिर के दक्षिण प्रवेश द्वार से स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
      मदिर के एक स्तंभ पर हाथी और नंदी की नक्काशीदार मूर्ति बनी हुई है। इस नक्काशी को हरी-हर मिलन (भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भेंट) का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, मंदिर के 24 स्तंभों पर यक्षों की आड़ी मूर्तियाँ उत्कीर्णन गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि यक्षों ने पूरे मंदिर का भार अपने कंधों और पीठ पर उठाया है।
      इसकी आंतरिक और बाहरी दीवारों पर विभिन्न मूर्तियां और सुंदर डिज़ाइन हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक ज्योतिर्लिंग मूर्ति स्थित है और मुख्य द्वार के सामने भगवान शिव के प्रिय भक्त नंदी की एक विशाल मूर्ति है। इस मंदिर में पांच मंजिला ऊंचा शिखर और कई स्तंभ हैं जिन पर जटिल पौराणिक नक्काशी की गई है। लाल पत्थर की दीवारों पर अधिकतर भगवान शिव और भगवान विष्णु के दस अवतारों की कथाएँ चित्रित हैं। गर्भगृह या पवित्रतम स्थान में शिवलिंग पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। गर्भ गृह का क्षेत्रफल लगभग 289 वर्ग फुट है और गलियारे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है।
      मंदिर का शिल्प देखकर आप प्रसन्न चित्त हो जायेंगे। हमारे देश के मंदिर अभूतपूर्व होते है। मंदिर के अंदर नंदी जी विशाल प्रतिमा के दर्शन होंगे। गर्भगृह के अंदर जाने पर घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का टकटकी लगाकर दर्शन करते रहे। शिव ज्योतिर्लिंग की छबि को अपने मन में उतार ले, ताकि जब भी आप दर्शन करना चाहे तो पलके बंद करके उनका ध्यान करने से ही दर्शन हो जाएँ। भगवान शिव के इस रूप को मन में बसा कर बाहर आ जाएँ। बाहर आकर मंदिर के बाहरी शिल्प और ख़ूबसूरती का दर्शन कीजिये। आपका मन आनंद से भर जायेगा।

शिवालय तीर्थ 
घृष्णेश्वर मंदिर के नजदीक ही शिवालय तीर्थ स्थित है। यह वही सरोवर है जहाँ घुश्मा भगवान शिव की पूजा करती थी और भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए थे। पौराणिक कथा के अनुसार एक राजा ने शिकार करते समय गलती से, जंगल में साधना करने वाले ऋषि मुनी के साथ रहने वाले पशु को मार डाला। इस घटना से क्रोधित होकर ऋषियों ने राजा को शाप दिया, जिससे उसके सम्पूर्ण शरीर में कीड़े लग गये। राजा पीड़ा ग्रस्त होकर जंगल में इधर उधर भटकता रहा। प्यास लगने पर उसे एक पानी का कुण्ड दिखाई दिया। राजा ने जैसे ही उस कुण्ड का पानी पिया तो एक चमत्कार हुआ और उसके शरीर में लगे कीड़े नष्ट हो गये। राजा एकदम स्वस्थ हो गया। तब राजा ने उसी जगह घोर तपस्या करके भगवान ब्रम्हा को प्रसन्न किया। ब्रम्हाजी ने एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया। जिसे पहले ब्रम्हा सरोवर कहा जाता था पर बाद में इसे लोग शिवालय तीर्थ के नाम से जानते है। वर्तमान शिवालय का निर्माण देवी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक ने स्वयं इस स्मारक का अवलोकन किया है। वॉट्सप नं.+919412300183)


Friday, December 26, 2025

पण्डित चन्द्र शेखर मिश्र की निर्गुण रचना "झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

कवि का परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली।कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाह संस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।
पुरस्कार एवं सम्मान - 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

"झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" निर्गुण भक्ति की काल जयी रचना

झूलनी का रंग सांचा हमार पिया (चंद्रशेखर मिसिर रचित निरगुणिया गीत) भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र की यह कालजयी रचना है। निर्गुणिया भाव की यह रचना वर्षों से लोकप्रिय है।इसका इस्तेमाल लोक जीवन और फिल्मों में भी हुआ। चंद्रशेखर मिश्र ने शरीर को झूलनी का रूप देते हुए जितने कमाल तरीके से माया,ईश्वर आदि के संबंधों को जोड़ा है, वह कमाल है। भाव सहज है कि यह झूलनी एक बार मिला है। इसे बनानेवाला सुनार जब एक बार बना देता है, तो उसका दूसरा सांचा नहीं रखता। यह पांच तत्वों से बना हुआ है।
निहितार्थ - 
"झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" का निहितार्थ यह है कि शरीर (झुलनी) नश्वर है और इसे बनाने वाला (सुनार, यानी ईश्वर) एक ही होता है, जिसका साँचा (शरीर) बार-बार नहीं बनता; यह भोजपुरी निर्गुण गीत आत्मा और परमात्मा के रिश्ते, जीवन की क्षण भंगुरता, और शरीर को एक अनमोल रचना मानकर उसका सही उपयोग करने का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह गीत बताता है कि यह शरीर क्षणभंगुर है, और इसे बनाने वाला सुनार (ईश्वर) इसे एक ही बार बनाता है. इसलिए, इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए. संक्षेप में, यह एक निर्गुण गीत है जो जीवन की सच्चाई, शरीर की नश्वरता और ईश्वर के प्रति समर्पण का गहरा दार्शनिक संदेश देता है,  है.अवधी के  निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है।जिसे भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र ने रचा है ।एसा ही एक मनोहारी युगल  गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है - 

                  मूल गीत

झुलनी का रंग साँचा हमार पिया 
कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया ,  
रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया
सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै , 
दै अगनी  का  आँचा हमार पिया। 
छिति जल पावक गगन समीरा ,   
तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया। 
रतन से बनी रे झुलनिया ,    
जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया। 
जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,  
गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया। 
टूटी  झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,  
फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया। 
सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया , 
केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया। 
एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,
इतना सांई मोहे राचा हमार पिया। 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

    इस विजुवल लिंक से इसे और अच्छी तरह देख और समझ सकते हैं - 
https://www.facebook.com/share/v/1DJxMkvE6S/

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Thursday, December 25, 2025

पण्डित चन्द्र शेखर मिश्र की कुंवर सिंह खण्ड काव्य ✍️ आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं।

पण्डित चंद्रशेखर मिश्र जी का जीवन परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्र धाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाह संस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

राष्ट्र जागरण के लिए रची “कुंवर सिंह” 

कुंवर सिंह (1777 – 26 अप्रैल 1858) 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान एक उल्लेखनीय नेता थे। वह वर्तमान में जगदीसपुर के शाही उज्जैनिया (पंवार) राजपूत घर से संबंधित थे, वर्तमान में भारत के बिहार, भोजपुर जिले का हिस्सा है।
       पण्डित चन्द्र शेखर मिश्रजी के लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचानकर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। 'कुँअर सिंह' की भूमिका सम्पूर्णानंद जी लिखी इस प्रकार लिखी है -

झूमत बा इतिहास जहां 
तहँ कईसे भूगोल रही ख़तरे में। 

xxxxxxxxxxxxxxxxxx 

छुरी कटारी बिकय सगरों, 
चूड़हारिन गांव में आवत नाहीं। 

 यह महाकव्य 1966 में प्रकाशित हुआ है। 1958 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। उस समय बाबू रघुबंश नारायण सिंह जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली भोजपुरी मासिक पत्रिका में बाबू कुंअर सिंह पर एक बड़ा लेख 'बिहार केशरी बाबू कुंअर सिंह' पर आया । इस लेख का असर पं चंद्रशेखर मिश्र जी पर इतना पड़ा कि इस महाकाव्य का सृजन हुआ। इससे उनकी लोक प्रियता में चार चांद लग गये। कवि सम्मेलनों में लोग आग्रह पूर्वक इसके अंश सुनते थे। इसे सुनकर लोगों का देश प्रेम हिलोरें लेने लगता था। युवक तो इसके दीवाने ही हो गये। 

