Saturday, May 2, 2026

नेपाल की यात्रा आसान, भारत से उसका बनता बिगड़ता संबंध ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी



नेपाल हिमालय की गोद में बसा हुआ अद्भुत देश है ,यहां के लोगों का मिलनसार व्यवहार और ताज़गी भरा वातावरण हमेशा याद किया जाता है। यह देश अपने निर्माण से लेकर वर्तमान समय तक अपनी आध्यात्मिकता पुरातनता को लेकर पूर्ण रूपेण सजग है। केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर ध्यान ना देकर इसकी आध्यात्मिकता और मानव चेतना को समर्पित करते हुए देश को बनाने की कल्पना पूरे विश्व में अनूठी है। ऐसा करने वाले देश शायद तिब्बत और नेपाल ही हैं।

तिब्बत को चीन ने अपने प्रभाव में लेकर उसकी स्वतंत्रता छीन ली है जबकि नेपाल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत है।

अध्यात्म की भूमि:- 

नेपाल अध्यात्म की भूमि है और एक समय में यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी। दुर्भाग्य से इस देश को राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर बेहद उठा-पटक और पतन का दौर देखना पड़ा। यह देश भले ही छोटा हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह खासा महत्वपूर्ण है। अस्थिरता के कारण यह देश अपने आध्यात्मिक खजाने को संभाल नहीं पाया और अब इस पर आधुनिकता की परत चढ़ती जा रही है।

नेपाल को ‘दुनिया की छत’ के रूप में भी जाना जाता है। यह देश है यहाँ आने वाले पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता रहता है। खूबसूरत पहाड़ की चोटियों के साथ- साथ नेपाल बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक प्रमुख धार्मिक केंद्र भी है। इस देश में अपराध की दर काफी कम है जिसकी वजह से यह एक बहुत ही सुरक्षित पर्यटन देश बन जाता है।

यहां  साफ सफाई और यातायात के नियमों का पालन तथा ध्वनि नियंत्रण बहुत अजीब है। लंबी लम्बी लाइनें संयमित रूप से देखी जा सकती हैं।

नेपाल का इतिहास :- 

नेपाल में मूल रूप से शाह वंश का शासन था। उन्होंने सिक्किम (भारत) तक और सतलज नदी से परे अपने साम्राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का विस्तार किया। नेपाल साम्राज्य या राज्य को गोरखा साम्राज्य या गोरखा राज्य के नाम से भी जाना जाता है, जिसका गठन 1768 में हुआ था। ब्रिटिश काल 1814 में अंग्रेजों ने एक युद्ध की घोषणा की और 1816 में नेपाल पर विजय प्राप्त कर ली। अग्रेजों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे भारत और चीन के बीच एक बफर राज्य चाहते थे। सुबौलीसंधि में अंग्रेजों का साथ देने के कारण भारत का विशाल क्षेत्र नेपाल को मिल गया था जिसके निवासी मद्धेशिया कहलाते हैं। इनके घर और संपत्ति दोनों देशों में देखने को मिलती है और ये लोग दो दो देशों के नागरिक बन जाते हैं।

सात प्रांत 77 जिलो में विभक्त:-

नेपाल में सात प्रांत हैं- बागमती, गंडकी, करनाली, कोशी, लुम्बिनी, मधेस और सुदूरपश्चिम । इन 7 प्रदेशों में कुल 77 जिले हैं। नेपाल का संविधान 2015 में अपनाया गया था, जिसमें देश को इन प्रांतों में विभाजित किया गया था। इसको 2006 में धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया था, लेकिन यहाँ हिंदू धर्म के अनुयायियों की संख्या सबसे अधिक है। 2021 की जनगणना के अनुसार, नेपाल एक हिंदू-बहुल देश है, जहाँ 81.19% आबादी हिंदू है। अन्य प्रमुख धर्मों में बौद्ध धर्म (8.21%), मुस्लिम (4.39%), किरात (3.17%), और ईसाई (1.76%) शामिल हैं। हालांकि नेपाल धर्मनिरपेक्ष है, हिंदू धर्म यहाँ की संस्कृति और जीवनशैली में सबसे प्रमुख है।

नेपाल के प्रमुख शहर और उनकी विशेषताएं:- 

काठमांडू- (संस्कृति/राजनीति) नेपाल की राजधानी और सबसे बड़ा शहर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों, ऐतिहासिक दरबार स्क्वायर और जीवंत संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।

