Sunday, April 12, 2026

आस्था व विश्वास का केन्द्र है बाबा राम निहालदास की तपोभूमि (कुटी) उमरिया ✍️आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी


बस्ती जिले के दुबौलिया थाना क्षेत्र के सिद्ध पीठ बाबा राम निहाल दास की कुटी उमरिया में है। जहां प्रत्येक साल के दीपावली बाद यम द्वितीया पर विशेष पूजा का आयोजन होता है। नदी की बाढ़ से कभी भी मंदिर को नुकसान नहीं हुआ। एक बार बाढ़ आ गई थी पर वह मंदिर को स्पर्श कर वापस चली गई थी। कहा जाता है कि बाबा जी के गुरु किसी बात पर नाराज हो गए थे और 12 वर्ष तक निहाल बाबा को मंदिर और आश्रम की साफ सफाई करने का शाप दे गए थे। यह अवधि पूरा करने के बाद बाबा जी में और सिद्धियां आ गई थीं। यहां बाबा जी की समाधि और मूर्ति दोनों बनी हुई है।
यम द्वितिया पर लगे विशाल मेले में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है। भोर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर मनोकामना पूरा होने की कामना करते हैं।
       महंत सुखराम दास के अनुसार बाबा निहाल दास यहीं पर बैठकर तपस्या किया करते थे। यहां इस मौके पर विशाल मेला भी लगता है। श्रद्धालु यहां सरयू नदी में स्नान करने के बाद बाबा निहाल दास को प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।

सरयू तट पर स्थित बाबा राम निहाल दास कुटी उमरिया में यम द्वितिया पर लगे विशाल मेले में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है । भोर से श्रद्धालुओं के आने जाने का तांता लगा रहता है।
       
बाबा राम निहाल दास की कुटी के परिसर में विभिन्न प्रकार की दुकानों की सजावट और भीड़ देखते ही बन रही थी। क्षेत्र के लोग मुख्य रूप से खेती-किसानी से जुड़े लोहे के सामान जैसे कुदाल, फावड़ा, हंसियां, सिंघाड़ा आदि खरीदते नजर आए। बच्चों के लिए झूले और खिलौनों की दुकानों पर भी खासा जमावड़ा रहा। मंदिर की मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु अपनी इच्छा से मंदिर में मनौती मानता है, उसे पुण्य अवश्य मिलता है। इसी विश्वास और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष यम द्वितीया पर यह मेला आयोजित होता है।

लोग बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर मनोकामना पूरा होने की कामना करते हैं।बाबा की कुटी पर भोर से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो शाम तक जारी रहता है । जिले के दूर दराज से आए व्यापारियों ने अपनी-अपनी दुकानें को लगाते हैं। मेले में आए लोग जमकर खरीदारी करते रहते हैं। मंदिर परिसर में पहुंचे श्रद्धालु बाबा राम निहाल दास की प्रतिमा का दर्शन भी करते हैं। मेले के दिन भंडारा का आयोजन भी होते रहते हैं। 
       मान्यता है कि जो लोग इस मंदिर पर पहुंचकर सच्चे मन से मनौती व मन्नत मांगते हैं उनकी मुराद अवश्य पूरी होती है। यहां पर प्रत्येक मंगलवार को मेला भी लगता है।मेले में आए श्रृद्धालुओं ने जमकर खरीदारी की। मिट्टी के बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी के सामानों की दुकानें लोगों को आकर्षित करती रहीं। महिलाओं ने सूप,मचिया की खरीददारी की। बच्चों ने खिलौने व सिघाड़े का आनंद लिया। दुबौलिया के प्रभारी निरिक्षक पंकज कुमार सिंह अपने दल बल के साथ सुरक्षा में लगे रहे। स्थानीय लोगों के मुताबिक सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां रामनिहाल दास नाम के एक पुजारी रहते थे। जिन्हें सिद्ध पुरुष माना जाता था। मान्यता है कि बाबा गंभीर से गंभीर रोग सिर्फ छू कर ठीक कर देते थे। बाबा ने यहां जीवित समाधि ली थी। बाबा के हाथ से स्थापित मंदिर नदी तट पर मौजूद है। लोग मंदिर की परिक्रमा कर मनौती मांगते हैं। प्रत्येक मेले में बस्ती के अलावा अंबेडकरनगर के लोग भी भारी संख्या में आते हैं।
    
 सिद्ध पीठ बाबा राम निहाल दास की कुटी और भक्तों की सुरक्षा के लिए यहां पुलिस चौकी भी स्थापित है।मेले की सुरक्षा में दुबौलिया पुलिस के अलावा कप्तानगंज, कलवारी, लालगंज, नगर की पुलिस के साथ यातायात पुलिस उपस्थित रहती है। 

प्रतापपुर इमलिया अम्बेडकरनगर में बाबा निहाल दास जी की एक और प्रसिद्ध तपस्थली 

अम्बेडकरनगर के कटेहरी क्षेत्र प्रतापपुर इमलिया में स्थित श्री बाबा निहाल दास जी की एक प्रसिद्ध तपस्थली दिव्य अलौकिक कुटिया है। यहां एक विशाल जलाशय के समीप जंगल में शिव जी पार्वती जी नंदी जी और हनुमान जी की दिव्य प्रतिमाएं और यज्ञ शाला भी स्थापित हैं। बाबा जी को उनके गुरु जी ने 12 साल मंदिर की साफ सफाई करने का शाप दिया था जिसे पूर्ण कर बाबा जी और दिव्यता के साथ चमक उठे थे।
 यहां प्रत्येक मंगलवार को मेला लगता है, यहाँ प्रतिदिन स्थानीय व दूरदराज के लोग अपनी अपनी मन्नतों को लेकर आया करते है और उनके आस्था विश्वास समर्पण भक्तिभाव के अनुरूप बाबा जी की कृपा आशीर्वाद से अवश्य पूर्ण होता है ऐसी अद्भुत मान्यताओं को लेकर यह तपस्थली काफी प्रचलित है। यहां भक्तजन अपने धार्मिक भावनाओं के आधार पर तरह-तरह के चढ़ावा करते है यह चारों तरफ जंगलो से घिरा हुआ एक ऐसा अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त देव स्थल है जहाँ पहुँचने मात्र से कुछ पल व्यतीत करने से तनावों से मुक्त आत्मशान्ति अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है। भौतिकतावाद के झंझावात से ग्रसित नाना प्रकार के दैहिक दैविक भौतिक समस्याओं से यदि उलझे हुए हो और आपको कोई मार्ग न दिखाई दे रहा हो चारों ओर अंधकार ही अंधकार नजर आ रहा हो तो धार्मिक भक्तिभावना से एक बार इस अलौकिक तपोस्थली पर आए दर्शन प्राप्त करे निश्चित रूप से समस्त समस्याओं से आपको निजात मिल जाएगी मनुष्य जीवन में आने वाले समस्त संघर्षों व विघ्न बाधाओं से डटकर सामना करने की सामर्थ्य प्राप्त होगी। धर्म अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों से भरपूर महान संत बाबा निहाल दास जी के तपसाधना से ऊर्जावान्वित साधना भक्ति से परिपूर्ण अलौकिक ऊर्जा शक्ति का केन्द्र श्री बाबा जी की कुटिया के परम्परागत गद्दी पर आसीन परम पूज्यनीय महंत बाबा पराग दास जी है जिनके द्वारा नित्य प्रति आने वाले भक्तजनों के दुःख, संकटों का निवारण उनके द्वारा किए गए यज्ञशाला के हवनकुण्ड की भभूति प्रसाद प्रदान कर किया जाता है।

साहित्यिक और धार्मिक रुचि :- 

गारीः- 
चारि पदारथ देन हार यह नर तन सुर मुनि गाई जी। 
बिन सत्संग जात है बिरथा पुनि पुनि गोता खाई जी। 
काम क्रोध मद लोभ मोह यह असुर बड़े दुखदाई जी। 
पांचों संस्कार ये जानो तन में रहत सदाई जी। 
दम्भ पखण्ड कपट औ निद्रा आलस संघ जम्हुआई जी।५। 

माया द्वैत बासना नाना संग मन नाचे जाई जी। 
चिंता तन में चिता लगावै दुख चढ़ि बैठे आई जी। 
यह समाज आसुरी बंश की थकै न नेको भाई जी। 
महा जाल में फांसि लेत औ नर्क को देय पठाई जी। 
शान्ति शील संतोष दीनता प्रेम के हाल सुनाई जी।१०। 

क्षिमा दया सरधा औ हिम्मति सत्य समाधि लगाई जी। 
ज्ञान बिराग संग विश्वासौ लय में पहुँचौ धाई जी। 
परस्वारथ परमारथ दोनो कैसे कोउ करि पाई जी। 
देवासुर संग्राम जीतिये घट ही में चमकाई जी। 
हरि सुमिरन बिन जीति न पैहौ सुनिये सब मम भाई जी।१५। 

सतगुरु करि सुमिरन बिधि जानौ तब मन वश स्वै जाई जी। 
नाम खुलै हरि दर्शन लागैं खल सब चलैं पराई जी। 
ध्यान समाधि में पहुँचि जाव जब कर्म भर्म मिटि जाई जी। 
सबै देव मुनि संग बतलावैं हर्ष न हृदय समाई जी। 
दास निहाल सुरति औ शब्द क मारग अति सुखदाई जी।२०। 

दोहाः-

चिता के ऊपर बैठि कै, 
राम राम कहि जान। 
निहाल दास कहैं जारि तन, 
छोड़ि दीन हम प्रान।१। 
बास मिल्यो बैकुण्ठ में, 
आवा गमन मुकाम। 
या की गणना जगत में, 
बात मानिये आम।२। 

चौपाई:- 
नाम रूप लीला औ धामा। 
शून्य समाधि जानि निज जामा।१। 
मरै बासना निर्भय होवै। 
सो साकेत जाय सुख सोवै।२। 

दोहाः- 
जो जियतै में तय करै, 
सोई चतुर सुजान। 
नाहिं तो जनमै मरै, 
मानों बचन प्रमान।१। 

चौपाई:- 
बाबन बेर ठगावै जोई। 
बावन बीर कहावै सोई। 
धोका खाये बिन नहिं ज्ञाना। 
हम तो यह अपने मन माना। 
पानी दूध वहां बिलगाना। 
सुनतै खुलि गे आँखी काना। 
बचन हमार मानि यह लेना। 
सत्य नाम की सिक्षा देना। 
रेफ बिन्दु जो सब में ब्यापक। 
सब का जानो यह अध्यापक! 
या को जानि लेय जो कोई। ता को आवागमन न होई।६। 

दोहाः- 
नाम कि धुनि खुलि जाय जब, सुर मुनि दर्शन दैय। 
मुद मंगल ह्वै जाय तब, हरि निज पास में लेंय।। 
(सन्दर्भ :श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' श्री परमहंस राममंगलदास जी द्वारा रचित प्रथम दिव्य ग्रन्थ।
(भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ); ग्रन्थ - 1, भाग - २ दिसम्बर २००१।)

रामजी के ही सहचर- सखी सखाओं का रामसखा सम्प्रदाय---- डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