कुंवर सिंह महा काव्य के संक्षिप्त आत्म कथ्य काव्य द्वार के कुछ अंश - 

बाबू कऽ फिरल दोहाई, गाँवन-गाँवन में डुप्पो बाजल 
सोहा चबाइ के नेवता बा, सब साजइ आपन दल बादल ।।
बा कोखि जुझावई के नेवता, सेन्हर पोंछवावइ के नेवता । 
बरी फोरवावद के नेवता, बा रोड़ कहावद के नेवता ॥
जे हउ हमार ते साथ देई, जे हउ हमार ते माथ देइ। 
के हउ हमार अब दुख बूझड, जे हउ हमार ते अब जूझइ ।
बा इहाँ न मोका समझइ के, बा इहां न मौका बझड़ के । 
की तउ फेरऽ नेवता हमार, की तउ तयार हो जझड़ के ।।
'नेवता कबूल बा हमहन के' सब गाँवन कऽ मुखिया बोलल। 
मेवता कबूल बा हमहन के' सुखिया बोलल, दुखिया बोलल ।।
महलन से निकलि जवान चले, मड़हन से निकलि जवान चले । 
सड़हर से निर्काल जवान चले, घर-घर से निकलि जवान चले ।।
माई कऽ बन्दि कटावइ के, बलहीन चले, बलवान चले। 
भारत का बड़ा पार करइ, कंगाल चले कंकाल चले ।।
अवाज गइल सुनि पड़ल मुनादी कऽ पुकार बुढ़वन के कान फर फर फर देहियाँ करकरानि, फेरि गइल जवानी याद भइन ।।
मोठन पर ताउ पड़ल अउ हथियारन की ओर नजर घूमल । 
बनराज जवानी के पंजन कऽ पउरुख सुमिरि-सुमिरि झूमल ।।
आँगन में लड़िकन के बटोरि हर घर में माई बोलि उठलि । 
बस एहो समइया के खातिर बंटवा तोहके पाललि-पोसलि 
हमरे दूबे कऽ लाज रखड घर-घर में महतारी बोललि ।
हमरे सेन्हरे क लाज रखड घर-घर में मेहरारू बोललि ।॥
हमरो राखी कऽ लाज रखड घर-घर में बहिनो बोलि उठलि 
पाकल मोछा क लाज रखड ई बूढ़ बाप फ बोल रहलि ।।
हुकार उठल जब सेना कऽ गूजलि आवाज नभ चोर गइल।
केउ बोर तपल बा भरत खंड में सरगे में अल सोर भइल ।
फर फर फर देहियाँ फर फरानि घरती क बात इयाद भइल 
 फेरि धरमराज के आगे हमरे पुरखन कऽ फरियाद गइल। 
धरती पर हमके भेजि देहु हम सरगे में नाहीं रहबे 
घेरे विपत्ति भारत के वा हमहू चलि के लोहा गहवं ॥
हम बड़ठि इहाँ लूटो बहार, हमरी धरती पर दाग लगढ़। 
अइसन सुख हम नाहीं भोगब तोहरे बैकुण्ठं झागि लगद ।।
हमरी माई की छाती पर जब दुश्मन पाँउ धरत होई 
नाहॅक जनमौली हम बेटवा, कहि धाड़ मारि रोवत होई ॥ 
पोहें छोटो पिचक्का लोहून कऽ लोथिन पर लोथिया भहराई। 
अनजाने में कतहू थ्रोट से अगिन बान गोली आई ।।
हम कोटि-कोटि रे साँड़ असत बेटवा जनमाके का कइलो ।
 नाहॅक एतना पीड़ा सहली, काहे न निपूतो हम भइली ।
अपनी माई कऽ रोइब सुनि ना फटल करेजा टूक-टूक । 
जीनी छातो में देस-प्रेम उकसउलेसि नाहीं यार हूक ।।
बेटवा लेडके पनहीं घूमद, माई सेवइ दासी बनिके । 
जेकर बरी सुख से सोवई धिक्कार यार ओहि जीवन के ।।
जेके प्यारी घर कऽ तिरिया ऊलौटि घरे के चला जाइ ।
 जेके प्यारी भारत माता रण में चढ़ि के लोहा चवाइ ।।
बाब क बोली गोली अस लगि गइल जवानन की छातो । 
तुराई माई क दूध पिया का हमहन नोर पिये बाटो ॥
गंगा भागई सागर ताकई सागर भागइ तउ कहाँ जाइ । 
भोजपुरिया भागई ए बाबू! केहि कायर के पोछे लोकाइ ॥
कहूँ भोजपुरी भागत पउलऽ सरदार हमें बतलाइ देउ। 
संका मन में राखउ नाहों, रन में चड़िके अजनाइ लेउ ।
मारे लोहन के गोरन के लोथिन पर लोथि गिराइ देव।
हाड़न में नून समायल वा बदले में खून बहाइ देव।
हम निमक हरामो ना करवं, करतब हमार गोहरावत बा।
इतिहास कार बोरन कऽ गाथा पोथी में दोहरावत बा ।।.
अइसन मोका फेरि ना लागे मरि जायेके, मिटि जायेके ।
 छुटही खटिया से प्रान तजे श्रोकर जस-गाथा गाये के ।
रन में चढ़िके तरुयारी से ठाकुर तू चिन्ह खचाइ विरऽ । 
ओहि चिन्हीं से पीछे आई तउ माथ हमार उतारि लिहऽ ।।
 घउग्र देखिहुड जजउ छाती में तउ छाती से चपकाइ लिहऽ । 
पीठो में घाउ लक्ष्य हमरे त लातन मारि गिरा बिहुऽ ॥
जेकर वंरी बत्ति जाइ आजू ओकरी तरुवारी के धिकार। 
जं बिनु मारे लोटड घरके ओवकरी तैयारी के धिकार ।।
जेकर गोछा नोचे झुकिया ओकरी सरदारी के चिकार । 
जंकरों पोटी में घाउ लगइ, आकरी महतारी के चिकार ।।
अँगरेजन क छोटका टावू गेना अस नाजु उठाइ लेव । 
हम मारव ठोकर लाते से सागर में कतउँ निराद्ध देव ।।
लागे न पता श्रोहि देसवा कऽ नकसा से नाउँ निकालि देव ।
एकउ न पूत बचिहैं दादा ! हम खोजि बोन के बालि देव ।
भोजपुरियन कऽ हूं'कार सुनत हर हर हर सागर हरि गयन । 
कंपिनी कंपलि इंगलंड महरानी कऽ आसन थहरि गइल 
ना पुरुवइया, ना पछ ग्रयाँ ना बहलि बयरिया चौमुखिना । 
एह भाजपुरो तप्पा में खाली लप लप लपकलि तरुश्ररिवा। 

कुंवर सिंह खण्ड काव्य की कुछ चयनित पंक्तियां इस प्रकार है - 

नेवता बलि बेदी क छोड़िके, 
औरन कs कबहूँ यह आवत नाहीं ।
मारू, जुझारू बजई बजना, 
केहु दोसर राग बजावत नाहीं ॥

छोड़ि के बीर भरी कविता, 
रस दूसर में केहू गावत नाहीं । 
छूरी-कटारी बिकइ सगरउँ , 
चुरिहारिन गाउँ में आवत नाहीं ॥ 

पूतन से बुढवा कहले, 
रन कइसे चली रहली न जवानी ।
पेड़ किनारे क जानs हमईँ, 
बस चार दिना क बची जिनगानी ॥

वेद के मंत्र से पिंड ना लेबइ, 
बोलs तबउ जय देस क बानी ।
पानी बचाई के ना रखबs , 
तब ना हम लेबइ सराध में पानी ॥ 