पोखरा - नेपाल की 'पर्यटन राजधानी' के रूप में प्रसिद्ध, जो फेवा झील और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला के शानदार दृश्यों के लिए जाना जाता है।

ललितपुर/पाटन - काठमांडू के पास स्थित, जो अपनी ललित कलाओं, वास्तुकला और प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता है।

भरतपुर -: चितवन नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध, जो नेपाल के सबसे प्रमुख व्यावसायिक और चिकित्सा केंद्रों में से एक है।

जनकपुर- मधेश प्रांत की राजधानी और एक पवित्र धार्मिक शहर, जो माता सीता के जन्मस्थान और जानकी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

बिराटनगर - देश के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक बड़ा औद्योगिक और आर्थिक केंद्र।

लुंबिनी - भगवान बुद्ध का जन्मस्थान, जो एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ स्थल है।

बीरगंज  - भारत-नेपाल सीमा पर एक प्रमुख व्यापारिक शहर।

धरान - कोशी प्रांत का एक प्रमुख शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्र।

बुटवल - लुंबिनी प्रांत में स्थित एक तेजी से विकसित होता हुआ व्यावसायिक शहर।

काठमांडू नेपाल की राजधानी :- 

राजधानी काठमाण्डू मे मनोरंजक दृश्य, लुभाने बाज़ार और रात को चमकीले कैसिनो ऐसा लगता था, मानो ये शहर कभी सोता ही नहीं। काठमांडू नेपाल की सांस्कृतिक राजधानी और यहां का बेहद आकर्षक शहर है। काठमांडू शब्द का अर्थ है "लकड़ी का घर" या "काष्ठ का मंदिर"। मूल अर्थ (शाब्दिक): काठ + मांडू = लकड़ी का मंदिर या मंडप।यह संस्कृत के शब्द 'काष्ठमण्डप' (काष्ठ = लकड़ी, मण्डप = मचान/घर) का अपभ्रंश है, जो दरबार स्क्वायर में स्थित एक ही पेड़ की लकड़ी से बने प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर का नाम है। इसका पुराना नाम कांतिपुर (शहर-ए- रोशनी) के नाम से जाना जाता था। इसे कांतिपुर (प्रकाश का शहर) भी कहा जाता था। यह शहर नेपाल का एक ऐसा स्थान है जो यहां आने वाले पर्यटकों को बेहद रोमांचित करता है। माना जाता है कि यह शहर 723 ईस्वी में राजा गुणकामदेव द्वारा बसाया गया था। यह शहर सदियों से नेवार संस्कृति का केंद्र रहा है और अपने ऐतिहासिक मंदिर (विशेषकर काष्ठमंडप) के कारण "काठमांडू" कहलाया। यह नाम स्वयं काष्ठमंडप से उत्पन्न हुआ है, जो गुरु गोरखनाथ द्वारा दान किए गए एक पवित्र साल के पेड़ से निर्मित एक मंडप है। यह राजाओं के लिए नहीं, बल्कि समुदाय के लिए बनाया गया था, एक ऐसा स्थान जहाँ लोग इकट्ठा हो सकें, आपस में मिल-जुल सकें और अपनापन महसूस कर सकें।

काठमांडू एक ऐसा शहर है जिसमे 1.5 मिलियन से अधिक लोगों का घर है। यह शहर 1400 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जो पूरे साल यहां आने वाले यात्रियों को आनंदमय वातावरण देता है। काठमांडू, अपने मठों, मंदिरों और आध्यात्मिकता के साथ एक शांति वाली जगह है। शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ यात्रियों को अन्य पर्यटन स्थलों से अलग अनुभव करवाता है। काठमांडू में बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म के साथ-साथ शहर के धार्मिक परिदृश्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है । दोनों धर्म वास्तव में काफी सामंजस्य पूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में हैं, और दैनिक जीवन के कई पहलुओं में उनकी प्रथाओं और प्रभावों का मिश्रण देखने को मिलता है।