              (राम सखा बगिया अयोध्या)
            ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। 
           भए समर सागर कहँ बेरे।। 
            मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। 
            भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
                   (राम चरित मानस)
 अपने सहचर सखाओं की प्रशंसा करते हुए श्रीराम गुरुदेव वशिष्ठ से उक्त बचन कहे थे। भक्तमाल के बीसवें छ्न्द में नाभादास ने राम के विशाल सहचर वर्ग को गिनाया है। इसके अलावा अन्यानेक सहचर , बीरों और भक्तों के नाम भी मिलते हैं। कुछ की कुछ - कुछ सूचनाएं भी मिलती है और कुछ का केवल नाम ही मिलते हैं। ये सब सखा किसी ना किसी देवी या देव के अंश से या अर्जित किए हुए कृपा या महान पुण्यों के फल स्वरूप उत्पन्न हुए थे। ब्रह्मा जी के आदेश से इन लोगों ने बानर , रीछ और भक्त गण का शरीर रामकाज के लिए धारण किया था। इनमें अथाह पौरुष और बल था। भगवान इन सबको अपना सखा मानते थे। रावण की मृत्यु के बाद उनके अनुचर सखा गण को रामजी ने आभार सहित अपने - अपने धाम को जाने को कहा था , पर कोई नहीं वापस गया। सभी राम जी के वनवास से वापस आने के अवसर पर सजी- धजी अयोध्या देखने आ गए थे। 
         कंचन कलस बिचित्र संवारे। 
          सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥ 
           बंदनवार पताका केतू। 
           सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। 
        छः माह तक उन सब की खूब आव - भगत अयोध्या में होती रही। उन्हें उपहार, वस्त्र और आभूषण देकर विदा किया गया।वे राम की छवि अपने हृदय में बसाकर लौट गए ,परंतु कई वीर सखा स्थाई रूप से अयोध्या वासी हो गए। जब रामजी बैकुंठ जा रहे थे तो अपने इन सखा वीरों को रामकोट , अयोध्या और भी मंडल की रखवाली का दायित्व भी दे दिया था।
        श्री रुद्रयामलोक्त अयोध्या महात्म्य के अध्याय 6 श्लोक 30 से 46 के मध्य रामकोट की सुरक्षा में लगे सभी वीरों और सखाओं के स्थान के बारे में विस्तार से जानकारी दिया गया है। इनमे अनेक स्थल तो राम जन्म भूमि न्यास के अधिग्रहण क्षेत्र की सीमा में आते हैं। कुछ को तो न्यास अपनी नई संरचना में स्थान भी दे रहा है। इस सब के अलावा भक्ति भाव में अनेक सन्त और महात्मा प्रभु से समीपता प्राप्त कर भगवान की सखा और सभी भाव से आराधना साधना और पूजा की थी। जिसके उपरान्त सखा और सखी भाव की भक्ति का संचार हुआ था। अयोध्या में अष्ट राम तथा अष्ट जानकी जी सखियों के नाम को आत्मसात करती हुई अनेक मंदिरों की संरचना व अराधना हो रही है।        
सखी- सखा सम्प्रदाय का विस्तार:-
'सखी या सखा भाव का सम्प्रदाय' 'निम्बार्क मत' की एक शाखा है। इस संप्रदाय में भगवान श्रीकृष्ण या राम की उपासना सखी- सखा भाव से की जाती है। कवि नाभादास जी ने अपने 'भक्तमाल' में कहा है कि- "सखी सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण की उपासना और आराधना की लीलाओं का अवलोकन साधक सखीभाव से कहता है। इस संप्रदाय के प्रसिद्द मंदिर वृंदावन मथुरा में श्री बांके बिहारी जी, निधिवन, राधा वल्लभ और प्रेम मंदिर आदि हैं। इसमें माधुर्य भक्ति और प्रेम भक्ति की जाती है ।वृन्दावन और अयोध्या दोनों स्थानों पर प्रेमलक्षणा और राधा भाव का इतना व्यापक प्रभाव किसी काल में पहुँचा था कि राम और सीता को राधा-कृष्ण की छाया में ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया गया और उसी शैली में काव्य-रचना होने लगी। 
 राम-काव्य के सुधी विद्वान् भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। फादर डॉ. कामिल बुल्के भी श्रृंगारी राम-काव्यों के संविधान में- भाव, साधना और शैली- सभी दृष्टियों से श्रृंगारिक कृष्ण काव्य-साधना के प्रभाव को स्वीकार करते हैं। वे हिन्दी साहित्य कोश में लिखते हैं- इस भक्ति पर कृष्ण-राधा संबंध साहित्य का प्रभाव भी पड़ा और बाद में उत्तरोत्तर बढ़ने लगा । रामभक्ति प्रधानतया दास्यभाव की न रह कर कुछ सम्प्रदायों में मधुरोपासना में परिणत हुई। अनुसन्धायकों के अतिरिक्त साहित्य के इतिहासकारों ने भी इस तथ्य को लक्ष्य किया है। आचार्य शुक्ल इनमें अग्रगण्य है। उनके अतिरिक्त आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपने इतिहास में इस धारणा की स्पष्ट-घोषणा की है। तदनुसार- 17वीं शताब्दी के बाद भक्ति-साहित्य में सखी-भाव की साधना का प्राधान्य हो गया। इसका प्रभाव रामभक्ति शाखा पर भी पड़ा है। वृन्दावन की भाँति अयोध्या भी सखी सम्प्रदाय के भक्तों का केन्द्र बन गई। राम जी के अभिन्न सहचर सखाओं ने भी राम सखा संप्रदाय की स्थापना करके अपने प्रभु से जुड़ने और उनकी भक्ति को और गहरी बनाने का उपक्रम किया है। राधा कृष्ण की भांति सीताराम की उपासना में सखी भाव में उपासना होती है। स्वामी रामानन्द जी, गोस्वामी तुलसी दास जी, कवि नाभा दास जी और कवि अग्रदास जी इस कड़ी को आगे बढ़ाए हैं। इस माधुर्य उपासना में सखी भाव प्रिया - प्रियतम के प्रेम मिलन के भाव से पूजा और आराधना की जाती है। कन्हैया कभी अपने दोस्त को पीठ पर लाद लेते हैं तो कभी दोस्त के पीठ पर बैठ लेते थे। कभी गेंद के लिए तो कभी फलादि के लिए लड़ते क्रीड़ा करते देखे गए हैं। इसी तरह सीताराम जी की उपासना में भगवान के चारो भाई, हनुमान जी ,भगवान शिव शंकर और भक्त व मित्र का बराबर बराबर का भाव देखने को मिलता है। 
पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
श्रीमद् सखेंद्र जी निध्याचार्य जी महराज का जन्म विक्रम संवत के आखिरी चरण चैत्र शुक्ल में राम नवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने श्री वशिष्ठ मुनि से गुरु दीक्षा प्राप्त की। राजस्थान में गलिता के आचार्य ने उन्हें रामसखा की उपाधि दी थी। वे दक्षिण के उडीपि कर्नाटक में गये जहां बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा की थी। उनका निवास नृत्य राघव कुंज के नाम से प्रसिद्व हुआ था । सखेंद्र जी महाराज को जब लगा कि भगवान राम ने उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में स्वीकार कर लिया है। उसी क्षण महाराज जी ने घर छोड़ दिया और विराट वैष्णव बन गए। उनकी जन्मस्थली होने के कारण वे जयपुर छोड़कर अयोध्या पुरी चले गए। अयोध्या आकर उन्होंने सरयू नदी के तट के अलावा एक पर्णकुटी में भगवान को याद करने के लिए जीवन बिताया। राम सखेंदु जी महाराज ने अठारहवीं संवत में राम सखा सम्प्रदाय की स्थापना की थी। सखी सम्प्रदाय तो सनातन काल से ही राम सखा ,राम सखी ,सीता सखी ,कृष्ण सखा ,कृष्ण सखी और राधा सखी आदि विविध रुपों में पुराणों व भक्ति साहित्य में पाया जाता रहा है। राम सखा जी के शिष्य गुरु की तरह निध्याचार्य उप नाम प्रयुक्त करने लगे थे। शील निधि सुशील निधि और विचित्र निधि उनके परम शिष्य थे।
          श्रीमद् सखेंद्र जी महाराज ने माध्य संप्रदाय के आचार्य श्री वशिष्ठ तीर्थ से गुरु दीक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने लिखा है -   
       "मध्य माध्य निज द्वैत मन मिलन द्वार हनुमान।
        राम सखे विद सम्पदा उडुपी गुरु स्थान।।"
रामसखा जी का अयोध्या में आगमन:-
अयोध्या आकर राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे। 

राम सखे जी (अवध वासी) के बारे मे दृष्टांत :- 
दोहाः
तन मन प्रेम से भाव मम, हरि हमरे हैं मीत।
एक दिवस हरि मिलि गये उर लगाय कह्यौ मीत।१। 
अन्त समय हरि धाम को गयों हर्षि चढि यान। 
राम सखे कहैं बचन मम, सत्य लीजिये मान।२। 
(सन्दर्भ:श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' लेखक: परमहंस राम मंगल दास जी।(भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ग्रन्थ - 1,भाग - २, दिसम्बर २००१ )