छाँटली बाँह गिरि छप से, 
किछु दूरी बनी तब लाल निसानी ।
भोजपुरी भुइयाँ हुलसी, 
कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी ॥

भागीरथी से कहै धरती , 
जब लेइ लहरा नदिया इतरानी । 
बोलs ई नीर तोहार हु या, 
हमरे बेटवा के कटार के पानी ॥ 

 
        आचार्य डॉ .राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)





पण्डित चंद्रशेखर मिश्र का "सीता” खण्ड काव्य ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

जीवन परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित
1942 के आंदोलन में गोविंद प्रसाद जी और मामा सत्य नरायण दुबे जी के गिरफ्तारी के बाद मिश्र जी अपने  साथियों के संग परसीपुर स्टेशन को आग लगा दिया था। उस जगह से वे इलाहाबाद फरार हो गए थे, जहाँ उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा था।  

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

खड़ी बोली की कृति “सीता” खण्ड काव्य

सीता खण्ड काव्य में अयोध्या से जब सीता जी निष्कासित की गयीं, तब भगवान राम, लक्ष्मण, अयोध्यावासियों व स्वयं माता जानकी के मन कुछ अनुत्तरित प्रश्न अवश्य उठे होंगें। ऐसे ही कारुणिक भावों व तथ्यों को "सीता" खण्ड काव्य में अपने कुशल काव्य शिल्प के माध्यम से प्रगट किया है महाकवि पं चन्द्रशेखर मिश्र जी ने। इनकी खड़ी बोली में सीता बेहतरीन खण्डकाव्य है जो देवी सीता के जीवन पर आधारित है। यथा - 

ऐसा ना दण्ड विधान बना
निर्दोष रहे, नृप तो भी सजा दे ।
देवो को सारवी बनायेगा कौन
सुरेश से जाके कोई समझा दे । 

शोभा न देता है राम के राज्य में
सत्य को आ के असत्य दबा दे । 
अग्नि में भी नही साहस था ,
जो सिया तन में एक दाग लगा दे ।।


सूरज के नाम पर वंश के गुमान वाले
समय कहेगा कौन खोटा,कौन है खरा।
सारी राजनीति एक दासी थी पलट गयी
खानदान खूब पहचानती थी मंथरा ।

बाप ने तो पूत को दिया था बनवास पर,
पूत ने तो एक पग और आगे है धरा । 
राम ने कलंक हीन नारी को निकालने की,
रवि-वंश में चलायी है नई परम्परा ।।


राम हो कि रावन हो, बलि चाहे बावन हो
यश-अपयश शेष दुनिया में रहेंगे । 
जब-जब चर्चा चलेगी रघुनाथ जी की,
सीय तेरी ! महिमा में तृण सम बहेंगे । 

आगे आगे राम सदा, पीछे पीछे सीय चली
किन्तु अब सीय आगे, राम पीछे रहेंगे ।
राम-सीता, राम-सीता , कोइ न कहेगा,
लोग सीताराम ! सीताराम ! सीताराम ! कहेंगे ।।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

पं.चन्द्रशेखर मिश्र की द्रौपदी खण्ड काव्य ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं।

भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
      राष्ट्र जागरण के लिए “कुंवर सिंह” खण्ड काव्य लिखा।उनके लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचान कर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। 

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

साहित्यिक कृति 'द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में 

कुंवर सिंह की सफलता के बाद उन्होंने अनेक भोजपुरी और हिन्दी पुस्तकों की रचना की। जहाँ 'कुँअर सिंह' महाकाव्य वीर रस प्रधान महाकाव्य रहा उसी युग में 'द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है - 

मोछि मुरेरत आंखि घुरेरत
पापी के केहू निरेखत नाहीं ।
ताकत बा हमही के सबै,
ओकरे ओरिया केहू ताकत नाहीं ।
सासु जेठानी खड़ी देवरानी,
दुसासन के केहू छेकत नाहीं । 
हे बिरना हमरे उपरा फटहिउ
धोतिया केहू फेकत नाहीं ।।

जीयत बा जबले भयवा,
एहसान ना आन के माथे चढइबै। 
गाढे में भारी भरोस हमार
ओन्है  तजि के के भला गोहरइबै।
पांच पति पर ऐसी गती
एहि देस में साझहिं आग लगइबै ।
सासुर में सब कायर बा
अब नइहर से बिरना बोलवइबै  ।। 

टारत भीड़ बढी द्रौपदी
जस हंसिनि पौरंत फाटत काई ।
ठाढि छछात लगै दुरगा,
केसिया कन्हिया रहलें छितराई । 
बोललिं धाइ धधाइ के बोललिं
एड़ी ऊँचाई के हाथ उठाईं ।
बाटै खड़ा बिरना अब देखब
बाघ बियानी बा केकरि माई ॥ 

तू दुर्गा बनके अइलू 
तोहरे बल वीर चलावत भाला ।
माई सरस्वती तू बनलु 
तोहरी किरिपा कविता बनी जाला ।
आठ भुजा नभचुंबी धुजा 
नहीं मैहर में सीढ़िया चढी जाला 
राउर उंचि अदालत बा, 
बदरा जहां से रचिकै रहि जाला।।

नाहीं ढोवात अन्हार क भार 
बा ताकत बाटे ढोवाइ न देते। 
झंखत बानी अँजोर बदे 
दियरी, दियरी से छुवाई न देते। 
भोर समय पछितैबे अकेलइ 
राह अन्हारे देखाइ न देते 
बाती अकेलि कहाँ ले जरइ? 
तनिका भरि नेह चुवाई न देते।।

देखले कबउँ ना बाटी 
पढ़ले जरूर बाटीं 
सुनी ले कि रिखि मुनि 
झूठ नाहीं बोललें 
बरम्हा, बिसुन औ महेस
तीनिउँ मोहि गइले, 
माई तोर बीन कौन-
कौन सुर खोललें? 

द्रौपदी बेचारी बाटे 
खाली एक सारी बाटै, 
उहो ना बचत बाटै 
बैरि मिलि छोरले, 
अस गाढ़ी समय में 
देखब तोहार हंस 
हाली हाली उड़ेलें 
कि धीरे धीरे डोलेले।।

ना लूटिहई द्रौपदी कतहू 
मतवा भेजबू जौउ धोती एहां से।
रोज तू सुरुज बोवलू खेत मे 
रोजई भेजलू जोती एहीं से।
माई रे तोरे असिसन के बल 
पाउब छंद के मोती एहीं से।
बाटई हमे बिस्वास बड़ा निह्चाई 
निकले रस सोती एहीं से ॥ 

ढोग कविताई क रचाई गैल बाटै तब 
छोड़ी के दूआरी तोर बोल कहाँ जाईरे।
भाव नाही भाषा नाही छंद रस बोध नाही ।
कलम न बाटै नाही बाटै रोसनाई रे।
कौरव सभा मे आज द्रौपदी क लाज बाटै
गाढे में परली बाटै मोर कविताई रे।
हियरा लगाई तनी अचंरा ओढाई लेते 
लडिका रोवत बा उठाई लेते माई रे ॥ 

ओहि दिन पुरहर राष्ट्र धृतराष्ट भैल 
भागि मे बिधाता जाने काउ रचि गईलें।
नाऊ त धरमराज नाहि बा सरम लाज
हाइ राम लाज क जहाज पचि गईलें।
ठाट बाट हारि गईलें राजपाट हारि गईलें 
आगे अब काउ हारे काउ बची गईलें।
अंत जब द्रौपदी के दाँउ पर धई देले 
अनरथ देखि हहकार मची गईलें॥ 

नाहि ढेर बड़ि बाटै नही ढेर छोटी बाटै 
नाहि ढेर मोटि बाटै नाहि ढेर पतरी।
छोट छोट दांत बाटै मोती जोति माथ बाटै 
तनी मनि गोरी बाटै ढेर ढेर सवंरी।
बड़ बड़ बाल बाटै गोल गोल गाल बाटै 
गोड लाल लाल बाटै लाल लालअगुँरी।
बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली 
द्रौपदी जुआरिन के दाँउ पर बा धरी॥ 