पोखरा :- 

पोखरा शहर अपनी झीलों की वजह से बहुत प्रसिद्ध है इसलिए आप यहाँ पहुँच कर झील के किनारे होटल में कमरा ले लें।  अगर आप सुबह पहुँचे हैं तो कुछ देर आराम करने के बाद पैदल ही शहर की यात्रा करने निकल सकते हैं। फेवा झील यहाँ की सबसे मशहूर और लम्बी झील है। झील में घूमने के लिए आपको वहाँ ₹400 में नाव मिल जाएगी जो इस खूबसूरत झील की सुन्दरता और ठहराव दोनों का अनुभव करवाएगी। सारंग्कोट और शांति स्तूपा पोखरा के आस पास बहुत मशहूर हैं तो अगर आपके पास वक़्त हो तो आप 1-2 दिन वहाँ रुक कर बाकि जगह भी घूम सकते हैं।

नेपाल की यात्रा :- 

भारतीय नागरिक बिना वीजा के, वैध पहचान पत्र ( मतदाता पहचान पत्र या पासपोर्ट) के साथ सड़क या हवाई मार्ग से नेपाल की यात्रा कर सकते हैं। नेपाल की यात्रा करते समय निम्न बातों का पालन करना चाहिए- 

1.यात्रा और दूरी के हिसाब से नकदी रखे।  सिक्के तो होने ही चाहिए । सारे पैसे एक ही पॉकेट या पर्स में न रखे।

2. समान कम से कम रखे। जरूरत के अनुसार खरीद लें।

3.पानी हमेशा अपने पास रखे और शरीर में ग्लूकोज लेवल बनाए रखने वाले खाने जैसे कि चॉकलेट, मीठे बिस्कुट जरूर रखे।

4. मोबाइल को पूरी तरह से इंटरनेशन पैक के साथ चार्ज रखे। सिर्फ मोबाइल के भरोसे न रहे ।अपने पारिवरिक सदस्यों एवं कुछ मित्रो के नंबर याद रखे ।

5.साथ मे सेनेटाइजर एवं टिश्यू पेपर भी रखे ।

6.यात्रा में निकलने से पहले अपने बस/ट्रैन/ फ्लाइट की सूचना अपने किसी जानकार को अवश्य दे । यदि अकेले हो तो इसकी जानकारी किसी अनजान लोग या सहयात्री को न दे । 

7.यात्रा के समय बोरियत से बचने के लिए अपनी रुचि अनुसार किताब, फिल्मे या गेम अपने साथ रखे ।

डॉक्यूमेंट्स क्या क्या रखें :- 

नेपाल जाने से पहले निम्न लिखित डॉक्यूमेंट्स तैयार रखें- 

भारत से नेपाल यात्रा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि आपको वीज़ा की ज़रूरत नहीं है। आपको नेपाल घूमने के लिए अपना पासपोर्ट, कुछ पासपोर्ट साइज़ की फ़ोटो और अपना वोटर आई.डी. तैयार रखें। अगर आप विदेशी मुद्रा के बारे में सोच रहे हैं तो यहाँ भी आप फ़ायदे में हैं। नेपाल में भारतीय रुपया चलता है तो जहाँ तक हो सके ₹100 के भारतीय नोट लेकर जाएँ। अगर आपके पास एसबीआई का एटीएम कार्ड है तो आप नेपाल के एस बी आई बैंक से पैसे भी निकल सकतें हैं।

भारत से नेपाल तक कैसे पहुँचे- 

वैसे तो नेपाल तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। आप दिल्ली से काठमांडू की हवाई यात्रा कर सकते हैं पर ये आपके लिए महंगी होगी। अगर आप रोड यात्रा करना चाहते हैं तो आपको दिल्ली से नेपाल के लिए सीधे बस भी मिलेगी पर ये यात्रा 30 घंटे लम्बी होगी, इसलिए सबसे सस्ता और सरल रास्ता होगा कि आप उत्तर प्रदेश के गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे और वहाँ से भारत नेपाल बॉर्डर सोनौली के लिए ट्रेन की टिकट ले लें। अगर आप बड़े ग्रुप में कई साथियों के साथ घूमने गए हैं तो आप जीप या कैब से भी गोरखपुर से सोनौली तक पहुँच सकते हैं। गोरखपुर से भारत नेपाल बॉर्डर 248 कि.मी. की दूरी पर है जहाँ पहुँचने में आपको 6-7 घंटे का वक़्त लगेगा।