चित्रकूट में आगमन:-
अयोध्या में बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"
उचेहरा में अस्थाई प्रवास :-
कुछ महात्मा यह भी बताते हैं कि महाराज जी के एक शिष्य उनके साथ रहे। चित्रकूट में रहने के बाद महाराज जी उचेहरा (अब सतना जिला) में गए, उन्हें वहाँ बहुत अच्छा नहीं लगा और संवत 1831में मैहर चले गए।
मैहर में तपोसाधना :-
श्री राम सखा जू महाराज, हिंदू धर्म के माधव संप्रदाय के प्रतिपादक और अनुयायी थे, लगभग दो सौ साल पहले जयपुर से मैहर आए । मैहर आकार वह नीलमती गंगा के तट पर उन्होंने एक पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया। मैहर में एक मठ की स्थापना की, जिसे "श्री राम सखेंद्र जू का अखाड़ा" कहा जाता है। श्री सुखेन्द्र निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि बड़ा अखाड़े के रूप में मैहर में बहुत लोकप्रिय है । यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। बड़ा अखाड़ा में मंदिर और आश्रम दोनो देखने के लिए मिल जाता है। यहां पर शिव भगवान जी की बहुत बड़ा शिवलिंग मंदिर के छत पर बना हुआ है, जो बहुत ही सुंदर लगता है। इसके अलावा मंदिर के अन्दर में 108 शिवलिंग विराजमान है। यहां पर एक प्राचीन कुआं भी है। यहां पर राम जी का मंदिर, गणेश जी का मंदिर और हनुमान जी का मंदिर भी हैं। आश्रम का प्रवेश द्वार बहुत ही खूबसूरत है। आश्रम के प्रवेश द्वार में हनुमान जी और शंकर जी की प्रतिमा बनी है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। इस आश्रम के अंदर बगीचा भी है। यहां पर बहुत सारे ब्राह्मण विद्यार्थी रहते हैं, जिन्हें यहां पर शिक्षा दीक्षा दी जाती है। महाराज जी ने उन्नीसवीं संवत के प्रथम चरण यानी 1842 में मैहर में अमरता प्राप्त की। उनकी समाधि मैहर में ही है । यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। 
              रामसखा बड़ा अखाड़ा मैहर के परमपूज्य श्री श्री 1008 श्री सीताबल्लभ शरणजू महराज जी राम सुखेंद्र जू महराज की तपोभूमि (अखाड़े का ही भाग) है। श्री 1008 सुखेन्द्र निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि (देवी रोड) बहुत ही सिद्ध पीठ है।            श्री1008 श्री सीता शरण जी महाराज 
इस समय श्री श्री1008 श्री सीता शरण जी महाराज इस पीठ के स्वामी हैं।
राम नगरी अयोध्या में विशाल प्रयोग:-
राम नगरी अयोध्या में 11,000 से ज्यादा मंदिर हैं, पूरे विश्व में यह एक ऐसा स्थान है जहां इतनी बड़ी संख्या में मंदिर है. धर्म नगरी अयोध्या भगवान राम की जन्म स्थली के रूप में जानी जाती है. भगवान विष्णु के ही दूसरे अवतार कृष्ण का नाम पहले लिया जाता है। रासलीला, गोपलीला, राधा प्रेम जैसी कई कथाएं कृष्ण से सम्बन्धित हैं.     
सिर पर चुनरी डालकर उपासना :-
अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर से कुछ दूर कनक भवन स्थित है . रसिक संप्रदाय के लोग यहां सिर पर चुनरी डालकर भगवान की आरती करते हैं और राम संकीर्तन में खो जाते हैं. वह खुद का संबंध सीता से जोड़ते हैं और श्रीराम को दूल्हा मानते हैं।
श्रीराम दूल्हे के रूप में पूज्य:-
मान्यता है कि जब मिथिला में श्रीराम-सीता का विवाह हुआ तब उसके बाद उनकी सखियों ने विवाह ही नहीं किया. उन्हें इस युगल को देखकर ही जीवन का सारा ज्ञान मिल गया. उन्होंने वरदान मांगा कि हमारा जब भी जन्म हो, राम-सीता की भक्ति में ही जीवन कटे और हम अधिक से अधिक उनके निकट रहें. बिहार में सीतामढ़ी, जनकपुरी, दरभंगा, मैथिल आदि इलाकों में आज भी श्रीराम और यहां तक कि अयोध्या के हर वासी को वे पाहुन (ससुराल से आया अतिथि) मानते हैं. वह उन्हें दूल्हा ही मानते हैं. 
त्रेतायुग से रामरसिकों की सानिध्यता:-
राम रसिकों की मौजूदगी त्रेतायुग से ही है. अहिल्या और शबरी श्रीराम की नवधा भक्ति में समर्पित महिलाएं थीं. 
 एक खास बात ये भी है कि राम रसिक होने के बाद स्त्री-पुरुष का भेद मिट जाता है, सिर्फ आत्मा रह जाती है, जो किसी देह से बंधी सी है.
खाकी बाबा प्रिया अली सहचरी भाव पाये :-
श्री रूपकला जी (अयोध्या के सिद्ध संत) के साथ खाकी बाबा की मित्रता थी । जब कभी अयोध्या आते तो उनसे मिलते और श्री रामकथा सुनकर उसका आनंद लेते । एक दिन रात्रि मे वही विश्राम किया । रात्रि मे श्री रूपकला जी को विरह हुआ तो उनके मुख से आर्त वाणी से निकलने लगा - हे प्रियतम ! हे प्राणनाथ ! हे किशोरी जू । इस तरह कहकर रोने लगे । 
        खाकी बाबा ने उनको डांटा और कहा कि यह क्या प्रियतम और प्यारे प्यारे कहकर रोते रहते हो ? रूपकला जी ने खाकी बाबा से कहा - खाकी बाबा ! श्री अवध आये हो तो आपको एक बार श्री श्री लक्ष्मण शरण जी का दर्शन करना चाहिए । श्री रूपकला जी के कहने पर खाकी बाबा उन रसिक संत श्री श्री लक्ष्मण शरण जी का दर्शन करने गए । जब खाकी बाबा दर्शन करने गए तब बाबा जी चारपाई पर लेटे थे । श्री लक्ष्मण शरण जी ने खाकी बाबा से कहा की थोड़ा समय रुके रहो । जब सब लोग चले गए तब खाकी बाबा को अपने पास बुलाया । खाकी बाबा ने जैसे ही पास जाकर अपने गुरु के चरणों का स्पर्श किया तो देखा की उनके शरीर का अंग प्रत्यंग बदल गया । उनका शरीर एक अतिसुंदर तरुणी के शरीर मे बदल गया । सामने जो रसिक संत लेटे है उनको भी एक सुंदर युवती के रूप मे देखा । कुछ क्षणों मे वह दृश्य चला गया । खाकी बाबा वहां से भागे ।रूपकला जी के पास आकर बोले -  उसके चरण छूते ही मै एक युवती बन गया और वह बाबा खुद भी एक युवती बन गया । 
       रूपकला जी ने कहा - आप पर श्री किशोरी जी की कृपा हो गयी । आपको संत ने श्री किशोरी जी की सहचरियों मे सम्मिलित कर लिया । आप अपने स्वरूप को पहचानो, आज से आप तो प्रिया अली हो गए।  गुरुदेव द्वारा प्रदत्त नाम सीताराम दास, दुनिया के लिए खाकी बाबा और अंतरंग उपासना मे प्रिया अली हो गया । उसके बाद धीरे धीरे रसिक संतो एक संग व सेवा करते करते उनको माधुर्य उपासना की प्राप्ति हुई । 
अयोध्या के लक्ष्मण किले में राम रसिकों की मौजूदगी:-
आचार्य पीठ लक्ष्मण किला रसिक उपासना का सबसे प्राचीन पीठ है. आचार्य जीवाराम के शिष्य स्वामी युगलानन्य शरण की तपोस्थली पर इस मंदिर को साल 1865 में रीवा स्टेट के दीवान दीनबंधु के विशेष आग्रह के बाद बनवाया गया था. यहां वह सिर्फ सीता के पति हैं, सखियों के जीजा हैं और जगत के स्वामी हैं. उनकी उपासना में श्रृंगार का भाव प्रमुख हैं. राम रसिक सिर्फ राम की भक्ति नहीं करते हैं, बल्कि राम से भक्ति में रचा-बसा प्रेम करते हैं. रसिक उपासना के संत यहां भगवान राम की उपासना दूल्हे के रूप करते हैं. मंदिर में विवाह के पदों का गायन होता है.
अयोध्या मां सीता की भी नगरी:-
रामनगरी वस्तुत: श्रीराम के साथ मां सीता की भी नगरी है. श्रीराम और मां सीता में अभिन्नता प्रतिपादित है. यह शास्त्रीय तथ्य रामनगरी में पूरी प्रामाणिकता और पूर्णता के साथ प्रवाहमान है. रामजन्मभूमि पर विराजे रामलला को छोड़कर बाकी के सभी मंदिरों में श्रीराम के साथ मां जानकी का भी विग्रह अनिवार्य रूप से स्थापित है. वैष्णव परंपरा की दो मुख्यधारा रामानुज एवं रामानंद संप्रदाय में सीता आद्या-परात्परा एवं अखिल ब्रह्मांड नायक सृष्टि नियंता श्रीराम की सहचरी के रूप में समान रूप से स्वीकृत-शिरोधार्य हैं.गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि सीता उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री शक्ति है. वैष्णव मतावलंबी संतों की यह आम धारणा है कि श्रीराम करुणा के साथ न्याय और कर्म के आधार पर फल देने वाले हैं, जबकि मां जानकी अतीव करुणामयी हैं और वे पीड़ित मानवता पर अहेतुक कृपा करती हैं. रामानंद संप्रदाय की उपधारा रसिक उपासना परंपरा में तो मां सीता श्रीराम की चिर सहचरी के साथ जीव मात्र की आदि गुरु और मार्गदर्शिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं.मान्यता है कि भक्तों की पुकार वही श्री राम तक पहुंचाती हैं और श्रीराम की कृपा भी उनके ही माध्यम से भक्तों पर बरसती है.
अयोध्या का रंग महल में माता सीता की सखी भाव:-
अयोध्या के मंदिरों में से एक पवित्र मंदिर रंगमहल भी है। यह सैकड़ों वर्ष पुरानी मंदिर है जहां की उपासना बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान श्रीराम की जन्म स्थली से सटे रंगमहल की पौराणिकता अत्यंत अद्भुत है श्री राम जन्मभूमि में जहां श्री राम की उपासना होती है वही राम जन्मभूमि के बगल स्थित रंगमहल में माता सीता की उपासना होती है, इस मंदिर के संत अपने आपको सीता जी की सखी मानते हैं.
बड़ा स्थान जानकीघाट :- 
बड़ा स्थान जानकीघाट मन्दिर रसिक उपासना का केन्द्र
रसिक उपासना की मूलपीठ श्री स्वामी करुणा सिंधु मेमोरियल चैरिटेबल सेवा संस्थान द्वारा संचालित श्री जानकीघाट बड़ा स्थान है. परमार्थ सेवा की यह सिद्ध स्थली है. यह अयोध्या की अति प्राचीनतम मन्दिर है. जहा पर हर वर्ष विविध धार्मिक आयोजनों के साथ ही जन मानस व राम भक्तो की सेवा सतत चलती ही रहती है.
अष्ट रामसखा तथा अष्ट जानकी सखी: कनक भवन :-
कनक भवन के अष्ट सखी कुुन्ज में शय्या पर भगवान शयन करते हैं। इस कुन्ज के चारों ओर आठ सखियों के कुंज हैं। श्री चारुशीला जी, श्री क्षेमा जी, श्री हेमा जी, श्री वरारोहा जी, श्री लक्ष्मणा जी, श्री सुलोचना जी, श्री पद्मगंधा जी, श्री सुभगा जी । इन आठ सखियों के प्राचीन चित्र बने हुए हैं। इनके अतिरिक्त सीताजी की आठ सखियाँ और हैं जो श्री सीताजी की अष्टसखी कही जाती हैं उनमें श्री चन्द्र कला जी, श्री प्रसाद जी, श्री विमला जी, मदनकला जी, श्री विश्वमोहिनी, श्री उर्मिला जी , श्री चम्पाकला जी, श्री रूपकला जी हैं। इन श्री सीताजी की सखियों को अत्यन्त अन्तरंग कहा जाता है। ये श्री किशोरी जी की अंगजा हैं। ये प्रिया प्रियतम की सख्यता में लवलीन रहती हैं। 
रंगमहल अयोध्या ;-
अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया। विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे। और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली खेली थी। तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ। सखी सम्प्रदाय का मंदिर होने से इस स्थान का महत्व अत्यंत वृहद और दर्शनीय हो जाता है । यहाँ नित्य भगवान राम को शयन करते समय पुजारी सखी का रूप धारण करती हैं, भगवान को सुलाने के लिए ये सखियाँ लोरी सुनाती हैं, और उनके साथ रास करती हैं।
हनुमत् निवास मंदिर:-
अयोध्या में रसिक उपासना परम्परा से जुड़े हनुमत् उपासना के प्रमुख केन्द्र हनुमत् निवास मंदिर है। सौ वर्षों से भी अधिक पुराने इस धर्म स्थान की हनुमत् उपासना के क्षेत्र में विशिष्ट परम्परा रही है। कहा जाता है की गोमती शरण जी महाराज को हनुमानजी का साक्षात्कार हुआ था। चित्रकूट में कठिन साधना के पश्चात ईश्वरीय प्रेरणा से रसिक परम्परा की केन्द्रीय पीठ लक्ष्मण किला के इस स्थान पर स्थित गौशाला को ही उन्होंने अपनी साधना स्थली बना लिया था। 
पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
अयोध्या में श्रावण कुंज, नृत्य राघव कुंज , सियाराम केलि कुंज ,चार शिला कुंज , राम सखा जू महाराज और राम सखा बगिया आदि पाच प्रमुख मंदिर इस सम्प्रदाय के हैं।प्रतीत होता है कि अयोध्या मैहर चित्रकूट पुष्कर उडुपि तथा सतना आदि के सभी मंदिर एक ही परमेश्वर व नियंत्रण के अधीन दीर्घ समय तक रहे। बाद में सुविध तथा दुर्गमता के कारण सभी स्वतंत्र नियंत्रण मे चले गये।
नृत्य राघव कुंज :-
नृत्य राघव कुंज मणिराम छावनी के निकट बासुदेव घाट अयोध्या एक प्राचीन मंदिर है।राम सखा की दूसरी गद्दी बनी। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। यही प्रथम गुरु का प्रथम निवास था। इसका निर्माण मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। आजादी के बाद तक वहां से मंदिर की व्यवस्था के लिए खर्चा आता था। अब पुराना मंदिर जीर्ण हो गया है और न मंदिर पुष्कर के महंत के अधीन चला गया है।
श्रावण कुंज अयोध्या :-
 श्रावण कुंज अयोध्या के नया घाट पर स्थित है। मान्यता के अनुसार गोस्वामी तुलसी दास जी ने यही रामचरित मानस के बालकंड की रचना की थी। यह प्रति महंत छवि किशोर शरण के संरक्षण में थी। इस पर 1661 वैशाख सुदी 6 बुधवार छपा है। तुलसीदास जी मानस के रचना अयोध्या में ही शुरू किए थे। वे बहुत दिनों तक अयोध्या में रहे। (हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : डा.राम कुमार वर्मा पृ. 416)। वर्तमान में इस पीठ की देख रेख साध्वी राजेश्वरी देवी द्वारा हो रही है ।इसके अधीन एक मातृ आश्रम भी चल रहा है।
राम सखा बगिया :-
राम सखा बगिया रानी बाग में एक विस्तृत भूभाग में स्थित है। इसका निर्माण भी मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। आजादी के बाद तक वहां से मंदिर की व्यवस्था के लिए खर्चा आता था।
 श्री अवध किशोर शरण मिश्र राम सखा बगिया अयोध्या 
राम सखा मंदिर रानी बाग अयोध्या के वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर मिश्र ने मंदिर की परम्परा के बारे में बताया कि अयोध्या के कुल पाच मंदिर एक ही महन्थ जी के संरक्षण में पूजा अर्चनाकरते आ रहें थे। प्रथम गुरु श्रीमद् राम सखेन्द्र जू महराज थे। द्वितीय का नाम सुशील निधि जी महराज रहे है। तृतीय महराज श्री शील निधि जू महराज थे। चतुर्थ श्री अवध शरण जू महराज तथा पंचम श्री रामभुवन शरण जू महराज रहे। षष्टम श्री कामता शरण जू महराज तथा सप्तम श्री रामेश्वर शरण जू महराज रहे।अष्टम महराज के रुप में वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर शरण जी है।इस परम्परा में मुस्लिम धर्म से सनातन धर्म में आये दो सन्तों ने कुछ समय तक इस परम्परा के प्रधान की भूमिका निभाई थी। इनके नाम श्री शीलनिधि महराज तथा श्री सुशील निधि महराज रहा। राम सखेन्दु जू महराज से लेकर कामता शरण महराज तक की परम्परा अखिल भारतीय स्तर पर प्रायः मिलती जुलती है । 
जानकी सखी मन्दिर:-
यह मंदिर पंजाबी आश्रम बक्सरिया टोला तुलसी नगर अयोध्या में मत गजेंद्र चौराहे से तुलसी बालिका विद्यालय होते हुए गोला घाट जाने वाले रोड पर स्थित है। तुलसी उद्यान से बगल के रास्ते से भी इस मंदिर में पहुंचा जा सकता है।
सियावर केलि कुंज :-
सियावर केलि कुंज नागेश्वरनाथ मंदिर के पीछे तथा अम्मा जी मंदिर के बगल तथा तुलसी बालिका इन्टर कालेज के पास स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। 
राम सखी मंदिर :-
राम सखी मंदिर निकट लक्ष्मण किला चौराहा गोलाघाट 
राम सखी मंदिर गोला घाट महंथ सिया राम शरण जी हैं।
चारू शिला मंदिर,जानकीघाट :-
चार शिला कुंज जानकी घाट अयोध्या में स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। चारूशिला मंदिर के जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी वल्लभाचार्य जी हैं। चारूशीला राम जी की सखी थी।
प्रथम चारुशीला सुभग, गान कला सुप्रबीन।
युगल केलि रचना रसिक, रास रहिस रस लीन।। 1।।
अर्थात-श्री चारुशीलजी, युगल सरकार की क्रीड़ा के लिये प्रबन्ध करती हैं। आप गान-कला की आचार्य हैं। अखिल ब्रह्माण्ड के देवी-देवता, जो गानविद्या-प्रिय हैं, गन्धर्व आदि उन सबकी अधिष्ठात्री देवी आप हैं। सृष्टि के वाणी आदि कार्य सब आपके आधीन हैं। आप युगल सरकार के ‘
विधान-रचना’ विभाग की प्रधानमंत्री हैं।
नौ खण्डीय रामसखा आश्रम पुष्कर :-
राजस्थान के पुष्कर में राम सखा आश्रम में आज भी इस सम्प्रदाय के लोग पूजा आराधना करते है । पुष्करके प्राचीन रामसखा आश्रम एवं नवखंडी हनुमान मंदिर के महंत तथा पुष्कर षड़दर्शन साधू समाज के अध्यक्ष रामस्वरूप शरण महाराज ,महंत सियाशरण महराज, सचिदानंद महाराज,रामस्वरूप शरण महाराज आदि परम तत्व मे विलीन हो चुके हैं। वर्तमान महंत नंदराम शरण महाराज सत्ता सीन है। यह मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
पीताम्बर गाल किशनगढ़:-
यह धार्मिक स्थल भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस जगह का नाम एक पीताम्बर नामक सिद्ध तपस्वी के द्वारा यहां तप करने और उनकी तपोस्थली रही इस जगह का नाम उनके नाम पर ही पीताम्बर पड़ा। पिताम्बर गाल सिलोरा के संचालक श्री 108 रामस्वरूप शरण जी महाराज के कृपापात्र शिष्य नौ खण्डीय रामसखा आश्रम पुष्कर के महंथ श्री नंदकिशोर शरण जी महाराज है, 
चित्रकूट में रामसखा आश्रम :-
रामसखा आश्रम जानकी कुण्ड चित्रकूट के , महंत मतंग ऋषि। हैं।.(रामसखा जानकी मंदिर) चित्रकूट के महंथ सचिदानंद जी हैं। ये मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
शहडोल एम पी में रामसखा आश्रम:-
राम सखा आश्रम कल्याणपुर पाली शहडोल एम पी में है।
यह मंदिर क्षेत्र के आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नयन के लिए सक्रिय भूमिका निभाता चला आ रहा है।
 