द्रौपदी की करुण पुकार- 

गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs 
हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।
तू बहिना बहिना कहबs, 
पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।
सावन में तोहें बांधे बदे,
जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।
आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,
भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।

दौड़े चले हैं मोहन पुकार पर- 
आगे से चीर बढ़े नभ में,
ओकरे पीछवाँ, दउरेले मुरारी।
आज कन्हैया भगें एतना,
उनका के ना छू पऊंले ऊरगारी ।
तीन विमान उड़े नभ में,
अगवां के बढ़े, ईहे होड़ लगा री।
आई सभा में, आकाश से कान्हा,
बढ़ावन लागे हैं, छोर से सारी।।

सारी सभा और कौरव अचंभित हैं- 
साड़ी घटे ना त, बोला दुर्योधन,
'खींच दु:शासन, जोर लगा दे।' 
ई सुन, द्रौपदी हंस बोली,
'तुहूँ अब जोर लगा शहजादे।
बाती दयादी के आई गई बा त,
बाती पे बाती, हमें भी कहे दे।
'चीर घटी न दु:शासन से,
अपने अन्हरा बपवा के पठा दे।।' 

कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं- 
आ के कन्हैया कहें बहिना,
'काहें बोलत नईखे, कोहांईल बाड़ी।
'राही में ना पनियो पियनी,
तनी देख हमें, कि घमाईल बाड़ीं।
'वाहन बा अबहीं मोर पाछे,
मो पैदल धावल, आवत बानी।
'अद्वारिकाधीश के तें बहिना,
लुगरी बदे काहें कोहांईल बाड़ी।।

कृष्ण का बहन को आश्वासन..
'खींचे दे साड़ी, मो देखत बानी,
ईहां पर के बलवान बड़ा बा।
कि बहिना के गोहार पे भाई भी,
आ के सभा बीचवा में खड़ा बा।
फारी के तें बन्हली सड़िया, 
अबहीं अंगुरी में निशान पड़ा बा।
आ सूद में ढांकब लाज तोहार,
मूल तोहार, पड़ा के पड़ा बा।।

द्रौपदी की चेतावनी 

खींच दु:शासन, जोर लगाई के
टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।
बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,
मोहन ना हमके बिसरईहें।
देर लगी, ना अबेर लगी,
बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।
भउजी के गोदी में होइहें तबो,
मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


 


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चन्द्र शेखर मिश्र का भीषम खण्ड काव्य✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।
क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

भीष्म खण्ड काव्य
कुँअर सिंह, द्रौपदी, सीता जैसे महान काव्यों की रचना के बाद भोजपुरी में तीसरा और हिन्दी भोजपुरी के चौथा  बेहतरीन खण्डकाव्य इन्होंने 'भीषम' खण्डकाव्य लिखा है। जो महाभारत के भीष्म के जीवन पर आधारित खण्ड काव्य  है । इसमें वीर रस और करुण रस का अदभुत समन्वय है। यथा - 

जानि परइ सुनले होइहैं हरि, 
भीषम से रण में पड़े पाला।
ठान हमार सुने डरि गइलन, 
लागत बा किछ बाल में काला।

गाण्डीव की टनकार न होत, 
ध्वजा पर ना हनुमान देखाला ।
प्रायः बीर सबइ रण अइलें, 
पे आयल नाहीं पितम्बर वाला ।

देखव पउरुख युद्ध में विड-न 
छोड़ब चक बिना उठवाये।
बाको जउ ना अइहुई रण में तब, 
व्यर्थ हवा में के बान बलाये ?

केकर छाती बनी अस बज्जर, 
जौनो से सायक मोर झेलाये ? 
पारथ अइले न पारथ सारथी, 
युद्ध में कोन मजा तब आये।


आइ जवानी भले हरि के, 
पर छटल नाहीं प्रबड़ बचकाना।
संभव बा समूहें नहि आवड, 
जाइ चला कहीं कड़के बहाना ।

अउ फेरि ना करजा मोर खइलन, 
जेकर मारब बाद में ताना ।
श्रावड न सावह लड़ड अनतें कहीं, 
बा छलिया कर कौन ठेकाना ।

जंगल सून जहाँ बिचरड, त
ड़पड, गरजइ नहि बाध-बघेला ।
जीवन सून बिना पुरुषारथ, 
आंगन सून न खेलइ गदेला ।

भक्ति बिना सब सून नदी-नद-
सून न जीने में नीर बहेला ।
तइसइ इ कुरुखेत पितंबर-
धारी बिना हमइ सून लगेला।

युद्ध में आजु पता चलिहद्द, लुटि 
जइहद्द बड़े-बड़े अस्त्र क थाती ।
कोवव में रणबीच अनेकन,
बंस क आज बतइहई बाती।

चातक माधव को छतिया, 
जेकरे बड़े बान हमार सेवाती ।
के मोरे बान क घाउ सहे, 
तजि कृष्ण के के कर बज्जर छाती ?

या तः चला जदहद ब्रज में, 
जिनगी फेरि माखन माँगि बितद हैं।
या हमरे रणकौशल से थकि, 
अन्त में चक्र जरूर उठइहैं।

द्वारिका ले हम खोदिके' मारव, 
माघव ठाँव कहीं नर्नाह पहहैं।
पं एक सोच इहद मन में-
कुरुखेत ओन्हइ बिनु सून देखइहैं।


मारि-मारि बानन के चक्र उठवाइ देव, 
देखबह में बातें जोर केतना जबानी में।
कइसे प्रण कइ जाला, 
कइसे निरबाहि जाला,
डूनउ कथा जुटे आज हमरी कहानी में।

सुनीला कि मोरे सात-सात बड़ भाइन के,
गंगा माई बोरि देलों धार को रवानी में।
हमई भी उचित वा कि जउ न प्रण दूर करो, 
बूड़ि मरि जाई कहीं चुल्लू भरि पानी में।

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छतिया उतान कइले भीषम तड़पि बोले,
रण बीच फैसला हमार बा तोहार बा ।
भाग्यमान जसुदा के कौन बा अभाव नाथ,
घीउ-दुध माखन कs लागल पहाड़बा ।

मोरे गंगा माई के त पास खाली पानी बाटै,
पनिया में का बा इहै मछरी सेवार बा ।
तबौ कुरुखेत बीच फैसला ई होइ जाई
दूध धार-दार बा कि पानी पानीदारबा ।

के रण जीतल हारल के,
कहइँ भीषम, केसव तू ही बतावs ।
जौन करइ के ना उ कइलs अब,
मारै बदै मति कष्ट उठावs ।

चूवत लोहू तरातर बा थकि-
जइबs न भूमि कठोर पै धावs ।
मैं रखि देब गला खुद चक्र पै,
मोहन माधव केसव आवs ।।

       आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भोजपुरी का व्यापक विस्तार 
भारत भाषाई विविधताओं का देश है जहां सैकड़ों भाषाएं तथा उनके अन्तर्गत हजारों बोलियां व उपबोलियां प्रचलित हैं। हिन्दी की ऐसी ही एक बोली भोजपुरी है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश,बिहार तथा फिजी सूरीनाम मॉरीशस आदि देश के बड़े भाग में बोली जाती है। भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं। अपने व्यापक प्रभाव के कारण अनेक साहित्यकार तथा राजनेता इसे अलग भाषा मानने का आग्रह भी करते हैं। सरकार इसके विकास के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रही है।

जीवन - परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। उनका पालन-पोषण उनके ननिहाल बनारस के जरी परसीपुर गांव में हुआ था। उन्होंने उस युग में पढ़ाई लिखाई के लिए क्रांतिकारी सन्यासी बाबा गोविन्ददास के द्वारा स्थापित विद्यालय में कक्षा 5 तक की शिक्षा ग्रहण की थी। इस विद्यालय का प्रभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। वन्दे मातरम का पाठ और मामा सत्य नारायण दुबे के क्रांतिकारी स्वभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। गांव में अपने माता-पिता तथा अन्य लोगों से भोजपुरी लोकगीत व लोककथाएं सुनकर उनके मन में भी साहित्य के बीज अंकुरित हो गये थे । कुछ समय बाद उन्होंने कविता लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया ।