सोनौली पहुँचने के बाद आपके पास दो रास्ते होंगे। पहले सोनौली से काठमांडू तक का जो वहाँ से 285 कि.मी. की दूरी पर है और दूसरा सोनौली से पोखरा का जो वहाँ से 148 कि.मी. पर है। सुझाव है कि आप पोखरा की ओर जाएँ। पोखरा और काठमांडू कुल मिलाकर एक जैसे ही हैं बस पोखरा में यात्रियों की भीड़ कम होती है तो आपको बेहतर अनुभव मिलेगा। साथ ही पोखरा काठमांडू से हर मायने में किफायती है।

भारत और नेपाल के बीच संबंध :- 

भारत और नेपाल के बीच पुरातन संबंध सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से "रोटी-बेटी के रिश्ते" (वैवाहिक और रोटी-रोजी) पर आधारित हैं। सदियों से साझा हिंदू-बौद्ध परंपराएं, खुली सीमाएं (1950 की संधि) और रामायण काल से चला आ रहा सीता-राम का संबंध दोनों देशों को अटूट रूप से जोड़ता है। लुम्बिनी (बुद्ध का जन्मस्थान) और पशुपतिनाथ (नेपाल) तीर्थयात्रा इस सांस्कृतिक कड़ी के प्रमुख स्तंभ हैं।  भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म में समान विश्वास रखते हैं। नेपाल के जनकपुर (माता सीता का जन्मस्थल) और भारत के अयोध्या के बीच पौराणिक संबंध हैं। वहीं, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोधगया में हुआ था। 

दोनों देशों के बीच लगभग 1,850 किमी लंबी खुली सीमा है। इस सीमा के आर- पार नेपाली और भारतीय नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं, जो इन संबंधों की अद्वितीयता को दर्शाता है। दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ रिश्ते और नातेदारी है, जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है। प्राचीन समय (कीरात काल) से ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध रहे हैं।आधुनिक काल में, 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने इन ऐतिहासिक संबंधों को एक औपचारिक आधार प्रदान किया। यद्यपि, कुछ सीमा विवाद (जैसे कालापानी) समय-समय पर चर्चा का विषय बनते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच के गहरे सांस्कृतिक और आत्मीय संबंध हमेशा अटूट रहे हैं।

कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों में छूट:- 

भारत-नेपाल व्यापार संधि 1996 के अनुसार, दोनों देश प्राथमिक उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों से पारस्परिक छूट देते हैं, लेकिन औद्योगिक उत्पादों पर भारत नेपाल को विशेष छूट देता है जो गैर-पारस्परिक है। 

नेपाल के '100 NPR वाले नियम' को सख्ती से लागू करने पर भारत काउंटर- ड्यूटी या नए प्रतिबंध लगा सकता है, जैसा कि हालिया चाय निर्यात पर सख्त नियमों से संकेत मिला है।नेपाल सरकार द्वारा भारत से 100 नेपाली रुपये (लगभग 65 भारतीय रुपये) से अधिक मूल्य के सामान पर सख्त कस्टम ड्यूटी लगाने के '100 वाले नियम' के जवाब में भारत सरकार ने काउंटर कदम उठाने का संकेत दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि यह नियम सीमावर्ती व्यापार और 'रोटी-बेटी' के रिश्ते को नुकसान पहुंचा रहा है, जिसके जवाब में भारत नेपाल से आने वाले सामानों पर समान या कठोर टैरिफ लगा सकता है।

भारत के संभावित काउंटर नियम :- 

भारत नेपाल बॉर्डर पर आने वाले नेपाली व्यापारियों और यात्रियों के लिए 100 भारतीय रुपये से अधिक के हर सामान पर 10-50% कस्टम ड्यूटी लगा सकता है। इसके अलावा, नेपाली नंबर वाली गाड़ियों पर सालाना 30 दिनों से ज्यादा प्रवेश पर प्रतिदिन 2000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम नेपाल के भंसार महाशुल्क एक्ट का सीधा जवाब होगा, जो नेपाल के निर्यात जैसे चाय, जड़ी-बूटियां और हस्तशिल्प को प्रभावित करेगा। 