रामजी के ही सहचर सखा से राम सखा सम्प्रदाय बना --- डॉ.राधे श्याम द्विवेदी

रावण की मृत्यु के बाद उनके अनुचर सखा गण को राम आभार सहित अपने अपने धाम को जाने को कहा।पर कोई नहीं वापस गया। सभी सजी धजी अयोध्या देखने आ गए थे। 
         कंचन कलस बिचित्र संवारे। 
          सबहिं धरे सजि निज निजद्वारे॥ 
           बंदनवार पताका केतू। 
           सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। 
        छः माह तक उन सबकी खूब आव भगत होती रही। उन्हें उपहार वस्त्र आभूषण देकर विदा किया गया।वे राम की छवि अपने हृदय में बसाकर लौट गए ,परंतु कई वीर सखा स्थाई रूप से अयोध्या वासी हो गए। जब रामजी बैकुंठ जा रहे थे तो अपने इन सखा वीरों को रामकोट और अयोध्या की रखवाली का दायित्व भी दे दिया था।
        श्री रुद्रयामलोक्त अयोध्या महात्म्य के अध्याय 6 श्लोक 30 से 46 के मध्य रामकोट की सुरक्षा में लगे सभी वीरों और सखाओं के स्थान के बारे में विस्तार से जानकारी दिया गया है। इनमे अनेक स्थल तो राम जन्म भूमि न्यास के अधिग्रहण क्षेत्र की सीमा में आते हैं। कुछ को तो न्यास अपनी नई संरचना में स्थान भी दे रहा है।
         रामकोट राजप्रासाद के मुख्य फाटक पर अंजनी नन्दन पवन पुत्र श्रीहनुमानजी का निवास है | उनके दक्षिण पाशर्व में श्रीसुग्रीवजी प्रतिष्ठित है। इसी दुर्ग से मिला हुआ अंगदजी का दुर्ग है | रामकोट के दक्षिण द्वार पर नल नील की स्थिति है। नवरत्न कुबेर जी से पूर्व में सुषेण रहते है | नवरत्न कुबेर नामक स्थान के उत्तर में गवाक्ष जी का स्थान है।रामकोट के पश्चिम द्वार पर दाधिवक्त्र जी प्रतिष्ठित हैं | उसी पश्चिम भाग में दाधिवक्त्र के उत्तर में स्थित द्वारदेश में दुर्गेश्वर के में से स्थान रहा है। उनके निकट शतवली जी का और कुछ दूर पर गन्धमादन जी का स्थान है।उससे आगे ऋषभ जी तथा उनके आगे शरभ जी , उनसे आगे पनस जी विराजमान हैं | राम दुर्ग के उत्तर द्वार पर प्रधान रक्षक का भार विभीषण जी पर रहा| उनके साथ उनकी स्त्री 'सरमादेवी' भी रहा करती हैं जो अयोध्या में हर्ष पूर्वक रहकर धर्मशील जनों की रक्षा और दुष्ट बुद्धि वालों का भक्षण करती है। शरमा जी के पूर्व में विघ्नेशवर देव का स्थान है। जिनके स्मरण मात्र से विघ्नों का लेश भी नहीं आ सकता है।विघ्नेशवर देवजी के पूर्व दिशा में बलवान श्री पिण्डारक जी का स्थान है। ये पापियों को दंड दिया करते हैं। पिण्डारक जी के पूर्व दिशा में बड़े ही बीर और मंगल करने वाले विभीषण जी के पुत्र मतगजेंद्र (मात गैंड) जी का स्थान है। ये अयोध्या के कोटपाल ( कोतवाल) हैं तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। इनको रामकोट के उत्तर फाटक के पाशर्व स्थापित किया गया | इनके पूर्व दिशा में द्विविदजी का स्थान है। मतगजेंद्र जी के ईशान कोण में बुद्धिशाली मयंद जी बिराजते हैं।मयंद जी के दक्षिण दिशा की प्रधान रक्षा का भार जांबवान जी बिराजते हैं। जांबवान जी के दक्षिण तरफ केशरीजी बिराजते हैं। इस प्रकार दुर्ग रामकोट की चतुर्दिक रक्षा होती रही है।
        ब्रह्मा से इन लोगों ने बानर और रीक्ष का शरीर रामकाज के लिए धारण किया था। इनमें अथाह बल था। भगवान इन सबको अपना सखा मानते थे। इनकी प्रशंसा करते हुए राम गुरुदेव वशिष्ठ से कहते हैं --
           ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। 
           भए समर सागर कहँ बेरे।। 
            मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। 
            भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
       इन सहचरों का भी प्रभु पर इतना प्रेम था कि वे लोग जी जान से युद्ध करने पर भी इसे प्रभु की सेवा में तुच्छ कार्य भी नहीं गिनते। भगवान द्वारा प्रशंसा किए जाने पर वे कहते हैं -- 
             सुनि प्रभु बचन लाज हम मरही।
             मसक कहूं खग पति हित करहीं।।
राम सखा सम्प्रदाय का विस्तार:-
सखी या सखा भाव का सम्प्रदाय' 'निम्बार्क मत' की एक शाखा है। इस संप्रदाय में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना सखी- सखा भाव से की जाती है। कवि नाभादास जी ने अपने 'भक्तमाल' में कहा है कि- "सखी सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण की उपासना और आराधना की लीलाओं का अवलोकन साधक सखीभाव से कहता है। सखी सम्प्रदाय में प्रेम की गम्भीरता और निर्मलता दर्शनीय है। इस संप्रदाय के संस्थापक स्वामी हरिदास (जन्म संवत 1535 वि०) ने की थी। इस संप्रदाय के प्रसिद्द मंदिर वृंदावन मथुरा में श्री बांके बिहारी जी, निधिवन, राधा वल्लभ और प्रेम मंदिर आदि हैं। इसमें माधुर्य भक्ति और प्रेम भक्ति की जाती है ।
            राम जी के अभिन्न सहचर सखाओं ने बाद में राम सखा संप्रदाय की स्थापना करके अपने प्रभु से जुड़ने और उनकी भक्ति को और गहरी बनाने का उपक्रम किया है। राधा कृष्ण की भांति सीताराम की उपासना में सखी भाव में उपासना होती है। स्वामी रामानन्द जी, गोस्वामी तुलसी दास जी, कवि नाभा दास जी और कवि अग्रदास जी इस कड़ी को आगे बढ़ाए हैं। इस माधुर्य उपासना में सखी भाव प्रिया - प्रियतम के प्रेम मिलन के भाव से पूजा और आराधना की जाती है। सखी भाव की तरह सखा भाव में कन्हैया कभी अपने दोस्त को पीठ पर लाद लेते हैं तो कभी दोस्त के पीठ पर बैठ लेते थे। कभी गेंद के लिए तो कभी फलादि के लिए लड़ते क्रीड़ा करते देखे गए हैं। इसी तरह सीताराम जी की उपासना में भगवान और मित्र का बराबर बराबर का भाव देखने को मिलता है। राम सखेंदु जी महाराज नेअठारहवीं संवत में इसकी स्थापना की थी।
 राम सखे जी (अवध वासी) पर एक पद 
दोहाः
तन मन प्रेम से भाव मम, हरि हमरे हैं मीत।
एक दिवस हरि मिलि गये उर लगाय कह्यौ मीत।१। 
अन्त समय हरि धाम को गयों हर्षि चढि यान। 
राम सखे कहैं बचन मम, सत्य लीजिये मान।२। 
(सन्दर्भ:श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' --- परमहंस राम मंगल दास। (भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ग्रन्थ - 1,भाग - २, दिसम्बर २००१ )
        सखी सम्प्रदाय तो सनातन काल से ही राम सखा ,राम सखी ,सीता सखी ,कृष्ण सखा ,कृष्ण सखी और राधा सखी आदि विविध रुपों में पुराणों व भक्ति साहित्य में पाया जाता रहा है। राम सखा जी के शिष्य गुरु की तरह निध्याचार्य उप नाम प्रयुक्त करने लगे थे। शील निधि सुशील निधि और विचित्र निधि उनके परम शिष्य थे। श्री 1008 सुखेन्द्र निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि बड़ा अखाड़े के रूप में मैहर में बहुत लोकप्रिय है। 
         राम सखा महाराज जी जयपुर से निकलने के बाद विराट वैष्णव बन गए थे। वे कर्नाटक के तीर्थ क्षेत्र उडुपी पहुंचे। श्रीमद् सखेंद्र जी महाराज ने माध्य संप्रदाय के आचार्य श्री वशिष्ठ तीर्थ से गुरु दीक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने लिखा है -   
         "मध्य माध्य निज द्वैत मन मिलन द्वार हनुमान।
        राम सखे विद सम्पदा उडुपी गुरु स्थान।।"
       वहां के आचार्य ने उन्हें रामसखा की उपाधि दी थी। वे दक्षिण के उडीपि (कर्नाटक) में बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा किये थे। उनका निवास नृत्य राघव कुंज के नाम से प्रसिद्व हुआ था । 
रामसखा जी का अयोध्या में आगमन:-
अयोध्या आकर राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे। जब उनकी व्यथा बढ़ी तो वे प्रभु को उपालंभ भी देना शुरू कर दिए। संप्रदाय भासकर में उल्लिखित है -
       “अरे शिकारी निर्दयी, करिया नृपति किशोर ।
       क्यों तरसावत दरश को, राम सखे चित्त चोर ।।"
        उनकी व्यथा देख एक बार प्रभु ने उन्हें अल्प समय के लिए दर्शन दिया। वे उनसे अंक में लिपट कर खूब रोए और खूब आनंद लिए। बाद में प्रभु जी अंतर्ध्यान हो गए। कुछ दिनों बाद फिर उन्हें दर्शन करने की तलब लगी। अब वे और बेचैन रहने लगे।जब उनकी बेचैनी असहय हो गई । उन्हें बेचैन मनोव्यथा जानकर इस बार रामजी माता सीता जी के साथ उन्हें युगल किशोर के दर्शन हुए। उनका सारा दुख दूर हो गया।
काछवाह राजा द्वारा अयोध्या में मन्दिर का निर्माण :-
बाद में अयोध्या में इसी नाम से एक मंदिर का निर्माण हुआ था।जो राम सखा की दूसरी गद्दी बनी। इसका निर्माण मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था।
कुंवर दुर्जन सिंह राजा मान सिंह के चौथे पुत्र थे. इनकी माता का नाम सहोद्रा गौड़ था. यह अत्यंत ही साहसी और पराक्रमी योद्धा थे. कुंवर दुर्जन सिंह के वंशजों को दुर्जन सिंहोत राजावत के नाम से जाना जाता है।
चित्रकूट में आगमन:-
अयोध्या में बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। बहुत दिनों तक दर्शन ना होने पर उनके मस्तिष्क में ये भाव आया । रूप सामर्थ्य चन्द्र में लिखा है -
"ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
ले चल कुटिल बदल जुल्फान छवि राज माधुरी वेशे।
केसर तिलक कंज मुख श्रम जल ललित लसत द्वई रेफे।
दशरथलाल लाल रघुवर बिनु बहुत जियब केही लेखे।
ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