भोजपुरी काव्य का चयन
भोजपुरी काव्य मुख्यतः श्रृंगार प्रधान होते है। इस चक्कर में कभी-कभी तो यह अश्लीलता की सीमाओं को भी पार कर जाता है। होली के अवसर पर बजने वाले गीत इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इसके कारण भोजपुरी लोककाव्य को कई बार हीन दृष्टि से भी देखा जाता है। चंद्रशेखर मिश्र इससे व्यथित हुए थे। उन्होंने दूसरों से कहने की बजाय स्वयं ही इस धारा को बदलने का निश्चय किया।

स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित
1942 के आंदोलन में गोविंद प्रसाद जी और मामा सत्य नरायण दुबे जी के गिरफ्तारी के बाद मिश्र जी अपने साथियों के संग परसीपुर स्टेशन को आग लगा दिया था। उस जगह से वे इलाहाबाद फरार हो गए थे, जहाँ उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा था।  

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

            साहित्यिक कृतियां :- 

'दउरी हंकवा’
आजाद भारत में मिश्र जी के लेखनी से वीररस को नई ऊंचाई दी। पं. चंद्रशेखर मिसीर जी की पहिला रचना 'दउरी हंकवा' थी। इसमें गांव के दलित समाज पर सामंती वर्ग की ओर से होने वाला अत्याचार को दर्शाया गया है । समाचार 'आज' में यह रचना विशेष नोट के साथ प्रकाशित हुआ था।बाद में आज, उत्तरप्रदेश, सन्मार्ग में इनकी रचनायें प्रकाशित होने लगी। 

नागरी प्रचारिणी सभा’ में संपादक
कुछ समय के बाद बनारस के ' नागरी प्रचारिणी सभा' में इन्हें 'संपादक के रूप में नियुक्त हो गए थे। जहां वे लंबे समय तक जुड़े रहे। वे आकाशवाणी से भी बहुत लम्बे समय तक जुड़े रहे।

अन्य रचनाएं
इसके बाद अनेक ग्रंथों की रचना मिश्र जी ने की है - लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जन मानस तक पहुंचाया।


पृष्ठभूमि सहित प्रमुख रचनाएं 
राष्ट्र जागरण के लिए “कुंवर सिंह” उनके लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचाकर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। 'कुँअर सिंह' की भूमिका सम्पूर्णानंद जी लिखी इस प्रकार लिखी है - 
झूमत बा इतिहास जहां 
तहँ कईसे भूगोल रही ख़तरे में। 
X।    X।      X।    X।      X। 
छुरी कटारी बिकय सगरों, 
चूड़हारिन गांव में आवत नाहीं। 

 यह महाकव्य 1966 में प्रकाशित हुआ है। 1958 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। उस समय बाबू रघुबंश नारायण सिंह जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली भोजपुरी मासिक पत्रिका में बाबू कुंअर सिंह पर एक बड़ा लेख 'बिहार केशरी बाबू कुंअर सिंह' पर आया । इस लेख का असर पं चंद्रशेखर मिश्र जी पर इतना पड़ा कि इस महाकाव्य का सृजन हुआ। इससे उनकी लोक प्रियता में चार चांद लग गये। कवि सम्मेलनों में लोग आग्रह पूर्वक इसके अंश सुनते थे। इसे सुनकर लोगों का देश प्रेम हिलोरें लेने लगता था। युवक तो इसके दीवाने ही हो गये। इस ग्रन्थ के कुछ पंक्तियां इस प्रकार है - 

नेवता बलि बेदी क छोड़िके, 
औरन कs कबहूँ यह आवत नाहीं ।
मारू, जुझारू बजई बजना, 
केहु दोसर राग बजावत नाहीं 

छोड़ि के बीर भरी कविता, 
रस दूसर में केहू गावत नाहीं । 
छूरी-कटारी बिकइ सगरउँ , 
चुरिहारिन गाउँ में आवत नाहीं ॥ 

पूतन से बुढवा कहले, 
रन कइसे चली रहली न जवानी ।
पेड़ किनारे क जानs हमईँ, 
बस चार दिना क बची जिनगानी ॥

वेद के मंत्र से पिंड ना लेबइ, 
बोलs तबउ जय देस क बानी ।
पानी बचाई के ना रखबs , 
तब ना हम लेबइ सराध में पानी ॥ 

छाँटली बाँह गिरि छप से, 
किछु दूरी बनी तब लाल निसानी ।
भोजपुरी भुइयाँ हुलसी, 
कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी ॥

भागीरथी से कहै धरती , 
जब लेइ लहरा नदिया इतरानी । 
बोलs ई नीर तोहार हु या, 
हमरे बेटवा के कटार के पानी ॥ 


द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में 

कुंवर सिंह की सफलता के बाद उन्होंने अनेक भोजपुरी और हिन्दी पुस्तकों की रचना की। जहाँ 'कुँअर सिंह' महाकाव्य वीर रस प्रधान महाकाव्य रहा उसी युग में 'द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है - 

तू दुर्गा बनके अइलू 
तोहरे बल वीर चलावत भाला ।
माई सरस्वती तू बनलु 
तोहरी किरिपा कविता बनी जाला ।
आठ भुजा नभचुंबी धुजा 
नहीं मैहर में सीढ़िया चढी जाला 
राउर उंचि अदालत बा, 
बदरा जहां से रचिकै रहि जाला।।

मोछि मुरेरत आंखि घुरेरत
पापी के केहू निरेखत नाहीं ।
ताकत बा हमही के सबै,
ओकरे ओरिया केहू ताकत नाहीं ।
सासु जेठानी खड़ी देवरानी,
दुसासन के केहू छेकत नाहीं । 
हे बिरना हमरे उपरा फटहिउ
धोतिया केहू फेकत नाहीं ।।

जीयत बा जबले भयवा,
एहसान ना आन के माथे चढइबै। 
गाढे में भारी भरोस हमार
ओन्है तजि के के भला गोहरइबै।
पांच पति पर ऐसी गती
एहि देस में साझहिं आग लगइबै ।
सासुर में सब कायर बा
अब नइहर से बिरना बोलवइबै ।। 

टारत भीड़ बढी द्रौपदी
जस हंसिनि पौरंत फाटत काई ।
ठाढि छछात लगै दुरगा,
केसिया कन्हिया रहलें छितराई । 
बोललिं धाइ धधाइ के बोललिं
एड़ी ऊँचाई के हाथ उठाईं ।
बाटै खड़ा बिरना अब देखब
बाघ बियानी बा केकरि माई ॥ 

नाहीं ढोवात अन्हार क भार 
बा ताकत बाटे ढोवाइ न देते। 
झंखत बानी अँजोर बदे 
दियरी, दियरी से छुवाई न देते। 
भोर समय पछितैबे अकेलइ 
राह अन्हारे देखाइ न देते 
बाती अकेलि कहाँ ले जरइ? 
तनिका भरि नेह चुवाई न देते।।

देखले कबउँ ना बाटी 
पढ़ले जरूर बाटीं 
सुनी ले कि रिखि मुनि 
झूठ नाहीं बोललें 
बरम्हा, बिसुन औ महेस
तीनिउँ मोहि गइले, 
माई तोर बीन कौन-
कौन सुर खोललें? 