नेपाल को होने वाला आर्थिक नुकसान

इससे नेपाल को सालाना 11-13 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारी कमी आएगी, क्योंकि नेपाली लोग सस्ते भारतीय सामान जैसे किराना, दवाइयां और कपड़े खरीदना बंद कर देंगे। सीमावर्ती इलाकों में रोजगार प्रभावित होगा, छोटे व्यापारी और दैनिक मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। नेपाली अर्थव्यवस्था पहले से ही भारत पर निर्भर है, ऐसे में महंगाई बढ़ने और स्थानीय उत्पादों की कमी से आम जनता को 20-30% ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। 

बालेन शाह सरकार का यह नियम घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने का दावा करता है, लेकिन भारत के जवाबी कदम से नेपाल की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नुकसान हो सकता है। दोनों देशों के बीच बातचीत से विवाद सुलझने की उम्मीद है। 

नेपाल की राजनीति इस समय एक अहम मोड़ पर खड़ी है। बालेन शाह, जो हाल ही में छात्र आंदोलनों की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए, अब खुद उसी जनभावना के दबाव में नजर आ रहे हैं।

सरकार बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि दो मंत्रियों—जिसमें गृह मंत्री भी शामिल हैं—को इस्तीफा देना पड़ा। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार के भीतर स्थिरता की कमी है और फैसलों को लेकर दबाव बढ़ रहा है। खासतौर पर छात्र संघ से जुड़े मुद्दों ने युवाओं में नाराज़गी पैदा कर दी है, जो कभी बालेन के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे।

भारत-नेपाल सीमा से लगे इलाकों में हो रहे विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि असंतोष सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी फैल रहा है। यही वो वर्ग है जिसने बदलाव की उम्मीद में बालेन शाह को सत्ता तक पहुंचाया था।

भारतीय सामान पर लगाया गया टैक्स नियम वापस हुआ :- 

नेपाल सरकार ने भारतीय सामान पर लगाया गया सख्त टैक्स नियम वापस ले लिया है। भारी घरेलू विरोध के बाद उसे यू-टर्न लेना पड़ा है। दरअसल अप्रैल 2026 में बालेन शाह के नेतृत्व में नियम सख्ती से लागू किए गए थे, जिनके तहत भारत से 100 नेपाली रुपये से ज्यादा का सामान लाने पर ड्यूटी लग रही थी, जो कुछ मामलों में 80% तक पहुंच रही थी। सीमा पर जांच इतनी कड़ी थी कि छोटे सामान जैसे - चिप्स के पैकेटभी जब्त किए जा रहे थे। विरोध बढ़ने पर सरकार ने अब फैसला वापस ले लिया।


लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, May 1, 2026

नेपाल का चितवन राष्ट्रीय उद्यान और थारू सांस्कृतिक केंद्र✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल का पहला राष्ट्रीय उद्यान है। जिसे पूर्व में रॉयल चितवन राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना जाता था । इस उद्यान का मुख्य द्वार निकटतम शहर भरतपुर से 10 किलोमीटर दूर स्थित है । यह राष्ट्रीय उद्यान बागमती प्रांत के चितवन, मकवानपुर, परसा और नवलपरासी क्षेत्रों में राप्ती, नारायणी और रियू जैसी बड़ी नदियों से घिरा हुआ है। यह नेपाल का पहला और सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है । इस उद्यान की यात्रा के लिए, भरतपुर से टांडी होते हुए सड़क मार्ग से प्रवेश किया जा सकता है।भरतपुर हवाई अड्डे पर प्रतिदिन उड़ानें उपलब्ध होती हैं ।
राष्ट्रीय उद्यान :- 
वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निर्धारित क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान नेपाल के मध्य तराई क्षेत्र में स्थित है , जो जैव विविधताओं से समृद्ध है । उद्यान का मुख्यालय कसारा में स्थित है, जहाँ से सभी प्रशासनिक कार्य संचालित होते हैं। इसकी ऊँचाई निचली नदी घाटी में 100 मीटर (330 फीट) से लेकर चुरे पहाड़ियों में 815 मीटर (2,674 फीट) तक है ।19वीं शताब्दी तक, यह उद्यान वनों का हृदय स्थल है।
विकास क्रम :- 
1950 के दशक तक, दक्षिणी नेपाल से काठमांडू की यात्रा इतनी कठिन थी कि वन मार्गों का उपयोग करने वाले यात्री बाघों, भालुओं, गैंडों और चीतों का शिकार करने के लिए महीनों तक वहीं डेरा डाले रहते थे। इस समय तक, चितवन के वन और घास के मैदान 2,600 वर्ग किमी (1,000 वर्ग मील) तक फैल चुके थे , जो लगभग 800 गैंडों का आवास प्रदान करते थे। 1951 तक, चितवन घाटी सर्दियों के दौरान नेपाल के शासक वर्ग का लोकप्रिय शिकारगाह था।
मध्य पहाड़ियों के गरीब किसान जब कृषि योग्य भूमि की तलाश में चितवन घाटी में आए, तो उन्होंने जंगलों को साफ करके बस्तियाँ बसा लीं, और वन्यजीवों का अवैध शिकार व्यापक हो गया। 1957 में, देश का पहला संरक्षण कानून गैंडों और उनके आवासों की रक्षा पर केंद्रित था। 1959 में, एडवर्ड प्रिचर्ड गी ने एक सर्वेक्षण किया जिसमें उन्होंने राप्ती नदी के उत्तर और दक्षिण में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए दस साल की परीक्षण अवधि की सिफारिश की। 
1960 के दशक के अंत तक, डीडीटी का उपयोग करके 70% जंगलों को साफ कर दिया गया था और हजारों लोग वहां बसने लगे थे, जिससे गैंडों की आबादी घटकर 95 रह गई थी। गैंडों की संख्या में इस भारी गिरावट और बढ़ते अवैध शिकार ने सरकार को चितवन के सभी हिस्सों में गश्त करने के लिए 130 सशस्त्र कर्मियों और सुरक्षा चौकियों के एक नेटवर्क से युक्त एक गैंडा गश्ती इकाई स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
चितवन के एक बाद के सर्वेक्षण के बाद, 1963 में उन्होंने सिफारिश की। वन्यजीव संरक्षण सोसायटी और प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ दोनों इस क्षेत्र को दक्षिण की ओर विस्तारित करें। गैंडों के अवैध शिकार को रोकने के लिए, चितवन राष्ट्रीय उद्यान को 1970 में नामित किया गया था और शुरू में 1973 में इसका क्षेत्रफल 544 वर्ग किमी ( 210 वर्ग मील) था। 
राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित :- 
बाद में 2030 बी.एस. 1973 ई में इसे राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित कर दिया गया। 
1977 में, पार्क का विस्तार करके इसे वर्तमान 932 वर्ग किमी (360 वर्ग मील) क्षेत्र में फैला दिया गया। 1997 में, नारायणी -राप्ती नदी प्रणाली के उत्तर और पश्चिम तथा पार्क की दक्षिण-पूर्वी सीमा तथा भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच 766.1 वर्ग किमी (295.8 वर्ग मील) का एक बफर जोन जोड़ा दिया गया। वर्तमान समय में इसका क्षेत्रफल 952.63 वर्ग किलोमीटर है। यह राष्ट्रीय उद्यान 1984 से विश्व धरोहर सूची में शामिल कर दिया गया है।
विविध जीव जन्तु:- 