डूब डूब उर श्याम सुरती कर प्राण रहे अवशेषे।
राम सखे विरहिन दोउ अखियां चाहत मिलन विशेषे।।"
        सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"
        भक्त भगवान का अब लुका छिपी का खेल होने लगा।अब प्रायः दर्शन होने लगे।वे इसका वर्णन सुनाते जाते और भक्त आनंदित होते रहते थे-
"आज की हाल सुनो सजनी मडये प्रकटी एक कौतुक भारी।
जेवत नारी बारात सभौ रघुनाथ लखे मिथिलेश उचारी।
श्री रघुवीर को देख स्वरूप भई मत विभ्रम गावनहारी।
भूली गयो अवधेश को नाम देने लगी मिथिलेश को गारी।।"
         अब तक की साधना और भक्ति से राम सखे की कुंडलिनी जागृति हो गई थी।उनकी सुरति खुलने लगी थी।योग में जब चाहा दर्शन होने लगा था ।अब ध्यान लगाना नही पड़ता अपितु मानस पटल पर प्रभु की छवि खुद ब खुद आ जाती थी।
उचेहरा में अस्थाई प्रवास :-
कुछ महात्मा यह भी बताते हैं कि महाराज जी के एक शिष्य उनके साथ रहे, वे लोगों से भिक्षा माँगते थे और ठाकुर जी के लिए भोग भी तैयार करते थे। ठाकुर जी के भोग के बाद, कई महात्माओं के पास प्रसाद था और वे संतुष्ट होकर लौटे। चित्रकूट में रहने के बाद महाराज जी उचेहरा (अब सतना जिला) में गए।लेकिन उन्हें वहाँ बहुत अच्छा नहीं लगा और संवत 1831में मैहर चले गए।
मैहर में तपोसाधना :-
मैहर आकार वह नीलमती गंगा के तट पर उन्होंने एक पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया। बड़ा अखाड़ा एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। बड़ा अखाड़ा मंदिर में आपको मंदिर और आश्रम देखने के लिए मिल जाता है। यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। यहां पर शिव भगवान जी की बहुत बड़ा शिवलिंग मंदिर के छत पर बना हुआ है, जो बहुत ही सुंदर लगता है। इसके अलावा मंदिर में 108 शिवलिंग विराजमान है। उनके दर्शन भी आप यहां पर आकर कर सकते हैं। यहां पर आपको एक प्राचीन कुआं भी देखने के लिए मिल जाएगा। यहां पर राम जी का मंदिर, गणेश जी का मंदिर और हनुमान जी का मंदिर भी है। आप इन सभी मंदिरों में घूम सकते हैं। बड़ा अखाड़ा में आपको आश्रम भी देखने के लिए मिलता है। आश्रम का जो प्रवेश द्वार है। वह बहुत ही खूबसूरत है। आश्रम के प्रवेश द्वार में आपको हनुमान जी की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है और शंकर जी की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। इस आश्रम के अंदर आपको बगीचा भी देखने के लिए मिल जाता है। यहां पर बहुत सारे ब्राह्मण विद्यार्थी रहते हैं, जिन्हें यहां पर शिक्षा दीक्षा दी जाती है।
 राम सखा जू महाराज :-
श्री राम सखा जू महाराज, हिंदू धर्म के माधव संप्रदाय के प्रतिपादक और अनुयायी थे, लगभग दो सौ साल पहले जयपुर से मैहर आए और मैहर में एक मठ की स्थापना की, जिसे "श्री राम सखेंद्र जू का अखाड़ा" कहा जाता है; कि उन्होंने अखाड़े में 'राम-जानकी' की एक छवि स्थापित की, जिसकी पूजा संप्रदाय के अनुयायी करते थे; कि कई व्यक्तियों ने अखाड़े को संपत्तियां दीं और मैहर के तत्कालीन शासक ने भी अखाड़े के रखरखाव और देवता की पूजा के लिए एक गांव दिया था। "बडा अखाड़ा" ट्रस्ट का गठन किया गया था और एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया गया था।
 मेंहर में अंतिम सांस :-
महाराज जी ने उन्नीसवीं संवत के प्रथम चरण यानी 1842 में मैहर में अमरता प्राप्त की। उनकी समाधि मैहर में ही है। उसे बड़ा अखाड़ा कहा जाता है। यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। राम सखेन्दु जी महराज के नाम से उनकी ख्याति आज भी विद्यमान है। राजस्थान के पुष्कर में राम सखा आश्रम में आज भी इस सम्प्रदाय के लोग पूजा आराधना करते है अयोध्या, चित्रकूट, पुष्कर और मैहर सबसे प्रमुख स्थान हैं। रीवा, नागोद आदि क्षेत्रों में महाराज जी के शिष्यों की भारी संख्या है। 
पृथक राम सखा सम्प्रदाय का उद्भव ;-
श्रीमद् सखेंद्र जी महाराज (संभवतः निध्याचार्य जी महराज) का जन्म विक्रमसंवत के आखिरी चरण चैत्र शुक्ल में राम नवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने श्री वशिष्ठ मुनि से गुरु दीक्षा प्राप्त की। गलिता के आचार्य ने उन्हें रामसखा की उपाधि दी थी। वे दक्षिण के उडीपि कर्नाटक में गये जहां बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा की थी।उनका निवास नृत्य राघव कुंज के नाम से प्रसिद्व हुआ था । सखेंद्र जी महाराज को जब लगा कि भगवान राम ने उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में स्वीकार कर लिया है। उसी क्षण महाराज जी ने घर छोड़ दिया और विराट वैष्णव बन गए।उन्होंने सत्यता का मार्ग खोजना शुरू कर दिया। वह अपने गुरु जी के साथ रहे और भगवान और उनके स्नेह को प्राप्त करने का कौशल सीखा। इस समय तक महाराज जी जयपुर में ही थे, लेकिन उनकी जन्मस्थली होने के कारण वे जयपुर छोड़कर अयोध्या पुरी चले गए। अयोध्या में गुरुजी के आवास का नाम नृत्य राघव कुंज के नाम से प्रसिद्व हुआ था। अयोध्या आकर उन्होंने सरयू नदी के तट के अलावा एक पर्णकुटी में भगवान को याद करने के लिए जीवन बिताया। महाराज जी को उन सभी भौतिक चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जो वे करना चाहते थे, वे अपने भगवान के बारे में अधिक जानते हैं और दुनिया में और कुछ भी उनके लिए मायने नहीं रखता था। जब वह ध्यान और प्रार्थना में व्यस्त थे कुछ और महात्मा उससे प्रभावित हुए उनके वास्तविकता का परीक्षण करना चाहे। वह उनसे बोले यदि भगवान राम अपने धनुष वाण के साथ प्रकट हो तो मानेगे कि महात्मा जी उनके सच्चे सेवक है। महात्माओं के सुनने के बाद महराज जी चुप हो गये और इसका उत्तर नहीं दिये। किन्तु रामजी ने इसे नहीं छोड़ा । इसके कुछ देर के बाद रामजी प्रकट हुए और सिद्व किये महराज जी सच्चे भक्त है। यह महात्माओं के लिए एक पाठ था। वे अपने करनी के लिए दुखी हुए। वह उन्हें महराज जी के सामने धनुष वाण के साथ लेकर देखने व मुस्कराने को महराज जी के आर्शाबाद को मानने लगे।
अयोध्या में राम सखा के मंदिर:-
अयोध्या में श्रावण कुंज नृत्य राघव कुंज , सियाराम केलि कुंज चार शिला कुंज राम सखा जू महाराज राम सखा बगिया आदि पाच प्रमुख मंदिर इस सम्प्रदाय के हैं। श्रावण कुंज अयोध्या के नया घाट पर स्थित है। मान्यता के अनुसार गोस्वामी तुलसी दास जी ने यही रामचरित मानस के बालकंड की रचना की थी। नृत्य राघव कुंज मणिराम छावनी के निकट बासुदेव घाट स्थित है। राम सखा बगिया रानी बाग में एक विस्तृत भूभाग में स्थित है। नृत्य राघव कुंज बासुदेवघाट अयोध्या एक प्राचीन मंदिर है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। सियावर केलि कुंज नागेश्वरनाथ मंदिर के पीछे स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। चार शिला कुंज जानकी घाट अयोध्या में स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। राम सखा मंदिर रानी बाग अयोध्या के वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर मिश्र ने मंदिर की परम्परा के बारे में बताया कि अयोध्या के कुल पाच मंदिर एक ही महन्थ जी के संरक्षण में पूजा अर्चनाकरते आ रहें थे। प्रथम गुरु श्रीमद् राम सखेन्द्र जू महराज थे। द्वितीय का नाम उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। तृतीय महराज श्री शील निधि जू महराज थे। चतुर्थ श्री अवध शरण जू महराज तथा पंचम श्री रामभुवन शरण जू महराज रहे। षष्टम श्री कामता शरण जू महराज तथा सप्तम श्री रामेश्वर शरण जू महराज रहे। अष्टम महराज के रुप में वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर शरण जी है।इस परम्परा में मुस्लिम धर्म से सनातन धर्म में आये दो सन्तों ने कुछ समय तक इस परम्परा के प्रधान की भूमिका निभाई थी। इनके नाम श्री शीलनिधि महराज तथा श्री सुशील निधि महराज रहा। राम सखेन्दु जू महराज से लेकर कामता शरण महराज तक की परम्परा अखिल भारतीय स्तर पर प्रायः मिलती जुलती है । प्रतीत होता है कि अयोध्या मैहर चित्रकूट पुष्कर उडुपि तथा सतना आदि के सभी मंदिर एक ही परम्रा व नियंत्रण के अधीन दीर्घ समय तक रहे। बाद में सुविध तथा दुर्गमता के कारण सभी स्वतंत्र नियंत्रण मे चले गये।
                         लेखक परिचय - 
27.06.1957 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्में डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य , ग्रंथालय विज्ञान शास्त्री B.Lib.Sc. तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) "संस्कृत पंच महाकाव्य में नायिका" विषय पर उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए. तथा ’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। डा. हरी सिंह सागर विश्व विद्यालय सागर मध्य प्रदेश से MLIS किया। आप 1987 से 2017 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण वडोदरा और आगरा मण्डल में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। आप
अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं।
साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर आपकी लेखनी सक्रिय है।