द्रौपदी बेचारी बाटे 
खाली एक सारी बाटै, 
उहो ना बचत बाटै 
बैरि मिलि छोरले, 
अस गाढ़ी समय में 
देखब तोहार हंस 
हाली हाली उड़ेलें 
कि धीरे धीरे डोलेले।।

ना लूटिहई द्रौपदी कतहू 
मतवा भेजबू जौउ धोती एहां से।
रोज तू सुरुज बोवलू खेत मे 
रोजई भेजलू जोती एहीं से।
माई रे तोरे असिसन के बल 
पाउब छंद के मोती एहीं से।
बाटई हमे बिस्वास बड़ा निह्चाई 
निकले रस सोती एहीं से ॥ 

ढोग कविताई क रचाई गैल बाटै 
तब छोड़ी के दूआरी तोर बोल कहाँ जाईरे।
भाव नाही भाषा नाही छंद रस बोध नाही ।
कलम न बाटै नाही बाटै रोसनाई रे।
कौरव सभा मे आज द्रौपदी क लाज बाटै गाढे में परली बाटै मोर कविताई रे।
हियरा लगाई तनी अचंरा ओढाई लेते लडिका रोवत बा उठाई लेते माई रे ॥ 

ओहि दिन पुरहर राष्ट्र धृतराष्ट भैल 
भागि मे बिधाता जाने काउ रचि गईलें।
नाऊ त धरमराज नाहि बा सरम लाज 
हाइ राम लाज क जहाज पचि गईलें।
ठाट बाट हारि गईलें राजपाट हारि गईलें 
आगे अब काउ हारे काउ बची गईलें।
अंत जब द्रौपदी के दाँउ पर धई देले 
अनरथ देखि हहकार मची गईलें॥ 

नाहि ढेर बड़ि बाटै नही ढेर छोटी बाटै 
नाहि ढेर मोटि बाटै नाहि ढेर पतरी।
छोट छोट दांत बाटै मोती जोति माथ बाटै तनी मनि गोरी बाटै ढेर ढेर सवंरी।
बड़ बड़ बाल बाटै गोल गोल गाल बाटै 
गोड लाल लाल बाटै लाल लालअगुँरी।
बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली द्रौपदी जुआरिन के दाँउ पर बा धरी॥ 

द्रौपदी की करुण पुकार-

गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs 
हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।
तू बहिना बहिना कहबs, 
पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।
सावन में तोहें बांधे बदे,
जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।
आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,
भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।

दौड़े चले हैं मोहन पुकार पर- 
आगे से चीर बढ़े नभ में,
ओकरे पीछवाँ, दउरेले मुरारी।
आज कन्हैया भगें एतना,
उनका के ना छू पऊंले ऊरगारी ।
तीन विमान उड़े नभ में,
अगवां के बढ़े, ईहे होड़ लगा री।
आई सभा में, आकाश से कान्हा,
बढ़ावन लागे हैं, छोर से सारी।।

सारी सभा और कौरव अचंभित हैं- 
साड़ी घटे ना त, बोला दुर्योधन,
'खींच दु:शासन, जोर लगा दे।' 
ई सुन, द्रौपदी हंस बोली,
'तुहूँ अब जोर लगा शहजादे।
बाती दयादी के आई गई बा त,
बाती पे बाती, हमें भी कहे दे।
'चीर घटी न दु:शासन से,
अपने अन्हरा बपवा के पठा दे।।' 

कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं- 

आ के कन्हैया कहें बहिना,
'काहें बोलत नईखे, कोहांईल बाड़ी।
'राही में ना पनियो पियनी,
तनी देख हमें, कि घमाईल बाड़ीं।
'वाहन बा अबहीं मोर पाछे,
मो पैदल धावल, आवत बानी।
'अद्वारिकाधीश के तें बहिना,
लुगरी बदे काहें कोहांईल बाड़ी।।

कृष्ण का बहन को आश्वासन..

'खींचे दे साड़ी, मो देखत बानी,
ईहां पर के बलवान बड़ा बा।
कि बहिना के गोहार पे भाई भी,
आ के सभा बीचवा में खड़ा बा।
फारी के तें बन्हली सड़िया, 
अबहीं अंगुरी में निशान पड़ा बा।
आ सूद में ढांकब लाज तोहार,
मूल तोहार, पड़ा के पड़ा बा।।

द्रौपदी की चेतावनी 

खींच दु:शासन, जोर लगाई के
टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।
बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,
मोहन ना हमके बिसरईहें।
देर लगी, ना अबेर लगी,
बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।
भउजी के गोदी में होइहें तबो,
मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।
     
खड़ी बोली में “सीता” खण्ड काव्य
इनकी खड़ी बोली में सीता बेहतरीन खण्डकाव्य है जो देवी सीता के जीवन पर आधारित है। यथा - 

ऐसा ना दण्ड विधान बना
निर्दोष रहे, नृप तो भी सजा दे ।
देवो को सारवी बनायेगा कौन
सुरेश से जाके कोई समझा दे । 
शोभा न देता है राम के राज्य में
सत्य को आ के असत्य दबा दे । 
अग्नि में भी नही साहस था ,
जो सिया तन में एक दाग लगा दे ।।

सूरज के नाम पर वंश के गुमान वाले
समय कहेगा कौन खोटा,कौन है खरा।
सारी राजनीति एक दासी थी पलट गयी
खानदान खूब पहचानती थी मंथरा ।
बाप ने तो पूत को दिया था बनवास पर,
पूत ने तो एक पग और आगे है धरा । 
राम ने कलंक हीन नारी को निकालने की,
रवि-वंश में चलायी है नई परम्परा ।।

राम हो कि रावन हो, बलि चाहे बावन हो
यश-अपयश शेष दुनिया में रहेंगे । 
जब-जब चर्चा चलेगी रघुनाथ जी की,
सीय तेरी ! महिमा में तृण सम बहेंगे । 
आगे आगे राम सदा, पीछे पीछे सीय चली
किन्तु अब सीय आगे, राम पीछे रहेंगे ।
राम-सीता, राम-सीता , कोइ न कहेगा,
लोग सीताराम ! सीताराम ! सीताराम ! कहेंगे ।।

भीषम खण्ड काव्य
कुँअर सिंह, द्रौपदी, सीता जैसे महान काव्यों की रचना के बाद भोजपुरी में तीसरा और हिन्दी भोजपुरी के चौथा बेहतरीन खण्डकाव्य इन्होंने 'भीषम' खण्डकाव्य लिखा है। जो महाभारत के भीष्म के जीवन पर आधारित खण्ड काव्य है । इसमें वीर रस और करुण रस का अदभुत समन्वय है। यथा - 

छतिया उतान कइले भीषम तड़पि बोले,
रण बीच फैसला हमार बा तोहार बा ।
भाग्यमान जसुदा के कौन बा अभाव नाथ,
घीउ-दुध माखन कs लागल पहाड़बा ।

मोरे गंगा माई के त पास खाली पानी बाटै,
पनिया में का बा इहै मछरी सेवार बा ।
तबौ कुरुखेत बीच फैसला ई होइ जाई
दूध धार-दार बा कि पानी पानीदारबा ।

के रण जीतल हारल के,
कहइँ भीषम, केसव तू ही बतावs ।
जौन करइ के ना उ कइलs अब,
मारै बदै मति कष्ट उठावs ।
चूवत लोहू तरातर बा थकि-
जइबs न भूमि कठोर पै धावs ।
मैं रखि देब गला खुद चक्र पै,
मोहन माधव केसव आवs ।।

हिंदूस्तान, किसान और देस के लिए- 
आओ लगाव की बात करें , 
इस देस को तो अलगाव ने मारा ।
नीचे को जाता कभी न कोइ, 
इनका उनका सबका चढा पारा ।
एक मंदिर दूजे को मस्जिद, 
चहिये तीसरे को गुरुद्वारा ।
जो कुछ चाहिए दे दो उन्हे ,
हमे चाहिए हिंदुस्तान प्यारा ।। 

फूल लिखो कहीं पान लिखे, 
कहीं गेहूँ कहीं धान लिखो रे । 
खेत लिखो खलिहान लिखो , 
खलिहान के पास किसान लिखो रे । 
एक निवेदन है तुमसे,
तुम ओ मेरे बेटे जवान लिखो रे । 
देश के देखें जहाँ टुकड़े , 
उन्हे जोड़ के हिन्दूस्तान लिखो रे।।

गांव का बरखा” की कुछ पंक्तियां- 

हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।
सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं।
पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।
बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया।
बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे। हमर।।

बड़ी लजाधुर बिरई अंगुरी छुवले सकुचि उठेली,
ओहू लकोअॅरी कोहड़ा क बतिया, देखतै मुरझेली।
बहल बयरिया उड़ै चुनरिया फलकै लागै गगरिया,
नियरे रहै पनिघरा, लगै रोज नहावन रे। हमर ।।

मकई जब रेसमी केस में मोती लर लटकावै,
तब सुगना रसिया धीर से घुँघट आय हटावै।
फूट जरतुहा बड़ा तिरेसिहा लखैत बिहरै छतिया,
प्रेमी बड़ी मोरिनियाँ लागै मोर नचावन रे। हमर.।।

देखऽ अब का होला” की पंक्तियां 

जवन कब्‍बो ना करे के
तवनो कइलीं
जहँवा गइले पाप परेला
तहँवो गइलीं
जनलस अरोस-परोस
जानि गयल टोला
देखऽ अब का होला !