हर साल हजारों पर्यटक इस राष्ट्रीय उद्यान में आते हैं। राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 70 प्रतिशत वन क्षेत्र में साल के जंगल हैं। यहां एक सींग वाला गैंडा पाया जाता है, जिसे विश्व में दुर्लभ माना जाता है। यहां 605 एक सींग वाले गैंडे हैं। यहां 96 अत्यंत दुर्लभ तेंदुए भी पाए जाते हैं। इसी प्रकार, यहां हाथी, गौरी गाय, जंगली भालू, तेंदुए, रतुवा, चीतल, लगुना, जरायो, चौसिंगे और बंदर सहित 60 से अधिक प्रकार के स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। इस पार्क में घड़ियाल, मगर मगरमच्छ और अजगर सहित सरीसृप और उभयचर भी पाए जाते हैं। यह पार्क प्रवासी और स्थानीय पक्षियों की 546 से अधिक प्रजातियों का भी घर है। यहां विभिन्न प्रकार के कीड़े और टिड्डे भी पाए जाते हैं।
 यहां स्थित बिसहजरी झील को 2003 में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। कीचड़ और पानी वाली जगह को आर्द्रभूमि कहते हैं। बिसहजरी झील में मोर सहित रंग-बिरंगे पक्षियों का झुंड भी देखा जा सकता है। इस पार्क में वाल्मीकि आश्रम और विक्रम बाबा जैसे धार्मिक स्थल संरक्षित हैं। 
घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र:- 
यहां घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र है। वहां आप छोटे मगरमच्छों को धूप और ठंडक में पलते-बढ़ते देख सकते हैं। आप पिंजरे में बंद एक तेंदुए को भी देख सकते हैं। आपको कई हाथी भी देखने को मिलेंगे। खोरसौर स्थित हाथी प्रजनन केंद्र में छोटे हाथियों को पलते-बढ़ते देखकर आनंद लिया जा सकता है।
पक्षी विहार:- 
राप्ती नदी के किनारे चखेवा पक्षियों के प्रवासी जोड़े देखे जा सकते हैं। पर्यटक अक्सर सूर्यास्त देखने के लिए सौराहा जाते हैं। यहाँ मोर नाचते हुए, पशु पानी पीते हुए, घड़ियाल नदी पार करते हुए और हाथी नहाते हुए देखे जा सकते हैं। पार्क से जुड़े राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण ट्रस्ट में आप चंचल गैंडों के बच्चों के साथ खेल सकते हैं। यहाँ आप हाथी, जीप या नाव की सवारी का आनंद ले सकते हैं। आप जंगल में घूमते हुए हिरणों और मृगों के झुंड देख सकते हैं और उनके साथ तस्वीरें ले सकते हैं। आप स्थानीय बोते, मांझी, मुसहर, चेपांग और थारू समुदायों द्वारा संरक्षित झीलों को भी देख सकते हैं।  
जलवायु:- 
चितवन में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है, जहाँ पूरे वर्ष भारी वर्षा होती है। यह क्षेत्र मध्य हिमालयी जलवायु में स्थित है, इसलिए मानसून का मौसम जून के मध्य में शुरू होता है और सितंबर के अंत में समाप्त होता है। इस 14-15 सप्ताह की अवधि के दौरान, इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 2500 मिमी से अधिक वर्षा होती है।पार्क के भीतर सबसे बड़ी झील, देवी झील, साथ ही तामर झील, मुंडी झील और पार्क के भीतर की बड़ी झीलें, लामिकताल, सूख रही हैं। 
पशु पक्षी:- 
यह पार्क विशेष रूप से अपने एक सींग वाले गैंडे और तेंदुए के लिए प्रसिद्ध है । इस पार्क में स्तनधारियों की 43 प्रजातियाँ, पक्षियों की 450 प्रजातियाँ, जलीय जीवों और सरीसृपों की 45 प्रजातियाँ और मछलियों की 100 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख स्तनधारियों में हिरण , चीतल , बंदर और लंगूर शामिल हैं ।
पर्यटन :- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। इसके दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं: पूर्व में सौराहा और पश्चिम में मेघाउली गाँव। यह पार्क सफारी, पैदल यात्रा और जीप सफारी के लिए भी लोकप्रिय है। 
सौराहा गांव:- 
सौराहा नेपाल के केंद्रीय विकास क्षेत्र के नारायणी जोन के चितवन जिले में स्थित एक गाँव है । यह आकर्षक पर्यटन स्थल भी है। चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। 
सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक केंद्र के कार्यक्रम:- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक परम्परा को जीवित रखने और प्रचार प्रसार करने के लिए विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक नाट्य बाद्य प्रोग्राम नियमित रूप से आयोजित होते रहते हैं। जिसके मुख्य विशेषता सांस्कृतिक नृत्य: थारू समुदाय का परम्परागत नृत्य यथा : लाठी नाच, झुमरा, और अन्य स्थानीय नाच का प्रदर्शन किया जाता है। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम: New Sauraha Tharu Cultural House के वातानुकूलित प्रेक्षागृह में प्रत्येक शाम को परम्परागत नृत्य और संगीतको कार्यक्रम होता है। इनका रहन सहन और पहनावा थारू भेषभुषा और परम्परागत रूप से होता है। खानपान और परंपरागत रूप से होता है। इसका उद्देश्य थारू जाति को पहिचान, भाषा, साहित्य, और मौलिक संस्कृति का संरक्षण और प्रवर्द्धन करना होता है।
लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
मोबाइल नंबर +91 9412300183