अनेक संप्रदाय और तीर्थ धामों में प्रस्फुटित हुआ राम सखा संप्रदाय✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

                         मधवाचार्य जी
माध्व वैष्णव( ब्रह्म) सम्प्रदाय द्वारा अनुप्राणित:-
राम सखा संप्रदाय, मूलतः ' माध्व वैष्णव( ब्रह्म) सम्प्रदाय' की एक शाखा है, जो एक संगठित समूह में नहीं बल्कि बिखरे स्वरूप में मिलता है। इसके अलावा रामानंद संप्रदाय से भी इसका लिंक मिलता है। संत राम सखे राम सखा संप्रदाय के संस्थापक रहे हैं । माधव सम्प्रदाय के संस्थापक मध्वाचार्य जी थे। जिसे भगवान नारायण की आज्ञा से वायु देव ने भक्ति सिद्धांत की रक्षा के लिए मंगलूर के वेलालि गांव में माघ शुक्ल सप्तमी संवत 1295 विक्रमी को अवतरित कराया था। माधवाचार्य ने अपने शिष्य पद्मनाभ तीर्थ (प्राप्त सिद्धि 1317-- 1324) के साथ तुलुनाडु क्षेत्र के बाहर तत्त्व वाद(द्वैत) का प्रसार करने के एक मठ की स्थापना की। वे द्वैत दार्शनिक और विद्वान थे । उनके शिष्य नरहरि तीर्थ , माधव तीर्थ और अक्षरोभ तीर्थ इस मठ के उत्तराधिकारी बने। 
           जयतीर्थ जी
    अक्षोभ तीर्थ के शिष्य श्री जयतीर्थ ( सी. 1345 - सी. 1388 ) एक हिंदूवादी, द्वंद्वात्मकतावादी, नीतिशास्त्री और माधवाचार्य पीठ के छठे पुजारी थे। माधवाचार्य के कार्यों की उनकी ध्वनि व्याख्या के कारण उन्हें द्वैत विचारधारा के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संतों में से एक माना जाता है । द्वैत ग्रंथों पर विस्तार करने के उनके अग्रणी प्रयासों को 14 वीं शताब्दी के दार्शनिक जयतीर्थ ने आगे बढ़ाया ।
उत्तरादि मठ की प्रबलता :-
माधवाचार्य द्वारा स्थापित अष्ट मठों में मुख्य मठ उत्तरादि मठ का प्रमुख तुलुनाडु क्षेत्र के बाहर द्वैत वेदांत ( तत्ववदा ) को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए पद्मनाभ तीर्थ नाम पड़ा है। उत्तरादि मठ तीन प्रमुख द्वैत मठों या मठात्रय में से एक है, जो जयतीर्थ के माध्यम से पद्मनाभ तीर्थ के वंश में माधवाचार्य के वंशज हैं । जयतीर्थ और विद्याधिराज तीर्थ के बाद, उत्तरादि मठ कवींद्र तीर्थ (विद्याधिराज तीर्थ के एक शिष्य) और बाद में विद्यानिधि तीर्थ (रामचंद्र तीर्थ के एक शिष्य) के वंश में जारी रहा। उत्तरादि मठ में पूजे जाने वाले मूल राम और मूल सीता की मूर्तियों का एक लंबा इतिहास है और वे अपनी महान दिव्यता के लिए पूजनीय हैं। उत्तरादि मठ प्रमुख हिंदू मठवासी संस्थानों में से एक है। इस मठ को पहले "पद्मनाभ तीर्थ मठ" के नाम से भी जाना जाता था। उत्तरादि मठ मुख्य मठ था जो पद्मनाभ तीर्थ , नरहरि तीर्थ , माधव तीर्थ , अक्षोब्य तीर्थ , जयतीर्थ , विद्याधिराज तीर्थ और कविंद्र तीर्थ के माध्यम से माधवाचार्य से उतरा था, इसलिए इस मठ को "आदि मठ" के रूप में भी जाना जाता है। इसे "मूल मठ" या "मूल संस्थान" या "श्री माधवाचार्य का मूल महासंस्थान" भी कहा जाता है। राम सखा के गुरु वशिष्ठ तीर्थ इसी परम्परा का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।
         राम सखा जी महराज
राम सखा की आध्यात्मिक यात्रा:-
राम सखा संप्रदाय के संस्थापक का जयपुर में जन्म उडुपी में दीक्षा अयोध्या और मैहर में तप साधना से विकसित और प्रस्फुटित हुआ है। श्रीमद् रामसखेंद्र जी महाराज ( निध्याचार्य जी महराज) का जन्म विक्रम संवत के 18वी सम्बत के आखिरी चरण या 18वीं ईसवी शताब्दी के प्रथम भाग में चैत्र शुक्ल में राम नवमी को जयपुर में एक सुसंस्कृत गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में उनका संस्कार असाधारण अलौकिक और दिव्य था।

राम सखे जी (अवध वासी) 
दोहाः- 
तन मन प्रेम से भाव मम, हरि हमरे हैं मीत।
एक दिवस हरि मिलि गये उर लगाय कह्यौ मीत।१। 
अन्त समय हरि धाम को गयों हर्षि चढि यान। 
राम सखे कहैं बचन मम, सत्य लीजिये मान।२। 
(सन्दर्भ:श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' लेखक: परमहंस राम मंगल दास (भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ग्रन्थ - 1,भाग - २, दिसम्बर २००१ )

      साधु संतों और भगवान के भक्तों के प्रति उनके मन में बड़ा आदर भाव था। राम के स्मरण मात्र से ही वे आत्म मुग्ध हो जाया करते थे। वे भगवान के जन्म जात सखा थे।