कहलीं, त कहलन -
ई का कइलऽ?
गंगा के घरे जनमलऽ
गड़ही में नहइलऽ? !
का ऊ ना जनतन जे कमल -
गड़हिए में होला ?
देखऽ अब का होला !

सरग हमैं ना चाहीं
हम त पा गइलीं
केहू जरो
हम त जुड़ा गइलीं
तोहार नाँव लेके
पी गइलीं जहर
रच्‍छा करिहऽ भोला
देखऽ अब का होला !

उँह...!
जवन होए के होई
तवन होई
एह डरन मनई
कब ले रोई।
हमके ?
'हरि प्रेरित लछिमन मन डोला'
देखऽ अब का होला !।।

" झुलनी का रंग सांचा हमार पिया" 

अवधी के निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है। एसा ही एक मनोहारी युगल गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है - 

झुलनी में गोरी लागा हमार जिया , 
झुलनी का रंग साँचा हमार पिया 
कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया ,  
रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया
सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै , 
दै अगनी का आँचा हमार पिया। 
छिति जल पावक गगन समीरा ,   
तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया। 
रतन से बनी रे झुलनिया ,    
जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया। 
जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,  
गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया। 
टूटी झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,  
फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया। 
सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया , 
केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया। 
एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,
इतना सांई मोहे राचा हमार पिया। 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

पुरस्कार एवं सम्मान - 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

     आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

 

भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र की द्रौपदी खण्ड काव्य के चीरहरण के रोमांचक और भावुक पल

'

भोजपुरी कविता लोकभाषा में लिखी जाती है और इसमें लोक जीवन, संस्कृति और भावनाओं की गहरी झलक मिलती है, जिसके प्रमुख कवियों में भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र, और आधुनिक रचनाकारों में रामायण राम, जगदीश ओझा जैसे नाम शामिल हैं, और इसकी परंपरा में गुरु गोरखनाथ और जगनिक (आल्हा) जैसे प्राचीन कवि भी महत्वपूर्ण हैं, जो भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करते हैं।

      भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा, सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

   भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र जी की द्रौपदी' खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है द्रौपदी की करुण पुकार- 

खींच दु:शासन, जोर लगाई के

टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।

बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,

मोहन ना हमके बिसरईहें।

देर लगी, ना अबेर लगी,

बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।

भउजी के गोदी में होइहें तबो,

मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।


गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs 

हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।

तू बहिना बहिना कहबs, 

पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।

सावन में तोहें बांधे बदे,

जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।

आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,

भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।

     इन छंदों को साथ में दिए लिंक से सुनकर आप अपने को धन्य अनुभव कर सकते हैं।

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Monday, December 22, 2025

विश्वस्तरीय एलोरा की गुफ़ाएं ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


एलोरा गुफाएँ भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं , जिनमें हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा गुफाएं शहर से 29 किलोमीटर दूर हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर परिसरों में से एक है। प्राचीन समय में कई गुफाएं मंदिरों के रूप में उपयोग की जाती थीं, जबकि अन्य मठ और विश्राम स्थल थे। यह लगभग 100 गुफाओं का एक परिसर है जिनमें जटिल नक्काशी और मूर्तियां हैं। गुफाएँ प्राचीन भारतीय शिला- कट वास्तुकला के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से एक हैं।खोजी गई 100 गुफाओं में से 34 गुफाएँ जनता के लिए खुली हैं। इनमें 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिंदू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) शामिल हैं। भारत के इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए ये गुफाएँ अवश्य देखने योग्य हैं।इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध कैलाश मंदिर नामक एक स्मारक है। यह एक विशाल अखंड संरचना है जिसे एक ही चट्टान से तराशा गया है।
      हिंदू बौद्ध और जैन धर्म के पवित्र कलाएं गुफाएं हमेशा से ही पवित्र स्थल रही हैं, जिन्हें आमतौर पर वेरुल के नाम से जाना जाता है। सदियों से ये गुफाएं तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करती रही हैं और आज भी करती हैं। एलोरा गुफाओं में मौजूद शिलालेख और नक्काशी बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।माना जाता है कि इनगुफाओं का निर्माण बौद्ध धर्म के पतन के समय हुआ था। इनकी नक्काशी का काम लगभग उसी समय शुरू हुआ जब पास की अजंता गुफाओं को छोड़ दिया गया था। उस दौरान हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा था। पूरे क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव कायम था। गुफाओं का निर्माण एक-दूसरे के करीब किया गया था, जो इसी सद्भाव को दर्शाता है।

एलोरा गुफा का समय 
गुफा स्मारकों की यह निरंतर श्रृंखला छठी से दसवीं शताब्दी के बीच की सभ्यता को जीवंत कर देती है। कुछ ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि इसके बाद भी लंबे समय तक इन गुफाओं में लोग रहते रहे।
एलोरा गुफाओं का निर्माण 600 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच,400 वर्षों की अवधि में हुआ था। जिसमें मुख्य रूप से कलचुरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों का योगदान था; इनमें बौद्ध (6वीं-8वीं सदी), हिंदू (6वीं-10वीं सदी) और जैन (9वीं- 12वीं सदी) धर्मों से संबंधित मंदिर और मठ शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं। 

एलोरा गुफाओं में सहिष्णुता की भावना दीखती है 
एलोरा गुफाएं बौद्ध, हिंदू और जैन गुफा मंदिरों का एक प्रभावशाली संगम हैं। इन गुफाओं में बौद्ध चैत्य और विहार, हिंदू मंदिर और जैन तीर्थस्थल शामिल हैं। इस प्रकार,एलोरा गुफाएं उस काल की धार्मिक सद्भाव, सामंजस्य और समकालिकता का प्रतीक हैं। एलोरा गुफा परिसर अपनी अनूठी कलात्मक कृतियों और तकनीकी बुद्धिमत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी कारण एलोरा को 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।
कैलाश मंदिर सबसे ज्यादा आकर्षक
एलोरा गुफाओं में स्थित कैलाश मंदिर यहाँ का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण है। कैलाश मंदिर (गुफा 16), जो एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया है, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समान दिखता है। प्रारंभिक हिंदू गुफाओं में से अधिकांश भगवान शिव को समर्पित थीं।