रामानंदी सम्प्रदाय गलिता से भी लगाव:-
गलताजी जयपुर से 10 कि.मीअरावली पहाड़ियोंमें एक पहाड़ी दर्रे के अंदर निर्मित है । 15वीं शताब्दी की शुरुआत से गलताजी वैष्णव रामानुज संप्रदाय से संबंधित हिंदू तपस्वियों के लिए एक शरणस्थल रहा है। यहां पर गालव नाम के एक संत यहां रहते थे, ध्यान करते थे और तपस्या करते थे। राजानुज/ रामवत/रामनदी सम्प्रदाय में राम और सीता के स्वरूप का पूजा किया जाता है। कहा जाता है कि यह लंबे समय से योगियों के व्यवसाय में है; पयोहारी कृष्णदास, एक रामानुजी संत, यानी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी 15वीं शताब्दी की शुरुआत में गलता आए और अपनी योगिक शक्तियों से अन्य योगियों को वहां से खदेड़ दिया। गलता उत्तरी भारत का पहला वैष्णव रामानुज पीठ था और रामानुज संप्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण घटना में से एक बन गया। कृष्णदास जी पयाहारी ने गलता (जयपुर) में रामानंदी सम्प्रदाय की प्रमुख मंच की स्थापना की थी। गलताजी को रामानुज संप्रदाय में उत्तर तोताद्रि भी कहते हैं। रामानुज सम्प्रदाय की एक प्रमुख गद्दी जयपुर में गलता के पास स्थित रही है। गलताजी (जयपुर) के साथ अयोध्यामें भी एक मठ है।
           यद्धपि जयपुर गलिता उडुपी चित्रकूट और मैहर आदि तीर्थों में घूमते फिरते हुए राम सखा जी का राम सखा नामक ये नया संप्रदाय 18वी संवत से प्रकाश में आया परन्तु सखी सम्प्रदाय का प्रभाव तो सनातन काल से ही राम सखा ,राम सखी ,सीता सखा सीता सखी ,कृष्ण सखा ,कृष्ण सखी , राधा सखा और राधा सखी के विविध रुपों में पुराणों व भक्ति साहित्य में पाया जाता रहा है।
अलग अलग उपाधियों को अंगीकार करना:-
जिस प्रकार राम सखा के गुरु वशिष्ठ तीर्थ उपाधि को विभूषित कर रहे थे। जिसका अर्थ यह होता है कि उसे सभी शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान हो गया है। ठीक उसी तरह राम सखा जी के शिष्य गुरु की तरह निध्याचार्य उप नाम प्रयुक्त करने लगे थे। तात्पर्य अनेक शास्त्रीय निधियां ये अपने में समाहित किए हुए हैं। शील निधि सुशील निधि और विचित्र निधि उनके परम शिष्य हुए थे। श्री निध्याचार्य जी महाराज की तपोभूमि मैहर के बड़ा अखाड़े के रूप में बहुत लोकप्रिय है। अयोध्या में चौथे गुरु अवध शरण ने अपने उपनाम में परिवर्तन कर लिया। निधि उपाधि की पूर्णता को त्यागते हुए दास्य वा भक्ति भाव की प्रधानता वाली उपाधि " शरण "अपनाई जाती है। उचेहरा सहडौल और पुष्कर के आचार्यों ने न जाने कब से अपने उप नाम। "शरण" प्रयोग करने लगे हैं।
       राम सखा महाराज जी जयपुर से निकलने के बाद विराट वैष्णव बन गए थे। उन्होंने सत्य का मार्ग खोजना शुरू कर दिया। राम सखेंद्र श्री राम जी के पिछ्ले जन्म से ही परम भक्त थे। वे युवास्था में तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े थे। वे कर्नाटक के तीर्थ क्षेत्र उडुपी पहुंचे। महाराज जी ने माध्य संप्रदाय के आचार्य श्री वशिष्ठ तीर्थ से गुरु दीक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने लिखा है -
"मध्य माध्य निज द्वैत मन
मिलन द्वार हनुमान।
राम सखे विद सम्पदा
उडुपी गुरु स्थान।।"
       वे दक्षिण के उडीपि (कर्नाटक) में बड़ी तनमयता से गुरु की सेवा किये थे। वह अपने गुरु जी के साथ रहे और भगवान और उनके स्नेह को प्राप्त करने का कौशल सीख लिया था। 
जयपुर में बीता बचपन :- जयपुर में जन्में राम सखा जी जयपुर के रामलीला अभ्यास में लक्ष्मण जी के रूप में भाग लेते थे। वे श्रीराम से इतना लगाव कर लिए कि वह वास्तव में उनका छोटा भाई होने का विश्वास करने लगे थे। एक दिन राम लीला प्रशिक्षण के दौरान महाराज जी को भगवान राम का किरदार निभाना पड़ा था। जिसके परिणाम स्वरूप महाराज जी को भोजन नहीं मिल पाया था। महाराज जी ने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया और रात तक इतना परेशान थे कि वे पास के जंगल में चले गए और एक पेड़ के नीचे बैठ रोते रहे। रामलीला मंडली में युवा बच्चा गायब हो जाने के कारण हर कोई चिंतित था।
श्रीरामजी ने खुद खाना खिलाया :-
आधी रात तक जब महाराज जी पेड़ के नीचे रो रहे थे तब राम जी स्वयं स्वादिष्ट भोजन से भरे हाथों में सुनहरे बर्तन लेकर प्रकट हुए। प्रभु की मधुर वाणी सुनकर महाराज जी अभिभूत हो गए। दोनों ने एक-दूसरे को बड़े प्यार से गले लगाया। महाराज जी ने अपनी भूख को शांत किया और दोनों काफी देर तक बातें करते रहे। जिसके बाद भगवान राम अपने साथ लाए सभी सोने के बर्तनों को छोड़कर गायब हो गए।
मन्दिर के सोने के बर्तन गायब मिले :-
इधर जयपुर में जब राम मंदिर के पुजारियों ने मंदिर का दरवाजा खोला, तो वे सभी सोने के बर्तनों को गायब देखकर हैरान रह गए। बर्तन गायब होने की सूचना जयपुर नरेश तक पहुंची । राजा ने तुरंत लापता संपत्ति और चोर की गहन खोज का आदेश दिया। कुछ लोग जंगल में पहुंचे और देखा कि एक युवा लड़का अपने चारों ओर सोने के बर्तन के साथ पड़ा है। लोगों ने उनसे बर्तनों के बारे में पूछा तो महाराज जी ने उन्हें बताया कि राम जी ने उन्हें भोजन कराया, लेकिन बर्तनों को वापस नहीं ले गए। उन्हें लगा कि भगवान राम ने उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में स्वीकार कर लिया है। इस समय तक महाराज जी जयपुर में ही थे। उनकी जन्मस्थली होने के कारण वे जयपुर छोड़कर पहले उडुपी और बाद में गुरु जी से दीक्षा लेकर अयोध्या आएं थे।
रामसखा जी का अयोध्या में आगमन:-
अयोध्या आकर राम सखा जी सरयू नदी के तट पर एक पर्णकुटी में भगवान को याद करते- करते अपना जीवन बिताया। वे प्रभु के दर्शन के लिए सरयू तट पर साधना करने लगे। उन्होंने भगवान राम के दर्शन का बहुत दिनों तक इंतजार किया।भगवान का विरह उन्हें असह्य होता जा रहा था। जब उनकी व्यथा बढ़ी तो वे प्रभु को उपालंभ भी देना शुरू कर दिए। संप्रदाय भास्कर में उल्लिखित है -
“अरे शिकारी निर्दयी, करिया नृपति किशोर ।
क्यों तरसावत दरश को, राम सखे चित्त चोर ।।"
      उनकी व्यथा देख एक बार प्रभु ने उन्हें अल्प समय के लिए दर्शन दिया। वे उनसे अंक में लिपट कर खूब रोए और खूब आनंद लिए। बाद में प्रभु जी अंतर्ध्यान हो गए। कुछ दिनों बाद फिर उन्हें दर्शन करने की तलब लगी। अब वे और बेचैन रहने लगे।जब उनकी बेचैनी असहय हो गई । उन्हें बेचैन मनो व्यथा जानकर इस बार रामजी माता सीता जी के साथ उन्हें युगल किशोर के दर्शन हुए। उनका सारा दुख दूर हो गया । सन्त राम सखा आजीवन राम की सरस भक्ति का प्रसार किए। भगवान की सरस झांकी का चिन्तन करते हुए उन्होंने साकेत धाम में प्रवेश किया था।
प्रभु की झांकी का वर्णन : -
प्रभु श्री राम सीता की झांकी राम सखे जी के हृदय में एसे बैठ गया और उनके मुख से ये भाव निकले -
"बगिया शिर लाल हरी कलगी
उर चंदन केसर खौर दिये।
मन मोहन राम कुमार सखी
अनुभारी नहीं जग जन्म लिए।
पग नुपुर पीत कसी कछनी
बन मालती के बन मॉल हिये।
बिहरे सरयू तट कुंजन में
तनु राम सखे चित चोर लिए।।"
          थोड़ी देर दर्शन के बाद प्रभु अंतर्ध्यान हो गए तो राम सखे अब फिर रोना धोना शुरू कर दिया।
काछवाह राजा द्वारा अयोध्या में मन्दिर का निर्माण :-
उनका निवास नृत्य राघव कुंज बना। अयोध्या में इसी नाम से एक मंदिर का निर्माण हुआ था। जो राम सखा की दूसरी गद्दी बनी। इसका निर्माण मैहर के तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह कछवाह ने करवाया था। दुर्जन सिंह कछवाहा भारत में राजपूत जाति की उपजाति है। उनके कुछ परिवारों ने कई राज्यों और रियासतों पर शासन किया है जैसे अलवर, अंबर (जिसे बाद में जयपुर कहा जाने लगा) और मैहर आदि । कुंवर दुर्जन सिंह राजा मान सिंह के चौथे पुत्र थे। इनकी माता का नाम सहोद्रा गौड़ था. यह अत्यंत ही साहसी और पराक्रमी योद्धा थे. कुंवर दुर्जन सिंह के वंशजों को दुर्जन सिंहोत राजावत के नाम से जाना जाता है।
चित्रकूट में आगमन:-
अयोध्या के बड़े बड़े सन्त और महात्मा उनका दर्शन पाने के लिए लालायित रहते थे। इससे उनके यहां बहुत भीड़ भाड़ रहने लगी। अवध में इस भीड़ भाड़ से बचने और भगवान राम का मनोवांछित दर्शन ना पाने व्यथा के कारण तथा अयोध्या में बेचैनी पूर्ण समय बिताने के बाद, महाराज जी वहां से चित्रकूट चले गए और वहां कामद वन गिरी पर प्रमोदवन में अपनी प्रार्थना जारी रखी। निरंतर प्रभु के चिन्तन ध्यान और भक्ति के कारण चित्रकूट में अनेक सिद्धियां उनके चरणों की दासी हो गई।
    प्रभु का मिलन और वियोग तथा दर्शन बातचीत का लुका छिपी जारी रहा। एक बार ज्यादा दिनों तक दर्शन ना होने पर उनके मस्तिष्क में ये भाव आया । रूप सामर्थ्य चन्द्र में लिखा है -
"ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
ले चल कुटिल बदल जुल्फान छवि राज माधुरी वेशे।
केसर तिलक कंज मुख श्रम जल ललित लसत द्वई रेफे।
दशरथलाल लाल रघुवर बिनु बहुत जियब केही लेखे।
ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे,ते दिन ह्वे जो गए बिन देखे।
डूब डूब उर श्याम सुरती कर प्राण रहे अवशेषे।
राम सखे विरहिन दोउ अखियां चाहत मिलन विशेषे।।"
    सरयू तट की भांति एक बार फिर यहां राम ने अपने जुगुल किशोर स्वरूप का दर्शन दिया। इसके संबंध में कुछ लाइनें राम सखे इस प्रकार लिखी है -
"अवध पुरी से आइके चित्रकूट की ओर।
राम सखे मन हर लियो सुन्दर युगुल किशोर।"
            भक्त भगवान का अब लुका छिपी का खेल होने लगा। अब प्रायः दर्शन होने लगे। वे इसका वर्णन सुनाते जाते और भक्त आनंदित होते रहते थे-
"आज की हाल सुनो सजनी मडये प्रकटी एक कौतुक भारी।
जेवत नारी बारात सभौ रघुनाथ लखे मिथिलेश उचारी।
श्री रघुवीर को देख स्वरूप भई मत विभ्रम गावनहारी।
भूली गयो अवधेश को नाम देने लगी मिथिलेश को गारी।।"
         अब तक की साधना और भक्ति से राम सखे की कुंडलिनी जागृति हो गई थी। उनकी सुरति खुलने लगी थी।योग में जब चाहा दर्शन होने लगा था । अब ध्यान लगाना नही पड़ता अपितु मानस पटल पर प्रभु की छवि खुद ब खुद आ जाती थी। उनके भंडारे में सामान्य सा भोजन बनता तो खत्म नहीं होता। राम सखे जी ध्यान में रसोई की जो कल्पना करते वह प्रभु प्रकट कर देते थे। एक दिन खुद महराज जी ने प्रभु के लिए ध्यान में रसोई बनाई। प्रभु उसे पूरा किए। नाना प्रकार के स्वाद और व्यंजन बन जाया करते थे।राम रसिकावली में राजा रघुराज सिंह ने लिखा है
"करई ध्यान में विपुल भावना,
जैसी छवि की होय कामना।
ध्यान में एक दिन रस रांचे,
राम भोग बनबै चित सांचे।
जो व्यंजन मन राम बनाए ,
सो तेहि प्रगट होई आए।।"
श्री रामजी का धनुष बाण के साथ दर्शन :-
महाराज जी को उन सभी भौतिक चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जो वे करना चाहते थे, वे अपने भगवान के बारे में अधिक जानते हैं और दुनिया में और कुछ भी उनके लिए मायने नहीं रखता था। जब वह ध्यान और प्रार्थना में व्यस्त रहते थे कुछ और महात्मा उससे प्रभावित हुए उनके वास्तविकता का परीक्षण करना चाहे। वह उनसे बोले यदि भगवान राम अपने धनुष वाण के साथ प्रकट हो तो मानेगे कि महात्मा जी उनके सच्चे सेवक है। महात्माओं के सुनने के बाद महराज जी चुप हो गये और इसका उत्तर नहीं दिये। किन्तु रामजी ने इसे नहीं छोड़ा । इसके कुछ देर के बाद रामजी धनुष बाण धारण किए हुए प्रकट हुए और सिद्व किये महराज जी उनके सच्चे भक्त है। महराज जी के सामने धनुष वाण के साथ लेकर देखने व मुस्कराने को महात्मा जन प्रभु जी का महराज जी पर आर्शीबाद मानने लगे।
कुएं में गिरे भगवान के विग्रह को खुद बाहर आना पड़ा :-
यहां राम सखा मंदिर और जानकी मंदिर आज भी इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। उनके भजनों का प्रभाव जल्द ही पन्ना के तत्कालीन महाराज (राजा) के ध्यान में आया। राजा महाराज जी के दर्शन करने आए और महाराज जी की भक्ति से बहुत प्रभावित हुए। यह भी कहा जाता है कि चित्रकूट में एक बार जब महाराज जी अपनी सुबह की दिनचर्या समाप्त करने के बाद अपने शालिग्राम भगवान की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तभी अचानक से मूर्ति नीचे की ओर लुढ़क गई और पास के कुएं में गिर गई। इस कारण महाराज जी बहुत आहत व शोकाकुल हुए। रोते हुए उसने दुःख में एक दोहा का जाप किया। जैसे ही उन्होंने दोहा समाप्त किया, कुएं में पानी का स्तर नाटकीय रूप से बढ़ गया और मूर्ति ने उन्हें पानी पर नृत्य करते हुए देखा, महाराज जी अभिभूत हो गए और उन्होंने भगवान को दोनों हाथों से गले लगाया। इसके बाद महाराज जी खुशी-खुशी अपनी पूजा करने चले गए।
उचेहरा में अस्थाई प्रवास :-
कुछ महात्मा यह भी बताते हैं कि महाराज जी के एक शिष्य उनके साथ रहे, वे लोगों से भिक्षा माँगते थे और ठाकुर जी के लिए भोग भी तैयार करते थे। ठाकुर जी के भोग के बाद, कई महात्माओं के पास प्रसाद था और वे संतुष्ट होकर लौटे। चित्रकूट में रहने के बाद महाराज जी उचेहरा (अब सतना जिला) में गए।लेकिन उन्हें वहाँ बहुत अच्छा नहीं लगा और संवत 1831विक्रमी (अर्थात 1774 ई.)में मैहर चले गए।
मैहर में तपोसाधना :-
उन्होंने मेहर राज्य के नीलमती गंगा के तट पर पर्णकुटी में गणेश जी के सामने भजन किया और मानसिक ध्यान पूजा और भगवद भजन में लग गए। बड़ा अखाड़ा एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर शिव भगवान जी को समर्पित है। कम उम्र में रामलीला में शामिल होने के कारण, महाराज जी संगीत के साथ-साथ लेखन कौशल में भी पारंगत थे। उनका लेखन कौशल उनके कई पवित्र लेखन जैसे दोहावली, कवितावली से स्पष्ट होता है। उन्होंने कई पवित्र लेखन जैसे अष्टयाम, स्वाधिष्ठान- प्रतिपादक और नृत्य राघव मिलन भी लिखे जो वास्तव में अभूतपूर्व हैं

उन्होंने अनेक भाव पूर्ण और सरस दोहे भी लिखे हैं।उन्होंने द्वैत-भूषण नामक एक संस्कृत लेखन को लिखा था। अब महराज जी नित्य प्रति प्रभु का दर्शन पाने लगे थे।इस स्वरूप का वर्णन अपने पदों के माध्यम से करने लगे थे। उनके भक्त उसे याद करके घूमते फिरते और लोगों को सुनाया करते थे।
                         नवाब आसफ़ुद्दौला
अनेक सिद्धियों के ज्ञाता:-
नवाब आसफ़ुद्दौला अवध का एक रंगीन मिज़ाज और दरियादिल नवाब था । उसके बारे में कहा जाता है जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला। लखनऊ का नवाब आसफदौला राम सखा महराज का भक्त हो गया था सुना जाता है कि एक बार एक गायक ने लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समक्ष को निम्न पंक्तियाँ गाईं-
प्यारे तेरी छबीं वर ।
विश्रामी वंदन कुमार दशरथ के मार जुल्फें कारियों ।।
तीखी सजल लाल अज्जन युत लागत खोलन प्यारियाँ ।।
राम सखे दृग ओटन हमको दो ना पल भर न्यारियाँ।।"
       उपरोक्त पंक्तियों को सुनने के बाद नवाब आसफुद्दौला बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने गायक से लेखक के बारे में पूछा। उन्होंने उसे महाराज जी के बारे में बताया और यह भी बताया कि वह मैहर में रहते हैं। उन्होंने नवाब को यह भी बताया कि महाराज जी द्वारा लिखी गई कई अन्य उत्कृष्ट पंक्तियाँ हैं और कई गायक संगीत के कौशल को जानने के लिए उनकी पंक्तियों को गाते हैं। नवाब उस गायक की सूचना से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने महाराज के लिए अपने संदेश के साथ अपने नाजिर सन्देश वाहक भेजा, जिसमें उनसे लखनऊ आने और अपना भजन सुनाने का अनुरोध किया था। बदले में उन्हें प्रति वर्ष लगभग 3 लाख की राशि के साथ भेंट करने की बात कही थी। महाराज जी ने नरमी से यह कहते हुए धीरे से मना कर दिया कि उनके पास भगवान राम के साथ कुछ कमी नहीं है। जिस नाजिर सन्देश वाहक को सुनिश्चित करने के लिए उसने धन की एक झलक दिखाई, उसके लिए भगवान ने आश्चर्य चकित कर दिया था। वह नवाब के पास लौट आया और उसने वह सब कह सुनाया जो उसने वहां देखा था।
मेंहर में अंतिम सांस :-
महाराज जी विक्रमीय उन्नीसवीं संवत के प्रथम चरण यानी 1842 विक्रमी (अर्थात 1785 ई.) में मैहर में अपना शरीर त्याग कर अमरता प्राप्त की। उनकी समाधि मैहर में ही है। उसे बड़ा अखाड़ा कहा जाता है। यहां राम जानकी मंदिर में आज भी इस पंथ की पुजा पद्वति प्रचलित है। राम सखेन्दु जी महराज के नाम से उनकी ख्याति आज भी विद्यमान है। मैहर के पूर्व राजा की पत्नी ने भी दीक्षा प्राप्त की और साधु, महात्माओं के लिए जगह-जगह पर सहायता प्रदान की। राजस्थान के पुष्कर में राम सखा आश्रम में आज भी इस सम्प्रदाय के लोग पूजा आराधना करते है । अयोध्या, चित्रकूट, पुष्कर और मैहर सबसे प्रमुख स्थान हैं। रीवा, नागोद आदि क्षेत्रों में महाराज जी के शिष्यों की भारी संख्या है।
                       डा. राधे श्याम द्विवेदी 
(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)


साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक - अयोध्या के महाराजा मानसिंह आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृतआयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य कासृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :- 

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली 'सर' की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ "वीर" या "साहसी" होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी ।के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित 'द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड  खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब 'लंबे समय तक चलने वाली' या 'दृढ़ता से लड़ी जाने वाली' लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा 

द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :- 

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लक्षिराम जी ने निम्नलिखित छन्द पढ़ा था -

कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ ।       वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।      कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।

- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

         राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह - बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.राजा रघुबर दयाल सिंह - 

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे।वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह द्विजदेव  :- 

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे।उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों   ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।"

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

    इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

       इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा 

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

    इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

 x        x        x       x         x             

मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।

विरोधियों को मात दिया :- 

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा। 

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:- 

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। "मैं अब अकेला हूँ... पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए," मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :- 

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया 

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। "तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं," सेनापति ने डरते हुए कहा, "यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।"

       मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।" रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था।          राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

     जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, "महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।" मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, "वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

     इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:- 

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें "राजा-बहादुर" की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में "कायम - जंग" की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ "महाराजा " की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था। 

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :- 

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

    एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, "मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।"

     उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन :- 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार :- 

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, "युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।"

   महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :- 

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :- 

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

'द्विजदेव' साहित्यिक उपाधि :- 

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम 'द्विजदेव' है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययन परक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

1.'श्रृंगारबत्तीसी' 

2.श्रृंगारलतिका'

3. 'शृंगार चालीसी' 

4. 'अवमुक्त पंचदशी' 

5. 'मान मयंक' 

6. 'लतिका सौरभ' 

श्रृंगारलतिका :- 

'श्रृंगारलतिका' का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :- 

'श्रृंगारबत्तीसी' भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

'मान मयंक' :- 

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:- 

शृंगार चालीसी' में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है। 

लतिका सौरभ:- 

दोहा - 

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।


शिव भक्ति का दृष्टांत

चौपाई: - 

शिव से प्रेम कीन्ह फल पावा। 

अन्त समय कैलाश सिधावा।१। 

मान सिंह कहैं मंगल दाता। 

हर दम दर्शन दें पितु माता।२। 

(सन्दर्भ :श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' श्री परमहंस राममंगलदास जी द्वारा रचित प्रथम दिव्य ग्रन्थ।(भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ); ग्रन्थ - 1, भाग - २ दिसम्बर २००१।)

भाषा :- 

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था-

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।

आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के 

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।


बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।।


बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन।

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।


भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।


घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव, 

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ, 

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)