एलोरा गुफाओं की वास्तुकला
एलोरा गुफाओं की वास्तुकला में विभिन्न प्रकार की शैलियाँ और तकनीकें देखने को मिलती हैं। पश्चिमी दक्कन के विभिन्न स्थानों पर चट्टानों को काटकर की जाने वाली कलाकृतियों पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव है, साथ ही दक्षिण भारत में संरचनात्मक गतिविधियों पर भी इसका प्रभाव है।
     सामान्य तौर पर, एलोरा की गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई वास्तुकला शैली के अंतिम चरण से उभरती हुई स्वतंत्र संरचना वास्तुकला की ओर संक्रमण का प्रतीक हैं। ये भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सबसे पुराने मंदिरों की संरचना सरल होती है। इनमें मंदिर के सामने स्तंभों के बिना छोटे-छोटे गलियारे होते हैं। और दरवाजों के फ्रेम और स्तंभ आमतौर पर सादे होते हैं। इसमें कैलाश मंदिर, छोटा कैलाश और इंद्र सभा जैसी अखंड संरचनाएं निर्मित इमारतों की नकल करती हुई प्रतीत होती हैं। ये स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर थे जिनमें खुले बरामदे और बंद मंडप थे, साथ ही गर्भगृह भी थे। यहां एक हिंदू मंदिर की विशिष्ट विशेषताएं दिखाई देंगी: गर्भगृह जिसमें लिंगम स्थापित है, परिक्रमा करने के लिए एक स्थान, एक सभा कक्ष और एक प्रवेश द्वार मिलते हैं।

15 मीटर ऊंची प्रतिमा बुद्ध की प्रतिमा
एलोरा में स्थित जैन गुफाएं हिंदू और बौद्ध गुफाओं से छोटी हैं। इन गुफाओं में मंडप और स्तंभों वाला बरामदा जैसी स्थापत्य विशेषताएं मौजूद हैं।परिसर में स्थित बौद्ध गुफाओं में मठ और मंदिर हैं। विश्वकर्मा गुफा (गुफा 10) सबसे उल्लेखनीय है।इस स्थल पर और भी कई गुफाएँ और मूर्तियाँ हैं। भगवान बुद्ध की 15 मीटर ऊंची प्रतिमा भी यहाँ की एक और खास विशेषता है। यह एक समर्पित प्रार्थना स्थल है, और इसके अंदर आपको उपदेश देने की मुद्रा में विश्राम करते हुए बुद्ध की 15 फुट ऊंची प्रतिमा मिलेगी।
       कैलाश मंदिर की शैली में निर्मित छोटा कैलाश (गुफा 30) एलोरा गुफाओं में सबसे अधिक दर्शनीय जैन मंदिर है। इंद्र सभा (गुफा 32) भी प्रसिद्ध है। यह सभी गुफाओं में सबसे बड़ी और सबसे उत्तम है।

एलोरा गुफाओं का इतिहास
एलोरा गुफाओं का इतिहास चार शताब्दी पुराना है। हालांकि गुफाओं की खुदाई की समयरेखा स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि हिंदू और बौद्ध गुफाओं का कुछ हिस्सा राष्ट्रकूट राजवंश के दौरान बनाया गया था। जैन गुफाओं का निर्माण यादव शासनकाल में हुआ माना जाता है। बौद्ध गुफाओं (1 से 12) की खुदाई छठी और आठवीं शताब्दी के बीच हुई मानी जाती है। और जैन गुफाओं (30 से 34) की खुदाई नौवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच हुई थी। हिंदू गुफाओं की खुदाई दो चरणों में की गई थी। इनमें से कुछ गुफाओं की खुदाई बौद्ध या जैन गुफाओं से भी पहले की गई थी। नौ गुफाओं (17 से 25) की खुदाई छठी शताब्दी के आरंभ में की गई थी, जिसके बाद चार और गुफाओं (26 से 29) की खुदाई की गई। अन्य हिंदू गुफाओं (13 से 16) का निर्माण सातवीं और दसवीं शताब्दी के बीच हुआ था।

एलोरा गुफाओं की महत्वपूर्ण बातें 
भारत में एलोरा गुफाओं में 100 से अधिक चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं। हालांकि, इनमें से केवल 34 गुफाएं ही जनता के लिए खुली हैं।

1. हिंदू मंदिरों का भ्रमण - 
एलोरा गुफाओं की सूची में, गुफा संख्या 13 से 29 तक हिंदू गुफाएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं गुफा संख्या 15 (दशावतार), गुफा संख्या 16 (कैलासा मंदिर) और गुफा संख्या 21 (रामेश्वर)। कैलाश मंदिर अपनी भव्य नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।दशावतार गुफा में मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है, और रामेश्वर गुफा अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। गुफा संख्या 29 (दुमर लेना) भी लोकप्रिय है। यह सीता-की-नहानी के किनारे स्थित है, जो एलागंगा नदी के झरने से बना एक छोटा सा तालाब है।

2. बौद्ध मठों का भ्रमण - 
एलोरा गुफाएँ: गुफा संख्या 1 से 12 तक बौद्ध मठ स्थित हैं। इनमें से गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा), गुफा संख्या 11 (दो ताल) और गुफा संख्या 12 (तीन ताल) विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। विश्वकर्मा गुफा में बुद्ध का एक विशाल स्तूप है, दो ताल दो मंजिला मठ है और तीन ताल तीन मंजिला मठ है। सभी बौद्ध गुफाओं में बुद्ध के चित्र और मूर्तियां तथा बौद्ध पौराणिक कथाओं के प्रतीक उकेरे गए हैं।

3. जैन तीर्थ स्थलों का भ्रमण
एलोरा में जैन गुफाएँ गुफा संख्या 30 से 34 तक हैं। इनमें से सबसे उल्लेखनीय हैं गुफा संख्या 30 (छोटा कैलाश), गुफा संख्या 32 (इंद्र सभा) और गुफा संख्या 33 (जगन्नाथ सभा)। छोटा कैलाश हिंदू कैलाश मंदिर की एक अधूरी प्रतिकृति जैसा है, इंद्र सभा जैन तीर्थ स्थलों की एक श्रृंखला है, और जगन्नाथ सभा में कुछ अच्छी तरह से संरक्षित मूर्तियाँ हैं। सभी जैन गुफाओं में सूक्ष्म और नाजुक नक्काशी की गई है और इनमें दिगंबर संप्रदाय को समर्पित चित्र हैं।

4. कैलाश मंदिर का भ्रमण – 
कैलाश मंदिर एक प्राचीन शिलाखंड काटकर निर्मित मंदिर परिसर है जिसमें भगवान शिव को समर्पित एक गर्भगृह है। इसमें एक विशाल अखंड शिवलिंग है। मंदिर में हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाली मूर्तियां हैं। पूरे मंदिर का आधार, दीवारें और छत सूक्ष्म और विस्तृत नक्काशी से सुशोभित हैं। और सभी शिव मंदिरों की तरह, केंद्रीय गर्भगृह के सामने बरामदे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है। यह सारा काम छेनी और हथौड़े जैसे साधारण औजारों से किया गया था।यह मंडप द्रविड़ शैली के शिखर और 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों के कारीगरों ने यहाँ काम किया है। कैलाश मंदिर भारतीय गुफा वास्तुकला का एक ज्ञानकोश है।

एलोरा-अजंता गुफाएं एक जैसी नहीं 
अजंता पूरी तरह से बौद्ध हैं और अपने अद्भुत चित्रों (भित्तिचित्रों) के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि एलोरा में बौद्ध, हिंदू और जैन धर्मों का मिश्रण है और यह कैलास मंदिर जैसे विशाल रॉक-कट मंदिरों के लिए जाना जाता है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं, और एलोरा की गुफाएँ पास-पास हैं, जबकि अजंता की गुफाएँ थोड़ी दूर हैं। संक्षेप में, अजंता कला और चित्रों के लिए है, जबकि एलोरा विभिन्न धर्मों के अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का संगम है। 

क्षति के कारक 
एलोरा गुफाएँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं, बल्कि दिल्ली सल्तनत और मुगल काल (15वीं-17वीं सदी) के दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा मूर्तियों और चित्रों को नुकसान पहुँचाया गया, खासकर औरंगज़ेब ने कैलाश मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रहा; आज भी प्राकृतिक कारणों : पानी का रिसाव और मानवीय उपेक्षा से इन्हें खतरा है, पर ये यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मौजूद हैं।
       आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)